चौबीस तीर्थंकर महापुराण (हरिलाल जैन) | Chaubis Tirthankar Mahapuran

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भगवान नेमिनाथ (भाग ३)

एक ओर सहस्राम्रवन मे नेमिप्रभु आत्मध्यान कर रहे है, दूसरी ओर राजमहल के झरोखे मे खड़ी हुई राजकुमारी राजुल नेमि-दूल्हाराजा को वैराग्य प्राप्त करते देखकर तथा रथसे उतरकर वनकी ओर जाता देखकर मनमे कहने लगी-अरे, प्रभो ! आपको यदि विवाह नही करना था तो फिर बारात लेकर यहाँ तक किसलिये आये ? दूल्हा क्यों बने ?..या फिर पशुओं की भाँति मुझे भी ससार-बन्धन से छुड़ाने के लिये यह एक नाटक ही था ! अपने साथ मुझे भी मोक्षपुरीकी राहमें ले जाने हेतु क्या आप यहाँ पधारे थे ? धन्य प्रभो ! आपकी लीला अपार है ! आपके जीवन से सम्बन्धित होने में मेरे हितकर कोई दैवी सकेत है।

हे देव ! आप मुनि होकर वनमें आयेंगे, तो मैं क्या रो-धोकर संसार मे ही बैठी रहूँगी ?-नहीं, मैं भी वीरपुत्री हूँ, आपकी अर्द्धांगी कहला चुकी हूँ, तो मैं भी आपके ही मार्गपर आऊँगी, आपको छोड़कर दूसरे मार्गपर नहीं जाऊँगी। आप होंगे मुनिराज, तो मैं बनूँगी आर्यिका; आप होंगे परमात्मा. .तो मैं होऊँगी एकावतारी !

मुझे लगे संसार असार,
ऐ रे संसार में नहीं जाऊँ…नहीं जाऊँ, नहीं जाऊँ रे…
मुझे लगे वैराग्य-पद सार,
प्रभुमार्गे चली जाऊँ, चली जाऊँ, चली जाऊँ रे…

माता-पिता एवं पारिवारिक जनोंने राजुल को बहुत समझाया कि-बेटी ! अभी तुम्हारा विवाह नहीं हुआ है; नेमिकुँवर के साथ सात फेरे नहीं हुए हैं इसलिये तुम अभी कुमारिका ही हो; बेटी हम किसी दूसरे राजकुमार के साथ तुम्हारा विवाह करेंगे।

परन्तु दृढ़प्रतिज्ञा राजीमती ने उन सबकी बात अनसुनी करके दृढ़ता पूर्वक कहा-फेरे नहीं हुए उससे क्या ? मैं नेमिकुमार का हृदय से वरण कर चुकी हूँ; वे ही मेरे स्वामी और जी~साथी हैं; मेरे हृदय में किसी और का स्थान नहीं है। अब सांसारिक भोगों के बदले मोक्ष की साधना में मैं उनकी संगिनी बनूँगी और अपने धर्मनाथ के पंथ पर चलकर अपना आत्मकल्याण करूँगी। इस प्रकार धर्मवीर राजीमतीने आर्यिका बनने का अपना दृढ़निश्चय प्रगट किया।

राजीमती का ऐसा दृढ़ वैराग्य देखकर सबके मुँह से धन्यवाद के उद्गार निकल पड़े-धन्य राजुल ! तू अपने हृदयेश्वर नेमप्रभु के रंगमें ऐसी रंग गई कि मोक्षपुरी तक उनका साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने तुझे छोड़ा परन्तु तूने उन्हें नहीं छोड़ा। अनेक राजकुमारियाँ भी राजुल के साथ दीक्षा लेने को तैयार हो गई।

‘अरे, मेरे स्वामी मोक्षमें आनन्द करें और मैं संसार भ्रमण करके दुःखी होऊँ ? -कदापि नहीं; मैं भी प्रभुके साथ ही रहूँगी’-ऐसे निश्चयपूर्वक सैंकड़ों राजकुमारियोंसहित राजीमती ने दीक्षा ग्रहण की, और गिरनार की गिरिगुफा में आत्मासाधना करने लगी।

अब हम पुनः सहस्राम्रवन में नेमिप्रभु के पास चलें-दीक्षा लेकर दूल्हाराजा से मुनिराजा बने नेमिप्रभुने आत्मध्यान में उपयोग को लगाया है; तुरन्त ही उन्हें शुद्धोपयोग में सातवाँ गुणस्थान प्रगट हुआ है, मात्र संज्वलन के अतिरिक्त समस्त कषाय दूर हो गये हैं; मनःपर्ययज्ञान एवं चौदहपूर्वरूप श्रुतकेवलीपना उदित हुआ है, अनेक दिव्य लब्धियाँ भी प्रगट हुई हैं। आसपास अन्य हजारों मुनियों से वह तपोवन मुक्तिमण्डप की भाँति सुशोभित हो रहा है। विवाह के समय बंधन से छुड़ाये हुए वे पशु भी प्रभु के पीछे-पीछे वन में जाकर उनके निकट ही रहने लगे हैं। अहा ! शान्ति किसे प्रिय नहीं होती ? हजारों-लाखों मोक्षार्थी जीवोंने प्रभुके दीक्षाप्रसंग पर उनके वैराग्यजीवन को देखकर अपने जीवन को भी ज्ञान-वैराग्य में लगाया। अहा, उस काल गिरनार का गौरव भी आश्चर्यकारी था; वहाँ मोक्षसाधक मुनिवरों का समूह ऐसे शोभा देता था मानो ‘सिद्धों का मेला !’

गिरनार का समस्त वनप्रदेश वैराग्य में निमग्न हो रहा था; सर्वत्र शांति छा रही थी। अहा, उन शान्त ध्यानस्थ मुनिवरों के प्रति आकर्षित होकर केवलज्ञान भी शीघ्रतासे उनके निकट आ रहा था। इन्द्रों तथा श्रीकृष्ण-बलभद्र आदि ने भी मस्तक झुकाकर बारम्बार उन नेमिनाथ मुनिराज के दर्शन-स्तुति की। अहा, श्रीकृष्ण भी जिनके चरणों में भक्तिपूर्वक नमन करते थे ऐसे प्रभु नेमिनाथ हमें आनन्दमय जिनदीक्षा दो।

दीक्षा के पश्चात् तीसरे दिन नेमि-मुनिराज आहार के लिये जूनागढ़ नगरी में पधारे, तब श्रद्धादि गुणों से विभूषित वरदत्त राजाने उन तीर्थंकर मुनिराज को शुद्ध आहारदान देकर प्रथम पारणा कराया, और पश्चात् स्वयं भी प्रभुचरणों में दीक्षा लेकर प्रभुके गणधर तथा चरमशरीरी बने। देवों ने रत्नवृष्टि करके तथा दिव्यवाद्य बजाकर उस उत्तम दानकी अनुमोदना की।

रत्नत्रय वैभवके धारी मुनिराज नेमिनाथ स्वयं मोक्षमार्गरूप होकर मौन धारण करके ५६ दिन तक सौराष्ट्र देशके आसपास विचरे। उस चलते-फिरते ‘जीवन्त मोक्षमार्ग’ के दर्शन से सौराष्ट्र की धर्मप्रेमी प्रजा धन्य हुई। अहा, उन्हें देखकर भव्य जीवों को मोक्षमार्ग के स्वरूप का ज्ञान हो जाता था। वे एक छोटे-से परमात्मा थे, द्रव्य-तीर्थंकर थे, आत्मा की लौ में लवलीन थे; परमात्मपद की साधना हेतु आत्मा की गहराई में उतरकर उसी में उपयोग को स्थिर करते थे। ऐसी शुद्ध परिणतिसहित विचरते हुए वे निर्मोही महात्मा ५६ दिवस पश्चात् पुनः गिरनार के तपोवन में पधारे और जहाँ दीक्षा ली थी उसी दीक्षावन में ध्यानस्थ हुए। उनके परिणाम अधिकाधिक स्थिर होने लगे, शुद्धोपयोग की धारा उल्लसित होने लगी; एक मुहूर्त में तो हजारों बार उन्हें शुद्धोपयोग हुआ; उनकी शुद्धता देखते ही भव्यात्माओं के अंतरसे भक्ति के उद्गार निकलते थे - रे ‘शुद्ध’ ने श्रामण्य धारव्युं, ज्ञान-दर्शन ‘शुद्ध’ ने; छे ‘शुद्ध’ ने निर्वाण ‘शुद्ध’ ज सिद्ध, प्रणमुं तेमने।

आत्मा ऐसे ‘शुद्ध’ रुप में परिणमित हो यही उनका मनोरथ था। आज वह मनोरथ सम्पूर्ण होने की घड़ी आ पहुँची। प्रभु नेमिमुनिराज सातिशय ध्यान द्वारा शुद्धता की ऐसी धारारूप परिणमित हुए कि अब उसमें भंग नहीं पड़ेगा। वे क्षपकश्रेणी पर चढ़ने लगे। प्रभु के अंतर में चैतन्य का नन्दनवन अनंतगुणों की विशुद्धता से विकसित होने लगे…और उसके प्रभावसे बाह्य में गिरनार का तपोवन भी हजारों मधुर आम्रफलों से खिल उठा…मानो गिरनार पर्वत और वन उन आम्रफलों द्वारा प्रभुके केवलज्ञान का स्वागत करता हो ! प्रभुके अंतरमें तो ध्येय, ध्यान एवं ध्याता तथा ज्ञेय, ज्ञान एवं ज्ञाता एकाकार हो रहे हैं;

हम तो सहसावन के वासी, हम तो मुनियों के सहवासी. . हम तो रत्नत्रय के प्यासी, हम तो मुनिजीवन अभ्यासी… हम तो जगसे बने उदासी, हम तो सहसावनके वासी ! शांत-शांत स्वरूपकों ध्यावेंगे, आनंद-मंगलरूप ही होयेंगे; अतर् स्वरूप मांही समायेंगे, अदभुत निजवैभवको पायेंगे; परिग्रह रहित होकर रहेंगे, मोक्षपुरीके पंथमें विचरेंगे; निर्विकल्प-गुफामें ठरेंगे, सिद्ध, स्वरूपमें केलि करेंगे . -ऐसे मुनिजीवन-अभ्यासी हम तो सहेसावनके वासी

हम तो सर्व जगतके संबंध छोड़ेंगे, मुनिवर संघ की साथ रहेंगे;
संतजनोकी सेवा करेंगे, स्वानुभूतिका प्रासाद लेंगे;
उपशमरसमें सदीव रहेंगे, आत्मिकजीवन सत्य जीयेंगे;
रत्नत्रय-शुद्धरुपे रहेंगे, केवलज्ञानको शीघ्र ही लेंगे…
-ऐसे मुनिजीवन अभ्यासी,
हम तो सहेसावनके वासी. .

[इस पुस्तक के लेखक सम्पादक द्वारा सहस्राम्रवन मे बैठे-बैठे भायी हुई भावना]

वहाँ न तो कोई विकल्प है और न कोई बाह्यवृत्ति एक छोटे-से क्षणमें ही शुक्ल ध्यानचक्र के प्रहार द्वारा समस्त कषाय-शत्रुओं का नाश करके प्रभु वीतराग हुए और समस्त घातिकर्मों भी नष्ट करके सर्वज्ञ हुए, शुद्ध हुए, बुद्ध हुए, केवलज्ञानी-अरिहंत परमात्मा-जिन हुए। पुनः धन्य हुआ वह गिरनारधाम और उसका आम्रवन, कि जिसने पाँचवें से लेकर तेरहवें तक के उत्तम गुणस्थानों में विराजमान प्रभुको साक्षात् देखा…जहाँ प्रभुके दीक्षा एवं केवलज्ञान के महान कल्याणक हुए। धन्य वह भूमि…जहाँ पुनः पुनः तीर्थंकर प्रभु का आगमन हुआ। उस तपोवन-सहस्राम्रवन का परम शांत वातावरण आज भी हमें तीर्थंकरप्रभु की महिमा एवं आत्मसाधना की मंगलकथा सुना रहा है। ‘णमो जिणाणं जितभवाण’ भवको जीतनेवाले जिनों को नमस्कार !

श्रीकृष्ण के राजदरबार में-

नेमिप्रभु के केवलज्ञान की मंगल बधाई और उसकी महिमा

द्वारिकानगरी में भव्य राजसभा भरी है। महाराजा समुद्रविजय तथा बलदेव-वासुदेव (श्रीकृष्ण चक्रवर्ती) आदि बैठे हैं और नेमिनाथप्रभु का गुणगान किया जा रहा है। इतने में एक दूतने राजसभा में प्रवेश किया और अत्यन्त हर्षपूर्वक कहने लगा- (यह प्रसंग वीरसंवत् २५०१ में वढवाण-वर्धमानपुरी में नेमिप्रभु के पंचकल्याणक हुए उस समय लिखा गया है; और उसमें दूतके रुप मे केवलज्ञान की बधाई का कार्य इस पुस्तक के लेखक ब्र० हरिभाई ने किया था।) भगवान नेमिनाथ की जय हो…महाराज ! मैं गिरनार से आ रहा हूँ और एक उत्तम बधाई लाया हूँ। अपने राजकुमार नेमिनाथ-जिन्होंने दो मास पूर्व विवाह के समय वैराग्य धारण करके गिरनार के आम्रवनमें दीक्षा ग्रहण की थी, वे विहार करते-करते पुनः गिरनार पधारे हैं और आज ही (आश्विन शुक्ला प्रतिपदा के दिन) शुद्धोपयोग की क्षपकश्रेणी लगाकर प्रभुने केवलज्ञान प्राप्त किया है।

बधाई सुनते ही सभाजन आनन्द से बोल उठे-वाह वाह ! धन्य है ! नेमिप्रभु सर्वज्ञ परमात्मा हो गये, उन्हें नमस्कार हो। ऐसा कहकर सबने सिंहासन से उतरकर प्रभुको वंदन किया।

वहाँ का प्रत्यक्ष देखा हुआ वर्णन करते हुए दूत कहने लगा- हे महाराज ! प्रभु नेमिनाथ मुनिराज गिरनार पधारे तो वहाँ के हजारों आम्रवृक्ष प्रसन्नता से झूम उठे ! एक ओर आम्रवन प्रफुल्लित हो उठा तो दूसरी ओर प्रभुका रत्नत्रय-उद्यान खिल गया। अहा, उस दिव्यता की क्या बात करूँ ! वहाँ मुनिजनों के मध्य नेमिप्रभु ध्यानस्थ मुद्रा में निर्विकल्प हो गये; परमचैतन्य का अवलम्बन करके शुद्धोपयोग की श्रेणी लगायी; अप्रमत्त भाव से अतीन्द्रिय आनन्द मे झूलते-झूलते शीघ्रता से गुणस्थान श्रेणी चढ़ने लगे. आठवाँ, नौवाँ, दसवाँ और बारहवाँ-यह सर्व गुणस्थान क्षणमें पार करते हुए प्रभुने केवलज्ञान प्राप्त कर लिया। अहा, गिरनार धाम और समस्त पृथ्वी आनन्दमय हो गई। अब तो इन्द्र वहाँ सहस्राम्रवन मे आ पहुँचे हैं और केवलज्ञान की पूजा कर रहे हैं। अद्भुत समवसरण मे विराजमान सर्वज्ञप्रभु नेमिनाथ तीर्थंकर की दिव्यध्वनि से गिरनार धाम गूँज रहा है। प्रभुकी अद्भुत वाणी से परमशांत चैतन्यरस झर रहा है।

※ प्रभुके केवलज्ञान की बधाई सुनकर श्रीकृष्ण आदि सभाजन हर्षपूर्वक बोल उठे-वाह ! आज तो सचमुच सब मंगल-मंगल भासित हो रहा है समस्त विश्व मंगलमय लगता है।

※ आज प्रात काल तो भगवान साधुपद मे थे और अभी-अभी केवलज्ञान प्राप्त करके अरिहंतपद मे पहुँच गये। पचपरमेष्ठी मे पाँचवे पद पर थे और अब प्रथम पद मे आ गये है, ‘नमो लोए सव्वसाहूणं’ में से अब ‘नमो अरिहंताण’ मे आगये।

※ ठीक ही हैं, भगवान नेमिनाथ को तीर्थंकर प्रकृतिका उदय आज प्रारम्भ हुआ; चैतन्य मे केवलज्ञान का प्रकाश और पुद्गल मे तीर्थंकर प्रकृतिका उदय-ऐसा सर्वोत्कृष्ट सुयोग आज गिरनार के सहस्राम्रवन मे वर्त रहा है और साथ ही साथ रत्नत्रयधारी गणधर, हजारों मुनिवर तथा बैराग्यमयी राजुलदेवी आदि हजारो आर्यिका माताएँ भी प्रभुकी धर्मसभा मे सुशोभित है। जैनशासन का धर्मचक्र तीव्रता से गतिमान है।

※ अहा, भगवान के आत्मा मे द्रव्य-क्षेत्र-काल और भाव सर्वप्रकार से मंगल है। भगवान नेमिनाथ का आत्मद्रव्य परमपारिणामिक भावसे त्रिकाल-मंगलरुप है, वह ‘मंगल-द्रव्य’ है; केवलज्ञान तथा अतीन्द्रिय महा आनन्द से भरपूर उनके असंख्य चैतन्य प्रदेश वह ‘मगल-क्षेत्र’ है। जहाँ वे विराजमान है ऐसा गिरनार तीर्थ भी मंगलक्षेत्र है। (श्री वीरसेन स्वामीने षट्खण्डागम की धवला टीका में गिरनार, पावापुरी, राजगृही आदि तीर्थों का मंगलक्षेत्र के रुप में स्मरण किया है।

※ अपने चैतन्य स्वभाव के अवलम्बन से प्रभु को जो अपूर्वपर्याय प्रगट हुई वह ‘मंगल-स्वकाल’ है, तथा आज यह आश्विन शुक्ला प्रतिपदा का दिवस भी प्रभु के ज्ञान कल्याणक के कारण मगल है ..और भगवान नेमिनाथ का आत्मा शुद्धोपयोग से केवलज्ञानरुप होकर परम आनन्दरुप परिणमित हो रहा है वह ‘मगल-भाव’ है।

※ अहा, जिनेन्द्र भगवान के द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव का ऐसा मंगलपना विचारने से अपने भावों में भी चैतन्यतत्त्व की कोई अगाध महिमा प्रगट होती है, वह भी भाव-मगल है।

※ श्रीकृष्ण कहते हैं-वाह, बड़ी ही सरस बात ! आचार्य भगवन्तों ने भी कहा है कि जो जीव भगवान अरिहंतदेव के आत्मा को चैतन्यभाव से जानता है वह जीव राग एवं चैतन्य की भिन्नता को जानकर अपने आत्मा के शुद्धस्वरुप को जान लेता है, इसलिये दर्शन मोह का नाश करके सम्यग्दर्शन प्राप्त करता है। अरिहत देवके आत्मा की सच्ची पहिचान का यह मगल-फल है।

※ भगवान अरिहत देवकी यह एक अचिन्त्य विशेषता है कि उनकी उपदेश, विहारादि क्रियाएँ तीर्थंकर नामकर्म के उदय से होने के कारण औदयिकी हैं तथापि, मोह के अभाव के कारण उनकी वे क्रियाएँ क्षायिकी ही मानी गई है, क्योकि वे क्रियाएँ उन्हें बध का कारण नहीं होती और उनको क्षण-क्षण कर्मका क्षय ही होता जाता है।

※ वाह, अद्भुत बात है ! भगवान के क्षायिक भाव को तथा उदय भाव को जो भिन्न-भिन्न स्वरूप से जाने वही इस बात को समझ सकता है, और यह बात समझने से अपूर्व भेदज्ञान होकर उस जीव को कर्मों का क्षय होने लगता है।

※ बलभद्र कहते हैं-श्री नेमिनाथ भगवान आज सर्वज्ञ हुए, वे किस प्रकार हुए ? देखो.. सुनो ! शुद्धोपयोग के प्रसाद से ही वे सर्वज्ञ हुए हैं। सर्वज्ञ होने के पूर्वक्षण में वे राग का सर्वथा क्षय करके पूर्ण वीतराग हुए और पश्चात् ही सर्वज्ञ हुए हैं। राग का एक सूक्ष्म अंश भी सर्वज्ञता को रोकता है; इसलिये जो वीतराग हो वही सर्वज्ञ होता है। राग का कोई अंश ज्ञान का कारण नहीं होता। आत्मा स्वयंज्ञान स्वभाव है, वही स्वयंभू सर्वज्ञ होता है। इस प्रकार आत्मा स्वयं ही सर्वज्ञता का साधन होता है।

अहा सर्वज्ञ भगवन्त स्वयंभु है, जिस प्रकार आकाश मे सूर्य अन्य किसी के अवलम्बन बिना स्वयं ही-स्वयमेव प्रकाश एवं उष्णतारूप है, उसी प्रकार चैतन्य भगवानआत्मा अन्य किसीके अवलम्बन बिना स्वयं ही स्वयंभूरूप से ज्ञान एवं आनन्द रूप है।

सर्वज्ञ लब्धस्वभाव ने त्रिजगेन्द्र पूजित ऐ रीते,
स्वयमेव जीव थयो थको ते ‘स्वयंभू’ जिनो कहे।

※ अहो, उन स्वयंभू भगवान सर्वज्ञदेव के दिव्यज्ञान की अचिन्त्य महिमा का क्या कहना ? वह परमआनन्दमय सर्वज्ञपद वीतरागी संतों को प्रिय है। उन अरिहंत भगवन्तों का अतीन्द्रिय महा आनन्द पंचेन्द्रिय के विषयरहित है, पुण्यफलरहित है, रागरहित है, और शुद्धोपयोगद्वारा आत्मा में से ही वह प्रगट हुआ है; वह स्वाभाविक आनन्द कहीं बाहर से आया हुआ नहीं है-

अत्यंत आत्मोत्पन्न विषयातीत अनुप अनंत ने
विच्छेदहीन छे सुख अहो ! शुद्धोपयोग-प्रसिद्धने।

※ उन अरिहन्त भगवन्तों को आत्मा में से जैसा सुख और जैसा आनंद प्रगट हुआ वैसा सुख और वैसा आनन्द प्रत्येक आत्माका स्वभाव है। ऐसे स्वभाव का श्रवण करते ही जो जीव प्रसन्न होकर उल्लासपूर्वक उसका स्वीकार करता है वह जीव आसन्नभव्य है, निकट भविष्य में ही मोक्षगामी है।

※ अहा, केवलज्ञान तो आत्मा का स्वभाव है; उस स्वभाव का स्वीकार करनेवाला जीव मोक्षका साधक हो जाता है; फिर उसे अनन्त भव नहीं होते, और केवलीने भी वे नहीं देखे हैं। केवली भगवान ने निकट में ही उसका मोक्ष देखा है। वाह, केवलज्ञान के इस न्याय में तो अतिगम्भीरता है, उसके स्वीकार में ज्ञानस्वभाव की सन्मुखता होकर मोक्षकी ओर का अनन्त पुरुषार्थ प्रारम्भ होता है। इसलिये सर्वज्ञ की श्रद्धा वह धर्म का मूल है।

※ अहा, अपने महान भाग्योदय से अपनी इस सौराष्ट्र भूमि में गिरनार धाम में हमें ऐसे सर्वज्ञ प्रभु नेमिनाथ भगवान के साक्षात् दर्शन प्राप्त हो रहे है। अपने सौराष्ट्र का गिरनार प्रदेश तो सिंहों की जन्मभूमि है; आज धर्म के केशरी सिंह समान केवली परमात्मा अपनी इस भूमि में उत्पन्न हुए हैं। चलो, हम सब गिरनार धाम में चलें और तीर्थंकर नेमिनाथ प्रभुके दर्शन करके धन्य हो !

-इस प्रकार सर्वज्ञपदकी अत्यन्त महिमापूर्वक महाराजा समुद्रविजय तथा श्रीकृष्ण, बलभद्र आदि सब धामधूम सहित नेमिनाथ प्रभुके दर्शन करने चले। दूसरी ओर स्वर्गलोक के देव-देवेन्द्र भी भव्य शोभायात्रा सहित नेमिनाथ तीर्थंकर के केवलज्ञान-कल्याणक का उत्सव मनाने आ पहुँचे। प्रभु को केवलज्ञान होते ही, उसके साथ की तीर्थंकर प्रकृति के प्रभाव से सम्पूर्ण स्वर्गलोक में हर्षपूर्ण खलबली मच गई। अरे, स्वर्गलोक तो ठीक नरक के नारकियों भी उस क्षण शान्ति का अनुभव किया ! नरको में अचानक ऐसी शान्तिका होना एक महान आश्चर्य था ! . और उस आश्चर्यके कारणरुप तीर्थंकर की अचिन्त्य महिमा का चिन्तवन करनेसे अनेक जीव सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए। देवों और मनुष्यों के उपरांत सिंह और शशक, नाग और वाघ मगर और मोर आदि तिर्यंचों के समूह भी तीर्थंकर प्रभु के दर्शन हेतु दौड़ आये। जगतकी उत्कृष्ट धर्मसभा वहाँ सहसावन में भरी थी और उसके मध्य त्रिलोकीनाथ तीर्थंकर परमात्मा नेमिनाथ भगवान विराजमान थे। आनन्द के धाम ऐसे नेमिनाथ को शतेन्द्र पूज रहे थे। उसप्रसंग को लक्ष में लेकर स्तुतिकार कविपद्मप्रभ (नियमसार-टीका में) कहते हैं कि-

शतमख शत पूज्यः प्राज्य सव्बोधराज्यः;
स्मरतिरसुरनाथः प्राप्त दुष्टाधयूथः ।
पदनत वनमाली भव्य-पद्मांशुमालि,
दिसतु शमनिश नो नेमिः आनन्दभूमिः ।।

अहा कैसा होगा वह पावन दृश्य ! जहाँ एक ओर तो मुनिगण सर्वज्ञ प्रभुकी स्तुति करते होगे और दूसरी ओर श्रीकृष्ण तथा इन्द्रादि भक्ति से सिर झुकाकर प्रभु नेमिनाथ की वन्दना कर रहे होगे ! वाह, नेमिनाथ और श्रीकृष्ण-एक साथ दो तीर्थंकरों का सुयोग; एक तो वर्तमान तीर्थंकर और दूसरे भावी तीर्थंकर . जो बीच मे एक भव करके आगामी चौवीसी में भरत क्षेत्र के तीर्थंकर होगें।

महाराजा समुद्रविजय, बलभद्र श्रीकृष्ण तथा उनके पुत्र-पौत्र शम्बुकुमार, प्रद्युम्नकुमार, अनिरुद्ध कुमार आदि समवसरणमे विराजमान परमात्मा नेमिनाथ के दर्शनोसे अति प्रसन्न हुए। महाराजा श्रीकृष्ण को महान गौरव का अनुभव हुआ कि-अहा ! मेरे लघुभ्राता तीर्थंकर हुए; इतना ही नही, धर्म के किसी अचिन्त्य उल्लास से उन्होने प्रभुचरणो में तीर्थंकर प्रकृति बाँधना प्रारम्भ किया। (श्रीकृष्ण की भाँति बलभद्र भी भावी तीर्थंकर होने का पुराणों में उल्लेख है।) त्रिलोक के इन्द्रों द्वारा पूज्य तथा सर्वोत्कृष्ट ज्ञान साम्राज्य के स्वामी ऐसे परमात्मा नेमिनाथ ने, सर्व प्रथम गिरनार के तपोवन में दिव्यध्वनि द्वारा मोक्षमार्ग बतलाकर भव्य जीवों को परम आनन्दित किया। हस्तिनापुर से युधिष्ठिर भीम, अर्जुन आदि पाण्डव ( जो कि नेमिनाथ प्रभुके बुआ-मामा के भाई होते थे) भी प्रभुदर्शन हेतु गिरनार आ पहुँचे और वह सर्वज्ञ की धर्मसभा देखकर अति आनन्दित हुए।

नेमिप्रभुकी धर्मसभा मे महाराजा वरदत्त (जिन्होंने नेमिनाथ प्रभुको मुनिदशा में प्रथम आहार दान दिया था) दीक्षित हुए और प्रभु के धर्ममंत्री बने उन वरदत्तसहित ११ गणधर समवसरण-सभा को सुशोभित करते थे; इतना ही नहीं, प्रभु के सह-दीक्षित हजारों मुनियों में से डेढ़ हजार(१५००) मुनिवर तो केवलज्ञान प्राप्त करके अरिहंतपद पर (समवसरण में ५००० धनुष ऊपर आकाश में) विराजते थे वास्तव में अद्भुत था वह भगवन्तों का सम्मेलन ! तदुपरान्त अवधि, मनःपर्यय ज्ञानी, श्रुतकेवली तथा विविध ऋद्धियो के धारी कुल १८००० मुनिवर उस धर्मसभा में मोक्ष की साधना कर रहे थे; राजीमती आदि आर्यिकाएँ भी अब गिरिगुफा का निवास छोड़कर ४०००० आर्यिकाओंके संघ सहित प्रभुके समवसरण में शोभायमान थी। एक लाख श्रावक और तीन लाख श्राविकाएँ सम्यक्त्व एवं व्रतसहित मोक्ष की उपासना कर रहे थे। देवों और तिर्यंचों का तो कोई पार नही था। प्रभु की धर्मसभा में सबको आत्मवैभव का अपूर्वनिधान मिलते थे। अहा, कितना शोभायमान होगा गिरनार की वह धर्म सभा ! और जगत में सौराष्ट्र के गिरनार तीर्थ का कितना महान गौरव होगा ! आज भी वह गिरनार लाखो-करोड़ों जीवों द्वारा तीर्थरूप में पूजित है और भगवान नेमिनाथ की महिमा जगत मे प्रकाशित कर रहा है।

गिरनार के उस आम्रवन के बीच आश्चर्यकारी धर्मसभा मे प्रभु नेमिनाथ ने दिव्यध्वनि द्वारा धर्मोपदेश दिया और सर्वाधिक आश्चर्य जनक ऐसा परमात्मवैभव भव्य जीवों को बतलाया-भो ..भो.. भव्यजीवो ! हमे जो सर्वज्ञ-परमात्मपद प्रगट हुआ वह आत्मा में से ही प्रगट हुआ है, तुम्हारे आत्मा में भी ऐसा ही परमात्मपद भरा है; उसे पहिचानकर श्रद्धा-ज्ञान-चारित्र द्वारा उसकी उपासना करके तुम भी परमात्मा बन सकते हो।-इसप्रकार चैतन्यतत्त्व की अगाध महिमा जानकर अपने में उसकी अनुभूति करना सो जैनशासन है। जिस प्रकार भगवान ऋषभदेव की धर्मसभा में मोक्षगामी भरत राजने धर्म का श्रवण किया था, उसी प्रकार नेमिनाथ की धर्मसभा मे मोक्षगामी पाण्डवों ने तथा गजकुमार, प्रद्युम्न आदि ने धर्मका श्रवण किया। प्रभुकी आयु १००० वर्ष थी· उसमें से ३०० वर्ष की आयु में प्रभु केवली परमात्मा हुए; पश्चात् ७०० वर्ष तक तीर्थंकर रुप मे विहार करके भारतभूमि मे धर्मामृत की वर्षा की।

धर्मचक्रसहित देशदेशान्तर में विचरते हुए प्रभुनेमिनाथ कभी-कभी रैवतगिरि (गिरनार) पधारते थे। एक बार प्रभुका आगमन होनेपर श्रीकृष्ण-बलभद्र परिवार सहित प्रभु के दर्शन करके अति आनन्दित हुए और धर्मोपदेश सुनने के पश्चात् पूछा-हे देव ! इस संसार में आत्मा के अस्तित्व सम्बन्धी अनेक मिथ्या मान्यताएँ चलती हैं कि-आत्मा जैसी कोई वस्तु है ही नहीं; कोई उसे पृथ्वी, जलादि अचेतन के संयोग से हुआ मानते हैं; कोई उसे जड़-शरीररुप ही मानते हैं; कोई उसे एकान्त कूटस्थ अपरिणामी मानते हैं तो कोई एकान्त क्षणिक नाशवान मानते हैं, कोई उसे पर्याय गुणरहित मानते हैं;-ऐसे अनेक प्रकार की मिथ्या मान्यताएँ चलती हैं;-तो हे प्रभो ! आत्मा का सत्यस्वरुप क्या है वह समझाइये ! ?

प्रभुकी वाणी में आया-हे भव्यराज ! तुम भावीतीर्थंकर हो, तुमने उत्तम प्रश्न पूछा। सुनो, सत्‌रुप इस विश्वमें अनन्त जीवात्माएँ स्वतंत्ररुप से विद्यमान तत्त्व हैं, उनमें से ‘मैं’ ऐसे स्वसंवेदन द्वारा आत्मा सदा सर्वत्र अपने अस्तित्व को प्रसिद्ध करता है। कोई भी जीव किसी भी स्थिति में, ‘मैं नहीं हूँ’-ऐसा अपना अभाव सिद्ध नहीं कर सकता, अपने अस्तित्व का अस्वीकार नहीं कर सकता; क्योंकि ‘मैं नहीं हूँ’-ऐसा कहनेवाला स्वयं ही जीव है। आत्मा सत्-विद्यमान है, वह ज्ञानमय-सुखमय वस्तु है, स्वयं अपने में है; अपने गुण-पर्यायरुप भावों में स्थित, उत्पाद-व्यय-ध्रुवरुप सत् है। सदा शरीर से भिन्न लक्षणवाला उसका अस्तित्व है, वह ‘ज्ञाता’ ऐसे चिह्न द्वारा ज्ञात होता है। यद्यपि अरुपी होने के कारण वह इन्द्रियों द्वारा दृष्टिगोचर नही होता, परन्तु अंतर में इन्द्रियों से परे अपने अनुभवज्ञान द्वारा वह स्पष्ट ज्ञात होता है-अनुभव में आता है। राग के तथा बाह्यविषयों के बिना एकाकी ही सुखी होने का उसका स्वभाव है। ऐसे परमतत्त्व रुप अपने आत्माको जानकर हे भव्यो ! तुम कषायों से भिन्नरुप उसकी उपासना करो. . यही मोक्ष साधनेकी रीति है।

आत्मा के अस्तित्व की ऐसी सुन्दर सिद्धि सुनकर सर्व श्रोताजनो का चित्त प्रसन्न हो गया, अनेक भव्यजीवों ने अपने सम्यक्त्व को उज्ज्वल किया। श्रीकृष्ण ने प्रभुकी वाणी में अपने पूर्वभव तथा भविष्य के भी मोक्षतक के दो भव जान लिये। पूर्वभव में स्वय मुनि थे, परन्तु निदान बन्ध के कारण धर्म की भावना मे मन को स्थिर किया; परन्तु आयुबध के कारण वे व्रत नही ले सके। अनेक जीवों ने प्रभु के उपदेश से आत्माका शुद्ध स्वरुप जैसा जाना वैसा ही अनुभव मे लिया और मोक्षमार्ग मे प्रविष्ट होकर परम आनन्दित हुए।

तत्पश्चात् श्रीकृष्ण की माता देवकी ने वरदत्त गणधर को वन्दन करके अपने मन की शका पूछी कि-हे देव ! मेरे आँगन मे दो मुनिराज आहार के लिये पधारे थे, दूसरे दिन वे ही मुनिराज फिर पधारे और तीसरे दिन भी वे ही दो मुनिराज मेरे घर आहार लेने पधारे; तो वे मुनिवर मेरे यहाँ बार-बार क्यों पधारे ? उन्हे देखकर मेरे अतर मे अत्यन्त स्नेह उमडता था, उसका क्या कारण ?

दिव्यज्ञानी गणधरदेव ने देवकी माता के मनका समाधान करते हुए कहा-हे माता ! आपके आँगन में तीन बार जो मुनि-युगल पधारे वे मुनि-युगल वही के वही नही थे, परन्तु हर बार अलग अलग थे; और वे मुनिवर आपके पुत्र ही थे। श्रीकृष्ण के अवतार से पूर्व तीन बार जो युगल-पुत्र अवतरित हुए थे उनका आपके भाई कस के भय से अन्यत्र लालन-पालन हुआ था, वे छहों पुत्र जिनदीक्षा लेकर मुनि हो गये थे। आपने बचपन से ही अपने उन पुत्रों को नही देखा था, उन छहो का रुप एक-सा था, इसलिये आप उन्हे नही पहिचान सकी, परन्तु वे आपके पुत्र होने से प्राकृतिक रुप से आप को उनके प्रति पुत्रवत स्नेह उमड़ा था और सुनिये, हे देवकी माँ ! वे छहो मुनिवर कि जिनका नाम देवदत्त-देवपाल, अनिकदत्त-अनिकपाल तथा शत्रुघ्न-जितशत्रु है, वे छहो चरमशरीरी हैं, इसी भव मे मोक्ष प्राप्त करेगे। पूर्वभव में भी वे छहों भाई थे और आपके ही पुत्र थे। अपने छहों पुत्र मुनि हुए हैं-ऐसा जानकर तथा उनके पूर्वभव सुनकर देवकी माता आश्चर्य पूर्वक वैराग्य को प्राप्त हुई, परन्तु श्रीकृष्ण के प्रति मोह के कारण दीक्षा नही ले सकी।

तत्पश्चात् श्रीकृष्ण ने अपनी आठ मुख्य रानियों-१.सत्यभामा २. रुक्मिणी, ३ जाम्बुवती, ४ सुसीमा, ५. लक्ष्मणा, ६. गांधारी, ७ गौरी तथा ८ पद्मावती-के पूर्वभव पूछे।

उत्तर मे गणधरदेव ने प्रथम सत्यभामा के पूर्वभव कहे-शीतलनाथ प्रभु के तीर्थ में वह जीव मथुरा राज्य की शौरीपुर नगरी मे एक अभिमानी विद्वान था; तब जैनधर्म की निन्दा करने तथा विषय-कषायपोषक कुधर्मका उपदेश देने से वह सातवें नरक में गया और अनेक निचले भवों में परिभ्रमण किया। पश्चात् भील के भव मे उसने एक मुनिराज के उपदेश से मद्य, मास, मदिरा, अण्डा, शहद आदि का त्याग किया और मरकर राजपुत्र हुआ; वहाँ भी आत्मज्ञान के बिना व्रत करके शुभ परिणाम से देव हुआ और वहाँ से च्यवकर यहाँ श्रीकृष्ण की पटरानी सत्यभामा के रुप में अवतरित हुआ है। अब भगवान नेमिनाथ के शासन में धर्मप्राप्त करके वह स्त्रीपर्यायका छेद करेगा और अनुक्रम से मोक्ष प्राप्त करेगा।

इसी प्रकार दूसरी सातों रानियों ने भी पूर्वभव में धर्म की कैसी विराधना की थी, और फिर मुनिवरोंको आहार दान, व्रतादि से धर्म के संस्कार प्राप्त किये, परन्तु अभी तक आत्मज्ञान नहीं किया होने से स्त्री पर्याय में अवतरित हुईं; अब वे नेमिप्रभु के शासन में धर्मप्राप्त करके अपना कल्याण करेंगी।-वह बात गणधर ने बतलायी।

इस प्रकार गणधरदेव के मुख से अपने पूर्वभव सुनकर तथा स्वयं निकट भविष्य मे मोक्षगामी होना जानकर वे सब रानियाँ अति प्रसन्न हुईं और अभी तक आत्मज्ञान के बिना ही ऐसी नीच स्त्रीपर्याय मे भटकती रही-ऐसा विचारकर उन्होंने वैराग्यपूर्वक जैनधर्म में अपनी बुद्धि लगायी और भक्तिसहित नेमिप्रभु के चरणों में चित्त लगाया। धर्मरहित मूर्ख जीवों का जीवन निन्दनीय तथा धर्म ही प्रशंसनीय है,-ऐसा समझकर अनेक जीवों ने अपना चित्त धर्ममें लगाया और पापप्रवृत्ति छोड दी।

पश्चात् बलदेव ने श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्नकुमार तथा शम्बुकुमार का जीवन चरित्र पूछा। उसका गणधरदेव ने संक्षेप में वर्णन किया।

श्रीकृष्ण के पुत्र चरमशरीरी शम्बु तथा प्रद्युम्न के पूर्वभव

रुक्मिणी का पुत्र प्रद्युम्न तथा जाम्बुवती का पुत्र शम्बु (शभव); वे दोनों जीव कुछ भव पहले मगधदेश में अग्निभूति तथा वायुभूति नाम के दो भाई थे। दोनों भाई नास्तिक थे। एक बार उन्होंने एक जैनमुनि के साथ वाद-विवाद किया। मुनिराजने अनेकान्त विद्या द्वारा जीव का अस्तित्व, उसका ज्ञानस्वभाव, तथा सर्वज्ञतारूप परमात्म पद की सिद्धि करके उन दोनों भाइयों को पराजित कर दिया। उस से अपमानित हुए वे दोनों भाई रात्रि के समय उन ध्यानस्थ मुनि को मारने के लिये तैयार हुए कि एक यक्षदेवने उन्हें वहीं किल दिया।

तब उनके माता-पिताने यक्षसे पुत्रों को छुड़ाने की प्रार्थना की। यक्षदेव ने कहा-तुम हिंस्रधर्म को छोड़कर मुनिराज से क्षमायाचना करो और परम अहिंसारूप जैनधर्म को स्वीकार करो तो तुम्हारे पुत्रों को मुक्त कर दूँगा। उन्होंने यक्ष की आज्ञा का पालन किया और दोनो भाई छूट गये। फिर उनके पिताने कहा-बेटा, अब तुम जैनधर्म को छोड़ दो, क्योंकि हमने तो मात्र दिखाने के लिये स्वार्थवश जैनधर्म का स्वीकार किया था। तब दोनों भाइयों ने उसकी बात मानने से इन्कार किया और कहा कि-‘जैनधर्म के कारण ही हमारी रक्षा हुई है, इसलिये हम उसे नहीं छोड़ सकते’-इस प्रकार दोनों ने दृढ़ता से जैनधर्म आस्था प्रगट की और श्रावकधर्म का पालन करके स्वर्ग में गये। वहाँ से निकलकर वे दोनो अयोध्यापुरी में पूर्णभद्र तथा मणिभद्र नामक श्रेष्ठिपुत्र हुए। जैनधर्म की उपासना करके पुनः स्वर्ग मे गये और फिर हस्तिनापुर मे राजाके पुत्र हुए। उनके नाम मधु और क्रीड़व। (मधु वह प्रद्युम्न का जीव है।)

एक बार राजामधु ने अपने मित्र कनकरथकी स्त्रीपर मोहित होकर उसका अपहरण किया। स्त्री के वियोग से दुःखी होकर कनकरथ ने संन्यास ले लिया और मरकर धूमकेतु देव हुआ।

पश्चात् राजामधु को अपने दुराचार के लिये पश्चात्ताप हुआ और मुनिराज के निकट धर्मोपदेश सुनकर अपने भाई के साथ संयम धारण किया और धर्म की आराधना द्वारा पापों को धो डाला। दोनों भाई पुण्य से स्वर्गमें गये और वहाँ से निकलकर राजा मधु का जीव तो रुक्मिणी का पुत्र प्रद्युम्न और उसके भाई क्रीड़व का जीव जाम्बुवतीका पुत्र शम्बुकुमार हुआ है। श्रीकृष्ण के वे दोनों पुत्र चरमशरीरी हैं और इस गिरनार से ही मोक्ष प्राप्त करेंगे।

प्रद्युम्न और शम्बुकुमार के जीवन की यह बात सुनकर सबको बड़ा हर्ष हुआ। पश्चात् विशेषरूप से गणधर देवने कहा-यह प्रद्युम्नकुमार द्वारिका नगरी में जब मात्र छह दिन का बालक था तब धूमकेतु देव वहाँ से विमानमार्ग से जा रहा था। रुक्मिणी के महल पर उसका विमान थम गया। अवधिज्ञान से उसने जाना कि यह कुमार मेरा पूर्वभवका शत्रु है; पूर्वभवमें इसने मेरी रानीका अपहरण किया था। इसलिये शत्रुता का बदला लेने के लिये उसने दैवी विद्यासे प्रद्युम्नकुमार का अपहरण कर लिया। वह उसे मार डालने का विचार कर रहा था, परन्तु चरमशरीरी प्रद्युम्न की आयु के प्रताप से उसमें दया का संचार हुआ, और वह बालक प्रद्युम्न को वन में एक शिला के नीचे दबाकर चला गया।

उसी समय कालसंवर नामका एक विद्याधर राजा वहाँ से निकला। शिला ऊँची-नीची होते देखकर वह आश्चर्यचकित हुआ और उसके नीचे अत्यन्त सुन्दर चरमशरीरी बालक को देखकर उसके हर्षका पार नहीं रहा। उसने वह बालक अपनी रानी कंचनमाला को दिया, और युवराजपद पर स्थापित करके उन्होंने उसका पुत्रवत् लालन-पालन किया। प्रद्युम्न बड़ा होने पर कंचनमाला के दूसरे पुत्र उसकी ईर्ष्या करने लगे और उसे मारने के अनेक प्रपंच किये; परन्तु पुण्यात्मा प्रद्युम्न को कोई हानि होने के बदले उसके पुण्यप्रताप से उसे महान दैवी वैभव प्राप्त हुए। धीरे-धीरे वह सोलह वर्ष का किशोर हुआ। दूसरी ओर द्वारिका में पुत्रवियोग से तड़पती रुक्मिणी का क्या हुआ वह सुनो।

द्वारिका नगरी में, अपने छह दिन के पुत्र को न देखकर रुक्मिणी व्याकुल हो उठी। महल में चारो ओर खोजने पर भी उसका कहीं पता नहीं लगा। श्रीकृष्ण भी उसकी खोज नहीं कर सके। श्रीकृष्ण और रुक्मिणी पुत्र-वयोग से अत्यन्त शोकमग्न रहने लगे; इसलिये श्रीकृष्ण के मित्र नारदजी उसे खोजने के लिये विदेहक्षेत्र गये और वहाँ विराजमान स्वयंप्रभ तीर्थंकर (सीमंधर स्वामी) के समवसरण में जाकर प्रद्युम्न की कथा सुनी। द्वारिका आकर श्रीकृष्ण तथा रुक्मिणी से कहा-सुनो, मैं एक आनन्द की बात करता हूँ-तुम प्रद्युम्नका शोक छोड़ो, क्योंकि वह कुशल है और १६ वें वर्ष में महान वैभवसहित लौटकर आपसे मिलेगा। मैं यहाँ से विदेहक्षेत्रमें सीमंधर प्रभु के समवसरण में गया था। अहा, वहाँ की आश्चर्यकारी शोभा का क्या कहना ! वहाँ तीर्थंकर परमात्मा के साक्षात् दर्शन से मुझे अति आनन्द हुआ और मैंने प्रद्युम्न की बात पूछी। उसके पूर्वभवका वैरी उसका अपहरण करके ले गया था, और इस समय वह एक विद्याधर के यहाँ पुत्ररूप में उसका लालन-पालन हो रहा है। १६ वें वर्ष में जब वह यहाँ लौटेगा तब अनेक शुभचिह्न दृष्टिगोचर होंगे-सूखे सरोवर जल से छलक उठेंगे, उनमें कमल खिल जायेंगे, मोर नाचने लगेंगे, बिना ऋतुके आम्रवृक्ष फलित होंगे और रुक्मिणी के स्तनों से दूध बहने लगेगा। वह पुत्र इसी भव में मोक्ष प्राप्त करेगा-ऐसा मैंने प्रभुकी वाणी में सुना है।

वाह ! सीमंधर प्रभु की धर्मसभा में नारदजी द्वारा सुनी गई अपने पुत्र की बात सुनकर श्रीकृष्ण तथा रुक्मिणी को अतीव प्रसन्नता हुई, उनका शोक मिट गया और वे चातक की भाँति प्रद्युम्न के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे।

इधर नवयुवा प्रद्युम्न का सुन्दर रूप देखकर उसकी पालक माता रानी कंचनमाला उन पर मोहित हो गई; उसके मनमे विकारभाव जागृत हुए। उसने अपनी महत्त्वपूर्ण प्रज्ञप्ति विद्या उन्हें दे दी और अनेक हावभावों से ललचाने का प्रयत्न किया; परन्तु धीर-गंभीर प्रद्युम्नकुमार शीलव्रत में अडिग रहे। इससे कुपित होकर रानी कंचनमालाने उन पर कुशील का झूठा आरोप लगाकर राजा को भड़काया। राजाने उन्हें मार डालने का काम अपने ५०० पुत्रों को सौंपा; परन्तु वे किसी प्रकार प्रद्युम्न को मार नहीं सके। चरमशरीरी को कौन मार सकता है ? उलटे उन्हें दिव्य विभूतियाँ प्राप्त हुई।

२२

भगवान नेमिनाथ (भाग ४)

एक बार नारदजी वहाँ आये और प्रद्युम्न कुमार को विदेहक्षेत्र में सुनी हुई उनके पूर्वभवों की सारी बातें कहीं; तथा रुक्मिणी और श्रीकृष्ण उनके सच्चे माता-पिता होने की बात का विश्वास कराया। द्वारिका की भी वर्तमान स्थिति सुनायी। उनके काका नेमिनाथ प्रभु वहाँ विराजमान हैं यह भी बतलाया। तुरन्त ही प्रद्युम्नकुमारको अपने माता-पिता से मिलने तथा नेमिप्रभु के दर्शन की इच्छा हुई; दिव्यवैभव सहित ठाटबाट से वे द्वारिका आये। वहाँ आकर उन्होंने बन्दर, सिंह आदि के रुप धारण करके सत्यभामा और बलभद्र आदिको खूब खिझाया, चित्र-विचित्र चेष्टाओं द्वारा नगरजनों को भी प्रमुदित किया; फिर एक ब्रह्मचारी श्रावक का रुप धारण करके रुक्मिणीके महल में पहुँचे। वहीं रुक्मिणीने उन्हें धर्मात्मा जानकर आदरपूर्वक भोजन कराया। भोजन के पश्चात् वे बोले-हे माता ! आप सम्यग्दर्शनधारी एव साधर्मी के प्रति वात्सल्य दरशानेवाली हो।

उस समय राजभवन में अनेक शुभचिह्न प्रगट हुए-अचानक ही फल-फूल खिल उठे, मोर आनन्द से नाचने लगे, आम्रवृक्ष फलों से लद गये और रुक्मिणी के स्तनों से दूध झरने लगा। इस प्रकार पुत्र-आगमनके सर्वचिह्न देखे, परन्तु प्रद्युम्न तो कहीं दिखायी नहीं दिया ! तब आशंका से रुक्मिणीने पूछा-हे ब्रह्मचारी महाराज ! मेरे पुत्र के आगमन पर जो चिह्न भगवान ने नारदजी से कहे थे वे सब यहाँ प्रगट दृष्टिगोचर हो रहे हैं, परन्तु मेरा पुत्र दिखायी नही देता !.. आपको देखकर मेरे हृदय में वात्सल्य उमड़ रहा है, तो क्या आप ही मेरे पुत्र हैं ?

यह सुनते ही प्रद्युम्न ने अपना यथार्थ दिव्यरुप धारण किया और हर्षपूर्वक नमन करते हुए बोले-हे माता ! मैं ही आपका पुत्र प्रद्युम्न…आपके चरणों में नमस्कार करता हूँ। उनके मीठे वचन सुनकर तथा दिव्यरुप देखकर माताने अत्यंत हर्षपूर्वक उन्हें गले से लगा लिया। मुमुक्षु को मोक्ष की कथा सुनकर जो आनन्द होता है, आत्मार्थी को आत्मा की अनुभूति से जो सन्तुष्टि होती है, वैसा ही आनन्द और वैसी ही सन्तुष्टि पुत्र मिलन से माता रुक्मिणी को हुई। अपनी बाल्यक्रीड़ा का विशेष आनन्द देने के लिये प्रद्युम्नकुमार ने विक्रियालब्धि द्वारा बचपन से अब तक की सर्वचेष्टाएँ प्रदर्शित कीं, और बालपुत्र को गोद में लेने का लाभ प्राप्त करके माता रुक्मिणी सन्तुष्ट हुईं।

पूर्वभव में जो प्रद्युम्नका भाई था और स्वर्गलोक में भी उनके साथ था, वह जीव वहाँ से च्यवकर श्रीकृष्ण के पुत्ररुप में जाम्बुवती की कुक्षि से अवतरित हुआ; उसका नाम शंभव अथवा शम्बुकुमार…वह भी चरमशरीरी है।

इस प्रकार श्री नेमिनाथ प्रभु के समवसरण में अपने पूर्वभव सुनकर श्रीकृष्ण की आठों रानियोंने अपना चित्त धर्म में लगाया तथा शम्बुकुमार-प्रद्युम्नकुमार आदि को भी वैराग्य हुआ और आत्मज्ञानसहित धर्मसाधना में अपना चित्त स्थिर किया। तत्पश्चात् भगवान नेमिनाथ ने विहार करके देश देशान्तर में वीतरागी मोक्षमार्ग का उपदेश दिया और लाखों-कराड़ों जीवों को धर्मरथ में बैठाकर मोक्षमार्ग में गमन कराया। प्रभु ने तीर्थंकर रुप में रहकर भरतक्षेत्र में ७०० वर्षतक धर्मचक्र चलाया।

अनेक वर्षों पश्चात् नेमिप्रभु जब पुनः गिरनार पधारे तब अति हर्षपूर्वक दर्शन करके सबने धर्मोपदेश सुना। उस समय गिरनार के वनराज-सिंह भी अहिंसक बने गये थे और प्रभु का धर्मोपदेश सुनकर आत्मकल्याण करते थे।

श्रीकृष्ण के लघु भ्राता गजसुकुमार भी प्रभु के धर्मदरबार में आये थे; प्रथमवार ही प्रभु को देखकर उन्हें ऐसा लगा कि-अहो, यह तो मेरे भ्राता ! मुझे मोक्ष ले जाने के लिये ही पधारे हैं। प्रभु के श्रीमुख से उन्होंने तीर्थंकरादि महापुरुषों का चरित्र तथा मोक्षपुरुषार्थ का वर्णन सुना। सुनते ही उनका आत्मा मोक्ष पुरुषार्थ हेतु जागृत हो उठा। अहा, यह तो नेमिप्रभुकी वाणी ! विवाह के समय ही वैराग्य प्राप्त करनेवाले उन प्रभुकी वीतरागरसझरती वाणी में संसार की असारता और मोक्षकी परममहिमा सुनकर गज सुकुमार का हृदय वैराग्य से झंकृत हो उठा।

तुरन्त ही उन्होंने प्रभुचरणों में जिन दीक्षा अंगीकार की और महान पराक्रम पूर्वक श्मशान मे जाकर आत्मध्यान मे लीन हो गये। इतने मे क्रूर परिणामी सोमिल सेठ वहाँ आ पहुँचा। गजसुकुमार मुनि को देखते ही ‘इस दुष्ट ने मेरी कन्या को अविवाहित रखा और मेरी पत्नी को परेशान किया’-ऐसा वैरभाव उसके मन मे जागृत हो उठा और उसने गजसुकुमार मुनिपर घोर उपसर्ग किया। उनका सिर अग्नि मे जलाया और शरीर में कीलें ठोक-ठोककर चलनी जैसा बना दिया। परन्तु यह तो महापराक्रमी गजकुमार ! उपसर्ग के बीच शान्ति के पर्वत की भाँति ध्यान मे अडिग रहे और शुक्ल ध्यान की श्रेणी द्वारा केवलज्ञान प्रगट करके मोक्ष प्राप्त किया। इस प्रकार नेमिनाथ प्रभु के तीर्थ मे वे ‘अंतकृत’ केवली हुए। उनका केवलज्ञान तथा निर्वाण-दोनों महोत्सव देवो ने एकसाथ किये।

[आत्म साधना में गजसुकुमार मुनि के इस प्रचंड पुरुषार्थ की घटना पूज्यगुरुदेव श्रीकानजीस्वामीको अति प्रिय थी। प्रवचन मे जब भावविभोर होकर तथा चित्र बतलाकर साधक के अति उग्र पुरुषार्थ का वर्णन करते तब मुमुक्षु जीव चैतन्य के पुरुषार्थ की प्रेरणा लेते और मोक्ष के अडोल साधक के प्रति हृदय से विनत हो जाते। अहा, जिन्हे पुरूषार्थ द्वारा आत्मसाधना करना है, उन्हें जगत की कोई घटनाएँ रोक नहीं सकतीं।)

राजपुत्र गजकुमार की दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्षकी बात सुनकर तुरन्त समुद्रविजय महाराज (नेमिप्रभु के पिताश्री) आदि नवों भाइयों ने (वसुदेव के अतिरिक्त) संसार से विरक्त होकर जिनदीक्षा लेकर मोक्षकी साधना की, मातुश्री शिवादेवी आदिने भी आर्यिका पद अंगीकार किया और राजीमती के सघ मे रहने लगी। राजीमती,शिवादेवी आदि आर्यिकाओंने अद्भुत वैराग्य-जीवन जीकर नेमिप्रभु के मार्गका अनुसरण किया और स्त्रीपर्याय का छेद करके स्वर्ग में देव हुई; वहाँसे निकलकर एक भव में मोक्ष प्राप्त करेंगी।

द्वारिकापुरी का दहन

प्रभु नेमिनाथ तो वीतरागरुप से भारत में विहार करते हुए पुनः पुनः गिरनार पधारते हैं। एकबार प्रभु पुनः गिरनार पधारे। इस बार प्रभु का उपदेश सुनकर बलभद्र जी ने अपने भाई श्रीकृष्ण का तथा द्वारिकानगरी का भविष्य पूछा। ‘बारह वर्ष पश्चात् द्वीपायन ऋषि द्वारा समस्त द्वारिका नगरी भस्मीभूत हो जायगी और श्रीकृष्ण की मृत्यु उसके भाई जरत्कुमार के हाथ से होगी’–ऐसा प्रभु की वाणीमें आया। वह सुनकर अनेक जीवों ने वैराग्य प्राप्त करके दीक्षा ग्रहण कर ली। श्रीकृष्ण महाराजने द्वारिका नगरी में घोषणा करायी कि-मेरे पिता-माता-भ्राता-भगिनी-पुत्रादि परिजन तथा समस्त नगरवासी सब वैराग्यपूर्वक संयम धारण करके शीघ्र आत्मकल्याण करो ! मैं किसी को रोकूँगा नहीं। मैं स्वयं व्रत धारण नहीं कर सकता, परन्तु जो भी व्रत-दीक्षा लेंगे उनके परिवार के पालन का सम्पूर्ण भार मैं लूँगा। इसलिये द्वारिका नगरी भस्म हो जाय उससे पूर्व जिन्हें अपना कल्याण करना हो वे कर लें . उसमे मेरी अनुमोदना है।

द्वारिका का भविष्य तथा श्रीकृष्ण की धर्मघोषणा सुनकर उनके पुत्र-पौत्र प्रद्युम्नकुमार, शम्बुकुमार, भानुकुमार, अनिरुद्धकुमार आदि चरमशरीरी राजपुत्रों ने तुरन्त नेमिप्रभु के निकट जिनदीक्षा ले ली…और गिरनार की दूसरी, तीसरी, चौथी टूंकसे मोक्षपद प्राप्त किया। श्रीकृष्ण की सत्यभामा, जाम्बुवती, रुक्मिणी आदि आठों पटरानियो ने तथा अन्य हजारों रानियों ने भी नेमिप्रभु के समवसरण में जाकर आर्यिका-व्रत धारण किये। हीरे-मोती के हार, मुकुट द्वारा सुशोभित वे रानियाँ अब मात्र श्वेत साड़ी मे भी विशेष शोभायमान होने लगीं; सच ही है, जैसी शोभा वीतरागता मे है वैसी रागमें कहाँ से होगी ? अनेक नगरजनों तथा सिद्धार्थ नामक सेनापति ने भी जिनदीक्षा धारण की, और वे सिद्धार्थ मुनिराज समाधि मरण करके स्वर्ग मे देव हुए।

अब, उधर द्वीपायन मुनि जो दूर देशान्तर चले गये थे वे ठीक बारह वर्ष पूर्ण होने से पूर्व (बारह वर्ष हो चुके है ऐसा समझकर) द्वारिका के उद्यान में आये। (-जो जो देखी वीतराग ने, सो सो होसी वीरा रे…) (वे बलभद्र के मामा लगते थे;) यादव कुमारों ने उन्हें देखा, और ‘यह द्वारिका जलानेवाला आया’-ऐसा कहकर पत्थर आदि मार कर तथा भला-बुरा कहकर उनका खूब अपमान किया। इससे क्रोधित होकर वे द्वीपायन ऋषि सम्पूर्ण द्वारिकानगरी के भस्म करने के लिये उद्यत हुए।-रे होनहार ! मुनिभाव से भ्रष्ट हुए वे द्वीपायन क्रोधपूर्वक तेजोलेश्या द्वारा द्वारिका को जलाने लगे। (दूसरे पुराण में ऐसा भी आता है कि उन द्वीपायन ने अशुभनिदान किया और मरकर देव हुए, पश्चात् द्वारिकानगरी को भस्म किया)। नगरी के पशु तथा मनुष्य अग्निमें धू-धू करके जलने लगे; बचाओं .बचाओं ..का करुण विलाप करने लगे। श्रीकृष्ण की द्वारिका में ऐसा करुण क्रन्दन कभी हुआ नहीं था। देवों द्वारारचित द्वारिकानगरी छह मास तक अग्नि में जलती रही और सर्वथा नष्ट हो गई।

यहाँ किसी को प्रश्न होगा कि-अरे, यह महान वैभवसम्पन्न द्वारिकापुरी .जिसकी रचना देवों ने की थी और श्रीकृष्ण जिसके राजा, अनेक देव जिसके सहायक, उस द्वारिका को भस्म होने से किसीने क्यों नही बचाया ? कहाँ गये वे देव ? और कहाँ गया उन वासुदेव का पुण्य ?

उसका समाधानः-हे भाई ! सर्वज्ञभगवान की देखी हुई भवितव्यता दुर्निवार है, उसे कोई रोक नहीं सकता। जब ऐसी होनहार हुई तब देव भी दूर हो गये। पुण्य का संयोग वासुदेव जैसों को भी कहाँ स्थिर रहता है ? वह तो अस्थिर, क्षणभंगुर और अशरण है।

अपनी आँखों के सामने धू-धूकर जलती हुई द्वारिका नगरी को देखकर दोनों भाई एकदम आकुल-व्याकुल हो गये। यद्यपि दोनों आत्मज्ञानी थे…जानते थे कि द्वारिका के इन सर्व परद्रव्यों में से कोई भी हमारा नहीं है; हम तो सबसे भिन्न चेतन स्वरूप हैं;-तथापि व्याकुल होकर कहने लगे-अरे, हमारे महल और रानियाँ जल रही हैं, माता-पिता जल रहे हैं, परिजन एव प्रजाजन जल रहे हैं.. कोई तो बचाओ रे ..कोई देव तो सहाय करने आओ ! परन्तु सर्वज्ञके देखे हुए भवितव्य के सामने तथा द्वीपायन ऋषि के क्रोधके समक्ष देव भी क्या करते ? आयु समाप्त होने पर इन्द्र-नरेन्द्र या जिनेन्द्र कोई भी जीव को बचा नहीं सकते । एक अपना आत्मा ही शरणभूत है।

आग बुझाने का कोई साधन दिखायी नहीं दिया तब श्रीकृष्ण और बलभद्र ने नगरी का गढ़ तोड़कर समुद्र के जलसे अग्नि बुझाने का प्रयत्न किया। परन्तु रे दैव ! वह जल भी तेल जैसा होने लगा, और उससे आग अधिक बढ़ने लगी ! अंत में आग को बुझाना असंभव जानकर वे दोनों भाई माता-पिता को बाहर निकालने का उद्यम करने लगे। माता-पिता को रथ में बैठाकर घोड़े जोत दिये, परन्तु वे नही चले; हाथी जोते वे भी रथ को नहीं खींच सके; रथ के पहिये पृथ्वी में चिपक गये थे। अंत में, ‘हाथी-घोड़ों से यह रथ नहीं चलेगा’-ऐसा देखकर श्रीकृष्ण और बलभद्र दोनों महान योद्धा रथमें जुत गये और शक्ति लगाकर खींचने लगे, हजार-हजार सिंहोंका बल रखनेवाले उन बलदेव-वासुदेव से भी वह रथ नहीं चला सो नहीं चला, वह तो वहाँ वहीं गड़ गया। जब बलदेव-वासुदेव रथ को बाहर निकालने के लिये शक्ति लगाने लगे तब नगरी के द्वार अपने आप बन्द हो गये। दोनो भाइयो ने लातें मार-मारकर द्वार तोड़े कि उसी समय आकाश से देववाणी हुई कि-मात्र तुम दोनों भाई ही

द्वारिका से जीवित निकल सकोगे,
तीसरा कोई नही माता-पिता को भी
तुम नहीं बचा सकोगे।

अरे, अशरण संसार ! श्रीकृष्ण-बलभद्र माता-पिता को असहाय छोड़कर रुदन करते-करते द्वारिका के बाहर निकले। बाहर निकलकर देखा तो . क्या देखा ? कि-सुवर्ण एवं रत्नमयी द्वारिकानगरी घास की भाँति भड़भड़ जल रही है, घर-घर मे आग लगी है, राजमहल भस्म हो चुके हैं. दोनों भाई एक-दूसरे के गले लगकर रोने लगे। अब कहाँ चला जाय वह सोचने लगे। अन्त मे, दक्षिण देश मे पाण्डवों के पास जाने का निर्णय करके उस ओर चलने लगे।

द्वारिकानगरी छह मास तक सुलगती रही . तब जो तद्भव मोक्षगामी थे अथवा जिन्हें संयम धारण करने का भाव था ऐसे जीवों को तो देव नेमिनाथ प्रभु के निकट ले गये; जो सम्यग्दृष्टि थे, धर्म संस्कारों से युक्त थे उन्होंने अंत समय जानकर प्रायोपगमन सन्यास धारण कर लिया; अग्नि का घोर उपसर्ग भी उन्हें आर्त्तध्यान का कारण नहीं हुआ। जो सच्चे जिनधर्मी हैं वे मृत्युकाल में भी कायर नहीं होते परन्तु उलटे धर्मसाधना में शूरवीर होते हैं; वे शरीर का त्याग देते हैं परन्तु धर्म का त्याग नहीं करते।-यह जैन सन्तों की रीति है।

अरेरे, द्वीपायन ने जिन वचन की श्रद्धा छोड़कर अपना भव बिगाड़ा और अनेक जीवों की मृत्यु का कारण बने। धिक्कार है ऐसे क्रोध को जो स्व-पर का नाश करके संसार की वृद्धि करता है। और देखो तो सही इस संसार की स्थिति ! द्वारिका जल रही थी तब श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र भी क्या काम आया ? कहाँ गये वे सब देव ? मात्र प्राण ही अब जिनका परिवार बचा हो, ऐसे वे दोनों भाई पाण्डवों के पास जाने को चले। तिरस्कार करके स्वयं ही जिन्हें राज्य से निकाल दिया था उन्हींकी शरण में जाने का समय आया ! ऐसा असार संसार ..उसमें पुण्य-पाप के विचित्र खेल देखकर हे जीव ! तू पाप के उदय में घबराना नहीं और पुण्य के भरोसे बैठ मत रहना; दोनों से निरपेक्ष रहकर शीघ्र आत्महित साधना। क्योंकि-

हर्ष-शोक से पार है, संयोग और वियोग में,
ऐसा ज्ञान स्वभाव; अरु सुख में या दुःख में;
उस स्वभाव को साधतो, संसार में या मोक्ष में,
सच्ची शान्ती लहाय। रे जीव ! तू तो अकेला।

(द्वारिकानगरी भले ही भस्म हो गई, परन्तु धर्मात्मा जीवों की शान्ति नहीं सुलगी थी, वह तो अग्नि से तथा राग से भी अलिप्त शांत चैतन्य रस में सराबोर थी। धन्य ज्ञानी की चेतना !

श्रीकृष्ण की मृत्यु और पाण्डवोंका वैराग्य

द्वारिकानगरी को जलता छोड़कर श्रीकृष्ण-बलभद्र दक्षिण देश की ओर जा रहे थे, वहाँ कौशाम्बी का भयंकर वन आया। वहाँ मृगजल तो बहुत दिखता था, परन्तु कहीं सच्चा जल मिलना दुर्लभ था। थके हुए श्रीकृष्ण को तीव्र प्यास लगी थी। उन्होंने बलभद्र से कहा-हे बन्धु ! पानी के बिना मेरे प्राण कण्ठतक आ गये हैं; जिस प्रकार संसार दुःख से संतप्त प्राणियों का भवाताप सम्यग्दर्शन रुपी जल से मिट जाता है, उसी प्रकार आप मुझे शीतल जल लाकर दो, जिससे मेरी तृषा शांत हो और प्राण बचें।

बलभद्र उनसे जिनेन्द्र-गुणस्मरण को कहकर पानी की खोज में गये। पानी खोजते हुए वे दूर-दूर चले गये। इधर थके हुए हताश एवं प्यासे श्रीकृष्ण पिताम्बर ओढ़े पैर पर पैर चढ़ाकर वृक्ष की छाया मे सो गये और उन्हे निद्रा आ गई। उसी समय सनसनाता हुआ एक तीर आया और श्रीकृष्ण बिंध गये !. कौन था वह बाण चलानेवाला ?-यह था उन्हीं का भाई जरत्कुमार ! एक भाई तो प्राण बचाने के लिये पानी लेने गया है और दूसरे भाई ने बाण छोड़कर उनसे प्राण हर लिये ! भाई के हाथ से भाई का प्राणांत हुआ। यद्यपि उसकी इच्छा श्रीकृष्ण को मारने की नहीं थी; उलटे वह तो इसी भावना से वन में भटक रहा था कि उसके हाथ से श्रीकृष्ण की मृत्यु न हो; परन्तु होनहार कौन टाल सकता है ? श्रीकृष्ण के वस्त्र का एक सिरा हवा में उड़ रहा था, उसे खरगोश का कान समझकर जरत्कुमार ने बाण छोड़ा और उस बाण से उनके भाई श्रीकृष्ण बिंध गये। फिर तो उसे बहुत पश्चात्ताप हुआ; श्रीकृष्ण के कहने से उसने धनुष-बाण फेंक दिये, शिकार करना छोड़ दिया, और द्वारिका भस्म हो गई तथा श्रीकृष्ण मृत्यु को प्राप्त हुए, यह समाचार देने के लिये वह पाण्डवों के पास चल दिया।

राजा-राणा-छत्रपति हाथिन के असवार,
मरना सबको एक दिन, अपनी-अपनी वार।

अरे, कहाँ तीन खण्डका राजवैभव ! और कहाँ निर्जन वनमें बिना जल के मृत्यु ! पुण्य के समय सेवा करनेवाले हजारों देवों मे से कोई देव उन प्यासे प्रभु को पानी पिलाने भी नही आया ! संयोग का क्या विश्वास !

दूसरी ओर पानी लेने गये बलभद्र जी पानी लेकर जल्दी-जल्दी आये . और कहने लगे-अरे भैया कृष्ण ! तुम्हें निद्रा आगई ? उठो, मैं जल लेकर आ गया हूँ, उसे पीकर तृषा शांत करो !

-परन्तु कौन उठता और कौन बोलता ? कौन पानी पीता ? .अत्यन्त भ्रातृस्नेह के कारण बलभद्र श्री ण की मृत्यु स्वीकार करने को तैयार नही हुए; वे श्रीकृष्ण के मृतशरीर को कन्धेपर लेकर घूमें और छह मास तक अत्यन्त शोकमग्न रहे। आत्मज्ञानी होने पर भी मोह के कारण यह दशा हुई। अन्त में, उनके सारथी सिद्धार्थ ने आकर (-जोकि मरकर देव हुआ था) सम्बोधन किया कि हे महाराज ! जिस प्रकार रेत में से तेल नहीं निकलता, पत्थर पर धान नही उगता और मरा हुआ बैल घास नही खाता, उसी प्रकार मरा हुआ मनुष्य पुन सजीवन नही होता। आप तो ज्ञानी े, इसलिये श्रीकृष्ण का मोह छोड़ो और सयम धारण करो।

सिद्धार्थ देव के सम्बोधन से बलभद्र का चित्त शांत हुआ और ससार से विरक्त होकर उन्होने जिनदीक्षा धारण की और आराधना पूर्वक समाधिमरण करके वे स्वर्ग मे गये। नेमिनाथ प्रभुके शासन मे श्रीकृष्ण-बलभद्र वे नौवे (अन्तिम) वासुदेव-बलदेव हुए और जरासघ प्रतिवासुदेव हुआ।

उधर दक्षिण देशमें पाण्डवों ने जरत्कुमार के मुँह से द्वारिकानगरी का विनाश तथा श्रीकृष्ण की मृत्यु के समाचार सुने। सुनते ही वे शोकमग्न हो गये। बलभद्रजी उन्हे आश्वासन देने गये फिर उन्होंने द्वारिकानगरी की नवरचना की और जरतकुमार को राजसिहासन पर बैठाया। परन्तु यह देखकर कि-कहाँ नेमितीर्थंकर और श्रीकृष्ण के समय की द्वारिका और कहाँ यह द्वारिका ! . वे पाण्डव वैराग्यमे चिन्तवन करने लगे कि-अरे, समुद्र के बीच देवो द्वार निर्मित द्वारिका नगरी भी जलकर भस्म हो गई। जहाँ श्रीकृष्ण राज्य करते थे, जहाँ की राजसभा मे नेमिकुमार बिराजते थे और दिन-प्रतिदिन मगल उत्सव होते थे, वह नगरी आज सुनसान हो गई ! कहाँ गये वे राजमहल ? कहाँ है वे राजवैभव ? और कहाँ चले गये वे उपभोग करनेवाले ? .नदी के प्रवाह जैसे चचल विषयों को स्थिर नही रखा जा सकता। विषयों की ऐसी विनश्वरता देखकर विवेकी जन उससे विरक्त होते है और वीतरागी होकर आत्महित की साधना करते है।

-इस प्रकार ससार से विरक्त होकर वे पाण्डव पल्लव देश में विराजमान श्री नेमिनाथ प्रभु के पास गये। प्रभु के दर्शनों से उनका चित्त शात हुआ। प्रभुके केवलज्ञान की अत्यन्त महिमा करके स्तुति और प्रभु के उपदेश मे चिदानन्द तत्त्व की, स्वानुभूति की तथा मोक्ष सुख की परम महिमा सुनकर वे पाण्डव भी मोक्ष साधना हेतु उत्सुक हुए। वे विचारने लगे-अरेरे, नेमिनाथ प्रभु जैसे तीर्थंकर का साक्षात् सुयोग होने पर भी अब तक हम असयमी रहे और तुच्छ राजभोगों के लिये बड़े-बड़े युद्ध किये। अरे, श्रीकृष्ण जैसे चक्रवर्ती राजा का राज्य भी जहाँ स्थिर नहीं रहा, द्वारिका नगरी भी देखते-देखते भस्म हो गई और श्रीकृष्ण जैसे चक्रवर्ती महाराजा जल के विना मृत्यु को प्राप्त हुए; ऐसे महापुरुषों को भी जब पुण्य शरणभूत नहीं हुआ वहाँ दूसरों की क्या बात ? पुण्य और संयोग तो ध्रुव एवं अध्रुव एवं अशरण हैं; मात्र रत्नत्रयधर्म ही जीव को शरणभूत है।

इस प्रकार जिनका चित्त असार ससार से त्रस्त होकर जिनदीक्षा हेतु तत्पर हुआ है ऐसे उन पाण्डवों ने भगवान नेमिनाथ की धर्मसभा में अपने और द्रौपदी के पूर्वभवों का वृत्तान्त सुना :-युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन-यह तीनों जीव पूर्व भव में भी भाई थे, और नकुल, सहदेव तथा द्रौपदी-यह तीनों जीव उन तीनों भाइयों की पत्नियाँ थे। उनमें द्रौपदी का नाम नागश्री था। अर्जुन और द्रौपदी पूर्वभव मे भी पति-पत्नी थे। उस नागश्रीने (द्रौपदी के पूर्वभव के जीवने) एक बार मुनिराज का अनादर करके अयोग्य आहार दिया, जिससे मुनिराज का समाधिमरण हुआ। नागश्री के जीवने उस पाप के फल मे अनेक बार दुर्गतिभ्रमण किया और महान दुःख भोगे। अन्त में, चम्पापुरी में एक मुनिराज के निकट उस जीव ने जैनधर्म के सस्कार प्राप्त किये और आर्यिकासंघ में रहकर अहिंसादि व्रतों का पालन किया, जिनके फल में स्वर्ग में देवी होकर वह जीव यहाँ द्रौपदी के रुप में अवतरित हुआ है। पूर्वभव में जब द्रौपदीने मुनिराज का अनादर किया, वह देखकर युधिष्ठिर आदि पाँचों जीवो को वैराग्य जागृत हुआ और जिनदीक्षा लेकर स्वर्ग में देव हुए, वे वहाँ से आकर यह पाँच पाण्डव हुए हैं। स्वर्ग में भी अर्जुन तथा दौपदी के जीव पति-पत्नी (देव-देवी) थे। यहाँ भी उस सती द्रौपदीने मात्र अर्जुन का ही वरण किया है; परन्तु पूर्वभव में एक अशुभ संकल्प किया था; फलस्वरूप वह लोकमें ‘पाँच भर्तारी’ कहलायी। तुममें से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन तो इसी भव में मोक्ष प्राप्त करोगे; शेष यहाँ से स्वर्गलोक में जाकर फिर अनुक्रम से मोक्ष में जाओगे।

इस प्रकार प्रभु नेमिनाथ तीर्थंकर की धर्मसभा में अपने पूर्वभवों का वृत्तांत सुनकर पाण्डवों का चित्त संसार से विरक्त हुआ और प्रभुचरणों मे जिनदीक्षा लेकर युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव पाँचों भाई जैनमुनि बनकर पंचरमेष्ठी पद मे सुशोभित होने लगे। उन्हें देखकर सब आश्चर्यचकित हुए, देवों ने भी आनन्दपूर्वक उत्सव किया। उसी समय माता कुन्ती, द्रौपदी तथा सुभद्रा आदिने भी राजीमती आर्यिका के संघ में दीक्षा धारण की।

तत्पश्चात् विहार करते-करते वे पाँचों मुनिवर सौराष्ट्र देशमे आये और नेमिप्रभु की कल्याणक भूमि गिरनार तीर्थकी वन्दना की। वैराग्यभूमि आम्रवन में कुछ समय रहकर आत्मध्यान की उग्रता द्वारा वीतरागता में वृद्धि की। वहाँ से शत्रुंजय सिद्धीक्षेत्र पर आये और अडोलरुप से आत्मध्यान मे लीन हो गये। अहा, परमेष्ठीपद की आनन्दानुभूति मे झूलते हुए वे पाँच पाण्डव मुनिवर पंचपरमेष्ठी समान शोभा देते थे।

कैसे सोहे पांडव-मुनिराज…अहो ! उन्हें वंदन लाख. .
राजपाट त्यागकर बसे-उन्नत पर्वत में,
जिसने छोडा स्नेहीओं का साथ,-अहो ! उन्हें वंदन लाख…
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के ज्ञे धारक,

करते कर्मों के जलाकर भस्म, - अहो ! उन्हें वंदन लाख… शत्रु या मित्र नहीं कोई उसीके ध्यान में, वे तो साधे मुक्तिका मार्ग, - अहो ! उन्हें वंदन लाख… [कोई कथाकार ऐसा भी कहते हैं कि-पाण्डव मुनिराज नेमिनाथ भगवान के दर्शन करने हेतु शत्रुंजय से गिरनार की ओर विहार कर रहे थे, इतने में उन्होंने नेमिनाथ भगवान के मोक्षगमन की बात सुनी, जिससे वे वैराग्यपूर्वक शत्रुंजय पर्वत पर ही ध्यानस्थ हो गये।]

शत्रुंजय पर्वत पर मोहशत्रु को जीतने के लिये ध्यानमग्न पाण्डव मुनि भगवन्तों पर दुर्योधन के भानजेने अग्नि का घोर उपसर्ग किया। उनके शरीर जल रहे थे, परन्तु उन मुनिवरों ने तो ध्यान द्वारा आत्मा में शांत जल का सिंचन करके शरीर के साथ-साथ ध्यानाग्नि में कर्मों को भी भस्म कर दिया। युधिष्ठिर, अर्जुन तथा भीम ने तो उसी समय केवलज्ञान प्रगट किया और अतंकृत केवली होकर मोक्षको प्राप्त हुए। नकुल तथा सहदेव-उन दो मुनिवरों-को अपने भ्राताओं सम्बन्धी किंचित् राग की वृत्ति रह गई; इतने मात्र रागके कारण वे मोक्षप्राप्त नहीं कर सके और सर्वार्थसिद्धि देवलोक का भव हुआ।

तेथी न करवो राग जरीये क्यांय पण मोक्षेच्छुये,
वीतराग थईने ए रीते ते भव्य भवसागर तरे।

[शत्रुंजय पर्वत पर उपसर्ग के समय पाण्डवमुनियो द्वारा भायी गई बारह वैराग्य-भावनाओं के लिये “जैनधर्म की कथाएँ” भाग-५ पढ़ें।]

बाईसवे तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ ने धर्मचक्रसहित गगनविहार द्वारा मोक्ष का धर्मरथ चलाते-चलाते अनेक देशों में विहार किया; वैरागी राजकुमार वरांग भी उन्हींके शासन में हुए; (उन वरांगकुमार के सुन्दर वैराग्य-उद्गारों के लिये देखो-"जैनधर्म की कथाएँ भाग ४ तथा ५) अन्तमे पुनः एक बार नेमिनाथ प्रभु सौराष्ट्र में पधारे। अपने देश के तीर्थंकर परमात्मा के आगमन से सौराष्ट्र की प्रजा धन्य हो गई! प्रभु पुनः उसी गिरनार गिरि (उर्जयन्तगिरि) पर पधारे कि जहाँ उनके दो कल्याणक हुए थे। अब १४ वें गुणस्थान तथा मोक्षपद की साधना द्वारा पंचम कल्याणक की तैयारी थी। नेमिनाथ भगवान से पूर्व भी करोड़ों मुनिवरों ने गिरनार से मोक्ष प्राप्त किया था, और अब यह बाईसवें तीर्थंकर प्रभु वहीं से मोक्ष पधार रहे हैं। नेमिनाथ प्रभुके १००० वर्ष के आयुबंध में से अब मात्र एक मास ही शेष रहा है। विहार और वाणी थम गये; गिरनार के सर्वोच्च शिखर (पाँचवीं टॉक…पंचम कल्याणक की टॉक ..मोक्षकी टॉक) पर प्रभु अयोगी हुए। अषाढ़ शुक्ला सप्तमी को समस्त कर्मरहित हुए वे प्रभु गिरनार गिरि के ऊपर सिद्धालय में सिद्ध परमात्मा रूप मे स्थित हुए। आज भी प्रभु वहीं विराज रहे हैं और अनंतकाल तथा उसी प्रकार मोक्षसुख में मग्न रहेंगे।-उन सिद्धप्रभु का स्मरण करके गिरनारगिरि की मोक्षटोंक पर बैठे-बैठेपूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामीनेपरमपद की भावना भायी थी-

पूर्वप्रयोगादि कारणना योगथी,
ऊर्ध्वगमन सिद्धालय-प्राप्त सुस्थित जो.
सादि अनंत-अनंत समाधि सुखमां,
अनंत दर्शन ज्ञान अनंत सहित जो..
अपूर्व अवसर ऐवो क्यारे आवशे ?

