चेतन अब धरि सहजसमाधि, जातैं यह विनशै भव ब्याधि ।।टेक।।
मोह ठगौरी खायके रे, परको आपा जान ।
भूल निजातम ऋद्धिको तैं, पाये दुःख महान् ।।१।।चेतन. ।।
सादि अनादि निगोद दोयमें, पर्यो कर्मवश जाय ।
श्वासउसासमँझार तहां भव, मरन अठारह थाय ।।२।।चेतन. ।।
कालअनन्त तहां यौं बीत्यो, जब भइ मन्द कषाय ।
भूजल अनिल अनल पुन तरु ह्वै काल असंख्य गमाय ।।३।।चेतन. ।।
क्रमक्रम निकसि कठिन तैं पाई, शंखादिक परजाय ।
जल थल खचर होय अघ ठाने, तस वश श्वभ्र लहाय ।।४।।चेतन. ।।
तित सागरलों बहु दुख पाये, निकस कबहुं नर थाय ।
गर्भ जन्मशिशु तरुणवृद्ध दुख, सहे कहे नहिं जाय ।।५।।चेतन. ।।
कबहूं किंचित पुण्यपाकतैं चउविधि देव कहाय ।
विषयआश मन त्रास लही तहं, मरन समय विललाय ।।६।।चेतन. ।।
यौं अपार भवखारवार में, भ्रम्यो अनन्ते काल ।
‘दौलत’ अब निजभावनाव चढि, लै भवाब्धिकी पाल ।।७।।चेतन. ।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ११८ से ११९
