२२
भगवान नेमिनाथ (भाग ३)
एक ओर सहस्राम्रवन मे नेमिप्रभु आत्मध्यान कर रहे है, दूसरी ओर राजमहल के झरोखे मे खड़ी हुई राजकुमारी राजुल नेमि-दूल्हाराजा को वैराग्य प्राप्त करते देखकर तथा रथसे उतरकर वनकी ओर जाता देखकर मनमे कहने लगी-अरे, प्रभो ! आपको यदि विवाह नही करना था तो फिर बारात लेकर यहाँ तक किसलिये आये ? दूल्हा क्यों बने ?..या फिर पशुओं की भाँति मुझे भी ससार-बन्धन से छुड़ाने के लिये यह एक नाटक ही था ! अपने साथ मुझे भी मोक्षपुरीकी राहमें ले जाने हेतु क्या आप यहाँ पधारे थे ? धन्य प्रभो ! आपकी लीला अपार है ! आपके जीवन से सम्बन्धित होने में मेरे हितकर कोई दैवी सकेत है।
हे देव ! आप मुनि होकर वनमें आयेंगे, तो मैं क्या रो-धोकर संसार मे ही बैठी रहूँगी ?-नहीं, मैं भी वीरपुत्री हूँ, आपकी अर्द्धांगी कहला चुकी हूँ, तो मैं भी आपके ही मार्गपर आऊँगी, आपको छोड़कर दूसरे मार्गपर नहीं जाऊँगी। आप होंगे मुनिराज, तो मैं बनूँगी आर्यिका; आप होंगे परमात्मा. .तो मैं होऊँगी एकावतारी !
मुझे लगे संसार असार,
ऐ रे संसार में नहीं जाऊँ…नहीं जाऊँ, नहीं जाऊँ रे…
मुझे लगे वैराग्य-पद सार,
प्रभुमार्गे चली जाऊँ, चली जाऊँ, चली जाऊँ रे…
माता-पिता एवं पारिवारिक जनोंने राजुल को बहुत समझाया कि-बेटी ! अभी तुम्हारा विवाह नहीं हुआ है; नेमिकुँवर के साथ सात फेरे नहीं हुए हैं इसलिये तुम अभी कुमारिका ही हो; बेटी हम किसी दूसरे राजकुमार के साथ तुम्हारा विवाह करेंगे।
परन्तु दृढ़प्रतिज्ञा राजीमती ने उन सबकी बात अनसुनी करके दृढ़ता पूर्वक कहा-फेरे नहीं हुए उससे क्या ? मैं नेमिकुमार का हृदय से वरण कर चुकी हूँ; वे ही मेरे स्वामी और जी~साथी हैं; मेरे हृदय में किसी और का स्थान नहीं है। अब सांसारिक भोगों के बदले मोक्ष की साधना में मैं उनकी संगिनी बनूँगी और अपने धर्मनाथ के पंथ पर चलकर अपना आत्मकल्याण करूँगी। इस प्रकार धर्मवीर राजीमतीने आर्यिका बनने का अपना दृढ़निश्चय प्रगट किया।
राजीमती का ऐसा दृढ़ वैराग्य देखकर सबके मुँह से धन्यवाद के उद्गार निकल पड़े-धन्य राजुल ! तू अपने हृदयेश्वर नेमप्रभु के रंगमें ऐसी रंग गई कि मोक्षपुरी तक उनका साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने तुझे छोड़ा परन्तु तूने उन्हें नहीं छोड़ा। अनेक राजकुमारियाँ भी राजुल के साथ दीक्षा लेने को तैयार हो गई।
‘अरे, मेरे स्वामी मोक्षमें आनन्द करें और मैं संसार भ्रमण करके दुःखी होऊँ ? -कदापि नहीं; मैं भी प्रभुके साथ ही रहूँगी’-ऐसे निश्चयपूर्वक सैंकड़ों राजकुमारियोंसहित राजीमती ने दीक्षा ग्रहण की, और गिरनार की गिरिगुफा में आत्मासाधना करने लगी।