[उस समय पूज्य बेनश्री-बेन तथा मुमुक्षुसमाज शान्तिपूर्वक उस भावना का अनुसरण कर रहा था। उस दृश्य के साक्षात् दर्शन सोनगढ़ की “गिरनार-यात्रा” फिल्म द्वारा आज भी हो सकते है। [ -हम भी गिरनार जाकर सिद्धभगवन्तों की छत्रछाया में उस धन्यदशा की भावना भाते हैं।]

तीन कल्याणक जहाँ हुए. .मोक्ष गये भगवान. .तीरथ सो नमूँ रे . नेमिप्रभु मोक्ष पधारने पर इन्द्र मोक्ष का महोत्सव मनाने आये। एक हजार वर्ष में इन्द्र पाँचवी बार सौराष्ट्र में आये और तीर्थंकर प्रभुके पंचकल्याणक का महान उत्सव किया। गिरनार की उस पाँचवीं मोक्ष टोंकपर पर्वत की एक शिलापर प्रभुके चरणचिह्न तथा प्रतिमाजी उत्कीर्ण हैं..जो आज ८६००० वर्ष बाद भी हमें तीर्थंकर प्रभुका स्मरण करा के परमपद प्राप्ति की भावना जागृत करते है।

गिरनार की टोंक पर, नेमिनाथ निर्वाण;
यात्रा करते हृदय में, जागे आतमध्यान।

[७२ करोड़ और सातसौ मुनिवरों की सिद्धभूमि गिरनार तीर्थ को वंदन हो !]

पहले जो चिन्तागति विद्याधर थे और विवाह के लिये प्रीतिमती राजकुमारी की माँग को अस्वीकार किया था, पश्चात् चौथे स्वर्ग के देव होकर अपराजित राजा हुए थे, तत्पश्चात् १६ वे स्वर्ग के इन्द्र होकर सुप्रतिष्ठ राजा हुए, पश्चात् अहमिन्द्र हुए, और अन्त मे भरतक्षेत्र के बाईसवे तीर्थंकर होकर गिरनार की पाँचवी टोंक से मोक्ष पधारे, वे भगवान नेमिनाथ हमें भी शीघ्र मोक्षपद की प्राप्ति कराओ।

यद्यपि इन्द्रादि देव भी जिसकी पूजा करें ऐसी अद्भुत पुण्यलक्ष्मी भगवान नेमिनाथ के पास थी, अत्यन्त सौन्दर्य से सुशोभित उनकी कुमारावस्था थी और राजुल (राजमती) जैसी अत्यन्त सौन्दर्यवान राजकन्या उन्हें वरमाला (पहिनाने को आतुर थी) तथापि अतीन्द्रिय चैतन्यवैभव के निकट भगवान ने उन सबको तुच्छ तृणवत् जानकर त्याग दिया और संयम धारण करके परमात्मा बन गये, इस प्रकार जगत के मुमुक्षु जीवों को वैराग्य का महान आदर्शरूप हुए। धर्मचक्र की धुरी (नेमि) बनकर जिन्होंने ‘नेमिनाथ’ नाम सार्थक किया;-उन भगवान का चलाया हुआ धर्मचक्र धर्मी जीवो के अन्तर में आज भी मोक्षकी ओर अग्रसर है।

हमारे धर्मरथ के सारथी प्रभु नेमिजिन को नमस्कार हो !

श्रीकृष्ण जैसे महात्माने भी जिन परमात्मा की शरण लेकर तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया, वे भगवान नेमिनाथ इस पृथ्वीपर किसके द्वारा वंद्य नहीं हैं !

हरिवंश के हंस प्रभु, बने सिद्ध भगवान;
‘हरि’ नमें तव चरण में, करे सदा गुणगान।
प्रभु तुम्हरे प्रसाद से, तीर्थ बना गिरनार;
तीन कल्याणक तुम्हारे, रत्नत्रय दातार।

[इस प्रकार सौराष्ट्र देश मे जिनके पंचकल्याणक हुए ऐसे बाल ब्रह्मचारी बाईसवें तीर्थंकर श्रीनेमिनाथ भगवान का मगल पुराण पूर्ण हुआ। वह सर्वजीवों को उत्तम ज्ञान-वैराग्य का कारण हो !]

(ગીરનાર-તીર્થ ઉપર બેઠાબેઠા પૂ. કાનજી સ્વામીએ લખેલા હસ્તાક્ષર)

ૐ શ્રી નેમીનાથ ભગવાનનુ ચારીત્ર ધામ કેવળજ્ઞાન ધામ સમશ્રેણીએ સિધ્ધપદ ધામના સ્મરણનું સ્થાન શ્રી ગીરનાર ધામના જયહો.

अन्तिम चक्रवर्ती ब्रह्मदत्त

भगवान नेमिनाथ और पार्श्वनाथ के मध्यकाल मे कम्पिला नगरी मे बारहवाँ ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती हुए। पूर्वभव मे वह जीव एक निर्धन कृषक का पुत्र था। उसने एक मुनि के निकट दीक्षा लेकर तप किया, और मूर्खतावश तप के फलमे चक्रवर्ती पद की विभूतिका निदान बंध किया। मरकर वह जीव सौधर्म स्वर्ग मे गया और वहाँसे कम्पिलानगरी मे ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती हुआ। एक दिन कारणवश अपने रसोइयेपर क्रोध करके उसे मृत्युदण्ड दिया; रसोइया मरकर व्यन्तर देव हुआ और वैरबुद्धि से ब्रह्मदत्त को मारने का विचार करने लगा। एक दिन रसनालोलुपी ब्रह्मदत्तको बनावटी अमृतफल द्वारा ललचाकर वह समुद्र के बीच ले गया; वहाँ उसने उन्हें डुबाने के लिये खूब उपद्रव किये। परन्तु चक्रवर्ती ब्रह्मदत्त णमोकार-मंत्र का जाप करते रहे; इसलिये वह देव उन्हे डुबा नहीं सका। अन्त में, उसने एक युक्ति सोची और ब्रह्मदत्त से बोला-‘हे राजन् ! यदि तुम पानीमे णमोकार मंत्र लिखकर पैरों से मिटा दो तो मैं तुम्हें समुद्र से बाहर निकाल दूँगा, नही तो डूबा दूँगा।’ मूर्ख चक्रवर्ती ने मरण के भय से धर्म छोड़ दिया। ज्यों ही वह नमस्कार मंत्र लिखकर पैरो से मिटाने लगा कि दुष्ट देवने उसका पैर पकड़कर समुद्र में फेंक दिया और वह ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती मरकर सातवें नरक मे औंधे मुंह जा गिरा। अरेरे ! विषयरसकी लोलुपता और धर्म की विराधना का उसे कितना भयंकर दुःखदायी फल मिला ! यह जानकर हे भव्य जीवो ! तुम विषयों की लालसा को छोड़ो और जैनधर्म की आराधना करों।

“हमारे ज्ञानमें उत्कीर्ण है-सिद्धभगवन्तों की स्तुति” [सिद्धपद की साधनापूर्वक मोक्षका अपूर्व महोत्सव]

जब भगवान महावीर का ढाई हजार वर्षीय निर्वाण-महोत्सव मनाया गया तब पूज्य श्री कानजीस्वामी ने अत्यन्त महिमापूर्वक कहा था कि आत्मा में सिद्ध भगवान की स्थापना वह मोक्षका मंगल-महोत्सव है। जिसने अपने आत्मा में ‘सिद्ध’ को (शुद्ध आत्मा को) स्थापित किया, उसमें अब विभाव या संसार रह नहीं सकता; उसे सिद्ध होना ही पड़ेगा।

सिद्ध भगवान कैसे हैं? कि-अपने स्वभाव से ही अतीन्द्रिय ज्ञान एवं सुखरूप परिणमने वाले, दिव्य चैतन्य शक्तिवान देव हैं। किसके देव हैं?-गणधरादि बुधपुरुषों के देव हैं। गणधर से लेकर अविरत सम्यग्दृष्टि तक के धर्मात्मा जीवों के अंतर में, निर्विकल्प समाधिगम्य सिद्धपरमात्मा-इष्टदेव विराज रहे हैं; उन ‘सिद्ध’ का स्वीकार ‘ज्ञान’ में होता है, ‘विकल्प’ में नहीं।

अहा, जिसने अपने ज्ञानमें सिद्ध भगवान को देवरुप में स्वीकार किया उसकी दशा भी अलौकिक-अचिन्त्य शान्तिरुप होती है। सुखस्वरुपी सिद्धको जो अपने अंतर में स्थापित करे वह स्वयं सुखरहित नहीं रह सकता। अंतरमें अपने स्वसंवेदन से अतीन्द्रिय आनन्द का रसास्वादन करके जिसने सिद्धप्रभुको देवरुप में स्वीकार किया उस बुधजन के ज्ञानमें सिद्धप्रभु की दिव्यमहिमा की स्तुति उत्कीर्ण हो गई है; अब किसी दूसरे की महिमा का समावेश उसके अंतर में नहीं हो सकता। इन्द्रियज्ञानवाला अज्ञानी जीव अतीन्द्रिय सुखस्वभावी सिद्धको नहीं स्वीकार सकता।

देखो, भगवान महावीर परमइष्ट सिद्धपद को प्राप्त हुए, उसके ढाईहजारवें वर्षका यह उत्सव है; उसे मनाने की यही सच्ची रीति है। सम्यग्दृष्टि के भावश्रुत में सदा मोक्षका महोत्सव (सिद्ध पद की साधना) चल ही रहा है। हे जीव ! तू भी भगवान महावीर जैसे ही अपने अतीन्द्रिय ज्ञान एवं सुखस्वभाव की प्रतीति करके अपने में मोक्षका अपूर्व महोत्सव कर।

(-पूज्य श्री कानजी स्वामी के प्रवचन से)

पारसनाथ भगवान की स्तुति

अतरिक्ष प्रभु आप हि सच्चे, देख रहे निज आतम राम, रागरहित हो निरालम्ब हो, स्वयज्योति हो आनन्दधाम; रत्नत्रय आभूषण सच्चा, जड़ आभूषण का नहि काम, तीन लोक के मुकुट स्वयं हो, फिर क्या स्वर्ण-मुकुट का काम ? सिहासन है नीचे फिर भी, नहीं आप सिहासन पर, अतरिक्ष है आपहि सच्चे, राजत हो जग के उपर; वस्त्र-मुकुट नहि प्यारे हमको, प्यारा सच्चा आतमराम, राज-मुकुटको छोड़ दिया फिर, यहाँ चढ़ाने का क्या काम ! अहो ! प्रभुजी पारस प्यारे, भक्त हृदय के हो विश्राम, राग-वस्त्रमें वास नहीं है, शुद्ध बुद्ध हो आनदधाम; मंगलकारी दर्श तुम्हारा, नहीं क्लेशका नाम-निशान, नग्न-दिगम्बर पारसप्रभुको, करता ‘हरि’ सम्यक् प्रणाम।

(वीरसवत २४९६ मे पूज्य श्रीकानजी स्वामी सघसहित शिरपुर-अतरिक्ष पधारे और पचकल्याणक-प्रतिष्ठा-महोत्सव हुआ। उस समय भोयरे मे पार्श्वनाथ प्रभुके सन्मुख बैठे-बैठे श्री ब्र हरिभाई ने यह स्तुति रची थी।]

२३

भगवान पारसनाथ (भाग १)

[२३]

वन्दों पारसनाथ, महारस के जो दाता;
प्रभु पारस-स्पर्शसे, जीवन उत्तम बन जाता।

अपने बाईस तीर्थंकर भगवन्तों की कथा आपने रुचिपूर्वक पढ़ी। अब, भगवान श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्र के दसभव की पवित्र कथा प्रारम्भ करते हुए आनन्द होता है। यह कथा आचार्य गुणभद्रस्वामी रचित उत्तरपुराण तथा पं. दौलतरामजी रचित पार्श्वनाथचरित्र आदिके आधार से लिखी गई है; तदुपरान्त प्रत्यक्ष सन्तो के कृपा-प्रसाद से प्राप्त हुए उत्तम भाव भी इस कथा में गूँथे है; पार्श्वप्रभु के दसभव की यह कथा उत्तम क्षमा धर्म का बोध देती है और शत्रुके प्रति भी मध्यस्थ रहकर हमें आत्मसाधना करना सिखाती है। साधर्मी बन्धुओ ! तुम यह भगवानका जीवनचरित्र आनन्द से पढ़ना और उसमें से उत्तम संस्कार प्राप्त करना। बालको में उच्च धार्मिक संस्कार डालने के लिये ऐसे साहित्य की आज विशेष आवश्यकता है; उस ओर जितना लक्ष दिया जायगा उतनी ही समाज की उन्नति होगी। पार्श्वप्रभुके दस भव की कथा प्रारम्भ होती है।

[(१) पूर्वभव-दो भाई-मरुभूति ओर कमठ]

चतुर्थकाल में पोदनपुर में अरविन्द राजा राज्य करते थे; उनके मंत्री के दो पुत्र था; उनमें ज्येष्ठपुत्र कमठ और छोटा मरुभूति यह मरुभूति ही अपने पार्श्वनाथ भगवान का जीव। (यह उनका नौवां पूर्वभव है।)

कमठ और मरुभूति दोनों सगे भाई थे; कमठ क्रोधी और दुराचारी था; मरुभूति शांत और सरल।

जिस प्रकार एक ही लोहे में से तलवार भी बनती है और बख्तर भी बनता है; तलवार काटती है और बख्तर रक्षा करता है; उसी प्रकार एक ही माता के दो पुत्र; उनमें एक कुपुत्र है और दूसरा सुपुत्र। क्रोधी कमठ सदा दोष देखता है और मरुभूति विनय से सद्गुण देखता है। प्रिय पाठक ! आगे चलकर तुम्हें ज्ञात होगा कि क्रोध से जीव का कितना अहित होता है और शान्ति एवं सद्गुणों से वह कितना सुखी होता है !

अरविन्द राजा के मंत्री ने एक बार सिरमें श्वेत बाल देखकर मुनि के निकट जिनदीक्षा ले ली। राजाने उसके पुत्र को मंत्री बनाया। बड़ा भाई कमठ क्रोधी और दुष्ट-प्रकृति होने से उसे मंत्रीपद नहीं मिला और छोटे भाई को मंत्रीपद प्राप्त हुआ, जिससे कमठ के मनमें उसके प्रति ईर्ष्या उत्पन्न हो गई।

एक बार राजा अरविन्द किसी दूसरे राजा से युद्ध करने गये तब मंत्री मरुभूति को साथ ले गये। राजा और मंत्री दोनो के बाहर जाने से दुष्ट कमठ ऐसा वर्तन करने लगा जैसे वह स्वयं ही राजा हो…और प्रजा को हैरान करने लगा। छोटे भाई मरुभूति की पत्नी अति सुन्दर थी; उसे देखकर कमठ उस पर मोहित हो गया। उसने मरुभूति की पत्नी को कपटपूर्वक एक फुलवाड़ी में बुलाया और उसके साथ दुराचार किया। कुछ दिन बाद राजा अरविन्द युद्ध का भार मंत्री मरुभूति को सौंपकर स्वयं पोदनपुर लौट आये। वहाँ लोगो के मुँह से जब कमठ के दुराचार की कथा सुनी तब उन्हें विचार आया कि ऐसे अन्यायी दुराचारी का हमारे राज्य में रहना उचित नहीं है। उन्होंने उसका सिर मुँडाकर काला मुँह करके, गधे पर बैठाकर नगर से बाहर निकलवाँ दिया। पापी कमठ की ऐसी दुर्दशा देखकर नगरवासी कहने लगे कि-देखो, पापी जीव अपने पाप का कैसा फल भोग रहा है; इसलिये पापों से दूर रहो।

राजाने कमठ को नगर से निष्कासित कर दिया, जिससे वह बड़ा दुःखी हुआ और तापस लोगों के मठ में जाकर वहाँ बाबा बनकर रहने लगा तथा कुगुरुओं की सेवा करने लगा। उसे कुछ ज्ञान तो था नहीं, वैराग्य भी नही था। अज्ञान एव क्रोध के कारण वह एक बड़ा पत्थर हाथों में उठाकर खड़े-खड़े तप करता था। इतने मे क्या हुआ?..वह जानने से पूर्व हम उसके भाई मरुभूति की खोज कर लें।

युद्ध मे गया मरुभूति जब लौटकर आया और उसे ज्ञात हुआ कि उसके बड़े भाई कमठ को राजाने नगर से निष्कासित कर दिया है, तब उसे बड़ा दुःख हुआ। भाई पर क्रोध न करके मरुभूति ने उससे मिलने तथा घर वापिस लाने का विचार किया और वह उसकी खोज करने निकल पड़ा।

ढूँढ़ते-ढूँढ़ते अन्त में उस कमठ का पता चल गया और अपना भाई बाबा बनकर मिथ्या तप कर रहा है यह देखकर उसे खूब दुःख हुआ। वह कमठ के पास जाकर हाथ जोड़कर बोला-हे भाई ! मुझे तुम्हारे बिना अच्छा नहीं लगता। जो हुआ सो हुआ; अब आप इस मिथ्या वेष को छोड़कर मेरे साथ घर लौट चलो। आप मेरे ज्येष्ठ भ्राता हो, इसलिये मुझपर क्रोध न करके मुझे क्षमा कर दो।-ऐसा कहकर मरुभूति ने भाई कमठ को वंदन किया।

-परन्तु दुष्ट कमठ का क्रोध तो और भी बढ़ गया। इसी के कारण मैं इतना अपमानित हुआ हूँ, और अब यहाँ भी मुझे दुःखी करने आया है !

मेरे पाप की बात यह यहाँ सबसे कह देगा तो ? -ऐसा विचार आने से उसने हाथों मे उठाये हुए उस पत्थर का प्रहार मरुभूति के सिर पर किया। पत्थर लगते ही मरुभूति का सिर फूट गया; रक्त बहने लगा और कुछ ही देरमें उसका प्राणान्त हो गया। अरेरे ! क्रोध के कारण सगे भाई के हाथ से भाई की मृत्यु हुई !..रे संसार ! जिस प्रकार सर्प से कभी अमृत प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार क्रोध से कभी सुख नहीं मिलता। क्षमा जीव का स्वभाव है, उसके सेवन से ही सुख की प्राप्ति होती है।

पत्थर के प्रहार से जब मरुभूति की मृत्यु हो गई तब उसे भी भयंकर वेदना के कारण आर्त्तध्यान हो गया। क्योंकि अभी उसे आत्मज्ञान तो हुआ नहीं था; इसलिये आर्त्तध्यान से मरकर वह सम्मेदशिखर के निकट वनमें विशाल हाथी हुआ।

[प्रिय पाठक ! हाथी हुआ वह पार्श्वनाथ भगवान का जीव उस हाथी के भवमें ही आत्मज्ञान प्राप्त करनेवाला है। उसकी सुन्दर कथा आप कुछ ही समय मे पढ़ेंगे; पहले यह जान लें कि-कमठ का तथा राजा अरविन्द का क्या हुआ !]

कमठ ने अपने भाई को पत्थर से मार डाला-यह बात जब आश्रम के तापसों ने जानी तब उन्होने कमठ को पापी मानकर उसे वहाँ से निकाल दिया। पापी कमठ चोरों के गिरोह में सम्मिलित होकर चोरी करने लगा। एक बार चोरी करते हुए पकड़े जाने पर उसे भयंकर मार पड़ी, जिससे वह बहुत दुःखी हुआ, परन्तु उसके भावों में कोई परिवर्तन नहीं आया। अन्तमें, क्रोध से मरकर वह कुक्कट नामका भयंकर विषैला सर्प हुआ।

(२) पूर्वभव आठवाँ-हाथी और सर्प

मरुभूति तो मरकर हाथी हुआ; परन्तु राजा अरविन्द को उसकी कोई खबर नहीं मिलने से वह चिन्तित रहने लगा कि-मरुभूति मेरा मंत्री अभी तक क्यों नही लौटा ? उन्हीं दिनों वहाँ एक अवधिज्ञानी मुनिराज का आगमन हुआ। उनका उपदेश सुनकर राजा को हार्दिक प्रसन्नता हुई…राजाने उनसे पूछा कि-हमारा मंत्री मरुभूति कहाँ है ? और अभी तक क्यों नही आया ?

मुनिराज ने कहा-हे राजन् ! मरुभूति को तो उसके भाई कमठ ने मार डाला है और उसे हाथी की पर्याय मिली है। तथा कमठ भी मरकर सर्प हुआ है।

यह सुनकर राजा को अत्यन्त दुःख हुआ। वह विचारने लगा कि-अरे ! कैसा है यह संसार ! दुष्ट कमठ के संग से मरुभूति भी दुःखी हुआ।

मुनिराजने समझाया कि हे राजन् ! इस संसार मे जीव जब तक ज्ञान नहीं करता तब तक उसे ऐसे जन्म-मरण होते ही रहते हैं। अपने हित के लिये दुष्ट अज्ञानी जीवों का संग छोड़कर ज्ञानी-धर्मात्माओं का संग करना योग्य है।

राजा उदास चित्त से महल में आया। एक बार वह राजमहल की छत पर बैठा-बैठा मुनिराज के उपदेश का स्मरण करके वैराग्य के विचार कर रहा था। इतने में एक घटना हुई-आकाश में रंगबिरंगे मेघ एकत्रित होने लगे और कुछ ही देर में ऐसी रचना हो गई मानो एक सुन्दर जिनमन्दिर हो ! अतिसुन्दर दृश्य था वह ! अहा, आकाश में ऐसे रमणीक जिनालय की रचना !!..उसे देखकर राजा अरविन्द को विचार आया कि मैं भी अपने राज्य में ऐसे ही सुन्दर जिनमन्दिर का निर्माण कराऊँगा। -ऐसे विचार आते ही उसने उस मन्दिर की आकृति बना लेने की तैयारी की। परन्तु उसने कलम हाथ में ली कि देखते ही वह मेघ रचना बिखर गई और मन्दिर की आकृति विलीन हो गई।

यह देखकर राजा दिङ्मूढ हो गया…अरे! ऐसा अस्थिर संसार!. ऐसे क्षणभंगुर संयोग!..यह राजपाट, यह रानियाँ यह शरीरादि . सब संयोग इन मेघों की भाँति बिखर जानेवाले-विनाशक हैं। अरे, ऐसे अस्थिर इन्द्रियविषयों में दिन-रात लगे रहना वह जीव को शोभा नहीं देता। यह शरीर नाशवान है और यह भोग भवरोग को बढानेवाले है। जिसे अपना हित करना हो उसे इन भोगों की लालसा मे जीवन गँवाना उचित नहीं है। जिस प्रकार यह मेघ-रचना क्षणभर मे बिखर गई, उसी प्रकार मैं भी अविलम्ब इसी क्षण संसार को छोड़कर मुनि बनूँगा और आत्मध्यान द्वारा कर्मरूपी बादलों को बिखेर दूँगा।

इस प्रकार अत्यन्त वैराग्यपूर्वक राजपाट छोड़कर राजा अरविन्द वनमें चले गये और निर्ग्रन्थ गुरु के निकट दीक्षा लेकर मुनि हुए। इन्ही अरविन्द मुनिराज द्वारा हाथी का जीव आत्मज्ञान प्राप्त करता है-उसका रोमांचक वर्णन आप अगले प्रकरण मे पढेंगे।

हाथी के भव मे सम्यक्त्व-प्राप्ति

सम्मेदशिखर वह अपने जैनधर्म का महान तीर्थ है। वहाँ से अनंत जीव सिद्धपद को प्राप्त हुए हैं; उसकी यात्रा करने से सिद्धपद का स्मरण होता है। अनेक मुनि वहाँ आत्मध्यान करते हैं। ऐसे महान तीर्थ सम्मेद शिखर की यात्रा हेतु एक विशाल संघ चला जा रहा है। उस यात्रासंघ में अनेक मुनि तथा हजारों श्रावक है, कितने ही छोटे-छोटे बालक भी उत्साह पूर्वक यात्रा करने जा रहे हैं। अरविन्द मुनिराज भी सघ के साथ विहार कर रहे हैं। रत्नत्रयधारी वे मुनिराज धर्मकथा कहते हैं और आत्मा का स्वरूप समझाते है; जिसे सुनकर सबको बड़ा आनन्द होता है। कभी भक्तिपूर्वक मुनिराज को आहारदान देने का अवसर प्राप्त होने से श्रावको को महान हर्ष होता है, समस्त साधर्मीजन परस्पर धर्मचर्चा और पंचपरमेष्ठी का गुणगान करते हुए सम्मेदशिखर की ओर चले जा रहे हैं। चलते-चलते उस संघने एक वनमें पड़ाव डाला। शात-सुन्दर वन हजारों मनुष्यों के कोलाहल से गूँज उठा .जंगल मे मानो एक नगर बस गया! मुनिराज अरविन्द एक वृक्ष के नीचे आत्मध्यान मे बैठे हैं। इतने मे एक घटना हुई.. क्या हुआ?-वह सुनो।

एक विशाल हाथी पागल होकर इधर-उधर दौड़ने लगा, जिससे लोगो मे भगदड़ मच गई। कौन था वह हाथी? - कुछ ही भवपश्चात् वही पार्श्वनाथ भगवान बननेवाला है! जो पूर्वभव में मरुभूति मंत्री था वही मरकर यह हाथी हुआ है; उसका नाम है वज्रघोष; वह हाथी इस वन का राजा है, और स्वच्छन्द रहकर विचरता है। सुन्दर वन मे एक सरोवर है जिसमे यह प्रतिदिन स्नान करता है, वनके मिष्ट फल-फूल खाता है और हाथिनियों के साथ क्रीड़ा करते है। घने निर्जन वनमें इतने अधिक मनुष्य और वाहन उस हाथीने कभी देखे नही थे; इसलिये वह एकदम भड़क उठा और पागल होकर लोगों को कुचलने लगा। लोग चिल्लाते और हाहाकार करते इधर-उधर दौड़े रहे थे…कितनों को उसने पैरों से कुचला तो कितनों को सूँड में उठा-उठाकर पछाड़ दिया! रथों को तोड़ डाला और वृक्षों को उखाड़ दिया। अनेक लोग भयभीत होकर रक्षा हेतु मुनिराज की शरण में जा पहुँचे।

पागल हाथी चारों ओर हाहाकार फैलाता हुआ, चिंघाड़ता हुआ उधर आया जहाँ अरविंद मुनिराज विराजते थे। लोग डरके मारे काँप उठे कि न जाने यह पागल हाथी मुनिराज को क्या कर डालेगा ? मुनिराज तो शांत होकर बैठे हैं। उन्हें देखते ही सूँड उठाकर वह उनकी ओर दौड़ा; परन्तु… …परन्तु अरविन्द मुनिराज के वक्षमें एक चिह्न देखते ही वह एकदम शांत हो गया; उसे लगा कि-अरे, इन्हें तो मैंने कहीं देखा है…यह तो मेरे कोई परिचित और हितैषी लगते हैं। ऐसा विचारते हुए वह एकदम शांत खड़ा रहा; उसका पागलपन मिट गया और मुनिराज के सन्मुख सूँड झुकाकर बैठ गया।

लोग आश्चर्यचकित होकर देख रहे थे कि-अरे, मुनिराज के सामने आते ही इसे क्या हो गया!..इस घटना से प्रभावित लोग मुनिराज के आसपास एकत्रित हो गये। मुनिराज ने अवधिज्ञान द्वारा हाथी के पूर्वभव को जान लिया, और शांत बैठे हुए हाथी को सम्बोधकर कहा-अरे, बुद्धिमान गजराज, यह पागलपना तुझे शोभा नहीं देता। यह पशुता और हिंसा छोड़ दे। पूर्वभव में तू हमारा मंत्री मरुभूति और मैं राजा अरविन्द था। मैं इस भवमें मुनि हुआ हूँ। मेरा मंत्री होकर भी तू आत्मा को भूला और आर्त्तध्यान करने से तुझे यह पशुपर्याय प्राप्त हुई…अब चेत, और आत्मा की पहिचान कर।

मुनिराज के कल्याणकारी सम्बोधन से उसे वैराग्य हो गया और अपने पूर्वभव का जातिस्मरण ज्ञान हुआ। अपने दुष्कर्म के लिये उसे तीव्र पश्चात्ताप होने लगा; उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी; वह विनयपूर्वक मस्तक झुकाकर मुनिराज के सन्मुख देख रहा था…प्राकृतिक रुपसे उसका ज्ञान इतना विकसित हुआ कि वह मनुष्य की भाषा समझने लगा, और उसे मुनिराज की वाणी सुनने की जिज्ञासा जागृत हो उठी।

मुनिराज ने जब जाना कि इस हाथी के परिणाम विशुद्ध हुए हैं, इसे आत्मा समझने की तीव्र जिज्ञासा जागृत हुई है और वह तो एक भावी तीर्थंकर है…तब अत्यन्त वात्सल्यपूर्वक वे हाथीको उपदेश देने लगे-अरे गजराज ! तू शांत हो; यह पशुपर्याय कहीं तेरा स्वरूप नहीं है; तू तो शरीर से भिन्न चैतन्यमय आत्मा है; आत्माको जाने बिना तूने अनेक भवों में अनेक दुःख भोगे हैं; इस लिये अब आत्मा के स्वरूप को समझकर सम्यग्दर्शन प्राप्त कर। सम्यग्दर्शन ही जीव को महान सुखकारी है। राग और ज्ञान को एकमेक अनुभवने का अविवेक तू छोड़…छोड़ ! तू प्रसन्न हो.. सावधान हो…और सदा उपयोगरुप स्वद्रव्य ही मेरा है-ऐसा अनुभव कर; उससे तुझे अति आनन्द होगा। तू निकटभव्य है, इसलिये आज ही ऐसा अनुभव कर।

हाथी बड़ी भक्ति से सुन रहा है। मुनिराज के श्रीमुख से आत्मस्वरुप की तथा सम्यग्दर्शन की बात सुनकर उसे अत्यन्त हर्षोल्लास हो रहा है; उसके परिणाम अधिकाधिक निर्मल होते जा रहे हैं…उसके अंतर में सम्यग्दर्शन की तैयारी चल रही है।

मुनिराज उसे आत्मा का शुद्ध स्वरुप बतलाते हैं-रे जीव ! तेरा आत्मा अनंत गुणरत्नों का भण्डार है…यह हाथी का विशाल शरीर तो पुद्गल है, यह कहीं तू नहीं है; तू तो ज्ञानस्वरुप है, तेरे ज्ञानस्वरुप में पाप तो नहीं है, किन्तु पुण्य का शुभराग भी नहीं है; तूं तो वीतरागी आनन्दमय है।-ऐसे अपने स्वरुप को अनुभव में ले।

-ऐसे अनेक प्रकार से मुनिराज ने सम्यग्दर्शन का उपदेश दिया; जिसे सुनकर हाथी के परिणाम अंतर्मुख हुए और अंतर में अपने आत्मा के सच्चे स्वरुप का अवलोकन करने से उसे सम्यग्दर्शन हो गया परम आनंद का अनुभव हुआ…उसे ऐसा भासित हुआ कि-“अहा, अमृत का सागर मेरे आत्मा में लहरा रहा है…परभावों से भिन्न सच्चे सुख का अनुभव आत्मा में हो रहा है। क्षणमात्र ऐसे आनन्द के अनुभव से अनंत भव की थकान उतर जाती है।” ऐसे आत्मा का बारम्बार अनुभव करने का उसे मन हुआ उपयोग पुनः पुनः अंतर मे एकाग्र होने लगा। उस अनुभव की अचिन्त्य अपार महिमा का कोई पार नही था। "आत्म-उपयोग सहजरूप से शीघ्रतापूर्वक अपने स्वरूपोन्मुख होने से सहज निर्विकल्प स्वरूप अनुभव में आया…चैतन्यप्रभु अपने ‘एकत्व’ में आकर निजानन्द में डोलने लगा…वाह ! आत्मा का स्वरूप कोई अद्भुत है ! परमतत्त्व को पाकर मैंने चैतन्य प्रभुको अपने में ही देखा।‘’

-इस प्रकार सम्यग्दर्शन होने से हाथी के आनन्द का कोई पार नही रहा। उसकी आनन्दमय चेष्टाएँ तथा आत्मशान्ति देखकर मुनिराज को भी लगा कि-इस हाथी को आत्मज्ञान हुआ है; भवका उच्छेद करके वह मोक्ष के मार्ग में आया है। मुनिराज ने प्रसन्न होकर, हाथ उठाकर हाथी को आशीर्वाद दिया। सघ के हजारों लोग भी यह दृश्य देखकर अति हर्षित हुए। एक क्षण मे यह क्या हो गया…वह सब आश्चर्य से देखने लगे।

आत्मज्ञान हो जाने से हाथी अत्यन्त भक्तिभाव से मुनिराज का उपकार मानने लगा…अरे, पूर्वकाल में आत्मा को जाने बिना आर्त्तध्यान करके मैंने पशुपर्याय पायी, परन्तु अब इन मुनिराज के प्रताप से मुझे आत्मज्ञान हुआ है; और अब आत्मा के ध्यान द्वारा मैं परमात्मा होऊँगा !-ऐसा विचार कर वह हाथी सूँढ़ झुका-झुकाकर मुनिराज को नमस्कार कर रहा था।

[देखो तो सही, बधुओ ! अपना जैनधर्म कितना महान है कि उसका सेवन करके एक पशु भी आत्मज्ञान पाकर परमात्मा बन सकता है ! प्रत्येक आत्मा में परमात्मा होने की शक्ति है।-ऐसा अपना जैनधर्म बतलाता है। वाह…जैनधर्म.. वाह !]

मुनिराज के पास सम्यग्दर्शन का स्वरूप समझकर, हाथी के साथ-साथ दूसरे भी अनेक जीव सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए। जिस प्रकार तीर्थंकर अकेले मोक्ष में नहीं जाते, दूसरे अनेक जीव उनके साथ मोक्ष प्राप्त करते हैं; उसी प्रकार यहाँ जब तीर्थंकर के आत्मा ने सम्यग्दर्शन प्राप्त किया तब दूसरे अनेक जीव भी उनके साथ सम्यक्त्व को प्राप्त हुए और चारों ओर धर्म की जयजयकार हो गई। कुछ ही समय पूर्व जो हाथी पागल होकर हिंसक बन गया था, वही अब आत्मज्ञानी होकर अहिंसक बन गया…और मुनिराज से पुन: पुन: धर्मश्रवण करने हेतु उनकी ओर आतुरता से देखने लगा। अनेक श्रावक भी उपदेश सुनने बैठे थे।

श्री मुनिराज ने मुनिधर्म तथा श्रावक धर्म का उपदेश दिया-सम्यग्दर्शन एवं आत्मज्ञान के उपरान्त जब चारित्रदशा होती है अर्थात् आत्मा का विशेष अनुभव होता है तब जीवको मुनिदशा होती है। वे मुनि उत्तम क्षमादि दसधर्मों का पालन करते हैं, और हिंसादिक पाँच पाप उनके किंचित् नहीं होते इसलिये उनके पाँच महाव्रत होते हैं। और सम्यग्दर्शन होनेपर भी जो जीव मुनि नहीं हो सकते वे श्रावक धर्मका पालन करते हैं; उनको आत्मज्ञान सहित अहिंसा दि पांच अणुव्रत होते हैं।तिर्यंचगति में भी श्रावकधर्म का पालन हो सकता हैं इसलिये हे गजराज ! तुम श्रावक धर्म को अंगीकार करो।

मुनिराज के पास धर्म का उपदेश सुनकर अनेक जीवों ने व्रत धारण किये। हाथी को भी भावना जागृत हुई कि-यदि मैं मनुष्य होता तो मैं भी उत्तम मुनिधर्म अंगीकार करता; इस प्रकार मुनिधर्म की भावनासहित उसने श्रावक धर्म अंगीकार किया…मुनिराज के चरणों में नमस्कार करके उसने पाँच अणुव्रत धारण किये.. वह श्रावक हो गया।

सम्यग्दर्शन प्राप्त करके व्रतधारी हुआ वह वज्रघोष हाथी बारम्बार मस्तक झुकाकर अरविन्द मुनिराज को नमन करने लगा, सूँड़ ऊँची-नीची करके उपकार मानने लगा। हाथी की ऐसी धर्म चेष्टा देखकर श्रावक बहुत सन्तुष्ट हुए…और जब मुनिराज ने घोषणा की कि-यह हाथी का जीव आत्मोन्नति करते-करते भरत क्षेत्रमें २३ वाँ तीर्थंकर होगा-तब तो सबको अत्यन्त हर्ष हुआ। हाथी को धर्मात्मा जानकर श्रावक उसे प्रेमपूर्वक निर्दोष आहार देने लगे।

यात्रा संघने कुछ समय उस वनमें रुककर फिर सम्मेदशिखर की ओर प्रस्थान किया। हाथी का जीव कुछ भवोंके पश्चात् इसी सम्मेदशिखर से मोक्ष प्राप्त करनेवाला है। अरविन्द मुनिराज भी संघके साथ विहार करने लगे तब वह हाथी भी विनयपूर्वक अपने गुरुको विदा करने हेतु कुछ दूर तक पीछे-पीछे चलता रहा. .अंतमें मुनिराज को पुन: पुन: वन्दन करके गद्गद् होकर अपने वन की ओर लौट चला।

अब, वह पाँच व्रतोंसहित निर्दोष जीवन जी रहा है; स्वयं जिस शुध्द आत्माका अनुभव किया उसकी बारम्बार भावना करता है। किसी भी जीवको सताता नहीं है, त्रसहिंसा हो ऐसा आहार नहीं करता; शांतभाव से रहकर सूखे हुए घास-पत्ते खाता है; कभी-कभी उपवास भी करता है। चलते समय देख-देखकर पाँव रखता है; हथिनियों का संग उसने छोड़ दिया है। विशाल शरीर के कारण अन्य जीवों को कष्ट न हो इसलिये वह शरीर का बहुत हलन-चलन नहीं करता; वनके प्राणियोंकी साथ शान्ति से रहता है और गुरुके उपकारका बारम्बार स्मरण करता है। हाथी की ऐसी शांत चेष्टा देखकर दूसरे हाथी उसकी सेवा करते हैं; वन के बन्दर तथा अन्य पशु भी उससे प्रेम करते हैं और सूखे हुए घास-पत्ते लाकर उसे खिलाते हैं।

पूर्वभवका उसका भाई कमठ, -जो क्रोध से मरकर विषधर-सर्प हुआ है, वह इसी वनमें रहता है और जीवजन्तुओं को मारकर खाता है तथा नवीन पापबंध करता है।

एक दिन प्यास लगने से वह हाथी सरोवर के निकट आया; सरोवर के किनारे वृक्षोंपर अनेकों बन्दर रहते थे; वे उसे देखकर बड़े प्रसन्न हुए। सरोवरका स्वच्छ जल पीने के लिये वह हाथी कुछ भीतर तक गया कि उसके पाँव कीचड़में फँस गये…बहुत प्रयत्न करने पर भी वह निकल नहीं सका। तब उसने आहार-जल का त्याग करके समाधिमरण की तैयारी की; वह पंचपरमेष्ठीका स्मरण करके आत्माका चिन्तन करने लगा। वैराग्यपूर्वक वह ऐसा विचारने लगा कि-अरे, अज्ञानसे कुमरण तो मैंने अनन्तबार किये, किन्तु यह अवतार सफल है कि जिसमें समाधिमरणका सुअवसर प्राप्त हुआ है। श्री मुनिराजने मुझपर महान कृपा करके देह से भिन्न आत्मस्वरूप मुझे समझाया; मेरे चैतन्यनिधान मुझे बतलाये। उनकी कृपा से मैंने अपना निजवैभव अपने आत्मा मे देखा है। बस, अब इस देह से भिन्न आत्माकी भावना द्वारा मै समाधिमरण करूंगा।

हाथी को कीचड़ में फँसा देखकर वन के बन्दर उसे बचाने के लिये किलकारियाँ मारने लगे; परन्तु वे छोटे-छोटे बन्दर उसे कैसे बाहर निकालते ? ..इतने में सर्प हुआ कमठ का जीव फुंकारता हुआ वहाँ आया; हाथी को देखते ही पूर्वभव के वैरसंस्कार के कारण उसे तीव्र क्रोध आया और दौड़कर हाथी को दंश मार दिया। कालकूट विषैले सर्प के दंश से हाथी को विष चढ़ गया और कुछही देरमें उसका प्राणांत हो गया। परन्तु इसबार उसने पहले की भाँति आर्त्तध्यान नहीं किया, इसबार तो आत्मा के ज्ञानसहित धर्मकी उत्तम भावना भाते-भाते उसने समाधिमरण किया, और शरीर को त्यागकर बारहवें स्वर्गमें देव हुआ।

सर्पने हाथी को डस लिया यह देखकर बन्दरी को बड़ा क्रोध आया और उसने मार डाला; पापी सर्प आर्त्तध्यान से मरकर पाँचवें नरक में पहुँचा। किसी समय जो दोनों सगे भाई थे, उनमें से पुण्य-पापके फलानुसार एक तो स्वर्ग में गया और दूसरा नरक में।

तीर्थंकरादि महापुरुषों के जीवन से आत्मा की आराधना सीखना है। पापके फलमें नरकादि के भयंकर दुःख सहना पड़ते हैं, इसलिये उन्हें छोड़ना और पुण्य के फल में स्वर्गादि गतियाँ प्राप्त होती हैं, तथा आत्मा के ज्ञानसहित वीतराग भाव से मोक्ष मिलता है-ऐसा जानकर उसकी उपासना करो।

(३) हाथी बारहवें स्वर्ग में, सर्प पाँचवे नरक में।

अपने चरित्र नायक का जीव पहले मरुभूति था, फिर हाथी हुआ और आत्मज्ञान प्राप्त किया; वहाँ से समाधिमरण करके बारहवे स्वर्ग में देव हुआ है,-उसका नाम है शशिप्रभ। स्वर्ग की दिव्य विभूति देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया और अवधिज्ञान से जान लिया कि-मैने हाथी के पूर्वभव में धर्मकी आराधना सहित जो व्रतों का पालन किया था उसका यह फल है; ऐसा जानकर उसे धर्मके प्रति विशेष सन्मान की भावना हुई; पूर्वभव में आत्मज्ञान प्रदान करनेवाले मुनिराज के उपकार का पुनःपुनः स्मरण किया; पश्चात् स्वर्ग में विराजमान शाश्वत जिन बिम्ब की पूजा की। स्वर्गलोक की रत्नमय शाश्वत वीतरागमूर्ति के दर्शन करते ही उसे अतिशय आनन्द हुआ और ऐसे ही अपने आत्माकी भावना की। वह असंख्यात वर्षों तक स्वर्गलोक में रहा। वहाँ बाह्य में अनेक प्रकार के कल्पवृक्षों से सुख-सामग्री प्राप्त होती थी और अंतर में चैतन्य-कल्पवृक्ष के सेवन से वह सच्चे सुखका अनुभव करता था। देखो तो सही, जैनधर्म के प्रताप से एक पशु भी देव हो गया, और कुछ ही काल पश्चात् तो वह भगवान होगा ! अहा, जिसके प्रताप से पशु भी परमात्मा बन जाते हैं-ऐसे जैनधर्म की जय हो ! हमें भी संसार से छूटकर परमात्मा बनने के लिये जैनधर्म में कहे हुए आत्मा का स्वरूप जानना चाहिये।

कमठ का जीव जोकि सर्प हुआ था, वह मरकर पाँचवें नरक में गया और असंख्य वर्षतक तीव्र दुःख भोगे। उसकी क्षुधा-तृषा का कोई पार नहीं था; उसके शरीरके प्रतिदिन हजारों टुकड़े हो जाते थे; लोहे का विशाल पिण्ड भी गल जाय ऐसी तो वहाँ ठण्ड थी; करवत और भालों से उसका शरीर कटता और छिदता था; आत्मा का ज्ञान तो उसे था नहीं, और अच्छे भाव भी नहीं थे, अज्ञान एवं अशुभ भावों से वह अत्यन्त दुःखी होता था। पूर्वभव में अपने भाई के प्रति जो तीव्र क्रोध के संस्कार थे, वे भी उसके छूटे नहीं थे। क्रोध में नरक से निकलकर वह एक भयंकर अजगर हुआ।

(४) पूर्वभव छठवाँ-अग्निवेगमुनि और अजगर

अपने कथा नायक भगवान पार्श्वनाथ का जीव स्वर्ग से च्यवकर जम्बूद्वीप के विदेह क्षेत्र में अवतरित हुआ। वहाँ सीमंधरादितीर्थंकर सदा विराजते हैं और दिव्यध्वनि में आत्माका स्वरूप समझाते हैं। हजारों केवली अरिहंत भगवान तथा लाखों जिनमुनि उस देश में विचरते हैं; वहाँ करोड़ों मनुष्य आत्मज्ञान करके धर्मकी साधना करते हैं। उस देश की शोभा अद्भुत है! देव भी वहाँ दर्शनार्थ आते हैं।

ऐसे सुन्दर विदेहक्षेत्र में पुष्कलावती देश के मध्य विजयार्द्ध पर्वत है; उसपर विद्याधरों के नगर हैं। उन्हीं में से एक नगर में विद्युत्गति नामक राजा राज्य करते थे, उनकी रानी का नाम विद्युत्माला था; उन्ही राजा-रानीके घर पार्श्वनाथ का जीव अवतरित हुआ, उसका नाम था अग्निवेग। वे पूर्वभव से ही आत्मज्ञान साथ लेकर आये थे। एक छोटे-से ज्ञानी की बालचेष्टाएँ देखकर सबको बड़ा आनन्द होता था। एक बार राजकुमार अग्निवेग वनमें जाकर वनकी शोभा निहार रहे थे, वहाँ अचानक उन्होंने एक साधु को देखा। वे साधु आत्मचिन्तन में एकाग्र थे, मानो साक्षात् भगवान विराज रहे हो ऐसा उनके दर्शन से लगता था। उन्हें देखकर अग्निवेग को हार्दिक प्रसन्नता हुई; निकट जाकर उनकी वंदना करके वह उनके निकट बैठ गया और आत्मा के विचार करने लगा कि-अहा! धन्य है ऐसी साधुदशा!..आत्मा में एकाग्र होकर आत्मा के अलौकिक आनन्द का अनुभव हो-ऐसी यह दशा है। कुछ ही देर में मुनिराज का ध्यान पूर्ण होने पर पुनः नमस्कार किया और मुनिराज ने उन्हे धर्मवृद्धि का आशीर्वाद देकर कहा-हे भव्य! आत्मा के सम्यक् स्वभाव को तो तुमने जाना है; अब उस स्वभाव को विशेषरूप से साधने के लिये तुम मुनिदशा का चारित्र अंगीकार करो। अब तुम्हारा संसार अति अल्प शेष रहा है; मनुष्य के तीन भव करके तुम मोक्ष प्राप्त करोगे। पहले तुम चक्रवर्ती होंगे और फिर तीर्थंकर होकर मोक्ष प्राप्त करोगे।

अहा! अपने मोक्षकी बात सुनकर किसे आनन्द नहीं होगा? मुनिराज के मुख से अपने मोक्ष की बात सुनकर अग्निवेग अति आनन्दित हुआ। उसे संसार के प्रति तीव्र वैराग्य जागृत हुआ कि-अरे, मुझे तो अल्पकाल में मोक्ष साधना है; इस राजपाट में बैठ रहना मेरे लिये उचित नहीं है, मैं तो आज ही मुनि बनकर आत्मसाधना में एकाग्र होऊँगा।

इस प्रकार युवावस्था में उन राजकुमार ने वैराग्य प्राप्त किया और मुनिराज के निकट जिनदीक्षा लेकर साधुदशा धारण की। राजपाट छोड़ा, स्त्री-पुत्र छोड़े और वस्त्र भी त्याग दिये। सर्व परिग्रह तथा कषायों को भी छोड़कर अंतर के एकत्वस्वरूप को ध्याने लगे-मेरा यह आत्मा सर्व परभावों से भिन्न है; मैं एकाकी ज्ञान और सुख से परिपूर्ण हूँ;- इस प्रकार निजात्मा के ध्यान में लीन रहकर वे अग्निवेग मुनिराज वनजंगल मे विचरने लगे तथा मोक्ष की साधना करने लगे। इतने मे एक घटना हुई।

पूर्वभव का कमठ जोकि नरक में गया था और वहाँ से निकलकर विशाल अजगर हुआ था; वह अजगर भी विदेहक्षेत्र के इसी वन में रहता था। वह शिकार की खोज में इधर-उधर भटकता रहता था। वह जंगल के पशुओं को पूरे का पूरा निगल जाता था। एक दिन मुनिराज अप्रिवेग ध्यान में लीन थे कि वह अजगर वहाँ आ पहुँचा। और फुंफारता हुआ क्रोधपूर्वक मुनिराजपर झपटा ! . शांत रस में निमग्न क्षमावंत मुनिराज तो ध्यान में लिन थे; उन्हें देखकर अजगर का क्रोध दूर नहीं हुआ; किन्तु मुँह फाडकर पुरे के पूरे मुनिराज को निगल लिया। अजगर के पेट में भी मुनिराजने आत्म ध्यान पूर्वक समाधिमरण किया और सोलहवे स्वर्ग मे गये ! देखो तो सही उनकी क्षमा ! अजगरने निगल लिया तथापि उसपर क्रोध नहीं किया और स्वयं आत्मा की साधना मे लीन रहे। क्रोध में दुःख है और आत्मा की साधना में ही परमशान्ति है। ऐसे शांत भावों से उन्होने समाधिमरण किया।

(५) सोलह स्वर्ग में देव; कमठ छठवें नरक का नारकी

मुनिराज तो शांत भाव से समाधिमरण करके सोलहवे स्वर्ग में गये और अजगर क्रोधभाव के कारण पुनः छठवे नरक में जा पडा और घोर दुःख सहन किये। दोनों की आयु बाईस सागर थी। एक बार जो दोनों सहोदर-भ्राता थे, उनमें से एक तो बाईस सागर तक स्वर्ग के सुख भोगकर तथा दूसरा उतने ही काल तक नरक के दुःख सहन करके दोनों मनुष्य लोक में उत्पन्न हुए, -उनमें से एक तो चक्रवर्ती हुआ और दूसरा शिकारी भील; -उनकी कथा आप अगले प्रकरण में पढ़ेंगे।

(६) पूर्व भव चौथा : वज्रनाभि चक्रवर्ती और कमठ शिकारी भील

इस जम्बूद्वीप के पश्चिम विदेह में अश्वपुर नगर है, वहाँ के राजाका नाम वज्रवीर्य तथा रानी का नाम विजयादेवी। एकबार रानीने आनन्दकारी पाँच मंगल स्वप्न देखे-मेरुपर्वत, सूर्य, चन्द्र देवविमान तथा जलसे भरा सरोवर। इन पाँच स्वप्नोंकी बात उन्होने राजासे कही और पूछा कि-हे महाराज ! इन पाँच स्वप्नोंका फल क्या ?

राजाने कहा कि-इनके फलमें तुम्हारे उत्तम पुत्र का जन्म होगा और वह चक्रवर्ती बनेगा।

यह सुनकर रानी प्रसन्न हुई और पंचपरमेष्ठी का गुणगान करने लगी। कुछ काल पश्चात् उनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम वज्रनाभि। यही अपने पार्श्वनाथ भगवान का जीव ! वह स्वर्ग से यहाँ अवतरित हुआ है; राजाने पुत्रजन्मका महान उत्सव किया। छोटे-से राजकुमार अपनी बाल चेष्टाओं से सबको आनन्दित करते थे… भले ही उम्र में छोटे, परन्तु महान आत्मज्ञानी थे। कभी कभी वे आत्मा की मधुर बातें करते, जिन्हें सुनकर अनेक जीवोंको धर्म की प्रेरणा मिलती। कभी वे एकान्त में ध्यान धरकर चैतन्य के चिन्तन में बैठ जाते. मानो कोई छोटेसे मुनि विराजते हो !

कुमार वज्रनाभि ज्यों-ज्यों बड़े होते गये त्यों त्यों उनके अनेक प्रकार की विद्याओका भी विकास होने लगा। वे बुद्धिसम्पन्न कुमार न्याय-निति के मार्गपर चलने वाले तथा अनेक गुणरत्नों कें भण्डार थे। युवा होनेपर उनका राज्याभिषेक हुआ। एक बार उत्तम पुण्योदय से धर्मचक्रवर्ती तीर्थंकर का उनके देशमें पदार्पण हुआ और उसी समय उनके राजभण्डार में चक्ररत्न-की उत्पत्ति हुई। पुण्य की अपेक्षा धर्मश्रेष्ठ है ऐसा समझनेवाले उन राजकुमार ने सर्वप्रथम धर्मचक्री तीर्थंकर देव की धर्मसभा में जाकर उनकी पूजा की… और फिर सुदर्शनचक्र का उत्सव किया। उस सुदर्शनचक्र का ऐसा सामर्थ्य कि जिस शत्रुपर छोड़ा जाय उसके प्राण हर ले ! परन्तु आश्चर्य की बात तो यह है कि उस चक्र द्वारा एक भी जीव की हिंसा किये बिना उन्होने छह खण्ड पर विजय प्राप्त कर ली ..मानो अहिंसा चक्र द्वारा ही छहों खण्ड जीतकर वे चक्रवर्ती हो गये। चक्रवर्ती का अपार वैभव उन्हें प्राप्त हो गया। अद्भुत वैभव होने पर भी वे चक्रवर्ती जानते थे कि- इस समस्त बाह्य वैभव की अपेक्षा हमारा अनत चैतन्य वैभव भिन्न प्रकार का है; वही सुख का दातार है, बाह्यका कोई वैभव सुख देनेवाला नही है, उसमे तो आकुलता है। पुण्य से प्राप्त बाह्य वैभव तो अल्पकाल रहनेवाला है, और हमारा आत्मवैभव अनंतकाल तक साथ रहेगा। सम्यग्दर्शनरुपी सुदर्शनचक्र द्वारा मोहको जीतकर मैं मोक्षसाम्राज्य प्राप्त करूँगा, वही मेरा सच्चा साम्राज्य है। ऐसी प्रतीतिससहित वे जगतसे उदास थे-‘‘दास भगवन्त के उदास रहे जगत सों, सुखिया सदैव ऐसे जीव समकिती हैं।’’

चक्रवर्ती-राज्य में रहने पर भी वे अंतर मे अद्भुत ज्ञान परिणति सहित वे प्रतिदिन अरिहंतदेव की पूजा, मुनिवरो की सेवा,शास्त्रस्वाध्याय, सामायिकादि क्रियाँए करते थी। इसप्रकार धर्म संस्कारों से परिपूर्ण उनका जीवन अन्य जीवों को भी आदर्शरुप था।

एक बार उनकी नगरी मे क्षेमकर मुनिराज पधारे; उनकी मुद्रा प्रशमरस झरती-वीतरागी थी और वे अवधिज्ञान के धारी थे। वज्रनाभि चक्रवर्ती उनके दर्शन करने गये और उन्हे देखते ही उनके नेत्रों से आनन्द उमड़ने लगा.. धन्य रत्नत्रयधारी मुनिराज ! आपके वीतरागी तीन रत्नो के समक्ष यह चक्रवर्ती के चौदहरत्न बिलकुल तुच्छ है ! इसप्रकार अत्यन्त भक्तिपूर्वक मुनिराजकी वन्दना एव स्तवन करके आत्महितका उपदेश सुनने की जिज्ञासा प्रगट की।

तब मुनिराजने उनको मोक्षमार्गका अलौकिक उपदेश दिया; सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रका वीतरागभाव समझाया, और कहा कि मोक्ष हेतु ऐसा वीतरागभाव ही कर्तव्य है। हे भव्य ! तुम इस संसार-दुःख से छूटना चाहते हो तो ऐसी चारित्रदशा अंगीकार करो। राग आत्मा का स्वभाव नहीं है, राग तो दुःख है; इसलिये कहीं भी किंचित् राग न करके, वीतराग होकर भव्यजीव भवसमुद्र से पार होते है। हे राजन् ! तुम भी ऐसे वीतराग धर्म की साधना में तत्पर होओ ! तुम्हे आत्मप्रतीति तो है ही, और अब तुम्हारे तीन भव शेष है, पश्चात् तुम तीर्थंकर होकर मोक्ष प्राप्त करोगे।

मुनिराजका ऐसा वीतराग उपदेश सुनकर चक्रवर्ती अति प्रसन्न हुए और उनको भी उत्तम वैराग्य भावनाएँ जागृत हुई। शरीर एवं भोगोंसे उनका चित्त उदास होगया और धर्मके उत्साह अत्यधिक बढ़ गया। उन्होने मुनिराज से अत्यन्त विनयपूर्वक मुनिदीक्षा देनेकी प्रार्थना की-हे प्रभो ! इस दुःखमय संसार से मेरा उद्धार करो… रत्नत्रयरुपी नौका द्वारा मैं भी इस भवसमुद्रसे पार होना चाहता हूँ.. संसार में कही सुख नहीं है, इसलिये तीर्थंकर भी संसार को त्यागकर मोक्षकी साधना करते हैं। हे प्रभो ! मै भी मुनिदीक्षा लेकर तीर्थंकर पथपर चलना चाहता हूँ।

२३

भगवान पारसनाथ (भाग २)

मुनिराजने कहाँ-हे भव्य ! तुम्हारी भावना उत्तम है। तुम चक्रवर्ती की सम्पदाको असार जानकर त्यागने हेतु तत्पर हुए हो और सारभूत रत्नत्रय को धारण करना चाहते हो… तुम्हे धन्य है ! ऐसा कहकर क्षेमकर मुनिराजने वज्रनाभिचक्रवर्ती को मुनिपद की दीक्षा दी .. वे चक्रवर्ती अब राजपाट छोड़कर जिनमुद्राधारी मुनि हो गये। छह खण्डकी विभूति के उपभोग से उन्हे तृप्ति नहीं हुई, इसलिये मोक्षका अखण्ड सुख साधने हेतु तत्पर हुए।धन्य वे मुनिराज ! उनके चरणों में नमस्कार हो !-धन्य चक्रेश्वर आतमहितमे छोड़ दिया घरबार… कि तुमने छोड़ा सब संसार छोड़े चौदह रत्न नवो निधि, जाना जगत असार .. कि तुमने छोड़ा सब ससार… रत्नत्रय को धारण करके पहुँचे मुक्ति द्वार . कि तुमने छोड़ा सब ससार. गजगज के ऊपर रत्नजड़ित होदे पर आरूढ़ होकर चलनेवाले चक्रवर्ती अब नंगे पाँव वनकी पथरीली भूमि पर चलने लगे। रत्न-मणिजड़ित वस्त्रालंकारो को छोड़कर नग्न-दिगम्बर मुद्राधारी वे मुनिराज अब रत्नत्रयरूपी आभूषणों से सुशोभित हो रहे थे। सुवर्ण-थालों मे भोजन लेनेवाले अब हथेलियों-में खडे-खड़े आहार करने लगे। चौदह रत्न छोड़कर उन्होंने तीन रत्न ग्रहण किये, नव निधानों को त्यागकर अखण्ड आनंद निधान की साधना मे लग गये। छियानवे हजार रानियाँ और छियानवे करोड़ सेना का सग छोड़कर एकाकी-असंगरुपमे वन-जगल मे वास करने लगे और चैतन्यस्वरूप आत्माके ध्यान मे लीन हो गये।

एक बार वे मुनिराज वन की एक शिलापर बैठे-बैठे आत्म ध्यान मे लवलीन थे. सिद्ध भगवान समान अपने आत्माका बारम्बार अनुभव करते थे। जगल मे आसपास क्या हो रहा है उसका उन्हे रंचमात्र भी लक्ष नही है; मै तो देहसे भिन्न आत्मा हूँ मुझमें परिपूर्ण परमात्मा शक्ति विद्यमान है. . इत्यादि ध्यान में एकाग्र थे कि.. इतने में दूरसे एक तीर सनसनाता हुआ आया और मुनिराज का शरीर विंध गया. . कहाँ से आया था वह तीर ? उनका पूर्वभव का भाई कमठ का जीव जो कि नरक में गया था और वहाँ से निकलकर कुरंग नामका शिकारी भील हुआ था, वह भील इसीवनमें रहताथा और धनुष-बाण द्वारा क्रूर परिणामोंसे हिरन आदि निर्दोष पशुओं की हिंसा करता था। वह मांसका लोलुपी था और महान पाप बंध कर रहा था। वनमे फिरते फिरते वह भील वहाँ आ पहुँचा जहाँ मुनिराज ध्यान मग्न विराजमान थे। मुनिराज को देखकर उन पर भक्तिभाव आने के बदले पूर्वभवके संस्कारवश उसे क्रोध आया और धनुष पर बाण चढ़ाकर मुनिराज की ओर चल दिया .. मुनिराज का शरीर बिंध गया।

अरेरे ! क्रोध कितना नीच है ! कहाँ जीव का उपशांत स्वभाव और कहाँ क्रोध ! क्रोधान्ध जीव उन भगवान सदृश मुनिराज को नहीं पहिचान सका ..और ध्यान में स्थिर उन अहिंसक मुनिराज की अकारण हिंसा करके उस जीवने तीव्र अनन्तानुबंधी क्रोध से सातवें नरक की आयु का बंध किया। उसे कहाँ खबर थी कि क्रोध के फल में इतने भयंकर दुःख भोगने पड़ेंगे !

और इधर, शरीर विंध जानेपर भी मुनिराज तो अपने आत्म स्वभाव मे निश्चल है, उनके ध्यान में कोई शत्रु या मित्र नहीं है, राग या द्वेष नहीं है। कोई पूजे या कोई बाण मारे-दोनों के प्रति उन्हे समभाव है, जीवन और मरण में भी समभाव है, उनको शरीर का ममत्व नहीं है; आत्मा के आनन्द में इतने लीन है कि शरीर छिदने पर भी उसका दुःख नहीं है; मोह हो तो दुःख हो न ? निर्मोही को दु ख कैसा ? वे तो निर्मोह रुपसे धर्मध्यान में ही एकाग्र है। बाण मारनेवाले भीलपर भी उन्हें क्रोध नहीं होता। वाह रे वाह ! धन्य है क्षमा के भण्डार उन मुनिराज को ! समाधिपूर्वक शरीर त्यागकर वे मध्यम ग्रैवेयकमें अहमिन्द्र हुए।

प्रिय पाठको ! तुम भी उस भीलपर क्रोध नहीं करना, किन्तु क्षमा के भण्डार ऐसे मुनिराज से उत्तम क्षमा का पाठ पढ़ना। क्रूर भीलका जीव भी अन्त मे तो धर्म प्राप्त करनेवाला है।

वह भील का जीव अपने महापाप का फल भोगने के लिये सातवे नरक में गया। रौद्रध्यान से मुनिराज की हत्या करने से वह घोर नरक मे जा गिरा और वहाँ भयंकर दुःख सहन किये। संसार में परिभ्रमण करते हुए जीव ने अज्ञानदशा में ऐसे भाव अनन्तबार किये है; वह जीव भी क्षणमात्र में अपने भावों में परिवर्तन करके अपना हित साध सकता है। वर्तमान का वह पापी जीव भी क्षणभर मे पलटकर कैसे आत्मा का उद्धार करता है वह आप कुछ ही समय पश्चात् पढ़ेंगे. और तब उसी जीव के प्रति आपको प्रेम उत्पन्न होगा।

(७) ग्रैवेयक में अहमिन्द्र और सातवें नरक में नारकी

ग्रैवेयक में उत्पन्न हुए उन अहमिन्द्र की आयु २७ सागरोपम जितने असंख्य वर्ष की थी, और सातवें नरक में उत्पन्न हुए उस कमठ के जीव की आयु भी २७ सागरोपम थी। और यहाँ से निकलकर दोनों जीव मनुष्यलोक में फिर मिलेंगे। स्वर्गलोक का आश्चर्यजनक वैभव देखकर वे अहमिन्द्र विचार मे पड़ गये और उनको अवधिज्ञान प्रगट हुआ, उन्होंने अपना पूर्वभव जान लिया; इससे धर्म की अतिशय महिमा आयी कि-अहो ! वह मुनिदशा धन्य थी ! वह चारित्रवृक्ष तो मोक्षफल देनेवाला था, परन्तु मेरी वीतराग चारित्रदशा पूर्ण नहीं हुई और किंचित् राग शेष रह गया जिससे इस स्वर्गलोक मे अवतार हुआ है। यहाँ भी जैनधर्म की उपासना मेरा कर्त्तव्य है। ऐसा विचारकर वहाँ देवलोक के जिनालय में विराजमान शाश्वत रत्नमय जिनप्रतिमा की अत्यन्त भक्तिसहित पूजा की। स्वर्गलोक के कल्पवृक्षोंसे पूजनकी सामग्री ली। उन स्वर्गलोक की ऋद्धि अलौकिक थी। वहाँ असंख्यात सम्यग्दृष्टि देव थे; उनमें से कितने ही देव आगामी भव में ही तीर्थंकर होनेवाले थे और कितने ही मोक्ष प्राप्त करनेवाले थे।-ऐसे धर्मात्मा साधर्मी देवों के साथ आनन्दपूर्वक असंख्य वर्षतक धर्मचर्चा की और मुनिपने की भावना भायी।

इधर, उनके साथ सातभव से सम्बन्धित कमठ के जीव ने नरक में २७ सागर तक अपरम्पार वेदनाएँ सहन की। जब वह भील था और उसने बाण चलाकर मुनिराजका घात किया; पश्चात् कुछ ही काल में उस भील को भी किसीने मार डाला और क्रूर परिणामों से रौद्रध्यान द्वारा मरकर वह सातवे नरक में उत्पन्न हुआ, उपजते ही औंधे सिर भालो जैसी भूमिपर गिरा और तीव्र वेदना सहित पाँच सौ योजन ऊपर उछलकर फिर उसे भूमिपर गिरा और फिर उछला।-इसप्रकार बारम्बार होने से उनका शरीर छिन्नभिन्न हो गया और भयंकर वेदना हुई। अत्यन्त भयभीत होकर मूढ़ की भाँति चारों ओर ताकने लगा कि-अरे, यह सब क्या है? मैं यहाँ कहाँ आ पहुँचा? यहाँ तो चारों ओर दुःख का समुद्र उमड़ रहा है। अरे, मैं कहाँ जाऊँ? क्या करूँ? किसकी शरण लूँ? अरेरे! पूर्वभव के महापाप से मैं इस नरक में आ पड़ा हूँ। यहाँ की दुर्गन्ध तो सहन नही होती, और अति भीषण ठण्ड से शरीर गल जाता है। इस नरकके कुएँ से मैं कब निकलूँगा? इस प्रकार अत्यन्त दुःख से विलाप करता है । परन्तु वहाँ कौन उसका विलाप सुने? कौन उसकी दया करे? उलटे दूसरे नारकी घातक बनकर उसे मारते है। भूखे-प्यासे उस जीव को असंख्य वर्ष तक खाने को अन्न या पीने को पानी नही मिलता। दुःख के मारे उसे कुछ सूझता नही है, कहीं चैन नही पड़ता। धर्म का सेवन तो किया नहीं है, धर्मात्मा की विराधना करके मात्र पाप का ही सेवन किया है, फिर उसे चैन कहाँ से हो? जो निर्दय होकर जीवहिंसा करे, मांसभक्षण करे,-ऐसे जीव नरक में अतिभयंकर दुःख भोगते हैं, वहाँ एक क्षण भी सुख नहीं है। हिंसादि में सुख माननेवाले जीव राई जितने इन्द्रियसुख के लिये मेरुपर्वत समान दुःख को आमंत्रित करते हैं।-इस प्रकार उस पापी जीव ने असंख्यात वर्ष तक सातवे नरक के महान दुःख भोगे।

(८) पूर्वभव दूसरा-आनन्दकुमार और सिंह

अहमिन्द्र स्वर्ग से निकलकर मरुभूति का जीव (पार्श्वनाथ भगवान का जीव) तो अयोध्यानगरी में आनन्दकुमार के रूप में अवतरित हुआ और कमठ का जीव नरक से निकलकर क्रूर सिंह हुआ।

ऋषभदेव आदि पाँच तीर्थंकर भगवन्तों के अवतार से पावन हुई अयोध्यापुरी में राजा वज्रबाहु थे, उनकी रानी प्रभावती की कुक्षि से आनन्दकुमार का अवतार हुआ। आनन्दकुमार स्वयं आत्मानन्द का अनुभव करते थे और दूसरों को भी आनन्द देते थे। बड़े होनेपर वे महामाण्डलिक राजा हुए, आठ हजार राजा उनके अधिकार में थे। इतने महान राजा होनेपर भी वे धर्म को नही भूलते थे। वे धर्मात्माओं का सन्मान तथा विद्वानों का आदर करते थे। उनके शासन में अयोध्या की प्रजा सर्व प्रकार से सुखी थी।

फाल्गुन मास में वसन्तऋतु आयी, और उद्यान सुन्दर पुष्पों से खिल उठे। धर्मात्माओं के अंतर के उद्यान भी श्रद्धा-ज्ञान एवं आनन्द के पुष्पों से खिल उठे। आनन्द महाराजा राजसभा में बैठे हैं और धर्मचर्चा द्वारा सबको आनन्दित कर रहे हैं। इतने में मंत्री ने आकर कहा कि-हे महाराज! कलसे अष्टाह्नि का पर्व प्रारम्भ हो रहा है, इसलिये आठदिन (फाल्गुन शुक्ला अष्टमी से पूर्णिमा) तक जिन मन्दिर में नन्दीश्वर-पूजा का आयोजन किया है, आप भी इस उत्सव में पधारकर नन्दीश्वर-जिनालयों की पूजा करें।

मंत्री की बात सुनकर राजा अति आनन्दित हुए और कहा-अहा, वीतराग जिनेश्वर की पूजा का यह अवसर तो बड़े भाग्य से प्राप्त होता है। राज्यभर में धामधूम से यह उत्सव मनाओ। पूजा रचाओ, धर्मचर्चा करो, दान दो, और जिनेन्द्र भगवान के गुणों का चिन्तन करके जैनधर्म की खूब प्रभावना करो।

अष्टाह्निका पर्व का मंगल-उत्सव चल रहा था, उन्हीं दिनों विपुलमति नामके एक मुनिराज जिनमन्दिर में आये। वाह! एक तो भगवान की पूजा का उत्सव और उसीमें मुनिराज का आगमन ..इससे सारे नगर मे हर्ष छा गया! राजा एवं प्रजा सबने भक्तिभाव सहित मुनिराज के दर्शन किये।

वीतरागी मुनिराज ने कहा-हे भव्यजीवो ! यह आत्मा ही स्वयं ज्ञान एवं सुखस्वरूप है, इसे पहिचानो ! सम्पूर्ण जगत में घूम-फिरकर देखा, परन्तु आत्मा के अतिरिक्त कही अन्यत्र सुख दिखायी नहीं दिया। आत्माका सुख आत्मा में ही है; वह बाहर ढूँढने से नहीं मिलेगा। आत्मा को जानने से ही आत्मसुख की प्राप्ति होती है। राग द्वारा भी वह सुख प्राप्त नहीं होता। जिनशासन में अरिहंत भगवान ने ऐसा कहा है कि-पूजा-व्रतादि के शुभराग से जीवों को पुण्यबन्ध होता है और मोह रहित जो वीतरागभाव है वह धर्म है, उसके द्वारा मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पुनश्च, मुनिराज ने कहा-इस समय नन्दीश्वर-जिनालयों की पूजा का उत्सव अष्टाह्निका पर्व चल रहा है; उस नन्दीश्वरद्वीप में बावन शाश्वत जिनालय हैं और उनमें ५६१६ वीतरागी जिनबिम्ब विराजमान हैं। वे जिनबिम्ब आत्मा के शुद्धस्वरूप का प्रतिबिम्ब हैं। जिस प्रकार दर्पण में देखनेपर अपनी मुखाकृति दिखायी देती है, उसी प्रकार वीतरागी जिनबिम्ब के दर्शन से आत्मा का शुद्धस्वरूप जो अरहंत जैसा है वह लक्ष में आता है और आत्मा का शुद्धस्वरूप लक्ष में आनेपर मोह का नाश होकर सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है। उस नन्दीश्वर द्वीपमें मनुष्य नहीं जा सकते, वहाँ देव ही जाते हैं। और रत्नमय शाश्वत जिनबिम्ब देखकर अनेकों देव आश्चर्य से चैतन्य की महिमा में लिन होकर सम्यग्दर्शन प्राप्त करते है। जिस प्रकार आत्माका शुद्धस्वभाव शाश्वत-अनादिका है, उसी प्रकार उसके प्रतिबिम्ब रुप वे वीतराग जिन प्रतिमाएँ भी शाश्वत अनादिकी है। वे प्रतिमाएँ ऐसी आश्चर्यकारी है मानो साक्षात् तीर्थंकर भगवान ही विराज रहे हो ! मानो अभी मुखसे दिव्यध्वनि खिरने लगेगी । वीतरागता का परमतेज उनकी मुद्रापर झलक रहा है; जिसे देखकर आत्माके सर्वज्ञस्वभाव का स्मरण होता है। अहा ! चैतन्य के अनंत गुणमानो मूर्त होकर झलकते हो ऐसी अद्भुत उन रत्नप्रतिमाओं की छबि है ! वे भले अचेतन हो, किन्तु चैतन्यगुणों के स्मरण का निमित्त हैं। वे मूक जिनप्रतिमाएँ ऐसा उपदेश देती हैं कि-संकल्प-विकल्प छोड़कर तुम अपने स्वरुप मे स्थिर होओ .हे चेतन ! तू जिनप्रतिमा बन ! जिस स्वरुप में प्रभु का ध्यान करोगे उसी स्वरुप तुम होगे।जिस प्रकार चिन्तामणि के चिन्तन द्वारा इच्छित वस्तु की प्राप्ति होती है, उसी प्रकार जिनप्रतिमा समान शुद्ध आत्मा के चिंतन द्वारा सम्यक्त्वादि इष्ट फल की प्राप्ति होती है। अरे, जिसे जिनदेव के प्रति भक्ति नहीं है वह तो ससार समुद्र के बीच विषय-कषाय रुपी मगर के मुख में ही पड़े है। प्रतिदिन जिनेन्द्र देव के दर्शन करके जिनभावना भाना वह प्रत्येक श्रावक का कर्तव्य है।

