चेतै छै तो आछी बेल्यां चेतरे ज्ञानीजिया
(राग सारंग)
चेतै छै तो आछी बेल्यां चेतरे ज्ञानीजिया,
मोह अन्धेरी शिवपुर आंतरो ॥टेर ॥
या देही को झूंठो छै अभिमानरे ज्ञानी जिया,
विनश होवैरे ढेरी राखकी॥१॥
तू मत जाने यो मेरो परिवार रे, ज्ञानी जिया,
लैर न आयो नाहीं जावसी ॥२॥
लक्ष्मी तो दिन चार रे ज्ञानी जिया,
काज सुधारे क्यों न आपनो ॥३॥
पूरव पुण्य प्रभावरे ज्ञानी जिया,
उत्तम श्रावक कुल लियो ॥ ४ ॥
पाये-पाये श्री जिनराजरे ज्ञानी जिया,
‘जोंहरी’ चित्त चरणन धरो ॥५ ॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ४२ (विभिन्न कवियों के भजन)
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