अब हम पुनः सहस्राम्रवन में नेमिप्रभु के पास चलें-दीक्षा लेकर दूल्हाराजा से मुनिराजा बने नेमिप्रभुने आत्मध्यान में उपयोग को लगाया है; तुरन्त ही उन्हें शुद्धोपयोग में सातवाँ गुणस्थान प्रगट हुआ है, मात्र संज्वलन के अतिरिक्त समस्त कषाय दूर हो गये हैं; मनःपर्ययज्ञान एवं चौदहपूर्वरूप श्रुतकेवलीपना उदित हुआ है, अनेक दिव्य लब्धियाँ भी प्रगट हुई हैं। आसपास अन्य हजारों मुनियों से वह तपोवन मुक्तिमण्डप की भाँति सुशोभित हो रहा है। विवाह के समय बंधन से छुड़ाये हुए वे पशु भी प्रभु के पीछे-पीछे वन में जाकर उनके निकट ही रहने लगे हैं। अहा ! शान्ति किसे प्रिय नहीं होती ? हजारों-लाखों मोक्षार्थी जीवोंने प्रभुके दीक्षाप्रसंग पर उनके वैराग्यजीवन को देखकर अपने जीवन को भी ज्ञान-वैराग्य में लगाया। अहा, उस काल गिरनार का गौरव भी आश्चर्यकारी था; वहाँ मोक्षसाधक मुनिवरों का समूह ऐसे शोभा देता था मानो ‘सिद्धों का मेला !’
गिरनार का समस्त वनप्रदेश वैराग्य में निमग्न हो रहा था; सर्वत्र शांति छा रही थी। अहा, उन शान्त ध्यानस्थ मुनिवरों के प्रति आकर्षित होकर केवलज्ञान भी शीघ्रतासे उनके निकट आ रहा था। इन्द्रों तथा श्रीकृष्ण-बलभद्र आदि ने भी मस्तक झुकाकर बारम्बार उन नेमिनाथ मुनिराज के दर्शन-स्तुति की। अहा, श्रीकृष्ण भी जिनके चरणों में भक्तिपूर्वक नमन करते थे ऐसे प्रभु नेमिनाथ हमें आनन्दमय जिनदीक्षा दो।
दीक्षा के पश्चात् तीसरे दिन नेमि-मुनिराज आहार के लिये जूनागढ़ नगरी में पधारे, तब श्रद्धादि गुणों से विभूषित वरदत्त राजाने उन तीर्थंकर मुनिराज को शुद्ध आहारदान देकर प्रथम पारणा कराया, और पश्चात् स्वयं भी प्रभुचरणों में दीक्षा लेकर प्रभुके गणधर तथा चरमशरीरी बने। देवों ने रत्नवृष्टि करके तथा दिव्यवाद्य बजाकर उस उत्तम दानकी अनुमोदना की।
रत्नत्रय वैभवके धारी मुनिराज नेमिनाथ स्वयं मोक्षमार्गरूप होकर मौन धारण करके ५६ दिन तक सौराष्ट्र देशके आसपास विचरे। उस चलते-फिरते ‘जीवन्त मोक्षमार्ग’ के दर्शन से सौराष्ट्र की धर्मप्रेमी प्रजा धन्य हुई। अहा, उन्हें देखकर भव्य जीवों को मोक्षमार्ग के स्वरूप का ज्ञान हो जाता था। वे एक छोटे-से परमात्मा थे, द्रव्य-तीर्थंकर थे, आत्मा की लौ में लवलीन थे; परमात्मपद की साधना हेतु आत्मा की गहराई में उतरकर उसी में उपयोग को स्थिर करते थे। ऐसी शुद्ध परिणतिसहित विचरते हुए वे निर्मोही महात्मा ५६ दिवस पश्चात् पुनः गिरनार के तपोवन में पधारे और जहाँ दीक्षा ली थी उसी दीक्षावन में ध्यानस्थ हुए। उनके परिणाम अधिकाधिक स्थिर होने लगे, शुद्धोपयोग की धारा उल्लसित होने लगी; एक मुहूर्त में तो हजारों बार उन्हें शुद्धोपयोग हुआ; उनकी शुद्धता देखते ही भव्यात्माओं के अंतरसे भक्ति के उद्गार निकलते थे - रे ‘शुद्ध’ ने श्रामण्य धारव्युं, ज्ञान-दर्शन ‘शुद्ध’ ने; छे ‘शुद्ध’ ने निर्वाण ‘शुद्ध’ ज सिद्ध, प्रणमुं तेमने।