मुनिराज के मुख से जिनदर्शन की महिमा सुनकर सबको अति हर्ष हुआ और अतर मे अरिहंत देव के गुणों का तथा आत्मा के शुद्धस्वरुप का विचार करने लगे। तत्पश्चात् मुनिराज आहार के समय नगर में पधारे और आनन्द राजाने नवधा भक्तिपूर्वक उन्हें आहारदान दिया। आहार के पश्चात् मुनिराज ने कहा-हे राजन् ! अब आपके दो ही भव शेष है। इस भवमें तीर्थंकर प्रकृति बाँधकर आगामी दूसरे भव में आप भरतक्षेत्र में २३ वें तीर्थंकर होगे.. और सम्मेदशिखर से मोक्ष प्राप्त करोगे। यह सुनकर राजा आनन्द अति आनन्दित हुए। उनका नाम भी ‘आनन्द’ था, और भाव मे भी वे आनन्दित थे।

पश्चात् मुनिराज ने उपदेश में तीन लोक के जिनबिम्बों का भी वर्णन किया था। सूर्यविमान मे प्रभु का शाश्वत जिनबिम्ब है और ज्योतिषी देव उसकी पूजाभक्ति करते हैं; उसका अद्भुत वर्णन सुनकर राजा अपने महल में से उन्हें नमस्कार करने लगे और अयोध्या नगरी में भी सूर्यविमान जैसा एक सुन्दर विमान बनवाया; हीरा-माणिक-रत्नजड़ित उस विमान में सुन्दर जिन प्रतिमा की स्थापना की। उस विमान की तथा उसमें विराजमान प्रतिमा की अद्भुत शोभा देखकर राजा आनन्द के आनन्द का पार नही था; वे प्रतिदिन प्रातःएवं सायंकाल उसकी पूजा करने लगे। इस प्रकार राजा को सूर्यविमान स्थित जिनबिम्ब की पूजा करते देखकर उस पर विश्वास के कारण लोग भी सूर्य विमान को नमस्कार करने लगे। राजा तो सूर्यविमान मे विराजमान जिनबिम्ब को नमस्कार करते थें, परन्तु बाह्य दृष्टि जीव निश्चय को जाने बिना व्यवहार को भजने लगते है, तदनुसार अन्यमतावलम्बी लोग भी जिनबिम्ब के बदले सूर्यबिम्ब को पूजने लगे।

आनन्द महाराजा अनेक प्रकार से धर्माराधन कर रहे है। उन्हे विश्वास है कि जिनसदृश अपने आत्मा का चिन्तन करके मै भी जिन हो जाऊँगा। -ऐसी भावना सहित अनेक वर्ष बीत गये। एक दिन राजाने अपने सिर मे श्वेतबाल देखा, और तुरन्त ही उसका हृदय वैराग्यमय हो उठा कि-अरे, यह श्वेत बाल मृत्युका सन्देश लेकर आया है कि-हे जीव ! अब शीघ्र ही चारित्रदशा को धारण करके आत्मकल्याण कर। इसलिये अब मुझे आत्मकल्याण में क्षणभर का भी विलम्ब नही करना चाहिये। मै आज ही यह सर्व सासारिक परिग्रह छोडकर शुद्धोपयोगी मुनि बनूँगा और उपयोग स्वरूप अपने आत्मामे एकाग्र होकर चारित्रदशा प्रगट करूँगा। ऐसे दृढ निश्चयपूर्वक वे आनन्द महाराजा बारह वैराग्य भावनाओ का चिन्तन करने लगे और सागर दत्त मुनिके समीप मुनिदीक्षा ग्रहण की। मुनि होकर शुद्धोपयोग द्वारा आत्मध्यान मे एकाग्र हुए और अतीन्द्रिय आनन्द के सागर मे निमग्न हो गये। अहा ! उनका आत्मा रत्नत्रयके तेज से दीप्तिमान हो उठा ! उनकी वीतरागता आश्चर्य उत्पन्न करती थी। ऐसी उत्तम आराधना सहित स्वाध्याय मे एकाग्रता से उन आनन्दमुनिराज को बारह अग का ज्ञान उदित हुआ, श्रुतज्ञान का पवित्र सागर उमडने लगा; अन्य अनेक ऋद्धियाँ भी उनके प्रगट हुई, परन्तु उनका लक्ष तो चैतन्यऋद्धि पर ही था। आर्तध्यान तथा रौद्रध्यान का तो उनके अभाव था, वे तो धर्मध्यान मे एकाग्र रहते थे और कभी कभी शुक्लध्यान भी ध्याते थे। ध्यान के समय वे अपने एक शुद्धात्मा में ही उपयोग को एकाग्र करके निर्विकल्प आनन्द का अनुभव करते थे, और अन्य चिन्ताएँ अपने आप अटक जाती थी। अहा, उनकी शात ध्यान मुद्रा देखकर वनके पशु भी आश्चर्यचकित हो जाते थे। सर्व प्रकार के परिषहो को सहन करते हुए वे आनन्द-मुनिराज आत्मशुध्दि मे वृध्दि कर रहे थे और उनके कर्मों की निर्जरा हो रही थी।-अहा, ऐसा वीतरागी मुनि जीवन धन्य है ! उनके चरणो मे हमारा मस्तक झुक जाता है।

वे मुनिराज बारम्बार शुध्दोपयोगरूपी जल द्वारा चारित्रवृक्ष का सिंचन करते थे। वे चारित्र के महान कल्पवृक्ष थे और उस कल्पवृक्ष मे मानो उत्तम फल लगे हो तदनुसार उत्तम क्षमादि दस धर्म उनके विकसित हो चुके थे। -ऐसे आनन्द मुनिराज ने दर्शन विशुद्धि से लेकर रत्नत्रयधर्म के प्रति परम वात्सल्यतक की सोलह भावनाओ द्वारा तीर्थंकर प्रकृतिका बध किया। सर्व तीर्थंकर पूर्वभव में ऐसी उत्तम भावनाएँ भाते है। एक ओर पुण्य का रस बढ रहा था तो दूसरी ओर चैतन्य-अनुभव द्वारा वीतरागी शांतरस में भी वृध्दि होती जा रही थी। शिवपुर पहुँचने में अब मात्र एक ही भव बीच में शेष बचा था।

वे मुनिराज एक बार वन मे निष्कप रुप से ध्यान मग्न थे…बाह्य लक्ष छोड़कर निजस्वरुप के अवलोकन में एकाग्र थे। उनके सर्व प्रदेशो मे अपूर्व आनद रस की फुहारे फूट रही थीं कि इतने में गर्जना करता हुआ एक सिह वहाँ आ पहुँचा। उसकी भीषण गर्जना से सारा वन काँप उठा; वन के पशु-पक्षी भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। छलाँगे मारता हुआ वह सिह वनमे स्वच्छन्द विचरता था। वह सिह दूसरा कोई नही किन्तु अपना परिचित कमठ का जीव है। ध्यानस्थ मुनिपर उसकी दृष्टि पडते ही उसने क्रोध से गर्जना की और मुनि की ओर दौड़ा। मुनिराज किंचित् मात्र भयभीत नहीं हुए, वे तो निर्भयरूप से अपने ध्यानमें लीन थे। सिह ने छलांग मारकर उनका गला दबोच लिया और पंजों से शरीर को फाड़कर खाने लगा! उसे कहाँ खबर थी कि मैं इस समय जिनके शरीर को खा रहा हूँ वे ही कुछ समय पश्चात् मेरे गुरु बनकर मेरा संसार से उद्धार करेंगे! सिंह शरीर को खा रहा था उस समय मुनिराज तो अपने उत्कृष्ट क्षमाभाव मे ही रहे, उन्होंने सिंह पर किंचित् क्रोध नहीं किया वीतरागमार्ग से किंचित् भी चलित नहीं हुए। वाह! धन्य मुनिराज! चतुर्विध आराधना की अखण्डता सहित प्राणोत्सर्ग करके वे आनत स्वर्ग मे इन्द्र हुए। सिह भी क्रूरपरिणामो से मरकर पुन नरक मे जा गिरा।

(९) आनन्द मुनि स्वर्ग में-सिंह नरक मे

ऊर्ध्वलोक के १६ स्वर्गो मे से १३ वाँ आनतस्वर्ग है, वहाँ अनेक कल्पवृक्ष एवं चिन्तामणि रत्न भी सुलभ है। परन्तु शास्त्रकार कहते है कि-कल्पवृक्ष के निकट तो फल की याचना करना पड़ती है और चिन्तामणि के निकट भी चितवन करना पड़ता है, तब वे इच्छित वस्तु देते हैं, परन्तु वीतराग धर्म तो ऐसा है कि वह बिना इच्छा के भी उत्तम फल प्रदान करता है, इसलिये वह धर्म ही श्रेष्ठ है। आनत स्वर्ग में उत्पन्न हुए अपने कथा नायक पार्श्वप्रभु का यह स्वर्ग का अन्तिम भव है अगले भव में तो वे भगवान होंगे। भोगोपभोग के बीच वे जानते थे कि इन भोगों की इच्छा तो अग्निसमान है, विषयरूपी ईंधन से वह कभी शात नहीं होगी, वह तो चारित्र-जलसे ही बुझ सकती है परन्तु इस स्वर्गलोक में चारित्रदशा है ही नही, वह तो मनुष्य भव में ही होती है; इसलिये अब मनुष्य भव पाकर हम अपनी चारित्रदशा पूर्ण करेंगे और पुन इस ससार चक्र में नही फँसेगे। इसप्रकार चारित्रदशा कि भावनापूर्वक, सम्यक्त्वकी आराधना सहित वे असख्य वर्षतक स्वर्गलोक मे रहे। वे बारम्बार जिनभक्ति का उत्सव करते और देवो की सभामें उत्तम धर्मोपदेश देते। उनके उपदेश से स्वर्ग के कितने ही देवो ने सम्यग्दर्शन प्राप्त किया।

उन इन्द्र की आयु में जब छहमास शेष रहे और वाराणसी नगरी (काशी-बनारस) मे पार्श्वनाथ की तीर्थंकररूप मे अवतरित होने की तैयारी हुई, तब बनारसनगरी में क्या हुआ?-वह देखने के लिये चलो हम उसनगरी में पहुँच जायें और पार्श्वप्रभु के जन्मोत्सव में आनन्दपूर्वक सम्मिलित हों।

(१०) वाराणसीनगरी में पार्श्वप्रभुका अवतार

पारस प्रभु ने कराया, चेतन रस का पान;
आत्मा को स्पर्शकर, जीवन बना महान।
लोहा जो कंचन बने, आत्मा बने भगवान,
प्रभु मैं भी तुमसा बनूँ, दीजे यह वरदान।

जिस समय की यह कथा है, उस समय इस भरतक्षेत्र में चौथा काल पूर्ण होने आया था; बाईस तीर्थंकर मोक्ष पधार चुके थे। नेमिनाथ भगवान गिरनार से मोक्ष पधारे, उसे भी ८३७५० वर्ष बीत चुके थे। अयोध्या से थोडे कोस की दूरीपर काशी देश में गंगानदी के किनारे वाराणसी (बनारस) नगरी अतिसमृध्द एवं शोभायमान थी। इसी नगरी में सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ अवतरित हो चुके थे। अब तो तेईसवे तीर्थंकर पार्श्वनाथ प्रभुके अवतार का समय आ चुका था। जहाँ तीर्थंकर अवतरित होनेवाले थे-ऐसी वाराणसी नगरी की शोभा का क्या कहना ! राजभवन के प्रांगण में प्रतिदिन आकाश से करोड़ो रत्नों की वर्षा होने लगी पन्द्रह मास तक वह रत्नवृष्टि होती रही . नगरवासी समझ गये थे कि-यह किसी महामंगल अवसर के चिह्न हैं।

विश्वप्रसिद्ध ऐसे बनारस तीर्थ मे उस समय महाभाग्यवान राजा विश्वसेन राज्य करते थे। [कोई उन्हे अश्वसेन भी कहते है।] वे अति गंभीर थे सम्यग्दृष्टि थे। अवधिज्ञान के धारी तथा वीतराग देव-गुरु के परम भक्त थे। उनकी महारानी ब्राह्मी देवी (ब्रह्मदत्ता अथवा वामादेवी) भी अनेक गुणसम्पन्न थी। उन दोनो का आत्मा तो मिथ्यात्वमल से रहित था ही, किन्तु उनका शरीर भी मलमूत्ररहित था। अहा ! जहाँ तीर्थंकर समान पवित्र आत्माका निवास होनेवाला हो वहाँ मलिनता कैसे रह सकती है ? सिद्धांत मे कहा है कि-तीर्थंकर को, उनके माता-पिता को, चक्रवर्ती को बलदेव-वासुदेव-प्रतिवासुदेव को तथा जुगलिया को मल-मूत्र नही होते।

एक बार महारानी ब्राह्मीदेवी पंचपरमेष्ठी भगवन्तों के स्मरणपूर्वक निद्राधीन थीं, वैशाख कृष्णा द्वितीया का दिन था, तब उन्होने रात्रि के पिछले प्रहर मे १६ मगल स्वप्न देखे .-

सुर कुंजर सम कुंजर, धवल धुरन्धरो,
केहरि-केशर शोभित, नख सिख सुन्दरो।
कमला कलश-न्हवन, दुई दाम सुहावनी,
रवि-शशि मंडल मधुर, मीन जुग पावनी।
पावन कनकघट जुगम पूरन, कमल-कलित सरोवरो;
कल्लोलमाला कुलित सागर, सिहपीठ मनोहरो।
रमणीक अमर विमान फणपति-भुवन रवि छवि छाजई;
रुचि रतनराशी दिपंत, दहनसु तेजपुंज विराजई।

ऐसे महामंगलकारी स्वप्न देखे और उसी समय ब्रह्मदत्ता(वामादेवी) माताकी कुक्षि में पार्श्वनाथ भगवान के जीवका आगमन हुआ। माताका हृदय आनन्द से भर गया। प्रभात होते ही राजसभा में जाकर माताजी ने महाराजा विश्वसेन से सोलह मंगल स्वप्नों की बात कही; और उनके फल स्वरूप तीर्थंकर समान पुत्ररत्नकी प्राप्ति होगी-ऐसा महाराजा के मुख से सुनकर उनके हर्षका पार नहीं रहा ! मानो हृदयभूमि मे धर्म के अंकुर फूट पड़े ! वाह माता, तू धन्य हो गई ! इन्द्रों तथा इन्द्रानियोंने आकर प्रभु के माता-पिता का सन्मान किया और गर्भकल्याणक-उत्सव करके भगवान की पूजा-स्तुति की। छप्पन कुमारी देवियाँ माता की सेवा करने लगीं। वे बारम्बार तीर्थंकर के गुणगान करके माताजी के साथ आनन्ददायक चर्चा करती थी-❁ एक बार माताजीने पूछा-हे देवी ! इस जगत मे उत्तम रत्न कहाँ रहता होगा ?

❁ देवीने कहा-माताजी, आपके उदर-भण्डार मे ही वह उत्तम रत्न विद्यमान है। ※ दूसरी देवीने पूछा-माताजी का शरीर सुवर्ण जैसा क्यों लगता है ? ❁ तीसरी देवी बोली-क्योंकि उनको ‘पारस’ का स्पर्श हुआ है इसलिये। ※ चौथी देवीने पूछा-माताजी, आपको कैसी भावना होती है ? ❁ माताजी बोली-जैनधर्म का खूब विस्तार हो ऐसी। ※ देवियाँ कहने लगी-वाह माताजी ! अपने स्वर्गलोक से भी हमें यहाँ अधिक अच्छा लगता है, क्योंकि यहाँ हमें आपकी तथा बालतीर्थंकर की सेवा करने का महाभाग्य प्राप्त हुआ है। छोटे-से प्रभुको हम पालने में झुलायेंगे, लोरियाँ गायेंगे, और हँसी-खुशी गोद में उठायेंगे, और उन्हे देख-देखकर आत्माका धर्म प्राप्त करेगे -इस प्रकार देवियाँ माताजी के साथ प्रतिदिन आनन्दकारी चर्चा करती थी और तीर्थंकर प्रभुकी महिमा गाती थी। माताजी के मुख से ऐसी आत्मस्पर्शी वाणी निकलती थी मानो उनकी कुक्षि मे बैठे पार्श्वनाथ भगवान ही बोल रहे हों ! गर्भस्थ ज्ञानवन्त भगवान उस समय भी जानते थे कि-मेरा चैतन्यतत्त्व इस शरीर के संयोग से बिलकुल भिन्न है, चेतनामय भाव ही मैं हूँ।-इस प्रकार भगवान तो अपनी चेतना के आनन्द मे झूल रहे थे। दिन पर दिन बीतते गये . पौष कृष्णा एकादशी आयी, और मंगल बधाई लायी।

पौष कृष्णा एकादशी के शुभदिन तेंईसवे तीर्थंकर का अवतार हुआ। बनारस नगरी मे चारों और आनन्द छा गया, मात्र बनारस मे ही नहीं किन्तु तीनो लोक आनन्दित हो गये। स्वर्ग में भी अपने आप दिव्य वाद्य बजने लगे। इन्द्रने जान लिया कि भरतक्षेत्र के तेईसवें तीर्थंकर का अवतार हुआ है, इसलिये तुरन्त इन्द्रासन से नीचे उतरकर भक्तिपूर्वक उन बालतीर्थंकर को नमस्कार किया और ऐरावत हाथी पर बैठकर जन्मोत्सव मनाने आ पहुँचे। छोटे-से भगवान को विशाल ऐरावत हाथीपर बैठाया..हाथी आकाश मे उड़ा और भगवान की शोभायात्रा मेरुपर्वतपर आ पहुँची। यह जो सूर्य-चन्द्र दिखते हैं इनसे भी अधिक ऊँचाईवाले मेरुपर्वत पर प्रभुका जन्माभिषेक किया। उस समय प्रभुकी दिव्य महिमा देखकर अनेक देवों को सम्यग्दर्शन हो गया। अहा प्रभु ! आप तो जन्मरहित हो गये और आपकी भक्ति से हमारा भी जन्म सफल हो गया !-इस प्रकार स्तुति करते-करते इन्द्र-इन्द्राणी भी आनन्द से नाच उठे उन्होंने प्रभु का नाम ‘पार्श्वकुमार’ रखा।

प्रभुके जन्माभिषेक के समय आकाश से पुष्पवृष्टि होने लगी। आश्चर्य यह है कि आकाश मे कहीं भी पुष्पवृक्ष न होने पर भी पुष्प वर्षा हो रही थी ! अनन्त आकाश को ऐसा लगा कि-अहा, इन भगवान का ज्ञान तो मुझमे भी विशाल है !. इसलिये नम्रीभूत होकर वह आकाश पुष्पवर्षा द्वारा प्रभुकी पूजा कर रहा था। तथा जिस प्रकार मैं निरालम्ब हूँ उसी प्रकार भगवान का ज्ञान भी निरालम्बी है-ऐसे निरालम्बनता के आनन्द से उल्लसित होकर वह आकाश पुष्पवृष्टि द्वारा प्रभुका जन्मोत्सव मना रहा था।

मेरुपर्वत पर पार्श्वकुमार का जन्माभिषेक करके स्तुति करते हुए इन्द्र कहते हैं कि-हे प्रभो ! आप तो पवित्र ही हो…आपका न्हवन करने के बहाने वास्तव में तो हमने अपने ही पापों को धो डाला है। इन्द्राणी कहती हैं-प्रभो ! आपको गोद में लेकर मानो मैं मोक्ष को ही अपनी गोद मे ले रही हूँ इस प्रकार मेरा आत्मा उल्लसित हो जाता है…और आपको रत्नाभूषणों से अलंकृत करते हुए ऐसा अनुभव होता है मानो मैं अपने ही आत्मा को धर्मरत्नों से अलंकृत कर रही हूँ। -ऐसा कहकर इन्द्राणी ने बाल तीर्थंकर को स्वर्ग से लाये हुए वस्त्राभूषण पहिनाए और रत्न का तिलक लगाया। -इस प्रकार पार्श्वकुमार का जन्माभिषेक करके तथा देवलोक के दिव्य वस्त्राभूषण पहिनाकर प्रभुके जन्मोत्सव की शोभायात्रा बनारसनगरी लौट आयी और वामादेवी माता को उनका लाडला पुत्र सौंपकर इन्द्र-इन्द्रानीने कहा-हे माता ! आप धन्य हैं आप जगत की माता हैं। आपने जगत को यह ज्ञानप्रकाशक दीपक प्रदान किया है, हे माता ! आपका यह पुत्र तीन लोक का नाथ है ।

वाराणसी नगरी मे सर्वत्र आनन्दोत्सव मनाया गया। तीर्थंकर के आत्मा को देखकर हजारों लोग चैतन्यमहिमा समझ-समझकर आत्मज्ञानको प्राप्त हुए। अहा, भगवान स्वय केवलज्ञान प्राप्त करके धर्मोपदेश देगे और धर्मवृद्धि करेगे, उस समय का क्या कहना !.. परन्तु उनका जन्म होते ही जीवों में स्वयमेव धर्मवृद्धि होने लगी। जिस प्रकार सूर्योदय होने पर कमल खिलने लगते हैं उसी प्रकार तीर्थंकर सूर्य का उदय हुआ और भव्यजनरूपी कमल खिलने लगे। जन्मोत्सव के हर्षोपलक्ष में देवों ने माता-पिता के समक्ष सुन्दर नाटक करके भगवान के पूर्व नौ भव बतलाये; उनमे हाथी के भवमें मुनि के उपदेश से सम्यक्त्व प्राप्ति का दृश्य देखकर तो अनेक जीवों ने प्रतिबोध प्राप्त किया और पश्चात् उन्होंने मुनिदीक्षा धारण करके उत्तम क्षमा का कैसा पालन किया वह भी बतलाया। इस प्रकार पारसकुमार का जन्मोत्सव मनाकर तथा माता-पिता को उत्तमोत्तम वस्तुएँ की भेंट देकर वे इन्द्र-इद्रानी देवोंसहित अपने स्वर्गलोक मे चले गये। उस समय तो स्वर्ग की अपेक्षा वाराणसी नगरी का वैभव विशेष लग रहा था, क्योंकि तीर्थंकर समान पुण्यत्मा वहाँ विराज रहे थे। स्वर्ग के देव भी छोटे-छोटे बालकों का रूप धारण करके पार्श्वकुमार के साथ क्रिडा करने आते थे। अहा ! तीर्थंकर का सहवास किसे अच्छा नही लगेगा ? उन देव कुमारो के साथ पार्श्वकुमार भिन्न-भिन्न प्रकार के खेल खेलते थे और कभी-कभी धर्मकी चर्चा करके आत्मानुभव का रहस्य भी समझाते थे। अहा ! उन छोटे-से भगवान के श्रीमुख से जब आत्मा के अनुभव की धारा प्रवाहित होती होगी तब वह वाणी सुनकर लोक कितने आनन्दित होते होंगे ? उनकी मुद्रा के दिव्य शातभाव मुमुक्षु को अतीन्द्रिय आत्मसुख की प्रतीति उपजाते थे। केवलज्ञान होने पर तो क्या कहना ! परन्तु तीर्थंकर प्रकृति का उदय आने से पूर्व भी उनके निमित्त से धर्मवृद्धि होने लगी…धन्य अवतार !

भगवान को जन्म से ही मति-श्रुत-अवधि तीन ज्ञान और क्षायिक सम्यग्दर्शन था; उनका स्वभाव अति सौम्य था। आठ वर्ष की आयु होने पर वे पाँच अणुव्रत का पालन करने लगे। किसी के पास विद्या सीखना तो उन्हे था ही नही; आत्मविद्या को जाननेवाले उन भगवान में अन्य सर्व विद्याएँ भी स्वयमेव आ गई थी; उनकी चैतन्य विद्या में भी वृद्धि हो रही थी।

युवा राजकुमार को देखकर एकबार माता-पिताने उनसे विवाह का अनुरोध किया और कहा कि-किसी सुन्दर, गुणवान राज कन्या के साथ वे विवाह करें, परन्तु पार्श्वकुमार ने अनिच्छा प्रदर्शित की। माताजीने गद्गद् होकर कहा हे कुमार। मैं जानती हूँ कि तुम्हारा अवतार वैराग्य हेतु है, तुम तीर्थंकर होनेवाले हो, और उससे मैं अपनी कोख को धन्य मानती हूँ; परन्तु पूर्वकाल में ऋषभादि तीर्थंकरों ने भी विवाह करके जिस प्रकार माता-पिता की इच्छा पूर्ण की थी, तदनुसार तुम भी हमारी इच्छा पूर्ण करो।

तब पार्श्वकुमार गंभीरतापूर्वक बोले-हे माता ! ऋषभदेव की बात और थी; मैं प्रत्येक विषय में उनके बराबर नही हूँ, उनकी आयु तो बड़ी लम्बी थी और मेरी आयु मात्र सौ वर्ष की है; मुझे तो अल्पकाल मे ही संयम धारण करके अपनी आत्मसाधना पूर्ण करना है; इसलिये मुझे सांसारिक बन्धनों में पड़ना उचित नही है।

वैरागी राजकुमार की बात सुनकर माता-पिता के नेत्रों में अश्रु छलक आये; कुछ देर तक निराश रहकर अन्तमें उन्होंने समाधान कर लिया। वे भी सुज्ञ थे…उन्होंने विचार किया कि-पार्श्वकुमार तो तीर्थंकर बनने को अवतरित हुए हैं..सांसारिक भोगों के लिये उनका अवतार नहीं है, उनका अवतार तो मोक्ष की साधना के लिये है और हमें भी उसी मार्गपर जाना है।

सर्प युगल के उद्धार की घटना

एक बार पारसकुमार वनविहार करने निकले। साथ में उनका मित्र सुभोम कुमार भी था। राजकुमार पार्श्वनाथ को देखकर प्रजा अतिप्रसन्न होती थी .अरे, वनके पशु-पक्षी भी प्रभुको देखकर आश्चर्य में पड़ जाते और शांतचित्त से उन्हें निरखते थे कि-अहा, यह कोई महान पुरुष हैं जिन्हें देखकर हमारा भय दूर हो जाता है और शान्ति मिलती है ! वन के वृक्ष और पुष्प भी प्रभुको देखकर खिल उठते थे। वनकी शोभा देखते हुए राजकुमार विचर रहे हैं और विचार रहे हैं कि-अब मेरा वनबिहारी बनने का समय निकट आ गया है।-ऐसी उत्तम भावनापूर्वक वनमें विचर रहे थे इतने में एक घटना हुई।…उन्हें एक तापस बावा दिखायी दिया। कौन है वह तापस ? वह जानने के लिये हमें उनके पूर्वभवों पर दृष्टि पात करना होगा।

पार्श्वनाथ भगवान पूर्वभव में जब अग्निवेग मुनि थे तब उनके भाई कमठ का जीव अजगर होकर उन्हे निगल गया था और फिर मरकर नरक में गया था। पश्चात् वह कमठ का जीव शिकारी भील हुआ और उसने वज्रनाभि मुनिको बाण से छेद डाला पश्चात् सिह होकर आनन्द मुनिको खा गया। वहाँ से पाँचवे नरक में जाकर उसने घोर दुःख सहन किये और तीन सागरतक तिर्यंच पर्याय में भटकता फिरा। अंत में वही जीव महिपाल नगरी में महिपाल नामका राजा हुआ। पार्श्वनाथ की माता वामदेवी इसी महिपाल राजा की ही पुत्री थी, इसलिये पार्श्वकुमार उसके दौहित्र (पुत्री के पुत्र) हुए। महिपाल की रानी का देहान्त होनेपर दुःखके कारण वह तापस बन गया; सात सौ तापस उसके शिष्य थे। वह अज्ञानजन्य कुतप करता था। उस समय अपने सात सौ तापस शिष्यों के साथ उसने वाराणसी नगरी में डेरा डाला था और पंचाग्नि तप कर रहा था ..अग्नि मे बड़े-बड़े लक्कड़ जल रहे थे।

-इतने मे पार्श्वकुमार अपने मित्रों के साथ वनविहार करते-करते वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने महिपाल तापस को देखा। उसे देखकर पार्श्वकुमार ने वंदन-नमस्कार नहीं किया। अरे, सामान्य श्रावक भी कदापि कुगुरु को नमन नहीं करते; फिर यह तो पार्श्वतीर्थंकर थ. वे कैसे कुगुरु को नमस्कार करते ?

राजकुमार ने अपना आदर नहीं किया, इसलिये महिपाल तापस के मन में क्रोध आ गया…मानो पूर्वभव के क्रोधसंस्कार भड़क उठे-अरे, मैं महान तापस-बावा ! और इस राजकुमार का नाना हूँ, फिर भी यह मुझे नमस्कार तक नहीं करता ? इसे अपने राज्य का अभिमान होगा ! परन्तु मैं भी तो इसी जैसा राज्य छोड़कर तापसी बना हूँ…इस प्रकार वह अज्ञानी गुरु मन ही मन क्रोध करने लगा।

शांत एवं गंभीर भगवान पार्श्वकुमार तो ज्यों के त्यों शान्तिपूर्वक खड़े रहे। उनका चित्त अत्यन्त दयालु था; परन्तु मिथ्यागुरु वह तापस बिना विचारे ही क्रोध में आ गया और कहने लगा ..मैं महान तपस्वी और इस राजकुमार पार्श्व का नाना हूँ, तथापि यह कुमार मुझे नमस्कार किये विना अविवेकी की भाँति खड़ा है।

तब पार्श्वकुमार के मित्र सुभोमकुमार कहने लगे कि-हे बाबाजी ! 'मैं गुरु हूँ और महान तपस्वी हूँ-ऐसा मानकर आप भारी अभिमान कर रहे हैं; परन्तु आपको खबर नहीं है कि मिथ्यात्वसहित किये गये कुतप से और हिंसा से जीव का कितना अहित होता है ? शरीर एवं कषायों से भिन्न आत्मा का अनुभव जब तक न हो, तब तक सच्चा तप नहीं होता। आपके इस अज्ञानमय तपमें छहकाय के जीवों की हिंसा होती है, इसलिये यह कुतप है, इसमें आत्मा का किंचित् भी हित नहीं है।

सुभोमकुमार की बात सुनकर महिपाल को अधिक क्रोध चढ़ा; वह कहने लगा-तू मुझे उपदेश देनेवाला कौन ? यह राज कुमार तो अभी छोटा बच्चा है, इसे मेरे तप का क्या पता ? ऐसा कहकर वह अज्ञानी कुल्हाड़ी द्वारा लकड़ फाड़-फाड़कर अग्निमे डालने लगा। एक बड़ा लकड़ फाड़कर जब वह अग्नि मे डालन लगा कि इतने मे !

२३

भगवान पारसनाथ (भाग ३)

-इतने मे प्रभु पार्श्वकुमार हाथ उठाकर गभीर स्वर मे बोले- ‘ठहरो .ठहरो… ( उन्होंने अवधिज्ञान से जान लिया था कि इस लकड़ मे एक सर्पोका जोड़ा बैठा है, वै कुल्हाड़ी से कट गया है और अभी अग्नि मे भस्म हो जायेगा ! इसलिये वे दयार्द्र होकर बोल, उठे की..ठहरो . ) इस लकड़ी को अग्निमें मत डालो !’

अज्ञानी तापस क्रोधित होकर बोला- तू मुझे रोकनेवाला कौन ? (उसे कहाँ खबर थी कि इस लकड़ी में नाग-नागिन का जोड़ा बैठा है।)

भगवान ने कहा-आप जो लकड़ी काट कर अग्नि मे होमना चाहते है उसमें नाग-नागिन का जोड़ा बैठा है, वे कट गये है और अग्नि मे जल जायेंगे. ऐसी जीव हिंसा मत कीजिये.. अवधिज्ञानी पार्श्वकुमार की बात सुनकर भी उस तपस्वी को विश्वाम नहीं हुआ, बोला-तू कौन ऐसा त्रिकालज्ञानी हो गया जो तुझे इस लकड़ी में सर्प बैठे दिख रहे हैं ? व्यर्थ ही होम मे विघ्न करता है ! तब सुभोगकुमार ने कहा-बाबाजी ! यह भगवान पार्श्वकुमार अवधिज्ञानी है, इनका वचन कभी असत्य नही होता। आपको विश्वास न आता हो तो लकड़ी चीरकर देख लीजिये।

महिपाल तापसने (जोकि कमठ का जीव है) क्रोध पूर्वक उस लकड़ी को चीरा तो भीतर दो तड़पते हुए सर्प निकले। उनके शरीर के दो टुकड़े हो गये थे और वेदना से तड़प रहे थे। वे दोनों नाग-नागिन पार्श्वप्रभु की ओर टकटकी लगाकर देख रहे थे, मानो दुःख से छुड़ाने की प्रार्थना कर रहे हो !

सर्पयुगल को देखकर लोग चकित रह गये ! चारों ओर हाहाकार हो गया…महिपाल तापस भी क्षणभर स्तब्ध हो गया।

प्रभुने सर्प युगलपर दृष्टि डाली, जिससे दोनों को अत्यन्त शान्ति का अनुभव हुआ। पार्श्वप्रभु धीर गम्भीर स्वर मे बोले ‘-अरे ! जीवोंका अज्ञान तो देखो !..जहाँ ऐसी जीवहिंसा हो वहाँ कभी धर्म हो सकता है।’

तापस अभिमानपूर्वक बोला-ठीक है, ठीक है, यह उपदेश कहीं और जाकर देना ! तुझे क्या पता कि मै सातसौ तापसों का गुरु हूँ !

उसकी अविवेकपूर्ण बात सुनकर सभोगकुमार कहने लगे अरे, महाराज ! हम न तो आपको गुरु मानते है और न आपका तिरस्कार करते है; परन्तु आम सर्वज्ञ-वीतराग देव और उनका कहा हुआ वीतराग अहिंसारुप मार्ग छोड़कर, तथा मिथ्यात्व एवं क्रोधादि कषायवश होकर यज्ञ के नाम पर आप छहकाय के जीवों की हिसामें प्रवर्त रहे हैं और उस मिथ्यामार्ग द्वारा मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा रखते हो, वह तो मात्र भूसा खाड़कर चावल प्राप्त करने की आशा जैसा अज्ञान है; इसलिये हिंसामय अज्ञानमार्ग को छोड़ो और सच्चे ज्ञानमार्ग को ग्रहण करो। आपके प्रति हमें अति स्नेह है, क्योंकी पूर्वभवमें आप पार्श्वकुमार के भ्राता थे; इसलिये आपसे यह हित की बात कर रहे हैं। आशा है कि आप शान्त चित्त से विचार कर हित की बात को ग्रहण करेंगे और अहितकर अज्ञानमार्ग को त्याग देगे।

अहा, कैसा हितकारी उपदेश ! भावी तीर्थंकर की उपस्थिति में ऐसा सुन्दर वीतराग धर्म का उपदेशसुनकर भी उस पापी कमठ के जीवने सत्य धर्म अंगीकार नहीं किया; अरे, साक्षात् भावी तीर्थंकर सन्मुख खड़े होने पर भी उस कुगुरु का क्रोध शान्त नहीं हुआ ! जीव स्वयं भावशुद्धि न करे; तो तीर्थंकर भी उसका क्या कर सकते है ? यद्यपि गहरे-गहरे उसे आभास तो हो रहा था कि इन उत्तम पुरुषों के समक्ष मैं कोई भूल कर रहा हूँ…किन्तु क्रोध तथा अज्ञान के कारण वह सच्चे वीतरागधर्म को स्वीकार नहीं कर सका। अभी धर्मकी प्राप्ति होनेमें उसे कुछ समय लगना था। अन्त मे तो वह इन्ही भगवानकी शरणमें आकर सच्चा धर्म अंगीकार करेगा।

एक ओर कटे हुए दोनो सर्प तड़प रहे है और दूसरी ओर उस सर्पयुगलकी हिंसा करनेवाला कुगुरु खडा है तथा उन्हींके निकट खड़े उनका उद्धार करनेवाले जगतगुरु तीर्थंकर वीतराग धर्म का स्वरूप समझा रहे हैं। दोनों सर्पने दया मूर्ति भगवान के दर्शन करके शांति प्राप्त की और उनके श्रीमुख से वीतरागधर्म का उपदेश सुनकर धन्य हो गये !

अति गंभीर ऐसे पार्श्वकुमार कहने लगे-हे सर्प राज ! भले ही इस अज्ञानी तपस्वी की कुल्हाड़ी से तुम्हारे शरीर कट गये हैं परन्तु तुम क्रोध नहीं करना; क्योकि पूर्व भवमें क्रोध करने के कारण तुम्हे यह सर्पका भव मिला है; किन्तु अब क्रोध त्यागकर क्षमाभाव धारण करना, और पंचपरमेष्ठी भगवान की शरण लेना। ऐसा कहकर पार्श्वनाथ प्रभुने उन्हे धर्म श्रवण कराया। दोनो नाग नागिन अत्यन्त शांतिपूर्वक सुन रहे थे :-अहा भावी तीर्थंकर के दर्शन से तथा उनकी वाणी सुनकर वे अपना कष्ट भूल गये और शांतभाव धारण करके अत्यन्त उपकारबुद्धि से प्रभुसन्मुख देखते रहे। उस सर्पके मुँह से विषके बदले मानो अमृत झर रहा था कि- अहा, हम जैसे विषैले जीवोंको भी प्रभुने करुणापूर्वक सच्चा धर्म समझाया और हमारा कल्याण किया। धन्य है इन प्रभुको ! ऐसा विचारते हुए वे दोनों सर्प मानो भक्ति से सिर झुका रहे थे और प्रभुके नेत्रोंसे तो अमृत झरता था। प्रभुके शांतरस झरते वचन सुनकर नाग-नागिन दोनों जीव अत्यन्त शान्ति को प्राप्त हुए और प्रभुके चरणो में शरीर त्याग कर भवनवासी देवों में धरणेन्द्र देव तथा पद्मावती देवी हुए। अवधिज्ञान से भगवान का उपकार जानकर वे भक्ति करने लगे कि धन्य जिनधर्म ! धन्य पार्श्वप्रभु ! कि जिन्होंने हमें सर्प से देव बनाया और ससार से मुक्त होने के लिये जैनधर्म का मार्ग बतलाया।

देखो तो सही, क्षमावन्त आत्मा के संसर्ग से नाग जैसे विषधर जीव भी क्रोध छोड़कर क्षमावान बन गये, और शरीर के टुकड़े कर देनेवाले कुगुरु के प्रति भी क्रोध न करके क्षमाभावसे शरीर त्यागकर देव हुए। धन्य है वीतरागमार्ग की क्षमा को !

ऐसे वीतराग धर्म का श्रवण करके भी दुष्ट कमठ के जीवने उसका ग्रहण नही किया, परन्तु इसने मेरा अपमान किया है-ऐसी मान्यता पूर्वक उलटा क्रोध किया। दोनों सर्प तो धर्म को प्राप्त हुए, परन्तु वह महिपाल तापस धर्म प्राप्त नहीं कर सका; वह क्रोधके शल्यपूर्वक मरकर ‘संवर’ नामक ज्योतिषी देव हुआ। कुतप के कारण वह निचली श्रेणी का देव हुआ।

अब इधर पार्श्वकुमार वारणसीनगरी मे आत्मज्ञानसहित वैराग्य जीवन जी रहे है और सर्व जीव उनके दर्शन से सुख प्राप्त करते है।

पार्श्वनाथ-वैराग्य एवं दीक्षा

एक बार पौष कृष्णा एकादशी के दिन पार्श्वकुमार राजसभा मे बैठे थे और उनका जन्मदिवस मनाया जा रहा था; देशदेशान्तर के राजाओ की ओर से उत्तमोत्तम वस्तुओ की भेट आ रही थी। अयोध्या का राजदूत भी भेट लेकर आया।

पार्श्वप्रभुके दर्शन से उसे आश्चर्य हुआ। विनयपूर्वक स्तुति करके वह कहने लगा-हे प्रभो! हमारी अयोध्यानगरी के महाराजा जयसेन को आपके प्रति प्रगाढ़ स्नेह है, इसलिये यह उत्तम रत्न एवं हाथी आदि वस्तुएँ आपको भेटस्वरूप भेजी है।

पार्श्वकुमारने प्रसन्न दृष्टि से राजदूत की ओर देखा और अयोध्या के वैभव की बात पूछी। राजदूतने कहा-महाराज! हमारी अयोध्यानगरी तो तीर्थंकरोकी खान है; जिस पुण्यभूमि मे तीर्थंकर उत्पन्न होते हों वहाँ के वैभव का क्या कहना! असंख्य वर्ष पूर्व भगवान ऋषभदेव इस भरतक्षेत्र मे प्रथम तीर्थंकर हुए, उनका अवतार भी अयोध्या में हुआ था; उस समय इन्द्रने उस नगरी की रचना की थी।

अयोध्या के वैभव की बात पार्श्वकुमार ध्यान से सुन रहे है। दूत कहता है-प्रभो! तत्पश्चात दूसरे अजितनाथ, अभिनन्दन स्वामी, सुमतिनाथ तथा अनन्तनाथ यह चार तीर्थंकर भी अयोध्यानगरी मे ही अवरित हुए थे। भरतचक्रवर्ती, भगवान रामचन्द्रजी आदि अनेक महान पुरुषोने अयोध्यानगरी को पावन किया है।

अयोध्यानगरी का तथा पूर्वकाल में हुए तीर्थंकरों का वर्णन सुनकर भगवान पार्श्वकुमार गभीर विचारों मे डुब गये; उसी समय उन्हे मतिज्ञानावरण का सातिशय क्षयोपशम हुआ; वृद्धिंगत् ज्ञानवैभव में पूर्वकाल के अनेक भवों का साक्षात्कार हुआ, अर्थात् जातिस्मरण ज्ञान हुआ और वे ससार से विरक्त हो गये-अरे! पूर्वकाल मे स्वर्गलोक के वैभव का भी यह जीव अनेकों बार उपभोग कर चुका है तथापि इसे तृप्ति नहीं हुई, बाह्य पदार्थों से जीव को कभी तृप्ति नही होगी। अहा, धन्य है वे ऋषभादि तीर्थंकर भगवन्त कि जिन्होने ससार छोड़कर मोक्षपद प्राप्त कर लिया! मुझे तीर्थंकर नामकर्म का बध हुआ, उससे क्या लाभ हुआ? ‘किं जातः तीर्थकृत नाम बन्धनात्?’ .. मुझे जगत के सामान्य मनुष्यो की भाँति संयम रहित काल गँवाना उचित नही हैं। ऋषभादि जिनवर जिस मार्गपर चले उसी मार्गपर मुझे जाना है; इसलिये अब आज ही मैं दीक्षा लेकर मुनि होऊगा और अपनी आत्मसाधना पूर्ण करूँगा।

इस प्रकार भव से विमुख और मोक्षके सन्मुख हुए भगवान वैराग्य भावना भाने लगे-शरीर तो जीवन रहित है, उसमें चेतना नही है, ज्ञान-दर्शनमय चेतना ही मेरा जीवन है, मैं सदा ज्ञान-दर्शन स्वरूप एक शाश्वत जीव हूँ, उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी मेरा नही है, इसलिये सर्वत्र ममत्व छोड़कर मैं अपने चिदानन्द स्वरूप में ही लीन होता हूँ। इस प्रकार वैरागी भगवान चारित्र ग्रहण करने को तत्पर हुए कि चारित्रमोहकी सेना थरथर काँपने और भागने लगी। दीक्षा का उत्सव करने हेतु इन्द्रादि आ पहुँचे; लौकान्तिक देव एकावतारी हैं वे भी आये और भगवान के वैराग्य का अनुमोदन किया।

दीक्षा के लिये तत्पर हुए भगवान ने माता के पास जाकर कहा-हे माता! अब. मैं चारित्र साधना द्वारा केवलज्ञान प्रगट करने जाता हूँ उसी प्रकार पिताजी की आज्ञा लेकर भगवान ‘विमला’ नामक शिबिकामें आरूढ़ होकर वनमें गये और स्वयं दीक्षा लेकर आत्मध्यान करने लगे। भगवान ने तीस वर्ष की आयु में अपने जन्म के दिन ही दीक्षा ग्रहण की; उनके साथ अन्य तीन सौ राजाओं ने जिनदिक्षा ले ली। अहा, तीनसौ मुनियोंसे भरा हुआ वह दीक्षावन अद्भुत वीतरागता से सुशोभित था; वनका वह शांत-वीतरागी वातावरण मानो वीतरागता को ही प्रसिद्ध कर रहा था। दिगम्बर मुद्राधारी उन मुनिराजके वस्त्र तो नहीं थे और अन्तर मे मोह भी नहीं था। निर्विकल्प शुद्धोपयोग रूप सहज दशा से वे महात्मा शोभायमान थे।

प्रभुको ध्यान में तुरन्त ही सातवाँ गुणस्थान प्रगट हुआ और मन पर्यय ज्ञान भी खिल उठा.. अनन्त गुण मानो एक-दूसरे की प्रतियोगिता कर रहे हो-इसप्रकार शीघ्रता से विकसित होने लगे। मौनरूप से वे पार्श्वमुनिराज आत्मा का निजकार्य साधने लगे। सर्वप्रथम गुल्मखेटनगर के ब्रह्मदत्त (अथवा धन्य) राजाने उन मुनिराज को आहारदान दिया और वे धन्य हो गये।

शरीर और आत्मा की भिन्नता जाननेवाले तथा शत्रु एव मित्र में समभाव रखनेवाले वे पारसमुनिराज अंतर मे बारम्बार शुद्धोपयोग द्वारा निजस्वरूप को ध्याते थे और अतिन्द्रिय आनन्द का अनुभव करते थे। उनके निकट सिंह और हिरन, सर्प और मोर आदि जीव भी शान्तिपूर्वक एकसाथ बैठते और एक-दूसरे के मित्र बन जाते थे। प्रभुको देखकर वे पशु भी प्रसन्न हो जाते थे।

संगम देव का उपसर्ग और प्रभुको केवलज्ञानप्राप्ति

इस प्रकार मुनिदशा में आत्मध्यानसहित विचरते-विचरते चार महिने बीत गये… भगवान की शुद्धतामे वृद्धि होते-होते केवलज्ञान की तैयारी हुई। एक बार वे मुनिराज सात दिन का ध्यान योग धारण करके कायोत्सर्गपूर्वक खड़े थे; उनकी मुद्रा दर्शनीय थी, वे स्वयं ही साक्षात् मोक्षमार्ग थे; कायाकी माया को भूलकर स्वरूप मे लीन होकर, वे निर्ग्रन्थ दशा द्वारा भव का अंत कर रहे थे। जगत की बाह्यदृष्टि छोड़कर निजस्वरूप के अवलोकन में तल्लीन थे। इतने में एक घटना हुई।

आकाश मार्ग से एक देवविमान जा रहा था; ज्यों ही वह विमान भगवान के ऊपर आया कि अचानक अटक गया ! नीचे पार्श्वनाथ जैसे महामुनिराज तपस्या कर रहे हों उन्हें वन्दन किये बिना वह विमान कैसे आगे बढ़ता ? उस विमानो मे बैठे हुए देवने बहुत प्रयत्न किया किन्तु विमान चला नहीं।-कौन है वह देव ? आप जानते है।-वह तो संगम देव था, अपना पुराना परिचित कमठ का जीव !

संगम देवने विमान से बाहर आकर देखा तो पार्श्वमुनिराज ध्यानमग्न खड़े है ! बस उन्हें देखते ही वह क्रोधसे आगबबूला हो उठा कि-अवश्य इसीने मेरे विमान को रोका है ! वह भयंकर विकराल रूप धारण करके भगवान के सामने आ खड़ा हुआ, मानो इसी क्षण उनको खा जायगा ! इस प्रकार अत्यंत क्रोध से मुँह फाड़कर बोला कि-अरे मायावी ! तूने मंत्रबल से मेरे विमान को क्यो रोक रखा है ?..शीघ्र ही विमान को छोड़ दे, नही तो तुझे भस्म कर दूँगा !-ऐसा कहकर वह मुहँ से अग्नि की लपटें निकालने लगा।

परन्तु कौन बोले ? भगवान तो ध्यान में लीन हैं; वे न तो कुछ बोले और न हिले-डुले; उनका रोम तक नही हिला ! (अरे कमठ ! तू स्वयं ही अपने क्रोधसे जल रहा है, तेरा क्रोध भगवान को नहीं जला सकता !) कमठ द्वारा फेंकी गई आग की लपटें प्रभुसे दूर ही रहती थीं; भगवान तो अपने उपशमरस मे सराबोर थे ।

अग्नि की ज्वालाओं का भगवान पर कोई प्रभाव न होने से वह संवरदेव और भी क्रोधित हुआ . और पर्वत जैसे बड़े-बड़े पत्थर उठाकर भगवान पर फेंकने लगा। धड़ाधड़ पत्थरों की वर्षा होने से धरती काँप उठी . वन के प्राणी कांपने लगे और धरणेन्द्र का आसन भी डोल उठा; किन्तु भगवान तो निष्कम्प आत्मध्यान मे लीन थे.. पत्थरो की वर्षा हो ऐसी विक्रिया संवरदेवने की, परन्तु भगवान का तो बाल भी बाँका नही हुआ, उनके ऊपर पत्थर का एक कण भी नहीं गिरा-ऐसा उनका अतिशय था। तीर्थंकर के शरीर पर कोई सीधा उपसर्ग नही कर सकता। बहार में संवर देव विशाल पत्थर उखाड़कर फेंक रहा था किन्तु पत्थर तो प्रभुसे दूर ही रहते थे; और प्रभु तो अन्तर मे ध्यान द्वारा कर्मरूपी पर्वत के टुकड़े-टुकड़ कर रहे थे।

पत्थरो की वर्षा मे भी प्रभु जब अडिग रहे, तब संवरदेवने मूसलधार पानी बरसना प्रारम्भ किया। मानो समस्त पृथ्वी डूब जायगी-ऐसा समुद्र जैसा पानी हिलोरें लेने लगा। वनमे चारों ओर हाहाकार मच गया। पशु भयभीत होकर प्रभुकी शरणमे आगये। संवरदेव क्रोधपूर्वक पार्श्वप्रभु पर जो घोर उपसर्ग कर रहा था उसे प्रकृति भी मानो सहन नही कर सकी. धरणेन्द्रका आसन काँपने लगा- 'अरे ! यह मेरा इन्द्रासन क्यों डोल रहा है ?- अवधिज्ञान से उसे पता चल गया कि-हमपर परम उपकार करनेवाले पार्श्वमुनिराज पर इस समय संवरदेव घोर उपसर्ग कर रहा है . तुरन्त धरणेन्द्र और पद्मावती वहाँ पहुँचे और उपसर्ग दूर करने मे तत्पर हुए।

एक ओर संवरदेव भयंकर द्वेषपूर्वक उपसर्ग कर रहा है तो दूसरी ओर धरणेन्द्र तथा पद्मावती भक्ति रागपूर्वक प्रभुकी सेवा-सुश्रुषा मे लगे है। भगवान तो दोनो से पर अपनी चैतन्यसाधना मे ही तत्पर है। ‘शत्रु-मित्र के प्रति वर्ते समदर्शिता’ उन्हे न तो संवरदेव के प्रति द्वेष है और न धरणेन्द्र-पद्मावती के प्रति राग, बाह्य में क्या हो रहा है उसका भी उन्हे लक्ष नहीं है। बाह्यमे पानी की घनघोर वर्षा हो रही है तो प्रभुके अंतर में आनन्द का सागर हिलोरे ले रहा है।

प्रिय पाठक ! इस समय भगवान पर ऐसा उपसर्ग देखकर तुम्हे कदाचित् उस कमठ के जीवपर (संवरदेव पर) क्रोध आ जाता होगा! किन्तु ठहरो ! तुम उस पर क्रोध मत करो! वह जीव शीघ्र ही सम्यग्दर्शन प्राप्त करके धर्मात्मा बननेवाला है। जिन पार्श्वनाथ पर वह उपसर्ग कर रहा है, उन्हीं पार्श्वप्रभुकी शरण मे आत्मा का अनुभव करके वह सम्यग्दर्शन प्राप्त करेगा और तब उनके प्रति बहुमान जागृत होगा कि वाह ! धन्य है वह आत्मा कि जिसने क्षणमात्र मे परिणामों का परिवर्तन करके आत्मानुभव किया। परिणामो को क्षणभर में बदला जा सकता है। क्रोध कहीं आत्माका स्वभाव नही है कि वह नित्य स्थिर रहे। उस क्रोध से भिन्न ज्ञानस्वरूप आत्मा है। उपसर्ग के समय पार्श्वनाथने भी कही कमठ के जीव पर क्रोध नहीं किया था;- क्रोध किया होता तो केवलज्ञान प्राप्त नही कर पाते। इस घटना के द्वारा मौनरूपसे पार्श्वप्रभु ऐसा उपदेश देते है कि हे जीवों ! तुम उपसर्ग कर्ता के प्रति भी क्रोध नहीं करना…तुम तो शांतभावसे अपनी आत्मसाधना में अडिग रहना-

बहु उपसर्गकर्ता प्रत्ये पण क्रोध नही;
वन्दे चक्री तथापि न मले मान जो;
देह जाय पण माया थाय न रोममां,
लोभ नहीं छो प्रबल सिद्धि निदान जो।

ऐसी अपूर्व मुनिदशामें प्रभु वर्त रहे हैं। धन्य उनकी वीतरागता ! धन्य उनकी आत्म साधना ! इधर संवरदेव तो, मानो भगवान को पानी मे डुबा दूँ-इस प्रकार मूसलधार पानी बरसा रहा है;

धरणेन्द्र और पद्मावती अत्यन्त भक्तिपूर्वक पानी मे कमल की रचना करके प्रभुको पानी से उपर रख रहे हैं और विशाल फन द्वारा छत्र तान रहे हैं। अतंर में परभाव से अलिप्त रहनेवाले भगवान बाह्यमे पानी से भी अलिप्त ही रहे !

अहा ! भगवान तो आत्मसाधना से नहीं डिगे सो नहीं डिगे। सात-सात दिन तक उपसर्ग करके अंतमें कमठ थका; अन्तिम प्रयत्न के रुप मे उसने भयंकर गर्जना के साथ बिजली और बादलों की गड़गड़ाहट की। बाह्य में बिजली की चमक हुई .ठीक उसी समय प्रभु के अंतर में केवलज्ञान की दिव्य ज्योति त्रिलोक को प्रकाशित करती हुई जग उठी ! अचानक ही सर्व उपसर्ग विलुप्त हो गये और सर्वत्र आनन्द-आनन्द छा गया। वह दिन था चैत्र कृष्णा चतुर्थी का।

धरणेन्द्र और पद्मावती जिस उपसर्ग को दूर करने की चेष्टा कर रहे थे वह कार्य केवलज्ञान के प्रतापसे अपनेआप पूर्ण हो गया। प्रभु उपसर्ग-विजेता होकर केवली बने। केवली को उपसर्ग नही होता। उपसर्ग समाप्त होते ही धरणेन्द्र-पद्मावती का कार्य भी समाप्त हो गया; वे भगवान के केवलज्ञान का ऐसा दिव्य अतिशय देखकर अति आनन्दपूर्वक पार्श्वप्रभु की स्तुति करने लगे-अहा प्रभु ! आपके केवलज्ञान की महिमा अद्भुत है। हे देव ! आप समर्थ हो, हम आपकी रक्षा करने वाले कौन होते है ? प्रभो ! आपके प्रताप से हमें धर्म प्राप्त हुआ और आपने ससार के घोर दुःखों से हमारी रक्षा की है। प्रभो ! आपके नामके साथ हमारा नाम देखकर अज्ञानी जन आपको भूलकर हमे पूजने लगे, परन्तु पूजनीय तो आप समान वीतराग देव ही हैं। इस प्रकार स्तुति की। भगवान को केवलज्ञान होने पर इन्द्रोने आकर भगवान की पूजा स्तुति के पश्चात् आश्चर्यकारी दिव्य समवसरण की रचना की। जीवोंके समूह प्रभुका उपदेश सुनने के लिये आने लगे।

यह सब आश्चर्यजनक घटना देखकर सवरदेव के भाव भी बदल गये; केवली प्रभु की दिव्य महिमा देखकर उसे भी श्रद्धा जागृत हुई। क्रोध एकदम शान्त हो गया और पश्चाताप से बारम्बार प्रभुके समक्ष क्षमा-याचना करने लगा-हे देव ! मुझे क्षमा करो, मैं अकारण ही आपके ऊपर महान उपसर्ग किया, तथापि आपने किंचित् मात्र क्रोध नही किया ! कहाँ आपकी महानता और कहाँ मेरी पामरता ! ऐसे महान इन्द्र भी भक्ति पूर्वक आप की सेवा करते है इतने समर्थ होनेपर भी आपने मुझ पर क्रोध नही किया और क्षमा धारण की …धन्य है आपकी वीतरागता ! उस वीतरागता द्वारा आपने केवलज्ञान प्राप्त किया और परमात्मा बन गये। प्रभो ! मेरा अपराध क्षमा करो मैंने अज्ञान पूर्वक क्रोध करके भवभव मे आपके ऊपर उपसर्ग किये, जिससे मैं ही महान दुःखी हुआ और नरकादिकी घोर यातनाएँ सहन कीं। प्रभो ! अन्तमें क्रोधपर क्षमाकी विजय हुई। अब मैंने क्षमाधर्म की महिमा को जाना। मेरा आत्मा उपयोग स्वरूप है, वह इस क्रोध से भिन्न है-ऐसा आपके प्रताप से समझा हूँ।

समवसरण में भगवान का उपदेश सुनकर संवर देव (कमठ का जीव) भेदज्ञान करके विशुद्ध सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुआ। पार्श्वप्रभुके सम्पर्क से वह जीव पापी मिटकर मोक्षका साधक हुआ। धरणेन्द्र और पद्मावती भी सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए; इतना ही नहीं, महीपाल तापस के साथ जो सात सौ कुलिंगी तापस थे, वे भी मिथ्यामार्ग को छोड़कर धर्म के सच्चे स्वरूप को समझे और भगवान के चरणो मे सम्यग्दर्शन सहित उन सबने संयम धारण किया। कुगुरु मिटकर वे सच्चे जैन गुरु बने गये अन्य भी कितने ही जीव भगवान के उपदेश से सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए।

देखो महापुरुषों की महिमा ! अनेक भवतक पार्श्वनाथ प्रभुका संग करने से कमठ के जीवका उद्धार हो गया। शास्त्रकार अलकार से कहते है कि-महापुरुषों के साथ मित्रता का तो कहना ही क्या… शत्रुरूप से उनका संग भी अन्तमे हितका ही कारण होता है !

कमठ का जीव धर्म को प्राप्त हुआ और भगवान की भक्ति करने लगा; यह देखकर लोग आश्चर्य से कहने लगे-वाह ! देखो जिनप्रभु की महिमा ! कमठ को भी अन्तमे तो प्रभुकी शरण में आना पड़ा। जिस प्रकार मच्छ उछाले मारकर समुद्र के पानी को पीड़ित करता है, तथापि अन्त में तो वह स्वय समुद्र के आश्रयमे ही जीवित है, उसी प्रकार कमठ के क्षुद्रजीवने वैरबुद्धि से अनेकभव तक पीड़ित किया, परन्तु अन्त मे तो उसे प्रभुकी शरण में ही धर्म की प्राप्ति हुई। प्रभुके आश्रय बिना वह कहाँ से सुखी होता ? अहा, प्रभु का ज्ञान, प्रभु की शान्ति, प्रभुकी वीतरागी क्षमा का क्या कहना ! प्रभुकी गम्भीरता तो समुद्र से भी महान है। हे पार्श्व जिनेन्द्र ! सर्व तीर्थंकर समान होने पर भी आपकी जो विशेष प्रसिद्धि दिखायी देती है वह तो एक कमठ के कारण है !-ठीक ही है, क्योंकि अपकार करनेवाले शत्रुओं द्वारा ही महापुरुषों की ख्याति फैलती है ! प्रभो ! संवरदेवकी भयंकर विक्रिया के समय भी आप न तो अपनी शान्ति से च्युत हुए और न कमठ पर क्रोध किया। आपने तो शांतचित्त से कमठ की विक्रिया दूर की, और जगत को बतलाया कि-सच्ची विजय क्रोध द्वारा नहीं, किन्तु क्षमा द्वारा ही प्राप्त होती है। कमठ के दुष्ट भाव के कारण उसी को हानि हुई; आपकी आत्मसाधना मे तो कोई बाधा नहीं आयी। सचमुच, आपकी महिमा और आपकी शान्ति आश्चर्यजनक है ! हे प्रभो ! यह धरणेन्द्र एवं पद्मावती दोनों जीव आपके महान कृतज्ञ हैं, उपकार को जाननेवाले है और धर्मात्मा हैं-इस प्रकार जगत मे उनकी प्रशंसा होती है, परन्तु हमें यह खोजना पड़ेगा कि आपका उपसर्ग किस प्रकार दूर हुआ ? क्या वह धरणेन्द्रने दूर किया अथवा आपके केवलज्ञान के प्रताप से स्वयमेव दूर हो गया ? प्रभो ! सच्चा प्रताप तो आपका है। वास्तविक पूज्य तो आप ही हैं; धरणेन्द्र और पद्मावती तो हमारी ही भाँति आपके सेवक हैं। आपके प्रताप से ही वे धर्म को प्राप्त हुए।-इस प्रकार भक्तगण अनेक रीति से प्रभुकी महिमा करते और दिव्य उपदेश सुनते थे।

अहा, समवसरण में विराजमान तीर्थंकर भगवान की शोभा आश्चर्यकारी थी। वहाँ दिव्य सिंहासन होनेपर भी भगवान उसका स्पर्श किये बिना अधर-आकाश में-अन्तरिक्ष विराजते थे। सिंहासन के ऊपर आकाश में विराजमान निरालम्बी भगवान को देखते ही ज्ञात होता था कि पुण्य के उत्कृष्ट फलकी अपेक्षा चैतन्यगुण उच्च है। उस सिंहासन पर न बैठकर भगवान जगत को यह बतलाते थे कि-पुण्यफलरूप यह सिंहासन आत्मा के लिये अपद है-अपद है ! रत्नजड़ित सिंहासन होनेपर भी भगवान तो उससे अलिप्त थे; उनको सिंहासन का आधार नही था, परन्तु उलटी सिंहासन की शोभा भगवान के प्रताप से थी ! उसी प्रकार बाह्य में स्फटिक के तीन छत्र भले ही सुशोभित थे परन्तु अंतर में प्रभु के रत्नत्रय की शोभा कुछ और ही थी। देवों के दुंदुभि वाद्यो की अपेक्षा प्रभुकी दिव्य ध्वनि विशेष मधुर थी। प्रभुके मुखका प्रभामण्डल भले ही सूर्य-चन्द्र से अधिक दैदीप्यमान था, परन्तु उनके केवलज्ञान की चैतन्यप्रभाके अतीन्द्रिय तेजका तो सम्यग्दृष्टियों को ही अनुभव होता था।

भगवान के समवसरण में कल्पवृक्ष थे। दस प्रकार की भोगसामग्र. प्रदान करनेवाले कल्पवृक्षों को देखकर मुमुक्षु को ऐसा लगता था कि-अरे, यह कल्पवृक्ष तो बाह्य फल देनेवाले है, परन्तु सर्वज्ञ देव तो ऐसे कल्पवृक्ष है कि जिनकी सेवा से सम्यग्दर्शनादि चैतन्य-रत्नोंकी प्राप्ति होती है। इसीलिये तो मुमुक्षुगण दस प्रकार की सामग्री देनेवाले कल्पवृक्षों को छोड़कर केवलज्ञानरूपी अद्वितीय कल्पवृक्ष की ओर दौड़ते थे और अपूर्व सम्यक्त्वादि रत्न प्राप्त करते थे। अहा, प्रभुकी गुणमहिमा का वर्णन कौन कर सकता है ? वह वचनगोचर नहीं है, वह तो ज्ञानियों को ही अनुभवगम्य है।

भगवान का उपदेश भी अद्भुत था ! आत्मा की परम महिमा समझाकर, वे उसकी आराधना का उपदेश देते थे। भगवानने उपदेश मे क्या कहा ? - वह संक्षेप में देखें-• ※ जगत में जानने योग्य तत्त्व कौन से हैं ? जीव, अजीव, पुण्य-पाप-आस्रव-बंध-संवर-निर्जरा-मोक्ष,-इन नवतत्त्वों को जानना चाहिये।

※ इनमें से कौन से तत्त्वों का ग्रहण करें और किन्हें छोड़े ? शुद्ध जीव का, तथा संवर-निर्जरा-मोक्षका ग्रहण करना और शेष तत्त्वों को छोड़ना। जीव सदा अपनी चेतना द्वारा जीवित रहनेवाला है।

※ जीवको मोक्षसुख की प्राप्ति कैसे होती है ? आत्मा के ज्ञान-दर्शन-चारित्र द्वारा मोक्ष होता है। जीव को पाप से नरक, पुण्य से स्वर्ग और रत्नत्रयरूप वीतरागधर्म से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

-ऐसा मोक्षमार्ग का उपदेश भगवानने दिया। जिस मार्ग से स्वयं मोक्ष प्राप्त किया, वही वीतराग मार्ग जगत को बतलाया। अनेकों जीव उस मार्ग को समझकर धर्मको प्राप्त हुए; कितने ही जीवों ने दीक्षा लेकर मुनिदशा धारण की, सिंह-हाथी-बन्दर-सर्पादि तिर्यंच जीव भी आत्मा को समझकर व्रतधारी हुए।-इस प्रकार चारों ओर धर्म का जयजयकार हो गया।

भगवान की धर्मसभा मे स्वयंभूस्वामी आदि दस गणधर, ३५० श्रुतकेवली, १०,००० उपाध्याय; १४०० अवधिज्ञानी, ७५० मन पर्ययज्ञानी, १००० केवलज्ञानी, १००० ऋद्धिधारी मुनिवर, तथा ६०० मुनिवर वाद-विवाद में निपुण थे। कुल सोलह हजार मुनिवर एवं छत्तीस हजार आर्यिकाएँ थी। उनमे सुलोचना नामकी आर्यिका मुख्य थीं। श्रावक और श्राविकाओं की संख्या क्रमश: एक लाख एव तीन लाख थी। स्वर्ग के देव और वनके पशु भी प्रभुकी दिव्यवाणी श्रवण करने आते थे, और धर्म प्राप्त करके आत्मा का उद्धार करते थे।

श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर ने ७० वर्ष तक देश-देशान्तर में विहार किया और अन्त मे सम्मेदगिरि पर पधारे। अब उन्हें मोक्ष जाने में एक मास शेष था, इसलिये उनकी वाणी एवं विहारादि क्रियाएँ थम गईं। पार्श्व प्रभु सम्मेदशिखर की सर्वोच्च टूंक पर ध्यानस्थ खड़े थे; तृतीय एवं चतुर्थ शुक्लध्यान पूर्ण करके वे अयोगी भगवान दूसरे ही क्षण ऊर्ध्वगमन करके मोक्ष पधारे…शरीर छोड़कर अशरीरी हुए…संसार दशा छोड़कर महाआनन्दरूप सिद्धदशारुप परिणमित हुए। इन्द्रोने प्रभुका मोक्षकल्याणक मनाया। भगवान श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन मोक्ष पधारे थे इसलिये उसे ‘मोक्ष सप्तमी’ कहा जाता है पार्श्वनाथ भगवान का मुक्तिधाम होने से पर्वत भी आज पारसनाथ हिल के रुपमें जाना जाता है। पर्वत की जिस टूंक से भगवान मोक्ष पधारे वह पत्थर की टूंक भी ‘पारस’ के स्पर्श से ‘सुवर्ण’ की हो गई इसलिये उनका नाम ‘सुवर्णभद्र’ पड़ा। (वीर सं. २४८३ तथा २४९३ में पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के साथ हजारों यात्रियों ने उस सिद्धिधाम की यात्रा की है।

पारसनाथ जिनराज की स्वर्णभद्र कूट जेह,
मन-वच-तनकर पूज हूँ शिखर सम्मेद यजेह।

क्षमामूर्ति हे पार्श्वजिनेश्वर सिद्धिधाम गिरि शिखर महान; स्वर्णभद्र से सिद्धालय में वास किया अविचल गुणधाम। निजस्वरूप० को साधा प्रभुजी करके चेतनरस का पान; आत्मसाधना करके ‘हरि’ भी करते पारस का गुणगान।

श्री पारसनाथ भगवान की जय हो… [तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का जीवनचरित्र पूर्ण हुआ।]

‘‘मैं एक ज्ञायकभाव हूँ’’

‘‘मैं एक ज्ञायकभाव हूँ’’-कितना सरस मत्र ! जिसमे जिनवाणी का सार है, और भगवान आत्मा की अनुभूति है, -ऐसा जैनशासन का मत्र देकर पूज्य गुरुदेव ने महान उपकार किया है उन्हीं के कारण आज ऐसी सुन्दर जिनवाणी प्रकाशित हो रही है। मुझ पर पुत्रवत् स्नेह बरसाने वाली मेरी धर्ममाता पूज्य बेनश्री-बेन के उपकार की तो क्या बात ! अहा, जिन्होने अतिवात्सल्यपूर्वक दिन-रात अतर की स्वानुभूति के रहस्य समझा-समझाकर मुझे ठेठ स्वानुभूति तक पहुँचाया, उनके उपकार का मधुर सगीत मेरी चैतन्यवीणा मे बज रहा है।

अब आप देखेंगे चैतन्य-सरकस के दो दृश्य।

एक बार हमारे नगर में सरकस आया। सरकस के खेल तो कई बार देखे थे, परन्तु यह सरकस अद्भुत था, इसके खेल आत्मा में उतर जायें ऐसे थे। उसमें एक खेल था-हाथी और सिंह के झूले का।

रिंग मास्टर ऐसे वीतरागी गुरु ने आदेश दिया- ‘बन जा तू भगवान ! बन जा तू महावीर !’ यह सुनते ही उन दोनों अति कुशल खिलाड़ियों ने स्वानुभूति की छलाँग लगायी और सम्यक्त्व-झूले पर चढ़कर मोक्षमार्ग में झूलने लगे… दोनों को उस झूलेपर झूलता देखकर मुमुक्षु-दर्शक वाह-वाह ! कर उठे ।.. इतने में.. इतने में, दोनों साधक-खिलाड़ी दूसरी छलाँग लगाकर चारित्र-झूले पर चढ़ गये…हाथी बन गय पार्श्वनाथ ! सिंह बन गया महावीर ! चैतन्य-सरकस में ऐसे अद्भुत खेल देखकर भव्य जीव तो प्रसन्न हो गये। उन दोनों ने भगवान होने तक दस-दस भवपर्यंत धर्म झूले पर आत्मसाधना के जो अद्भुत खेल किये उनमें से हाथी के खेलों का रोमांचक वर्णन आपने अभी अभी पढ़ा…अब सिंह के खेलों का वर्णन पढ़कर आपका आत्मा भी ऐसी अपूर्व छलाँग लगाने को उछल पड़ेगा। (देखो पृष्ठ ४१०)

२४

भगवान महावीर (भाग १)

[२४]

[महावीर-मंगलवन्दना]

सुर-असुर-नरपतिवंद्यको, प्रविनष्ट घाती कर्म को,
करता नमन मैं धर्मकर्ता, तीर्थ श्री महावीर को।

जो सर्वज्ञ है, वीतराग है, हितोपदेशी है और वर्तमान मे जिनका धर्मतीर्थ चल रहा है-ऐसे असाधारण गुणवन्त भगवान महावीर-को मैं वन्दन करता हूँ।

वे भगवान महावीर जिसका आराधन करके सर्वज्ञ हुए और जिसकी आराधना का भव्य जीवो को उपदेश दिया, ऐसे शुध्द सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र को मैं नमस्कार करता हूँ ओर उसकी पूर्णता की भावना भाता हूँ। अहा, यह रत्नत्रय मुमुक्षु के सर्व अर्थ को सिद्ध करनेवाले अमूल्य रत्न हैं।

अहो, आत्मतत्त्व का अद्भुतपन बतानेवाला, तथा अनेकान्त धर्म के ध्वज से सुशोभित जिनशासन जयवंत वर्तो ..जोकि परसे भिन्न आत्मतत्त्व का अद्भुत स्वरूप बतलाकर इष्ट की सिद्धि कराता है और मिथ्यादृष्टि जिसका पार नहीं पा सकते।

‘श्री महावीर प्रभु मगलमय हैं।’ ऋषभादि तेईस भगवन्त, सीमंधरादि बीस विद्यमान भगवन्त, अथवा भावी-सर्व कीर्ति इत्यादि त्रिकालवर्ती सर्व-अरहन्त-सिद्ध-पंचपरमेष्ठी-रत्नत्रय -जिनवाणी-राजगृही आदि सर्वतीर्थ,-यह सब मंगल, एक ‘मंगलमय महावीर में समा जाते हैं; इसलिये महावीर प्रभुके मंगल गुणगान में अभेदरूप से उन सबका गुणगान भी आ जाता है। इस समय अपना चित्त महावीरमय है, महावीर मे सर्व इष्ट पद आ जाते है।

अहो महावीरदेव ! आपके सर्वज्ञतादि अगाध गुणो की गम्भीरता के निकट मेरी बुद्धि तो अत्यन्त अल्प है; तथापि आपके परम उपकारो से प्रेरित होकर भक्तिपूर्वक आपके जीवन का आलेखन करन हेतु मै उद्यमी हुआ हूँ। अल्प होनेपर भी मेरी बुद्धि आपके शासनके प्रताप से सम्यक्ता को प्राप्त हुई है इसलिये मै नि:शंकभाव से आपके अगाध आत्मगुणो का स्तवन करके जगत मे प्रकाशित करूँगा। मोक्षगमन के ढाई हजार वर्ष पश्चात् भी आप हम जैसे साधको के हृदय में ज्यों के त्यों साक्षात् विराज रहे है - इस प्रकार ज्ञानमे आप का साक्षात्कार करके मैं आप के जीवन का आलेखन करता हूँ। अहा, यह रहे सर्वज्ञ ! प्रभो ! आप मेरे सन्मुख ही विराजमान है इसलिये आपके जीवन का सम्यक् आलेखन करना मेरे लिये दुष्कर नही है, सुगम है आनन्दकारी है । हे भव्य साधर्मीजनो ! तुम भी ज्ञान मे सर्वज्ञ महावीर को साक्षात् विराजमान करके उन्हे चेतनस्वरूप मे जानना, उससे तुम्हे भी महान आत्मिक आनन्द का अपूर्व लाभ होगा।

प्रभो ! आपके गुणो के वर्णन की धुनमे मै शाब्दिक क्षति की अपेक्षा नही करता। अहा ! आपके गुणवाचक जो शब्द होगे वे सुन्दर होगे। पारसमणि के स्पर्श से लोहा भी यदि सोना बन जाता है, तो आप जैसे सर्वोत्तम परमात्मा के साथ वाच्य-वाचक सम्बन्ध होने से क्या शब्द पूज्य नही बन जायेगे ? अरे, स्थापना निक्षेपसे जब परमात्मा के साथ सम्बन्ध करते है तब पत्थर भी परमात्मा के रूप मे पूजाते है, तब जो शब्द आपके परमगुणो के वाचक होकर आपके साथ सम्बन्ध करते है वे शब्द जगत मे परमागम के रुप मे पूजे जाय-उसमे क्या आश्चर्य ! मेरा लक्ष आपके आत्मिक गुणोपर है, शब्दो पर मेरा लक्ष नही है। आपके सर्वज्ञतादि गुणोका रसिक मेरा मन, इस समय आपके गुणो के सिवा अन्यत्र कही नही लगता। बस ! आपके वीतरागी आत्मगुणो मे मेरे चित्त की तल्लीनता ही मेरा मंगल है।

[इति मंगल-अधिकार]

भगवान महावीर : पूर्वभव वर्णन

हे महावीर प्रभु ! वर्तमान मे तो आप मुक्तरुप से परम सुखकी अनुभूति मे लीन होकर सिद्धपुरी मे विराजमान है। हम जहाँ आप को जानते है वहाँ मोक्षसे पूर्व की आपकी भवावलि भी दृष्टिगोचर होती है। मोक्ष प्राप्त करने से पूर्व इस संसार की चारो गतियो मे आपके जीवने कैसे-कैसे दुख सहन किये ! और पश्चात् जैन मुनिवरो के सम्पर्क में धर्म प्राप्त करके सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की कैसी आराधना द्वारा आप इस भवचक्र से छूटे तथा मोक्षपुरी में पधारे ! वह सब चित्रपट की भाँति दृष्टिसमक्ष तैरता है। अहा, आत्मसाधना मे आपकी महान वीरता…हमें भी उस साधना के प्रति उत्साहित करती है। प्रभो ! भवसे छूटकर मुक्त कैसे होना, दु:ख से छूटकर सुखी कैसे होना, -वह मार्ग आपने अपने जीवनचरित्र द्वारा हमें स्पष्ट बतलाया है; इसलिये पुरुरवा भीलसे लेकर मोक्षतक के आपके जीवन-प्रसंगों का वैराग्यरसपूरित आलेखन भव्य जीवों के हितार्थ एव अपने आत्मा के गुणो की वृद्धि हेतु प्रारम्भ करता हूँ।

पुरूरवा भील

भगवान महावीर का जीव एक भव पहले पुरूरवा नाम का भील था, तब एक बार विदेह क्षेत्र की पुण्डरीकिणी नगरी मे धर्मात्मा-श्रावकों का संघ तीर्थयात्रा हेतु जा रहा था। सागरसेन नाम के मुनि-राज भी उस संघके साथ चल रहे थे। संघ जब जगल के मार्ग से जा रहा था कि डाकुओं की टोलीने उसे लूट लिया। सघ के लोग इधर-उधर भाग गये। मुनिराज सागरसेन संघ से पृथक् हो गये और घोर जगल मे किधर जाये वह उन्हे नही सूझ रहा था। इतने मे भील सरदार पुरूरवाने उन्हे देखा और मुनिराज को मारने के लिये धनुष पर बाण चढाने लगा, तब भील सरदार की भद्र पत्नीने उसे रोका और बोली-ठहरो स्वामी ! यह कोई सामान्य शिकार नही है। इनकी तेजस्वी मुद्रा से तो यह कोई वनदेवता लगते है, ऐसा लगता है कि यह वनमे मार्ग भूल गये है। चलो, उनके पास चल कर देखें। यह सुनकर क्रूर भीलने क्षणभर क्रूरता छोड़ दी। उसने मुनिराज के निकट जाकर विनयपूर्वक वदन किया, और मार्ग भूले हुए मुनिराज को वनमे से बाहर निकलने का मार्ग बतलाया। मुनिराज ने उसकी भद्रता से प्रभावित होकर कहा-हे भव्य ! तू अहिंसाधर्म को उत्तम जानकर उसका पालन कर। निर्दोष प्राणियों का घात करनेवाली यह क्रूरता तुझे शोभा नही देती, इसलिये यह शिकार एव मासभक्षण छोड़कर अहिंसाधर्म का सेवन कर, जिसमे तुझे उत्तम सुख प्राप्त होगा। मास के स्वाद की लोलुपतावश निर्दोष जीवो का वध करना वह तो महापाप है। मनुष्यभव पाकर ऐसा पाप करना तुझे शोभा नहि देता। इसलिये तू उसे शीघ्र छोड़ दे! इस प्रकार मुनिराज ने उसे अत्यन्त करुणापूर्वक हितोपदेश दिया।

मुनिराज का कल्याणकारी उपदेश सुनकर वह भील अति प्रभावित हुआ और उसने शिकार तथा मासाहार का त्याग करके अहिंसा धर्म धारण किया। अहा, साधु पुरुषो की क्षणभर की सगति भी जीवो को कितनी हितकारी होती है ! वीतरागी सन्तों की सगति से किसे शान्ति नही मिलेगी ? अहो ! भवदुःख से सतप्त ससारी जीवो की तृषा शात करने के लिये जैनदर्शन तो शातरस के सरोवर समान है, उसका सेवन करो।

श्री मुनिराज के प्रताप से जिसने क्रूरता छोड़ दी है ऐसा वह पुरूरवा भील भक्तिपूर्वक बहुत दूर तक मुनिराज के साथ चलता रहा और उन्हे नगर के मार्ग पर छोड़ कर लौट आया। अव्यक्त रूप से मानो वह कह रहा था कि-प्रभो ! आपने तो मुझे भववन में से बाहर निकलने के लिये हितोपदेश दिया, तो क्या मैं आपकी इतनी सेवा भी नही कर सकता ?

बस, मुनिराज से पृथक् होकर अपने निवासस्थान पर पहुँचे उस भील को अब कहीं चैन नही पड़ता था। अब उसने लूटपाट छोड़ दी थी और जंगल में भटके हुए पथिको की रक्षा करके उन्हें उनका मार्ग बतलाता था। वह सोचता था कि-अरे मुझमें कितनी क्रूरता थी और वे मुनिराज कितने शात परिणामी थे ! उनके क्षणभर के संग से मेरा जीवन बदल गया ! अब मुझे कितनी शान्ति मिल रही है !-इस प्रकार वह बारम्बार विचारता था; शान्ति की शीतलता उसे तृप्त करती थी। इसी प्रकार उसने शेष जीवन स्थूल अहिंसाव्रत के पालन में व्यतीत किया और अंत में मरकर वह भील सौधर्मस्वर्ग मे देव हुआ।

पूर्वभव-सौधर्म स्वर्ग में देव

कहाँ क्रूर भील ! और कहाँ देव ! किंचित् अहिंसा का पालन करके भीलसे देव हुए उस जीवको सौधर्मस्वर्ग मे अनेक दिव्य ऋद्धियाँ प्राप्त हुई और दो सागरोपम (असंख्यात वर्ष) तक पुण्यफल का उपभोग किया। अहा, क्षणभर की किंचित् अहिंसा के पालन से एक अज्ञानी को भी असंख्य वर्षों का पुण्यफल प्राप्त हुआ, तो ज्ञानपूर्वक सर्वथा वीतरागी अहिंसा के उत्तमफल का तो कहना ही क्या ?

अज्ञानभाव से पुण्य करके स्वर्ग मे गये उस देव ने वहाँकी देवागनाओ के साथ क्रीड़ा एव वैभव-विलास मे असख्य वर्ष व्यतीत कर दिये अभी उसे आत्मज्ञान प्राप्त नही हुआ था। स्वर्ग मे उसे अवधिज्ञान था, परन्तु आत्मज्ञान के बिना अवधिज्ञान का क्या मूल्य ? अज्ञानपूर्वक पुण्यफल के उपभोग मे उसने स्वर्ग के असख्य वर्ष बिता दिये और आयु पूर्ण होने पर स्वर्ग मे च्यवकर मनुष्य लोक मे अवतरित हुआ।

ऋषभदेव का पौत्र मरीचि कुमार

सौधर्म स्वर्ग से च्यवकर भूतकाल का वह भील और भविष्य काल का भगवान-ऐसा वह जीव एक अति सुन्दर प्रसिद्ध नगरी मे, तीर्थंकर के कुल मे अवतरित हुआ कहाँ अवतरित हुआ ? वह पढिये।

तीर्थरूप अयोध्या नगरी में ऋषभदेव भगवान के गर्भ, जन्म आदि कल्याणको का देवो ने आश्चर्यकारी महोत्सव मनाया था। उन ऋषभराजा के दो रानियाँ तथा भरत, बाहुबलि आदि सौ पुत्र थे, उनमे से ज्येष्ठ पुत्र भरत तीन ज्ञान के धारी, क्षायिक सम्यग्दृष्टि तथा चरमशरीरी और भरतक्षेत्र के प्रथम चक्रवर्ती थे। अपने चरित्र नायक का जीव सौधर्म स्वर्ग से च्यवकर इन्ही भरत चक्रवर्ती का पुत्र हुआ। उसका नाम था मरीचिकुमार। अहा, भरतक्षेत्र के भावी चौबीसवे तीर्थंकर का जीव वर्तमान मे प्रथम तीर्थंकर का पौत्र हुआ ! तीर्थंकर का पौत्र और चक्रवर्ती का पुत्र ! उसके गौरव का क्या कहना ? पुरुरवा भीलका जीव भगवान पुरुदेव का पौत्र हुआ। (ऋषभदेव का एक नाम पुरुदेव भी है) दादाको पौत्रपर और पौत्र को दादाजी पर अत्यन्त प्रेम था,-दोनो आत्मा तीर्थंकर होनेवाले थे। दादा ऋषभदेव अपने पौत्र को गोद में लेकर खेलाते और बोलना सिखाते कि बोलो बेटा !-‘अप्पा सो परमप्पा’ और बालक मरीचि तोतली भाषा मे ‘अप्पा-पप्पा’ बोलकर दादाजी का अनुसरण करता। वाह ! आदि तीर्थंकर अन्तिम तीर्थंकर को खेलाते होगे ? वह दृश्य कितना आनन्ददायी होगा ?-बहुत ही देखने योग्य !

एक बार चैत्र कृष्णा नौवीं को महाराजा ऋषभदेव के जन्म दिवसपर हजारों राजाओं के बीच इन्द्र अनेक देव-देवियोंसहित जन्मोत्सव मना रहा था, नीलांजना नामकी देवी नृत्य कर रही थी कि अचानक ही उसकी आयु पूर्ण हो जाने से वह देवी अदृश्य हो गई। ससार की ऐसी क्षणभंगुरता देखकर महाराजा ऋषभदेव ने जिनदीक्षा ले ली। (इस घटना के विशेष चित्रसहित वर्णन के लिये देखिये-भगवान ऋषभदेव पृष्ठ ) भगवान ऋषभदेव के प्रति परमस्नेह के कारण चार हजार राजाओं ने भी उनका अनुसरण किया, तथा दादाजी के साथ उनका पौत्र मीचिकुमार भी अविचारी रुपसे दिगम्बर साधु बन गया। अंतर में चैतन्यतत्त्व की प्रतीति तो थी नहीं; भगवान ऋषभदेव मुनि बनकर किसका ध्यान कर रहे हैं, वह भी नहीं जानता था। ऋषभ मुनिराज तो छह मास तक चैतन्य के ध्यान में लीन होकर ज्यों के त्यों खड़े रहे; परन्तु मरीचि आदि द्रव्यलिंगी साधु दीर्घकाल तक भूख-प्यास सहन नहीं कर सके, इसलिये मुनिमार्ग से भ्रष्ट होकर ज्यों-त्यों वर्तने लगे। अहा, जैनधर्म का मुनिमार्ग तो मोक्ष का मार्ग है! कायर जीव उसका पालन कैसे कर सकते थे? भगवान ऋषभदेव का मुनि होने के एक हजार वर्ष पश्चात् केवलज्ञान हुआ। जिस दिन भगवान को केवलज्ञान हुआ उसी दिन महाराजा भरतके यहाँ चक्ररत्न की उत्पत्ति हुई। पिता धर्मचक्री बने और पुत्र राजचक्री हुआ। भरतक्षेत्र के प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती एक ही दिन प्रगट हुए। विवेकी भरतराज अपने चक्रको एक ओर रखकर प्रथम धर्मचक्री सर्वज्ञपिता का केवलज्ञान-महोत्सव मनाने हेतु समवसरण में आये। वहाँ धर्मपिता के दिव्य आत्मवैभव को देखकर तथा चैतन्यतत्त्व की अलौकिकता सुनकर आश्चर्यचकित हो गये। उन्होने भगवान से पूछा-हे देव! हमारे कुलमे आप तीर्थंकर हुए; तो आप जैसा तीर्थंकर होनेवाला दूसरा कोई उत्तम पुरुष इस समय मेरे परिवार में है?

तब प्रभु की दिव्यध्वनि में उत्तर मिला कि-हे भरत! तुम और तुम्हारे सब पुत्र मोक्षगामी हो, और तुम्हारा यह पुत्र मरीचिकुमार तो भरतक्षेत्र की इस चौबीसीमे अन्तिम तीर्थंकर (महावीर) होगा।

यह सुनकर भरत को अति हर्ष हुआ कि-अहा मेरे पिता आदि-तीर्थंकर और मेरा पुत्र अन्तिम-तीर्थंकर! तथा मै भी इसी भव में मोक्षगामी! -इस प्रकार भरतराज की प्रसन्नता से चारो ओर आनन्दमय उत्सव का वातावरण छा गया! प्रभु की वाणी में अन्य विकल्प को अवकाश नही है। अरे, प्रभु की वाणीमे अपने तीर्थंकरत्व की बात सुनकर भी उस मरीचि ने सम्यक्त्व ग्रहण नहीं किया और भव के कारणरूप मिथ्यात्व को नही छोडा, वह कुमार्ग मे ही लगा रहा। ..वाह रे होनहार!

मुनिवेश छोडकर भ्रष्ट हुए मरीचि ने तापस का वेश धारण करके सांख्यमत का प्रवर्तन किया। उस मूर्ख जीव ने कुतर्क द्वारा कुमार्ग चलाया और मिथ्यामार्ग के सेवन से अपने आत्मा को असंख्य भव तक घोर संसार-दुःखों मे डुबोया। इसलिये शास्त्रकार कहते हैं कि-अरे जीवो! मिथ्यात्व का पाप मेरुसमान है, उसके समक्ष अन्य पाप तो राई जैसे है;-ऐसा जानकर प्राण जाय तथापि मिथ्यात्व का सेवन मत करना। सिंह, सर्पादि के विष से तो एक बार मरण होता है, परन्तु कुमार्ग के सेवन से तो जीव भव-भव में अपार दुख भोगता है। इसलिये हे भव्यजीवों! भयंकर भवदुःखों से छूटने की तथा शाश्वत आत्मसुख प्राप्त करने की इच्छा हो तो तुम शीघ्र कुमार्गरूप मिथ्यात्व को छोड़ो, और जिनमार्ग के सेवन द्वारा सम्यक्त्व को अंगीकार करो।

पूर्वभव-पाँचवे स्वर्ग में देव

अरेरे, तीर्थंकर का कुल और बाह्य में जैनदीक्षा प्राप्त करके भी उस मरीचि ने सम्यक्त्व ग्रहण नहीं किया, आत्मज्ञान नही किया, और मिथ्यात्वसहित कुतप के प्रभाव से मरकर पाँचवे स्वर्ग में देव हुआ। मिथ्यात्वसहित होने के कारण स्वर्ग मे उसके परिणाम कुटिल थे। स्वर्ग के दिव्य वैभव में भी उसे सुख नहीं मिला। -कहाँ से मिलता? सुख विषयों मे कहाँ है? सुख तो आत्मा में है; उसे जाने बिना सुख का वेदन कहाँ से होगा? दस सागरोपम जितने असंख्य वर्षों तक वह जीव स्वर्ग में रहा और अनेक देवांगनाओं सहित स्वर्ग के दिव्य इन्द्रियभोग भोगे; परन्तु उससे क्या? स्वर्गीय सुख दूसरी वस्तु है और आत्मिक शान्ति दूसरी। मूर्ख जीव ही शान्तिरहित स्वर्गीय सुखों को सच्चा सुख मानते हैं। आत्मिक शान्ति का अनुभव करनेवाले धर्मात्मा बाह्यविषयोंमे कदापि सुखकी कल्पना नही करते, -फिर भले ही वे सुख स्वर्ग के हों!

पूर्वभव-ब्राह्मणकुमार प्रियमित्र और प्रथम स्वर्ग में देव

असंख्य वर्षों तक स्वर्गलोक मे रहकर भी लेशमात्र आत्मसुख का आस्वादन किये बिना अन्त में वह (भूतकाल का मरीचि और भविष्य के महावीर) जीव वहाँ से च्युत हुआ। संसार तो समरणरूप है, इसलिये वह समारी जीव देवगति से समरित होकर मनुष्यगति में एक ब्राह्मण का पुत्र हुआ, उसका नाम था प्रियमित्र। पूर्वभव के मिथ्या संस्कार वश अब भी वह मिथ्यामार्ग मे प्रवर्तता था। मिथ्यातप के क्लेशपूर्वक मरकर वह जीव प्रथमस्वर्ग मे देव हुआ। अपने हिताहित के विवेकरहित वह देव स्वर्ग मे भी सुखी नही था। दो सागर तक देवोपनीत भोगों में ही काल गँवाकर, भोगो की लालसासहित वह स्वर्ग से मृत्युलोक मे गिरा। 'अरेरे, असख्य वर्ष तक भोगे हुए यह दिव्य भोग अब छुट जायेंगे ! -ऐसे शोक से संतप्त आर्तध्यानपूर्वक वह देव लोक से च्युत हुआ।

ब्राह्मणकुमार पुष्पमित्र और दूसरे स्वर्ग में देव

प्रथम स्वर्ग से च्युत हुआ वह जीव इस भरतवर्ष के स्थूणागार नगर मे एक ब्राह्मणपुत्र हुआ, -उसका नाम था पुष्पमित्र। बालक पुष्पमित्र एक बार खेल रहा था कि एक संन्यासी-बाबाने उसे लालच दिखाया कि- ‘तू हमारे साथ चल, तुझे स्वर्ग का सुख मिलेगा !’ स्वर्ग-मोक्ष का भेद नही जाननेवाले उस अविवेकी बालकने स्वर्ग के लालच से बाल्यावस्था मे ही कुतप धारण किया, (‘-भोगहेतु धर्मको, नहि कर्मक्षय के हेतु को।’) अरेरे ! एक भावी तीर्थंकर का आत्मा भी मिथ्यामार्ग के संस्कार वश कुमार्ग मे फँसकर संसार मे कैसा भटक रहा है ! दीर्घकाल तक मिथ्यात्वसहित कुतप का क्लेश सहन करके वह मरा और दूसरे ईशान स्वर्ग मे देव हुआ। वहाँ उसने अप्सराओ द्वारा होनेवाले नृत्यागानादि देखने में दीर्घकाल गँवाया। धर्मरहित हीन पुण्य क्षीण होनेपर स्वर्गने उसे च्युत कर दिया, -जिस प्रकार सोते हुए महावत को मदोन्मत्त हाथी पछाड़ देता है, उसी प्रकार मोहनिद्रा में सोते हुए उस देवको पुण्यरूपी हाथी ने नीचे पछाड दिया।

पूर्वभव-अग्निसह ब्राह्मण और तीसरे स्वर्ग मे देव

दूसरे स्वर्गसे च्युत हुआ वह देव, श्वेतिकानगरी मे अग्निसह नामका ब्राह्मणपुत्र हुआ; वहाँ भी पूर्वभवके मिथ्या संस्कार अनुसार सन्यासी होकर मिथ्यातप का आचरण करके जीवन बिताया और पुनः तीसरे स्वर्ग मे देव हुआ। वहाँ सात सागर की आयु अप्सराओ के साथ व्यतीत कर दी, परन्तु आत्महित किंचित् नही साधा।

अरेरे, जैनधर्मको प्राप्त नहीं हुआ वह जीव, भावी तीर्थंकर होने पर भी, अज्ञान के कारण संसार की गतियों में कैसा भटक रहा है ? क्षण में मृत्युलोक और क्षण में स्वर्गलोकमें जाता है। पुण्य कर-करके बारम्बार स्वर्गमे जानेपर भी उस जीव को कहीं शान्ति नही है, कहीं उसके आत्मा को आराम नहीं है। अहा, जब जीव जैनमार्ग को प्राप्त कर ले, तभी उसे सुख-शान्ति मिलते हैं; इसलिये हे जीवो ! तुम जैनमार्ग पाकर महान आदरपूर्वक उसका सेवन करो।

अग्निमित्र ब्राह्मण और चौथे स्वर्ग में देव

तीसरे स्वर्ग से निकलकर ‘भील’ और ‘भगवान’ का वह जीव भरतक्षेत्र की मन्दिर नगरी में एक ब्राह्मण के घर अग्निमित्र नामका पुत्र हुआ। उसके काले केश मानो अन्तरकी मिथ्यात्वरूपी कालिमा सूचित करते हों-इस प्रकार फरफर होते थे। युवावस्था में गृहवास छोड़कर वह पुनः संन्यासी होकर तीव्र तप करते हुए मिथ्यामार्ग का उपदेश देने लगा।

दीर्घकाल तक कुमार्गका प्रवर्तन करके अन्त में असमाधिमरण पूर्वक मरकर वह चौथे माहेन्द्र स्वर्ग में देव हुआ। असंख्य वर्षतक स्वर्गलोककी विभूतियों को पुण्यफल में भोगा, परन्तु अन्त में जिस प्रकार सूखा पत्ता डालसे खिर पड़ता है तदनुसार पुण्य सुख जानेपर वह स्वर्गलोक से खिर पड़ा।

भारद्वाज ब्राह्मण और पुनः चौथे स्वर्ग में

चौथे स्वर्ग से च्युत होकर वह जीव स्वस्तिमती नगरी में भारद्वाज नामक ब्राह्मण हुआ और पुनः गतजन्मकी भाँति सन्यासी होकर कुतप में जीवन गँवाकर चौथे स्वर्ग में गया। स्वर्गलोक की अनेक ऋद्धियाँ तथा देवांगनाएँ आदि वैभव मे आसक्तिपूर्वक असंख्य वर्षका जीवन बिता दिया, और जब आयु पूर्ण होने आयी तब उसके कल्पवृक्ष काँपने लगे, उसकी मन्दारमालाएँ मुरझाने लगीं, उसकी दृष्टि भ्रमित होने लगी, शरीर की कान्ति निस्तेज होने लगी। ऐसे चिह्नोंसे उसे विचार आने लगा कि अब स्वर्गकी यह सब विभूति छोड़कर मुझे यहाँ से जाना पड़ेगा। देवियों के विरह से वह विलाप करने लगा। अरेरे ! देखो तो सही, जिसने बाह्य वस्तुओं में सुख माना वह उनके वियोग मे कैसा विह्वल होता है ! अरे मूर्ख ! विचार तो कर कि असंख्य वर्षोतक जिन बाह्यविषयों के बीच रहकर उनका उपभोग करने पर भी तुझे शान्ति या तृप्ति नहीं हुई उनमें सुख कैसा ?-सुख हो तो मिले न ? आकुलित होकर मिथ्या प्रयत्न किसलिये करता है ? अनतकाल तक झूरने पर भी विषयों मे से कदापि सुख प्राप्त नहीं हो सकता।

जिसका आशाचक्र टूट गया है, जिसका पुण्यदीपक बुझ जाने की तैयारी में और जिसके मानसिक संताप का कोई पार नहीं है-ऐसा वह देव मरण को निकट देखकर अत्यन्त भयभीत हुआ और हताशापूर्वक भोगोंकी चिंता में आर्तध्यान करने लगा कि-अरेरे ! मैं असहायरूप से यह सब छोड़कर मर जाऊँगा ? मैं अब किसकी शरण लूँ ? कहाँ जाऊँ ? किस प्रकार इन भोगों की रक्षा करूँ कौन उपाय करके मृत्यु को रोकूँ ? यहाँ से मरकर मैं न जाने किस गति मे जाऊँगा ?..वहाँ मेरा क्या होगा ?..कौन साथ देगा ? वास्तव में पुण्य समाप्त होनेपर कोई साथ नही देता। देवांगनाएँ देखती रहीं और देवके प्राण छूट गये. -इस प्रकार विलाप करता हुआ वह देव ‘क्षीण पुण्य से मृत्युलोक में’ आ पड़ा और अनेक भवों में भटकता फिरा।

एकेन्द्रियादि पर्यायों में असंख्य भव का अनंत दुःख

जिसके नीच पुण्यका अस्त हुआ है और जो मिथ्यात्वकी आगमें जल रहा है ऐसा वह भील का जीव (भावी महावीर भगवानका जीव) बारम्बार स्वर्ग-मनुष्य के भवों में भ्रमण करता हुआ तथा दुःख भोगता हुआ संसार में भटक रहा है। वह स्वर्ग से भ्रष्ट होकर कितनी ही निचली त्रसपर्यायों मे भटका, अन्त मे मिथ्यात्व-रस की पराकाष्ठा के फलरुप स्थावर-एकेन्द्रिय पर्याय मे गया और वहाँ दो घड़ी मे हजारो बार जन्म-मरण कर-करके दुःखी हुआ। -इस प्रकार असख्य बार भवभ्रमण कर-करके उसने कल्पनातीत दुःख सहन किये। सिद्ध भगवन्तों का सुख और एकेन्द्रिय जीवों का दुःख-यह दोनो वचनातीत है। दीर्घकाल तक उस जीवने स्थावरपर्यायों में इतने अधिक दुःख भोगे कि जिनका वर्णन भी शास्त्रकार नहीं कर सकते। जिस प्रकार सिद्धोंका सुख किन्हीं संयोगों से नही होता, ‘स्वभावसिद्ध’ है, उसी प्रकार निगोद के जीवों का दुःख भी सयोग से हुआ नही है, , परन्तु भावकलक की प्रचुरतारुप उनके अपने परिणाम से हुआ है इसलिये ‘परिणामसिद्ध’ है। किसी मनुष्य को धधकती हुई अग्नि मे डालकर लौहरस के साथ गला दे-वह दुख भी जिसके समक्ष अत्यल्प माना जाय-ऐसे घोरातिघोर दुख निगोदमे एकेन्द्रिय जीवोको होते है। ऐसा दुख उम जीव ने मिथ्यात्व के कारण अनेक भवोतक भोगा।

तथापि देखो तो सही, चेतनके स्वभाव की अद्भुतता कि ऐसे दुखो के बीच भी अपने चैतन्यस्वभावको उसने नही छोड़ा, स्वय अपने चेतनप्राण द्वारा वह जीता ही रहा ! तथा अनन्त दुख भोगने पर भी अपने सुखस्वभाव को नही छोड़ा इसीलिये तो दुःख मे परिमुक्त होकर वही जीव आज अनन्त सुखसहित सिद्धपदमे विराजमान है वाह रे वाह चैतन्य ! तेरा स्वभाव ! वास्तव मे अद्भुत है।-निजभाव को छोड़े नहीं, परभाव किंचित ना ग्रह, ज्ञाता-द्रष्टा जो सर्व का सो मैं, एम ज्ञानी चिंतन करें।

अत्यधिक दुःखोसे पीडित वह महावीर का जीव,-मानो अब उनसे छुटने तथा भगवान होने हेतु बाहर आ रहा हो ! -तदनुसार बडी कठिनाई से दीर्घकाल मे कुयोनियो मे निकलकर पुन मनुष्य हुआ; निगोद दशा को अन्तिम प्रणाम करके सदा के लिये छोड दिया।

[निगोद से निकलकर मोक्षकी ओर-]

राजगृहीनगरी में स्थविर ब्राह्मण और पाँचवे स्वर्ग में

हम भगवान महावीर के पूर्व भवो की कथा पढ़ रहे है। अति दीर्घकाल तक एकेन्द्रिय पर्याय मे तथा विकलत्रय में दुख के ही अवतार कर-करके अतमे वह जीव राजगृही मे एक ब्राह्मण के घर पुत्ररुप मे उत्पन्न हुआ, उसका नाम था स्थविर। राजगृही जहाँ से स्वय कुछ भव पश्चात् धर्मतीर्थका प्रवर्तन करनेवाला है,-ऐसी उस नगरी मे अवतरित वह जीव अभी तो धर्म जानता भी नहीं है; अभी उसने मिथ्यात्वके पाप का भार उतारा नही है। राजगृही नगरी की शोभा तो अद्भुत थी, परन्तु वहाँ अवतरित जीव भी धर्म के बिना शोभा नही देता था। कोयले को भले ही सुवर्ण मजूषा मे रखो, तो क्या वह वहाँ शोभा देगा ? अपने पुण्य पाप कर्म के अनुसार जीव ससार में अनेक वस्तुएँ ग्रहण करता और छोड़ता है। घोर परिभ्रमण के पश्चात् बड़ी कठिनाई से मनुष्यभव को प्राप्त वह जीव अभी भी जागृत नहीं हुआ और नास्तिक-पथ का संन्यासी बनकर मिथ्यात्व में ही पड़ा रहा; अज्ञानपूर्वक कुतप करके वह पाँचवें ब्रह्मस्वर्ग मे देव हुआ, और दस सागरपर्यंत वहाँ रहा।

वहाँ की आयु पूर्ण होने पर वह पुनः राजगृही में अवतरित हुआ। भविष्यमें इसी राजगृही से वह धर्मचक्रका प्रवर्तन करनेवाला है-इसी से मानो अव्यक्तरुप से भी उसकी ममता हो इसलिये वह जीव राजगृही में राजकुमार के रुप में अवतरित हुआ।

[भगवान महावीर : पूर्वभव]

राजगृहीनगरी में विश्वनन्दि राजकुमार

वैराग्य, धर्मप्राप्ति, जिनदीक्षा, निदानबंध, दसवें स्वर्गमें

अपना भारतदेश अर्थात् तीर्थंकरों की पुण्यभूमि। उसमे भी मगध देश और उसकी भी राजगृही नगरी वह विशिष्ट तीर्थसमान है। वहाँ पुण्यवन्त धर्मात्मा जीव निवास करते है और जैनधर्म का प्रताप वर्तता है। अपनी कथा का मुख्य पात्र अर्थात् अपने चरित्रनायक का जीव इस धर्मनगरी में विश्वभूति राजाके पुत्ररुप में, धर्म प्राप्त करने हेतु अवतरित हुआ-‘विश्वनन्दि’ उसका नाम।

राजा विश्वभूति श्वेत केश देखकर ससार से विरक्त हुए और अपने भ्राता विशाखभूति को राज्य सौंपकर तथा विश्वनन्दिकुमार को युवराजपद देकर, चार सौ राजाओं सहित जिनदीक्षा लेकर मुनि हुए।

विशाखभूतिने सुन्दर ढंग से राज्य का संचालन किया और विश्वनन्दि युवराज ने उन्हें अच्छा सहयोग दिया। युवराजने एक अति सुन्दर उद्यान बनवाया था; उसके सुन्दर पुष्प मानो ‘चैतन्य उद्यान’ विकसित होने की पूर्वसूचना देते हों इसप्रकार सुशोभित होते थे। यद्यपि अभी चैतन्यउद्यान खिला नहीं था, इसलिये चैतन्य-उद्यान की अतीन्द्रिय शोभा को नहीं जाननेवाला वह भव्य, बाह्य उपवन की सुन्दरता पर मुग्ध था। वह उद्यान अनेक प्रकार के उत्तम वृक्षों से शोभायमान था, बारम्बार मुनिवर पधारकर उस उद्यान की शोभा में अभिवृद्धि करते, और वहाँ असमय ही आम्रवृक्ष फलते थे। उस अद्भुत उद्यान के प्रति युवराज विश्वनन्दि को अति ममत्व था,-क्यो न हो?-जबकि वह उद्यान ही उसके चैतन्य उद्यान के खिलने में कारणभूत होना है।

एक बार उसके काकाके पुत्र राजपुत्र ‘नन्द-विशाख’ ने (विशाखनन्दिने) वह अद्भुत उद्यान देखा और उसका मन मोहित हो गया। उसने माता-पिता के पास वह उद्यान उसे दिलवा देने की हठ की। अपने पुत्र को उद्यान दिलवा देनेके लिये विशाखभूतिने कपटपूर्वक विश्वनन्दि को काश्मीर राज्य पर विजय प्राप्त करने के बहाने राज्य से दूर भेज दिया। आज्ञाकारी युवराज शत्रुको जीतने के लिये सेनासहित चल दिया। उसके जानेपर उसके चचेरे भाई नन्दविशाखने उसके प्रिय उद्यान पर अधिकार कर लिया। शत्रुराज्यपर विजय प्राप्त करके युवराज विश्वनन्दि शीघ्र ही राजगृही लौट आया। उसके मनमें अपने उपवन की चिन्ता थी; उपवन को देखे बिना उसे चैन नहीं पड़ता था। (हे भव्य पाठक! कुछ ही देर में तुम देखोगे कि ऐसी घटनाएँ भी भव्य जीवोंको किसप्रकार हित का कारण होती हैं!)

राजगृही नगरी में आकर उसने देखा तो प्रजाजन भयभीत हो रहे हैं। नन्द-विशाख (चचेरा भाई) उसके उद्यान पर आधिपत्य जमाकर उससे लड़ने को तैयार हुआ है। युवराज विश्वनन्दि ने उसके साथ युद्ध किया। अत्यन्त वीरता पूर्वक पत्थरका एक खम्भा उठाकर उसके प्रहारों से उसने शत्रुसेना के छक्के छुड़ा दिये। उसके पराक्रम से भयभीत होकर नन्द-विशाख भागा और जान बचाने के लिये एक वृक्षपर चढ़ गया। परन्तु अति बलवान विश्वनन्दिने क्रोधपूर्वक उस वृक्ष को उखाड़ डाला। अन्त में नन्दविशाख उसकी शरण मे आया और चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगा।

यह देखकर उदार हृदय विश्वनन्दि को दया आयी और उसका क्रोध शांत हो गया। अरे, भाई के साथ युद्ध करके अब मैं पितातुल्य काका विशाखभूति को क्या मुँह दिखाऊँ?- इस प्रकार लज्जित होकर वह राज्य छोड़कर दीक्षा हेतु वन मे जाने को तैयार हुआ। ‘दुर्जनों द्वारा किया गया अपकार भी सज्जनों को कभी-कभी उपकार रुप हो जाता है।’ जिस उद्यान के मोहवश युद्ध करना पड़ा, उसे भी छोड़कर मुनिदीक्षा ग्रहण करने हेतु वह राजकुमार दिगंबर जैनाचार्य के निकट जा पहुँचा। वन में संभूतस्वामी नामके दिगम्बर जैनमुनि संघसहित विराज रहे थे। रत्नत्रयपुष्पों से सुशोभित वह मुनिसंघ धर्म के सुन्दर उपवन समान था। विश्वनन्दिने मुनिराजके चरणों में नमस्कार किया और उनके श्रीमुख से राग-द्वेष रहित चैतन्य के शुध्द स्वरुप का श्रवण करके, स्वानुभूतिपूर्वक दिगम्बर जिनदीक्षा अंगीकार की। राजा विशाखभूतिने भी जिनदीक्षा ग्रहण कर ली। भविष्य के महावीर भगवान का जीव विश्वनन्दि अब बाह्य उपवन का ममत्व छोड़कर अंतरंग मे रत्नत्रय पुष्पों से सुशोभित चैतन्य-उपवन मे विचरने लगा, तपद्वारा उसका चैतन्य-उद्यान खिल उठा था।

[अहा, अपने चरित्रनायक प्रथम इस भव मे धर्म को प्राप्त हुए। चैतन्य की आराधना द्वारा उन्होंने इसभव में भवकट्टी की। परन्तु उस आराधना मे एक बार निदान शल्य के कारण बीच मे भंग पड़ गया। पश्चात् मोक्ष की अखण्ड आराधना उन्होंने सिंह के भव में प्रारम्भ कीं इसलिये शास्त्रकारोंने सिंह के भव मे सम्यक्त्व-प्राप्ति का वर्णन मुख्य रुप से किया है-जो हमें अखण्ड आराधना की प्रेरणा देता है।]

दीक्षा लेने के पश्चात् राजा विशाखभूति तो नि शल्य रत्नत्रयका पालन करके दसवे स्वर्ग में गये। इधर राजगृही मे उनका पुत्र नन्दविशाख-कि जिसके अन्याय के कारण विश्वनन्दि ने राज्य छोड़कर दीक्षा ली है-वह शक्तिहीन तथा पुण्यहीन था; कुछ ही समय पश्चात् एक राजाने उसका राज्य जीत लिया और वह रास्ते पर भटकता हुआ भिखारी बन गया, राजा मिटकर रंक हो गया, वह भीख माँगता हुआ मथुरा की गलियो मे घूमने लगा।

अब अपने चरित्रनायक महात्मा विश्वनन्दि का क्या हुआ ? वह देखे। उपवन का मोह छोड़कर मुनि हुए विश्वनन्दि मुनि यथाशक्ति रत्नत्रय धर्म का पालन करते थे, अनेक बार उपवासादि भी करते थे; एक बार उन्होंने मासोपवास किये, जैनमुनि उपवास मे पानी भी नहीं पीते, तथा उपवास के अतिरिक्त दिनों मे भी मात्र एक ही बार आहार-जल ग्रहण करते हैं। इसप्रकार अन्न-जलरहित मासोपवासी वे विश्वनन्दि मुनिराज मथुरानगरी में पारणा हेतु पधारे और नीचे देखकर मार्ग में चल रहे थे; इतने में एक बैलने उन्हें सींग मारा और वे धरतीपर गिर पड़े।

-ठीक उसी समय राज्यभ्रष्ट नन्दविशाख वहाँ एक वेश्या के घर के पास खड़ा था; उसने यह दृश्य देखा और पूर्वके वैरका स्मरण करके अट्टहास्यपूर्वक कटाक्ष किया कि-रे विश्वनन्दि ! कहाँ गया तेरा वह बल ? तूने तो विशाल खम्भा उखाड़कर सारी सेना को जीत लिया था और मैं भागकर वृक्षपर चढ़ गया था तब पूरे वृक्ष को अपने बाहुबल से उखाड़ दिया था, -उसके बदले आज एक बैल के धक्के से गिर पड़ा है ! -कहाँ गया तेरा बाहुबल ?!

एक ओर मासोपवास की अशक्ति के कारण बैलके धक्केसे गिर पड़ना, और दूसरी और भाई द्वारा पूर्वकालिक वैर का स्मरण करके कटाक्ष करना…उससे विश्वनन्दिमुनि का सुषुप्त कषाय जागृत हो उठा; क्रोधावेश में वे अपने मुनिपद को भूल गये ! रत्नत्रय का अमूल्य निधान और उसके महाफल मोक्ष को भूलकर मानो उन्होंने अमूल्य रत्न को पानी के भाव बेच दिया ! क्रोधवश उनके नेत्रों से अंगारे झरने लगे और वे बोल उठे-अरे दुष्ट ! तू मेरे तपकी हँसी उड़ाता है ! परन्तु देख लेना इस तप के प्रभाव से भविष्य में मैं तुझे सबके सामने छेद डालूँगा’ -इस प्रकार अज्ञानवश वे निदान कर बैठे कि-मेरे इस तपका कोई फल हो तो मैं अगले जन्म में अद्भुत शारीरिक शक्ति प्राप्त करूँ और इस दुष्ट नन्द-विशाख को मारूँ !-ऐसे निदानशल्य के कारण वे रत्नत्रय से भ्रष्ट हो गये, तथा विद्याधर की विभूति देखकर उसका भी निदान कि मेरे तप के प्रभाव से मुझे ऐसी विभूति प्राप्त हो !

रे विश्वनन्दि ! यह तुमने कैसी मूर्खता की ? रत्नत्रयके अमूल्य रत्न को तुमने क्रोध में आकर फेंक दिया ? रत्नत्रय के फलमे शारीरिक बल की अभिलाषा करके तुम मिथ्या दृष्टि हुए, चैतन्यवैभव को भूलकर तुमने पुण्यवैभव की चाह की, और निदानशल्य से अपने आत्माको भयंकर दुःख में डाल दिया।

इस प्रकार, तीव्र क्रोधाग्नि मे जिसने अपने सम्यक्त्वरत्न को जला दिया है-ऐसे उन विश्वनन्दि मुनिका जीव, निदान शल्यसहित मरकर, तपके शेष पुण्यप्रताप से महाशुक्र नामके दसवें स्वर्गमें देव हुआ। वहाँ सोलह सागर तक उसने भोगलालसा से इन्द्रसमान वैभव का उपभोग किया। अनुपम जैनव्रत प्राप्त करके भी उनका पूरा लाभ वह नहीं ले सका। जिसप्रकार कोई मूर्ख पुरुष अमृतपान करके उसका वमन कर दे, तदनुसार उसने रत्नत्रयरूपी-अमृत का निदान शल्य द्वारा वमन कर दिया और पुनः संसार में भटकने लगा। [रे भवितव्य ! यह जीव है तो तीर्थंकर होनेवाला. किन्तु…भरतक्षेत्र का ‘चौबीसवाँ’ तीर्थंकर होनेवाला है; और कालक्रमानुसार चौबीसवें तीर्थंकर के अवतार में अभी दीर्घकाल लगेगा ..इसलिये बीच का समय संसार भ्रमण में बिताने के लिये ही निदान शल्य किया।]

पश्चात् नन्द-विशाख का जीव भी किसी कारणवश वैराग्य प्राप्त करके मुनि हुआ। जैनदीक्षा लेकर उसने तप किया; परन्तु एक बार आकाशमार्ग से जाते हुए किसी विद्याधर की आश्चर्यजनक विभूति देखकर वह भोगों की वांछा से ऐसा निदानशल्य कर बैठा कि-मेरे धर्मके फलमें मुझे भी ऐसी विभूति प्राप्त हो ! अरेरे ! धर्म के फलमें उसने पुण्यभोगों की याचना की,-अमृत के फलमें विष मांगा,-इसलिये वह भी मिथ्यादृष्टि हुआ और उसके संचित पुण्य अल्प होगये; हाथमें आये हुए धर्मरत्न को फेंककर उसके बदले में उसने विषय-भोगों का कोयला माँगा,-धिक्कार है विषयाभिलाषा को !

व्रतभ्रष्ट ऐसे उन विशाख मुनि का जीव भी निदान बंध सहित मरकर दसवें स्वर्ग में देव हुआ; और विषय-भोगों की लालसा में ही असंख्य वर्ष व्यतीत किये।

[प्रिय पाठक ! महावीर होनेवाला यह विश्वनन्दि का जीव स्वर्ग से च्यवकर अब त्रिपृष्ठ वासुदेव और उसका भाई नन्दविशाख प्रतिवासुदेव होगा , । वह कथा आप अगले प्रकरण में पढ़ेंगे।]

जैनधर्म अर्थात् पंच परमेष्ठी की नगरी

हमें महाभाग्यसे इस नगरी में प्रवेश मिला है। आत्मिकसुख इसी नगरी में प्राप्त होता है; इस नगरी का रहन-सहन ही कोई भिन्न प्रकार का, अपूर्व एवं रागरहित होता है। इस वीतराग नगरी के निवासी भगवंत पंचपरमेष्ठी तथा साधर्मी जगत से भिन्न भाववाले होते हैं।

आओ.. इस नगरी मे आये हो तो अब इस नगरी के आत्मवैभव को (तीर्थंकरों के महापुराण द्वारा) जान लो। यह समस्त वैभव तुम्हारा ही है। वह दिखलाकर भगवन्तो ने उपकार किया है।

भगवान महावीर : पूर्वभव : त्रिपृष्ठ वासुदेव

२४

भगवान महावीर (भाग २)

जहाँ हम रहते हैं उस भरतक्षेत्र में, प्रत्येक कालचक्र मे (अवसर्पिणी तथा उत्सर्पिणी प्रत्येक के दस कोड़ा कोड़ी सागरोपम मे) दो बार २४-२४ तीर्थंकर भगवन्त अवतरित होते है। वे सर्वज्ञ होकर, ज्ञानानन्द आत्मा का स्वरूप समझाकर उसकी वीतरागी उपासनारूप मोक्षमार्ग बतलाते हैं, और उनके उपदेश से लाखो-करोड़ो-असंख्य जीव धर्म प्राप्त करके संसार से मुक्त होते हैं। उनमे इस चौवीसी के अन्तिम तीर्थंकर श्री महावीर भगवान के मोक्षगमन का ढाई हजारवें वर्ष का अभूतपूर्व महोत्सव भारतभर मे मनाया गया था। उस अवसर पर पूज्य श्री कानजी स्वामी की प्रेरणा से लिखे गये इस ग्रन्थ मे भगवान महावीर का मगल-जीवन आप पढ़ रहे हैं। उनके पूर्वभवो का वर्णन चल रहा है।

अपने चरित्रनायक महावीर का जीव दसवे स्वर्ग से वासुदेवरूप मे कहाँ उत्पन्न होता है, वह देखें-भरतक्षेत्र की पोदनपुरी में भगवान ऋषभदेव-बाहुबलि के वंश में असंख्य बड़े-बड़े राजा हुए और मोक्ष प्राप्त किया। उनमे अनुक्रम से प्रजापति नामके राजा हुए। उनके दो पुत्र थे-१. विशाखभूति का जीव (जा पूर्वभव मे विश्वनन्दि के काका थे वे) विजय बलदेवरूप मे अवतरित हुए, और २ विश्वनन्दि (महावीर का जीव) त्रिपृष्ठ वासुदेव रूप मे अवतरित हुए।

उसी समय पूर्व भव का नन्दविशाख का जीव विद्याधरो की अलकापुरी नगरी मे राजकुमाररूप मे अवतरित हुआ, उसका नाम अश्वग्रीव ! उस अश्वग्रीव को अनेक विद्याऐं सिद्ध हुई, तथा दस हजार आरेवाला सुदर्शन चक्र, दंड, छत्र, खड्ग आदि अनेक दैवी आयुध प्राप्त हुए। तीनों खण्ड पर विजय प्राप्त करके वे आधे भरतक्षेत्र के स्वामी (अर्धचक्री, प्रतिवासुदेव) हुए। दग्ध पुण्यके फल का उपभोग करते हुए उन अश्वग्रीव की हजारो राजा सेवा करते थे। पुण्य से क्या नहीं मिलता ? अरे, आराधक दशा मे बाँधकर पश्चात् निदान द्वारा जलाये हुए दग्ध-पुण्य का भी ऐसा फल है, तो आराधक भावसहित बाँधे हुए आश्चर्यकारी सातिशय-पुण्य का क्या कहना !.. तथा पुण्यराग से पर ऐसी चैतन्य आराधना के वीतरागी आनन्द की तो बात ही क्या ! धन्य आराधना ! धन्य वीतरागता ! धन्य उसका प्रशंसनीय फल !

एक दिन पोदनपुर में महाराजा प्रजापति दोनों पुत्रों (विजय और त्रिपृष्ठ) सहित राजसभा में बैठे थे। उस समय मंत्रीने निवेदन किया-हे स्वामी ! आपकी प्रजा सर्व प्रकार से सुखी होने पर भी, आजकल एक महा-भयंकर सिंहने लोगों की हिंसा करके प्रजा को भयभीत कर दिया है। उसका उपद्रव इतना बढ़ गया है कि लोग इधर-उधर आ-जा भी नहीं सकते !

यह सुनते ही राजा को खेद हुआ कि-अरे ! खेत में अनाज की रक्षा हेतु बाँस का बिजू (बनावटी आदमी) हो उससे भी हिरन आदि प्राणी भयभीत होकर भागते हैं और फसल की रक्षा होती है; फिर मैं इतना पराक्रमी होकर भी अपनी प्रजा की रक्षा न कर सकूँ यह तो शर्म की बात है। जो प्रजा का दुःख दूर न कर सके वह राजा किस काम का ? -ऐसा विचार कर राजा ने सिंह को मारने के लिये सेना को तैयार होने की आज्ञान दी।

इतने में त्रिपृष्ठकुमार उठे और हँसकर बोले-पिताजी ! एक हिंसक पशु को मारने के लिये स्वयं आपको कष्ट उठाना पड़े, तो फिर हम किस काम के ? इतने छोटे से काम के लिये आपका जाना आवश्यक नहीं है। मैं अभी जाकर सिंह को मारता हूँ। ऐसा कहकर त्रिपृष्ठकुमार वन में गये। सिंह को गुफा से बाहर निकाला। एक हाथ से सिंह के अगले पंजे पकड़े और दूसरे हाथसे झपट मारकर उसे नीचे पछाड़ दिया; फिर जिस प्रकार बजाज कपडा फाडता है तदनुसार सिंह का मुँह फाड़कर उसको चीर दिया। [-मानो उस सिंह को मारने के क्रूर परिणामवश त्रिपृष्ठ को भी अगले भवों मे सिंह की पर्याय में जाना पड़ेगा। पाठक ! ऐसे पराक्रम की घटना मे वासुदेव को हिंसा में आनन्द माननेरूप ‘हिंसानन्दी-आर्त्तध्यान’ के जो क्रूर परिणाम वर्तते हैं वह उन्हें नरकगति का कारण होते है।]

सिंह को मारने से उन राजकुमार के पराक्रम की प्रशंसा चारों और फैल गई। तत्पश्चात् एक बार ‘कोटि शिला’ को ऊपर उठाकर उन्होंने महान पराक्रम किया। इस कोटिशिला से करोडो मुनिवरों ने मोक्ष प्राप्त किया है। साधारण मनुष्य उसे ऊपर नहीं उठा सकते; नारायण-वासुदेव ही उसे उठाते है। एक बार जो प्रथम तीर्थंकर का पौत्र था, वही जीव असंख्य वर्ष पश्चात् उन्ही के कुल में अवतरित होकर प्रथम नारायण-अर्धचक्री हुए। नौ नारायणों मे यह प्रथम नारायण, श्रेयांसनाथ तीर्थंकरके तीर्थ में हुए।

विद्याधरों के राजा ज्वलनजटीने अपनी पुत्री स्वयंप्रभा का विवाह त्रिपृष्ठ के साथ किया, तब उसके प्रतिस्पर्द्धी राजा अश्वग्रीव को अपमान लगा कि विद्याधरने श्रेष्ठ कन्या मुझे न देकर त्रिपृष्ठको क्यों दी ? इससे क्रोधित होकर वह त्रिपृष्ठ के साथ युद्ध करने चला। उधर त्रिपृष्ठकुमार ने भी युद्ध की तैयारी प्रारम्भ कर दी; उसके लिये वह विद्या सिद्ध करने लगा। दूसरों को जो बारह वर्षों मे सिद्ध होती हैं-ऐसी विद्याएँ त्रिपृष्ठको पुण्यप्रताप से मात्र सात दिन में सिद्ध हो गई। अहा, पुण्य द्वारा जगत में क्या साध्य नहीं है ? पुण्य से जगत में सब कुछ मिल जाता है, परन्तु चैतन्य का अतीन्द्रिय सुख उससे प्राप्त नहीं होता। इसलिये तो मुमुक्षु जीव कहते हैं कि-अरे, ऐसे हत्-पुण्य का हमें क्या करना है।

[अरेरे ! भावी तीर्थंकर ऐसे यह महात्मा वर्तमान मे हिंसा के हेतुभूत लौकिक विद्याएँ साधनेमे लगे हैं.. परन्तु अब कुछ ही भवपश्चात् वे अलौकिक आत्मविद्या साधेंगे तथा जगत के जीवों को भी उसे अलौकिक वीतरागी विद्या का बोध देंगे, और तब उनकी सच्ची वीरता विकसित हो उठेगी और वे ‘महा-वीर’ कहलायेंगे।]

शस्त्रविद्या साधकर दोनों भाइयों ने युद्ध के लिये प्रस्थान किया। घोर युद्ध प्रारम्भ हुआ। अश्वग्रीव और त्रिपृष्ठ दोनों शूरवीर योद्धा थे; युद्ध सम्बन्धी आर्त्तध्यान में इतने तल्लीन थे कि नरकगति के कर्म आत्मा में प्रविष्ट हो रहे हैं उसकी भी खबर नहीं रही। लाखों लोग आश्चर्य से, भय से तथा कुतूहल से युद्ध देख रहे थे। उनमें से कोई तो वैराग्य के परिणाम कर रहे थे कि अरेरे, तुच्छ जैसी बात के लिये यह लोग लड़ रहे हैं !..और कोई मूर्ख जीव युद्ध के आनन्द का-हिंसानन्दी रौद्रध्यान कर-करके व्यर्थ ही अशुभकर्म बाँध रहे थे। जीवों के परिणाम की भी विचित्रता है कि-एक ही प्रसंग पर भिन्न-भिन्न जीव भिन्न-भिन्न प्रकार के परिणाम करते हैं। इसलिये तो कहा है कि-"हैं जीव विधविध, कर्म विधविध, लब्धि है विधविध अरे !’ उसमें तू अपना कल्याण कर लेना, जगत की ओर देखने में मत रूकना।

युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व अश्वग्रीव विद्याधर के दूतने आकर त्रिपृष्ठ से धमकी भरे वचन कहे; तब उनका उत्तर देते हुए त्रिपृष्ठ ने कहा-हे दूत ! तेरे राजा को आकाश में ऊँचे उडने तथा विद्याधरपने का अभिमान होगा, परन्तु आकाश मे तो कौए भी उड़ते है, -उस मे क्या है ? याद रखना, कि-तीर्थंकर और चक्रवर्ती कभी विद्याधरो के यहाँ नही होते, वे तो भूमिगोचरी राजाओ के यहाँ ही होते है।

तब अश्वग्रीव के दूतने कहा -अरे, हमारे महाराज के पास दिव्यचक्र है, उनके प्रताप को क्या आप नही जानते ? सूर्यसमान तेजस्वी वह चक्र बडे-बडे शत्रुओ का छेदन कर देता है त्रिपृष्ठ ने उसे बोलते हुए रोककर कहा-हे दूत ! तू यहाँ से चला जा, अपने राजा की व्यर्थ प्रशसा मत कर, युद्ध मे उसकी परीक्षा हो जायगी। रणभेरी बज उठी दोनो ओर के योद्धा सावधान हो गये। जिस प्रकार मुमुक्षु जीव शुद्धोपयोग द्वारा मोह को नष्ट करने हेतु तत्पर होते है तदनुसार शूरवीर योद्धा शत्रु का घात करने हेतु तत्पर हो गये। सामने शत्रु खडे होने पर भी वे कुशल योद्धा गभीर एव शात दिखायी देते थे, क्योकि कुशल पुरुष आकुलता का प्रसग आने पर भी व्याकुल नही हो जाते अथवा मोहशत्रु का हनन करने मे तत्पर हुआ शूरवीर साधक स्वय शांत रहकर ही मोह को नष्ट कर देता है। जिस प्रकार गुरु उत्तम शिष्य को आत्मसाधना हेतु प्रोत्साहित करते है, उसी प्रकार राजा अपने सेनापतियो को प्रशसा द्वारा युद्ध के लिये उत्साहित कर रहे थे। जब गजमेवक बलदेव-वासुदेव के लिये कवच लाये तब अपनी शूरवीरता के अभिमान से उन्होने उसे पहिनने से इन्कार किया कि-‘शूरवीर को किसी अन्य का रक्षण कैसा ?’ -शुद्धोपयोग के सामर्थ्य से स्वयभू-सर्वज्ञ होनेवाले अरिहंतों को किसी अन्य साधन की कहाँ आवश्यकता होती है ?

त्रिपृष्ठ का पराक्रम अद्भुत था। जिस प्रकार सम्यक्त्व हेतु तत्पर मुमुक्षु योद्धा विशुद्धि के प्रहार द्वारा मिथ्यात्वशत्रु के तीन टुकडे कर देता है, तदनुसार त्रिपृष्ठने प्रथम प्रहार मे ही शत्रुसेना को तीन भागों में विभक्त कर दिया, जिस प्रकार आत्मसाधना हेतु कटिबद्ध हुआ शूरवीर साधक शरीर की भी परवाह नही करते उसी प्रकार विजय के लिये उन्मत्त योद्धा चारो ओर शस्त्र से बिधे हुए अपने शरीर की भी परवाह नही करते थे। अरे, खेद है कि वे योद्धा क्रोधावेशमे इस प्रकार निर्भयरूप से शरीर को तो छोड़ देते थे, परन्तु शरीर से भिन्न आत्मा का भेदज्ञान करने मे अपनी शक्ति नहीं लगाते थे। जितनी शक्ति वे युध्द मे लगा रहे थे उतनी आत्मसाधना मे लगाते तो कितना अपूर्व लाभ होता !

‘युद्ध मे जिनके साथ कोई वैर न हो ऐसे हाथी, घोड़े तथा सैनिकों को भी अरे, मात्र अपने स्वामी की प्रसन्नता के लिये मारना पड़ता है। धिक्कार है ऐसी पराधीन चाकरी को !’-ऐसा विचारकर अनेक योद्धाओंने इस युद्ध के बाद तुरन्त चाकरी छोड़ने का निर्णय कर लिया था। जिन्हें हिंसा नही रुचती थी ऐसे अनेक जीवों का चित्त युद्ध से उदास होनेपर भी युध्दकर रहे थे। कोई योद्धा युद्धभूमि में घायल होकर मरने की तैयारी मे हो, तब घायल करनेवाला योद्धा स्वयं ही उसे पानी पिलाता था और पंचपरमेष्ठी का नाम सुनाता था। इस प्रकार वे युद्धभूमि में ही वैरभाव को भूल जाते थे। घायल शत्रुपर कोई पुनः प्रहार नहीं करता था, अपितु उसे आश्वासन देते थे। ऐसे विभिन्न दृश्य युद्धभूमि में दिखायी देते थे।

विजय और त्रिपृष्ठ द्वारा अपने कितने ही शूरवीर विद्याधरों का नाश होते देखकर अश्वग्रीवने चक्र हाथ में लेकर गर्जना की; तब भावी महावीर ऐसे त्रिपृष्ठने निर्भयरुप से कहा-रे अश्वग्रीव ! तेरी गर्जना व्यर्थ है; जगली हाथी की गर्जना से हिरन डरते हैं, सिंह नही; कुम्हार के चाक जैसे तेरे इस चक्रसे मैं नही डरता…चला अपने चक्रको !

अन्तमें, अत्यन्त क्रोधित होकर अश्वग्रीवने वह चक्र त्रिपृष्ठ पर फेंका मानो चक्र के बहाने उसने अपना पुण्य ही फेंक दिया। भयंकर ज्वालाएँ छोड़ता एवं अत्यन्त गर्जन करता हुआ वह चक्र तीव्रगति से चला। दोनो सेनाओमे भयंकर हाहाकार मच गया। प्रथम तो जिसने अश्वग्रीव के पुण्य का ही छेदन कर दिया है ऐसा वह चक्र आश्चर्यपूर्वक त्रिपृष्ठ के दाएँ हाथपर आया, उसकी ज्वालाएँ शात हो गई, गर्जनाएँ रुक गई और वह त्रिपृष्ठ के आदेश की प्रतीक्षा करने लगा। तुरन्त वही चक्र क्रोधावेश मे त्रिपृष्ठ ने अश्वग्रीव पर फेका। (रे महात्मा ! यह हिंसक चक्र तुम्हारे हाथ मे शोभा नही देता; अब तुम धर्मचक्र के प्रवर्तक बननेवाले हो। तुम्हारा चक्र जीवों को मारनेवाले नही किन्तु तारनेवाला होगा।)

क्रोधपूर्वक त्रिपृष्ठ द्वारा छोडे हुए उस चक्रने अश्वग्रीव की ग्रीवा को छेद दिया और वे भरतक्षेत्र के प्रथम वासुदेव के रूप में प्रसिद्ध हुए। त्रिखण्ड का राज्य एव अपार विभूति होने पर भी सम्यक्त्व रहित वह जीव किंचित् सुखी नही था। भोगसामग्री मे तल्लीन ऐसा वह जीव दानादि धर्मको जानता नहीं था और सदा अति आरम्भ-परिग्रह में डूबा रहता था। अरे, विषयसमुद्रको पार करने हेतु नौका समान जो जैन शासन, वह तो आत्मा में ही शान्तिरूप शाश्वत सुख बतलाकर विषयों से सुखबुद्धि छुड़ाता है, -तो ऐसा ‘वीर-शासन’ प्राप्त करके ‘त्रिपृष्ठ जैसी मूर्खता’ कौन करेगा ? और विषयो की आग मे कौन जलेगा ? जिनोक्त धर्म की अवहेलना करके जो विषयों मे लुब्ध होता है-वह मूर्ख प्राणी हाथमे आये हुए अमृत को छोड़कर विषपान करता है। राग का नाश होने से आत्मा को जिस स्वाभाविक शान्तिरूप परम सुख की प्राप्ति होती है-क्या उसका अनन्तवाँ भाग भी विषयाध मोही जीवों को विषयों मे से प्राप्त होता है ?-नहीं। विषयरहित वीतरागभाव से ही जीव को शान्ति प्राप्त होती है।

त्रिपृष्ठ मरकर सातवें नरक में; विजय-बलभद्र मोक्ष में

(दो भाई-एक मोक्ष में, दूसरा नरक मे) त्रिपृष्ठ कुमार ने (अपने चरित्रनायक महावीर के जीव ने) विजय बलभद्रसहित त्रिखण्ड के राज्य का दीर्घकाल तक उपभोग किया। योग्य समयपर उनके पिता प्रजापति ने दीक्षा ग्रहण की और केवलज्ञान प्रगट करके निर्वाण प्राप्त किया। दूसरी ओर इष्ट एवं मनोज्ञ (-वास्व मे अनिष्ट एवं बुरे) विषयों में ही जिसका चित्त लीन है ऐसा वह त्रिपृष्ठ कुमार निदान बंध के कारण विषयों के रौद्रध्यान सहित निद्रावस्था मे ही मृत्यु को प्राप्त हुआ…और जिसका असंख्यात वर्षों का घोरातिघोर दुःख चिन्तन मे भी नही आ सकता ऐसे सातवें नरक में जा गिरा ! अरे रे ! एक-एक क्षणकी तीव्र विषयासक्ति के पापफल में वह जीव असंख्य वर्ष के महा भयानक दुःखों को प्राप्त हुआ।-ऐसे घोर दुःखफलवाले विषयसुखों को कौन सुख कहेगा ? उन नरकदुःखों का वर्णन भी जिज्ञासु को संसार से भयभीत कर देता है। अरे, ऐसे दुःख ?..उनसे बचना हो तो अज्ञान को छोड़कर आत्मज्ञान करना चाहिये. विषयों के प्रति वैराग्य करना चाहिये। यह महावीर का जीव पूर्वकाल में अज्ञानदशा से भवभ्रमण करता हुआ त्रिपृष्ठ वासुदेव जैसा महान अवतार प्राप्त करके भी विषय-कषायों में लीनतावश सातवें नरक में गया, -उससे ज्ञात होता है कि-अरे जीव ! विषय-कषाय कि जिन्हे मूर्ख-अज्ञानीजन ही सुख मान रहे हैं-उन्हें तू नरकसमान दुःख दाता जान और उनसे विमुख होकर चैतन्य के अतीन्द्रिय सुखो ही सच्चा सुख जानकर उसकी अनुभूति मे सलग्न हो। विषय-कषाय का कण भी दुःख है और चैतन्यानुभूति के कण मे भी महान सुख है ।

कहाँ अर्धचक्रवर्ती के त्रिखण्ड के राजवैभव की अनुकूलता .और कहाँ यह सातवें नरक की
प्रतिकूलता !

अपने भाई त्रिपृष्ठ की मृत्यु होने पर विजय बलभद्र छह मास तक उद्वेग मे रहे; पश्चात् वैराग्य प्राप्त करके जिनदीक्षा धारण की, और रत्नत्रयरूपी अमोघ-अहिंसक शस्त्र द्वारा समस्त कर्मों का क्षय करके मोक्षपद प्राप्त किया।

अरे, सदा साथ रहनेवाले दो भाई. उनमे से एकने तो वीतराग चारित्र द्वारा मोक्षसुख प्राप्त किया, और दूसरे ने विषय-कषायवश सातवे नरक के घोर दुःख पाये। यह जानकर हे भव्य जीवो ! तुम विषय-कषाय से विरक्त होकर वीतरागी चारित्र की आराधना करो ! ..अरे, जीवके परिणामो की विचित्रता तो देखो, कि-वही जीव पुनःनरक से निकलकर वर्तमान में मोक्ष में विराजमान है, और हम उसे ‘भगवान महावीर’ के रूप में पूजते हैं।

भगवान महावीर : पूर्वभव : सिंह होकर नरक में और पुनः सिंह

सातवे नरक मे, एक नारकी ने आकर भाले से उसकी आँखे छेद डाली, वह दुःख से चीत्कार करता उससे पूर्व ही एकसाथ कितने ही नारकियों ने उसके शरीर में भाले घोंप दिये; वह गिरा कि उसे उठाकर उबलते हुए लाल रसमें डालकर गला दिया। अरे, उसमे करोड़ों दुःखों का कौन वर्णन कर सकता है ?

बड़ी कठिनाई से छूटकर भावी तीर्थंकर ऐसे उस नारकी का जीव शान्ति की इच्छा से एक वृक्ष (सेमर वृक्ष) के नीचे गया, किन्तु तुरन्त ही ऊपर से तीक्ष्ण असिधारा समान पत्ते उस पर पड़ने लगे, और उसके हाथ-पैर आदि सर्व-अंग कटकर छिन्न-भिन्न होकर इधर-उधर बिखर गये। अरेरे ! मर जाऊँ तो यहाँ से छूटूँ ऐसा उसे लगा, किन्तु नरक में मृत्यु भी माँगने से नही मिलती। अरेरे, पापी को शान्ति कैसी ? एक क्षण मात्र कही चैन नही है ! इस प्रकार भयकर मरण वेदनाएँ सहते-सहते उस जीवने असख्य वर्ष बिताये।

ऐसे नरक के तीव्र दुःख भोगकर वह अर्धचक्री का जीव इस भरतक्षेत्र के विपुलसिंह नामक पर्वतपर क्रूरपरिणामी सिंह हुआ; अनन्तानुबंधी कषायसहित रौद्र ध्यान से रंजित उसका मन शान्तिरहित था। भूखा न हो तब भी बिनाकारण वह अनेक निर्दोष जीवोंका घात कर देता था। इस प्रकार जिसके रौद्र भावोंका प्रवाह अभी रुका नहीं है ऐसा वह निर्दय सिंह वहाँ से मरकर पुनः नरक में गया और फिर असंख्य वर्षोंतक वहाँ के तीव्र-असह्य दुःख उसने भोगे। उन दुःखों का कथन कैसे हो ? और कैसे सहे जायें ? वह तो भोगनेवाला ही भोगे और भगवान ही जाने !

ऐसे मिथ्यात्व-कषाय के दुःखों से अब बस होओ !..बस होओ ! जिनका वेदन अब इस जीव को तो कभी नहीं करना है, परन्तु जिन दुःखोंका वर्णन पढ़ते-लिखते हुए भी कँपकँपी आ जाती है-वे दुःख महावीर के जीवने अज्ञानवश अन्तिम बार भोग लिये। -बस अब फिर कभी वह जीव ऐसे दुःख मे नहीं पड़ेगा। नरक की यह उसकी अन्तिम पर्याय है; अब नरकको तिलांजली देकर वहाँ से बाहर निकलकर वह पुन सिंह हुआ। उसकी यह सिंहपर्याय (और तिर्यंच पर्याय भी) अन्तिम है, अब फिर वह जीव कभी तिर्यंचगतिमे अवतरित नही होगा।

इस प्रकार महावीर के जीवने नरक और तिर्यंच इन दोनों गतियों मे परिभ्रमण का अन्त तो किया। अब शेष रही देव और मनुष्य पर्यायों का भी अन्त करके वह जीव अपूर्व सिद्धपद की साधना किस प्रकार करता है-उसकी सरस आनन्दप्रद अब प्रारम्भ होगी। अभी तक तो वह जीव अज्ञान एवं कषाय वश ससार मे कहाँ-कहाँ भटका और कैसे-कैसे दुःख भोगे उसकी कथा थी-बधन की कथा थी; परन्तु अब वह जीव किस प्रकार धर्म प्राप्त करता है, आराधक बनकर कैसी शान्तिका वेदन करता है और मोक्ष सुख साधकर कैसे भगवान महावीर बनता है। -उसकी सुन्दर आन्ददायक धर्मकथा पढ़कर प्रसन्नता होगी। दुःख में तो ग्लानि होती ही है, परन्तु दुःख की कथा पढ़कर भी जीव थक जाता है। महावीर के जीव की दुःखद कथा का अन्त हुआ; अब उसकी सुखद कथा का प्रारम्भ होगा।

सिंह के भवमें सम्यक्त्वप्राप्ति

अपने चरित्र नायक का जीव नरक से निकलकर एक बलवान सिंह हुआ। दसवे भव मे जो तीर्थंकर होनेवाला है ऐसा वह सिंह भरतक्षेत्र के एक पर्वतपर रहता था; वनके विशाल हाथी भी उससे डरते थे, उसके विकराल मुँहसे भयानक गर्जना सुनकर वनके पशु काँप उठते थे। क्रूरता से हिंसा करते-करते उसे दीर्घकाल व्यतित हो गया था। एक बार अमितकीर्ति और अमितप्रभ नामके दो मुनिवर आकाशमार्ग से जाते हुए वहाँ सिंह को प्रतिबोध देने हेतु उतरे। अचानक ऐसे शांत मुनिवरों को अपने समक्ष खड़ा देखकर सिह को विस्मय हुआ। एक ओर मरा हुआ हिरन पड़ा है, सामने चेतनवंत मुनिवर खड़े हैं। सिंह ने दोनों की ओर देखा-एक ओर महान हिंसा, दूसरी ओर परम शान्ति ! (एक ओर आस्रव एवं बधतत्त्व, दूसरी ओर संवर-निर्जरा तत्त्व।) विरुद्ध दृश्य एवं भाव देखकर वह क्षणभर तो विचार मे पड़ गया। अन्त में क्रूरता पर शान्ति की विजय हुई; उसे क्रोध की अपेक्षा शान्ति अच्छी लगी। वीतरागता के सान्निध्य में क्रूरता कैसे टिक सकती थी ? मुनियों की ओर देखकर उसे अंतर में नवीन शांतभाव जागृत होने लगे- ‘अहा, ऐसी शान्ति !’ जीवन मे प्रथम बार ही अपने अंतरमें ऐसे शांत परिणामों से सिंह को आश्चर्य होने लगा।

उस समय उसकी सुन्दर चेष्टा देखकर अमितकीर्ति मुनिराज वात्सल्यपूर्ण वचनों से उसे सम्बोधने लगे-हे मृगेन्द्र ! ऐसी क्रूर सिंह पर्याय तुमने कही प्रथम बार धारण नहीं की है, ऐसी तो अनंत क्रूर पर्यायें धारण कर-कर के अज्ञान से तुम संसार वनमें भटक रहे हो। यह ज्ञान-लक्षण संयुक्त जीव अनादि-अनन्त है; वह अपने परिणामों का कर्ता होकर उनके फल का भोक्ता होता है; अभी तक तुमने अज्ञान वश कषायभाव ही कर-करके उनके फलरूप दु.खो को भोगा है। अब, उस मिथ्याबुद्धि को तथा कषायभावों को तुम छोडो और आत्मज्ञान करो। अब तुम्हारे हित का अवसर आया है।

सिंह बड़ी आतुरता से मुनिराज के वचन सुन रहा है।

दूसरे मुनिराज भी प्रेमपूर्वक कहने लगे-अरे वनराज ! तुम्हारे महान भाग्य से तुम्हे मुनिराज का उपदेश मिला है; तो पात्र होकर तुम अवश्य सम्यक्त्व को अंगीकार करो ! सम्यक्त्व ही परम कल्याणकारी है।

सिंह मानो पश्चाताप मे अपने पूर्वभव पूछ रहा हो इस प्रकार टकटकी लगाकर मुनिके समक्ष देखने लगा ! तब मुनिराजने उसके वासुदेव आदि पूर्व भवों का वृत्तान्त सुनाया।

श्री मुनिराज के मुख से झरती हुई परम वैराग्यवाणी मे अपने पूर्वभवो का वर्णन सुनकर सिंह के परिणामों मे महान परिवर्तन होने लगा, उसे जातिस्मरण हुआ और समस्त दुखो के कारणरूप मिथ्यात्व-कषायो से उसकी परिणति पराङ्मुख होने लगी। वाह रे वाह ! धन्य सिंह-शार्दूल ! अब तेरा चैतन्यपराक्रम जागृत होने लगा है। सचमुच हिंसा मे पराक्रम नही है, अहिंसा एवं शान्ति मे ही सच्चा पराक्रम है।

मुनिराज कह रहे है-हे भव्य ! हम तुम्हे एक विशेष सुखदायी बात बतलाते है सो सुनो !-अब इस भवमे तुम्हारा आत्मा सम्यक्त्व प्राप्त करके आत्मा की अखण्ड साधना करेगा और क्रमश उन्नति करते-करते पूर्णता साधकर इस भरतक्षेत्र मे चौबीसवाँ तीर्थंकर बनेगा। यह बात हमने विदेहक्षेत्र मे सीमंधर स्वामी के श्रीमुख से सुनी है; इसीलिये हमे तुम्हारे प्रति स्नेह जागृत हुआ है।

आहा ! सिंह का भव्य आत्मा यह सुनते ही हर्षपूर्वक नाच उठा वाह ! मेरा आत्मा अब इन भयंकर दुःखों से तथा हिंसासे छूटकर अपूर्व सुख प्राप्त करेगा ! दुःख से छूटने की बात सुनकर कौन आनन्दित नही होगा ?. और मुनियों ने वात्सल्य प्रगट किया उसमे तो वह अति आह्लादित हो उठा-अहा, मुनिवर मुझे सम्यक्त्व प्राप्त कराने आये हैं ! मुझपर कृपा करके वे आकाश मार्ग से उतरकर मुझे प्रतिबोध देने आये है ! वाह ! तीर्थंकर के श्रीमुख से मेरे भावि तीर्थंकरत्व की मंगलवाणी निकली ! मुझ जैसा भाग्यशाली कौन होगा ? इससे उत्तम मंगल और क्या होगा ! बस, सिंह तो सब भूल गया और अंतर चैतन्य की महिमा में इस प्रकार निमग्न होने लगा मानो वर्तमान में ही तीर्थंकर बन गया हो ! उसकी परिणति में कषाय से भिन्न शांति की तरंगे उठने लगी, उसका अंतर वैराग्य से उछलने लगा, परिणति कषाय से भिन्न होकर चैतन्यशान्ति का वेदन करने हेतु अन्तर्मुख हो गई, उसके परिणाम विशुद्ध होने लगे। इस प्रकार भावी तीर्थंकर ऐसा वह सिंह का आत्मा उपयोग की एकाग्रता से सम्यक्त्व-ग्रहण की ओर झुक रहा है। अपना शान्त चैतन्यतत्त्व देखने पर ही उसका लक्ष है। आँखें मूँदकर ज्ञानको स्थिर करके निजस्वरूप को देखने के लिये उसका उपयोग उत्सुक हो रहा है। बस, अब अधिक देर नहीं है।

श्री मुनिराज उसे शुद्धात्मा की देशना दे रहे हैं-भो भो भव्य ! तुम एकाग्रचित्त से सुनो ! यह जीव अनादि-अनन्त सदा उपयोग स्वरूप है, चेतनरूप द्रव्य से-गुण से-पर्याय से शुद्धोपयोगी जैसे अरिहंत है, परमार्थतः यह आत्मा भी वैसा ही उपयोगस्वरूप है;-ऐसे आत्मा को तुम अनुभव में लो..तुम्हे महाआनन्दरूप सम्यक्त्व होगा और परम शान्ति के वेदनरूप तुम्हारा आत्मा इस भवदुःख से छूट जायगा।

श्री मुनिराज जो कह रहे हैं उसे ‘श्रवण’ करने की अपेक्षा वैसे भावों के ‘वेदन’ के प्रति अब सिंह का उपयोग विशेष कार्य कर रहा है। सम्यक्त्व के लिये आवश्यक तीन करणों की विशुद्धता उसे होने लगी है…राग से हटकर उसका उपयोग अब अतीन्द्रिय शान्ति की ओर जा रहा है…आहा ! ऐसा अद्भुत शांत मेरा आत्मा ! -ऐसे अंतर वेदन में उसे अपूर्व शान्ति प्रगट होती जा रही है.. शान्ति के समुद्र में उपयोग अधिकाधिक गहराईमें उतरता जा रहा है…मुनिवर तो आश्चर्य से सिंह का हृदयपरिवर्तन देखते ही रह गये। इतने में, सिंह की परिणति ने चैतन्यरस की प्रबलता से कोई ऐसी छलाँग लगाई कि कषायों से पार जाकर चैतन्य के अतीन्द्रिय भाव में जा पहुँचा और शांतरस के समुद्र में निमग्न हो गया…उसे निज परमात्मा का सम्यक्दर्शन प्रगट हुआ। अहा, उस क्षण के आनन्द का क्या कहना ! सम्यक्त्वरूपी सिंहने मिथ्यात्वरूपी उन्मत्त हाथी को भगा दिया, और मोक्षसाधना का शौर्य प्रगट किया। (देखो, चैतन्य सरकस पृष्ठ ३९१)

उसकी अपूर्व शान्तिमय चेष्टा से मुनिराज उसकी स्थिति समझ गये। चैतन्य की ऐसी अपूर्व शक्ति देखकर क्षणभर वे भी निर्विकल्परस में निमग्न हो गये।

वाह ! इधर मुनिवर ध्यान में लीन होकर बैठे है, सामने सिंह भी निर्विकल्प होकर सम्यक्त्वप्राप्ति के धन्य क्षण का अपूर्व आनन्द ले रहा है वाह रे वाह ! धन्य गुरु ! धन्य शिष्य ! धन्य निर्विकल्पता का आनन्दोत्सव !

क्षणभर के लिये सारा वन प्रदेश स्तब्ध रह गया .वह भी मानो निर्विकल्पता मे झूलने लगा। वनके जो पशु पहले भयभीत होकर भागते थे वे भी सिंह की नवीन शांत चेष्टा देखकर आश्चर्य से स्तम्भित हो गये। कुछ देर बाद जब सिंह ध्यान से बाहर आया और मुनिवरो की ओर देखा, तथा मुनिवरों ने भी मधुर दृष्टि से देखकर उस सम्यग्दृष्टि सिंह की पीठपर हाथ रखा, तब उसकी आँखों में आँसू भर आये थे..वे आँसू दुःखके नहीं किन्तु हर्ष के थे। अगले पाँवोंरुपी दो हाथ-जोड़कर मुनियों की वन्दना करता हुआ वह सिंह मानो उपकार व्यक्त कर रहा था। वहाँ भाषा भले ही नहीं थी, परन्तु भावों द्वारा वह मुनिराज की अपार भक्ति कर रहा ता ‘अहो मुनिराज ! आपके प्रताप से यह आत्मा भवदुःख से छूटकर ऐसे अपूर्व आत्मानन्द को प्राप्त हुआ !’ और जब मुनिराज ने उसके मस्तक पर हाथ रखकर आशीर्वाद देकर वात्सल्य प्रगट किया तब तो मानो वह कृतकृत्य हो गया। अहा ! मोक्षगामी मुनिवरों का हाथ जिसके मस्तक पर फिरा और आशीर्वाद मिला उस भव्य के हर्षानन्द का क्या कहना ? उसके तो भव के फेरे टल गये…और मोक्ष की बारी आयी ! मुनिराज ने कहा-हे सिह ! तुम सम्यग्दर्शन पाकर धन्य हुए हो; अब तुम्हारे मिथ्यात्वजन्य पाप धुल गये; तुम मोक्ष के साधक बने। वाह ! तुम्हे देखकर हमें वात्सल्य भाव आता है।

सिंह का अंतर भी आनन्द से नाच उठा, उसने खड़े होकर मुनिराज के चरणों में मस्तक झुकाया और धीरे-धीरे चलकर उनकी प्रदक्षिणा करने लगा। वाह रे सिंह ! तुझे भी ऐसी अद्भुत भक्ति करना आ गया !! ‘यह तो अंतर के सम्यक्त्व का प्रताप है।’ अहो ! उस सिंह की भक्ति-चेष्टा ही उसके सम्यक्त्व प्राप्ति के परम उल्लास को प्रगट कर रही थी।

अंतर में उसने अनुभव किया कि-अहा ! यह क्रोध तथा यह सिंहपर्याय मैं नहीं हूँ; मेरा आत्मा तो उनसे भिन्न, सदा ज्ञानदर्शन-आनन्द स्वरूप है। अरेरे, यह हिंसा और यह मांसभक्षण मुझे शोभा नहीं देता। मेरा चेतनतत्त्व तो सुन्दर शांत स्वरूप है। सम्यग्दर्शनरुप अति गहरी चैतन्य-कन्दरा मे जाकर, उपशांत भावरूप तीक्ष्ण पंजों से मैंने मिथ्यात्व एवं कषायों रूप मदोन्मत्त हाथी को मार दिया है; अब विशेष शुद्धोपयोग की दूसरी छलाँग लगाकर मैं संयम के पर्वत पर चढ़ जाऊँ-उसीमें मेरा सच्चा शौर्य-शार्दूलपना है। वाह ! श्री मुनिराज के श्रीमुख से झरते हुए जिनवचन समान उपकारी इस संसार मे दूसरा कोई नहीं हैं। जिसका कभी बदला नहीं दिया जा सके ऐसा महान उपकार सम्यक्त्व देकर इन मुनिवरों ने मुझपर किया है। -ऐसा सोचकर अगले पैरों के पंजों द्वारा बारम्बार हाथ जोड़कर, मस्तक से लगाकर वह नमस्कार करने लगा; उसका चित्त अति प्रशांत हो गया; उसे संसार से निर्वेद और मोक्षमार्ग के प्रति संवेग हुआ।

श्री मुनिराज ने पुनः कहा-हे सिंह राज ! हे धर्मात्मा ! अपूर्वभाव से सम्यग्दर्शन प्राप्त करके अब तुम परमशांत भाव द्वारा क्रोध-मान-माया-लोभका भी निवारण करना; उपसर्ग या परिषहों से डरे बिना उन्हे शूरवीरतासे सहन करना। वीतरागी पंच परमगुरुओं को सदा हृदय में रखकर उनकी महिमा करना। सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान के प्रताप से तुम्हारे पापकर्म नष्ट हुए हैं, तथा प्रशम-संवेग-निर्वेद तथा अनुकम्पा के विशुद्ध परिणामों से तुम्हारा आत्मा उज्ज्वल बना है। अनादि से कर्म के आस्रव-बन्ध में वर्तते हुए तुम्हारे आत्मा को अब कर्मों के संवर-निर्जरा प्रारम्भ हुए हैं। अहा ! मोक्ष के मार्ग में आकर तुम धन्य हुए हो; अब निरन्तर ऐसा सुन्दर जीवन जीना ताकि तुम्हारे अंतर की विशुद्धता वर्धमान होती रहे। हे भव्य शार्दूल ! अब तुम्हारी आयु मात्र एक मास शेष है। आनेवाले दसवें भवमें तुम भारतवर्ष में जगदोद्धारक जिनेश्वर महावीर बनोगे।-यह बात हमने ‘कमलाधर’ (लक्ष्मीधर, श्रीधर अथवा सीमंधर) जिनेन्द्र के श्रीमुख से सुनी है। -इस प्रकार मुनिवरों ने अत्यन्त वात्सल्य से सिंह को सम्बोधन किया। वाह ! देखो ता सही, जिस प्रकार मनुष्य के साथ बातें करते हों तदनुसार मुनिराज सिंह के साथ बात कर रहे हैं और महाभाग्यवन्त सिंह भी मनुष्य की भाषा समझ रहा है। अहा, जिसके सम्बोधन को आकाश से मुनिराज उतरे हों और जिनेश्वर देव की वाणी में जिसके तीर्थंकरत्व की घोषणा हुई हो-उसकी पात्रता का क्या कहना ! वाह रे वाह ! वनराज ! अब तो तुम ‘जिनराज’ हो।

श्री मुनिवर की बात सुनकर तथा अपनी आयु अब मात्र एक मास शेष जानकर सिंह को परम वैराग्य हुआ। बोधिलाभ का जिसे महान आनन्द है और संसार से जिसका चित्त सर्वथा विरक्त हुआ है-ऐसे उस सिंहने साधकभाव का शौर्य जागृत किया; मुनिवरों के समक्ष उसने बोधिसहित समाधि-संल्लेखना धारण की; आहार-जल का सर्वथा त्याग करके संलेखना धारण की; आहार-जल का सर्वथा त्याग करके अनशनव्रत अंगीकार किया। वाह रे सिंह ! तुम्हारा सच्चा शौर्य जागृत हो उठा ! [पाठक आत्माओ ! क्षणभर पहले जो मांसाहारी क्रूर सिंह था वह कुछ ही समय पश्चात् चैतन्य की आराधना का शौर्य प्रगट करके कैसा शांत हो गया है ! उसका वर्णन पढ़ते हुए भी हमें उसके प्रति प्रेम उमड़ता है। हम सबके आत्मा में भी चैतन्य का ऐसा शौर्य विद्यमान है; सिंह समान वीर बनकर उस शौर्य को जागृत करो। महावीर का मार्ग वह चैतन्य के शौर्य का मार्ग है; उस मार्ग की साधना हेतु वीर बनो…महान वीर बनो !]