आत्मा ऐसे ‘शुद्ध’ रुप में परिणमित हो यही उनका मनोरथ था। आज वह मनोरथ सम्पूर्ण होने की घड़ी आ पहुँची। प्रभु नेमिमुनिराज सातिशय ध्यान द्वारा शुद्धता की ऐसी धारारूप परिणमित हुए कि अब उसमें भंग नहीं पड़ेगा। वे क्षपकश्रेणी पर चढ़ने लगे। प्रभु के अंतर में चैतन्य का नन्दनवन अनंतगुणों की विशुद्धता से विकसित होने लगे…और उसके प्रभावसे बाह्य में गिरनार का तपोवन भी हजारों मधुर आम्रफलों से खिल उठा…मानो गिरनार पर्वत और वन उन आम्रफलों द्वारा प्रभुके केवलज्ञान का स्वागत करता हो ! प्रभुके अंतरमें तो ध्येय, ध्यान एवं ध्याता तथा ज्ञेय, ज्ञान एवं ज्ञाता एकाकार हो रहे हैं;
हम तो सहसावन के वासी, हम तो मुनियों के सहवासी. . हम तो रत्नत्रय के प्यासी, हम तो मुनिजीवन अभ्यासी… हम तो जगसे बने उदासी, हम तो सहसावनके वासी ! शांत-शांत स्वरूपकों ध्यावेंगे, आनंद-मंगलरूप ही होयेंगे; अतर् स्वरूप मांही समायेंगे, अदभुत निजवैभवको पायेंगे; परिग्रह रहित होकर रहेंगे, मोक्षपुरीके पंथमें विचरेंगे; निर्विकल्प-गुफामें ठरेंगे, सिद्ध, स्वरूपमें केलि करेंगे . -ऐसे मुनिजीवन-अभ्यासी हम तो सहेसावनके वासी
हम तो सर्व जगतके संबंध छोड़ेंगे, मुनिवर संघ की साथ रहेंगे;
संतजनोकी सेवा करेंगे, स्वानुभूतिका प्रासाद लेंगे;
उपशमरसमें सदीव रहेंगे, आत्मिकजीवन सत्य जीयेंगे;
रत्नत्रय-शुद्धरुपे रहेंगे, केवलज्ञानको शीघ्र ही लेंगे…
-ऐसे मुनिजीवन अभ्यासी,
हम तो सहेसावनके वासी. .
[इस पुस्तक के लेखक सम्पादक द्वारा सहस्राम्रवन मे बैठे-बैठे भायी हुई भावना]
वहाँ न तो कोई विकल्प है और न कोई बाह्यवृत्ति एक छोटे-से क्षणमें ही शुक्ल ध्यानचक्र के प्रहार द्वारा समस्त कषाय-शत्रुओं का नाश करके प्रभु वीतराग हुए और समस्त घातिकर्मों भी नष्ट करके सर्वज्ञ हुए, शुद्ध हुए, बुद्ध हुए, केवलज्ञानी-अरिहंत परमात्मा-जिन हुए। पुनः धन्य हुआ वह गिरनारधाम और उसका आम्रवन, कि जिसने पाँचवें से लेकर तेरहवें तक के उत्तम गुणस्थानों में विराजमान प्रभुको साक्षात् देखा…जहाँ प्रभुके दीक्षा एवं केवलज्ञान के महान कल्याणक हुए। धन्य वह भूमि…जहाँ पुनः पुनः तीर्थंकर प्रभु का आगमन हुआ। उस तपोवन-सहस्राम्रवन का परम शांत वातावरण आज भी हमें तीर्थंकरप्रभु की महिमा एवं आत्मसाधना की मंगलकथा सुना रहा है। ‘णमो जिणाणं जितभवाण’ भवको जीतनेवाले जिनों को नमस्कार !
श्रीकृष्ण के राजदरबार में-
नेमिप्रभु के केवलज्ञान की मंगल बधाई और उसकी महिमा
द्वारिकानगरी में भव्य राजसभा भरी है। महाराजा समुद्रविजय तथा बलदेव-वासुदेव (श्रीकृष्ण चक्रवर्ती) आदि बैठे हैं और नेमिनाथप्रभु का गुणगान किया जा रहा है। इतने में एक दूतने राजसभा में प्रवेश किया और अत्यन्त हर्षपूर्वक कहने लगा- (यह प्रसंग वीरसंवत् २५०१ में वढवाण-वर्धमानपुरी में नेमिप्रभु के पंचकल्याणक हुए उस समय लिखा गया है; और उसमें दूतके रुप मे केवलज्ञान की बधाई का कार्य इस पुस्तक के लेखक ब्र० हरिभाई ने किया था।) भगवान नेमिनाथ की जय हो…महाराज ! मैं गिरनार से आ रहा हूँ और एक उत्तम बधाई लाया हूँ। अपने राजकुमार नेमिनाथ-जिन्होंने दो मास पूर्व विवाह के समय वैराग्य धारण करके गिरनार के आम्रवनमें दीक्षा ग्रहण की थी, वे विहार करते-करते पुनः गिरनार पधारे हैं और आज ही (आश्विन शुक्ला प्रतिपदा के दिन) शुद्धोपयोग की क्षपकश्रेणी लगाकर प्रभुने केवलज्ञान प्राप्त किया है।
बधाई सुनते ही सभाजन आनन्द से बोल उठे-वाह वाह ! धन्य है ! नेमिप्रभु सर्वज्ञ परमात्मा हो गये, उन्हें नमस्कार हो। ऐसा कहकर सबने सिंहासन से उतरकर प्रभुको वंदन किया।
वहाँ का प्रत्यक्ष देखा हुआ वर्णन करते हुए दूत कहने लगा- हे महाराज ! प्रभु नेमिनाथ मुनिराज गिरनार पधारे तो वहाँ के हजारों आम्रवृक्ष प्रसन्नता से झूम उठे ! एक ओर आम्रवन प्रफुल्लित हो उठा तो दूसरी ओर प्रभुका रत्नत्रय-उद्यान खिल गया। अहा, उस दिव्यता की क्या बात करूँ ! वहाँ मुनिजनों के मध्य नेमिप्रभु ध्यानस्थ मुद्रा में निर्विकल्प हो गये; परमचैतन्य का अवलम्बन करके शुद्धोपयोग की श्रेणी लगायी; अप्रमत्त भाव से अतीन्द्रिय आनन्द मे झूलते-झूलते शीघ्रता से गुणस्थान श्रेणी चढ़ने लगे. आठवाँ, नौवाँ, दसवाँ और बारहवाँ-यह सर्व गुणस्थान क्षणमें पार करते हुए प्रभुने केवलज्ञान प्राप्त कर लिया। अहा, गिरनार धाम और समस्त पृथ्वी आनन्दमय हो गई। अब तो इन्द्र वहाँ सहस्राम्रवन मे आ पहुँचे हैं और केवलज्ञान की पूजा कर रहे हैं। अद्भुत समवसरण मे विराजमान सर्वज्ञप्रभु नेमिनाथ तीर्थंकर की दिव्यध्वनि से गिरनार धाम गूँज रहा है। प्रभुकी अद्भुत वाणी से परमशांत चैतन्यरस झर रहा है।
※ प्रभुके केवलज्ञान की बधाई सुनकर श्रीकृष्ण आदि सभाजन हर्षपूर्वक बोल उठे-वाह ! आज तो सचमुच सब मंगल-मंगल भासित हो रहा है समस्त विश्व मंगलमय लगता है।
※ आज प्रात काल तो भगवान साधुपद मे थे और अभी-अभी केवलज्ञान प्राप्त करके अरिहंतपद मे पहुँच गये। पचपरमेष्ठी मे पाँचवे पद पर थे और अब प्रथम पद मे आ गये है, ‘नमो लोए सव्वसाहूणं’ में से अब ‘नमो अरिहंताण’ मे आगये।