प्रशमरस में रत हुआ सम्यग्दृष्टि सिंह विचारता है कि-अहा, मुझे प्रतिबोध देने हेतु ही यह मुनिराज करुणा करके यहाँ पधारे हैं मुझपर अचिंत्य उपकार किया है। मेरे पास तो ऐसा कुछ नही है कि मैं इनकी सेवा करूँ ! मेरी यह पर्याय ऐसी नहीं है कि मैं उन्हें आहारदान दे सकूँ। मुनिवर तो अत्यन्त निःस्पृह होते हैं। -इस प्रकार उपकार का चिंतवन करता हुआ सिंह बारम्बार मुनिवरों के चरण में मस्तक झुकाने लगा…और भक्ति के जल से उनके पग धोता हो ! इस प्रकार उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

सिंह को प्रतिबोध देने का अपना प्रयोजन पूर्ण हुआ-ऐसा समझकर वे मुनिवर वहाँ से प्रस्थान की तैयारी करने लगे…मधुर दृष्टि से सिंह की ओर देखकर धर्मवृद्धि का आशीर्वाद देकर तथा उसके अयाल पर पीछी फेरकर वे मुनिवर आकाशमार्ग से विहार कर गये।

सिंह अश्रुभीगी आँखों से अत्यन्त प्रेमपूर्वक दूर-दूर तक देखता ही रहा…अहो, मुझे भवसमुद्र से पार करने वाले मेरे उपकारी गुरु आकाशमार्ग से चले जा रहे हैं ! कुछ देर में मुनिवर अदृश्य हो गये, तथापि मानो अब भी उनका पवित्र हाथ अपने मस्तक पर फिर रहा हो। -इस प्रकार वह उनके गुणचिन्तन में लीन रहा।

सिंहराज का जीवन आज पलट गया; उसका आत्मा मानो सम्पूर्ण नवीन बन गया; उसका अंतर क्रूरता के बदले शांतरस में सराबोर हुआ, उसकी चेतना परभाव से छूटकर शांत चैतन्यरस में निमग्न होकर शोभा देने लगी। मुनिराज के जाने से उसका चित्त व्यथित हुआ। अरे, ऐसे उपकारी सत्पुरुष के विरह में कौन व्यथित नहीं होगा ?

अन्तमें, चैतन्य की साधनामय उत्तम जिनकी चेष्टाएँ हैं-ऐसे उस मृगराजने चैतन्य की अद्भुतता के चिन्तन में अपना चित्त लगाकर, पुनः निर्विकल्प उपयोग द्वारा हृदय से मुनि-वियोग का शोक दूर किया और साथ ही हिंसादि पाँचो पापो को भी दूर भगा दिया। व्रतधारी उत्तम श्रावक होकर उसने अनशन पूर्वक संल्लेखनाव्रत धारण किया और श्री मुनिवरो के पवित्र चरणों से पावन हुई निर्दोष शिला को तीर्थरुप मानकर उस पर ‘सल्लेखना-मरण’ रूप समाधि लगायी।

पाषाण-शिलापर वह एक ही करवट सोता रहता और किंचित् हलन-चलन नही करता था। उसने अपने आत्मा को चैतन्यस्वभाव में तथा पंचपरमेष्ठी के गुणचिन्तन में लगा दिया। उसकी लेश्या और अधिक शुद्ध होने लगी, कषाय बिलकुल शांत हो गये। ग्रीष्म की अति उष्ण वायु से उसका शरीर सूख रहा था, सूर्यकी प्रखर किरणे उसे जला रही थीं, तथापि उसके मनमे कोई क्लेश नहीं था। ऐसे तीव्र ताप में उसने जलका त्याग कर दिया था। अंतर मे चैतन्य का शांत रस उसके भवताप को शीतल कर रहा था, फिर बाह्य जल की क्या आवश्यकता थी ! ‘मैं चलूँ-फिरूँगा तो वनके जीव मुझे जीवित समझकर भयभीत होगे’-ऐसा सोचकर वह चलता-फिरता नहीं था। उसे निश्चेष्ट पड़ा देखकर ‘यह सिंह मर गया है’- ऐसा मानकर मदमस्त हाथी उसके अयाल को नोंच डालते थे, तथापि मोक्ष के इच्छुक ऐसे मुमुक्षु-सिंहने तो सहनशीलता ही धारण कर ली थी। अरे, जिसकी एक गर्जना से हाथियो की टोली दूर भागती थी, वह हाथियों का शत्रु आज आराधना रुपी टकार से कर्मरूपी हाथी को दूर भगा रहा था। वाह रे सिंह भाई ! धन्य है तुम्हारी आराधना !

शरीर से भिन्न चेतन्यतत्त्व को जानकर जिसने शरीर का ममत्व सर्वथा छोड़ दिया है-ऐसे उस सिंहराज ने एक महीने तक धैर्यपूर्वक क्षुधा-तृषा सहन किये; काया के साथ कषाय भी क्षीण हो रहे थे; जिनमार्ग की आराधना मे उसका उत्साह बढ़ता जा रहा था। अहा, उस वनराज की शांत चेष्टाओं से प्रभावित होकर वनके हिरन, खरगोश और बन्दर आदि प्राणी भी निर्भय होकर उसके पास बैठने लगे और उसका आश्चर्यकारी परिर्वतन देखने लगे।

प्रशम-शान्ति की गहरी कन्दरामे रहे हुए उस वनराज को बाह्य उपद्रव कोई बाधा नहीं पहुँचा सके। उसे मरा हुआ मानकर गीधड़ और लोमड़ी जैसे तुच्छ जंगली प्राणी भी उसे नाखूनों से चीर-चीर कर खाने लगे, गिद्ध और कौए भी चोंच मार-मारकर चींथने लगे, तथापि उसने अपनी समाधि भंग नहीं की और न उन प्राणियों को भगाने का प्रयत्न किया। अहा, क्षमावान जीवों को कौन डिगा सकता है !

इस प्रकार उज्ज्वल परिणामी और आराधना में शौर्यवान-ऐसा वह वनराज आराधनासहित शरीर का त्याग करके उसी क्षण सौधर्म स्वर्ग के मनोहर विमान मे हरिध्वज (सिंहकेतु) नामक देव हुआ।

भगवान महावीर (पूर्वभव-१०) सौधर्मस्वर्ग में सिंहकेतु देव

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भगवान महावीर (भाग ३)

सिंहपर्याय मे सम्यक्त्व प्राप्त करके, सल्लेखनासहित समाधि मरण करके सौधर्मस्वर्ग में हरिध्वज देवरूप से अवतरित हुए अपने चरित्रनायक को देखते ही स्वर्ग के देव जयजयकार करने लगे। मंगलवाद्य बजने लगे, देव-देवांगनाओ ने जिनेन्द्रपूजन सहित मंगल उत्सव किया। अहो, सम्यक्त्वसहित विशुद्धिका फल अद्भुत है ! उस हरिध्वज अथवा सिंहकेतु देवने अवधिज्ञान द्वारा जान लिया कि-मै पहले सिंहपर्यायमें था और दो मुनिराजो ने प्रतिबोध देकर मुझे धर्म प्राप्त कराया; उन्हीं के प्रताप से मैं यहाँ उत्पन्न हुआ हूँ, मुझपर उनका महान उपकार है। इस प्रकार मुनिराजों के उपकार का चिन्तवन करता हुआ वह देव अत्यन्त भक्तिपूर्वक मुनिवरों के पास आया और कल्पवृक्ष के अचेतन दिव्यपुष्पो द्वारा उनके चरणो की पूजा करके बोला- हे प्रभो ! एक मास पूर्व आपने जिस सिंह को प्रतिबोध दिया था वही मैं हूँ, समाधिमरण करके मै सिंह से सौधर्मस्वर्गका देव हुआ हूँ और आपके उपकार का स्मरण होने से आपके दर्शन करने आया हूँ। हे प्रभो ! आपके प्रसाद से तीनलोक मे श्रेष्ठ चूड़ामणिसमान सम्यक्त्व प्राप्त करके मै कृतकृत्य हुआ हूँ साधुजनो का सत्सग किसे हितकर नही होता ? ऐसा कहकर उसने अत्यन्त भक्तिपूर्वक मुनिराज के चरणों की रज अपने मुकुट पर चढ़ायी-मानो कोई अमूल्य निधान चढ़ा रहा हो !

एक ओर वह देव पूजा-भक्ति की विधिसहित मुनिवरों की प्रशंसा कर रहा है, उधर मुनियो का लक्ष तो अपने चैतन्य की ओर ही स्थिर है। देव क्या कर रहा है, उसका उन्हे लक्ष नहीं है, वे तो निन्दा-प्रशंसा मे समताभाव रखकर शुद्धोपयोग द्वारा चैतन्य के ध्यान मे लीन होकर क्षपक श्रेणी पर चढ़ रहे हैं शीघ्रतापूर्वक एक पश्चात् एक-आठवे, नौवे, दसवें गुणस्थानपर चढ़ते हुए मोहकर्मका नाश कर रहे हैं। अभी वह हरिकुमार देव मुनिवरों के समक्ष खडा-खड़ा उनकी भक्ति कर रहा है कि-इतने मे मोहका सर्वथा क्षय करके, क्षायिकभावपूर्वक उन मुनिवरों ने केवलज्ञान प्रगट किया। अहा, आनन्दमय महान उत्सव हुआ, चारों ओर दिव्यता फैल गई ! अपनी उपस्थिति मे ही अपने परमगुरुओ को केवलज्ञान होता देखकर ‘हरि’ तो परम आनन्दसहित नाच उठा ! अहो ! सर्वज्ञपरमात्मा का साक्षात्कार होने से हरि को जो आनन्द हुआ उसका क्या कहना !! अत्यन्त हर्षोल्लासपूर्वक केवलज्ञान का मगल-उत्सव, तथा उन दोनों केवली भगवन्तों की पूजा एवं दिव्यध्वनिका श्रवण करके वह हरिकुमार देव सौधर्म स्वर्ग चला गया।

जिसके अंतर मे सम्यक्त्वरूपी महान सम्पदा विद्यमान है-ऐसे उसी देवका चित्त स्वर्ग की दैवी सम्पदा में भी आकर्षित नहीं होता। बारम्बार स्वर्ग से धरतीपर आकर सर्वज्ञपरमात्मा की भक्ति एव बहुमान पूर्वक शुद्धात्मा का श्रवण करके अपनी स्वानुभूति को पुष्ट करता है। इसप्रकार भगवान महावीर के जीवने अखण्ड आराधना पूर्वक सौधर्म स्वर्ग में असंख्य वर्ष व्यतीत किये।

भगवान महावीर (पूर्वभव ९ तथा ८) कनकध्वज राजा, और आठवें स्वर्गमें

स्वर्ग से च्यवकर वह हरिध्वज (सिंहकेतु) देव, विदेहक्षेत्र में कनकप्रभ राजा का पुत्र हुआ; उसका नाम कनकध्वज। युवा होनेपर पिताने उसे राज्य सौंपकर दीक्षा ले ली। अपने चरित्रनायक राजा कनकध्वज एकबार सुदर्शन वनमें यात्रा करने गये। सुन्दर वृक्षों और फल-फूलों से भरे हुए उद्यान की शोभा निहारते हुए आगे बढ़े कि एक बड़ी शिलापर छोटे-से किन्तु महान तेजस्वी मुनिराज को ध्यान में बैठे देखा-अहा, कितनी अद्भुत थी उनकी मुद्रा ! अंतरंग अतीन्द्रिय शान्ति एक ही जीव सिंह के भवसे पूर्व-१. नरक मे निरन्तर, भूख-प्यास की भयकर पीड़ा तथापि अनाज का एक कण या पानी की एक बूँद भी नही मिलती। २. नरक में धधकती हुई लोह पुतलियों के साथ जबरन् लिपटाकर अग्नि मे जलाते हैं। ३. नरक मे धधकती वैतरणी नदी की अति दुर्गन्ध। ४ नरक में वृक्ष (सेमरवृक्ष) ऐसे हैं कि जिनकी छाया में बैठने से उसके तलवार जैसे पत्तों से शरीर विध जाता है। ५ नरक में तीर्थंकर या मुनिवरों के दर्शन का सदा अभाव सिंह के भव के पश्चात्-१. स्वर्ग मे दो हजार वर्ष में आहार की इच्छा होती है और कण्ठ में अमृतका स्वाद आता है। २ स्वर्ग मे सुन्दर देवागनाएँ है जिन्हे स्नेहसे आलिगन करते है। ३. स्वर्ग में अमृत के सरोवर में सुगन्धित जल मे स्नान। ४. स्वर्ग मे ऐसे कल्पवृक्ष है जो अनेक प्रकार की वांछित दिव्य भोग सामग्री देते है। ५ स्वर्ग मे जब भी इच्छा हो तब तीर्थंकर प्रभु के समवसरण में जा सकते है।

[दोनों का भोक्ता एक ही जीव; बीच में कुछ ही वर्षों का अंतर] कहाँ वे पाप के फल और नरक के दुःख ! कहाँ यह पुण्यफल और स्वर्ग के सुख ! शास्त्रकार कहते हैं कि-दोनों संयोग से आत्मा भिन्न है; पुण्य-पाप दोनों कर्मों से आत्मा भिन्न; तथा उनके कारणरूप शुभाशुभ परभावों से भी भिन्न; ऐसे ज्ञानस्वरूपी आत्मा की अनुभूतिरूप ज्ञान चेतना से ही मोक्षसुख की प्राप्ति एवं भवदुःख से छुटकारा होता है। [अपने चरित्रनायक का जीव ऐसी ज्ञानचेतना प्राप्त करके स्वर्ग में हरिकेतु देव हुआ है; अगले भव का वर्णन अब पढ़ेंगे।]

की दिव्य झलक उनकी मुद्रा पर दृष्टिगोचर होती थी। राग-द्वेष को नष्ट करके वीतरागता द्वारा वे सुशोभित हो रहे थे। क्षमा को एक क्षण भी विस्मरण नहीं करते थे। उनके रत्नत्रय के प्रभाव से आसपास के वृक्ष भी फल एवं पुष्पाच्छादित हो उठे थे।-ऐसे मुनिराज को देखकर कनकध्वज ऐसे प्रसन्न हुए जैसे उन्हें किसी अपूर्व निधान की प्राप्ति हुई हो।

अत्यन्त हर्ष से जिनका रोम-रोम उल्लसित हो रहा है-ऐसे उन राजाने मुनिराज के चरणों में नमस्कार किया और अति अनुरागसहित उनके समीप बैठ गये। मुनिराजने शांत दृष्टि से राजा को देखा और ‘राजन् ! धर्मवृद्धि हो !’ ऐसे आशीर्वचनों द्वारा उन पर परम अनुग्रह किया। अहा, धर्मात्मा को देखकर मुनिवर भी प्रसन्न होते हैं ! मुनिराज बोले-हे महाभाग ! तुम सम्यक्त्वरूपी मुकुट से तो अलंकृत हो, अब उस पर चारित्ररूपी कलगी चढ़ाओ !

मुमुक्षु राजा को स्वयं भी चारित्र की भावना तो थी ही; उसमें मुनिराज की प्रेरणा मिलने से उन्हें अत्यन्त उल्लास हुआ। अति वैराग्यपूर्वक हाथ जोडकर बोले-हे प्रभो ! यह जीव ससार में अनंतबार पंचपरावर्तन कर चुका है, अब उस परावर्तन से बस होओ ! श्रुतज्ञान के सारभूत एसी चारित्रदशा को मै आज ही अंगीकार करूँगा।- ऐसा कहकर राजाने उसी समय चारित्रदशा अंगीकार कर ली; मुनि होकर शुद्धोपयोग द्वारा आत्मा को ध्याने लगे। -ठीक ही है, कि-महापुरुष अपने हितकार्य को सिध्द करने मे विलम्ब नही करते। ‘कनक’ को छोड़कर जिन्होने ‘सुन्दर रत्न’ ग्रहण किये हैं ऐसे वे मुनिराज कनकध्वज मुनिसंघ मे अति सुशोभित होने लगे; वीतरागभाव द्वारा अनेक परिषह सहने लगे। अन्त में चार आराधना के अखण्ड पालनपूर्वक आयु पूर्ण करके आठवे स्वर्ग में गये ।

वे धर्मात्मा स्वर्गलोक में भी देवों को आनन्द प्राप्त कराते थे, जिससे ‘देवानन्द’ उसका नाम सार्थक था। चौदह सागरोपम के असंख्य वर्षों तक जिनमार्ग के प्रभाव द्वारा असंख्य देवो को आनन्द देकर वे देवानन्द अपनी आत्म-आराधना को आगे बढ़ाने के लिये पुनः मनुष्य लोक में अवतरित हुए।

भगवान महावीर (पूर्वभव ७ तथा ६) हरिषेणराजा; और स्वर्गमें

बन्धुओ, आप भगवान महावीर के पूर्वभवों का वर्णन पढ़ रहे हैं। अब उनके मात्र सात ही भव शेष हैं-उनमें तीन भव तो देवके हैं और अन्य चार भव उत्तम रत्नत्रय धर्म की आराधना सहित हैं; जिनमें एक चक्रवर्तीका भव है और एक तीर्थंकर का अवतार है। वीरप्रभु के आत्मा द्वारा की गई उस आराधना को देखकर तुम्हें भी आराधना का उत्साह जागृत होगा, और उस आराधना में आत्मा को लगाने से तुम्हें सर्वज्ञ महावीर का साक्षात्कार होगा ! सर्वज्ञ महावीर के साक्षात्कार के साथ ही उनके जैसे अपने परम-आत्मा की स्वानुभूति रूप साक्षात्कार होने पर जो अतीन्द्रिय परम आनन्द होता है-उसका क्या कहना ! अहा, वह तो मोक्षसुख की बानगी ! और वही मंगल निर्वाण-महोत्सव !

जो जानता महावीर को चेतनमयी शुध्दभाव से;
वह जानता निजआत्मको, सम्यक्त्व ले आनन्द से।

अपने चरित्रनायक का परिणमन अब मोक्ष की ओर तीव्रगति से हो रहा है। आठवें स्वर्गसे एकसमय में असंख्ययोजन की गति से वे मनुष्यलोक में आये और उज्जयिनी नगरी में वज्रधर राजा के पुत्ररूप में अवतरित हुए; उनका नाम हरिषेण था। एक बार जैनाचार्य श्रुतसागर उज्जयिनी नगरीमें पधारे;

उनका वैराग्यमय धर्मोपदेश सुनकर महाराजा वज्रधर संसार से विरक्त हुए और हरिषेणकुमार को राज्य सौंपकर जिनदीक्षा ग्रहण कर ली।

हरिषेणकुमार जो कि सम्यग्दर्शन तो पूर्वजन्म से ही लेकर आये है, उन्होने श्रावक के बारहव्रत धारण किये। पाप के कारणभूत ऐसा विशाल राज्य मे रहनेपर भी वे महात्मा कमलवत् ऐसे अलिप्त थे कि पाप उन्हे स्पर्श तक नही करते थे; उनका चित्त सर्वत्र नि स्पृह रहता था। अहो, साधक की ज्ञानचेतना कोई अद्भुत आश्चर्यकारी है ! जिस प्रकार विषधर सर्पों के बीच रहकर भी चन्दन अपनी शीतलता को नहीं छोड़ता अर्थात विषरुप नही होता, उसी प्रकार विषसमान विभिन्न राग-संयोगों के बीच रहने पर भी धर्मात्मा की ज्ञानचेतना अपने ज्ञातस्वभाव को छोड़कर राग-रुप नही होती।

राजा हरिषेण एक दिन संसार मे विरक्त हुए, और जिनदीक्षा लेकर तपोवन मे जाकर प्रशान्तरस मे निमग्न हो गये। उन मुनिराजने आयुके अन्त मे समाधिपूर्वक शरीर का त्याग करके महाशुक्र स्वर्ग को अलंकृत किया। वे प्रीतिवर्धन विमान मे सोलह सागर आयु के धारी देव हुए।

[भगवान महावीर : पूर्वभव पाँचवा और चौथा]

विदेहक्षेत्र में प्रियमित्र चक्रवर्ती; पश्चात् बारहवे स्वर्गमे

अपने चरित्रनायक भगवान महावीर अन्तिम भव मे धर्मचक्री होंगे, उसमे पूर्व वे विदेहक्षेत्र मे राजचक्रवर्ती हुए। स्वर्ग मे व महात्मा विदेह की क्षेमधुति नगरी मे धनजय राजा के घर पुत्ररुप म उत्पन्न हुए, उनका नाम था प्रियमित्र।

एक दिन राजा धनजय ने संसार से विरक्त होकर पुत्र प्रियमित्र को राज्य सौंप दिया और स्वयं स्वभावमय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र को ग्रहण करके तप द्वारा सुशोभित हुए। राज्यलक्ष्मी छोड़कर तपलक्ष्मी द्वारा वे अधिक शोभायमान हो रहे थे।

इधर राजा प्रियमित्र विशाल राज्य के साथ-साथ शुद्धसम्यक्त्वसहित अणुव्रतो का भी पालन करते थे और जगत को दरशा रहे थे इतने बड़े राज्यभार के बीच भी आत्मा की आराधना हो सकती है। धर्म के अंतर में आत्मा की जितनी महिमा है उतनी किसी और को नही है। एक बार उनके शस्त्रभण्डार में चक्रवर्ती पद के वैभवका सूचक सुदर्शनचक्र प्रगट हुआ, परन्तु उससे वे किंचित् आश्चर्य चकित नही हुए। अहा ! तीन लोक मे सर्वश्रेष्ठ एव सुन्दर ऐसा चैतन्यरत्न जिन्होने स्वानुभूति मे प्राप्त कर लिया है, उन महात्मा को जगत के जडरत्नोसे क्या आश्चर्य होगा ? मोक्षसाम्राज्य प्रदान करनेवाला सम्यग्दर्शनरुप सुदर्शनचक्र जिनके अन्तर मे निरन्तर चल रहा है उन्हे बाह्य पौद्गलिक सुदर्शनचक्र की क्या महत्ता लगेगी ? वे धर्मात्मा प्रियमित्र जानते थे कि यह बाह्यवैभव की प्राप्ति वह कोई मेरी चैतन्य-आराधना का फल नहीं है; परन्तु आराधना के साथ रहनेपर भी उससे भिन्न जाति का ऐसे जो राग-उसका यह फल है। अरे, जिसके साथ रहनेवाले राग का भी ऐसा आश्चर्यकारी बाह्य फल हो, उस रागरहित आराधना के अंतरंग फलका तो क्या कहना ! उस फल का स्वाद तो धर्मात्मा ही ले सकते है, और उसके समक्ष जगत के समस्त वैभव बिलकुल नीरस लगते है।

चक्ररत्न प्राप्त होने पर उन महाराजा प्रियमित्रने विदेहक्षेत्र के छहों खण्डों की दिग्विजय की, छह खण्ड में रहनेवाले समस्त मनुष्य, विद्याधर एव देवों को भी उन्होने वशमें कर लिया। चौदह रत्न एवं नवनिधान के उपरान्त सोलह हजार देव और बत्तीस हजार मुकुटधारी राजा उनकी सेवा करते थे; उनकी छयानवे हजार रानियाँ तथा छयानवे करोड़ पैदल, लाखों उत्तम गज आदि विशाल सेना थी; तथापि ‘इस विषय सामग्रीमे जीव को तृप्ति देने का गुण कदापि नही है, यह सब तो आकुलता देनेवाले हैं; एक चैतन्यतत्त्व ही जीवको सच्ची तृप्ति एवं शान्ति प्रदान करता है’-ऐसा वे धर्मात्मा जानते थे; इसलिये भोगों में कही मूर्च्छित नहीं होते थे, जल मे कमलपत्र की भाँति अलिप्त रहते थे।

चक्रवर्ती के चौदह रत्न एव नवनिधान आदि वैभव का वर्णन करके शास्त्रकार ऐसा बतलाना चाहते हैं कि-हे जीवो ! देखो, यह तो सब उस जीव के रागादि औदयिक भावों का बाह्य फल है, उसी समय उसके अतर मे स्वाभाविक चेतना के जो भाव (सम्यक्त्वादि) वर्त रहे हैं-वे कैसे है ! और उनका फल कैसा सुन्दर है ! उनका स्वरूप जानोगे तभी तुम धर्मात्मा के जीवन को भली भाँति जान सकोगे, और उसे जानने का सम्यक् फल आयगा। मात्र औदयिक भावको ही देखने से ज्ञानी का सच्चा स्वरूप जानने में नही आता. इसलिये बारम्बार कहते हैं कि-चेतनभाव से भगवान को पहिचानो, उदयभाव से नही।

उन प्रियमित्र महाराजाने तेरासी लाखपूर्व के दीर्घकाल तक चक्रवर्ती पद पर रहकर प्रजा का पालन किया। पश्चात् एकबार दर्पण में मुख देखते समय कान के पास श्वेत केश देखकर उनका चित्त संसार से विरक्त हुआ।

संसार से विरक्त वे प्रियमित्र चक्रवर्ती बारह वैराग्य भावनाएँ भाते हुए क्षेमंकर जिनेन्द्र भगवान के समवसरण मे पहुँचे। सर्वज्ञता से सुशोभित वीतराग जिनेन्द्र देवके दर्शन से उनका प्रशम भाव दुगुना हो गया। उन्होंने अत्यन्त भक्तिपूर्वक जिनेन्द्र भगवान के श्रीमुख से मोक्षमार्ग का श्रवण किया। सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यग्चारित्र जो कि महा आनन्दमय मोक्षका कारण है,-तद्रूप अपना ही शुद्ध स्वभाव परिणमित होता है; वे कहीं बाहर से नहीं आते, और न कही उनमें राग है। -ऐसे वीतराग रत्नत्रयके आधाररूप शुद्ध आत्मा की अचिन्त्य अपार महिमा भगवान ने बतलायी। उसे सुनकर ज्ञानकी अतिशय निर्मलतापूर्वक जिनेन्द्र भगवान के पादमूल में ही जिनदीक्षा लेकर उन्होंने चारित्रदशा के महान रत्नत्रय अंगीकार किये, और चक्रवर्ती की तृणतुल्य अपार विभूति को छोड़ दिया, -अधिक लेकर अल्प छोड़ दिया-उसमें क्या आश्चर्य है ! मोक्षके सारभूत निधान लेकर संसार के तुच्छ निधान छोड़ दिये,-उन्होंने तो अल्प छोड़कर अधिक ले लिया !-तथापि (आश्चर्य है कि-) लोग उन्हें महान त्यागी कहते हैं।

अहा ! सुख का सरोवर अपने मे पाकर असत् ऐसे मृगजल की ओर कौन दौड़ेगा ? चारित्रदशा का चैतन्य सरोवर प्राप्त करके चक्रवर्ती के विषय-भोगों को छोड़ना वह कोई बडी बात नहीं है। विदेहक्षेत्र में राजचक्रीपना छोड़कर जो मुनि हुए है और अब चौथा भव में भरतक्षेत्र में धर्मचक्री-तीर्थंकर होनेवाले हैं-ऐसे वे प्रियमित्र मुनिराज जगत मे सर्वप्रिय थे, और सर्वजीवों के हितकारी मित्र थे। उत्तम प्रकार से चारित्रपालन करके उन्होंने संल्लेखना पूर्वक शरीर का त्याग किया और उत्तम रत्नत्रय की आराधना करते-करते शेष रह गये किंचित् कषायकण के महान पुण्यफल का उपभोग करने हेतु सहस्रार नामके बारहवें सूर्यप्रभ स्वर्गमें देवरूप से उत्पन्न हुए। वहाँ यद्यपि उनको पुण्यजन्य वैभव अपार था, परन्तु अरेरे ! जो कषाय का फल है उसका कितना वर्णन करें ! कषायकलंक के उस फलका विस्तार करने से अथवा उसकी प्रशंसा सुनकर मुमुक्षु जीव लज्जित होते हैं कि-अरे ! हम अपने चैतन्य की शान्ति को साधनेवाले…उसके बीच कषाय तो कलंकरूप है। अपनी शान्ति का विस्तार करक चैतन्यवैभव की पूर्णता करें-वही हमारे लिये इष्ट है, अन्य कुछ भी प्रिय नहीं है।

-ऐसी भावनापूर्वक स्वर्ग के अपार तथापि अध्रुव वैभवों में वे सूर्यप्रभ देव असंख्य वर्ष तक रहे।

परन्तु अन्त में तो देवपद भी अध्रुव ही है न ! अध्रुव ऐसे रागभावोंका फल भी अध्रुव ही होगा न ! इसलिये ऐसी देवगति को छोड़कर ध्रुवपद की साधना के ध्येय से वे धर्मात्मा मनुष्यलोक में अवतरित हुए। जिस अवतार मे अपने चरित्रनायक महात्मा ने सोलह उत्तम भावनाओं द्वारा तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया, उस अवतारका वर्णन अब आप पढ़ेंगे।

भगवान महावीर : पूर्वभव तीसरा : नन्द राजा

[जिनदीक्षा; सोलहकारण भावना और तीर्थंकर नामकर्म; पश्चात् सोलहवें स्वर्ग में]

इस भरतक्षेत्र के पूर्वभाग में श्वेतनगरी है; वहाँ भव्य जीव मोक्षमार्ग की साधना करते हैं; वहाँ के जिनालयों की शोभा ऐसी अद्भुत है कि जिसे देखकर नास्तिक को भी श्रध्दा जागृत हो जाय। स्वर्ग से च्यवकर भगवान महावीर का जीव इसी नगरी के राजा नन्दिवर्धन का पुत्र हुआ• उसका नाम ‘नन्दन’ था (विभिन्न पुराणों के अनुसार ‘नन्दन’ तथा ‘नन्द’-दोनों नाम स्वीकार किये गये है।) एक दिन वनविहार करते समय श्रुतसागर नामके एक जैन आचार्य को देखकर उन नन्दराजा को हार्दिक प्रसन्नता हुई और मोक्षमार्ग श्रवण करने की अभिलाषा से पूछा-हे स्वामी ! इस संसार समुद्रसे छुटकर जीव मोक्ष सुख किस प्रकार प्राप्त करता है ?

मुनिराज के श्रीमुख से मानो अमृत झरता हो तदनुसार प्रसन्नतापूर्वक बोले-हे भव्य ! जब आत्मा भेदज्ञान द्वारा सम्यक्त्वादि शुध्दभावो को प्रगट करता है तब भवदुःख से छूटकर वह मोक्षसुख प्राप्त करता है।

मुनिराजका उपदेश सुनकर नन्दराजा अपना जीवन प्रसन्नतापूर्वक मोक्षसाधना में बिताते थे। उन्हे कोई अशुभ व्यसन तो था नहीं; मात्र एक ही व्यसन था-देव-गुरु-धर्म की उपासना का। धर्म के चिंतन बिना वे एक दिन तो क्या, एक क्षण भी नहीं रह सकते थे।

महाराजा नन्दिवर्धन ने यद्यपि नन्दकुमार को राज्य कारभार सौंप दिया था; तथापि अब जिनके संसार का किनारा निकट आ चूका है-ऐसे नन्दराज, ‘सदननिवासी तदपि उदासी’ थे। राज एवं रमणियों के बीच रहनेपर भी उनकी चेतना सबसे पृथक ही रहती थी। निज चेतना के सिवा उन्हे अन्यत्र कही सुख की कल्पना नहीं होती थी।

महाराजा नन्दिवर्धन एक बार आकाश मे मेघों की क्षणभंगुरता देखकर संसार से विरक्त हुए और पंचमगति-मोक्ष प्राप्त करने के लिये जिन दीक्षा अंगीकार की; पश्चात् ध्यानचक्र द्वारा कर्मोंको नष्ट करके केवलज्ञान एवं मोक्ष पद प्राप्त किया।

पिता के वियोग से पुत्र ‘नन्दन’ यद्यपि शोकाकुल हो गया; परन्तु कायर पुरुष ही शोक के आधीन होकर बैठ रहते हैं। बुध्दिमान धीर पुरुष तो शोक को छोड़कर स्वकार्य को सम्हालते हैं,-तदनुसार नन्द राजाने राज्य कारभार सम्हाल लिया। राज्य और धर्म दोनों के सहयोगपूर्वक वर्ष बीत गये। एक बार वसन्त ऋतु का आगमन होते ही वन-उपवन नवीन कोंपलों एवं पुष्पों से खिल उठे; उसी के साथ-साथ जैसे रत्नत्रय-पुष्पों का उद्यान भी मानो खिल गया हो…ऐसे ‘प्रौष्ठिल’ नामके श्रुतकेवली मुनिराज का श्वेतपुरी के उपवन में आगमन हुआ। अहा, कैसी उनकी अनुपम मुखमुद्रा ! मानों वे चैतन्य की शान्ति में निमग्न हो ! शशक जैसे प्राणी आश्चर्य से उनकी ओर देख रहे हैं और उनके चरणों में बैठ गये है। ज्ञान के गम्भीर समुद्र-ऐसे उन मुनिराज को देखते नन्द राजा को अति आनन्द हुआ…अहा, मोक्षकी जीवंत मूर्ति ! भक्तिपूर्वक वन्दन करके नन्दराजा ने उन श्रुतकेवली से वीतरागता का उपदेश तथा अपने पूर्वभवों की बात सुनी। सर्व अवधिज्ञानी एवं चरमशरीरी ऐसे उन श्रुतकेवली भगवानने उनकी नरकदशा, वासुदेव पदवी, सिंहपर्याय में. सम्यक्त्वप्राप्ति, चक्रवर्ती पद आदि पूर्वभवों का वर्णन करके कहा-हे भव्यात्मा ! एक भव के पश्चात् तुम भरतक्षेत्र के चौबीसवें तीर्थंकर होकर मोक्षपद प्राप्त करोगे।

यह सब सुनकर नन्दराजा को भी अपने पूर्वभवों का जातिस्मरण हुआ; अपने पूर्वभव उन्होंने चित्रपट की भाँति देखे, तथा भविष्य की सुन्दर कहानी सुनकर उनका चित्त प्रसन्न हो गया। अहा, मुमुक्षु को अपने मोक्ष की बात सुनकर चित्त में जो प्रसन्नता होती है उसका क्या कहना ! हजारों प्रव्राजन भी आनन्दविभोर होकर भावी तीर्थंकर की ऐसी महिमा एवं उत्सव करने लगे मानो वर्तमान में ही प्रभु के पंचकल्याणक हो रहे हों।

पश्चात् श्री प्रोष्ठिल प्रभुने नन्दराजा को मुनिदशा की परममहिमा बतलाते हुए कहा-अहा, आत्मसाधक वीर मुनिवरों के तपश्चरण रूपी रणसंग्राम में पापकर्मरूपी उध्दत शत्रु भी नहीं टिक पाते; शुद्धोपयोग-धनुर्धर उन सन्त को कोई जीत नहीं सकता, जिन्होंने मोह-लुटेरे को भगा दिया है और पंचपरमेष्ठी जिनके मार्गदर्शक हैं ऐसे मोक्षपथिक मुनिवर आत्मा की आराधना में कहीं उलझते नहीं हैं, दीन नहीं होते और न राग-द्वेष करते हैं। अहा, ऐसे मोक्ष साधक मुनिवरोंने क्या मुक्ति को यही नहीं बुला लिया है ? -ऐसी चारित्राराधना परमपूज्य है। हे वत्स ! उसे तुम अंगीकार करो।

अहा, मानो मुनिराज के मुखचन्द्र से वीतरागी अमृत झरता था। उसे झेलते हुए नन्दराजा के नयनों से आनन्द उमड़ने लगा। सम्यक्त्व से अलंकृत उनका आत्मा वैराग्यभावना द्वारा विशेष सुशोभित हो उठा…और तुरन्त ही उन्होंने प्रोष्ठिल आचार्य के निकट जिनदीक्षा अंगीकार कर ली। तुच्छ राजलक्ष्मी को छोड़कर महान रत्नत्रयलक्ष्मी को ‘ममत्वरूपसे’ धारण किया; बाह्य तथा अंतर में निर्ग्रन्थरूपसे शोभायमान होने लगे। अहा, वीतरागता द्वारा नग्नजीव जैसा सुशोभित होता है, वैसा क्या रागी वस्त्रभूषण द्वारा शोभता है ? -नही; वीतरागता ही जीव कि सच्ची शोभा है। इसीलिये तो मोक्षमार्गी जैन मुनियों को मोहरहित जो नग्नता है उसे तत्वज्ञानियों ने मंगलरूप कहा है। वही मुनियों का सच्चा स्वरूप है। ऐसे यथार्थ स्वरूप में अपने चरित्रनायक श्री नन्दमुनिराज सुशोभित होने लगे।-वन्दन हो उन नन्दन मुनिराजको !

श्रीनन्दमुनिराजको विशुध्द चारित्र के बल से कितनी ही लब्धियों सहित ग्यारह अंगरुप श्रुतज्ञान का विकास हो गया। जिनका चित्त केवलज्ञान में संलग्न हैं ऐसे वे महात्मा मात्र स्वानुभूतिकी ऋद्धि से ही ऐसे तृप्त थे कि अन्य किसी ऋद्धिका उपयोग नही करते थे। वाह रे वाह चैतन्य ऋद्धि ! सचमुच, चैतन्य ऋद्धि की तुलना जगत में कौन कर सकता हैं। अहा, प्रशान्त धर्मात्माओंका चारित्र तो आश्चर्य का स्थान है।

भावी तीर्थंकर ऐसे वे नन्दमुनिराज, एक बार प्रोष्ठिलश्रुतकेवली भगवंत की धर्मसभा में बैठे थे; रत्नत्रयवन्त ऐसे वे मुनिराज बारम्बार निर्विकल्प चैतन्यरस का पान करते थे। दूसरे भी अनेक मुनिवर और धर्मात्मा उस धर्मसभा में विराज रहे थे। अहा, वहाँ जैनधर्म का अपार वैभव था। अनेक श्रुतकेवली भगवन्त, आचार्य -उपाध्याय -साधु, श्रुतज्ञान का अपार भण्डार ऐसी स्वानुभवसम्पृक्त जिनवाणी, वह सर्व जिनवैभव एकसाथ देखकर, अपने चरित्रनायक को परम धर्मभावना भक्ति एवं वात्सल्य के कोई ऐसे अचिंत्य परम अद्भुत भाव उल्लसित हुए कि-वहाँ श्रुतकेवली के चरणों में बैठे-बैठे ही उन्हें त्रिलोक पूज्यता के हेतुरुप ऐसा तीर्थंकर नामकर्म बँधना प्रारम्भ हो गया। जिन का सम्यक्त्व अष्ट अंगसहित विशुध्द है- ऐसे उन नन्दमुनिराज को आश्चर्यकारी अद्भुत धर्ममहिमा देखकर सोलह प्रकार की ऐसी मंगलभावनाएँ जागृत हुईं कि-भव के अन्तकी सूचक तथा सर्वज्ञपदकी पूर्वभूमिकारूप तीर्थंकर प्रकृति के पिण्डरूप जगत के उत्तम पुद्गल स्वयमेव परिणमित होने लगे। अहा, सर्वज्ञ के साथ रहना किसे अच्छा नहीं लगेगा ? ‘आप सर्वज्ञ होगे तब तक हम आपके साथ रहेंगे और ठेठ मोक्षगमन तक आपकी सेवा करेंगे।’ - ऐसे भाव से वे शुभपुद्गल प्रभुके आत्मा के साथ एकक्षेत्र में आकर निवास करने लगे। ‘श्रुतकेवली के चरणसान्निध्य में’ वे मुनिराज अत्यन्त विशुद्ध परिणामों से क्षायिकसम्यक्त्वको प्राप्त हुए।

प्रश्न -क्षायिक सम्यग्दर्शन तो आत्माकी विशुद्धि है, उसके लिये बाह्य आलम्बनरूप केवली-श्रुतकेवली के पाद-मूल की समीपता किसलिये आवश्यक है उत्तर -तीर्थंकरादि का माहात्म्य जिसने नही देखा ऐसे जीव को दर्शन मोहके क्षय के कारण रूप परिणाम उत्पन्न नही होते। ‘अदिट्ठ तिथ्थयरादिमाहप्पस्स दसणमोहखवण णिबन्धणकरण परिणामामणणुप्पत्तीदो।’ (यही बात तीर्थंकर प्रकृति के बधन मे भी समझ लेना। अर्थात् क्षायिकसम्यक्त्व की भाँति तीर्थंकर प्रकृति का प्रारम्भ भी केवली या श्रुतकेवली के सान्निध्य में ही होता है।) [कषायप्राभृत, गाथा-११०]

[यहाँ, तीर्थंकर तत्त्व के कारणरूप दर्शनविशुद्धि आदि सोलह भावनाओंका अति सुन्दर भावपूर्ण वर्णन षट्खण्डागम, धवला आदि के आधार से किया गया है, परन्तु ‘महापुराण’ का विस्तार बढ जाने से वह प्रकरण यहाँ नही दिया जा सका, अन्य किसी पुस्तक मे उसे प्रकाशित करेंगे। इसी प्रकार दूसरे भी अनेक प्रकरण संक्षिप्त करना पड़े हैं। जो जिज्ञासु उन्हे पढ़ना चाहते हों वे प्रकाशक से सम्पर्क करे।]

-इस प्रकार उन नन्दमुनि ने दर्शनविशुद्धि से लेकर प्रवचन वत्सलत्व तक की सोलह मंगल-भावनाओ द्वारा तीर्थंकर प्रकृति बाँधना प्रारम्भ किया। यद्यपि एक ओर अघाति ऐसी तीर्थंकर प्रकृति बँध रही थी, तो दूसरी ओर उसी समय वे मोहादि घाति-कर्मों को वे नष्ट-भ्रष्ट कर रहे थे . और जिसके बिना तीर्थंकरत्वकी सम्भावना नहीं होती-ऐसी सर्वज्ञताको वे अति शीघ्रता से निकट ला रहे थे। वे रत्नत्रयवंत धर्मात्मा कही तीन रत्नो को ही धारण नहीं करते थे। उनका आत्मा तो अपार चैतन्यगुणों की राशि से शोभायमान था। उनमे सम्यक्त्वादि शुद्धभाव मोक्षके ही साधक थे, बध के किंचित् नही। जब भरतक्षेत्रके २४ वे तीर्थंकर ने तीर्थंकर प्रकृति बाँधना प्रारम्भ किया तब १२वें वासुपूज्य तीर्थंकर का शासन प्रवर्तक रहा था। एक ओर थोड़ी बंधधारा, और दूसरी ओर रत्नत्रयकी शुद्धिरूप वेगवती मोक्षधारा,-ऐसी द्विरूपधारा मे वर्तती हुई उनकी परिणति तीव्रगति से मोक्ष की ओर प्रयाण कर रही थी। एक रागधारा और दूसरी रत्नत्रयधारा,-ऐसी दोनो धाराएँ एक साथ साधक की भूमिका में अपना-अपना कार्य करती हैं; उन दोनों धाराओं की भिन्नता को भेदज्ञानी जीव जानते हैं। वे रागधारा को मोक्षका कारण नहीं मानते और रत्नत्रयधाराको किंचित् भी बन्ध का कारण नहीं मानते। यदि रत्नत्रय स्वयं बंधका कारण हो तो जगत में मोक्ष के उपाय का अभाव हो जाय; और यदि राग मोक्षका कारण हो तो सर्व जीव मोक्ष प्राप्त कर ले, इसलिये जिनसिद्धान्त है कि- ‘जितने अंशमें राग उतने अंशमें बंधन; और जितने अंश में रत्नत्रय उतने अंश में मोक्ष का उपाय ।’ (पुरुषार्थ सिद्धिउपाय २१२-१३-१४.)

भगवान के मुनिजीवन की, (और ऐसे ही प्रत्येक साधक धर्मात्मा की) यह विशेषता है कि उनकी चैतन्यधारा बंधको तोड़ती हुई आनन्दपूर्वक मोक्ष को साधने का कार्य निरन्तर कर रही है, उनकी ज्ञानचेतना का प्रवाह अखण्डरूप से केवलज्ञान की ओर दौड़ रहा है। अहा, धर्मात्माकी यह दशा अद्भुत-आश्चर्य जनक है। ऐसी अद्भुत वीतरागी दशामें वे नन्दमुनि शोभायमान थे। ‘यह मुनिराज अब तीर्थंकर होकर मोक्षमें जाने की तैयारी कर रहे हैं, इनके साथ हम भी मोक्ष में जायेंगे’-ऐसी भावना से प्रेरित होकर जगत के समस्त सद्गुण दौड़-दौड़कर प्रभुके आश्रय में आ रहे थे, और क्रोधादि दोष अब अपना नाश निकट जानकर शीघ्रता से दूर भागने लगे थे। इस प्रकार दोषरहित, गुणसहित निर्दोष मोक्षमार्ग को वे मुनिराज सुशोभित कर रहे थे और जगत को भी उस सुन्दर मार्ग की प्रेरणा दे रहे थे .. इस प्रकार रत्नत्रय की उत्तम आराधनापूर्वक समाधिमरण करके वे महात्मा १६वें प्राणत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान मे इन्द्ररूप से उत्पन्न हुए। वहाँ वे यद्यपि पुण्यजनित दिव्य इन्द्रियसुखों के सागर में रहते थे, तथापि उन मुमुक्षु महात्मा को मोक्षसुख के बिना कहीं चैन नहीं पड़ता था; इसलिये अन्त में उन स्वर्ग सुखों को भी छोड़कर मोक्षसुखकी साधना के लिये वे मनुष्यलोक में आने को तैयार हुए।

[स्वर्ग से च्यवकर वे मंगल-महात्मा अन्तिम अवतार में भरतक्षेत्र में तीर्थंकर रुप से अवतरित हुए और उनके पंचकल्याणक उत्सवों से अनेक जीवों का कल्याण हुआ…उसकी आनन्दकारी कथा आप अगले प्रकरणों में पढ़ेंगे।]

है शार्दूल समान वीरता, साधकत्व है अनुपम;
भवका अंत किया जिनने, उन महावीर को वंदन।
[यहाँ भगवान महावीर के पूर्व भवों का वर्णन समाप्त हुआ।]

जो जानता महावीर को-

इस एक ही चौबीसी में महावीर के एक ही जीवने अपने विविध परिणामोंवश कैसी-कैसी विशिष्टपर्यायें धारण कीं! उनका ज्ञान अद्भुत वैराग्य जागृत करता है और बंध-मोक्ष के भावोंका भेदज्ञान कराता है-अनन्त काल की बात तो दूर रही, इस वर्तमान मात्र एकही चौबीस मे (चतुर्थकाल में) ही तीर्थंकर के उस जीवने स्वर्ग के, नरक के, तिर्यंच के तथा मनुष्य के-चारो गति के भवसहित एकेन्द्रिय-निगोद के भव भी असख्यबार किये और अन्त में उस जीवने मोक्षपर्याय भी प्राप्त की!

※ आदि तीर्थंकर का पौत्र होकर फिर स्वयं भी अन्तिम तीर्थंकर हुआ।

※ प्रथम चक्रवर्ती का पुत्र होकर फिर स्वयं भी चक्रवर्ती हुआ।

※ मुनि होकर स्वर्ग में गया और अर्धचक्री होकर नरक में भी गया।

※ सिंह होकर मासभक्षण भी किया और तीर्थंकर होकर परम अहिंसाधर्म का उपदेश भी दिया!

※ नरक-निगोदके दुःख भी भोगे और मोक्षसुख भी प्राप्त किया।

※ तीव्र मिथ्यात्वादि भावों का सेवन करके मिथ्यामार्गोंका उपदेश भी दिया और क्षायिक सम्यक्त्वादि प्राप्त करके रत्नत्रय धर्म के उपदेश द्वारा उन मिथ्यामार्गोंका खण्डन भी स्वय किया।

हे देव! उत्पाद-व्यय-ध्रुवरूप अनेकान्त तत्त्व बिना ऐसा किस प्रकार हो सकता है? वाह, द्रव्य-गुण-पर्यायस्वरूप, नित्य-अनित्यतास्वरूप, तथा एक-अनेकरूप ऐसी अनेकान्तमय वस्तु बतलाकर जिनशासन कैसी वीतरागता कराता है! अनेकान्त का स्वरूप प्रकाशित करके जिनदेवने परम उपकार किया है। हे वीरनाथ! आपका जीवन तथा आपका इष्टोपदेश ‘अनेकान्तमय’ हैं; उसे जानकर और उसीसे अपने आत्मा का भी सत्य स्वरूप समझकर हम आपके मंगलमार्ग से मोक्षपुरी में आ रहे हैं… उस मोक्ष के मंगल उत्सव के निमित्त ही आपकी यह मंगल कथा लिखी जा रही है… यह भव्य जीवों का कल्याण करो!

भगवान महावीर : पंचकल्याण

यत्स्वर्गावतरणोत्सवे यदभवत् जन्माभिषेकोत्सवे,
यददीक्षाग्रहणोत्सवे यदखिल ज्ञानप्रकाशोत्सवे;
यत् निर्वाणगमोत्सवे जिनपतः पूजाद्भुतं तद्रवे;
संगीतः स्तुति मंगले प्रसरता मे सुप्रभातोत्सवः ।।

सर्वज्ञ भगवान महावीर स्वामी के पंचकल्याणक जगत का कल्याण करें !

हे जिनेन्द्र ! आप श्री के मंगल पंचकल्याणक प्रसंग पर आपके शुद्धात्मा की दिव्य महिमा को हृदयगत करके इन्द्रादि आधारक भक्त जनोंने अद्भुत पूजन-स्तुतिपूर्वक जो मंगल उत्सव किया उसके मधुर संस्मरण आज भी आनंद उत्पन्न कर रहे है, मानो आप ही मेरे हृदय में विराजकर बोल रहे हैं; ऐसे आपके मंगल चिन्तनपूर्वक आपके पंचकल्याणक का भक्तिसहित आलेखन करता हूँ। जिन भावों से स्वर्ग के हरिने आपकी भक्ति की थी, उन्ही भावों मे मै-इस मनुष्य लोक का हरि-आपकी भक्ति करता हूँ। अहो, त्रिकाल मंगल रुप उन तीर्थंकरों को नमस्कार हो कि जिनके पंचकल्याणक अनेक जीवोंको कल्याण का कारण हुए हैं।

भगवान महावीर के आत्मा का भव-भ्रमण पूरा हुआ; अब अन्तिम तीर्थंकर अवतार में उनके पंचकल्याणक होते हैं। उन महात्मा को अनादिकाल के भव समुद्र का किनारा आ चुका है, और अनेक भव से चल रही वृद्धिंगत आत्मसाधना के प्रताप से महामंगल मोक्षपद बिलकुल निकट आ गया हैं; जिन्होंने चैतन्यसुखका आस्वादन किया है ऐसे उन महात्मा को देवलोक के दिव्यवैभव लुभा नहीं सके। मोक्ष के साधक को स्वर्ग का भव कैसे ललचा सकेगा ? वीतरागता के साधक को राग के फल कहाँ से अच्छे लगेंगे ? उन मंगल आत्मा को १६ वें स्वर्ग से इस भरतक्षेत्र में अवतरित होने में जब छह मास शेष थे तब वैशाली-कुण्डग्राम मे रत्नवृष्टि होने लगी।

अनन्त तीर्थंकरों के मंगलविहार से पावन अपना यह भारत देश; उसमें ढाई हजार वर्ष पूर्व वैशाली गणतंत्र का कुण्डपुर (कुण्डग्राम) अति शोभायमान था। उस काल भगवान पार्श्वनाथ तीर्थंकर का शासन चल रहा था और उनके परमउपासक सिद्धार्थ महाराजा वैशाली गणराज्य के अधिपति थे। उनकी महारानी प्रियकारिणी-त्रिशलादेवी सचमुच भरतक्षेत्र की अद्वितीय नारी-रत्न थीं। गौरववन्ती वैशाली-कुण्डपुर की शोभा अयोध्यानगरी जैसी थी, उसमें तीर्थंकर के अवतार की पूर्वसूचना से सम्पूर्ण नगरी की शोभा मे और भी वृद्धि हो गई थी..जिस प्रकार मिथ्यात्व से सम्यक्त्व की तैयारी होने पर आत्मा का रूप बदल जाता है, और आनन्द की ऊर्मियाँ उठने लगती हैं, तदनुसार जिनराज के अवतार की तैयारियों से समस्त वैशाली की शोभा मे आश्चर्यजनक परिवर्तन होने लगा, प्रजाजनों में सुखसमृध्दि एव आनद की वृध्दि होने लगी। महाराजा सिद्धार्थ के प्रागण में प्रतिदिन तीन बार साढ़े तीन करोड़ रत्नों की वर्षा होती थी। नगरजन नगरी की दिव्य शोभा तथा रत्नवृष्टि देखकर विस्मित होने लगे कि-अरे, इस नगरी मे कौन ऐसा पुण्यवान पुरुष है कि जिसके गृह-आँगन मे प्रतिदिन ऐसे रत्नो की वर्षा होती है। जब किन्ही अनुभवी पुरुषो ने बतलाया कि-अपनी नगरी मे अन्तिम तीर्थंकर अवतरित होनेवाले है, उसी की तैयारी के यह चिन्ह है। मात्र अपनी नगरी का नही, परन्तु सारे भरतक्षेत्र का भाग्योदय हो रहा है।

महारानी त्रिशलादेवी मे भी अतरग एव बाह्य मे कोई अद्भुत परिवर्तन होने लगे। महान आनन्द की अव्यक्त अनुभूतियाँ उनके अतर मे होने लगीं। आषाढ़ शुक्ला षष्ठी की रात्रि के पिछले प्रहर में अति उत्तम मगल सूचक सोलह स्वप्न देखकर वे हर्षातिरेक से रोमाचित हो गई और उसी समय प्रभु महावीर का मंगल-आत्मा १६ वे स्वर्ग से च्यवकर प्रियकारिणी-त्रिशला माता के उदर में अवतरित हुआ.

मंगलदिन अति सुखदाता, आये उर त्रिशलामाता;
नर-हरि-देव नयें जिनमाता, हम सिरनावत पावत साता।

आज त्रिशलादेवी के हर्षोल्लास का पार नहीं था, और जब राज सभा में सिद्धार्थ महाराजा के श्रीमुख से उन स्वप्नो का महान फल सुना कि - चौबीसवें तीर्थंकर का उनके गर्भ में अवतरण हुआ है, तब तो उन्हे किसी अचित्य निधान की प्राप्ति जैसा अपार हर्ष हुआ। सारी नगरी में भी चारों ओर आनन्द छा गया। लोगो के मुँह से धन्य है ..धन्य है !’ के उद्गार निकल रहे थे और कह रहे थे कि-‘अपनी नगरी मे हम बालतीर्थंकर को खेलते-बोलते हुए देखेंगे हम सब का जीवन धन्य होगा !’

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भगवान महावीर (भाग ४)

इन्द्र-इन्द्रानीने भी वैशाली आकर माता-पिता का सन्मान किया; दिकुमारी देवियाँ त्रिशला माता की सेवा करने लगी। देव तो ठीक, नरक के जीवो ने भी दो घड़ी साता का वेदन किया; और उससे तीर्थंकर-महिमा जानकर गहरे विचार में मग्न होने से अनेक जीव चैतन्यविभूति को लक्षगत करके सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए। धन्य है तीर्थंकर के कल्याणक का प्रभाव और धन्य हैं उनको देखनेवाले !

अहा, माता के उदर में विद्यमान वह जीव, अपर्याप्त दशा में जहाँ अभी हाथ-पाँव तथा आँख-कान की भी रचना नही हुई थी, तथापि मति-श्रुत-अवधि तीन ज्ञान का धारी था, सम्यग्दृष्टि था, आत्मानुभूति के वैभवसहित था, अतीन्द्रिय आनन्द का परिणमन हो रहा था; इसलिये वह आत्मा कल्याणकरूप था; उसकी वह गर्भावस्था भी कल्याणकारी थी। उस समय की भी उसकी देहातीत आत्मदशा को जान ले उसका कल्याण होगा; उसे शरीर एवं आत्मा का भेदज्ञान होकर अतीन्द्रिय ज्ञान, सुख होंगे। इसका नाम है गर्भकल्याणक ! अरे लक्ष में तो लो-❉ जहाँ आँख-कान नहीं है तथापि अतीन्द्रियज्ञान वर्तता है; ❉ जहाँ शरीररचना नहीं हुई है तथापि अतीन्द्रिय सुख वर्तता है; ❉ जहाँ अभी द्रव्यमन की रचना नही हुई है, तथापि सम्यग्दर्शन वर्तता है।

-इस प्रकार आत्मा के ज्ञान, सुख, सम्यक्त्वादि भाव देहातीत हैं, इसलिये आत्मा स्वयं ही ज्ञान एवं सुखरूप परिणमनेके स्वभाववाला है-ऐसा विश्वास होता है।

हे भाई ! तू इस प्रकार भगवान को पहिचान। ऐसा भगवान का जीवन है । इसलिये प्रत्येक प्रसंग मे (गर्भ से लेकर मोक्ष तक) भगवान का आत्मा कैसे चैतन्य भावों रूप वर्त रहा है उसे तू जान ! मात्र सयोग या पुण्य का वैभव देखकर नहीं अटक जाना। आत्मिक गुणों द्वारा प्रभुकी सच्ची पहिचान करेगा तो तुझे भी अवश्य सम्यग्दर्शन-ज्ञानादि होंगे और तू भी मोक्ष के मार्ग मे आ जायगा। इसलिये बारम्बार कहते है कि-

जो जानता जिनराजको चैतन्यमय शुद्धभावसे,
वह जानता निज आत्मको सम्यक्त्वलेता चावसे।

जिस प्रकार सम्यग्दर्शन होने से पूर्व उसकी तैयारी में भी जीवोंको कोई नवीन आत्मिक आह्लाद जागृत होता है और नई भनक आती है, उसी प्रकार वैशाली में प्रभुजन्म से पूर्व चारों ओर नूतन आनन्दका वातावरण छा गया था। देवकुमारियाँ त्रिशला माताकी सेवा करती है नित्य नवीन आनन्दकारी चर्चा करती हैं। एकबार माताजी को विचार आया कि आज मै देवियों से प्रश्न पूछ कर उनके तत्त्वज्ञान की परीक्षा करूँ ! देवियाँ भी कोई साधारण नहीं थीं परन्तु जिनभक्त थीं; वे माताकी बात सुनकर प्रसन्न हुई .और मानो माताजी के मुख से फूल झर रहे हों तदनुसार एक के पश्चात् एक प्रश्न पूछने लगीं .और देवियाँ भी झट-झट उनके उत्तर देने लगी। तत्त्वरससे भरपूर उस चर्चा के आनन्द का रसास्वादन आप भी कीजिये-※ सर्व प्रथम माताजी ने पूछा-जगतमें सबसे सुन्दर वस्तु कौन ? -देवीने तुरन्त उत्तर दिया- ‘शुद्धात्मतत्त्व।’ ※ माताने पूछा-आत्मा का लक्षण क्या ?-देवीने कहा-चैतन्यभाव।’ ❉ धर्मका चिह्न क्या ? शांतभावरूप ज्ञानचेतना ! ※ उत्तम सदाचार क्या ? वीतरागभाव। ※ पापी कौन ? -जो देव-गुरु-धर्मकी निन्दा करे वह। ❉ पुण्य पाप रहित जीव कहाँ जाता है ? -मोक्ष में। ※ वीर कौन ?- जो वीतरागता करे वह वीर है। ※ जिन कौन ? जो मोह को जीते वह जिन। ※ संतोषी कौन ?-जो स्वमें तृप्त रहे वह। ❉ विवेकी कौन ?-जो जिनाज्ञा का पालन करे वह। ❉ शूरवीर कौन ? जो शत्रुको भी क्षमा करे वह।

* मूर्ख कौन ? जो मनुष्य भव पाकर भी आत्महित न करे वह। ❋ सर्व श्रेष्ठ कौन ? -जो सबको जाने वह सर्वोत्तम। ❋ मुमुक्षु कौन ? -जो मोक्ष का ही उद्यम करता हो वह।

ऐसे भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रश्नोत्तर हुए और धर्मचर्चा चली। कई बार तो ऐसा होता था कि-माताजी प्रश्न पूछे तब देवी को उत्तर न आता हो, किन्तु ज्यों ही माताजी के उदर में विराजमान तीर्थंकर का स्मरण करें कि तुरन्त उत्तर आ जाता था। -मानो प्रभु स्वयं ही उदर-भवन में बैठे-बैठे सब प्रश्नों के उत्तर दे रहे हों ! उदरस्थ आत्मा अवधिज्ञानी है, तो उनकी सेवा करनेवाली देवियाँ भी अवधिज्ञानी हैं, उनमें से कुछ तो सम्यग्दर्शन को प्राप्त हैं और कुछ प्राप्त करने में तत्पर हैं; -ऐसी वे देवियाँ माता से पूछती है-हे माता ! अनुभूति स्वरूप परिणमित आत्मा आपके अंतर में विराजमान है, तो ऐसी अनुभूति कैसे होती है ? वह समझायें।

माता ने कहा- हे देवी ! अनुभूति की महिमा अति गंभीर है। आत्मा स्वयं ज्ञान की अनुभूति स्वरुप है। उस ज्ञान की अनुभूति मे रागकी अनुभूति नहीं है; -ऐसा भेदज्ञान हो तब अपूर्व अनुभूति प्रगट होती है।

दूसरी देवीने पूछा- हे माता ! आत्मा
की अनुभूति होने से क्या होता है ?

देवी, सुनो ! अनुभूति होनेपर सम्पूर्ण आत्मा स्वयं अपने मे स्थिर हो जाता है; उसमे अनन्त गुणों के चैतन्यरस का ऐसा गंभीर वेदन होता है कि जिसके महान आनन्द को अनुभवी आत्मा ही जानते हैं; वह वेदन वाणीगम्य नही होता।

हे माता ! वाणी में आये बिना उस वेदन की कैसे खबर पड़ती है ?

हे देवी ! अंतर में अपने स्वसंवेदन से आत्मा को उसका पता चलता है। जैसे यह शरीर दिखायी देता है, वैसे ही अनुभूति में उस से भिन्न आत्मा ’ उससे भी विशेष स्पष्ट’ दृष्टिगोचर होता है।

हे माता ! आँखों से शरीर दिखायी देता है उसकी अपेक्षा आत्मा के ज्ञान को विशेष स्पष्ट क्यों
कहा ?

हे देवी ! आँख द्वारा शरीर का ज्ञान वह तो इन्द्रियज्ञान है, परोक्ष है; और आत्मा को जाननेवाला स्वसंवेदनज्ञान तो अतीन्द्रिय है प्रत्यक्ष है, इसलिये वह अधिक स्पष्ट है।

अनुभूति के काल में तो मति-श्रुतज्ञान हैं, तथापि उन्हें प्रत्यक्ष और अतीन्द्रिय क्यों कहा ?

-क्योंकि अनुभूति के समय उपयोग आत्मा में ऐसा लीन हुआ है कि उसमें इन्द्रियों का तथा मन का अवलम्बन छूट गया है, इसलिये उस समय प्रत्यक्षपना है। अहा, उस काल के अद्भुत निर्विकल्प आनन्दका क्या कहना !

देवियों ने प्रसन्नता से कहा- हे माता ! आपने अनुभूति की अद्भुत बात समझायी, मानो आपके अंतर से कोई अलौकिक चैतन्यरस झर रहा है। यह आपके अंतर में विराजमान तीर्थंकर के आत्मा की अचिन्त्य महिमा है। उन बालतीर्थंकर को गोद में लेकर हम कृतार्थ होंगे। -इस प्रकार धर्मचर्चा द्वारा आनन्दमय उत्तम भावना भाते-भाते सवानौ मास आनन्दपूर्वक बीत गये और तीर्थंकर के अवतार की धन्य घड़ी आ पहुँची।

वैशाली में महावीर-जन्म की मंगल बधाई

आज तो बधाई राजा सिध्दारथ दरबार जी .. त्रिशलादेवी कुँवर जायो जग का तारणहार जी… वैशाली मे नौबत बाजे देव करें जयकार जी .. भव्यों के इस भाग्योदय से हर्षित सब नरनार जी! आत्मने धन्य करवा, समकितने उज्जल करवा; बाल-तीर्थंकर दर्शन करवा, चालो जईऐ वैशाली धाममां. इस पुस्तक के लेखक ने वीर सं २५०२ की चैत्र शुक्ला १३ का मंगल-दिवस वैशाली में-वीर जन्मधाम में आनन्द पूर्वक मनाया था; इस पुराण का कुछ भाग वहीं रहकर लिखा है, और वीरप्रभु की रथयात्रा के समय इसकी पाण्डुलिपि को रथ मे विराजमान करके उसकी पूजा की है। [चित्र]

चैत्रशुक्ला त्रयोदशी के मंगल-दिन वैशाली-कुण्डग्राम में भगवान महावीर का अवतार हुआ। उस काल (ईस्वीसन् पूर्व ५९८ वर्ष, ता २८ मार्च सोमवार को) समस्त ग्रह सर्वोच्च स्थान में थे। ज्योतिषविज्ञान के अनुसार ऐसा उत्तम योग १० कोड़ाकोड़ी सागरोपम मे २४ बार ही आता है; और वीरप्रभु की यह जन्म कुण्डली उनका बाल-ब्रह्मचारीपना सूचित करती है।

तीर्थंकर का अवतार होते ही तीनों लोक आश्चर्यकारी आनन्द से खलबला उठे। इन्द्र ऐरावत हाथी लेकर जन्मोत्सव मनाने आ पहुँचा। एक देवपर्याय में असंख्य तीर्थंकरों का जन्माभिषेक करनेवाल इन्द्र पुनःपुन जन्माभिषेक के अवसरपर किसी नूतन आहलाद का अनुभव करते है। भक्तिभावना से प्रेरित होकर वह सौधर्म इन्द्र स्वयं एक होनेपर भी अनेक रुप धारण करके जन्मोत्सव मनाने हेतु तत्पर हुए; -जिस प्रकार मोक्ष का साधक आत्मा स्वयं ‘एक’ होने पर भी सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र द्वारा अनेकरूपों को धारण करता हुआ मोक्ष साधने को तत्पर होता है।

शची इन्द्राणी के भी हर्षका पार नहीं है। जिन्हें बाल तीर्थंकर को गोद में लेने की प्रबल उत्कण्ठा है-ऐसी वे इन्द्राणी कुण्डपुरी में प्रवेश करके तुरन्त ‘जिन-मन्दिर’-में गईं। (सिद्धार्थ राजाके ‘नंद्यावर्त’ नामक राजप्रासाद में ‘द्रव्यजिन’ का अवतार हुआ, और वे ‘द्रव्यजिन’ वहाँ विराजमान होने से पुराणकारोंने उस राजमहल को भी ‘जिन-मन्दिर’ कहा है।) वहाँ प्रवेश करके बालतीर्थंकर का मुख देखते ही आनन्द से उनका अंतर नाच उठा- 'अहा, देवी पर्याय मे संतान नही होती, परन्तु मुझे तो इन तीर्थंकर समान पुत्रको गोदमें लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इस प्रकार परम हर्ष पूर्वक उन बाल तीर्थंकर के स्पर्श से वे इन्द्राणी चैतन्य की अद्भुतता का अनुभव करने लगी… अहा, प्रभुके स्पर्श से मैं धन्य हो गई! अब मै स्त्री पर्याय का छेद करके मोक्ष प्राप्त करूँगी…ऐसे आत्मिक आह्लाद सहित उन बालप्रभुको इन्द्र के हाथ मे दिया। इन्द्र भी प्रभुका रुप देखकर ऐसे आश्चर्यचकित हुए कि एक साथ हजार नेत्र बनाकर उस रुप को निहारने लगे। जिस प्रकार मोक्षाभिलाषी जीव अतीन्द्रिय ज्ञानकी सर्व किरणों द्वारा आत्माके अलौकिक रुप का निरीक्षण करता है और महाआनन्दित होता है उसी प्रकार हरि हजार नेत्रों द्वारा प्रभुके रुप को देखकर अति प्रसन्न हुए। उस समय होनेवाली दिव्य पुष्पवृष्टि से ऐसा लग रहा था मानो आकाश में सुन्दर उद्यान खिला हो!.. परन्तु अरे, उस दिव्य पुष्पोद्यान की अपेक्षा प्रभुके आत्मा में चैतन्य के अद्भुत गुणोंका उद्यान खिल रहा था-उसे तो धर्मात्मा ही देख सकते थे और ‘अगन्धभाव’ से उस चैतन्य उद्यान की अपूर्व सुगन्ध लेते थे।

इस प्रकार अद्भुत जिनमहिमा देखकर तथा चैतन्य की अचिन्त्यता को लक्षगत करके अनेक जीव सम्यक्त्वको प्राप्त हुए; सम्यक्त्व के अनुपम प्रकाश से उनका आत्मा जगमगा उठा। प्रभु का जन्म उनके लिये सचमुच कल्याणकारी हुआ! अहो तीर्थंकरों का अचिन्त्य प्रभाव!

बालतीर्थंकर का रुप निहारने के लिये हजार नेत्र खोलकर इन्द्र ऐसा बतलाना चाहता था कि-अरे जीवो! मेरे यह हजार नेत्र जिनका रुप देखने के के लिये कम लग रहे हैं उन साधक के अंतर का तो क्या कहना! ऐसे आत्मसाधक आत्माकी पहिचान बाह्य नेत्रो द्वारा नहीं किन्तु अतीन्द्रिय ज्ञान द्वारा ही होती है; इसलिये जन्मकल्याणक में तुम प्रभुको मात्र इन्द्रियज्ञान द्वारा न देखकर उन्हे अतीन्द्रिय ज्ञान द्वारा पहिचानना; उससे प्रभुके कल्याणक के साथ तुम्हारा भी कल्याण होगा,-तुम्हें सम्यग्दर्शनादि कल्याणकारी भाव प्रगट होगे।

अति शोभायमान शाश्वत मेरुपर्वत जिनप्रभु के जन्माभिषेक से अत्यधिक सुशोभित हो उठा;

अथवाऐसा कहो कि जिनराज ने आकर मेरुकी शोभा का हरण कर लिया, क्योकि लोग तो मेरुकी दिव्य शोभा को देखना छोडकर प्रभुके मुखारविन्दको निहार रहे थे। प्रभुमें लगे हुए उनके चित्त को दूसरा कोई आकर्षित नही कर सकता था। मेरु पर ‘स्थापनारुप जिन’ तो सदा-शाश्वत विराजते है, तदुपरान्त आज तो ‘द्रव्यजिन’ तथा अशतः ‘भावजिन’ वहाँ पधारे थे; फिर उसके गौरव की क्या बात ! अहा, वह तो जगत का एक पूजनीय तीर्थ बन गया था। वहाँ ध्यान धरकर अनेक मुनिवर निर्वाण प्राप्त करते है इसलिये वह सिद्धिधाम (निर्वाण तीर्थ) भी है। अहा, तीर्थस्वरुप आत्माका जहाँ-जहाँ स्पर्श होता है वह सब तीर्थ बन जाता है। सम्यग्ज्ञान की यह महत्ता है कि वह द्रव्य-क्षेत्र-काल से ‘भाव’-मंगल को जानकर उसके साथ आत्मा की सन्धि कर लेता है।

‘‘धन्य घड़ी धन्यकाल शुभ देखो, हरि अभिषेक करे प्रभुजीको’’

उस जन्माभिषेक के समय सर्वत्र आनन्द छा गया.. देवगण भक्ति से नाच उठे और मुनिवर चैतन्य की अगाध महिमा का चिंतन करते-करते ध्यानमग्न हुए। निर्विकल्प जिनभक्ति तथा सविकल्प जिनभक्ति-दोनों का वहाँ संगम हुआ। वाह प्रभो ! अभी तो आप बालतीर्थंकर है, द्रव्यतीर्थंकर है, तथापि ऐसी अगाध महिमा ! तो जब आप सर्वज्ञ होकर साक्षात् भावी तीर्थंकर होगे और इष्ट-उपदेश द्वारा जगत में रत्नत्रय-तीर्थ का प्रवर्तन करते होगे,-उस काल की महिमा का क्या कहना !-घटे ‘द्रव्य-जगदीश’ अवतार ऐसो, कहो ‘भाव-जगदीश’ अवतार कैसो ?

प्रभो ! आपकी महिमा को जो जानेगा वह अवश्य सम्यक्त्व प्राप्त करेगा ! हे देव ! आपके जन्मोत्सव में कही राग का ही उल्लास नही था, रागसे पार ऐसे वीतरागरस की एकधारा भी वहाँ चल रही थी। जैनदर्शन की इस अद्भुतता को ज्ञानी ही जानते है। जब सारी दुनिया जन्मोत्सव के हर्षातिरेक में पागल हो रही थी तब हमारे प्रिय बालप्रभु तो अपनी ज्ञान चेतना की शान्ति में निमग्न होकर बैठे थे। वाह रे वाह ! वीतरागमार्ग में हमारे भगवान तो इसी प्रकार शोभा देते हैं ।

पार्श्वनाथ प्रभुके मोक्षगमन पश्चात् १७८ वर्ष में महावीर प्रभुका जन्म हुआ। उनके शरीर में १००८ उत्तम लक्षण थे; उनके बाये पैर में केसरी सिंह देखकर ¹ हरिने ² हरिका ³ हरिलक्षण प्रसिद्ध किया। (¹ हरि=इन्द्र; ² हरि=भगवान; ³ हरि=सिंह। एकदेव, एक मनुष्य, एक तिर्यंच।) उन सिंहलक्षण युक्त प्रभुको ‘वीर’ ऐसे मंगल नाम से सम्बोधन करके इन्द्र ने स्तुति की। ‘‘अरे, अनंत गुणसम्पन्न भगवान ‘वीर’ ऐसे एक ही शब्द से वाच्य कैसे होगे ?’’-हाँ, जैनशासन के अनेकान्त के बल से वह संभव हो सका, क्योंकि एक गुण द्वारा अभेद रुप से अनन्त गुण सम्पन्न ऐसे पूर्ण गुणी को प्रत्यक्ष किया जा सकता है,- ऐसा जैन- शासन के अनेकान्त ज्ञान का विशिष्ट सामर्थ्य है।

मेरु पर जन्माभिषेक के पश्चात् प्रभुकी शोभायात्रा लेकर इन्द्र वैशाली- कुण्डपुर लौटे और माता पिता को उनका पुत्र सौंपते हुए कहा- हे महाराज ! हे माताजी ! त्रिलोकपूज्य पुत्र को पाकर आप धन्य हुए हैं; वे मोह को जीतने में वीर’ हैं और धर्मतीर्थ का उद्योत करनेवाले हैं- इसप्रकार स्तुति करके इन्द्र तो माता-पिता का सन्मान कर रहे थे, परन्तु माता त्रिशलादेवीका ध्यान उसमें नहीं था; वे तो बस पुत्रको देखने में तल्लीन थी। जिसप्रकार स्वानुभूति में प्रथम बार ही चैतन्यका अतीन्द्रिय रुप देखकर मुमुक्षु जीवका चित्त अपूर्व आनन्द के वेदने में लग जाता है…उसी प्रकार पुत्र का अद्भुतरुप देखकर त्रिशला माताका चित्त अनुपम आनन्द से तृप्त हो गया। इन्द्र-इन्दानी ने ताण्डव नृत्य करके अपना हर्षोल्लास व्यक्त किया। इसप्रकार प्रभुके जन्मकल्याणक का भव्य उत्सव करके देवगण अपने स्वर्गलोकमें चले गये; किन्तु कितने ही देव छोटे बच्चे का रुप धारण करके वीर कुँवर के साथ वहीं क्रीड़ा करने हेतु रुक गये। अहा, तीर्थंकर जैसे बालमित्र के साथ रहना तथा खेलना किसे अच्छा नहीं लगेगा?..वाह, उसमें तो बड़ा ही आनन्द आयगा। उन देवकुमारों के साथ क्रीड़ा करते हुए वीरकुँवर को देखकर उनमें देव कौन है और मनुष्य कौन ? उसका पता भी नहीं चलता था; क्योंकि सबका रुप एक जैसा था; परन्तु जब वे देवकुमार तीर्थंकर देवका चरण स्पर्श करते तब समझमें आता था कि देव कौन है ! वे देव कहते थे कि -हे प्रभो ! हम देव नहीं हैं; वास्तवमें देव तो आप ही है। इसप्रकार गुणोंकी विशेषता के कारण वीर कुँवर सबसे अलग पहिचाने जाते थे।

वीरकुँवर का जन्म होने से वैशाली सर्व प्रकार से वृद्धिंगत होने लगी; उसका वैभव भी बढ़ने लगा और आत्मगुण भी; इसलिये माता-पिता एव प्रजाजनोंने उन वीरकुवँर को वर्द्धमान नामसे सम्बोधन किया।

" ‘पणमामि वड्ढमाणं तित्थं धम्मस्स कत्तारं" (प्रवचनसार)

अहा, ‘वर्द्धमान’ ऐसे सुन्दर नामसे जो वाच्य है, जिन प्रभु के गुणों की पहिचान से आत्माके गुण वृद्धिगत होते हैं ऐसे धर्मवृद्धिकर श्री वर्द्धमान जिनको; मैं वन्दन करता हूँ। चैतन्यगुणोंमें वृद्धिगत ऐसे उन महात्मा को देवलोक से आनेवाले दिव्यवैभव भी आश्चर्यचकित नहीं करते थे। अहा, चैतन्यगुणों से अधिक सुन्दर ऐसी कोई वस्तु इस जगत में है जो धर्मी के चित्त को आश्चर्य मे डाल सके !

वीर-वर्द्धमानकुमार दो वर्ष के बालक होनेपर भी तीन ज्ञान से गंभीर हैं और आराधना सहित श्रेष्ठ जीवन जीते हैं। उन्हें देख-देखकर भव्य जीवों का हृदय शांत होता है। उनकी बालक्रीडाएँ निर्दोष है। अवधिज्ञानी-आत्मज्ञानी वे महात्मा ऐसा विशिष्ट क्षयोपशम लेकर आये हैं कि-किसी शिक्षक के पास कोई विद्या पढ़ना शेष नही रहा, जगत को चैतन्यविद्या पढ़ानेवाले वे स्वयं बुद्ध भगवान स्वयं सर्वविद्याओ मे पारगत है। अहा ऐसे बालप्रभु जिनके गृह मे सदा क्रीड़ा करते हो और जिनके हृदय मे विराजते हों उनके महान सौभाग्य का क्या कहना !

देवियाँ उन्हे आनन्द मे खेलाती थी, माता उन्हें झूले में झूलाती थी, देवकुमार हाथी के बच्चे का रुप धारण करके वीर कुँवर को सूढ़ पर बैठाकर झुलाते थे तथापि वीर कुँवर डरते नहीं थे आनन्द से झूलते थे। उनके शरीर की ऊचाई १ धनुष (दस फुट अथवा तीन मीटर) थी; रग पीला सुवर्ण जैसा था; ७२ वर्ष की आयु और तीनो लोक में सबसे सुन्दर अदभुत रुप था। अति मनोज्ञ उनके शरीर में जन्मसे ही दस अतिशय थे-वह शरीर मल-मूत्र रहित, प्रस्वेद रहित था तथा रक्त का रग श्वेत-दूध समान था, वज्र संहनन था, सर्वांग सुन्दर उसकी आकृति थी, सुगन्धित श्वास था, अद्भुत रुप, अतिशय बल एवं मधुरवाणी थी। उस शरीर मे १००८ उत्तम चिह्न थे।

इस प्रकार बालतीर्थंकर के शरीर मे जन्म से ही पुण्यजनित दस अतिशय थे। वह अतिशयता कर्मजनित शरीराश्रित थी उसके द्वारा कही भगवान की सच्ची पहिचान नही होती हों, भगवान के आत्मा मे जन्म से ही सम्यग्दर्शन-ज्ञानरुप चैतन्य भावोंकी जो अतिशयता थी, वह धर्मजनित और आत्माश्रित थी, वही उनकी सच्ची अतिशयता थी, और उन लक्षणों द्वारा भगवान को सच्चे स्वरुप में पहिचाना जा सकता है। शरीर के गुणो की दिव्यता वह कही वास्तव में महावीर नही है, वह तो मात्र महावीर के आत्मा के साथ संयोगरुप से लगा हुआ सुन्दर पुद्गलोंका पिण्ड है। महावीर के सानिध्य के कारण वह भी उपचार से पूज्यरुप बना है। सच्चे महावीर तो अतीन्द्रिय, रुपातीत, अगरीरी, चैतन्यगुण- सम्पन्न है। ऐसे भाव से जो महावीर को जानता है वह जीव सम्यक्त्व प्राप्त करके आनन्दित होता है।

तेईसवे तीर्थंकर पार्श्वप्रभु का निर्वाण होने के २५० वर्ष पश्चात् भगवान महावीर ने निर्वाण प्राप्त किया अर्थात् पार्श्वप्रभु के निर्वाण के १७८ वर्ष पश्चात् वीरप्रभु का अवतार हुआ। उनकी आयु ७१ वर्ष ६ मास १७ दिन थी। [बालप्रभु वीरकुँवर को रत्नो के पालने में झुलाते हुए माता त्रिशला देवी तथा छप्पनकुमारी देवियाँ कैसे सुन्दर मगल-गीत गाती थी ! उनकी कुछ बानगी भगवान नेमिनाथ चरित्र पृष्ठ मे देखिये]

देवकुमारों तथा राजकुमारों की तत्त्वचर्चा

एक बार चैत्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन वीरकुवँर का जन्म-दिन मनाने हेतु देवकुमार और राजकुमार कुण्डग्राम के राजोद्यान मे एकत्रित हुए थे। वीर कुवँर के आने मे कुछ देर होने से वे तत्त्व चर्चा करने लगे। उनकी चर्चा कितनी सुन्दर थी वह हम देखे-❋ देवकुमार:-भाइयो, आज वीरकुवँर का जन्मदिन है। वे राजभवनसे यहाँ पधारें तबतक हम थोड़ी धर्मचर्चा करे।

❋ राजकुमार बोले:-वाह, यह तो बड़ी अच्छी बात है ! धर्म के महान दिवस पर तो धर्मचर्चा ही शोभा देती है।

❋ देवकुमार:- ठीक है, आज हम ‘सर्वज्ञ’ के स्वरुप की चर्चा करेंगे। बोलो राजकुमार ! हम किस धर्म को मानते हैं ? और हमारे इष्ट देव कौन हैं ? ※ राजकुमार:-हम जैन धर्म को मानते हैं. . उसमें आत्मा के शुद्धभाव द्वारा मोह को जीतते हैं और भगवान ‘सर्वज्ञ’ अपने इष्टदेव हैं। ❁ ‘सर्वज्ञ’ कौन हैं ? ❁ 'सर्वज्ञ नाम कोई व्यक्ति वाचक नहीं है, परन्तु मोह का नाश करके ज्ञान-स्वभावी आत्मा की सर्व ज्ञान-शक्ति जिनके विकसित होगई है वे सर्वज्ञ है; इस प्रकार ‘सर्वज्ञ’ शब्द गुणवाचक है। ❁ सर्वज्ञ कब हुए ? ※ राजकुमार:-सर्वज्ञ अनादि से होते आ रहे हैं; वर्तमान में होते हैं और भविष्य में भी होते रहेंगे । ※ सर्वज्ञ कितने हैं ? उनके कितने प्रकार हैं ? ❁ सर्वज्ञ हुए अनन्त जीव हैं; उन सबकी सर्वज्ञता एकसमान है, उसमें कोई अन्तर नहीं है; परन्तु अन्य प्रकार से उनके ‘सिद्ध’ और ‘अरिहंत’ ऐसे दो भेद हैं। ❁ वे सर्वज्ञ भगवन्त कहाँ रहते है ? ※ सर्वज्ञ मे जो सिद्ध है वे लोकाग्र मे सिद्धलोक में विराजते है; वे अनन्त हैं। उनके अतिरिक्त कितने ही सर्वज्ञ ‘अरिहंत’ पद पर विराजमान हैं, वे इस मध्यलोक में मनुष्य रुप में विचरते हैं और ऐसे लाखों ‘अरिहंत’ हैं। ❁ ऐसे किन्ही सर्वज्ञ का नाम बतलाएँगे ? ❁ हाँ, इस समय महाविदेहक्षेत्र में श्रीसीमंधर भगवान आदि सर्वज्ञ रुप से विचर रहे हैं; वे ‘अरिहंत-सर्वज्ञ’ हैं; और पार्श्वनाथ आदि भगवन्त वर्तमान में सिद्धलोक में विराजते है वे ‘सिद्धसर्वज्ञ’ हैं। अपने महावीर कुमार भी ४२ वें वर्ष में सर्वज्ञ होंगे। ※ देवकुमार:-सर्वज्ञ क्या करते हैं ? ※ राजकुमार:-सर्वज्ञ अर्थात सबके ज्ञाता; सर्वज्ञ भगवान अपने ज्ञानसामर्थ्य से सब जानते हैं और उस ज्ञान के साथ वे अपने पूर्ण आत्मिक सुख का अनुभव करते हैं। वे विश्व के ज्ञाता है किन्तु कर्ता नहीं है। ❁ ऐसे सर्वज्ञ को ही देव किसलिये मानना ? ※ क्योंकि अपने को अतीन्द्रिय पूर्ण सुख तथा पूर्णज्ञान इष्ट है-प्रिय है, इसलिये जिन्हें ऐसा सुख एवं परिपूर्ण ज्ञान प्रगट हुआ है उन्हीं को हम अपने इष्ट देव रुप में मानेंगे। ※ देवकुमार:- सर्वज्ञ को मानने से हमे क्या लाभ ? ※ राजकुमार:-सर्वज्ञ को जानने से हमे आत्मा के पूर्ण सामर्थ्य की प्रतीति होती है; और अपने आत्मा के पूर्ण सामर्थ्य की प्रतीति होने के कारण परमें से ज्ञान या सुख लेने की पराधीन मान्यता दूर हो जाती है; बाह्यविषयों में सुख की मिथ्याकल्पना छूटकर आत्मस्वभाव में जो अतीन्द्रियज्ञान एवं सुख है उसकी श्रध्दा प्रगट होती है। तथा सर्वज्ञता के साथ राग-द्वेष का कोई अंश भी नहीं रह सकता, इसलिये सर्वज्ञ को जानने से राग-द्वेष से भिन्न आत्मा के शुद्धस्वरुप की पहिचान होती है। इस प्रकार सर्वज्ञ को जानने से अपने आत्मा में स्वाश्रयपूर्वक सम्यग्ज्ञान एवं अतीन्द्रिय सुख होता है अर्थात् धर्म का प्रारम्भ होता है, -यह अपूर्व लाभ है। ❁ क्या सर्वज्ञ को माने बिना धर्म नहीं हो सकता ? ※ नहीं, सर्वज्ञ को माने बिना कदापि धर्म नहीं होता। ※ सर्वज्ञ को माने बिना क्यों धर्म नहीं होता ?

※ क्योंकि सर्वज्ञता ही आत्मा की पूर्ण प्रगट हुई परमात्मशक्ति है; आत्मा की पूर्ण प्रगट हुई शक्ति को जो नहीं मानेगा वह अपने आत्मा की परमात्मशक्ति को भी कहाँ से जानेगा ? और जब तक अपने आत्मा की पूर्ण शक्ति को नहीं जानेगा तबतक परमे से ज्ञान या सुख प्राप्त करनेकी पराश्रित-मिथ्याबुध्दि बनी ही रहती है; जहाँ पराश्रित बुध्दि हो अर्थात् बाह्यविषयों मे सुख बुध्दि हो वहाँ धर्म हो ही नहीं सकता। इस प्रकार सर्वज्ञ को माने बिना कदापि धर्म नहीं हो सकता।

※ देवकुमार-सर्वज्ञ को माने बिना आत्मा की पूर्ण शक्ति को मान ले तो ?

※ राजकुमार-यदि आत्मा की पूर्णशक्ति को यथार्थरूप से माने तो उसमें सर्वज्ञकी प्रतीति भी अवश्य आ ही जाती है। यदि सर्वज्ञ की प्रतीति न हो तो आत्माकी पूर्ण शक्ति की प्रतीति भी नहीं होती। अपने को पूर्ण सुख चाहिये न ? तो जहाँ पूर्णज्ञान हो वही पूर्ण सुख होता है; इसलिये पूर्ण ज्ञान कैसा होता है उसका निर्णय करना चाहिये। पूर्णज्ञान के निर्णय मे ही सर्वज्ञ की मान्यता आ गई, तथा ज्ञान एव रागका भेदज्ञान भी हो गया, क्योकि पूर्णज्ञान मे राग का सर्वथा अभाव है। भले ही सर्वज्ञ अपने सामने उपस्थित न हो, परन्तु अपने ज्ञान मे तो उनका निर्णय हो ही जाना चाहिये। तभी आत्मा की पूर्ण शक्ति का विश्वास आयगा और धर्म होगा।

※ देवकुमार -सर्वज्ञ कौन हो सकता है ?

※ राजकुमार -प्रथम जो सर्वज्ञ को तथा सर्वज्ञ समान अपने आत्मा की परमात्मशक्ति को जाने वह जीव अपनी शक्ति मे से सर्वज्ञता कि व्यक्ति करके सर्वज्ञ होता है। इसलिये-

जो सर्वज्ञस्वभाव को जाने वह आत्मज्ञ होता है,
जो आत्मज्ञ हो वह अवश्य सर्वज्ञ होता है।

इस प्रकार सर्वज्ञता वह जैनधर्मका मूल है।

इसलिये हे मुमुक्षु भव्य जीवो ! यदि तुम धर्मार्थ सर्वज्ञका निर्णय करना चाहते हो तो सर्वज्ञता के प्रति जिनकी परिणति उल्लसित हो रही है, जिनकी वाणी एव मुद्रा सर्वज्ञता की निःशंक घोषणा कर रही है, तथा राग से भिन्न ज्ञान चेतना के बल से जो सर्वज्ञ होकर जिनशासन के धर्मचक्र का प्रवर्तन करनेवाले हैं-ऐसे श्री वीर प्रभु को चैतन्यभाव से जानो।

जो जानता महावीर को चेतनमयी शुद्धभाव से,
वह जानता निजआत्म को सम्यक्त्व लेता चावसे।

प्रभुकी ज्ञान चेतना को जानने से रागरहित सर्वज्ञस्वभावी आत्मा तुम्हारे स्वसवेदन में आ जायगा और सम्यक्त्व सहित सर्वज्ञता का सर्व समाधान हो जायगा, तुम्हारा परिणमन राग से भिन्न ज्ञानचेतनारूप हो जायगा और तुम स्वयं अल्पकाल मे अल्पज्ञ मिटकर सर्व काल के लिये सर्वज्ञ हो जाओगे।

-इस प्रकार देवकुमारों तथा राजकुमारों के बीच तत्त्वचर्चा चल रही थी, उस समय राजभवन में (चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को) क्या हो रहा था वह हम देखें।

वर्द्धमान कुमार ने प्रातःकाल सिध्दोंका स्मरण करके आत्मचिन्तन किया। फिर माताजी के पास आये। त्रिशलामाताने बड़े उत्साहपूर्वक पचपरमेष्ठी का स्मरण करके प्रिय पुत्र को तिलक किया और बलैयाँ लेकर मंगल आशीर्वाद दिया। माता का आशीष लेकर वीरकुमार प्रसन्न हुए और उनसे आनन्दपूर्वक चर्चा करने लगे। अहा, माताजी के साथ वीर कुँवर कैसी आनन्दप्रद चर्चा करते हैं वह सुनने के लिये हम राजासिध्दार्थ के राजभवन मे चलें . !

त्रिशला माता के राजभवन में

वाह ! देखो, यह राजा सिद्धार्थ का राजभवन कितना भव्य एवं विशाल है ! इसका शृंगार भी कितने अद्भुत ढंग से किया गया है ! आज चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को वीरप्रभुका जन्मदिन होने से राजभवन के प्रांगण में हजारों प्रजाजन वीरकुँवर के दर्शनार्थ एकत्रित हुए हैं; आज वे पाँचवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। राजभवन के भीतर उस कक्ष की शोभा तो स्वर्गकी इन्द्रसभा को भी भुला दे ऐसी है; परन्तु अपना लक्ष वहाँ नहीं जाता, अपनी दृष्टि तो सीधी महावीर कुँवर पर केन्द्रित है। अहा, वे कैसे सुशोभित हो रहे हैं ! त्रिशला माता अपने इकलौते पुत्र को कितना लाड कर रही है। और कुँवर भी माताजी के आनन्दपूर्वक चर्चा कर रहे है। चलो, हम भी वह सुने-

※ वीर कुँवर ने पूछा-हे माता ! जिन्हे भव नहीं है और जो मोक्ष को भी प्राप्त नही हुए-वे कौन
है ?

※ माताने पुत्र के सिर पर हाथ फेरते हुए हँसकर कहा-‘वह तो मेरा प्यारा पुत्र !’ फिर उन्हें गोद मे लेकर चुम्बन करते हुए कहा-बेटा, वह तो तू ही है कि जिसे अब भव भी नहीं है और जिसने अभी मोक्ष प्राप्त नही किया।

※ वीर कुँवर कहते हैं-हे माता ! शुद्धात्मतत्त्व की महिमा कैसी अगाध है-वह तुम जानती हो ?

※ हाँ बेटा, जब से तू मेरे अंतर में आया तब से शुद्धात्मतत्त्व की महिमा मैंने जान ली है।

※ ‘तुमने आत्माकी कैसी महिमा जानी है ?-वह मुझे बतलाओ।’

※ बेटा, जबसे यहाँ रत्नवृष्टि प्रारम्भ हुई, मुझे १६ स्वप्न दिखायी दिये, और मैंने उन स्वप्नों का उत्तमफल जाना, तब से मुझे ऐसा लगा कि-अहा, जिसके पुण्य का प्रभाव इतना आश्चर्यकारी है उस आत्मा की पवित्रता का क्या कहना ! ऐसा आराधक आत्मा मेरे उदर में विराज रहा है ! -ऐसी अद्भुत महिमा से आत्मा को आराधक भाव का विचार करते-करते किसी अचिन्त्य आनन्दपूर्वक मुझे शुद्धात्मतत्त्व का भास हुआ। बेटा, यह सब तेरा ही प्रताप है।

※ हे माता ! तुम्हें तीर्थंकर की माता बनने का महान सौभाग्य प्राप्त हुआ, तू जगतकी माता कहलायी। चैतन्य की अद्भुत महिमा को जाननेवाली हे माता ! तुम भी अवश्य मोक्षगामी हो । ※ बेटा वर्द्धमान ! तेरी बात सत्य है। स्वर्ग से तेरा आगमन हुआ तभी से अंतर एवं बाह्यवैभव वृद्धिगत होने लगा है; मेरे अंतर में आनन्द का अपूर्व स्फुरण होने लगा है। तेरे आत्मा का स्पर्श होते ही मुझे आराधक भाव प्रारम्भ हो गया है, और मैं भी एक भव पश्चात् तेरी भाँति मोक्ष की साधना करूँगी।

※ धन्य है माता ! मेरी माता तो ऐसी ही शोभित होना चाहिये ! माता, तुम्हारी बात सुनकर मुझे आनन्द होता है। मैं इसी भव में मोक्ष को साधने हेतु अवतरित हुआ हूँ, तो मेरी माता भी ऐसी ही होगी न !

※ बेटा, तू तो समस्त जगत को मोक्षमार्ग दरशानेवाला है; तेरे प्रताप से तो जगत के भव्यजीव आत्मज्ञान करेंगे और मोक्षको साधेंगे…तो मैं तेरी माता क्यों बाकी रहूँ !-मैं भी अवश्य मोक्षमार्ग में आऊँगी। बेटा तू भले ही सारे जगत का नाथ है, परन्तु मेरा तो पुत्र ही है ! तुझे आशीर्वाद देने का मुझे अधिकार है।

※ ‘वाह, माता ! तुम्हाग स्नेह अपार है ..माता के रुप में तुम पूज्य हो. .तुम्हारा वात्सल्य जगत में अजोड़ है।’

माता मारी मोक्षसाधिका धन्य धन्य छे तुजने .. तुज हैयानी मीठी आशीष, वहाली लागे मुजने… माता ! दरशन तारा रे, जगतने आनंद देनारा बेटा,तारो अद्भुत महिमा सम्यक् हीरले सोहे… तारा दरशन करता भव्यो, मोहनां बंधन तोड़े. बेटा ! जन्म तुमारो रे जगतनु मंगल करनारो… माता ! तारी वाणी मीठी, जाणे फूलड़ां खरतां .. तारा हैड़े हेत फूवारा, ..झरमर-झरमर झरता… माता ! दरशन तारा रे.. जगतने आनंद देनारा. . तारी वाणी सुणतां भव्यो, मुक्तिपथे दोड़े… चेतनरसनो स्वाद चाखे त्यां राजपाट सब छोड़े .. बेटा ! जन्म तुमारो रे जगतनुं मंगल करनारो… जागे भावना माता मुजने, क्यारे बनुं वीरागी .. बंधन तोडी रागतणां सौ, बनुं परिग्रह-त्यागी … माता दरशन तारा रे जगतने आनंद देनारा… बेटा ! तुं तो पांच बरसनो, पण गंभीरता भारी… गृहवासी पण तुं तो उदासी, दशा मोहथी न्यारी… बेटा ! जन्म तुमारो रे जगतनुं मंगल करनारो… माता ! तुं तो छेल्लीमाता, माता बीजी नहि थाशे… रत्नत्रयथी केवल लेतां जन्म-मरण दूर जाशे… माता ! दरशन तारा रे जगतने आनन्द देनारा… … बेटा ! तुं तो जगमां उत्तम जीवन जीबनारो… जिनभक्ति नो सन्देश दईने, मुक्तिमार्ग खोलनारो… … बेटा… धर्म तुमारो रे जगतनुं मंगल करनारो… माता ! मुक्ति मारग भूली भटकी चाल्या आवे… भरतक्षेत्रमां जयवंत शासन, आनंद मंगल आपे… माता ! दरशन तारा रे जगतने आनंद देनारा..! वर्द्धमान तुं साचो बेटा, धर्म वृष्टि करनारो… महावीर पण साचो तुं छो, मोहमल्ल जीतनारो… बेटो, धर्म तुमारो रे…जगतनुं मंगल करनारो… माता, करूँ निजधर्मनी वृष्टि, परमातम-पद पामुं,… जीव बधा जिनधर्म ने पामो…एवी भावना भावुं… माता ! दरशन तारा रे जगतने आनंद देनारा… बेटा, जगमां धर्मनी वृद्धि थाशे तारा प्रतापे… जे चाले तुज पगले-पगले, मोक्षपुरीमां आवे… बेटा धर्म तमारो रे जगतने आनंद देनारो… माता ! अनुभूति-चेतननी , अतिशय मुजने वहाली,… अनुभूतिमां आनंद उल्लसे, एनी वात ज न्यारी… माता…दरशन तारा रे जगतने आनंद देनारा… बेटा ! तुं तो स्वानुभूतिनी मस्तीमां नित म्हाले… हींचोलु हीरलानी दोरे, उरनां वहाले-वहाले… बेटा जन्म तुमारो रे जगतने आनन्द देनारो… आहा, त्रिशलामाता और बालतीर्थंकर वर्द्धमान कुँवर की यह चर्चा कितनी आनन्दकारी है ! माता को आनन्दित करके वीरकुमार बोले-माँ, मेरे मित्र बाहर मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं, मैं उनके पास जाता हूँ।

माँ ने कहा-अवश्य जाओ बेटा ! सबको आनन्द देने के लिये तो तुम्हारा अवतार है।

माताजी से आज्ञा लेकर वीर कुमार तपोवन में आये; उन्हें देखते ही देवकुमार तथा राजकुमार हर्षपूर्वक जयजयकार करने लगे और अनेक प्रकार से उनका सन्मान किया।

वीरकुमार ने भी प्रसन्न दृष्टि से सबकी ओर देखा और माताजी के साथ हुई आनन्दकारी चर्चा कह सुनाई। वह सुनकर सबको बड़ी प्रसन्नता हुई।

एक राजकुमार बोले-अहा ! तीर्थंकरके मित्र होने से अपने को उनके साथ रहने तथा खेलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, तो हम सब उनके साथ मोक्ष की साधना भी अवश्य करेंगे; वे दीक्षा ग्रहण करेंगे तब उनके साथ हम सब भी दीक्षा लेंगे।

यह सुनकर देवकुमारों के मुखपर उदासी छा गई। ‘तुम क्यों उदास हो गये मित्र ?’ ऐसा पूछने पर देवकुमारों ने कहा-हे मित्रो ! तुम तो मनुष्यपर्यायमें हो इसलिये प्रभु के साथ दीक्षा ले सकोगे; परन्तु हम देवपर्याय में होने के कारण प्रभु के साथ दीक्षा नहीं ले सकते, -इस विचार से हमें खेद होता है।

महावीर बोले : बन्धु देव ! सम्यग्दर्शन द्वारा देवपर्याय में भी चैतन्य की आराधना चलती रहती है और ऐसे आराधक जीव मोक्ष के मार्ग में ही चल रहे हैं; जीव को मोक्षमार्ग की प्राप्ति वह अपूर्व महान लाभ है। मोक्षमार्ग में लगा हुआ जीव अल्पकाल में मोक्ष को साध लेगा-इसमें संशय नहीं है।

महावीर की ऐसी गम्भीर वाणी सुनकर सब को हर्ष हुआ और फिर बालतीर्थंकरके साथ सम्यक्त्व सम्बन्धी बहुत चर्चा की। अहा, छोटे-से द्रव्य-तीर्थंकरके श्रीमुख से वीतरागी मोक्षमार्ग की सुन्दर बातें सुनकर उन कुमारों को जो हार्दिक प्रसन्नता हुई-उसका क्या कहना ? ढाई हजार वर्ष पूर्वका यह प्रसंग आज भी हमें उतना ही आनन्द देता है, तो उस प्रसंग को प्रत्यक्ष देखनेवाले जीवों के महान आनन्द का क्या कहना !! कितने ही कुमार उस समय सम्यक्त्व को प्राप्त हुए। साथ ही पाठकों को यह जानकर आनन्द होगा कि वीरकुँवर की बात मनुष्यों की भाँति हाथी घोड़े और बन्दर भी प्रेम से सुनते थे और प्रसन्न होते थे।

बाल महावीर अपने बालमित्रों के साथ ऐसी चर्चा भी करते थे और बालसुलभ क्रीड़ाएँ भी; परन्तु उस समय वे मात्र क्रीड़ाओ में ही नहीं वर्तते थे, उन बाल महात्मा की चेतना उस समय भी अंतर में अतीन्द्रिय ज्ञानक्रीड़ा करती थी। कई बार वे चैतन्यभवन में जाकर निर्विकल्प ध्यान कर लेते थे। उनके अंतरंग ज्ञान जीवन का आनन्द कोई अनुपम था-एक बार वीर कुमार अपने मित्रों के साथ चर्चा-विनोद करते थे, इतने में अचानक एक आश्चर्यजनक घटना हुई… क्या हुआ ? वह अगले प्रकरण में पढ़ेंगे।

बालवीर की महा-वीरता

जीत लिया मिथ्यात्व-विष, सम्यक्-मंत्र प्रभाव,
नाग लगा फुफकारने, प्रभु को समता भाव।
जहाँ इन्द्रियातीत भाव है, वहाँ नाग क्या करता ?
रुप बदलकर बना देव वह, नमन वीर को करता।

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भगवान महावीर (भाग ५)

फूँ…फूँ करता हुआ एक भयंकर विषैला नाग अचानक ही फुँफकारता हुआ वहाँ आ पहुँचा…जिसे देखकर सब राजकुमार इधर-उधर भागने लगे; क्योंकि उन बालकों ने पहले कभी ऐसा भयंकर सर्प नहीं देखा था। परन्तु महावीर न तो भयभीत हुए और न भागे ।

अहिंसा के अवतार महावीर को मारनेवाला कौन है ? वे तो निर्भयता से सर्प की चेष्टाएँ देखते रहे। जैसे मदारी साँप का खेल कर रहा हो। और हम देख रहे हों !. तदनुसार वर्द्धमान कुमार उसे देख रहे थे।

शांतचित्त से निर्भयतापूर्वक अपनी ओर देखते हुए वीरकुमार को देखकर नागदेव आश्चर्यचकित हो गया कि-वाह ! यह वर्द्धमान कुमार आयु में छोटे होनेपर भी महान हैं…वीर हैं ! उसने उन्हें डराने के लिये अनेक प्रयत्न किये; बहुत फुँफकारा. परन्तु वीर तो अडिग रहे; वे निर्भयता से सर्प के साथ खेलने के लिये उसकी ओर जाने लगे।

दूर खड़े राजकुमार यह देखकर घबराने लगे कि अब क्या होगा ?..सर्प को भगाने के लिये क्या किया जाये उसके सोच-विचार में पड़ गये. इतने में लोग क्या देखते हैं कि-वह भयंकर सर्प अपनेआप अदृश्य हो गया ! …उसके स्थानपर एक तेजस्वी देव खड़ा है…और हाथ जोड़कर वर्द्धमान कुमार की स्तुति करते हुए कह रहा है कि-हे देव ! आप सचमुच ‘महावीर’ हैं। आपके अतुलबल की प्रशंसा स्वर्ग के इन्द्र भी करते हैं। मैं स्वर्ग का देव हूँ; मैंने अज्ञानभाव से आपके बल और धैर्य में शंका की; मैं नाग का रूप धारण करके आपकी परीक्षा ले रहा था; मुझे क्षमा कर दें ! तीर्थंकरों की दिव्यता वास्तव में अद्भुत है ! प्रभो ! आप वीर नहीं किन्तु ‘महावीर’ हैं।

महावीर कुमार तो देव की बात गंभीरता से सुन रहे हैं; परन्तु हम उस देवको उत्तर देंगे कि-अरे देव ! तू तो परीक्षा करने के लिये सर्प का रूप धारण करके आया था; परन्तु कदाचित् सच्चा सर्प भी आया होता तो क्या था ? वह सर्प भी महावीर के सान्निध्य में निर्विष हो जाता। जिनकी शांत दृष्टि के समक्ष मिथ्यात्व का विष भी टिक नहीं सकता, उन भगवान की दृष्टि पड़ने से सर्प भी निर्विष हो जायें-इसमें क्या आश्चर्य है ! सम्पूर्ण कषायों को जीतनेवाले वीर क्या एक सर्प से डर जायेंगे ? -कदापि नहीं। महावीर की वीरता वह किन्हीं बाह्य शत्रुओं को जीतने के लिये नहीं है, किन्तु वह तो अंतरंग कषाय-शत्रुओं पर विजय प्राप्त करनेवाली वीतरागी वीरता है। उन वीरकी वीतरागता के सान्निध्य में विषैले सर्प भी अहिंसक बन जायेंगे और मिथ्यात्व-विष को छोड़कर सम्यक्त्व-अमृत का पान करेंगे।

अन्तर एवं बाह्य में वृद्धिंगत होते-होते राज कुँवर महावीर जब आठ वर्ष के हुए तब एक बार अत्यन्त विशुद्धि से अंतर में चैतन्य धाम में एकाग्रता की धुन लगने से निर्विकल्प ध्यान का अपूर्व आनंद प्रगट हुआ और प्रभु चतुर्थ गुणस्थान से पंचम गुणस्थान में पधारे। आठ वर्ष की आयु में शुद्धि की वृद्धिपूर्वक प्रभु ने पंचअणुव्रत धारण किये। प्रभु श्रावक हो गये। यद्यपि उनका जीवन तो पहलेसे ही अहिंसादि रूप था; परन्तु आठवे वर्षमें बालक वर्द्धमान चौथे से पांचवे गुणस्थान में आने पर अप्रत्याख्यान सम्बन्धी चारों कषाय नष्ट हो गये और आत्मिक आनन्द की वृद्धि हुई; कषायों को जीतने की वीरता में वीर प्रभु एक डग आगे बढ़े।

तत्पश्चात् बाल तीर्थंकर की वीतरागी वीरता की एक अन्य घटना हुई, जिसका आनन्ददायक वर्णन आप आगे पढ़ेंगे।

शान्त दृष्टि से हाथी को वश में करने की घटना

वह दिख रहा है वैशाली राज्य का नंदावर्त राजप्रासाद; जिस पर अहिंसाधर्म की ध्वजा फहरा रही है। कैसी अद्भुत है इस राजप्रासाद की शोभा !! क्यों न हो, बालतीर्थंकर जिसके अन्तर में वास करते हों उसकी शोभा का क्या कहना ! उस प्रासादकी शोभा चाहे जैसी हो, तथापि इन्द्रियगम्य एवं नश्वर थी; जब कि उसमें निवास करनेवाले प्रभुके सम्यक्त्वादि गुणों की शोभा अतीन्द्रियगोचर एवं अविनश्वर थी। प्रभुके पुण्य ही उस प्रासाद का रूप धारण करके सेवक रूप में सेवा करने आये थे। उस सात खण्ड ऊँचे राजप्रासाद के प्रांगण में छोटे-से वीरप्रभु खड़े हों तब प्रेक्षकों को वीर प्रभु बड़े और प्रासाद छोटा लगता था। राजप्रासाद के निकट हस्तिशाला में कितने ही श्रेष्ठ हस्ती शोभा देते थे। राजप्रासाद के मार्ग से आनेजानेवाले हजारो प्रजाजनों को वर्द्धमान कुँवर के दर्शनों की उत्कण्ठा रहने से उनकी दृष्टि राजप्रासाद के प्रत्येक झरोखे पर घूम जाती थी और कभी किसीको झरोखे में खड़े हुए वीरप्रभुके दर्शन हो जाते तो उसका हृदय आनन्द से नाच उठता था… कि वाह ! आज तो बालतीर्थंकर के दर्शन हो गये ! पाठक ! चलो हम भी राजप्रासाद में चलें और वीर प्रभुके दर्शन करके धन्य बनें।

राजकुमार महावीर शान्तिपूर्वक अपने कक्ष में बैठे हैं और विचार कर रहे हैं; कि-अहा, चैतन्य की अल्प (चौथे-पाँचवें गुणस्थान की) शान्ति को भी डिगा सके ऐसी शक्ति जगत में किसी की नहीं है; तो फिर चैतन्यतत्त्व की परिपूर्ण परम शान्ति का क्या कहना ! शान्त रस के उस महासागर की शक्ति तो अपार है। जगत के भव्य जीव एक बार भी अपने शान्तरस को देख ले तो अंदर में परमतृप्तिका अनुभव होकर जगतसे निर्भय हो जाय। कक्ष में बैठे-बैठे वीर कुँवर इस प्रकार आत्माके शान्तरस का विचार कर रहे हैं; उस समय राजप्रासाद के बाहर क्या हो रहा है-वह देखें।

राजमार्ग पर तो कोलाहल मचा है और प्रजाजन भयभीत होकर इधर-उधर भाग रहे हैं। बचाओ !..बचाओ !..की आवाजें आ रही हैं ! राजा का हाथी पागल होकर दौड़ रहा है… बचाओ !

आत्मा की अगाध शान्ति का विचार करते हुए महावीर ने वह कोलाहल सुना और धीर-गम्भीर रुप से बाहर राजमार्गपर आये। उन्होने हाथ उठाकर लोगों को आश्वासन दिया और शान्त रहने को कहा। महावीर को देखते ही मानो चमत्कार हुआ…लोग निर्भय होकर आश्चर्यपूर्वक देखने लगे कि अब क्या होता है !

एक ओर बालक महावीर, .. दूसरी ओर क्रोधाविष्ट मदोन्मत्त हाथी। बालक महावीर धीर-गम्भीर चालसे उस ओर चलने लगे जिधर से हाथी दौड़ता आ रहा था .. हाथी के सामने आकर उस पर दृष्टि स्थिर कर के खड़े हो गये…क्षण दो क्षण शान्त दृष्टि से हाथी को देखते रहे।

अहा कैसी शान्तरस भरी थी वह अमी दृष्टि ! मानो उससे अमृत झर रहा था। उस दृष्टिद्वारा महावीर कह रहे थे कि-अरे गजराज ! यह पागलपन छोड़। लोग तेरे पागलपन का कारण नहीं जानते किन्तु मैं जानता हूँ। अरे, यह चार गति के दुःख और उनमें यह तिर्यंच गति की वेदनाः… उससे तू अकुला गया है और छूटने को उद्विग्न हुआ है… परन्तु धैर्य रख… शांति हो ! उद्वेग करने से यह दुःख दूर नहीं होगा।

अहा, हाथी तो मानो भगवान के नेत्रों से झरते हुए शान्त रस के स्रोत का पान कर रहा हो इस प्रकार टकटकी बाँधकर प्रभु की ओर देखता ही रह गया , आसपास के वातावरण को वह भूल गया। ‘वाह’ कैसी शान्ति है इन कुमार के मुखमण्डल पर ! मुझे भी ऐसी शान्ति प्राप्त हो जाय तो कितना अच्छा !!

ऐसा विचारते हुए वह हाथी बिलकुल शान्त हो गया। लोगोंने यह चमत्कार देखा; परन्तु वे समझ नहीं पाये कि-महावीरने किस प्रकार मदोन्मत्त हाथी को वश कर लिया ? जो लोग विचक्षण थे वे समझ गये कि बालप्रभुने किसी बलसे या शस्त्र से नहीं किन्तु आंतरिक शान्ति के बल से ही हाथी को वश कर लिया है और ऐसा करके जगत को बतलाया है कि-“जगत के किसी भी अस्त्र-शस्त्र की अपेक्षा आत्मबल-शान्तिबल महान है।”

बन्धुओ !जिस प्रकार शिशु महावीर ने विशाल हाथी को वश कर लिया, उसी प्रकार अल्प चेतनभाव भी बड़े-बड़े उपद्रवभावों को जीत लेता है। हाथी को जीतने के लिये महावीर ने क्रोध नहीं करना पड़ा, किन्तु शान्ति के बल से ही उसे जीत लिया, उसी प्रकार विषयकषायरूप पागल हाथी को जीतने के लिये क्रोधकी अथवा रागादि की आवश्यकता नहीं होती किन्तु वीतरागी शान्ति द्वारा ही मुमुक्षु वीर उसे जीत लेते हैं।

हाथी जैसा प्राणी भी क्रोध द्वारा वश में नहीं होता, वह शान्ति द्वारा सहज ही वश में हो जाता है; इससे सिद्ध होता है कि उसे भी क्रोध अच्छा नहीं लगता, शान्ति ही अच्छी लगती है। जगत् के सर्व जीवों को शान्ति प्रिय है, क्यों कि शान्ति उनका स्वभाव है ।

[क्या सचमुच वह हाथी पागल हुआ था ? या फिर उसे प्रभुके दर्शनों की तीव्र उत्कण्ठा जागृत हुई थी ? , और वीर कुँवर के दर्शनों की धुन में वह आकुलित होकर राजप्रासाद की ओर दौड़ रहा था; उसे दौड़ता देखकर ही लोगों ने उसे पागल मान लिया होगा ! देखो, प्रभुको देखते ही वह हाथी बिलकुल शान्त होगया ! प्रभुका प्रभाव सचमुच आश्चर्य जनक है ।]

[कवि श्री नवलशाह रचित महावीर पुराण में इस हाथी की घटना में हाथी को देव की विक्रिया होना लिखा है ।]

अब यहाँ एक बात लक्ष में रखना है-शिशु महावीर ने विशाल हाथी को जीत लिया इसीसे वे कहीं अपने इष्टदेव नहीं हैं; अपने इष्टदेव तो ‘सर्वज्ञ महावीर’ हैं । हाथी को जीतते समय उनमें, मोहरूपी हस्ती को जीतकर जो सम्यक्त्वादि भाव वर्तते थे वही भाव उनको सर्वज्ञता का साधन हुए हैं, इसलिये मोह विजयी महावीर अपने इष्ट हैं ।

एक रीति से देखा जाये तो, उपरोक्त घटना में हाथी द्वारा हुआ उत्पात वह उदयभावों का प्रतीक है; और महावीर ने शान्त-प्रतिबोध से उसे जीत लिया वह उपशान्त भाव का प्रतीक है । बाल्यावस्था में भी उस महावीर आत्मा में जितना उपशान्त भाव (ज्ञान चेतना रूप भाव) था वही हमें इष्ट है, और उस भाव स्वरूप ही हमें महावीर को देखना चाहिये ।

[पुराणों में वर्णित प्रत्येक घटना द्वारा उन-उन आराधक महात्माओं की चैतन्य परिणती में ज्ञानादिके कैसे भाव वर्तते थे, उनभावों की पहिचान करने से उन आराधक जीवों की सच्ची पहिचान होती है और स्वयं को वैसे आराधक भाव की उत्तम प्रेरणा मिलती है ।

सन्मतिनाथ

[संजय और विजय मुनिवरों का प्रसंग]

…तीर्थंकर वर्द्धमान जब बाल्यावस्था में थे , उस काल पार्श्वनाथ तीर्थंकर का शासन चल रहा था; उस शासन में संजय और विजय नाम के दो मुनि विचर रहे थे; रत्नत्रयवन्त वे मुनिवर आकाश गामी थे । स्वानुभूति की चर्चा करते-करते वे सिद्ध-क्षेत्र की वन्दना हेतु सम्मेदशिखर तीर्थभूमि में पधारे और वहाँ अनन्त सिद्धों का स्मरण करके आत्मध्यान किया । पश्चात् संजय मुनि बोले-अहा, स्वानुभूति में आत्मा स्पष्ट ज्ञात होता है; वहाँ मति-श्रुतज्ञान होनेपर भी वे अतीन्द्रिय भाव से काम करते हैं, इसलिये स्वसंवेदन में प्रत्यक्षपना है इसमें कोई सन्देह नहीं रहा ।

तब विजय मुनिने कहा-हाँ मुनिराज ! आपकी बात सत्य है; परन्तु मति-श्रुतज्ञान निर्बल होने से किन्ही सूक्ष्म ज्ञेयोंमें सन्देह भी बना रहता है । देखो न, सूक्ष्म अगुरुलघुत्वजनित षट्गुण वृद्धि हानि के किसी गंभीर रहस्य का हल अभी हमें नहीं मिलता और सूक्ष्मशल्य रहा करती है । पार्श्वनाथ भगवान तो मोक्ष पधारे, और वर्द्धमान तीर्थंकर अभी बाल्यावस्था में हैं; किसी केवली या श्रुतकेवली के दर्शन से ही हमारी इस सूक्ष्म शंका का समाधान हो सकेगा । -इस प्रकार सूक्ष्म शल्य सहित विचरते हुए वे मुनिवर सम्मेदशिखर तीर्थ की यात्रा करके लौटते समय वैशाली-कुण्डपुर में सिद्धार्थ महाराजा के राजप्रासाद के ऊपर से जा रहे थे और सोच रहे थे कि अहा, यह एक तीर्थंकर की जन्मभूमि है, भारत के भविष्य तीर्थंकर इस नगरी में बिराज रहे हैं । ऐसी महिमा लाते-लाते उनके आत्मा में कोई आश्चर्यजनक परिवर्तन होने लगा । अंतर की गहराई में रही हुई सूक्ष्म शल्य न जाने कहाँ चली गई !

शल्यरहित निःशल्य हो जाने से उन मुनिवरों के आत्मा प्रफुल्लित हो उठे… अचानक यह क्या हुआ ? वह देखने के लिये पाठक ! चलो त्रिशला माता के भवन में !.. -उस समय राजप्रासाद के झरोखें में वर्द्धमान कुमार त्रिशला माता के साथ बैठे थे। जैसे चैतन्य की स्वानुभूति द्वारा जिनवाणी माता सुशोभित होती है वैसे ही वीर कुँवर द्वारा त्रिशला माता शोभायमान हो रही थीं। माता पुत्र के वात्सल्य का अद्वितीय दृश्य देखनेवालों के हृदय से स्नेह उमड़ता था। बालप्रभु महान स्वानुभूति की दिव्यता और साथ हीं तीर्थंकरत्व की सातिशयता से सुशोभित हो रहे थे; निःशंकता, प्रभावनादि आठ गुणोंसे वे अलंकृत थे। संजय और विजय मुनिराज जब आकाशमार्ग से गमन करते हुए राजप्रासाद के उपर आये तब अचानक ही उनकी दृष्टि वर्द्धमान कुँवर पर पड़ी; बालतीर्थंकर को देखकर वे आश्चर्य में पड़ गये… क्षणभर के लिये थम गये और उनकी महिमा का विचार करने लगे। इतने में सातिशय जिनमहिमा के प्रताप से उनका मतिज्ञान उज्जवल हुआ और सूक्ष्म शंकाओं का भी समाधान हो जाने से वे निःशल्य हो गये; इस प्रकार वीरनाथ प्रभु उनको मति की उज्जवलताके कारण बने; इसलिये मुनिवरोंने प्रसन्नचित्त से उनको ‘सन्मतिनाथ’ नाम से सम्बोधन किया। वाह, वीर-वर्द्धमान-महावीर-सन्मतिनाथ आपका एक मंगल-नामकरण इन्द्रने, दूसरा माता-पिता ने, तिसरा देवने और चौथा मुनिवरों ने किया। तीन उत्तम ज्ञान तथा चार उत्तम नामों को धारण करने वाले आप त्रिजगत को रत्नत्रय का इष्ट उपदेश देकर कल्याण करने वाले हो; आपकी जय हो।

मुनिवरों ने प्रभुको ‘सन्मतिनाथ’ विशेषण से अलंकृत किया, जिससे प्रसन्न होकर नगरजनों ने उत्सव किया; देवों ने आकाश में बाजे बजाकर आनन्द मनाया; 'अहो सन्मतिनाथ ! आप हमें अपूर्व सम्यक्मति के दाता हो, आपकी पहिचान से हमारी मति सम्यक् हुई है… और उसके द्वारा चैतन्यस्व प्राप्त करके हम आपके मार्ग की साधना कर रहे है। सबको सन्मतिदाता सन्मतिनाथ की जय हो…

राजसभा में युवराज महावीर की धर्मचर्चा

[श्री वीरमुख से चैतन्य की अचिन्त्य महिमा का वर्णन] भगवान वीर कुमार बीस वर्ष के हो गये थे। युवा होने पर भी अध्यात्मरस के रसिक वे राजकुमार राजयोगी समान जीवन जीते थे; कभी-कभी चैतन्य की धून मे लीन हो जाते और कभी तो अर्धरात्रि को राजभवन से बाहर निकलकर उद्यान में खड़े-खड़े ध्यान धरते थे..मानों कोई मुनिराज खड़े हों ! ऐसा होने पर भी कही दिनभर शून्यमनस्क-उदास नहीं बैठे रहते थे; सबके साथ हिलते-मिलते और प्रजाजनों के सुख-दुःख की बातें सुनते थे। यद्यपि राज्य का कार्यभार सम्हालने में उनकी रुचि नही थी, फिर भी कई बार राजसभा में आते और पिता सिद्धार्थ के समीप बैठते थे। उनके आगमन से राजसभा सुशोभित हो उठती थी, सभाजन उनके दर्शन से आनन्दित होते और उनकी मधुर वाणी सुनकर मुग्ध हो जाते थे।

एक बार सभाजनों ने महाराजा सिद्धार्थ से प्रार्थना की-हे देव ! आज की राजसभा अद्भुत लग रही हैं; वीर कुँवर को देखकर मानो अंतर में रत्नत्रय का उद्यान खिल उठा हो ऐसी प्रसन्नता हो रही है। उनके श्रीमुख से हम सब आत्मतत्त्वकी अचिन्त्य महिमा सुनना चाहते हैं।

महाराजा ने भी प्रसन्नता से उनके प्रस्ताव का समर्थन किया कि-वाह, धर्मचर्चासे उत्तम और क्या होगा ! इतना कहकर उन्होंने वीर कुँवर की ओर दृष्टि डाली और उन्हें बोलने का संकेत किया। तब अत्यंत मधुर धीर-गंभीर वाणी द्वारा वीर कुमार ने चैतन्यतत्त्व की परम अचिन्त्य महिमा समझायी। प्रभुने क्या कहा, वह हम भी सुनें-अहो, चैतन्यसत्ता स्वयं आनन्दरूप है; पुद्गलपिण्ड शरीर से चैतन्य आत्मा भिन्न है; वह इन्द्रियोंसे परे चेतनाघन है और चेतना द्वारा ही उसका स्वसंवेदन होता है; किन्हीं बाह्य चिन्होंसे, अथवा इन्द्रियज्ञान द्वारा उसका ग्रहण (अनुभवन) नहीं हो सकता, इसलिये वह ‘अलिंगग्राह्य’ है। [यहाँ अलिंगग्रहण के २० अर्थ और उनके सुंदर काव्य की रचना की है, परन्तु ग्रन्थविस्तार के कारण छाप नहीं सके। ऐसे अनेक प्रकरण रह गये हैं जो योग्य अवसर पर अलग से प्रकाशित करेंगे। -लेखक]

छे चेतना अदभुत अहो, निज स्वरुपमां व्यापी रही,
इन्द्रियोथी पार थई निज आत्मने देखी रही;
स्वानुभूतिवन्त जीवमां सुन्दरपणे शोभी रही,
आनन्द करती मस्त थई निज मोक्ष ने साधी रही.

राजयोगी वर्द्धमानने स्वानुभूतिगम्य आत्मतत्त्व की ज्ञानचेतना का अद्भुत वीतरागी स्वरूप समझाते हुए कहा-यह ज्ञानचेतना स्वरूप आत्मा हैं, उस चेतना में रागादि विभावोंका मिश्रण नहीं है। एक परमाणु जितने राग का भी यदि ज्ञानचेतना में मिश्रण करोगे तो ज्ञान के परमार्थ स्वादका अनुभव नहीं होगा; राग में ज्ञानका रस नहीं हैं। इसलिये हे जीवो ! यह वीतराग उपदेश प्राप्त करके तुम सर्वतः रागसे भिन्न ऐसे शुद्धज्ञान का आस्वादन करो। परम आनन्द स्वादसे भरपूर वह शुद्धज्ञान ही आत्माका निजरूप है। अहो, यह ज्ञानस्वरूप आत्मा सत्य हैं, उसकी प्रीति करो, तन्मयता से उसका अनुभव करो; उसका अनुभव ही परमतृप्ति एवं सन्तोष हैं, वही कल्याण हैं, और वही मोक्षसुख है। आत्मा अनन्तशक्ति का स्वामी है, वह जब स्वयं जागृत हो तब सहज-प्रयत्नसे अपना कल्याण कर लेता है।

एक सभाजन ने आतुरता से पूछा-प्रभो ! ‘आत्मा अनन्तशक्ति सम्पन्न हैं’-तो उसमें कैसी-कैसी शक्तियाँ है वह आपके श्रीमुख से सुनने की उत्कण्ठा है।

उसके उत्तर में मोक्षसाधक युवराज महावीर ने चैतन्यस्वरूप आत्मा की अनन्त शक्तियों का अद्भुत, परम अध्यात्मरस पूरित वर्णन किया-अभेदरूप ज्ञानलक्षण द्वारा लक्षित करके ज्ञायक का अनुभव करने पर जीवत्व, चेतना, सुख, वीर्य, प्रभुता, विभुता, स्वसंवेदनता-आदि अनन्त चैतन्य शक्ति रूपसे आत्मा एक साथ वेदनमें आता है। अहा, जिसकी प्रत्येक शक्ति की महत्ता अपार है ऐसी अनन्त शक्तियों, वे भी रागरहित शुद्धपरिणमन युक्त ऐसी अगाध शक्तिवान आत्मा की अद्भुत महिमा एक भावी तीर्थंकर के श्रीमुख से साक्षात् सुनकर अनेक भव्य जीव उस चैतन्यमहिमा में इतने गहरे उतर गये कि तत्क्षण ही महाआनन्द सहित निर्विकल्प आत्मानुभूति को प्राप्त हुए और अनन्त शक्तियों का स्वाद एक साथ स्वानुभूति में चख लिया। एक राजकविने प्रभु द्वारा कही गई अनन्त शक्तियों का संक्षिप्त वर्णन तत्काल ‘आत्मस्तवन’ रूप में गूँथकर राजसभा को सुनाया। आप भी मधुर चैतन्यरस से भरपूर उस काव्य का रसास्वादन करें :-

आत्म-स्तवन (४७ शक्तिनुं काव्य)

जीव छे अनन्ती शक्तिसंपन्न, रागथी ते भिन्न छे;
ते जीवने लक्षित करवा ‘ज्ञानमात्र’ कहेल छे… १.

अेक ज्ञानमात्र जे भावमां शक्ति अनन्ती उछले;
अहीं वर्णवे ते शक्तिने भवि जीव जाणो तेहने. २.

‘जीवत्व’ थी जीवे सदा जीव चेततो ‘चिति’ शक्तिथी; ‘दृशि’ शक्तिथी देखे बधुं ने जाणतो वली ‘ज्ञान’ थी. ३ आकुल नहि ‘सुख’ शक्तिथी, निजने रचे निज 'वीर्य’थी; ‘प्रभुता’ वडे शोभित ने व्यापक छे ‘विभु’ शक्तिथी; ४

सामान्य देखे विश्वने ते ‘सर्वदर्शि’ शक्ति छे;
जाणे विशेषे विश्वने 'सर्वज्ञता’नी शक्ति छे. ५

ज्या आवी झलके विश्व अेवी शक्ति छे ‘स्वच्छत्व’ नी; छे स्पष्ट स्वानुभवमयी ते शक्ति जाण ‘प्रकाशनी’ ६ राजकुमार महावीर आत्मशक्तिना चिंतनमां

‘विकासमां संकोच नहि’ ते शक्ति तेरमी जाणवी;
‘नहि कार्य-कारण’ कोईनुं अेवी ज शक्ति आत्मनी. ७.

जे ज्ञेयनो ज्ञाता बने, वली ज्ञेय बनतो ज्ञानमां; ते शक्तिने ‘परिणम्य-परिणामक’ कहे छे शास्त्रमां. ८. ‘नथी त्याग के नथी ग्रहण’ बस ! निजस्वरूपमां स्थित जीव छे; स्वरूपे प्रतिष्ठित जीवनी शक्ति ‘अगुरुलघुत्व’ छे. ९. ‘उत्पाद-व्यय-ध्रुव’ शक्तिथी जीव क्रम-अक्रम वृत्ति धरे; ‘परिणाम’ शक्तिथी सत्पणुं त्रणकालमां ते नहि मरे. १०.

नहीं स्पर्श जाणो जीवमां ‘अमूर्त्त’ शक्ति छे;
कर्ता नथी परभावनेो अेवी ‘अकर्त्ता’ शक्ति छे;

भोक्ता नथी परभावनो अेवी ‘अभोक्ता’ शक्ति छे;
‘निष्क्रियता’ रूप शक्तिथी आत्मप्रदेश निष्कंप छे. १२.

असंख्य निज अवयव थकी ‘नियत प्रदेशी’ आत्म छे; तें शरीरमां बधी व्यापतो ‘स्वधर्म-व्यापक’ शक्ति छे. १३.

स्व-परमां जे सम अने विसम वली छे भिन्न जे,
त्रणविध अेवा धर्मने निजशक्तिथी आत्मा धरे. १४

जीव-नंत भावो धारतो 'अनन्तधर्म’नी शक्तिथी; तन् तू ने अतत्पणुं साथ वर्तते ‘विरुद्धधर्म’ नी शक्तिथी. १५ जे ज्ञाननुं तद्रूप भवन ते ‘तत्त्व’ नामनी शक्ति छे; वली अतद्रूप परिणमन जीवनुं ते ‘अतत्त्व’ शक्ति छे. १६

बहु पर्ययोमां व्यापतो पण अेक द्रव्यपणे रहे;
निजस्वरूपनी ‘अेकत्व’ शक्ति जाणी जीव शांति लहे. १७

छे अेक द्रव्य ज जीव पण ‘अनेक’ पर्यायरूप बने;
स्वपर्ययोमां व्यापतो जीव सुखी ज्ञानी सिद्ध बने. १८.

छे ‘भाव’ शक्ति जीवनी सतरूप अवस्था वर्तती;
वली असतरूप छे पर्ययो ते ‘अभाव’ शक्ति जीवनी. १९

‘भावनो तो अभाव’ थाय, ‘अभावनो वली भाव’ रे;
अे शक्ति बंने अेकसाथें ज्ञानमां तुं जाणजे. २०.

वली ‘भाव’ ते तो भाव ने ‘अभाव’ तेह अभाव छे;
अेवा स्वभावे जीव चेतन निजगुणे देखाय छे. २१

नहि कारकोने अनुसरे अेवो ज भवतो ‘भाव’ छे;
ने कारकोने अनुसरे तो तेनी ‘क्रियाशक्ति’ छे. २२

निज ‘कर्म-शक्ति’ थी आतमा सिद्धरूप भाव ने पामतो,
वली 'कर्तृ-शक्ति’ना बले पोते ज ज्ञायकरूप थतो. २३

जे ज्ञानरूपे ज शुद्ध भावे तेहनुं जे भवन छे,
आत्मा स्वयं ते भावनुं उत्कृष्ट साधन थाय छे. २४.

तुज ‘करण-शक्ति’ छे खरी, तुं बाह्य साधन शोध मा!
आत्मा ज तारो करण छे पामी वात, बीजी पूंछ मा. २५

आत्मा वडे निज आत्माने ज ज्ञानभाव अपाय छे;
अे ‘सम्प्रदान’ स्वभाव

उत्पाद-व्ययथी क्षणिकता पण ध्रुवनी हानि नहीं,
सेवो सदा सामर्थ्य अेवुं 'अपादान’नुं निजमहीं. २७.

भाव्यरूप जे ज्ञानभावो परिणमे छे आत्ममां,
आत्मा ज तेनुं ‘अधिकरण’ भाख्युं अहो ! जिनवचनमां. २८.

छे ‘स्व अने स्वामित्व’ मारुं मात्र निजस्वभावमां,
निजभावथी को अन्यमा छे स्वत्व मारुं नहि कदा. २९.

अनेकान्त छे जयवंत अहो ! निजशक्तिने प्रकाशतो,
शक्ति अनन्ती माहरी मुज ज्ञानमां ज समावतो. ३०.

ज्ञानलक्षण भाव साथे अनन्त भावो उल्लसे,
अनुभव करु अनो अहो ! विभाव कोई नही दीसे. ३१

जिनमार्ग सौ पामो अहो, श्री वीर-वचन प्रसादथी,
अंदर नीहालो रूप चेतन, पार जे परभावथी. ३२.

निजशक्तिने देखो अहो, निजात्म अंतर-दृष्टिथी,
निजशक्तिनो वैभव अहो ! आ पार छे परभावथी. ३३.

ज्ञान मात्र ज अेक ज्ञायक पिंडलो हु आत्मा,
अनन्त गंभीरता भरी मे देखिया परमात्मा. ३४

आश्चर्य अदभुत थाय छे निज विभवने नीहालता,
आनन्दमय आहलाद उछले फरीफरीने ध्यावता. ३५

अदभुत अहो ! अदभुत अहो ! छे विजयवंत स्वभाव आ,
जयवंत ते अनेकान्त जेणे निज निधान बताविया. ३६.

[पूज्यश्री कानजी स्वामी जब अस्वस्थ थे उस समय ब्र० हरिभाई उन्हें आत्मशान्तिका यह काव्य कई बार सुनाते थे; इसे सुनकर वे अति प्रसन्न होते थे। इस काव्य इस काव्य सम्बन्धी उनके प्रमोदभरे हस्ताक्षर यहाँ दिये जा रहे है-]

ॐ सहजात्म स्वरूप अनंत शक्ति संपन्न चैतन्य चित् चमत्कार चिंतामणी भगवान कि जय. वाह, आत्मा के अपार वैभव का मधुर संगीत सुनकर सभाजन शांत रसमें निमग्न होगये। आज की धर्मचर्चा में इतने तन्मय हो गये कि किसीको उठने का मन नहीं होता था। अहा, एक तो अति सुन्दर आत्मतत्त्व की चर्चा और वह भी तीर्थंकर के श्री मुखसे.. सुनकर किसे आनन्द नहीं होगा ?

सबको ऐसा लगा कि अहा ! अभी तो चौथा कालचक्र चल रहा है और अन्तिम तीर्थंकर के आत्मा हमारे समक्ष साक्षात् विराज रहे हैं। जगत् के जीवों को तो उनकी दिव्य ध्वनि उपदेश उन्हें केवलज्ञान होने पर सुनने को मिलेगा, जब कि हमें-वैशाली गणतंत्र के प्रजाजनों को तो वर्तमान में ही उनके श्रीमुख से धर्मश्रवण का महाभाग्य प्राप्त हुआ है, तथा उनके प्रताप से अनेक जीव धर्म प्राप्त कर रहे हैं।-इस प्रकार वीर कुवँर की प्रशस्ति एवं जयजयकारपूर्वक सभा समाप्त हुई।

[वैरागी वर्द्धमान-विवाह से इन्कार और चन्दना के साथ चर्चा]

अहा, बालतीर्थंकर वीरकुमार का जीवन तो ज्ञान चेतना सम्पन्न है। धर्म के भरयौवन में वर्तते हुए वे अंतरात्मा अपनी ज्ञानचेतना को विषय-कषायों से अत्यन्त दूर रखते हैं। एक तो राजपुत्र, और उसमें युवावस्था होने पर भी उनके चित्त में कोई विकार वासनाओंका उद्भव नहीं होता; वे तो अपनी चैतन्य मस्ती में मस्त हैं। शरीर के दिव्य रूप के साथ-साथ उनकी चेतना का रूप भी निखरता जा रहा है। ज्यों-ज्यों शरीर का रूप बढ़ता जा रहा है त्यों-त्यों वीरप्रभु की शरीरके प्रति विरक्ति में भी वृद्धि हो रही है। अहा, देह की वृद्धि होने पर भी देह के प्रति ममत्व में वृद्धि नहीं हो रही है।

वैशाली गणतंत्र के शृंगाररूप वर्द्धमान कुमार की वीरता एवं रूप गुणसम्पन्न युवावस्था को देखकर अनेक राजाओं की ओर से अपनी राजकुमारियों का विवाह वर्द्धमान कुमार से करने के लिये महाराजा सिद्धार्थ के पास मंगनी आने लगीं। एक बार कलिंग देश की चम्पापुरी के महाराजा जितशत्रु की ओर से सन्देश लेकर एक राजदूत वैशाली कुण्डपुर आया और उत्तम भेंटों द्वारा महाराजा तथा वीरकुँवर का सन्मान करके कहने लगा-हे महाराज ! हमारे महाराजा की राजकुमारी यशोदा रूप-गुणसम्पन्न है; जैसे उत्तम उसके धर्म-संस्कार हैं, वैसा ही अद्भुत रूप-यौवन है; श्री वीरकुँवर के उत्तम गुणों से आकर्षित होकर हमारे महाराजा ने यशोदा कुँवरी का विवाह वीर कुँवर के साथ करने का निश्चय किया है, वह प्रस्ताव लेकर मैं आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूँ।

सिद्धार्थ महाराजा ने दूतकी बात सुनकर प्रसन्नता व्यक्त की और उसका सन्मान किया। जब त्रिशलामाता ने यह बात सुनी तब उन्हें हार्दिक प्रसन्नता हुई, और कलिंग देश की अनुपम सुन्दरी राजकुमारी यशोदा से विवाह करने हेतु वीरकुँवर की संमति माँगी।

परन्तु..वे तो वीर…वीतरागता को वर्द्धमान करनेवाले महावीर…कुछ वर्षों की आयु में जिन्हें महान कार्य करना है ऐसे उन वैरागी महात्मा का हृदय पहले से ही संसार से विरक्त था, विषयों से परे चैतन्य के अतीन्द्रिय सुख का आस्वादन करके जो सदा मुक्तिसुन्दरी के साथ आनन्द करते हैं और अलौकिक मुक्तिसुन्दरी के प्रति जिनका चित्त आकर्षित है, उनको सांसारिक भोगों की आकांक्षा कैसे होती ? जब माताजी ने यशोदा सुन्दरी के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा तब वीरकुँवर क्षण भर तो माता के समक्ष देखते रह गये। माता के हृदय को आघात न लगे इस प्रकार गंभीरता से मुस्कराते हुए कहा-हे माता ! आपका पुत्रप्रेम अपार है; किन्तु अपने प्रिय पुत्रको संसार बंधन में बाँधनेका मोह न करो। आप जानती हैं कि इसी भव में मुझे अपनी मोक्षसाधना पूरी करना है। आयु अल्प है, वहाँ विषयकषाय के पिंजरे में बन्द हो जाना मुझे योग्य नहीं है। इसलिये हे माताजी ! आप भी मोह छोड़ो और मेरे विवाह की बात न करो। ‘वीर मेरा पुत्र और मैं उसकी माता’-ऐसी मोहदृष्टि से मुझे न देखो, परन्तु अल्पकाल में ही यह आत्मा मोक्ष को साधनेवाला है-ऐसी तत्त्वदृष्टि से देखो।

अपने लाड़ले पुत्र के विवाह अभिलाषा किस माता को नहीं होगी ? किन्तु वीरकुँवर की बात सुनकर त्रिशलामाता के हृदय को आघात तो लगा; परन्तु वे तो यथार्थ परिस्थिति को जानती थीं, महावीर की दृढ़ता से परिचित थीं; वे समझ गई कि वीर कुँवर को विवाह के लिये समझाना कठिन है। उन्होंने विचार किया कि महावीर जो करता है वही योग्य है। मेरा पुत्र विवाह करके सांसारिक बंधनों में बँध जाय, उसकी अपेक्षा लाखों भव्यजीवों का उद्धार करके मुक्तिसुन्दरी का वरण करे यही उचित है-उत्तम है। ऐसा समझते हुए भी पुत्रमोहवश माता का हृदय पुकार उठा कि-बेटा, तेरी बात सच है, परन्तु अभी तेरी युवावस्था है, इसलिये विवाह करके गृहस्थाश्रम चलाओ, फिर संसार छोड़कर धर्मतीर्थ चलाना। तुमसे पूर्व ऋषभादि तीर्थंकरोंने भी ऐसा ही किया है।

महावीर ने कहा-माँ ! समझते हुए भी तुम पुत्रमोह के कारण ऐसा कह रही हो। हे माता ! क्या संसार के जाल को तुम नही जानती ! देखो तो सही, कितना दुःखी है यह विषयाधीन संसार ! इससे तो जितनी जल्दी छुटा जा सके उतना अच्छा ! हे माता ! इस सम्बन्ध में ऋषभादि तीर्थंकरों का उदाहरण मेरे लिये उचित नहीं है; क्योंकि उनकी आयु तो करोड़ों-अरबों वर्ष की अतिदीर्घ थी; जबकि मेरी आयु तो मात्र ७२ वर्ष की है और उसमे से तीस वर्ष तो व्यतीत हो चुके हैं, मेरे लिये तो अन्तिम तीर्थंकर श्री नेमिनाथ और पार्श्वनाथ का उदाहरण ही ठीक लगता है; उन तीर्थंकरों ने विवाह नहीं किया था, उसी प्रकार मैं भी विवाह के बंधन में आत्मा को नहीं बाँधना चाहते।

बस ! पुत्र के हृदय को बराबर जाननेवाली माता ने फिर कोई विशेष तर्क नहीं किया। पुत्र की महानता देखकर वे मन ही मन गौरव का अनुभव करने लगीं; उनके मोहपर मानो महावीर के वैराग्य का कुठाराघात होने से मोह के टुकड़े होने लगे; धर्म साधना के प्रति उनका चित्त दृढ़ हो गया। कलिंग के राजदूत को निराशापूर्वक विदा करना पड़ा .हाँ, परन्तु वीरकुँवरने यशोदा कुमारी के लिये एक अमूल्य भेंट भेजी ..वह भेंट अर्थात् ‘उत्तम वैराग्यजीवन जीने का महान आदर्श !’ यशोदाकुमारीने भी बड़े उत्साहपूर्वक उस महान आदर्श को स्वीकार किया और राजुल की भाँति वैराग्यपूर्वक अपना जीवन आत्मसाधना के मार्ग मे लगाया।

जब कुण्डग्राम के निकट स्थित वैशाली में त्रिशलामाता की सबसे छोटी बहिन राजकुमारी चन्दनबालाने उपरोक्त घटना सुनी तब उस वीर मौसीने हार्दिक उल्लासपूर्वक वर्द्धमानकुमार के वैराग्य का स्वागत किया-वाह, धन्य है महावीर को !’ चन्दना अभी छोटी है, परन्तु उसका हृदय महान है। वीरकुमार विवाह नहीं करेंगे यह जानकर मौसी चन्दनबालाने भी मन ही मन विवाह न करने का निर्णय कर लिया। धन्य चन्दना ! धन्य तुम्हारे शील का सौरभ !

चन्दना ने समझ लिया कि विरागी महावीर अब अधिक दिनों तक गृहवास नहीं करेंगे, इसलिये अपने भानजे महावीर से मिलने तथा उनके साथ वैराग्य चर्चा करने हेतु उसका मन लालायित हो उठा और कुछ ही दिन में वह कुण्डग्राम पहुँच गई एक दिन वह बड़ी बहिन त्रिशलादेवी के पास बैठी वीरकुमार का गुणगान कर रही थी, इतने में प्रिय भानजा आ पहुँचा। छोटी मौसी को देखकर वीरकुमार ने प्रसन्नता व्यक्त की, और वैरागी भानजे को देखकर चन्दना का हृदय भी उनके प्रति नतमस्तक हो गया। वह कहने लगी-वीरकुमार ! तुम्हारे उत्तम गुणों को देखकर मुझे बड़ा आनन्द होता है। अहा ! एक तीर्थंकर की मौसी होने के नाते मेरा हृदय गौरव का अनुभव करता है…परन्तु प्रिय वीरकुमार ! मैं मात्र तुम्हारी मौसी होकर नहीं रहूँगी. .जब तुम तीर्थंकर होगे और जगत को मोक्षमार्ग का उपदेश दोगे तब मैं भी तुम्हारे मार्ग का अनुसरण करके तुम्हारे शासन को सुशोभित करूँगी।

‘हो मौसी !’ महावीर ने कहा-तुम्हारी बात सच है; तुम्हारे उत्तम धर्मसंस्कारों को मैं जानता हूँ, तुम भी संसार के मोहजाल में फँसना नहीं चाहतीं और आत्मसाधना में ही जीवन बिताना चाहती हो, यह जानकर मुझे आनन्द होता है।

देव वर्द्धमान ! राग से अलिप्त ज्ञान चेतना की अपार महिमा तुम्हारे जीवन में दिखायी देती है, जिसे देखकर हमारी चेतना भी जागृत हो जाती है, और मानो इसी समय निर्विकल्प चेतनाका आस्वादन कर लूँ, इस प्रकार अत्यन्त उत्कण्ठा होती है। किन्तु प्रभो ! अंतर में आत्मा का विचार करते हुए विकल्प भी साथ ही साथ दिखते रहते हैं। वे विकल्प चैतन्य का स्वाद नहीं लेने देते; तो उनसे छूटकर चैतन्य का आस्वादन कैसे किया जाय ! उसकी रीति बतलाओ न !

  • ‘वाह मौसी !’ महावीरने कहा, 'चैतन्य के रसास्वादन की तुम्हारी ऐसी उत्कण्ठा देखकर मुझे प्रसन्नता होती है। देखो, अन्तर में विचार के समय जो विकल्प दिखायी देते हैं, उसी समय विकल्पों को जाननेवाला ज्ञानभी साथ ही है न ! वह ज्ञान कहीं विकल्पों को नहीं करता। ज्ञान विकल्पों को जानता है, किन्तु उन्हें करता नहीं है। चैतन्य के चिन्तनकाल में जो किंचित् भी शान्तिका आभास होता है वह ज्ञानका कार्य है, और जो विकल्प रह जाते हैं वह राग का कार्य है। -इस प्रकार ज्ञान और राग दोनों के कार्य एक-दूसरे से विरुद्ध हैं; उन दोनों को भली भाँति जानने से ज्ञान का रस अधिक हो जायेगा और राग का रस टूट जायेगा। ज्ञान अपने रस में वृद्धि करता-करता अन्त में अपने अनंत चैतन्यभावों से भरपूर एक ज्ञानस्वभाव में ही तन्मय होकर उसके अतीन्द्रिय महान आनन्द का स्वाद लेगा। मौसी, तुम प्रयत्न करोगी तो आज ही तुम्हें उस अपूर्व स्वादका अनुभव होगा।

अहा, प्रभु वर्द्धमान ! तुम्हारी ऐसी उत्तम बात और उत्तम प्रेरणा से मेरा आत्मा झंकृत हो उठता है; मैं इसी समय वह चैतन्यस्वाद लेने के लिये अन्तरोन्मुख होती हूँ। तुम्हारे पास से चैतन्यस्वरूप की जो अपार गम्भीर महिमा सुनी है उसे अभी हाल अनुभवगोचर करती हूँ।

‘बहुत ही अच्छा !’ ऐसा कहकर महावीर ने उसका अनुमोदन किया, और चन्दनबाला तुरन्त ही गम्भीर वैराग्य से चैतन्य के उल्लासित भावों से आत्मस्वरूप का चिन्तवन करने लगी। अहा, क्षण-दो क्षण हुए कि चन्दना को चैतन्यदेव जागृत होने लगे…चन्दन जैसी आनन्दमय सुगन्ध से उसका आत्मा महक उठा। भावी तीर्थंकर सामने ही बैठे हैं, परन्तु अभी चन्दना को उनका भी लक्ष नहीं है, वह तो निर्विकल्प आनन्द की अनुभूति में निमग्न होकर आत्मा में सम्यक्त्व तीर्थ का प्रारम्भ कर रही है…मानो कोई लघु तीर्थंकर गृह-आँगन में तीर्थ का प्रवर्तन कर रहे हों। धन्य हुई चन्दनबाला ! उसने वीतरागतापूर्वक सदाके लिये स्त्री पर्याय का छेदन कर दिया। वाह रे वाह ! तीर्थंकर की माता की लाड़ली बहिन ! तूने अपना जीवन सफलकर लिया।

स्वानुभूति की निर्विकल्प दशा से उपयोग बाहर आनेपर भी चन्दना की दशा कोई परम अद्भुत थी। उस गम्भीरता को देखकर वीर कुँवर समझ गये कि मौसी को अपूर्व आनन्द की अनुभूति हो चुकी है। अहा, ऐसी धर्मात्मा सम्यग्दृष्टि मौसी को देखकर महावीर भी आनन्दित हुए। चन्दनबालाने अपनी बड़ी दीदी त्रिशलादेवी के साथ स्वानुभूति की महिमा और साथ-साथ वीरकुँवर की महिमा की गम्भीर चर्चा की। ‘दोनों सम्यग्दृष्टि बहिनों की चर्चा वास्तव में अद्भुत थी, उसमें से मानो अतीन्द्रिय आनन्द के झरने झरते थे…परभावों से अलिप्त ज्ञान चेतना की अगाध महिमा उसमें भरी थी…’ धन्य हैं ऐसी ज्ञानचेतनावंत धर्मी जीव।

दो बहिनों की सुन्दर धर्मचर्चा

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भगवान महावीर (भाग ६)

राजकुमार वर्द्धमान और वैराग्यवती चन्दनबाला की अद्भुत चैतन्यरसपूर्ण चर्चा और उसके फलस्वरूप चन्दनबाला को सम्यक्त्व की प्राप्ति का आनन्ददायी वर्णन हमने पढ़ा। पश्चात् चन्दनाने त्रिशला दीदी के साथ स्वानुभव की तथा वीरकुँवर की अद्भुत महिमाकी जो चर्चा की उसे जानने की आत्मार्थी पाठकों की उत्कण्ठा देखकर यहाँ वह सुन्दर चर्चा दे रहे हैं।-चन्दना ने हर्षित होकर कहा-दीदी, वीर वर्द्धमान कुँवर को प्राप्त करके हम सचमुच धन्य हो गये हैं; उनकी ज्ञानचेतना की गम्भीरता और वीतरागी अनुभूति अति गहन है।

त्रिशलादेवी बोली-हाँ, बहिन चन्दना ! तेरी बात सच है; वीर कुँवर तो ‘आनन्द की चलती-फिरती अनुभूति’ है; उन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे अपने घर में चलते-फिरते छोटे सिद्ध हों। ऐसे गम्भीर वीर कुँवर कई बार मेरे पास अपना हृदय खोलते हैं और अपनी गम्भीर अनुभूति के रहस्य मुझे बतलाते हैं.. उस समय यह संसार विस्मृत हो जाता है और आत्मा में ऐसी झनझनाहट उठती है जैसे मोक्षपुरी में केलि कर रही होऊँ।

चन्दना-अरे दीदी ! मुझे भी महावीरने आज स्वानुभूति के गहन रहस्य समझाकर आनन्द का अपूर्व अनुभव कराया है। मेरे लिये तो उन्होंने आजसे ही धर्मतीर्थका प्रवर्तन प्रारम्भ कर दिया। उनके अपूर्व उपकार की क्या बात करूँ !

त्रिशला-बहिन, आत्मशान्ति से भरपूर उनकी वाणी चमत्कारिक है, उसे सुनकर आश्चर्य होता है और चैतन्यभाव जाग उठते हैं।

चन्दना-हाँ दीदी, आज ही मुझे उनकी प्रसन्न वाणी का लाभ प्राप्त हुआ और मेरे आत्मा में अपूर्व चैतन्यभाव जाग उठे…रागरहित ज्ञानरस कितना मीठा है उसका मैने आज आस्वादन किया।

त्रिशला-वाह चन्दना ! तू धन्य हो गई ! मेरी लाड़ली छोटी बहिन आत्मानुभूति को प्राप्त हो-ऐसी उत्कण्ठा मुझे बहुत दिनों से थी, जो आज पूरी हुई। तेरी बातें सुनकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता होती है।

चन्दना-अहा, वर्द्धमान तो वर्द्धमान ही हैं, उनकी वैराग्यदशा पाताल जैसी गहरी है !

त्रिशला-ठीक है बहिन ! ‘ज्ञानकला जिसके घट जागी…ते जगमाहिं सहज वैरागी’-ऐसा जो सिद्धान्तवचन है वह हमें तो अपने घर में ही चलता-फिरता प्रत्यक्ष दिखायी देता है। और चन्दना बहिन ! तेरा जीवन भी वीरकुँवर के सम्पर्क से स्वानुभूति प्राप्त करके कैसा सुशोभित हो रहा है ! महावीरकुमार जब तीर्थंकर होकर धर्मनेता बनेंगे तब तू भी भारत के समस्त श्राविका संघ की तथा आर्यिका संघ की नायिकारूप से समवसरण में शोभा देगी।

बड़ी बहिन की यह बात सुनकर चन्दना प्रसन्नता से बोली-दीदी ! धन्य है वह अवसर ! मैं उस दिनकी भावना भाँती हूँ जब वीरकुमार को सर्वज्ञरूप में देखूँ और उनकी धर्मसभा में बैठकर आत्मसाधना करूँ ! साध्यरूप आत्मा तो उनके प्रताप से हमने अपने अंतर में देख लिया है और अपूर्व आत्मसाधना का प्रारम्भ हो चुका है।

‘अहा, मेरापुत्र महावीर इस जीवन में ही सर्वज्ञ परमात्मा बनेगा…मैं सर्वज्ञ महावीर की माता कहलाऊँगी और एक अवतार के बाद मेरे भी भवका अन्त होकर मैं भी सर्वज्ञ परमात्मा बनूँगी।’-ऐसे विचार से प्रियकारिणी-त्रिशलादेवी का चित्त किसी अनुपम आल्हाद का अनुभव करने लगा। अहा, अपने ही आत्मा को सर्वज्ञ-परमात्मारूप से देखकर मुमुक्षु का हृदय आनन्दित हो-उसमें क्या आश्चर्य !