※ ठीक ही हैं, भगवान नेमिनाथ को तीर्थंकर प्रकृतिका उदय आज प्रारम्भ हुआ; चैतन्य मे केवलज्ञान का प्रकाश और पुद्गल मे तीर्थंकर प्रकृतिका उदय-ऐसा सर्वोत्कृष्ट सुयोग आज गिरनार के सहस्राम्रवन मे वर्त रहा है और साथ ही साथ रत्नत्रयधारी गणधर, हजारों मुनिवर तथा बैराग्यमयी राजुलदेवी आदि हजारो आर्यिका माताएँ भी प्रभुकी धर्मसभा मे सुशोभित है। जैनशासन का धर्मचक्र तीव्रता से गतिमान है।
※ अहा, भगवान के आत्मा मे द्रव्य-क्षेत्र-काल और भाव सर्वप्रकार से मंगल है। भगवान नेमिनाथ का आत्मद्रव्य परमपारिणामिक भावसे त्रिकाल-मंगलरुप है, वह ‘मंगल-द्रव्य’ है; केवलज्ञान तथा अतीन्द्रिय महा आनन्द से भरपूर उनके असंख्य चैतन्य प्रदेश वह ‘मगल-क्षेत्र’ है। जहाँ वे विराजमान है ऐसा गिरनार तीर्थ भी मंगलक्षेत्र है। (श्री वीरसेन स्वामीने षट्खण्डागम की धवला टीका में गिरनार, पावापुरी, राजगृही आदि तीर्थों का मंगलक्षेत्र के रुप में स्मरण किया है।
※ अपने चैतन्य स्वभाव के अवलम्बन से प्रभु को जो अपूर्वपर्याय प्रगट हुई वह ‘मंगल-स्वकाल’ है, तथा आज यह आश्विन शुक्ला प्रतिपदा का दिवस भी प्रभु के ज्ञान कल्याणक के कारण मगल है ..और भगवान नेमिनाथ का आत्मा शुद्धोपयोग से केवलज्ञानरुप होकर परम आनन्दरुप परिणमित हो रहा है वह ‘मगल-भाव’ है।
※ अहा, जिनेन्द्र भगवान के द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव का ऐसा मंगलपना विचारने से अपने भावों में भी चैतन्यतत्त्व की कोई अगाध महिमा प्रगट होती है, वह भी भाव-मगल है।
※ श्रीकृष्ण कहते हैं-वाह, बड़ी ही सरस बात ! आचार्य भगवन्तों ने भी कहा है कि जो जीव भगवान अरिहंतदेव के आत्मा को चैतन्यभाव से जानता है वह जीव राग एवं चैतन्य की भिन्नता को जानकर अपने आत्मा के शुद्धस्वरुप को जान लेता है, इसलिये दर्शन मोह का नाश करके सम्यग्दर्शन प्राप्त करता है। अरिहत देवके आत्मा की सच्ची पहिचान का यह मगल-फल है।
※ भगवान अरिहत देवकी यह एक अचिन्त्य विशेषता है कि उनकी उपदेश, विहारादि क्रियाएँ तीर्थंकर नामकर्म के उदय से होने के कारण औदयिकी हैं तथापि, मोह के अभाव के कारण उनकी वे क्रियाएँ क्षायिकी ही मानी गई है, क्योकि वे क्रियाएँ उन्हें बध का कारण नहीं होती और उनको क्षण-क्षण कर्मका क्षय ही होता जाता है।
※ वाह, अद्भुत बात है ! भगवान के क्षायिक भाव को तथा उदय भाव को जो भिन्न-भिन्न स्वरूप से जाने वही इस बात को समझ सकता है, और यह बात समझने से अपूर्व भेदज्ञान होकर उस जीव को कर्मों का क्षय होने लगता है।