अंतरंग हर्ष व्यक्त करते हुए त्रिशलादेवी बोलीं-प्रिय बहिन चन्दना ! अब अनुभूति के प्रभाव से अपनी स्त्री पर्यायका छेद हो गया, इतना ही नहीं अपने संसार का भी अन्त आ गया…एक भव पश्चात् हम परमात्मपद की साधना करके मोक्षपुरी में पहुँच जायेंगे।

चन्दना बोली-अरे दीदी ! उस मोक्षपुरी के स्मरण से भी हमें कितना आनन्द होता है…तो उस साक्षात दशा का क्या कहना !..इन्द्रियज्ञान से उसका अनुमान भी नहीं हो सकता; अपने ज्ञान में अंशतः अतीन्द्रियपना हो तभी उस सर्वज्ञ सुख को जाना जा सकता है ! अचिन्त्य है उसकी महिमा !

त्रिशलादेवी कहने लगीं-हाँ चन्दना ! ऐसे अपार महिमावन्त आत्मा का स्वानुभूति में इससमय भी अनुभव होता है। आत्मा के एकत्व की वह अनुभूति ‘अभेद’ होनेपर भी वह एकान्त नहीं है; आत्मा के शुध्द द्रव्य-गुण-पर्यायरुप अनन्त स्वभावधर्म उस अनुभूति के अंतर्गत् वेदन में आते हैं इसलिये वह अनेकान्त स्वरुप है, उस शुध्दपरिणतिरुप परिणमत आत्मा अपने एकत्वस्वरुप में शोभायमान है।

चन्दना-वाह दीदी ! आपने बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया। स्वानुभूति में परके सम्बन्धरहित अर्थात् विभक्त आत्मा अकेला वेदन में आता है इसलिये उसे एकत्व की अनुभूति कहा गया परन्तु उस एकत्व में भी गुण-पर्याय तो वर्तते ही है, ऐसी अनुभूति वह ‘एकत्व-विभक्त’ शुद्धात्मा की अनुभूति है; वही समस्त जैनशासन की अनुभूति है। सचमुच, महावीर प्रभुके प्रताप से जैनशासन में अनेकों जीव आत्माकी ऐसी अनुभूति प्राप्त करके अपना कल्याण करेंगे। जब दोनों धर्मात्मा बहिनें इस प्रकार स्वानुभूति की तथा महावीर की महिमा का गुणगान कर रही थीं तब महावीर कुमार तो उद्यान के एकान्तस्थल में बैठे-बैठे आत्मध्यान में निर्विकल्प स्वानुभूति के महा आनन्दका साक्षात् वेदन कर रहे थे…दोनों बहिनें दूर से वह दृश्य देखकर आश्चर्यमुग्ध हो गई-धन्य महावीर ! मानों कोई छोटेसे सिध्द बैठे हों।

उद्यान मे आत्मध्यान करते हुए उन राजकुमार का दृश्य सचमुच दर्शनीय था । आत्मध्यान का वह दृश्य वीतरागी आत्मसाधना की प्रेरणा देता था। कुछ देर बाद जब प्रभुकी ध्यानदशा समाप्त हुई और अमृत झरते नेत्र खुले उससमय अनेक प्रजाजन प्रभुके दर्शन हेतु एकत्रित हुए थे। उद्यान भी अद्भुत सौन्दर्य से प्रफुल्लित हो रहा था। उसमें खिले हुए विविध प्रकार पुष्पों एवं फलों से आच्छादित वृक्ष शोभायमान लग रहे थे; चारों ओर पुष्पों की सुगन्ध फैल रही थी। राजकुमार महावीर उस प्रफुल्लित उद्यान की शोभा निहारते हुए साथ ही अंतर में सम्यक्त्वादि आनन्द-पुष्पों से आच्छादित अपने चैतन्य उद्यान में क्रीड़ारत थे-‘अहा, मेरे आत्म-उद्यान में जैसे सम्यक्त्व एवं आनन्दादि के अतीन्द्रिय फल-फूल खिल रहे हैं वैसे क्या अन्यत्र कहीं खिलते होंगे !..नहीं; जगत में मेरा आत्म-आराम.. आनन्दमय चैतन्य उद्यान ही सबसे सुन्दर है। उस आत्मउद्यान में केलि करते हुए जिस आनन्दमय शीतलता एवं शान्तिका वेदन होता है वह अनिर्वचनीय है !’-ऐसी अंतरधारा सहित उद्यान की शोभा देखते-देखते कुमारकी दृष्टि एक वृक्षपर पड़ी जिसमें एक हजारों पंखुरियोंवाला सुन्दर फूल खिला हुआ था; उसे देखकर कुमार बोले-वाह ! वृक्षपर खिला हुआ फूल उसपर कैसा सुशोभित होता है ! जिस प्रकार इस वृक्षपर यह फूल शोभा दे रहा है, उसी प्रकार आत्मारूपी चैतन्यवृक्ष भी उस पर खिले हुए अनन्त पंखुरियोंवाले सम्यक्त्वादि पुष्पों से सुशोभित है, उसका सौन्दर्य अनुपम है।

वीरकुमार चैतन्य-उद्यान की प्रशंसा कर रहे थे, इतने में एक कुमारने सुन्दर पुष्प लाकर आदरसहित वीरकुमार के चरणों में रख दिया। सब लोग आनन्दपूर्वक देख रहे थे।

तब वीरकुमारने गम्भीरता से कहा-बन्धु ! यह पुष्प वृक्ष की डालपर जैसी शोभा दे रहा था वैसी अब नहीं देता; उसकी शोभा नष्ट हो गई है; मातासे बिछुड़े हुए बालक की भाँति वह मुरझा रहा है। पुष्प को उसकी डाली से पृथक् करना वह तो वृक्ष तथा पुष्प-दोनों की सुन्दरता को नष्ट कर देता है। देखो न, पुष्परहित वृक्ष कैसा शोकमग्न लगता है। अपनी प्रसन्नता के लिये हम दूसरे जीवोंका सौन्दर्य नष्ट कर दे वह क्या उचित लगता है ? दूसरों को कष्ट दिये बिना हम आनन्द प्रमोद करें वही उचित है।

-इस प्रकार सहजरूप से अहिंसादि की प्ररूपणा करके वीरकुमार वीतरागता फैला रहे थे। धन्य उनका जीवन ! गृहवास मे भी धर्मात्मा राजपुत्रका जीवन अलौकिक था। वे गृहवासी भगवान बारम्बार सामायिक का प्रयोग भी करते थे। सामायिक की स्थिति में वे इस प्रकार मन की एकाग्रतापूर्वक धर्मध्यानरूप आत्मचिंतन करते थे मानो एकान्त में कोई मुनिराज विराज रहे हों, उस समय में वे राग-द्वेष से परे समभावरूप वीतराग परिणतिका विशेष आनन्द अनुभवते थे। उनकी सामायिक कोई अमुक शब्दपाठ बोलनेरूप नहीं थी, किसीके नाम का जाप भी उसमें नहीं था; उसमें तो आत्मस्वरूप की भावना से चैतन्य की किसी अपार शान्ति का वेदन था कि जिस वेदन की वीतरागता में उनका आत्मा दो क्षण रागद्वेष की परिणती से भिन्न हो जाता था। ऐसे तो उन महात्मा का जीवन राग द्वेष से परे था, परन्तु शुद्धोपयोगद्वारा निर्विकल्प होकर वे जिस आत्मानन्द का वेदन करते थे वह एक अनिर्वचनीय विशिष्ट दशा थी। सामायिक के समय वे कैसा आत्मचिन्तन करते थे वह उन्हींके श्रीमुख से सुने। ૐ સહજ શુદ્ધ જ્ઞાનાનંદ એક સ્વભાવ છું… નિર્વિકલ્પ છું…ઉદાસીન છું… નિજ નિરંજન શુદ્ધાત્માના સમ્યક્ શ્રદ્ધાન - જ્ઞાન - અનુષ્ઠાન રૂપ છું નિશ્ચય રત્નત્રય રૂપ નિર્વિકલ્પ સમાધિમાં અનુભવાતા વીતરાગ સહજાનંદ રૂપ છું. સર્વ વિભાવ પરિણામરહિત શૂન્ય છું. માત્ર સુખની અનુભૂતિરૂપ લક્ષણ વાળા સ્વસંવેદન- જ્ઞાન વડે સ્વસંવેદ્ય_ગમ્ય_પ્રાપ્ય_ભરિતાવસ્થ પરિપૂર્ણ પ ર મા ત્મા છું. वीर राजकुमार सदा ऐसे शुद्धात्मा की भावना भाते थे। विलक्षण थी उनकी आत्मधुन…और विशुद्ध थी ध्यानधारा ! कभी-कभी अर्धरात्री के समय अचानक चैतन्य की धुन लगने से वे ध्यान में लीन हो जाते थे। उन्हें राजभवन में आराम से निद्रा लेना अच्छा नहीं लगता था। राजप्रासाद की दीवारों के बन्धन तोड़कर तथा राग को भी छोड़कर, अनन्त तीर्थंकरों की पंक्ति में प्रवेश करने की अधिकाधिक ऊर्मियाँ उनके अंतर में उल्लसित होती थी। स्वर्गलोक से आनेवाले दिव्य वस्त्राभूषण एवं रसपूर्ण भोजन के प्रति वे निरस होते जा रहे थे; उनका हृदय अब शीघ्र ही मोक्षप्राप्ति हेतु तरस रहा था।

दूसरी ओर त्रिशला माता भी पुत्र के मुख से आत्मवैभव की बाते सुन-सुनकर हर्षविभोर हो जाती थीं और कहतीं…बेटा, तू सचमुच पहले से ही इस राजभवन में रहकर भी परमात्मा की भाँति रूप से अलिप्त रहता था। तेरी ज्ञानचेतना तुझमें ही भीतर-भीतर कोई परमात्म लीला करती रहती थी…वह हम बहोत दिनों से देख रहे थे…अब तो कुछ समय पश्चात् सारा जगत भी तुम्हारी ज्ञानचेतना की अद्भुत परमात्म लीला देखकर धन्य होगा !

‘धन्य माता ! तुम्हारी ज्ञानचेतना की प्रतीति यथार्थ है। तुम स्वयं ज्ञानचेतना के मधुर आनन्द स्वाद का आस्वादन करनेवाली हो ! मैं इस भव में, तो तुम उस भव में…अवश्य मोक्ष साधनेवाली हो।’

बेटा, तुम्हारी वीरता भरी मीठी-मीठी बातों से मैं मुग्ध हो जाती हूँ.. ऐसा लगता है कि तुम्हारी बाते सुनती ही रहूँ ! किन्तु रह-रहकर मनमें ममता की लहर आ जाती है कि-तुम सचमुच यह सब छोड़कर चले जाओगे ?..फिर मुझे ‘माँ’ कहकर कौन बुलायगा ! यह राजभवन और वैभव सब तेरे बिना सूने-सूने लगेंगे ।

सुनो माँ ! यह सब मोह-ममता है। मैं तीस वर्ष तक इस राजपाट और हीरे-जवाहिरात की सुख-समृध्दि में रहा, परन्तु मुझे इनमें कही चेतनता दिखायी नहीं दी, इन अचेतन पदार्थों में मैंने कहीं सुख या चैतन्य की चमक नहीं देखी,…और हे माता ! यह सब छोड़कर मैं कहीं दुःखी होनेवाला तो नहीं हूँ, उलटा इनमें रहकर जो सुख मैं भोगता हूँ उसकी अपेक्षा कोई विशिष्ट सुख मुझे प्राप्त होनेवाला है…और तुम देखना कि तुम्हारे इन अचेतन हीरों की अपेक्षा कोई अपूर्व-अमूल्य-महान-त्रिलोकप्रकाशी चैतन्यरत्न लेकर कुछ ही समय पश्चात् मैं परमात्मा बनकर वैशाली में आऊँगा।

वीरकुँवर की बातें सुनकर त्रिशलामाता को हार्दिक प्रसन्नता होती थी कि-अरे, इस समय भी मेरे पुत्र का ज्ञान कितना विकसित है…उसकी चैतन्यरसयुक्त वाणी मन भरकर सुन लूँ…ऐसा सोचकर माता-पुत्रने हृदय खोल-खोलकर आत्म साधना के विषयमें अनेक प्रकारकी चर्चाएँ कीं। अहा, ऐसे बालतीर्थंकर के साथ व्यक्तिगत रुप से धर्मचर्चा करने में मुमुक्षु को कितना आनन्द होगा ! और उनके मुख से स्वानुभूति के रहस्य सुनकर कौन स्वानुभूति को प्राप्त नहीं होगा ! अरे, राजभवन में रहनेवाले राज-सेवक भी उनके श्रीमुख से खिरती वाणी सुनकर मुग्ध हो जाते थे और किन्हीं-किन्हीं को स्वानुभव भी हो जाता था। इस प्रकार द्रव्यतीर्थंकर के प्रताप से चारों ओर धर्मप्रभावना हो रही थी और भावीतीर्थंकर होने का दिन भी निकट आता जा रहा था। दो के बाद अब तीसरे कल्याणक की तैयारी होने लगी थी।

[महापुराण अर्थात महा पुरुषोंके गुणोंकी कथा]

यह पुराण महान क्यों है?-क्योंकि वह जगत में सबसे महान सर्वज्ञ परमात्मा तीर्थंकर भगवन्तों के जीवन का साक्षात्कार कराता है। महापुरुषोंका पुराण होने से यह महापुराण है…और ऐसे महानग्रन्थ के श्रोतापाठक भी महान है क्योंकि उन्हें वीतरागी महापुरुषोंका उत्तम चरित्र रुचता है, तथा तीर्थंकरों के जीवन से उत्तम प्रेरणा लेकर वे स्वय उसमार्गपर चलना चाहते हैं। महापुरुषों के उत्तम गुणों के वाचक शब्द भी उत्तम हैं। महापुरुषों के गुणों की कथा जो प्रेमपूर्वक पढ़ेगा वह आत्मगुणों की महासम्पत्ति को प्राप्त होगा।

भगवान महावीर : वैराग्य और दीक्षा

[मार्गशिर्ष कृष्ण दशमी]

आज पूरी रात राजकुमार वर्द्धमान चैतन्य की अनोखी धून में थे; निद्रा का तो नाम ही नहीं था; उपयोग बारम्बार चैतन्य की अनुभूति मे स्थिर हो जाता था। परभावों से थककर विमुख हुआ उनका उपयोग अब आनन्दमय निजघर मे ही सम्पूर्ण रुपसे स्थिर रहना चाहता था। तीस वर्ष के राजकुमार का चित्त आज अचानक ही ससार से विरक्त हो गया है, मोक्षार्थी जीव प्रशम हेतु किन्ही बाह्य कारणों को नहीं ढूँढ़ते, प्रशम तो उनके अन्तर से स्वयमेव स्फूरीत होता है।

आज प्रात काल महावीर ने सिद्धों का स्मरण करके आत्मा का ध्यान किया। आज उनके वैराग्य की धारा कोई अप्रतिम थी, विशुद्धता मे वृद्धि हो रही है, उपयोग क्षणभर में अंतर्मुख निर्विकल्प हो जाता है और पुनः बाहर आजाता है, परन्तु बाह्य में उसे चैन नहीं पड़ता, वह सर्वत्र से छूटकर, पराभवरुप परदेश से लौटकर स्वभाव रुप स्वदेश में स्थिर रहना चाहता है।

बारम्बार ऐसी दशामें झूलते हुए प्रभुके मतिज्ञान मे सहसा कोई विशिष्ट निर्मलता झलक उठी, उनको जातिस्मरण हुआ; स्वर्गलोक के दिव्य दृश्य देखे चक्रवर्ती का वैभव देखा, सिह देखा, सम्यक्त्वका बोध देते हुए मुनिवर देखे; उससे पूर्वकी नरकगति भी देखी;

-इस प्रकार अनेकपूर्वभव देखकर तुरन्त वीरप्रभुका चित्त संसार से विरक्त होकर जिनदीक्षा लेने हेतु उद्यत हुआ। अरे, कहाँ वे नरक के घोर दुःख और कहाँ स्वानुभूतिका सुख ! कहाँ वे सिंह पर्याय मे हिंसा और क्रूरता के रौद्र परिणाम और कहाँ सम्यक्त्व की शान्ति !-दोनो में अटूट रहनेवाला एकमहान ज्ञायकभाव मैं हूँ-ऐसे अपने एकत्व का चिन्तवन करते हुए वे बारम्बार निर्विकल्प हो जाते थे। बारम्बार इतनी अधिक निर्मलता एवं निर्विकल्पता होती थी कि बस, अब शुद्धोपयोगी मुनिदशा के बिना यह जीव रह नहीं सकेगा।-इस प्रकार महावीर ने अपने मन में दीक्षा का निर्णय किया।

महावीर का निर्णय अर्थात् वज्र-निर्णय…महावीर का निर्णय अर्थात् अचल निर्णय…भगवान ने दीक्षा ग्रहण का दृढ़ निर्णय किया और परम विरक्त चित्त से एक बार निर्विकल्प अनुभूति में लीन हो गये।

राजकुमार सिंहासन पर बैठे हैं…चैतन्य की गंभीरता में ऐसे लीन हैं कि दुनिया का लक्ष ही नहीं रहा। अरे, त्रिशलामाता आकर सामने खड़ी हैं उसका भी उन्हे लक्ष नहीं हैं। माता तो देखती ही रह गई कि-वाह ! मेरा पुत्र कैसी अद्भुत वैराग्यमुद्रा में सुशोभित हो रहा हैं ! अहा, इसकी शान्त वैराग्यमुद्रा देखकर मुझे अनुपम आनन्द होता हैं…मानो देखती ही रहूँ ! इस प्रकार त्रिशलामाता के हृदय में अत्यन्त स्नेह उमड़ रहा हैं; वे मन ही मन पुत्र को आशीर्वाद दे रही हैं। सचमुच आशीर्वाद दे रही हैं या आशीर्वादके बहाने उनकी भक्ति कर रही हैं?-यह तो वे ही जानें।

थोड़ी देर में महावीर ने नेत्र खोले तो देखा कि सामने माताजी खड़ी हैं। माता को देखकर उनकी वैराग्यमुद्रा किंचित् मुस्करा उठी। माताने स्नेह से पूछा-बेटा वर्धमान ! आज तुम इतने विचारमग्न क्यों हो ?..तब वीर कुँवर के मुख से गम्भीर वाणी निकली-हे माता ! आज प्रातःकाल जातिस्मरण में मैंने अपने पूर्वभव देखे; अब मेरा चित्त सर्वत्र से विरक्त हुआ है, इसलिये आज ही इस असार संसार को छोड़कर मै मुनिदीक्षा अंगीकार करूँगा और शुद्धोपयोग द्वारा परमात्मा को साधूँगा !

अभी तो राजकुमार के मुख से दीक्षा लेने के उद्गार निकल रहे थे कि उधर इन्द्रसभा में खलबली हुई; इन्द्र का इन्द्रासन डोल उठा, प्रभु के दीक्षाकल्याणक का अवसर जानकर देवगण वैशाली में आ पहुँचे। लौकांतिक देवो ने आकर प्रभुकी स्तुति की; वैराग्यभावना में निमग्न प्रभुने दृष्टि उठाकर लौकांतिक देवो की ओर देखा। उस समतारस झरते दृष्टिपात से देवगण अत्यन्त प्रमुदित हुए…एक ओर वैरागी तीर्थंकर तो दूसरी ओर वैरागी लौकांतिक देव ! अहा, वैराग्यवान उत्तम साधकों का वह मिलन चैतन्य की परम गंभीर शान्तियुक्त था। उस मिलन से परस्पर दोनों के वैराग्य की पुष्टि हुई।

प्रजाजन यह सब बड़े आश्चर्य से देख रहे थे। देवेन्द्रों ने प्रभु का दीक्षाकल्याणक मनाने हेतु प्रथम उनका दैवी श्वेतवस्त्रों से शृंगार किया। प्रभुका वह वस्त्रधारण करना अब अन्तिम था; अब वे पुनः कभी कोई वस्त्र धारण नहीं करेंगे। एक ओर देवों का शृंगाररस तो दूसरी ओर वैरागी प्रभु का शांतरस; उत्कृष्ट शृंगार एव उत्कृष्ट वैराग्य मे मानो प्रतियोगिता हो रही थी। अंत में शृंगाररस की पराजय और वैराग्यरस की विजय हुई। प्रभु तो रागमय वस्त्रादि शृंगार का परित्याग करने तथा वीतरागी शांतरस को अंगीकार करने हेतु वन मे जाने को खड़े हो गये और उत्तम वैराग्यभावनाओं के चिन्तनपूर्वक ‘चन्द्रप्रभा’ नामकी शिविका में आरूढ़ हुए।

[यहाँ देवगति की अपेक्षा मनुष्यगति का तथा चारित्रदशा का महत्व बतलाने के लिये कोई कथाकार अलंकार से कहता हैं कि-दीक्षा के अवसर पर प्रभु की पालकी उठाने हेतु देवों और मनुष्यों के बीच विवाद खड़ा हुआ कि पहले पालकी कौन उठाये ?

देव बोले-हम स्वर्ग से प्रभुका दीक्षाकल्याणक मनाने आये हैं, इसलिये पहले हम पालकी उठायेंगे। जिस प्रकार जन्म कल्याणक के लिये हम प्रभुको मेरुपर्वत पर ले गये थे, उसी प्रकार दीक्षा के लिये वन में भी हम ले जायेंगे।

तब मनुष्यों की ओर से राजाओं ने कहा-अरे देवो ! हम मेरुपर्वत पर नहीं आ सके थे, किन्तु इस चारित्र के प्रसंग में तो हमारा ही अधिकार बनता है; क्योंकि प्रभु हमारे मनुष्यलोक के हैं इसलिये प्रभु की चारित्रदशा के अवसर पर तो हम ही पालकी उठायेंगे…चारित्र में देवों का अधिकार नहीं है।

अंतमें इन्द्रने झिझकते हुए प्रभुकी ओर देखा कि-इस विवाद में वे ही कोई मार्ग निकालें, ताकि देवों को भी कुछ अधिकार प्राप्त हो।

प्रभु बोले-चारित्र में जो मुझे साथ दे सकें, जो मेरे साथ चारित्रदशा अंगीकार कर सकें वे पहले सात डग पालकी उठायें..और फिर दूसरे… बस, हो गया ! यह बात सुनते ही इन्द्र निस्तेज हो गया; उसे अपना इन्द्र पद तुच्छ लगा और पुकार कर कहने लगा कि-अरे, कोई मेरा यह स्वर्गका साम्राज्य लेकर बदले में एक क्षणभर का चारित्र दो।

देखो, चारित्रदशा की महिमा ! हे सौधर्मदेव ! तेरे पास भले ही इन्द्र पद हो, परन्तु वे देकर भी एक क्षणभर का चारित्र तुझे नही मिल सकता। चारित्र दशा तो मनुष्यभव में ही प्राप्त होती है, उसकी महिमा इन्द्र पद से अधिक है।

इस अलंकार-कथन द्वारा पुराणकार ऐसा प्रगट करते हैं कि-देवलोक की दिव्यता की अपेक्षा मनुष्यलोक का संयम महान है, उस संयम के समक्ष इन्द्र को भी नतमस्तक होना पडता है।

तथा मनुष्यों में भी, विद्याधर-मनुष्यो मे तीर्थंकर उत्पन्न नहीं होते; भूमि गोचरी मनुष्यों में ही तीर्थंकर पैदा होते है, इसलिये प्रभु की पालकी उठाने का प्रथम अधिकार भूमिगोचरी राजाओंका ही है।

-इस प्रकार पहले राजा पालकी उठाकर सात डग भूमिपर चले, फिर सात डग तक विद्याधर राजा चले और तत्पश्चात् देव पालकी उठाकर आकाशमार्ग से चलने लगे। हजारों लाखों नर-नारी वैराग्यभावना भाँते हुए प्रभुके साथ वन की ओर चले।

गगनदी के पश्चिमी तटपर (पटना शहर के सामनेवाले किनारे) वैशाली-कुण्डग्राम के ‘नागखण्ड’ नामक उपवन मे शिविका से उतरकर प्रभु महावीर एक स्फटिक शिलापर विराजे। उत्तरमुख विराजमान वर्द्धमान कुमार ने ‘ॐ नमः सिद्धेभ्यः’ कहकर प्रथम सिद्धों को नमस्कार किया। इस प्रकार देहातीत सिद्धो को निकट लाकर प्रभुने देह के आभूषण उतारे, वस्त्र भी एक-एक करके उतार दिये और सर्वथा दिगम्बर दशा धारण की। वर्धमानकुमार जितने दैवी वस्त्रो में शोभते थे उसकी अपेक्षा दिगम्बर दशा मे मुनिराज महावीर अधिक सुशोभित होने लगे। रत्नत्रय द्वारा प्रभु सुशोभित हो उठे और प्रभु के आश्रय से रत्नत्रय शोभ्ययमान हो गये। अरे, किन्तु प्रभु और रत्नत्रय भिन्न कहाँ थे।-कि एक-दूसरे से सुशोभित होते ? प्रभुस्वयं रत्नत्रयरूप परिणमित थे। भेदवासना का विलय हो अभेद आत्मानुभूति मे लीनता हो !

अभेद आत्मानुभूति में लीन उन श्रमण-भगवन्त
महावीर को वन्दन हो !

वैशाली के नगरजन अपने प्रिय राजपुत्र को ऐसी वीतरागदशा मे देखकर आश्चर्य को प्राप्त हुए.. वे न तो हर्ष कर सके और न शोक ! बस, मानो हर्ष-शोकरहित ऐसी वीतरागता ही करने योग्य है।-ऐसा उस कल्याणक प्रसग का वातावरण था। हर्ष और शोक के बिना भी मोक्ष का महोत्सव मनाया जा सकता है-ऐसा प्रभु का यह दीक्षा कल्याणक महोत्सव घोषित करता था। उन चैतन्यवीर को वीतरागदशा में देखकर धर्मिजनों के अंतर में चारित्र की लहरें उछलती थी।

मार्गशीर्ष कृष्णा दशमी के सध्याकाल स्वय दीक्षित होकर महावीर मुनिराज षष्ठी के उपवास का तप धारण करके अप्रमत्तभाव से चैतन्यध्यान मे लीन हो गये। अहा, दो रत्न से वृद्धिगत होकर भगवान त्रिरत्नवंत हुए; तीनज्ञान से चार ज्ञानवत हुए; अनेक महान लब्धियाँ सेवा करने आ गईं। उनकी अतीन्द्रिय ज्ञानधारा तो केवलज्ञान के साथ केलि करने लगी। केवलज्ञान ने उसी समय अपने ज्येष्ठ पुत्र समान मनःपर्ययज्ञान को भेजकर शीघ्र ही अपने आगमन की पूर्वसूचना दे दी। परन्तु प्रभु का लक्ष उस मनःपर्यय की ओर अथवा दिव्य लब्धियों की ओर नहीं था; वे तो अपने ज्ञायक स्वरूप की अनुभूति में ही ऐसे मग्न थे कि मानो सिद्धपद मे विराज रहे हों ! वाह ! कैसी अद्भुत है उनकी शांत ध्यानमुद्रा ! प्रभुकी ध्यानमुद्रा से प्रेरित होकर चारों ओर हजारों भव्य जीव भी चैतन्य का ध्यान धरने लगे हैं। अरे, ध्यानस्थ प्रभु की शांतमुद्रा देखकर वन के सिंह, हाथी, हिरन, सर्पादि पशु भी मुग्ध होकर शान्ति से प्रभुचरणों में बैठ गये हैं। अहा, ‘जिनकी मुद्रा देखने से आत्मस्वरूप के दर्शन हों’-ऐसे उन ध्यानस्थ मुनिराज का क्या कहना ! वह तो साक्षात् मोक्षतत्त्व ही बैठा है… वैराग्य की प्रचण्ड बाढ़ से पूरी वैशाली घिर गई थी। हमारे लाड़ले राजकुमार तीस वर्ष हमारे साथ रहकर हमें सुख-समृद्धि दे गये…ज्ञानवैराग्य दे गये…अब वे हमें छोड़कर राग-द्वेष-काम-क्रोधादि को जीतने के लिये वनमें चले गये। वे अवश्य विजेता बनेंगे। वे तो अपने शुद्धोपयोग में लीन होकर बैठे हैं; हमारी ओर देखने अथवा हमसे ‘आओ’ कहने के लिये दृष्टि भी नहीं उठाते-हमारे पाँव भी उन्हें वन में छोड़कर नगर में जाने के लिये नहीं उठते। राजवैभव के बिना भी परमवीतरागता से वे सुशोभित हो रहे हैं! सचमुच वीतरागता ही सुख और शोभा है; बाह्य वैभव में न तो सुख है और न आत्मा की शोभा। -ऐसा विचारते हुए हजारो-लाखों नगरजन वीर के वैराग्य की प्रशंसा करते थे।

उस समय महान विजेता वीर तो अपने एकत्वमें झूल रहे थे।

अहा, एक युवा राजपुत्र वीतराग होकर समस्त वस्त्राभूषण रहित दिगम्बर दशा में कैसे सुशोभित लगते हैं! अरे, सहज चैतन्यतत्त्व…उस पर कषाय की तथा वस्त्रादि की उपाधि कैसी ? शुद्धतत्त्वपर आवरण कैसा ? वस्त्राच्छादित वीतरागता वस्त्रावरण हटाकर बाहर निकल आयी। वीतरागता अपने ऊपर कोई आवरण नहीं सह सकती। जहाँ मोहका या रागका भी आवरण नहीं रुचता वहाँ बाह्य आवरण कैसे रुचेगा ? चार दीवारों का और वस्त्रोंका आवरण तो विषयविकार के पाप को होता है; धर्म को आवरण कैसा ? वह तो सर्व बन्धनों को तोड़कर निर्ग्रन्थ होकर अपने मूल स्वरूप में विचरता है और सर्वत्र वीतरागता से सुशोभित होता है।

“धन्य दिगम्बर मुनिदशा!”

कोई जीव जिस वस्तु का त्याग करे उस से ऊँची वस्तु का ग्रहण करना यदि उसे आता हो तभी वह उसका सच्चा त्याग कर सकता है। पुण्यराग का सच्चा त्याग वही कर सकता है जिसे वीतरागभाव ग्रहण करना आता हो। त्याग लाभदायक होना चाहिये, हानिकारक नहीं। जीव जो त्यागे उसकी अपेक्षा उच्च वस्तु-उच्च भाव प्राप्त करे तभी उसका वह त्याग लाभदायी कहा जायगा। भगवान महावीर का त्याग ऐसा था कि उन्होंने जिन हेयतत्त्वों को छोड़ा उनसे विशेष उपादेयतत्त्वों को ग्रहण किया। उनकी शुद्धता की श्रेणी का क्या कहना! जब वे निर्विकल्पता के महान आनन्द में झूलते थे तब उनके शुद्धोपयोग की प्रचण्डता देखकर बेचारे शेष चार संज्वलन कषाय भी इस प्रकार चुपचाप होकर छिप जाते थे कि वे कषाय जीवित हैं मृत-यह जानना कठिन लगता था, क्योंकि उस समय उनकी कोई प्रवृत्ति दिखायी नहीं देती थी।

इस प्रकार एक ओर प्रभु महावीर वीरता से कषायों को जीत रहे थे, तब दूसरी ओर त्रिशलामाता भी वीरके वीतराग चारित्र का अनुमोदन करके अपने मोहबंधन को ढीला कर रही थीं। 'अरेरे, राजभवन में जिसका लालन-पालन हुआ है ऐसा मेरा पुत्र वन-जंगल में कैसे रहेगा ? और शीत-उष्णता कैसे सहन करेगा?-ऐसी शंका वे नहीं करती थीं; वे जानती थीं कि आत्मसाधना में उनका पुत्र कैसा वीर है! और यह भी अनुभव था कि चैतन्यके आनन्द की लीनता में बाहर का लक्ष ही नहीं रहता। जहाँ शरीर का ममत्व नहीं रहता वहाँ शीत-उष्णता के उपसर्ग कैसे ? अस्पर्शी चैतन्य के वेदन में जड़ के स्पर्शका प्रभाव कैसा ? अहा, ऐसे अतीन्द्रिय चैतन्यतत्त्व को जाननेवाली माता क्या आत्मसाधना में आगे बढते हुए पुत्र को देखकर मूर्च्छित होगी ? नहीं, कदापि नहीं। अपने लाड़ले पुत्र को मोहपाश तोड़कर मुनिदशा में मग्न देखकर वे आनन्दित हुईं .और जब उसे केवलज्ञानी-अरिहत-परमात्मारूप मे देखेंगी तब तो अति आनन्दित होंगी। धन्य माता ! तुम तो परमात्मा की माता हो . बिना वर्द्धमान के वैशाली के राजप्रासाद सूने हो गये थे। बाह्य वैभव ज्यों के त्यों होनेपर भी सुखरहित बिलकुल निस्तेज लगते थे।-मानो वे पुद्गल-पिण्ड जगत से कह रहे थे कि-‘देखो, हममें सुख नहीं है, इसीलिये तो वीरकुमार हमें छोड़कर तपोवन मे चले गये और चैतन्य में लीन हो गये।’ परम वैराग्य जिसका प्रवेशद्वार है ऐसा चैतन्यवन का आनन्द-उद्यान सज्जन-सन्तों को अत्यन्त प्रिय है; धर्मात्मा उसमे क्रीडा करते है, पचपरमेष्ठी का वहाँ निवास है। शुद्धोपयोग का अमोघ चक्र लेकर वीरनाथ ने ज्यों ही ऐसे तपोवन मे प्रवेश किया त्यो ही मोह लुटेरा भयभीत होकर भाग गया। निजवैभव की सेना सहित वीर योद्धा के आगमन स तपोवन सुशोभित हो उठा, सर्व गुणरूपी वृक्ष अपने-अपने मिष्टफलों से भर गये, अत्यन्त सुन्दर एवं परम शात उस चैतन्य-नन्दनवन के एकान्त स्थान में (एकत्व चैतन्यधाम में) प्रभु महा आनन्द अनुभवते थे।

  • ऐसा अद्भुत था वीर प्रभुका वनवास !

भगवान महावीर : मुनिदशा में आत्मसाधना

मुनि होकर आत्मा की निर्विकल्प आनन्द दशा में झूलते-झूलते भगवान ने साढ़े बारह वर्ष तक मौन रहकर आत्मसाधना की। मात्र अपने एक स्वद्रव्य मे ही अग्र, तथा अन्य समस्त द्रव्यो से अत्यन्त निरपेक्ष,-ऐसी आत्मसाधना करते-करते महावीर प्रभु मोक्षमार्ग में विचर रहे है, और बोले बिना भी वीतराग मोक्षमार्ग का अर्थबोध करा रहे हैं। दीक्षा के पश्चात् दो दिन के उपवास हुए और तीसरे दिन कुलपाक नगरी के राजाने भक्तिपूर्वक आहारदान देकर वीरनाथ मुनिराज को पारणा कराया। आहारदान के प्रभाव से वहाँ देवों ने रत्नवृष्टि आदि पंचाश्चर्य प्रगट किये। अहा, तीर्थंकर के आत्मा जैसा सर्वोत्तम आश्चर्य जहाँ विद्यमान हो वहाँ जगतके अन्य छोटे-मोटे आश्चर्य आयें वह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। परन्तु मोक्ष की साधना मे ही जिनका चित्त लगा है ऐसे उन महात्मा को वे पाँच आश्चर्यकारी घटनाएँ किंचित् आश्चर्यचकित नही कर सकी। अहा, आश्चर्यकारी चैतन्यतत्त्व की साधना में लीन मुमुक्षु को जगत की कौनसी वस्तु आश्चर्य में डाल सकेगी ! उन मोक्षसाधक महात्मा का कितना वर्णन करें ! हे भव्यजनो ! सक्षेप मे समझ लो कि-मोक्षसाधना हेतु जितने गुण आवश्यक हैं उन सर्वगुणों का वहाँ संग्रह था, और मोक्षसाधना में जो विघ्न करनेवाले जितने भी दोष है उन समस्त दोषों को प्रभुने छोड़ दिया था। धन्य प्रभु की मोक्षसाधना ! उनकी साधना ऐसी उग्र थी मानो वे स्वयं ही मोक्षतत्त्व थे।

उज्जयिनी में रुद्रका उपसर्ग…और ‘अतिवीर’ नामद्वारा स्तुति

अहा, अनेक लब्धियाँ प्रगट होने पर भी, प्रतिक्षण स्वानुभूति द्वारा अनन्त आत्मलब्धियों का साक्षात्कार करते हुए उन वीतरागी साधक का अन्य किन्हीं लब्धियों के प्रति लक्ष ही नहीं था।

विचरते-विचरते वे योगिराज उज्जयिनी नगरी में पधारे और क्षिप्रावती नदी के किनारे अतिमुक्तक नाम के भयानक श्मशान में ध्यान लगाकर खड़े हो गये। परमशांत…अडोल…अहा, जीवंत वीतराग-प्रतिमा ! वे प्रभु श्मशान में नहीं खड़े थे, किन्तु आत्म-उद्यान में क्रीड़ा कर रहे थे। उस समय इन्द्रसभा में धीरवीर प्रभुकी प्रशंसा होने से ‘भव’ नामका एक रुद्र-यक्ष उनकी परीक्षा करने आया। (‘भव’ नामक यक्ष अथवा ‘स्थाणु’ नामक रुद्र-ऐसे दोनो नाम पुराण में आते हैं।)

ध्यानस्थ प्रभु के सर्व प्रदेशों में ऐसी परम शांति व्याप्त हो गई है कि वन के पशु भी वहाँ शांत होकर बैठ गये। अद्भुत है उनकी धीरता.. और…अद्वितीय है उनकी वीरता ! वहाँ यक्षने आकर भयंकर रौद्ररूप धारण किया; सिंह, अजगर आदिकी विक्रिया द्वारा उपद्रव करके प्रभु को ध्यान से डिगाने का प्रयत्न किया; पत्थर बरसाये, अग्नि के गोले फेंके; परन्तु वे सब प्रभुसे दूर ही रहे. .तीर्थंकरों का ऐसा ही अतिशय है कि उनके शरीरपर सीधा उपद्रव नहीं होता। उन्हें काँटे नहीं लगते, सर्प नहीं डस पाते, कोई प्रहार नहीं कर सकता। अहा ! जिनकी चेतना अंतर्मुख है ऐसे वीरमुनिराज को बाह्य उपद्रव कैसे ? वीतरागी आराधना मे वर्तते हुए मुनि भगवन्तो पर उपद्रव करने या उन्हें आराधना से विचलित करने का सामर्थ्य विश्व में किसी का नहीं है। अरे, हे पामर यक्ष ! हे दुष्ट रुद्र ! तू इन वीतरागी मुनिपर क्या उपसर्ग करेगा ? तेरे अपने ही ऊपर भयंकर क्रोध का उपसर्ग हो रहा है और उससे तू महा दुःखी है ! भवदुःख मे छूटने के लिये तू प्रभुकी शरण मे आ और अपने आत्मापर होते हुए भयंकर उपद्रव को शांत कर !

दुष्ट यक्ष अनेक उपसर्गों की चेष्टाएँ करके थक गया, परन्तु महावीर अपनी वीरता से विचलित नही हुए। अरे, शान्ति के वेदन मे थकावट कैसी ! थकावट तो कषाय मे है। ‘शान्ति’ कभी परास्त नही होगी, ‘क्रोध’ क्षण मे परास्त हो जायगा। अन्तमे वह भव-रुद्र मोक्ष के साधक पर उपसर्ग कर-करके थक गया. हार गया। ‘वि-भव’ ऐसे भगवान के समक्ष ‘भव’ कैसे टिक पाता। भवरहित ऐसे मोक्ष के साधक महावीर के सामने ‘भव’ हार गया। शांतभाव के समक्ष रुद्रभाव नही टिक सका। अन्त में थककर उसने अपनी विचारधारा बदली कि-अरे, इतना सब करने पर भी यह वीर मुनिराज तो ध्यान से किंचित् चलायमान नही हुए और मेरे प्रति किंचित् भी क्रोध उत्पन्न नही हुआ . मानो कुछ भी न हुआ हो, इस प्रकार वे अपनी शान्ति मे ही लीन है। वाह प्रभु ! धन्य है तुम्हारी वीरता ! सचमुच तुम मात्र ‘वीर’ नहीं किन्तु अतिवीर हो।-इस प्रकार ‘अतिवीर’ सम्बोधनपूर्वक वह यक्ष प्रभुचरणों मे झुक गया।-‘धन्य धन्य अतिवीर ! मोक्ष के सच्चे साधक !’

‘महावीर पर आया हुआ उपसर्ग दूर हो गया !!’-नहीं, उन पर तो उपसर्ग था ही नहीं, उपसर्ग तो यक्ष पर था, दूर हो गया, महान क्रोध और पापके उपसर्ग से छूटकर वह यक्ष शान्ति को प्राप्त हुआ। अहा, शान्ति के अमोघ शस्त्र के सामने भगवान के विरोधी भी स्वयं वश में होकर झुक जाते थे। वास्तव में ‘शान्ति’ ही मुमुक्षु को विजय के लिये परम अहिंसक और सर्वोत्कृष्ट शस्त्र है जो कदापि निष्फल नहीं जाता।

यक्षदेव अथवा भव-रुद्र द्वारा ‘अतिवीर’ ऐसे मंगल नामकरण द्वारा प्रभुका सन्मान करने से परमेष्ठीपद में विराजमान प्रभु पाँच मंगल नामधारी हुए-‘वीर’ नाम जन्माभिषेक के समय इन्द्रने दिया ‘वर्द्धमान’ नाम माता-पिताने दिया, ‘सन्मतिनाथ’ नाम मुनिवरों ने दिया; ‘महावीर’ नाम संगमदेवने दिया, और अतिवीर नाम रुद्रने दिया। प्रभुके सान्निध्य में रुद्रने रौद्रता छोड़कर पुनः धर्म में स्थित हुआ और क्षमायाचनापूर्वक स्तुति की-

“श्री वीर महा अतिवीर सन्मतिनायक हो,”
जय वर्द्धमान गुणधीर सन्मति दायक हो।"

पंच-मंगल नामधारी प्रभुका चित्त तो पंचमगति की साधना हेतु पंचमभाव में ही लगा था। अहा, बचपन में भी जिनके अद्भुत शौर्य के समक्ष सर्प भी शरण में आ गया था तो मुनिदशा में विद्यमान उन तीर्थंकर देव की परम शांत गम्भीर मुद्रा के समक्ष चण्डकोशिया जैसे विषधर नाग भी सहम जावें-उसमें आश्चर्य क्या है! वीरनाथ की वीतरागी शान्ति के समक्ष चण्डकोश का प्रचण्ड आक्रोश कैसे टिक सकता था? अरे, सामान्य लब्धिधारी मुनिराज के समक्ष भी क्रूर पशु अपनी क्रूरता को छोड़कर शांत हो जाते हैं, तब फिर यह तो तीर्थंकर-मुनिराज वर्द्धमान! उनकी आश्चर्यजनक लब्धियाँ एव शान्ति के प्रभाव की तो बात ही क्या! जिनके समीप क्रूरसे क्रूर जीव भी ऐसे शांत हो जाते हैं कि-दूसरे जीवों का भी घात नहीं करते-सिंह हिरन को नही मारता, नेवला सर्प को नहीं छेड़ता, तो फिर उन्हें स्वयं को सर्प डसे या कोई कानों में कीले ठोक दे-यह बात ही कहाँ रही? दूसरों की बात और है, परन्तु यह तो तीर्थंकर महात्मा है, उनके ऐसा कुयोग कभी नहीं बनता। जैनधर्म का कर्मसिद्धान्त भी ऐसे अशुभ कर्मों का उदय होने को अस्वीकार करता है, और तथापि जैनधर्म की विशेषता यह है कि-प्रभु की सच्ची पहिचान उनके चेतनभावों द्वारा ही होती है, उदयभावों द्वारा नहीं।

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भगवान महावीर (भाग ७)

जान लो, इस महावीर जीवन को! और प्राप्त कर लो सम्यक्त्व एकाकी विचरते हुए जिनकल्पी तीर्थंकर मुनिराज महावीर एकमात्र निजस्वभाव के आश्रय से सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप मोक्षमार्ग में परिणमते थे। वे जानते थे वर्तमान के यह मेरा स्वयं अकेला ही सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रभावरूप होता हुआ अपने मोक्षका कर्ता होता है, और भूतकाल में जब सम्यक्त्वादिरूप परिणमित न होकर, अज्ञान से उन मिथ्यात्वादि भावरूप परिणमित होता था तब भी वह स्वयं ही अपने ससार का कर्ता होता था। इस प्रकार संसार और मोक्ष दोनों भावों में अपना स्वाधीन-कर्तृत्व जानकर, उन्होंने परके साथ एकत्व का अध्यास छोड़ दिया था और अपने आत्मा के एकत्व का अनुभव करते हुए स्वाधीनरूप से अपने मोक्ष के ही कर्ता होते थे।

भेदज्ञान द्वारा मोक्षमार्ग में प्रविष्ट वे मुमुक्षु-महात्मा ऐसा जानते थे कि-※ जब मैं संसारी था-अज्ञानी था तब भी वास्तव में मेरा कोई भी नहीं था; तब भी मैं अकेला ही अपने मलिन चैतन्यभाव द्वारा कर्ता-करणादि होकर स्वभावसुखसे विपरीत ऐसे दुःखफल को उत्पन्न करता था, उसमें दूसरा कोई मेरा सम्बन्धी नहीं था।

※ और अब, साधकदशा में जिसे सुविशुद्ध सहज स्वपरिणति प्रगट हुई है ऐसा मैं एकान्त से मुमुक्षु हूँ-वर्तमान में इस मुमुक्षु-साधक-ज्ञानदशा में भी मैं अकेला ही अपने सुविशुद्ध चैतन्यभाव द्वारा कर्ता-करणादि होकर, मै अकेला ही अपने स्वभाव द्वारा अनाकुल सुख उत्पन्न करता हूँ। इस समय भी वास्तव में मेरा कोई भी नहीं है और मोक्ष में भी मैं सादि-अनन्तकाल अपने एकत्व स्वरूप में रहकर अतीन्द्रिय आनन्दमय जीवन जिऊँगा।

-इस प्रकार बंधमार्ग में या मोक्षमार्ग में, दुःख में या सुख में, संसार में या मोक्ष में आत्मा अकेला ही है-ऐसे आत्मा के एकत्व को जानकर, उस एकत्व की भावना में तत्पर रहनेवाले प्रभुको पर द्रव्यका किंचित् भी सम्पर्क न रहने से शुद्धता थी, तथा कर्ता-कर्म-करण-फल इन समस्त भावों को एक अभेद आत्मारुप अनुभवते-भाते होने से पर्यायों द्वारा खण्डित नहीं होते थे इसलिये सुविशुद्ध ही रहते थे; आत्मा की पर्यायों को आत्मद्रव्य में ही प्रलीन करके सुविशुद्ध आत्माको उपलब्ध करते थे। इस प्रकार अपने आत्मा को परसे विभक्त करके सुविशुद्ध आत्मा को उपलब्ध करते थे। उन्होने अपने आत्मा को परसे विभक्त करके स्वतत्त्वके एकत्वमें लगाया- वही शुद्धनय है, वही शुद्धात्माकी उपलब्धि है, वही निर्वाण का मार्ग है। वही महा अतीन्द्रिय सुख है। तथा वही महावीर का जीवन है। -अहो! ऐसे स्वभावरुप परिणमित चैतन्यतत्त्व जगत में सर्वोत्कृष्ट सुन्दर वस्तु है। चैतन्यतत्त्व की सुन्दरता जहाँ अनुभव में आती है वहाँ जगत का अन्य कोई पदार्थ सुन्दर नहीं लगता, कहीं सुखबुद्धि नहीं होती, सर्वत्र उदासीनवृत्ति रहती है।-ऐसी शांत सहजदशा स्वयं आनन्दरुप है, और उसमें वीरनाथ प्रभुका साक्षात्कार है अनन्त सिद्धोंका साक्षात्कार है.. आत्माका साक्षात्कार है… धन्य दशा!

अहा, शुद्ध ज्ञान स्वरुप के अनुभव से भरा हुआ महावीर का जीवन कितना सुन्दर है!! वह सदा वर्धमान है-आत्मसाधना में वृद्धिस्वरुप है। न ललचाये वे संसार के किसी वैभव से, और नही डरे वे जगतकी किसी प्रतिकूलतासे। हाँ, वे ललचाये अवश्य-चैतन्य के अतीन्द्रिय आनन्द के स्वादमे, और डरे-इस असार ससार में भवभ्रमण से, ..तथापि वे वीर थे; सामान्य वीर नही किन्तु महावीर थे। आत्मा की वीतरागी वीरता द्वारा कषाय शत्रुओं को जीतनेवाले वे ‘विजेता’ थे, जिन थे। केवलज्ञान प्राप्त करके जब वे धर्म गर्जना करेंगे तब उनकी हुंकार सुनकर गौतम इन्द्रभूति और श्रेणिक जैसे अनेक भव्यात्मा चौंक उठेंगे।

अहा, उन वीर योगिराज की वीतरागी वीरता के सामने बड़े- बड़े सम्राटों का मस्तक भी झुक जाता था। उनकी वीरता किसी दूसरे को दुःख देने के लिये नहीं थी, वह वीरता तो अहिंसक थी, निर्विकार थी। जगत में तो वीर योद्धा कहलानेवाले अनेक जीव सुन्दर स्त्रियोंके कटाक्ष मात्र से विह्वल होकर पराजित हो जाते है, अथवा अपमान के एक कटु शब्द का प्रहार होते ही क्रोधित होकर-हारकर क्षमाभाव को खो बैठते हैं। -वाह, तुम्हारी वीरता! देखली तुम्हारी बहादुरी!! ऐसे तुच्छ आक्रमण से ही रो पड़े तब मोहके सामने महायुद्ध में कैसे खड़े रहोगे? -अरे, मोह से लड़ना और मोक्षका राज्य प्राप्त करना वह तो वीतरागी वीरों का काम है . कायरों का नहीं। वह वीरता देखना हो तो देख लो, सामने खड़े, हुए इन महावीर को! -वे इसी समय उग्र पराक्रमपूर्वक मोहसे लड़ कर, उसका सर्वनाश करके (सत्तानाश-सत्यानाश करके) अपनी क्षायिक विभूति से भरपूर केवलज्ञान-साम्राज्य जीत लेंगे। धन्य है उनकी वीरता।

आत्माके साहजिक रुपको धारण करनेवाले वे मुमुक्षुवीर जानते थे कि-मैं किसी दूसरे का नहीं हूँ और जगत में अपने चैतन्य के सिवा दूसरा कुछ भी मेरा नहीं हैं। अपने आत्मीय चैतन्यस्वरुप शुद्ध द्रव्य-शुद्ध गुण-शुद्ध पर्याय वह मेरा स्व है। मै अपने शुद्ध-द्रव्य-गुण पर्यायरुप स्व वस्तु में ही निवास करता हूँ, वह मेरा स्वकीय परिवार है; उसी का मैं स्वामी हूँ और वही मेरा स्व है। -इस प्रकार शुद्ध-द्रव्य-गुण-पर्याय में अपने को तन्मय अनुभवते हुए वे वन-जंगल के बीच कही एकाकी नहीं थे किन्तु अपने गुण-पर्याय के अनन्त परिवार सहित थे। और फिर भी उनकी अनुभूति मे द्रव्य-गुण-पर्याय के भेद भी नहीं थे, एकत्व था। बस, ऐसी एकत्व-अनुभूति ही मोक्ष का पथ वही महावीर का जीवन ..और वही महावीर का स्वरूप।

महावीर के ऐसे स्वरूप को जानने से मुमुक्षु के अंतर से प्रतिध्वनि उठती है कि-‘हे जीव! अनन्त काल से संसार की चार गतियो मे भ्रमण करते हुए जो सुख तुझे कहीं प्राप्त नहीं हुआ, उस अद्भुत अनुपम सुख का तुझे चैतन्य की अनुभूति मे बहुल वेदन होगा, क्योंकि आत्मा स्वय अद्भुत सुखका भण्डार है। उसे प्रत्यक्ष देखना हो तो देखो इन महावीर को!’

‘आत्मा चैतन्यसत्ता है। जो भी चैतन्यमय गुण-पर्याये हैं उनसे भिन्न आत्मसत्ता नहीं है, एक ही सत्त्व है। स्वानुभूति के समय गुण-पर्यायो का विकल्प छूट जानेसे वे-वे गुण-पर्यायें कहीं आत्मासे भिन्न नहीं हो जाते, अनुभूति स्वरुप आत्मा मे द्रव्य-गुण-पर्याय के भेद मिटकर, तीनो स्वरुप से अभेद एक ज्ञायकस्वरुप प्रगट अनुभव मे आता है। भेदो का जिसमे समावेश होने पर भी जो अभेदरुप से अनुभव मे आता है ऐसा अद्भुत अनेकान्त स्वरुप आत्मतत्त्व है।’- ऐसे अद्भुत आत्मतत्त्व को महावीर प्रभु प्रकाशित कर रहे हैं। “वन्दन हो उन वीर को!”

ऐसी मुनिदशामें झूलते हुए प्रभु महावीर उल्लसित आराधना सहित विहार करते हुए भारतभूमि को पावन कर रहे हैं। केवलज्ञान की साधना करते-करते एक वर्ष ..दो वर्ष चार वर्ष आठ वर्ष इस प्रकार वर्षों पर वर्ष बीत रहे हैं और केवलज्ञान दिन-प्रतिदिन निकट आता जा रहा है। एक बार उन्होने ऐसा उग्र अभिग्रह धारण किया कि-दासी के वेश में सिर मुँडाये हुए, कोई सती-राजकुमारी आहार देगी तभी आहार लूँगा; साथ मे अन्य भी अनेक अभिग्रह थे। ऐसे अभिग्रह सहित विचरते-विचरते दिवसों पर दिवस बीत रहे हैं, परन्तु अभिग्रह कहीं पूर्ण नहीं होता और बिना आहार के महिनों बीत चुके हैं. तथापि वीर मुनिराज के मनमे किसी प्रकार की आकुलता नहीं है सुन्दर आहार मिले या उपवास हो-दोनों में समभाव है। प्रभुका आहार न होने से नगरवासी चिन्ता में हैं।…इस प्रकार बिना आहार के पाँच मास बीत गये।

‘विचरुँ उद्याधीन किन्तु निर्लोभ मैं…’ ऐसी स्थिति में विचरते हुए वीरनाथ मुनि कौशाम्बी नगरी में पधारे। सारे नगरमें एक ही चर्चा हो रही है कि-वीर मुनिराज प्रतिदिन नगर मे आहार हेतु पधारते है, किन्तु आहार हो नहीं पाता! ऐसा कौनसा अभिग्रह उन्होंने धारण किया होगा? कौन होगा वह सौभाग्यशाली जिसे मुनिराज के आहारदान का महान लाभ प्राप्त होगा?..अहा, वह मनुष्य बड़ा भाग्यवान होगा जिसके घर पौने दो सौ दिवस के उपवास पश्चात् प्रभुका पारणा होगा!

चन्दना के जीवन की चमत्कारी घटनाएँ

इधर महावीर की मौसी चन्दनबाला- की जिसने वीरकुमार के निकट सम्यग्दर्शन प्राप्त किया था, वह भी महावीर की भाँति विवाह न करने का निश्चय करके वैराग्यमय आत्मभावना में जीवन व्यतीत करती थी। एक बार, चन्दना कुमारी अपनी सहेलियों के साथ नगर के बाहर उद्यानमें क्रिडा कर रही थी कि उसके लावण्यमय यौवन से आकर्षित होकर ,एक विद्याधर ने उसका अपहरण कर लिया; परन्तु बाद में अपनी पत्नी के भयसे उसने चन्दना को कौशाम्बी के वन् में छोड़ दिया! कहाँ वैशाली और कहाँ कौशाम्बी! वन के भील सरदार ने उसे पकड़ लिया और एक वेश्या को सौंप दिया! एक के बाद एक होनेवाली इन घटनाओं से चन्दना व्याकुल हो गई कि अरे, यह क्या हो रहा है?..ऐसी अद्भुत सुन्दरी को देखकर वेश्या विचारने लगी कि- कौशाम्बी के नागरिकों ने ऐसी रुपवती स्त्री कभी देखी नहीं है। इसे रुप के बाज़ार में बेचकर मैं भी धन कमाऊँगी।-ऐसा सोचकर वह सती चन्दन बाला को वेश्याओंके बाज़ार में बेचने ले गई। अरेरे! इस संसार में पुण्य-पाप की कैसी विचित्रता है कि-एक सती नारी वेश्या के हाथा बिक रही है! [ किन्तु पाठक! तुम घबराना नहीं…क्योंकि ऐसे पुण्य-पाप के उदय में भी आत्मा को उनसे भिन्न रख सके-ऐसी ज्ञानचेतना, प्रभुवीर के प्रताप से चन्दना के पास विद्यमान है। चन्दना की उस चेतना को जानने का तुम प्रयत्न करना।]

जहाँ की महारानी मृगावती स्वयं चन्दनबाला की बहिन है उस कौशाम्बी के वेश्या बजार मे महावीर की मौसी एक दासी के रुप में बिक रही है!

वेश्या आतुरतापूर्वक प्रतीक्षा कर रही है कि-कोई बडा ग्राहक आये तो इसे बेचकर धन कमा लूँ।-इतने में एक बड़े सज्जन सेठ वहाँ से निकले। बाजार में खड़ी हुई चन्दना का रुप देखकर वे आश्चर्यचकित हो गये-अरे, राजकुमारी समान यह कन्या यहाँ कैसे आ गई होगी? जो दासी के रुप मे बेची जा रही है! संकटग्रस्त होने पर भी आत्मतेजसम्पन्न उसकी मुखमुद्रा से सेठ को ऐसा लगा कि यह अवश्य कोई संस्कारी कुलवान कन्या है; इसके मुख पर किंचित विषय-लालसा नहीं है, फिर भी बीच बाजार मे वेश्या के रुप मे बिक रही है…अवश्य ही इसमें कोई रहस्य होना चाहिये! इस कन्या को मैं इस संकट से बचा लूँ ताकि यह किन्हीं दुष्टो के चंगुल मे न फँस जाय! -ऐसा विचार करके सेठ उसके पास गये और पूछताछ करने लगे।

उन सज्जन सेठ को वहाँ देखकर नगरजनों के आश्चर्य का पार नहीं रहा.. अरे, नगर के यह महान श्रावक धर्मात्मा सेठ वृषभदत्त भी इसके सौन्दर्य पर मोहित हो गये?..‘किन्तु यह असभव है!’ .तो फिर किसलिये वे यहाँ आकर बात कर रहे हैं? -इस प्रकार लोगों में भिन्न-भिन्न प्रकार का कौतुहल फैल गया। सेठ वृषभदत्त निकट आकर चन्दना को देखने लगे। वह धीमे-धीमे कुछ बोल रही थी…उसके मुहँ से निकलते हुए शब्द सुनकर सेठ एकदम चौंक पड़े ..‘अरिहंत. ., अरिहंत…’ अरे, यह तो ‘णमोकार’ मंत्र जप रही है…अवश्य ही यह कोई उच्च सस्कारी जैन कन्या है-जो ऐसे घोर संकट के समय नमस्कार मत्र का जाप कर रही है। धन्य है इसे! …मेरे कोई सन्तान नहीं है, मैं इसे घर ले जाऊँगा और अपनी पुत्री के रुप में पालन करूँगा। -ऐसा सोचकर सेठ ने उसे खरीद लेने का निश्चय किया और वेश्या को मुँहमाँगी स्वर्णमुद्राएँ देकर चन्दना को ले लिया। धन्य उनका धर्म वात्सल्य!

घर में प्रवेश करते ही सेठ ने कहा-पुत्री! तुम किसी उच्च कुल की कन्या हो; तुम्हारी प्रत्येक चेष्टा, तुम्हारे निर्विकारी नेत्र और तुम्हारे वस्त्र,-वह सब तुम्हारी कुलीनता का परिचय देते हैं। बेटी, तुम निर्भय होकर रहो। मैं तीर्थंकर देव का अनुयायी जैन श्रावक हूँ…तुम मेरी पुत्री हो।

दासी के रुप में बिक कर भी स्वयं एक सज्जन जैन श्रावक के घर में आ गई है, यह जानकर चन्दना को सन्तोष हुआ; उसे इतनी प्रसन्नता हुई मानो वह महावीर की मंगल छाया में ही गई हो!..उसका हृदय पुकार उठा- 'जैन धर्म से रहित चक्रवर्ती पद भी अच्छा नहीं है; भले ही दासीपना हो परन्तु जैनधर्म में वास हो तो वह भी अच्छा है; -ऐसी कठीन परिस्थिति में भी उसे वीरकुमार के साथ हुई धर्म चर्चा का स्मरण हुआ और वह अपूर्व क्षण याद आया जब वीरकुमार के मार्गदर्शन से स्वयं निर्विकल्प आत्मानुभूतिपूर्वक सम्यग्दर्शन प्राप्त किया था। अनुकूल या प्रतिकूल प्रसंगों में घिर जाने से वह आत्मा को भूल जाये ऐसी कोई साधारण स्त्री नहीं है, वह तो चैतन्यतत्त्व की ज्ञाता, मोक्ष की साधक है। ऐसी प्रतिकूलता में भी ज्ञानचेतना किंचित् घिरती नहीं है, पृथक् की पृथक् ही रहती है। राजपुत्रीपना या दासीपना, सत्कार या तिरस्कार,-उन सबसे चन्दना के चैतन्य की प्रभा भिन्न की भिन्न रहती है। वाह चन्दना !.. धन्य तुम्हारी चैतन्य प्रभाको !

'वाहरे उदय ! एक मुमुक्षु धर्मात्मा राजकुमारी वर्तमान में दासी बनकर पराये घर मे निवास कर रही है। सेठ-सेठानी को पता नहीं है कि यह दासी कौन है ? अरे, यह दासी तो जगत् के परमेश्वर की मौसी है, धर्म का एक रत्न है, भारत के श्राविका संघ की शिरोमणि है और कौशाम्बी नगरी की महारानी मृगावती की लाड़ली बहिन है ! जो वर्तमान में कर्मोदयवश दासी बनी है, तथापि पुण्य का ऐसा कोई योग है कि-दासीपना भी सेठ वृषभदत्त जैसे एक सज्जन-धर्मात्मा के घर मे मिला है..जहाँ शीलधर्म की रक्षा सुगम है परन्तु अरे उदय ! चन्दना के सौन्दर्य को देखकर सेठानी को सन्देह हुआ कि- मेरी कोई संतान न होनेसे सेठ अवश्य मुझे छोड़कर इस चन्दना को मेरी सौत बनाएँगे ! नहीं तो इस घरमे कहाँ दास-दासियों की क्या कमी थी कि इसे ले आये ? सती चन्दना सब कुछ जानते हुए भी धैर्यपूर्वक सहन करती है; सेठानी के प्रति हृदयमें द्वेषभाव भी नहीं आने देती। वीरनाथ के बतलाये हुए चैतन्यतत्त्व का विचार करने से दासीपने के दुःख का विस्मरण हो जाता है। वह संसार से विरक्त होकर चिन्तन करती है-मै तो चैतन्य की महान स्वाधीन विभूतिसे भरपूर हूँ, यह सब तो पूर्व कर्मोंसे छूटने की चेष्टा है। प्रभु महावीर के प्रताप से मेरी ज्ञानचेतना अब कर्मों से पृथक् की पृथक् रहकर मोक्षमार्ग को साधती रहती है.. एक दिन सेठ वृषभदत्त बाहर से थके हुए घर आये। सेठानी कही बाहर गई थी, कोई नौकर-चाकर भी घरमे नहीं थे; इसलिये सदा की भाँति चन्दना पानी ले आयी और पितातुल्य सेठजी के पाँव धोने लगी। पाँव धोते- धोते उसके कोमल केशों का जूड़ा खुल गया और केश धूलधूसरित होने लगे; इसलिये सेठ ने निर्दोषभाव से वात्सल्यपूर्वक पुत्री के केश हाथ से ऊपर उठा लिये। ठीक उसी समय सुभद्रा सेठानी आ पहुँची और चन्दना के बाल सेठ के हाथ में देखकर क्रोध से आगबबूला हो गई ! उसे लगा कि-मेरी अनुपस्थिति मे यह दोनों एक-दूसरे से प्रेमालाप कर रहे थे। बस, उस पर शंका का भूत सवार हो गया और उसने निश्चय कर लिया कि किसी भी प्रकार चन्दना को घर से निकालना है .रे दैव ! तेरे भण्डार में क्या-क्या भरा है !!

-जिज्ञासु पाठक ! तुम निराश मत होना। कर्मोदय की तथा धर्मी जीव के परिणामों की विचित्रता देखो ! यह कर्मोदय भी चन्दना के लिये वरदानरूप बन जाता है.. वह तुम कुछ ही समय में देखोगे। कर्मोदय से व्याकुल हो जाना वह धर्मी जीवों का काम नहीं है; उस समय भी अपनी धर्मसाधना मे आगे बढ़ते रहना वह धर्मात्माओं की पहिचान है। वे जानते है कि-

कर्मो तणो जे विविध उदय विपाक जिनवर वर्णव्यो,
ते मुज स्वभावो छे नहि; हूँ एक ज्ञायक भाव छुं।
सौ जीवमां समता मने, को साथ वेर मने नहीं;
आशा खरेखर छोड़िने प्राप्ति करूँ हूँ समाधिनी।

इधर सुभद्रा सेठानी भयंकर वैरबुद्धि से चन्दना को अपमानित करने तथा बदला लेने को तत्पर है। एक दिन जब सेठ नगर से बाहर गये हुए थे, तब सेठानीने चन्दना को एकान्त में बुलाकर उसके सुन्दर केश काँट कर सिर मुँड़वा दिया। अरे, अत्यन्त रुपवती राजपुत्री को कुरुप बना देने का प्रयत्न किया…इतने से उसका क्रोध शांत नहीं हुआ तो चन्दना के हाथ-पाँव में बेड़ियाँ डालकर उसे एक अंधेरी कोठरी में बन्द कर दिया; ऊपर से तरह-तरह के कटु वचन कहे; भोजन भी नहीं दिया। अरे, सिर मुँड़वाकर जिसे बेड़ी पहिना दी गई हो उस सुकोमल निर्दोष स्वानुभवी राजकुमारी का उस समय क्या हाल होगा ? आँखों से आँसू बह रहे हैं; मन में वीरनाथ प्रभु का स्मरण होता है। उसे विश्वास है कि मेरे महावीर मुझे संकट से उबारने अवश्य आयेंगे…जिन महावीर ने मुझे सम्यक्त्व देकर भव बंधन से मुक्त किया है वे ही प्रभु मुझे दर्शन देकर इन बेड़ियों से भी छुड़ायेंगे। इस प्रकार वीर प्रभु के स्मरण में लीन होकर वह भूख-प्यास को भी भूल जाती थी,.. क्षणभर तो उसका आत्मा मुक्तरूप से किसी देहातीत अगम्यभाव में निमग्न हो जाता था।

ऐसी स्थिति में एक दिन बीता . रात बीती…दूसरा दिन भी बीत गया…सेठ वृषभदत्त नहीं आये ! तीसरा दिन बीत गया.. तब सेठ नहीं आये. चन्दना को तीन दिन के उपवास हो गये.. तीन दिन तक कोठरी में बन्द और बेड़ियों में जकड़ी हुई वह राजकुमारी आहार-जल के बिना एकाकी पड़ी है और कड़वे-मीठे संस्मरणों में खो गई है-प्रतिक्षण प्रभु महावीर का स्मरण करते हुए सम्यक्त्व का मधुर स्वाद ले-लेकर जी रही है। सोच रही है कि-या तो अब प्रभु के दर्शन हों या समाधिमरण… -इस प्रकार विचार करते-करते तथा प्रभुके दर्शनों की भावना भाते-भाते तीन दिन बीत गये. .चौथे दिन प्रातःकाल सेठ आ गये। घर का वातावरण कुछ सूना-सूना बेचैन-सा लग रहा था; चन्दना कही दिखायी नहीं दी इसलिये बुलाया-‘चन्दना…बेटी चन्दना !’ किन्तु कहीं से उत्तर न पाकर सेठ चिन्ता मे पड़ गये; उनके मनमें तरह-तरह की शंकाएँ होने लगीं.. अरे, चन्दना कहाँ गई ? वह निर्दोष कन्या कोई अशुभ कार्य तो कर नहीं सकती। मुझसे या सुभद्रा से पूछे बिना वह कहीं जा भी नही सकती। .तो फिर हुआ क्या ? कहाँ गई वह ? …सेठानी से पूछा तो कहती है-मैं कुछ नहीं जानती, दास-दासियों को भी कुछ पता नहीं; वे कुछ बोलते भी नहीं हैं…सेठ व्याकुल हो गये। प्राणों से भी प्रिय पुत्री कहाँ गई ?? अन्त में गद्गद होकर एक वृद्ध दासी से पूछा-बहिन, तुम्हे मालूम है चन्दना कहाँ है ? तुम सब उदास क्यों हो ? कुछ बोलते क्यों नहीं ? दासी ने कोई उत्तर तो नहीं दिया परन्तु सेठ की ओर देखकर सिसकने लगी उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे.. एक गहरा निःश्वास छोड़कर कोठरी की ओर संकेत करके वह चली गई।

सेठने तुरन्त कोठरी की खिड़की के पास जाकर देखा तो भीतर चन्दना बैठी है…बाहर से ताला लगा हुआ है। चन्दना का मुंडा हुआ सिर और हाथ-पाँव में पड़ी हुई बेड़ियों को देखकर सेठ से रहा नहीं गया…वे करुण चीत्कार कर उठे-अरे बेटी चन्दना ! तेरी यह दशा ।। और फिर भी मुँह से आह तक नहीं करती ? अरे, किस दुष्ट ने तेरी यह दशा की है ?

चन्दना कुछ बोली नहीं, मात्र स्नेहपूर्ण नेत्रों से सेठ की ओर देखती रही…मानो उसके अमृतझरते नेत्र उनसे शांत भाव रखने को कह रहे हों।

सेठने तुरन्त कोठरी का द्वार खोला और बेडियाँ काटने के लिये स्वयं ही लुहार को बुलाने दौड़े…आते-जाते उबले हुए उड़द और उष्ण जल चन्दना को पारणे हेतु देते गये।

किन्तु तीन दिन की उपवासी चन्दना विचारने लगी-अरे, वीरप्रभु तो कई मास से उपवास कर रहे हैं…वे यदि पधारें तो उन्हें पारणा कराके फिर मैं पारणा करूँ।-ऐसी अंतरंग भावना भा रही है। और यदि जीव की भावना सच्ची हो तो उसका फल भी मिले बिना नहीं रहता…यदि जीव को भावनाका फल न मिले तो सारा जगत शून्य हो जाय। जिसे आत्मा की भावना हो उसे आत्मा की प्राप्ति होती ही है। सच्ची आत्मभावना वाले को यदि आत्मसुख की प्राप्ति न हो तो आत्मतत्त्व ही शून्य हो जाय-उसका अस्तित्व ही सिद्ध नहीं होगा। यदि पापीजीव के पापभाव का फल न हो तो नरकगति ही शून्य हो जाय; जीव के पुण्यभाव का फल न हो तो जगत में देवगति ही शून्य हो जाय; जीव के रत्नत्रयभाव का फल न हो तो सिद्धगति ही शून्य हो जाय। -इस प्रकार जीव के शुभ-अशुभ या शुद्धभावों का फल यदि न हो तो संसार की चार गतियाँ अथवा सिद्धगति ही नहीं रहेगी, और तब जगत को शून्य हो जाना पड़ेगा।-किन्तु नहीं; सच्ची भावना का सच्चा फल आता ही है. .भावना फलित हुए बिना नहीं रहती। देखो, इधर चन्दना उत्तम भावनाएँ भा रही हैं.. कि वीर प्रभु पधारें..तो आहारदान दूँ ठीक उसी समय-

प्रभु महावीर पधारे कौशाम्बी नगरी में…
सती चन्दना को बंधनमुक्त करने।

पाँच मास और पच्चीस दिन के उपवासी प्रभु महावीर आहार हेतु नगर में पधारे हैं। उनका शरीर दुर्बल नहीं हुआ, उनकी मुद्रा निस्तेज नहीं हुई; उलटी तप के दिव्य तेज से चमक रही हैं, उनके चैतन्य का प्रतपन अनोखा हैं। ऐसे प्रभु वीर मुनिराज वृषभदत्त सेठ के घर की ओर आ रहे हैं. चन्दना ने दूर से प्रभु को अपने घर की ओर आते देखा तो उसका रोम-रोम, प्रदेश-प्रदेश हर्षातिरेक से भक्ति से तथा आश्चर्य से पुलकित हो उठा ..‘पधारो प्रभु पधारो !’ प्रभु निकट आये और हर्षविभोर चन्दना प्रभुको सत्कारने के लिये आगे बढ़ी आश्चर्य ! उसकी बेड़ियाँ खुल गईं, सिर भी पूर्ववत सुन्दर केशो से सुशोभित हो गया-

भा रही थी भावना आहार देने के लिये..
बेड़ियाँ खुल गई उसकी वीर के शुभ दर्श से।

सारा वातावरण एकदम बदल गया। बन्धनमुक्त चन्दना का लक्ष तो प्रभु की ओर था। बन्धन था और टूट गया, उसका भी लक्ष उसे नहीं है…जिस प्रकार स्वानुभूति के काल में मुमुक्षुसाधक को बंध-मोक्ष का लक्ष नहीं रहता, तथापि बन्धन टूट जाता हैं; आत्मदर्शन में लीन साधक के मोह-बन्धन अचानक ही खुल जाते हैं उसी प्रकार प्रभुदर्शन में लीन चन्दना की बेड़ी का बंधन टूट गया आनन्दपूर्वक वह द्वार पर आयी; प्रभु की परमभक्तिसहित वन्दना करके पड़गाहन किया-अहो प्रभो ! पधारो . पधारो पधारो !

वीरप्रभु की मधुर दृष्टि चन्दना पर पड़ी. तो वह कृतार्थ हो गई !.. ‘लोग मुझे नहीं पहिचानते, किन्तु मेरे प्रभु महावीर को तो जानते हैं ?’ प्रभु के दर्शनों से वह जीवन के सर्व दुःख भूल गई भक्तिपूर्वक वीर मुनिराज को आहार हेतु आमंत्रित किया…क्षणभर के लिये प्रभु वहाँ ठहरे…और देखा तो दासी के रूप मे तीन दिन की उपवासी राजकुमारी चन्दना आहारदान देते हेतु खड़ी है . दूसरे भी अनेक अभिग्रह पूरे हो गये…और १७५ दिन के उपवासी तीर्थंकर मुनिराज ने चन्दना के हाथ से पारणा किया। ज्यों ही चन्दना ने प्रभु के हाथमें उड़द का प्रथम ग्रास रखा कि दाता और पात्र दोनों के दैवी पुण्यप्रभाव से उसका उत्तम खीररूप परिणमन हो गया ! उत्तम खीर से विधिपूर्वक प्रभुका पारणा होने से चारों ओर आनन्दमंगल छा गया; देवगण आकाश में जयजयकार करने लगे और रत्नवृष्टि होने लगी; देवदुंदुभी बज उठी. ..समस्त कौशाम्बी नगरी में हर्ष एवं आश्चर्य फैल गया कि-अरे, यह काहेका उत्सव है?..और जब उन्होंने जाना कि आज वीर.मुनिराज का पारणा हो गया है और उसी के हर्षोपलक्ष में देवगण यह महोत्सव कर रहे हैं. ..तब नगरजनो के आनन्द का पार नहीं रहा।

मुनिराज महावीर प्रतिदिन नगरी में पधारते और बिना आहार लिये लौट जाते. .उन प्रभुने आज आहार ग्रहण किया ..यह समाचार नगरी में फैलते ही लोग हर्षसे दौडते हुए उधर आने लगे कि-चलो, उस भाग्यशाली आत्मा के दर्शन करें और अभिनन्दन दें.. जिसके हाथ से यह महानकार्य हुआ है। लोगो ने जब देखा कि वृषभदत्त सेठ की एक दासी के हाथ से प्रभु ने आहार लिया है तब वे आश्चर्यचकित हो गये.. अरे, लोगो को क्या खबर थी कि’ वह दासी नहीं किन्तु प्रभु महावीर की मौसी है. .उनकी श्रेष्ठ उपासिका है ..प्रभु को पारणा कराके चन्दना धन्य हो गई’. आहार ग्रहण करके वे वीर योगिराज तो मानो कुछ भी नहीं हुआ हो-ऐसे सहजभाव से वन की ओर गमन कर गये और वहाँ जाकर आत्मध्यान में लीन हो गये। जब तक प्रभु जाते हुए दिखायी दिये तब तक चन्दना उन्हें टकटकी बाँधे देखती रही .आकाश म देव और पृथ्वीपर जनसमूह उसे धन्यवाद देकर उसकी प्रशंसा कर रहे थे. .किन्तु चन्दना तो सारे जगत को भूलकर, समस्त परभावो से परे, चैतन्यतत्त्व के निर्विकल्प ध्यान मे शान्तिपूर्वक बैठी थी उसकी गंभीरता अद्भुत थी।

इधर वृषभदत्त सेठके घर में मुनिराज के आहार दान का प्रसंग बनने से आनन्द-मगल छाया हुआ है . उधर सेठ स्वय तो बेड़ी कटवाने हेतु लुहार को बुलाने गये थे सो वापिस लौट रहे हैं . मार्ग में आनन्दमय कोलाहल देखकर लोगो से पूछा-यह क्या हो रहा है? किस बात का है इतना हर्षमय कोलाहल?. तब प्रजाजन कहने लगे-अरे सेठ! आपके तो भाग्य खुल गये!..आपके आँगन मे तो महावीर मुनिराज का पारणा हुआ है! पाँच मास और पच्चीस दिन के उपवास पश्चात् पारणे का धन्य अवसर आपको प्राप्त हुआ है! आपके गृह-आँगन में चन्दना ने भगवान को आहारदान दिया है.. उसी का यह उत्सव हो रहा है…देव भी आपके आँगन में रत्नवृष्टि एवं जयजयकार कर रहे हैं।

सेठ तो आश्चर्यचकित होकर घर की ओर दौड़े. हर्षानन्द का स्वयंभूरमण समुद्र उनके हृदय में उछलने लगा…क्या हुआ? कैसे हुआ!! चन्दना की बेड़ी किसने काटी? उसने प्रभुको काहेसे-किस प्रकार पारणा कराया??-ऐसे अनेक प्रश्न हर्ष के समुद्र मे डूब गये…वे घर पहुँचे तो वहाँ सारा वातावरण ही बदल गया था। कहाँ कुछ क्षणपूर्व का अशांत क्लेशमय वातावरण और कहाँ यह उल्लासपूर्ण आनन्द!! चन्दना का अद्भुत रूप पहले से भी अधिक सुन्दर देखकर वे आश्चर्यचकित हो गये और हर्ष से बोल उठे-वाह बेटी चन्दना! धन्य हैं तुझे! तूने मेरा घर पावन किया…कौशाम्बी नगरी की शोभा बढ़ा दी…तुझे पाकर मैं धन्य हो गया…तू तो देवी हैं…अरे रे, हम तुझे नहीं पहचान सके और अभी तक दासी बनाकर रखा! बेटी, हमारा अपराध क्षमा कर दे! तू दासी नहीं हैं, तू तो जगत्पूज्य माता हैं!

चन्दना बोली-पिताजी, वह बात भूल जाइये…मुझ पर आपका महान उपकार हैं…आपने ही मुझे संकट में शरण देकर मेरी रक्षा की हैं।

यह आश्चर्यजनक घटना देखकर सुभद्रा सेठानी तो दिङ्मूढ बन गई…उसके पश्चाताप की सीमा नहीं थी; वह चन्दना के चरणों में गिरकर क्षमायाचना करने लगी-बेटी, मैं तुझे नहीं पहिचान सकी, मुझ पापिन ने बहुत कष्ट दिये…मुझे क्षमा कर दे बेटी!

चन्दना ने उसका हाथ पकड़कर कहा-माता! वह सब भूल जाओ!..मेरे ही कर्मोदय से वह सब हुआ;-परन्तु प्रभु महावीर के मंगल-पदार्पण से आपका घर पावन हो गया और हम सब धन्य हुए !-मानो महावीर का अभिग्रह पूर्ण होने के लिये ही यह सब हुआ हैं !

आत्ममंथन करती चन्दना विचार रही हैं कि-अहा, एक आहारदान की भावना से मेरी बेड़ी के बंधन टूट गये…तो परम चैतन्य की निर्विकल्प भावना से भव के बंधन छूट जायें उसमें क्या आश्चर्य !! आत्मभावना द्वारा मैं अपने भव बंधन को भी अल्पकाल में ही अवश्य तोड़ डालूँगी। महावीर प्रभु के दर्शनमात्र से मेरे बाह्य बंधन छूट गये तो अंतर में चैतन्यप्रभु के दर्शन से भवबंधन भी टूटने में अब क्या विलम्ब ?

[शास्त्रकार प्रमोद से कहते हैं-वाह रे वाह, चन्दना सती ! धन्य हैं तुम्हारा शील, धन्य हैं तुम्हारा धैर्य और धन्य हैं तुम्हारी भावना ! तुम महान हो। प्रभु महावीर जब सर्वज्ञ होंगे तब उनकी धर्मसभा में जो स्थान १४००० मुनियों का नायक रुप में गणधर-गौतमस्वामी का होगा, वैसा हा स्थान ३६००० आर्यिकाओं के बीच तुम्हारा होगा। हृदय में परम हर्ष एवं वात्सल्य उमड़ आता हैं तुम्हारे ऐसे उत्तम-उज्ज्वल जीवन को जानकर।]

सारी कौशाम्बी नगरी उमड़ पड़ी हैं महावीर मुनि को पारणा करानेवाली उन चन्दना देवी के दर्शन करने तथा उन्हें अभिनन्दन देने ! अहा, आज तक जिसे हम दासी समझते थे वह तो भगवती देवी निकलीं। उन्होंने वीर प्रभुको पारणा कराके अपनी कौशाम्बी नगरी का सम्मान बढ़ाया और उसे विश्वप्रसिद्ध कर दिया ! अपनी नगरी में वीर प्रभुका आहार नहीं होने का जो कलंक लग रहा था उसे आज चन्दना ने आहारदान देकर मिटा दिया ! बहुतों को तो आश्चर्य हो रहा था कि-आहारदान और किसी के हाथ से नहीं, एक दासी के हाथ से हुआ !

[अरे नगरजनो ! कलंक तो तुम्हारी नगरी में चन्दना जैसी सतियाँ दासीरुप में बिकीं उसका था…प्रभु महावीर ने उस दासी के ही हाथ से पारणा करके वह कलंक मिटा दिया।…दासी प्रथा दूर कर दी…मनुष्य मनुष्य को बेचे वह कलंक धो दिया; तथा यह भी प्रचारित किया कि धर्मसाधना में धनवान होने का कोई महत्त्व नहीं हैं…सद्गुणों का महत्त्व हैं।]

नागरिकों के मन में प्रश्न उठने लगे कि-यह चन्दनादेवी हैं कौन ? कहाँ की हैं ? दिखने में तो पुण्यात्मा लगती हैं…इस प्रकार सब उनका परिचय प्राप्त करने को आतुर थे…इतने में राज्य की महारानी मृगावती अपनी नगरी में सेठ वृषभदत्त के घर मुनिराज महावीर के पारणे के समाचार सुनकर हर्षसहित वहाँ आ पहुँचीं…और पूछने लगीं-‘किसके हाथसे हुआ प्रभुका पारणा ?’…और वे देखती हैं तो एकदम चौंक पड़ती हैं…अरे ! यह कौन हैं ?..यह तो मेरी छोटी बहिन चन्दनबाला ! अरे चन्दन…चन्दन तू यहाँ कैसे ?..ऐसा कहकर वे चन्दना से भेट पड़ीं !-अद्भुत था वह दृश्य !

दोनों बहिनों का मिलन देखकर, तथा चन्दना महारानी मृगावती की छोटी बहिन हैं यह जानकर नगरजन तो अचम्भे में पड़ गये और एक-दूसरे की ओर ताकते हुए कहने लगे-अरे, यह दासी नहीं, यह तो महावीर प्रभु की मौसी ! सेठ-सेठानी भी चकित रह गये…वे डर रहे थे कि-‘अरेरे, इन राजकुमारी से दासीपना कराया…उसके लिये न जाने राजमाता हमें क्या दण्ड देंगी…’ हमारा सर्वस्व छीनकर हमें नगर से बाहर निकाल देंगी ! चन्दना उनके भाव समझ गई और तुरन्त राजमाता के समक्ष सेठ-सेठानी का अपने माता-पिता के रुप में परिचय देते हुए कहा-दीदी ! इन्होंने संकट के समय मेरी रक्षा की हैं, यह माता-पिता से कम नहीं हैं, मुझ पर इनका महान उपकार हैं…इन्हीं के प्रताप से मुझे यह अवसर प्राप्त हुआ हैं।

सेठ-सेठानी चन्दना का विवेक, क्षमा एवं उदारता देखकर गद्गद हो गये और कहने लगे-हे राजमाता ! हमारे घर में ऐसा अमूल्यरत्न होने पर भी हम उसे परख नहीं पाये…यह कई बार उत्तम धर्मचर्चा करती थीं, परन्तु हमें खबर नहीं पड़ने दी कि स्वयं राजपुत्री हैं। धन्य हैं इनकी गंभीरता ! इनके पुण्यप्रताप से तो हमारे आँगन में वीर प्रभुका पदार्पण तथा पारणा हुआ। धन्य हमारे भाग्य ! यह सब चन्दना की उत्तम भावना का प्रताप हैं…बेटी चन्दना ! हमें क्षमा करना !

वीर प्रभु को पारणा कराने के पश्चात् चन्दना ने भी चार उपवासों के तप का पारणा किया पश्चात् रानी मृगावती ने कहा-बहिन चन्दना, मेरे साथ चलो और राजमहल में आनन्दपूर्वक रहो।

परम वैरागी चन्दना बोली-अरे बहिन ! इस संसार में आनन्द कैसा ? संसार की असारता देख ली हैं; अब इस संसार से बस होओ ! अब तो वीर प्रभु के मार्ग पर चलूँगी और आर्यिका बनकर उनके संघ मे रहूँगी।

‘तेरी भावना उत्तम हैं बहिन !’ किन्तु महावीर प्रभु तो अभी मुनिदशामे विचर रहे हैं, मौन धारण कर रखा है, किसी को दीक्षा भी नहीं देते। जब वे केवलज्ञान प्राप्त करेंगे तब हम दोनो उनकी धर्मसभा मे जाकर आर्यिकाव्रत धारण करके उनके चरणों मे रहेंगे। तब तक धैर्य रखकर घर मे ही धर्मध्यान करो और हमे सत्संग का लाभ दो। तुम कौशाम्बी में इतने दिन रहीं, इतने संकट सहे.. और हमे खबर तक नहीं पड़ी !

चन्दना ने कहा-दीदी ! सब कर्मों की विचित्रता है .और मेरे ऊपर अकेले संकट ही थोड़े आये है ?..देखो न, आज वीरप्रभु के दर्शन तथा आहारदान का महान लाभ प्राप्त हुआ, वह क्या कम भाग्य की बात हैं ? संसार में सर्व जीवों को शुभ और अशुभ, हर्ष और शोक के प्रसंग तो आते ही रहते है किन्तु-

हर्ष-शोकसे पार है अपना ज्ञानस्वभाव;
उस स्वभाव को साधकर होना भव से पार।

मृगावती-तुम्हारी बात सच है बहिन ! एक ओर तुम्हारा दासी जीवन देखकर शोक और दूसरी ओर तुम्हारे ही हाथ से वीरप्रभु का पारणा देखकर हर्ष,-इस प्रकार शोक और हर्ष दोनों एक साथ;…इनमें से मैं शोक का वेदन करूँ या हर्षका ?-नहीं; हर्ष और शोक दोनों से परे चैतन्यभाव ही आत्मा का सच्चा स्वरुप हैं और उसी मे सच्चा सुख है,-यह बात स्पष्ट समझ में आती हैं।

पाठक ! इस घटना में चन्दना की बेड़ी टूट गई, वह दासत्व से छूट गई, परन्तु वास्तव में अकेली चन्दना ही नहीं, सारे भारतवर्ष से दासत्व के-गुलामी के बन्धन टूट गये…दासत्व प्रथा की जड़ उखड़ गई; नारियों के शील की महान प्रतिष्ठा हुई और भारत की नारियों में अपनी आत्मशक्ति का विश्वास पैदा हुआ। भारत की सन्नारियों ने विश्व में उत्तम स्थान प्राप्त किया। अहा, अपने देश के पास जो श्रेष्ठ, सदाचार एवं अध्यात्म का अमूल्य वैभव है वह क्या दुनिया के किसी और देश के पास है ? २४ तीर्थंकरों तथा समस्त चक्रवर्तियों को जन्म देनेवाली इस भारतभूमि का गौरव विश्व में महान है…भारत. में जन्म लेनेवाले हम सब गौरवपूर्वक कह सकते हैं कि-“हम उस देश के वासी हैं, जिस देशमें होते तीर्थंकर। हमारा जन्म तीर्थंकरों के देश में हुआ है…तीर्थंकर हमारे देश में जन्मे हैं। तीर्थंकरों का और हमारा देश एक ही है।” धन्य, मेरी प्यारी भारतमाता ! मुनिरूप से विचरते तीर्थंकर के चरणों का साक्षात् स्पर्श करनेका महाभाग्य तुझे प्राप्त हुआ है…‘वन्दे मातरम्।’

[वीर संवत् २५०५, फाल्गुन कृष्णा त्रयोदशी की रात्रि के १ बजे यह लिखते-लिखते महान ऊर्मियाँ जागृत हो रही है-अहाहा ! चन्दनाबहिन, मेरे पास आओ न ! हम आनन्दपूर्वक स्वानुभव की चर्चा करे और मै प्रभु महावीर के मधुर सस्मरण तुम्हारे पास से जी भरकर सुनूँ !]

राजगृही मे चिन्तातुर बहिन चेलना, वैशाली मे बहिन प्रियकारिणी त्रिशला, तथा चन्दना के पिताजी राजा चेटक और प्रजाजन सबको चन्दना के मिल जाने की खबर सुनकर तथा उनके हाथ से वीर मुनिराज का पारणा होने के समाचार जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई।

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भगवान महावीर (भाग ८)

अब, इधर चन्दना अपनी बहिन के साथ कौशाम्बी के राजमहल मे रहती है, और वैराग्यपूर्ण जीवन बिताती है; स्वानुभूति मे अधिकाधिक परिणाम लगाती है, दिन-रात महावीर के विचारो मे तल्लीन रहकर समवसरण के सपने देखती है कि-कब वर्द्धमान प्रभुको केवलज्ञान हो और कब मैं प्रभु के समवसरण मे जाकर आर्यिका बनूँ !! प्रतिदिन प्रभु को केवलज्ञान होने के समाचार की प्रतीक्षा करती है। वीर प्रभु राजगृही की ओर सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र के आसपास विचर रहे हैं वहीं से कोई यात्री आते है तो उन्हे बुलाकर आतुरता से समाचार पूछती है कि-तुमने प्रभुको देखा ? प्रभुको केवलज्ञान हुआ ? .वे इस समय कहाँ विराजते है ? क्या करते हैं ?

एक यात्रीने कहा- बहिन, मै वीरप्रभु के दर्शन करके आ रहा हू। जांभिक ग्राम में ऋजुवालिका नदी के तटपर प्रभु ध्यान मे लीन खडे थे और अब तो केवलज्ञान की तैयारी लगती है; क्योकि प्रभु अति उग्ररूप से ध्यान मे एकाग्र हों-ऐसा मुझे लगता था। किन्तु बहिन ! प्रभु को केवलज्ञान होने की बात क्या कहीं छिपी रहेगी ? अरे, केवलज्ञान होते ही तीनो लोक मे उसके समाचार फैल जायेंगे और आनन्द का कोलाहल मच जायगा आकाश से देवो के समूह धरतीपर उतरेगे.. अब तो हम शीघ्र ही वह धन्य अवसर देखेगे और तीर्थंकर रूप मे प्रभुकी दिव्यध्वनि सुनकर धन्य बनेगे !

प्रिय साधर्मी पाठक ! चलो, हम भी चन्दना जिनकी राह देख रही है . उन प्रभु महावीर के दर्शन करने तथा उनके केवलज्ञान का दिव्य-महोत्सव प्रत्यक्ष देखने चले।

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ऋजुवालिका के किनारे:प्रभु को केवलज्ञान

महावीर मुनिराज कौशाम्बीनगरी मे चन्दनाकुमारी के हाथ से पारणा करने के पश्चात् उद्यान में जाकर ध्यानमग्न हो गये। पश्चात् वे सिद्धपद साधक सन्त विहार करते हुए अनंतसिद्धो के सिद्धिधाम सम्मेदशिखर पधारे। सिद्धिधाम में वे भावी सिद्ध ध्यान में बैठे थे-वह दृश्य वास्तव में अदभुत था। प्रभु के चरणस्पर्श से शिखरजी की पावनभूमि पुनः पावन हुई; दो तीर्थोंका मिलन हुआ-एक भावतीर्थ और दूसरा स्थापना-तीर्थ; अथवा एक चेतनतीर्थ और दूसरा अचेतन-तीर्थ। हमें ऐसा लगेगा कि क्या भगवान तीर्थयात्रा हेतु आये होंगे ! अरे, किन्तु प्रभु तो स्वयं ही चलते-फिरते जीवंत-तीर्थ हैं। शिखरसम्मेद तो स्थापना तीर्थ है जबकि प्रभु तो स्वयं रत्नत्रयरूप परिणमित जीवन्त-तीर्थ हैं। मोक्षयात्रा तो सदा कर ही रहे हैं। और साक्षात् रत्नत्रय तीर्थरूप परिणमित ऐसे महात्माओं के प्रताप से ही भूमि-पर्वतों को तीर्थपना प्राप्त हुआ है।

सम्मेदशिखर तीर्थ के निकट १५-२० किलोमीटर दूर जांभिक ग्राम के समीप ऋजुवालिका नदी बहती है; जैसा सुन्दर नाम वैसी ही सुन्दर नदी है। महावीर प्रभु सम्मेदशिखर से विहार करते हुए उस नदी के तटपर आये और एक स्फटिक समान स्वच्छ सुन्दर शिला पर ध्यानस्थ हुए। वैशाख मास की तीव्र तपन में भी मानो प्रभु तो चैतन्यशान्ति की हिम शीतल गुफा में बैठे-बैठे अपूर्व वीतरागी शीतलता का वेदन कर रहे हैं ..और मानो प्रकृति भी अनुकूल होकर प्रभु की सेवा कर रही हो तद्नुसार एक घटादार शाल्मली वृक्ष प्रभुको शीतलछाया दे रहा है ! अहा, चैतन्य के साधक को सारा जगत अनुकूल ही बर्त्तता है।

प्रभु ध्यान में खड़े हैं . .अहा, ऐसे वीतरागी महात्मा मेरे तटपर पधारे ! . . इस प्रकार हर्षतरंगों से उछलती कलकल करती नदी मानो आज विशेष हर्षित हो रही हो तदनुसार जांभिक ग्राम के निकट वह दृश्य देखने के लिये क्षणभर थम जाती थी। अहा, मेरे किनारे आज कोई अद्भुत योगिराज आकर ध्यान लगा रहे हैं। प्रातःकाल से ध्यानमग्न योगिराज…न तो कुछ बोलते हैं, न खाते हैं और न पानी पीते हैं ! यह नदी का किनारा, यह ग्रीष्मका ताप और यह शीतल मिष्ट जल… जो भी यात्री यहाँ आता है वह शीतल जल पिये बिना नहीं रहता, परन्तु यह योगिराज तो ग्रीष्म के प्रचण्ड ताप में खड़े होने पर भी पानी का नाम तक नहीं लेते मानो नदी को आश्चर्य हो रहा है-वह सोच रही है, क्या इन्हे गर्मी नहीं लगती होगी ? क्या इन्हें तृषा नहीं सताती ? . मैं उछलकर इनके मुखद्वारा हृदय में प्रविष्ट हो जाऊँ और अपनी शीतलता से इनकी तृषा मिटाकर सेवा करूँ ! .किन्तु नही, वे यहाँ पानी के लिये नहीं आये .आँख उठाकर वे पानी की ओर देखते तक नहीं हैं.. वे तो आँखें झुकाए अंतर में कुछ और ही देख रहे हैं। उनकी मुद्रा देखकर लगता है कि उन्हें बाह्य में कुछ भी खोजने की इच्छा नहीं है .उनके मुख पर क्षुधा-तृषा की आकुलता के भाव भी दिखायी नहीं देते, उस पर तो परमशान्ति एवं प्रसन्नता झलक रही है। भक्ति तरंगों से कलकल करती हुई ऋजुका नदी मानो अपनी उस ध्वनि से उनकी स्तुति कर रही है कि-अहा, मैं शीतलस्वभावी होनेपर भी मुझ से अधिक शीतलता-शान्ति सम्पन्न इन योगिराज को तो मैंने आज ही देखा; अंतरमें वे न जाने कैसी अद्भुत शीतलता का वेदन कर रहे हैं कि उन्हें पानी की बाह्य शीतलता की इच्छा नहीं है। ऐसे योगिराज मेरे तटपर पधारे जिससे मैं धन्य हो गई हूँ। अहा, इन योगिराज की चरण-रज से पावन होने के कारण लोग मेरी भी तीर्थरूप में पूजा करेंगे।

इधर मोह से युद्ध करने के लिये वीर योद्धा तैयार खड़े हैं…वीर राजा का महाबीरपना आज सचमुच जागृत हो उठा है; क्षायिक सम्यक्त्व उनकी सेना का सेनापति है और अनन्तगुणों की विशुद्धिरूपसेना शुक्लध्यान की श्रेणीरूप बाणों की वर्षा कर रही है; अनंत आत्मवीर्य उल्लसित हो रहा है और अन्य सिद्ध भगवंत उनके पक्ष में आ मिले हैं। केवलज्ञानलक्ष्मी विजय माला लेकर तैयार खड़ी है और मोह की समस्त सेना प्रतिक्षण घट रही है। अरे, देखो…देखो ! प्रभु तो शुद्धोपयोगरूप चक्र की धार से मोह का नाश करने लगे हैं ! क्षपकश्रेणी मे आगे बढते-बढते आठवें…नौवें…दशवें गुणस्थान में तो क्षणमात्र में पहुँच गये हैं। प्रभु अब सर्वथा वीतराग हो गये…और सूर्यास्त से पूर्व तो वीरप्रभु के अंतर में जो कभी अस्त न हो-ऐसा केवलज्ञान सूर्य जगमगा उठा…अहा ! प्रभु महावीर सर्वज्ञ हुए.. अरिहंत हुए…परमात्मा हुए… ‘णमो अरिहंताणं।’

सर्वज्ञ महावीर

सर्वज्ञ प्रभु महावीर राग या इन्द्रियों के बिना ही परिपूर्ण सुख और ज्ञानरूप परिणमित हुए। अभूतपूर्व थी वह दशा ! इन्द्रियाँ विद्यमान होनेपर भी मानो अविद्यमान हों-इस प्रकार प्रभुने उनका सम्बन्ध सर्वथा छोड़ दिया। ‘भगवान भले अतीन्द्रिय हुए और हमारा साथ छोड़ दिया, फिर भी हमें प्रभु के साथ रहने में ही लाभ हैं’,-ऐसा मानकर वे जड़ इन्द्रियाँ अभी प्रभुका साथ नही छोड़ती थीं। प्रभु तो इन्द्रियों से निरपेक्ष रहकर स्वयमेव सुखी थे। पराधीन इन्द्रियसुखों से ठगे जा रहे जगत को प्रभुने बतला दिया कि आत्मा इन्द्रियविषयों के बिना ही स्वाधीनरूप से सुखी है; सुख वह आत्मा का स्वभाव है, इन्द्रियों का नहीं। शुद्धोपयोग के प्रभाव से आत्मा स्वयं परम सुखरूप परिणमता है।

इन्द्रियातीत तथा लोकोत्तम ऐसे वे वीर भगवान केवलज्ञान होते ही पृथ्वी से ५००० धनुष ऊपर अंतरिक्ष में विराजमान हुए। अहा, पृथ्वीका अवलम्बन उनको नहीं रहा, और अब वे फिर कभी पृथ्वीपर नहीं उतरेंगे। उनका शरीर छायारहित परम औदारिक हो गया; सब को देखनेवाले प्रभु स्वयं भी सर्व दिशाओं से दिखने लगे। प्रभुके केवलज्ञान का महोत्सव करने तथा अरिहंतपद की पूजा करने स्वर्ग से इन्द्रादि देव पृथ्वीपर आ पहुँचे। इन्द्रने स्तुति करते हुए कहा-हे देव ! आप वीतरागता एवं सर्वज्ञता द्वारा जगत में सर्वोत्कृष्ट सुन्दरता को प्राप्त हुए हैं; आप परम इष्ट हो !

सर्वज्ञ परमात्मा का साक्षात्कार करके हजारों लाखों जीव पावन हुए। कुबेरने अत्यन्त भक्तिसहित संसार की सर्वोत्कृष्ट विभूति द्वारा समवसरणरूप जिनेन्द्रसभा की रचना की।-ऐसी रचना वह इन्द्र की आज्ञा से करता होगा या प्रभु की तीर्थंकर प्रकृति से प्रेरित होकर ?..वह तो वही जाने ! परन्तु वह रचना पूर्ण करते ही आश्चर्यचकित होकर उसने कहा- अहो देव ! आपके सान्निध्य के कारण आपका समवसरण जैसा सुशोभित होता है वैसा हमारा स्वर्ग भी शोभा नहीं देता ! [कैसे शोभा देगा ?..अरे कुबेर ! यहाँ तो मोक्ष प्राप्त होता है, तुम्हारे स्वर्ग में कहाँ मोक्ष मिलता है ? हे कुबेर ! तुम स्वर्गलोक की उत्कृष्ट शोभा यहाँ ले आये, परन्तु इन सर्वज्ञदेव की चैतन्यविभूति के समक्ष तुम्हारी विभूति का क्या मूल्य ?]

सम्पूर्ण नीलमणि की शिलापर पृथ्वी के आधार बिना प्रभु के समवसरण की दिव्यरचना हुई; परन्तु उस दिव्य शोभा में मुमुक्षु का चित्त नहीं लगता था; क्योंकि उसका चित्त तो सर्वज्ञ प्रभु के चरणों में ही लगा है। उसे तो देखना है साक्षात् परमात्मा को !..चेतनवंत वीतराग देव को प्रत्यक्ष देखकर उनकी उपासना करना है…और रागरहित आत्मा का स्वाद लेना है। प्रभु की शोभा कहीं बाह्य ठाटबाट में नहीं है, उनकी शोभा तो सर्वज्ञता एवं वीतरागता से है, इसलिये उसी में मुमुक्षु का चित्त स्थिर होता है। हे प्रभो ! आपके शुद्धचेतनस्वरूप को जानने से हमें अपना भी ऐसा ही शुद्धात्मा अनुभूति में आता है,-यह आपका उपकार है। इस प्रकार सर्वज्ञ की सभा में प्रवेश करते हुए मुमुक्षु का गौरव बढ़ जाता था और उसके परिणाम विशुद्ध होते थे। उसे ऐसी अचिन्त्य अनुभूति होती थी मानो अपने ज्ञान मे ही सर्वज्ञ बैठे हों !

प्रभु के चारों ओर दिव्य सभामण्डप है, जहाँ मोक्ष के साधक सभाजन बैठे हैं और भगवान महावीर के दर्शन का आनन्द ले रहे हैं। श्रीमण्डप की शोभा सर्वार्थसिद्धि की शोभा से भी बढ़कर है। अहा, यह तो सर्वज्ञ की सभा…परमात्मा का दरबार…तीर्थंकर की प्रवचन सभा ! उसकी अद्भुतता का क्या कहना ! गणधर एवं इन्द्र जिस सभा में बैठते थे। वहाँ जगत की सर्व लक्ष्मी-समस्त शोभा एकत्रित हुई थी। केवलज्ञान लक्ष्मी का भी जहाँ निवास हो वहाँ अन्य लक्ष्मी का तो क्या पूछना ? अहा, एक ओर भगवान की ‘केवलज्ञान-श्री’ अर्थात् सर्वोत्कृष्ट ज्ञानलक्ष्मी की शोभा और दूसरी ओर समवसरण की दिव्य शोभा;-इस प्रकार जीव और अजीव दोनों ने अपनी-अपनी सर्वोत्कृष्ट शोभा धारण की थी। परन्तु उनमें से जो ‘जीव’ की उत्कृष्ट शोभावान ‘सर्वज्ञ-महावीर’ को जान ले वह जीव सम्यग्दृष्टि होकर अखूट चैतन्यलक्ष्मी के भण्डार अपने मे देख लेता है। वीतरागी, शांतभावरूप परिणमित आत्मा कैसा होता है-उसे प्रत्यक्ष देखकर उन्हें आत्मा के शांतस्वभाव की प्रतीति हो जाती है। अहा, सर्वज्ञ तीर्थंकर जिसके नायक, गणधर जिसके मंत्री और देव जिसके द्वारपाल हो उस दरबार का क्या कहना ! भगवान ऋषभदेव की धर्मसभा (समवसरण) बारह योजन व्यास की थी और भगवान महावीर की एक योजन व्यास की है, परन्तु दोनों धर्मसभाओं मे भगवंतों ने जिस चैतन्यतत्त्वका प्रतिपादन किया तथा जो मोक्षमार्ग बतलाया वह तो एकसमान ही था।

उत्तम छाया तथा दिव्यप्रकाश द्वारा जो प्रभु की सेवा कर रहा था वह अशोकवृक्ष आश्चर्य उत्पन्न करता था कि जड़ के बिना इतना विशाल वृक्ष कैसे बना ! …और देखो, यह भी एक आश्चर्य की बात है कि वहाँ जगत में श्रेष्ठ सिंहासन होनेपर भी प्रभु उस पर बैठते नहीं हैं; उससे ऊपर-अंतरिक्ष मे बैठकर ऐसा प्रगट करते हैं कि- यह रत्नसिंहासन वह कोई चैतन्यपद नहीं है; चैतन्य का पद तो अंतर में अतीन्द्रिय ज्ञान-आनन्द द्वारा निर्मित है…उस पर प्रभु आरूढ़ हैं। ज्ञानानन्द पद मे विराजमान सर्वज्ञ महावीर को देखकर भव्यजीव भी ज्ञानानन्द में लीन हो जाते थे…और प्रभु की दिव्यवाणी का श्रवण करने के लिये अत्यन्त आतुर थे-प्रभु कैसा अद्भुत बोलेंगे ! कैसा अचिन्त्य आत्मस्वरूप बतलायेंगे ! . प्रभु अभी बोलेंगे…प्रातःकाल बोलेंगे…मध्याह्न मे बोलेंगे…सायंकाल बोलेंगे ! कल तो अवश्य बोलेंगे !

‘‘बोलो, बोलो न वीतराग, अबोला क्यों हमसे लिया है?’’

यद्यपि वीरप्रभु अभी बोलते नहीं हैं, परन्तु मौन रहकर, अनिच्छा से गगनविहार करते हैं। विहार करते-करते वे राजगृही में विपुलाचल पर पधारे। दिवसोंपर दिवस बीत रहे हैं; जीवों के झुण्डके झुण्ड समवसरण में आ रहे हैं और साक्षात् परमात्मा के दर्शनों से हर्षित होते हैं…परन्तु भगवान की दिव्यध्वनि नहीं खिरती। वैशाख शुक्ला दशम के दिन प्रभुको केवलज्ञान हुआ था; वह शेष वैशाख मास बीत गया, ज्येष्ठ मास भी बीत गया और अब अषाढ़ भी पूरा होने लगा है…ग्रीष्म ऋतु समाप्त हुई.. ६६ दिन बीत चुके हैं, किन्तु भगवान की ध्वनि नहीं खिरती; तथापि भव्यजीव थके नहीं हैं, वे तो प्रभु की वाणी सुनने के लिये समवसरण में ही बैठे हैं; वहाँ उन्हें भूख नहीं लगती और न प्यास; थकान भी नहीं लगती और निद्रा भी नहीं आती। मानो क्षुधा-तृषा रहित भगवान के सान्निध्य में उनकी भी क्षुधा-तृषा एवं निद्रा शांत हो गई है। (समवसरण में किसी को क्षुधा-तृषा-रोगादि नहीं होते।)

अब तो अषाढ़ भी पूर्ण होकर श्रावण मास प्रारम्भ हो चुका है…इस प्रकार श्रावण कृष्णा प्रतिपदा आयी; वर्षाऋतु प्रारम्भ हो गई। अब तो प्रभु के मुख से भी दिव्यध्वनि की वर्षा अवश्य होगी-ऐसे विश्वासपूर्वक सभाजन भगवान की ओर दृष्टि लगाये बैठे थे इतने मे अचानक एक ऋषि-महात्माने समवसरण में प्रवेश किया; उनका नाम था इन्द्रभूति-गौतम ! मानस्तंभ के निकट आते ही उनका मान विगलित हो गया और प्रभुकी दिव्यता देखते ही विनित हो गये-अहा, ऐसी अद्भुत वीतरागता ! यह आत्मा अवश्य ही सर्वज्ञ परमात्मा हैं-ऐसा विश्वास आ गया और प्रभु के पादमूल में नम्रीभूत होकर उसी समय उन्होंने संयम धारण किया। इन्द्रराज हर्षपूर्वक यह सब देखते रहे और उन महात्मा-गौतम को आदर पूर्वक मुनिवरों की सभा में ले गये। ज्यों ही मुनिराज इन्द्रभूति-गौतम मुनिवरों की सभा मे जाकर प्रभु को हाथ जोड़कर बैठे कि तुरन्त सर्वज्ञ महावीर के सर्वांग से ॐ दिव्यध्वनि खिरने लगी-

वीरप्रभु के ज्ञानगगन से बरसे अमृतधार,
विपुलगिरि पर दिव्यध्वनिकी होती जयजयकार।
रत्नत्रयकी खिली वाटिका, आनन्द का सौरभ है;
करते निजकल्याण जीव, जिनशासन का गौरव है।
समवसरण के मध्य विराजे वीरनाथ भगवान;
हर्षित हो सुर-नर-मुनि करते प्रभुजी का गुणगान।
स्वाश्रित चेतनभाव सहित प्रभु करते मोक्षप्रकाश;
भव्यजीव भवसे तिरने की लगा रहे हैं आश।
रत्नत्रयनिधि की उपासना हरि करते हैं निशदिन;
निजवैभव कर प्राप्त सभी होते प्रसन्न मन ही मन।
मुनि-गणधर भी धर्मसभा में धरते आत्मध्यान;
सबके मन की एक भावना हो शिवपुर प्रस्थान।

अहा, वह आश्चर्यकारी दिव्यध्वनि सुनकर सर्व जीव आनन्दमग्न हो गये; उसमें परम चैतन्यतत्त्व का अचिन्त्य स्वरुप श्रवण करके अनेक जीव ऐसे अंतर्लीन हुए कि तत्क्षण निर्विकल्प होकर आत्मअनुभूतिकरके सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र को प्राप्त हुए। इस प्रकार तीर्थंकर भगवान महावीर ने रत्नत्रयतीर्थ का प्रवर्तन किया…धर्मचक्र का प्रवर्तन किया। गौतमस्वामी रत्नत्रयसंयुक्त मुनियों के नायक बने, उन्हें उसी क्षण अप्रमत्तदशा उदित हो उठी; मनःपर्ययज्ञान हुआ; वे बारह अंग के ज्ञाता श्रुतकेवली हुए; अनेक महान लब्धियाँ उनके प्रगट हो गईं। उन्हें वचनलब्धि तो ऐसी अपूर्व प्रगट हुई कि-करोड़ों-अरबों श्लोक धीर-गम्भीर, मधुर, स्पष्ट स्वर में दो घड़ी में बोल सकते थे; करोड़ों मनुष्य और तिर्यंच एकसाथ भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोल रहे हों तब भी प्रत्येक की बात अलग-अलग स्पष्ट समझ सकते थे। बुद्धिलब्धि, औषधलब्धि, रसलब्धि, अक्षयलब्धि, विक्रियालब्धि…आदि अनेक लब्धियाँ प्रगटी होने पर भी वे जानते थे कि इन सर्व लब्धियों की अपेक्षा आत्मानुभूति की लब्धि कोई अचिन्त्य सामर्थ्यवान है, और सर्वज्ञ की केवलज्ञानलब्धि के समक्ष तो यह समस्त लब्धियाँ अनन्तवें भाग की हैं।-इस प्रकार अत्यन्त निर्माणतापूर्वक वे तीर्थंकर महावीर के प्रथम गणधर बने और हाथ जोड़कर प्रभु की स्तुति की:-

शतइन्द्र-वंदित, त्रिजगहित निर्मल मधुर वदनारवे,
निःसीम गुण धरनारने, जितभव नमुं जिनराजने।
सुर-असुर-नरपतिवंद्यने, प्रविनष्ट घातीकर्मने,
प्रणमन करूँ हूँ धर्मकर्ता तीर्थ श्री महावीरने।

इन्द्रभूति-गौतम के अतिरिक्त उनके दो भाई अग्निभूति और वायुभूति तथा शुचिदत्त, सुधर्म, मांडव्य, मौर्यपुत्र, अकम्पन, अचल, मेदार्य एवं प्रभास,-ऐसे कुल ११गणधर महावीर प्रभुके थे।

अब, गौतमस्वामी वीरप्रभुके समवसरण में अचानक कैसे आ पहुँचे ? उसकी रोमांचक कथा सुनो।-ऋजुकूला नदी के तट पर वीर प्रभुको केवलज्ञान हुआ, समवसरण की रचना हुई, किन्तु दिव्यध्वनि नहीं खिरी; विहार करते-करते प्रभु राजगृही में विपुलाचल पर पधारे। छियासठ दिन बीत जाने पर भी भगवान का उपदेश क्यों नहीं होता ? भगवान तो तीर्थंकर हैं, इसलिये दिव्यध्वनि के उपदेश द्वारा तीर्थप्रवर्तन हुए बिना नहीं रह सकता; किन्तु इतना विलम्ब क्यों ? भव्यजीव वाणी सुनने के लिये प्यासे चातक की भाँति आतुर हो रहे हैं ! अन्त मे इन्द्र का धैर्य समाप्त हुआ; उसने दिव्यज्ञान से देखा कि तीर्थंकर देव के धर्मोपदेश के समय जिसकी अनिवार्य उपस्थिति होना चाहिये ऐसा कोई गणधर इस सभा में उपस्थित नहीं हैं। वह गणधर होनेवाला जीव तो इस समय वेद-वेदान्त में पारंगत महापण्डित के रुप में गौतमग्राम (गुणावा नगरी) में बैठा हैं;- ऐसा जानकर इन्द्रने उन गौतम को समवसरण में लाने की युक्ति बनायी। स्वयं एक ठिगने ब्राह्मण का रुप धारण करके गौतम के पास पहुँचे और विनयपूर्वक कहा-हे स्वामी ! मैं महावीर तीर्थंकर का शिष्य हूँ; मुझे एक श्लोक का अर्थ समझना है, परन्तु मेरे गुरुने तो अभी मौन धारण किया है, इसलिये आपके पास उस श्लोक का अर्थ समझने आया हूँ।

इन्द्रभूति ने प्रेम से कहा-बोलो वत्स ! कौनसा श्लोक है तुम्हारा ?

ब्राह्मण वेशधारी इन्द्र ने कहा-सुनिये महाराज !-त्रैकाल्यं द्रव्यषट्कं नवपदसहितं जीव षट्काय-लेश्या। पंचान्ये चास्तिकायाः व्रतसमितिगति ज्ञान-चारित्रभेदाः ।।

    इत्येतन्मोक्षमूलं त्रिभुवनमहिते प्रोक्तमर्हद्भिरीशैः । प्रत्येति श्रद्दधाति स्पृशति च मतिमान् यः स वै शुद्धदृष्टिः ।।

श्लोक बोलकर इन्द्रने कहा-हे देव ! इसमें तीनकाल, छहद्रव्य, नवपदार्थ, पंचास्तिकाय आदि-कि जिन्हे जानना मोक्ष का मूल है-वे क्या हैं ? सो समझायें।

महान विद्वान इन्द्रभूति विचार में पड़ गये कि-यह श्लोक तो मैं प्रथम बार सुन रहा हूँ। इसमें तो जीवादितत्त्वों का वर्णन हैं, परन्तु मेरे मन की गहरायी में तो अभी ‘जीव’ के अस्तित्व की भी शंका हैं, तब फिर मैं इस ब्राम्हण को उसका स्वरूप कैसे समझाऊँ ? अवश्य ही यह श्लोक कहनेवाले इसके गुरु कोई असाधारण एवं जीवतत्त्व के ज्ञाता होना चाहिये ! इन्द्रभूति बहुत मंथन करने के बाद भी श्लोक के भाव नही समझ सके। अहा, सर्वज्ञमार्ग के रहस्य को एकान्त-मिथ्यावादी कहाँ से समझ सकेंगे ? उसने विचार किया-अरे, मै समस्त वेद-पुराणों का ज्ञाता हूँ, परन्तु छह द्रव्य क्या हैं, पाँच अस्तिकाय क्या है, पाँच ज्ञान कौन से हैं-यह तो मैंने कभी सुना ही नही है ! यह तो इस ब्राह्मण के सामने मेरी प्रतिष्ठा जाने का प्रसंग आया ? क्यों न इसके गुरु के पास जाऊँ और देखूँ कि वह कौन है ?-ऐसा सोचकर इन्द्रभूतिने कहा- हे वत्स ! तुम्हारे गुरु कौन हैं और कहाँ विराजते हैं ? मैं उनके साथ इस श्लोकपर चर्चा करूँगा।

बस, इन्द्र तो यही चाहते थे। उन्होने कहा-यह तो बड़े आनन्द की बात है महाराज ! मेरे साथ चलिये ! मेरे गुरु सर्वज्ञ-महावीर हैं और वे राजगृही मे विपुलाचल पर विराजते हैं।

.. और इन्द्र के साथ इन्द्रभूति समवसरण की ओर चल पड़े । वाह रे इन्द्रभूति जो तत्त्व अपनी समझ मे नहीं आया उसे समझने की कितनी गहरी जिज्ञासा है ! पाँच सौ शिष्यों के साथ समवसरण की ओर चलते हुए गौतम का अभिमान क्षण-क्षण गल रहा है; उनका अंतर स्वीकार कर रहा है कि जिस श्लोक का अर्थ मैं नही जान पाया उसे जाननेवाले गुरु-महावीर कोई असाधारण ज्ञानवान होंगे !-इस प्रकार उनके अंतर में हार-जीतकी नहीं किन्तु अपने ज्ञान के समाधान की मुख्यता है। उनकी शंका का तथा अज्ञान का अंत अब निकट ही है; यहाँ अपूर्वज्ञान की तैयारी है तो सामने अपूर्ववाणी की,-उत्कृष्ट उपादान-निमित्त का कैसा सुमेल है !

ज्यों ही मानस्तंभ के निकट आये और प्रभुका वैभव देखा त्यों ही उनका मान विगलित हो गया, उन्होंने महावीर को देखा और देखते ही सर्वज्ञ की तथा जीव के अस्तित्व की प्रतीति हो गई। अहा ! ऐसे वैभव में भी प्रभु वीतरागरूप से विराज रहे हैं ! कैसी शांत है उनकी दृष्टि ! उनके आत्मा की दिव्यता का क्या कहना !-अवश्य ही यह सर्वज्ञ हैं।-इस प्रकार गौतम को प्रभुके प्रति परम सम्मान का भाव जागृत हुआ और जीव के अस्तित्व सम्बन्धी उनकी सूक्ष्म शंकाएँ दूर हो गई. मान का स्थान ज्ञानने ले लिया। निःशल्य हुए गौतम ने विनयपूर्वक अपने पाँच सौ शिष्योंसहित प्रभुका मार्ग अंगीकार किया और नम्रीभूत होकर प्रभु की स्तुति की-मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम् । ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये ।।

अहा, कैसा आनन्ददायी होगा वह दृश्य ! वीरप्रभुकी दिव्यवाणी छूटती होगी और गौतम गणधर उसे झेलते होंगे ! प्रभुकी वाणी सुनकर तत्क्षण गौतम-इन्द्रभूति चार ज्ञानधारी श्रुतकेवली हुए और बारह अंगरुप श्रुतकी रचना द्वारा परमात्मा की वाणी का प्रसाद पंचमकाल के भव्य जीवों के लिये संग्रहित करके रख दिया,-जो प्रसाद आज हमें गुरु-परम्परा से प्राप्त हो रहा है। अहो वीरनाथ ! आपका महान उपकार है; आपके गणधरों का तथा वर्तमान पर्यंत आपकी वाणी द्वारा स्वानुभवपूर्वक मोक्षमार्ग को प्रवाहित रखनेवाले वीतरागी सन्तों का भी महान उपकार है कि जिन के प्रताप से आज ऐसे दु:षम काल में भी हमें आपद मोक्षमार्ग मिल रहा है। वाह, धन्य वीरका शासन ..और धन्य उस शासनधारा को अविच्छिन्न रुप से प्रवाहित रखनेवाले सन्तोंको !

पश्चात् इन्द्रभूति-गौतम के साथ उनके और दो भाई महा विद्वान अग्निभूति, वायुभूति तथा अन्य आठ विद्वान् अपने अपने सैकड़ों शिष्यों सहित वीरप्रभु के समवसरण में आये और रत्नत्रयधर्म प्राप्त करके प्रभु के गणधर बने। महावीर तीर्थंकर के कुल ११ गणधर थे। समवसरण की अद्भुत दिव्यता के मध्य रहकर भी निर्मोहरुप से विराजमान वर्धमान सर्वज्ञ सचमुच अलौकिक थे-अहा, कैसी शांत मुद्रा ! कैसी वीतरागता ! और कैसा ज्ञानतेज ! वह मुद्रा देखते ही जीवों की शंकाएँ निर्मूल होकर आत्मा के परमस्वरुप की प्रतीति होती थी। वाह, उन अरिहंतों की महिमा का क्या कहना !-कि जिनका स्वरुप जानने से आत्मा के शुद्धस्वरुप का ज्ञान तथा सम्यग्दर्शन होता है।

इन्द्रभूतिका अद्भुत परिवर्तन देखकर इन्द्र को अपार आनन्द हुआ।…और ब्राह्मण का रुप छोड़कर अपने असली इन्द्र स्वरुप मे गौतम गणधर के चरणों में वन्दन किया।

इन्द्रभूति ने परमगम्भीरता से कहा-इन्द्रराज ! अब मैंने जान लिया है कि-तुम्हीं ब्राह्मण का वेश धारण करके युक्तिपूर्वक मुझे यहाँ समवसरण में लाये हो ! …यहाँ आने से मेरा कल्याण हुआ है; मेरी पराजय नहीं किन्तु विजय हुई है और उसमें मुझे तीन रत्न तथा चार ज्ञान प्राप्त हुए हैं।पहले मैं मिथ्यात्व से पराजित था, अब मिथ्यात्व को पराजित करके मैंने अपने अपार निजवैभव को जीत लिया है। प्रभु महावीर अब मात्र तुम्हारे नही, मेरे भी परमगुरु हैं।

‘शतइन्द्र-वंदित त्रिजगहित निर्मल मधुर वदनार ने,
नि:सीमगुण धरनार ने, जितभव नमुं जिनराज ने।’

अहा, गौतम गणधर भी जिनकी स्तुति करते हैं उन सर्वज्ञ महावीर की महिमा का क्या कहना ! हे महावीर देव ! आपके गुण इतने अधिक महान हैं कि छद्मस्थ जीव उनकी स्तुति करते हुए थक जाता है, तथापि मैं आपके गुणों के प्रति सच्ची महिमा के कारण आपकी स्तुति करता हूँ-प्रभो ! आपके अंतर में उदित हुआ केवलज्ञान सूर्य हानि-वृद्धि से रहित स्थिर है; वह सूर्यकी भाँति आतप देनेवाला नहीं किन्तु आतप हरनेवाला है। आपकी वीतरागी सर्वज्ञता की अचिन्त्य महिमा का चिन्तन हमें राग से भिन्न ज्ञानस्वभावी आत्मा की अनुभूति कराता है…और सम्यक्त्वसहित महान आनन्द प्रगट होता है। प्रभो ! आपकी यथार्थ प्रतीति का यह महान फल है।

धन्य सर्वज्ञदेव ! आपका प्रभाव कोई अद्वितीय है। स्वानुभूति के बिना आपके अचिन्त्य गुण चिन्तन में नहीं आ सकते। जहाँ आपके अचिन्त्य गुणों को ज्ञान में लेकर उनका चिन्तन करते हैं वहाँ हमारा ज्ञान वैसे आत्मगुणों में एकाग्र हो जाता है और विकल्पों से परे कोई परमशांत चैतन्यरस अनुभव में आता है। यही है आपकी परमार्थ स्तुति !..यही है आपका पावन पंथ !

‘जिती इन्द्रियो ज्ञानस्वभावे अधिक जाणे आत्मने,
निश्चय विषे स्थित साधुओ भाखे जितेन्द्रिय तेहने ।’

[इस प्रकार सर्वज्ञस्वभावी अतीन्द्रिय आत्मा की अनुभूति ही सर्वज्ञ की परमार्थ स्तुति है।]

वे सर्वज्ञ महावीर कोई ‘अन्तिम तीर्थंकर’ नहीं थे। जिस प्रकार जगत में मोक्ष प्राप्त करनेवाले जीवों का तथा मोक्षमार्ग का कभी अन्त नहीं है, उसी प्रकार एक के बाद एक अनन्त तीर्थंकरों की परम्परा अनन्त काल तक चलती ही रहेगी। इस चौबीसी के प्रथम और अन्तिम (ऋषभदेव एवं महावीर) तीर्थंकरों के बीच तो असंख्य वर्षों का अंतर था, परन्तु इस चौबीसी के अन्तिम और आनेवाली चौबीसी के प्रथम (महावीर एवं पद्मनाभ) तीर्थंकरों के बीच मात्र ८४००० वर्ष का ही अंतर है। महावीर प्रभुके मोक्षगमन पश्चात् ८४००० वर्ष में ही राजा श्रेणिक का आत्मा महापद्म तीर्थंकर होगा। धन्य मार्ग !

इधर कौशाम्बीनगरी में कुमारी चन्दनबाला वीरप्रभु के केवलज्ञान की प्रतीक्षा करते हुए वैराग्यमय जीवन बिता रही है। वैशाख शुक्ला दशमी के सायंकाल आकाश में अचानक हजारों-लाखो देव-विमान देखकर उसे आश्चर्य हुआ…वे देव महावीर भगवान का जयजयकार करते हुए जा रहे थे। चन्दना तुरन्त समझ गई कि-मेरे महावीर को केवलज्ञान हो गया है..और उसीका उत्सव मनाने यह देवगण जा रहे हैं। अहा ! मेरे महावीर अब परमात्मा बन गये ! इस प्रकार चन्दना के हर्षानन्द का पार नहीं है। सारे नगर में आनन्द के बाजे बजवाकर उसने प्रभुके केवलज्ञान का मंगल उत्सव मनाया। पश्चात् बड़ी बहिन मृगावती को साथ लेकर वह राजगृही वीरप्रभु के समवसरण में पहुँची.. और उन वीतरागी वीर परमात्मा को देखकर स्तब्ध रह गई। राजकुमार महावीर ने जो आत्मानुभूति प्राप्त की थी उसका उसे स्मरण हुआ और तुरन्त वैसी अनुभूति में पुनःपुनः उपयोग लगाकर अन्तर की विशुद्धता को बढ़ाया। प्रभु की स्तुति की, गौतम स्वामी आदि मुनिवरों को वन्दन किया और प्रभुचरणों में आर्यिका के व्रत धारण किये…कोमल केशों का लोच किया, राजवस्त्र छोड़ दिये और एक श्वेत परिधान में वैराग्य से सुशोभित हो उठी। अभी कुछ दिन पूर्व भी सिर मुंडाए बंधन में पड़ी थी…और आज स्वेच्छा से सिरमूंडकर वह मोक्षमार्ग में प्रयाण कर रही है ! कहाँ वह कारागृह और कहाँ यह समवसरण-धर्मसभा ! उन दोनों संयोगों से विभक्त तथा निजगुणों के एकत्व-ऐसे निजस्वरूप का वह अनुभवन करती थी। वीरप्रभुकी धर्मसभा में विद्यमान ३६००० आर्यिकाओं के संघ की वे चन्दनामाता अधिष्ठात्री थीं। कहाँ भील द्वारा अपहरण और कहाँ वीरप्रभु की शरण ! कहाँ वेश्या के हाथों बाजार में बिकने का प्रसंग और कहाँ ३६००० आर्यिकाओं में अधिष्ठात्री-पद ! वाह रे उदयभाव तेरा खेल !!परन्तु धर्मात्मा का चैतन्यभाव अब तेरे विचित्रजाल में नहीं फँसेगा, वह तो सर्व प्रसंगों में तुझसे अलिप्त अपने चैतन्यभाव में ही रहेगा…और मोक्षको साधेगा।

भारत में भगवान महावीर तीर्थंकर से पूर्व २३ वें पार्श्वनाथ तीर्थंकर का शासन चल रहा था; अहिंसाधर्म की महिमा फैल रही थी। भगवान महावीर ने भी वह बात प्रचारित की कि-रागसे भिन्न आत्मा के अनुभवद्वारा ही अहिंसाधर्म का पालन हो सकता है। क्योंकि राग स्वयं हिंसा है, इसलिये जो जीव जितना राग में वर्तता है उतना वह हिंसा में ही वर्त रहा है। जिसमें राग नहीं है ऐसे ज्ञान की अनुभूति वह परम अहिंसाधर्म है और उससे मोक्ष की प्राप्ति होती है।-ऐसे अहिंसाधर्म के उपदेशक प्रभु महावीर ने विपुलाचल से विहार करके भारतभूमि को पावन किया। जहाँ वे पधारते वहाँ अहिंसामय शान्त वातावरण हो जाता था। सर्प और नेवले जैसे विरोधी जीव भी एक दूसरे के मित्र बन जाते थे।

सिंह और गाय, शेर और खरगोश ..सब भयरहित होकर एक साथ बैठते…और वीरवाणी का अमृत-पान करते थे। प्रभुने अनेकान्त तत्त्व का स्वरूप समझाया-जीव अतीन्द्रिय चेतनतत्त्व है, वह जड़ से भिन्न है। चेतन और जड़ प्रत्येक द्रव्य अपने-अपने स्वधर्म में स्थित है। एक ही वस्तुका एकसाथ अपने अनेक धर्मों में तन्मयरूप से रहना सो ‘अनेकान्त’ है। एक ही आत्मा ज्ञानमें है, वही दर्शन में है, वही सुख में है, वही द्रव्य में है, वही गुण-पर्यायों में है; वही आत्मा अस्तित्वधर्म में है, वही नास्तित्वधर्म में है;-इस प्रकार अनन्त स्वधर्मों में व्यापक आत्मा अनेकान्त स्वरूप है। उसे जानने से आत्मा का अनन्त निजवैभव जानने में आता है। इस प्रकार अनेकान्तमय आत्मवैभव बतलाकर भगवान ने प्रत्येक जीव को भगवानपना ही दिया. .अनन्त निजवैभव दिया…मोक्षमार्ग दिया…धर्म दिया।

प्रभु महावीर जब तीर्थंकर रुप में विचर रहे थे उन दिनों राजगृही मगध देश की राजधानी थी, और वहाँ राजा श्रेणिक राज्य करते थे। यद्यपि प्रभु वर्धमान (वड्ढमाण) सौराष्ट्र आदि अनेक देशों में विचरे थे, परन्तु मगध देश के निकटस्थ प्रदेशों मे उनका ‘विहार’ इतना अधिक हुआ कि वह प्रदेश ही विहार (बिहार) के नाम से प्रसिद्ध हो गया। पहले तो वैशाली और मगध दोनों राज्य एक-दूसरे के शत्रु थे और परस्पर युद्ध भी करते थे; परन्तु वीतराग महावीर को क्या ? उनका कौन शत्रु और कौन मित्र ? उन्होंने तो अपने धर्मचक्र का प्रवर्तन मगध की राजधानी से प्रारम्भ किया। क्रोध द्वारा जिन्हें नहीं जीता जा सकता था उन्हें वीतरागता द्वारा जीत लिया।

एक बार प्रभु महावीर राजगृही के वैभारगिरि पर पधारे। परमात्मा महावीर को और साथ में अपनी लाड़ली बहिन चन्दना को देखकर महारानी चेलना के आनन्द का पार नहीं रहा। महाराजा श्रेणिक भी साथ थे। सर्वज्ञ महावीर को देखकर वे भी स्तब्ध रह गये-वाह ! मेरे इष्ट देव ! धन्य आपकी वीतरागता ! धन्य आपका अचिन्त्य धर्मवैभव !

जब श्रेणिक राजा भव्य शोभायात्रासहित हाथी पर बैठकर प्रभुके दर्शन करने जा रहे थे तब एक मेंढक भी उनके साथ कमल की पंखुरी लेकर चल रहा था ! (वह नागदत्तसेठ का जीव था।) मार्ग में हाथी के पाँवतले कुचल जाने से वह मेढक मर गया और प्रभु की पूजा के भावसहित मरकर देव हुआ। देवगति को प्राप्त वह जी तुरन्त वीरप्रभु के समवसरण में आया…उसकी कथा जैनधर्म में प्रसिद्ध है।

आज श्रेणिक राजा के आनन्द का पार नहीं है-अहा, सर्वज्ञ परमात्मा मेरी नगरी में पधारे…मैं धन्य हुआ ! अपनी बड़ी बहिन [त्रिशला] के लाड़ले पुत्र को सर्वज्ञ परमात्मा रुप में तथा छोटी बहिन चन्दनबाला को आर्यिका के रुप में देखकर रानी चेलना का हृदय भी हर्षोल्लास से भर गया, और वीरप्रभुकी दिव्यध्वनि सुनकर चैतन्यरस की धारा उल्लसित हुई। राजा श्रेणिक तो चैतन्यरस में ऐसे सराबोर हुए कि प्रभु के पादमूल में ही दर्शन मोह की सातों कर्म प्रकृतियों का क्षय करके क्षायिक सम्यक्त्व प्राप्त किया; उनके ज्ञान की निर्मलता बढ़ गई,; व्रतचारित्र तो उन्होंने नहीं लिये, परन्तु दर्शनविशुद्धिप्रधान सोलह कारण भावना भाते-भाते तीर्थंकर नामकर्म बाँधना प्रारम्भ किया। इस भरतक्षेत्र के ही दो तीर्थंकर …उन में अवसर्पिणी के अन्तिम तीर्थंकर के चरणों में उत्सर्पिणी के प्रथम तीर्थंकर ने तीर्थंकर नामकर्म बाँधा…और अब मात्र ८२५०० वर्ष पश्चात् वह आत्मा इस भरतक्षेत्र में प्रथम तीर्थंकर के रुप में उत्पन्न होगा।

अहा, राजगृही के वैभारगिरि पर धर्मवैभव का महान आनन्दोत्सव चल रहा है। वर्तमान एवं भावी दोनों तीर्थंकरों को एकसाथ देखकर जीव आनन्दित हो रहे हैं। गणधर-मुनिवर भी उन भावी तीर्थाधिनाथ को मधुरदृष्टि से देखकर आशीर्वाद की वर्षा करते हैं। अरे, तिर्यंच भी प्रभुकी वाणी द्वारा श्रेणिक राजा की महिमा सुनकर आश्चर्य एवं भक्ति सहित उनकी ओर निहार रहे है। 'धन्य भाग्य से हमें भावी तीर्थंकर के प्रत्यक्ष दर्शन हुए। यह भावी तीर्थंकर जिस सभा में बैठकर प्रभुकी वाणी सुन रहे हैं, -हम भी उसी सभा मे उन भावी तीर्थंकर के साथ बैठकर वीरप्रभु की वाणी सुन रहे हैं. हम भी उन तीर्थंकरों के मार्ग से अवश्य मोक्ष में जायेंगे।

श्रेणिकराजा ने एक ओर से तो ऐसा जाना कि यहाँ से मरकर स्वयं प्रथम नरक मे जायेंगे; उसी समय दूसरी ओर से ऐसा जाना कि एक भव पश्चात् स्वय त्रिलोकपूज्य तीर्थंकर होंगे। परस्पर विरुद्ध दोनों बातें सुनकर उन धर्मात्मा को कैसी अनुभूति हुई होगी ? क्या नरकगति के शोक से वे खेदखिन्न हुए होंगे ? अथवा तीथकर होने को उल्लास में हर्ष से नाच उठे होंगे ? । नहीं, उन धर्मात्मा की चेतना तो हर्ष या खेद दोनों से परे अलिप्त ही रहकर मोक्ष की ही साधना में लगी रही। वाह, बलिहारी है ज्ञानी की ज्ञान चेतना की !-

हर्ष-शोक से पार, ज्ञानी जीव रहें सदा;
जो चाहो सुख-शांति, साधो ज्ञानस्वभावको।

अहो, वीरनाथ के समीप चैतन्य की विशुद्धता के बलसे नरक के पाप भी मानो धुल गये हों।-इस प्रकार श्रेणिक राजा तो चेतनरस के वेदन मे ही तत्पर थे। वीर प्रभु के प्रति परम उपकार के सूचक हर्षाश्रु उनकी आँखोंसे झर रहे थे। अरे, देखो तो सही, जीव के परिणाम का परिवर्तन ! कहाँ एक समय मुनि की विराधना के क्रूरपरिणाम ! और कहाँ इस समय तीर्थंकर प्रकृति के योग्य विशुद्धपरिणाम ! कहाँ उस समय का मिथ्यात्व और कहाँ आज का क्षायिक सम्यक्त्व ! एक ही जीवके जीवन में कैसे-कैसे परिवर्तन आते हैं ! वाह, जिनशासन ! सत् को उत्पाद-व्यय-ध्रुवस्वरूप बतलानेवाला तेरा उपदेश हमे वीतरागता ही कराता है। नरकगामी भी वही ..और किंचित् दीर्घदृष्टि से देखें तो मोक्षगामी भी वही ! अहा, जीव के परिणामों की शक्ति तो देखो, चाहे जैसा पापी या विराधक जीव भी सीधा चले तो क्षण में धर्मी होकर मोक्षका साधक बन जाता है।-इसका उदाहरण एक इन्द्रभूति-गौतम गणधर और दूसरे श्रेणिकराजा-तीर्थंकर।

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भगवान महावीर (भाग ९)

क्षायिक सम्यक्त्व को प्राप्त श्रेणिकराजा ने अतर में अतीन्द्रिय आनन्द के तार झंकृत करके वीरनाथ प्रभु की भक्ति की। उस समय एक ओर उनके पुराने कर्म शीघ्रता से खिर रहे थे तो दूसरी ओर तीर्थंकर प्रकृति बँध रही थी; यद्यपि उस समय ‘मैं कर्म से बंधूँ’-ऐसी इच्छा उनको नही थी, परन्तु राग के अपराधवश बंधन हो रहा था। महावीर तो पूर्व मे बाँधे हुए तीर्थंकर नामकर्म को छोड़ रहे हैं ओर श्रेणिक तीर्थंकर नामकर्म को बाँध रहे हैं. मानो एक तीर्थंकर के पाससे प्रकृति के परमाणु दूसरे तीर्थंकरके पास जा रहे हों ! ‘यह वीर प्रभु तो अब हमें छोड़कर निष्कर्म होकर मोक्षमें जायेंगे’-ऐसा समझकर उन कर्मोंने अपने रहने के लिये दूसरा घर ढूँढ लिया…और महावीर के पासु से निकलकर श्रेणिक के पास आ गये !-इस प्रकार तीर्थंकरत्व का अविछिन्न प्रवाह जगत मे चलता ही रहता है।

इस प्रकार इन्द्रादि देवों द्वारा पूजित एव भव्यजीवों को मोक्षमार्ग दरशाते हुए गगनगामी महावीर तीर्थंकर विचर रहे थे। राजगृही से विहार करके प्रभु वैशाली की ओर चलने लगे। बीच में गंगानदी पार करने के लिये उन्हें पुल की या नौका की आवश्यकता नही पडी, क्योंकि प्रभु तो अब गगनविहारी हो गये थे। वैशाली वीरप्रभु की जन्मभूमि ! वहाँ माता त्रिशला और पितासिद्धार्थ बारह वर्ष से परमप्रिय वीरनाथ के दर्शनों को आतुर थे। परमात्मा वीरनाथ वैशाली में पधारे और अद्भुत समवसरण के बीच विराजमान उन परमात्मा को देखकर माता त्रिशला के अन्तर में आनन्दोर्मियाँ जाग उठीं-मेरा लाल केवलज्ञानरूपी जगत्श्रेष्ठ अमूल्य रत्न लेकर आया, परमात्मा बनकर हमें दर्शन देने आया। वैशालीकी समस्तप्रजा अपने लाडले राजकुमार को एक परमात्मा के रूपमें देखकर परमहर्षित हुई और महा महोत्सव किया। जिन्होंने महावीर को बचपन में क्रीड़ा करते देखा था, मुनिरूप से आत्मसाधना करते देखा था, और अब सर्वज्ञदशा में परमात्मारूप में देखा,…उन वृद्धजनों को ऐसा लगा कि अरे, कुछ वर्ष पूर्व जो हमारे साथ पृथ्वी पर चलते-फिरते मनुष्य थे वे देखते ही देखते परमात्मा बन गये!..कैसी अजब है आत्म-शक्ति ! ‘आत्मा में ही परमात्मशक्ति है’-इस प्रकार सर्वज्ञ महावीर को देखते ही अपनी आत्मशक्ति की प्रतीति करके अनेकों जीव परमात्मा बन गये ! प्रभुने दिव्यध्वनि द्वारा ‘प्रत्येक जीव में परमेश्वरता’ की प्ररूपणा की। अहा, प्रत्येक आत्मा परमात्मवैभव से परिपूर्ण है और वह स्वाधीनरूप से परमात्मा हो सकता है’-ऐसी महान बात परमेश्वर के अतिरिक्त कौन बतला सकता है ? और उसे झेलनेवाले कोई साधारण जीव नहीं किन्तु ‘जिनेश्वर के नन्दन’ होते हैं; मोक्षके पंथी होते हैं। अहा, वीरका ऐसा सुन्दर रागरहित मार्ग ! उसमें जीवों को जगत की कोई सम्पदा ललचा नहीं सकती, अथवा कोई विपदा डरा नहीं सकती। हे वीर ! आपका मार्ग वह वीरों का मार्ग है; वीतरागता का मार्ग है। वीतरागता में निहित सच्ची वीरता को आपके भक्तों के सिवा और कौन समझेगा ?

लोग कहते हैं कि-आकाश में पुष्प नहीं होते; परन्तु ऐसा कहनेवाले ने प्रभुके श्रीविहार को नहीं देखा। आकाशगामी प्रभु जहाँ भी विचरते हैं वहाँ उनके चरणों के नीचे २२५ अदभुत कमलों की रचना हो जाती है ..मानो आकाश में पुष्पवाटिका खिली हो ! और प्रभुके प्रताप से भव्यजीवों के चैतन्याकाश में भी रत्नत्रय के पुष्प खिल उठते हैं।

राग अलंकार या वस्त्ररहित होने पर भी उन सर्वज्ञ प्रभु की सुन्दरता का क्या कहना !..और देखो तो सही, जड़-पुद्गल भी मानो प्रभु की आश्चर्यमय सुन्दर सर्वज्ञता की प्रतिस्पर्धी करना चाहते हों, तदनुसार वे भी जगत में सर्वश्रेष्ठ आश्चर्यजनक पौद्गलिक सुन्दरतारूप से परिणमित हो रहे हैं। एक ओर वीतरागी सर्वज्ञता द्वारा चैतन्य की सर्वोत्तम सुन्दरता, तथा दूसरी ओर परमऔदारिकता द्वारा शरीर-पुद्गलोंकी सर्वोत्तम सुन्दरता !..वाह ! चेतन और जड़ दोनों के सौन्दर्य की पराकाष्ठा !-ऐसी सुन्दरता सर्वज्ञप्रभु के सिवा अन्यत्र कहाँ होगी !

रे शरीर ! तूने भले प्रभु के सान्निध्य में सर्वोत्कृष्ट सौन्दर्य धारण कर लिया परन्तु तुझे यह खबर नहीं है कि प्रभुकी सर्वज्ञता का चैतन्य सौन्दर्य तो अनन्तकाल तक ज्यों का त्यों बना रहेगा, जबकि तेरा सौन्दर्य तो क्षणभंगुर है। प्रभु तुझे छोड़कर मोक्ष जाय-इतनी ही देर है !’

यह सुनकर शरीर मानो हँस कर कहता है-अरे भाई ! इन सर्वज्ञ-परमात्मा का क्षणभर का सान्निध्य भी कहाँ से ? सत्पुरुषों के एक क्षणमात्र के सहवास का भी कितना महान फल है,…वह क्या तुम नहीं जानते -?

लाखों धर्मात्मा जीवोंका परिवार वीरप्रभु के संघ में मोक्ष की साधनाकर रहा था। ७०० केवलज्ञानी अरिहंत भगवन्त वहाँ धर्मसभा में विराजते थे; जो गुणों में प्रभु के समकक्ष थे। तदुपरान्त ऋद्धिधारी १४००० मुनिराज थे; चन्दना सहित ३६००० आर्यिकाएँ थीं; आत्मज्ञानसहित देशव्रतधारी एक लाख श्रावक एवं तीन लाख श्राविकाएँ थीं। देव और तिर्यंच भी प्रभु की वाणी सुनते और सम्यक्त्वादि धर्म प्राप्त करते थे। वहाँ धर्मका साम्राज्य था। उस धर्म-साम्राज्य के नायक थे धर्मराजा भगवान महावीर। आज हम भी उसी महावीर-साम्राज्य के उत्तराधिकारी हैं और प्रभुके मार्ग की साधना करते हुए उस पथपरचल रहे हैं ..धन्य है यह धर्मसाम्राज्य ! धन्य हमारे धर्मराजा ! और धन्य यह धर्मपालक प्रजा ! महावीर हमारे हैं, हम महावीर के हैं।’

बौद्धधर्म के संस्थापक गौतमबुद्ध भी महावीर प्रभु के समकालीन थे और वे सर्वज्ञ महावीर के प्रशंसक थे। तीस वर्ष तक धर्मचक्रसहित विहार करते-करते अन्तिम दिनों में प्रभु महावीर बिहार प्रान्त की पावापुरी में पधारे; वहाँ का सुन्दर उद्यान खिल उठा। भव्यजीवों का चैतन्य-उद्यान भी सम्यक्त्व आदि धर्मपुष्पों से आच्छादित हो गया। कार्तिक कृष्णा द्वादशी के दिन प्रभु की अन्तिम देशना हुई। (उस अन्तिम देशना के स्थान पर वहाँ एक प्राचीन जिनमन्दिर है और उसमें वीर प्रभुके चरणों की स्थापना है। निर्वाणभूमि के स्थानपर आज ‘पद्म-सरोवर’ है, उसके प्रवेशद्वार के सामने के भाग मे अन्तिम देशना-भूमि के स्थान का होना दिगम्बर जैन-परम्परा मे माना जाता है।)

प्रभु महावीर ने विपुलाचल पर प्रथम देशना मे जो परमात्मतत्त्व दर्शाया था, वही परमात्मतत्त्व अन्तिम देशना मे पावापुरी में बतलाया। प्रभुकी वाणी द्वारा परमशान्त चैतन्यरस का पान करके लाखों-करोड़ों जीव तृप्त हुए। गणधर गौतमदेव भी उत्कृष्टरूप से वीतरागरस का पान करके केवलज्ञान प्राप्त करने को तत्पर हैं, अहा ! तीर्थंकर प्रभुने सिद्धपद की तैयारी की तो गणधर देवने भी अरिहतपदकी तैयारी की…तथा प्रतिगणधरदेव (सुधर्मस्वामी) श्रुतकेवली होने को तैयार है। धन्य भगवन्त ! आपने पंचमकाल में धर्मकी अच्छिन्नधारा प्रवाहित रखी।

अभी पंचमकाल का प्रारम्भ होने मे तीन वर्ष आठ मास तथा पन्द्रह दिन का समय शेष था। चौथा काल चल रहा था। प्रभु महावीर का विहार थम गया; वाणी का योग भी मोक्षगमन के दो दिन पूर्व (धनतेरस से) रुक गया। प्रजाजन समझ गये कि अब प्रभुके मोक्षगमन की तैयारी है। प्रत्येक देशके राजा तथा लाखों प्रजाजन भी प्रभुके दर्शनार्थ आ पहुँचे। परम वैराग्य का वातावरण छा गया। भले वाणी बन्ध हो गई थी, तथापि प्रभुकी शांतरस झरती मुद्रा देखकर भी अनेक जीव धर्म प्राप्त करते थे। गौतम गणधरादि मुनिवर ध्यान में अधिकाधिक एकाग्र हो रहे थे। प्रभुकी उपस्थिति में प्रमाद छोडकर अनेक जीवों ने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की आराधना प्रारम्भ कर दी। इस प्रकार कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी तथा चतुर्दशी को-दो दिन देवेन्द्रो तथा नरेन्द्रोने सर्वज्ञ महावीर तीर्थंकर की अन्तिम महापूजा की..मोक्ष-महोत्सव का महान मेला लग रहा था संसार को भूलकर सब मोक्षकी महिमा मे तल्लीन थे। चतुर्दशी की रात्रि हुई, अर्धरात्रि भी बीत गई और . .पिछले प्रहर (अमावस्या का प्रभात उदित होने से पूर्व) वीरनाथ सर्वज्ञ प्रभु तेरहवाँ गुणस्थान लाँघकर चौदहवे गुणस्थान मे अयोगिरूप से विराजमान हुए। यहाँ आस्रवका सर्वथा अभाव एव सवर की पूर्णता हुई। परमशुक्लध्यान (तीसरा एवं चौथा) प्रगट करके शेष अघाति कर्मों की सम्पूर्ण निर्जरा प्रारम्भ कर दी और क्षणमात्र में प्रभु सर्वज्ञ महावीर मोक्षभावरूप परिणमित हुए…तत्क्षण ही लोकाग्र में सिद्धालयरुप मोक्षपुरी में पहुँचे। आज भी वे सर्वज्ञ परमात्मा वहाँ शुद्ध स्वरुप अस्तित्व में विराज रहे हैं. . .उन्हें नमस्कार हो !

अर्हंत सौ कर्मोंतणो करी नाश ए ज विधि वडे,
उपदेश पण एम ज करी निवृत्त थया, नमुं तेमने।
श्रमणो-जिनो-तीर्थंकरो एं रीत सेवी मार्गने,
सिद्धि वर्या, नमुं तेमने; निर्वाणना ते मार्गने।

पावापुरी में वीरप्रभु निर्वाण को प्राप्त हुए और कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी की अँधेरी रात भी मोक्षकल्याणक के दिव्य प्रकाश से जगमगा उठी लाखों भक्तोंने करोड़ों दीपकों की आवलियाँ सजाकर प्रभु के मोक्षकल्याणक का उत्सव मनाया; इसलिये कार्तिक कृष्णा अमावस्या दीपावली-पर्व के रुप में प्रसिद्ध हुई। …जो आज भी भारत में प्रसिद्ध है। उस निर्वाण-महोत्सव को २५०० वर्ष पूरे हुए तब (ई.स. १९७४ में) समग्र भारत में अति भव्य उत्सव मनाया गया था और इस महापुराण का लेखनकार्य भी उस निर्वाण-महोत्सव के निमित्त ही पू. गुरुदेव श्री कानजी स्वामी की प्रत्यक्ष प्रेरणा से हुआ है।

भगवान महावीर तो निर्वाण को प्राप्त हुए, सिद्ध हुए.. अहो, उन सिद्ध भगवन्तों का अतीन्द्रियज्ञान ! इस महापुराण द्वारा मैं उस परमेष्ट पदका गुणगान करता हूँ और मेरा आत्मस्वभाव ऐसा ही है-उसे स्वीकार करके मैं भी प्रभु के मार्गपर चलता हूँ और इष्टपद प्राप्त करता हूँ। मोक्ष के कारणरूप ऐसे भगवान महावीर को नमस्कार हो !-

नमन करता उन जिनेश्वर देव को,
धर्मचक्र चला गये शिवगेह जो;
गये पावापुरी से निर्वाणको,
सन्त-मुनि-गणधर नमें कल्याण हो !

वीर प्रभु पंचमगति को प्राप्त करके सिद्ध हुए, मुक्त हुए; वह
तो आनन्दका प्रसंग है, शोक का नही।

किसीको प्रश्न उठ सकता है कि-अरे, निर्वाण होनेपर तो
भगवान का विरह हुआ, फिर उसका उत्सव क्यों ?

समाधान-अरे भाई ! तुम बाह्य चक्षुओं से देखते हो इसलिये तुम्हे ऐसा लगता है कि भगवान का विरह हुआ ! जो इन्द्रियज्ञान द्वारा ‘शरीर युक्त महावीर’ को ही देखते थे उन्हें उन शरीरवान महावीर का विरह हुआ; परन्तु जो शरीर से भिन्न महावीर के सच्चे स्वरूप को अर्थात् ‘सर्वज्ञ-महावीर’ को अंतर्दृष्टि से-अतीन्द्रिय चक्षुसे पहिचानते हैं उन्हें तो उन सर्वज्ञ परमात्मा का कभी विरह नहीं है; उनके लिये तो वे भगवान लोकाग्र में सिद्धरूप से साक्षात् विद्यमान विराजमान हैं। पावापुरी में २५०० वर्ष पूर्व जो ‘सर्वज्ञपरमात्मा’ विराजते थे, वे ही वर्तमान में सिद्धपुरी में विराज रहे हैं। साधक के ज्ञान में उन सिद्ध भगवंत का स्वरूप उत्कीर्ण हो गया है, उसे सर्वज्ञ महावीर का विरह नहीं है…नहीं है; सर्वथा अतीन्द्रिय ऐसे उन परमात्मा को अपने ही आत्मा में स्थापित करके वह अपने आत्मा को सिद्ध की साधना में लगाता है..और ऐसी साधना का उत्साह ही निर्वाण का महोत्सव…आत्महित का ऐसा मंगल-महोत्सव कौन नहीं मनायेगा ?!

देखो न, वीरप्रभु के निर्वाण के समय गौतमस्वामी कहीं प्रभुविरह का विलाप करने नहीं बैठे थे; किन्तु चैतन्य की अनुभूति में अधिक गहरे उतरकर मोक्ष की साधना में मग्न हो गये थे। ३० वर्ष तक जिनके सतत सान्निध्य में रहा-ऐसे मेरे प्रभुनिर्वाण को प्राप्त हुए और मैं अभी छद्मस्थ ही रहा ?..अब आज ही साधना पूर्ण करूँगा’-इस प्रकार उत्कृष्टरूप से आत्मा को आराधना में लीन करके उसी दिन केवलज्ञान प्रगट किया और सर्वज्ञपरमात्मा हुए; पूर्ण वीतराग होकर उन्होंने सर्वोत्कृष्टरूप से प्रभुका निर्वाण महोत्सव मनाया। उनके शिष्य सुधर्मस्वामी उसी दिन श्रुतकेवली बने। अहा, नमस्कार हो उन श्रुतकेवली भगवन्तको !

पश्चात्, तीर्थंकर प्रभुकी वह कुल परम्परा चलते…चलते श्रीगुरुओं द्वारा हम तक आयी है; हम भी उसी कुल-परम्परामें हैं। कृतार्थ हो गये हम सब महावीर के मार्ग को पाकर। अपने तीर्थंकर भगवन्तों के मार्ग की उपासना करके हम सब अपना कल्याण करें और अपने उन भगवन्तों के सिद्धालय में पहुँचकर सदैव उनके साथ रहें…ऐसी मंगल भावना के साथ यह भागवत पुराण समाप्त करता हूँ।

-इस प्रकार भरतक्षेत्र के अन्तिम तीर्थंकर एवं वर्तमान शासननायक सर्वज्ञ भगवान महावीर तीर्थंकर का मंगल जीवन चरित्र पूर्ण हुआ।

    अनन्त तीर्थंकर हुए, जगके तारणहार;
    सिद्ध दशा को साधकर, पहुँचे भवदधि पार।
    शासन वीर जिनेन्द्रका, अक्षयपद दातार;
    सेवन कर समकित लहो, जो चाहो भवपार।

-अपने चौबीस तीर्थंकर भगवन्तोंके मंगल जीवनका यह ‘महापुराण’ भव्यजीवों में जिनमार्ग के प्रति भक्ति जागृत करों, रत्नत्रय की प्राप्ति कराओ, और मोक्षसुख में स्थापित करो !

‘भागवत कथा’

श्री समयसार पर व्याख्यान देते समय पू. गुरुदेव अनेकबार कहते थे कि-‘अहो, यह तो भागवत-कथा है !’ भगवान आत्मा के महिमाकी कथा सो भागवत-कथा; उसीप्रकार चौबीस तीर्थंकर भगवन्तोंका यह महापुराण भी भागवत कथा है। वे भगवान किसप्रकार आत्मा की साधना करके परमात्मा हुऐ वह इसमें बतलाया हैं। जैनपुराण तो वीतरागता के ही पोषक हैं। श्री गुरुके प्रताप से आज ऐसे भागवत पुराणों द्वारा हम भगवन्तों का पंथ समझ रहे हैं…धन्य वह पंथ !..और धन्य हैं उसके पंथी !