※ बलभद्र कहते हैं-श्री नेमिनाथ भगवान आज सर्वज्ञ हुए, वे किस प्रकार हुए ? देखो.. सुनो ! शुद्धोपयोग के प्रसाद से ही वे सर्वज्ञ हुए हैं। सर्वज्ञ होने के पूर्वक्षण में वे राग का सर्वथा क्षय करके पूर्ण वीतराग हुए और पश्चात् ही सर्वज्ञ हुए हैं। राग का एक सूक्ष्म अंश भी सर्वज्ञता को रोकता है; इसलिये जो वीतराग हो वही सर्वज्ञ होता है। राग का कोई अंश ज्ञान का कारण नहीं होता। आत्मा स्वयंज्ञान स्वभाव है, वही स्वयंभू सर्वज्ञ होता है। इस प्रकार आत्मा स्वयं ही सर्वज्ञता का साधन होता है।
अहा सर्वज्ञ भगवन्त स्वयंभु है, जिस प्रकार आकाश मे सूर्य अन्य किसी के अवलम्बन बिना स्वयं ही-स्वयमेव प्रकाश एवं उष्णतारूप है, उसी प्रकार चैतन्य भगवानआत्मा अन्य किसीके अवलम्बन बिना स्वयं ही स्वयंभूरूप से ज्ञान एवं आनन्द रूप है।
सर्वज्ञ लब्धस्वभाव ने त्रिजगेन्द्र पूजित ऐ रीते,
स्वयमेव जीव थयो थको ते ‘स्वयंभू’ जिनो कहे।
※ अहो, उन स्वयंभू भगवान सर्वज्ञदेव के दिव्यज्ञान की अचिन्त्य महिमा का क्या कहना ? वह परमआनन्दमय सर्वज्ञपद वीतरागी संतों को प्रिय है। उन अरिहंत भगवन्तों का अतीन्द्रिय महा आनन्द पंचेन्द्रिय के विषयरहित है, पुण्यफलरहित है, रागरहित है, और शुद्धोपयोगद्वारा आत्मा में से ही वह प्रगट हुआ है; वह स्वाभाविक आनन्द कहीं बाहर से आया हुआ नहीं है-
अत्यंत आत्मोत्पन्न विषयातीत अनुप अनंत ने
विच्छेदहीन छे सुख अहो ! शुद्धोपयोग-प्रसिद्धने।
※ उन अरिहन्त भगवन्तों को आत्मा में से जैसा सुख और जैसा आनंद प्रगट हुआ वैसा सुख और वैसा आनन्द प्रत्येक आत्माका स्वभाव है। ऐसे स्वभाव का श्रवण करते ही जो जीव प्रसन्न होकर उल्लासपूर्वक उसका स्वीकार करता है वह जीव आसन्नभव्य है, निकट भविष्य में ही मोक्षगामी है।
※ अहा, केवलज्ञान तो आत्मा का स्वभाव है; उस स्वभाव का स्वीकार करनेवाला जीव मोक्षका साधक हो जाता है; फिर उसे अनन्त भव नहीं होते, और केवलीने भी वे नहीं देखे हैं। केवली भगवान ने निकट में ही उसका मोक्ष देखा है। वाह, केवलज्ञान के इस न्याय में तो अतिगम्भीरता है, उसके स्वीकार में ज्ञानस्वभाव की सन्मुखता होकर मोक्षकी ओर का अनन्त पुरुषार्थ प्रारम्भ होता है। इसलिये सर्वज्ञ की श्रद्धा वह धर्म का मूल है।
※ अहा, अपने महान भाग्योदय से अपनी इस सौराष्ट्र भूमि में गिरनार धाम में हमें ऐसे सर्वज्ञ प्रभु नेमिनाथ भगवान के साक्षात् दर्शन प्राप्त हो रहे है। अपने सौराष्ट्र का गिरनार प्रदेश तो सिंहों की जन्मभूमि है; आज धर्म के केशरी सिंह समान केवली परमात्मा अपनी इस भूमि में उत्पन्न हुए हैं। चलो, हम सब गिरनार धाम में चलें और तीर्थंकर नेमिनाथ प्रभुके दर्शन करके धन्य हो !
-इस प्रकार सर्वज्ञपदकी अत्यन्त महिमापूर्वक महाराजा समुद्रविजय तथा श्रीकृष्ण, बलभद्र आदि सब धामधूम सहित नेमिनाथ प्रभुके दर्शन करने चले। दूसरी ओर स्वर्गलोक के देव-देवेन्द्र भी भव्य शोभायात्रा सहित नेमिनाथ तीर्थंकर के केवलज्ञान-कल्याणक का उत्सव मनाने आ पहुँचे। प्रभु को केवलज्ञान होते ही, उसके साथ की तीर्थंकर प्रकृति के प्रभाव से सम्पूर्ण स्वर्गलोक में हर्षपूर्ण खलबली मच गई। अरे, स्वर्गलोक तो ठीक नरक के नारकियों भी उस क्षण शान्ति का अनुभव किया ! नरको में अचानक ऐसी शान्तिका होना एक महान आश्चर्य था ! . और उस आश्चर्यके कारणरुप तीर्थंकर की अचिन्त्य महिमा का चिन्तवन करनेसे अनेक जीव सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए। देवों और मनुष्यों के उपरांत सिंह और शशक, नाग और वाघ मगर और मोर आदि तिर्यंचों के समूह भी तीर्थंकर प्रभु के दर्शन हेतु दौड़ आये। जगतकी उत्कृष्ट धर्मसभा वहाँ सहसावन में भरी थी और उसके मध्य त्रिलोकीनाथ तीर्थंकर परमात्मा नेमिनाथ भगवान विराजमान थे। आनन्द के धाम ऐसे नेमिनाथ को शतेन्द्र पूज रहे थे। उसप्रसंग को लक्ष में लेकर स्तुतिकार कविपद्मप्रभ (नियमसार-टीका में) कहते हैं कि-
शतमख शत पूज्यः प्राज्य सव्बोधराज्यः;
स्मरतिरसुरनाथः प्राप्त दुष्टाधयूथः ।
पदनत वनमाली भव्य-पद्मांशुमालि,
दिसतु शमनिश नो नेमिः आनन्दभूमिः ।।
अहा कैसा होगा वह पावन दृश्य ! जहाँ एक ओर तो मुनिगण सर्वज्ञ प्रभुकी स्तुति करते होगे और दूसरी ओर श्रीकृष्ण तथा इन्द्रादि भक्ति से सिर झुकाकर प्रभु नेमिनाथ की वन्दना कर रहे होगे ! वाह, नेमिनाथ और श्रीकृष्ण-एक साथ दो तीर्थंकरों का सुयोग; एक तो वर्तमान तीर्थंकर और दूसरे भावी तीर्थंकर . जो बीच मे एक भव करके आगामी चौवीसी में भरत क्षेत्र के तीर्थंकर होगें।
महाराजा समुद्रविजय, बलभद्र श्रीकृष्ण तथा उनके पुत्र-पौत्र शम्बुकुमार, प्रद्युम्नकुमार, अनिरुद्ध कुमार आदि समवसरणमे विराजमान परमात्मा नेमिनाथ के दर्शनोसे अति प्रसन्न हुए। महाराजा श्रीकृष्ण को महान गौरव का अनुभव हुआ कि-अहा ! मेरे लघुभ्राता तीर्थंकर हुए; इतना ही नही, धर्म के किसी अचिन्त्य उल्लास से उन्होने प्रभुचरणो में तीर्थंकर प्रकृति बाँधना प्रारम्भ किया। (श्रीकृष्ण की भाँति बलभद्र भी भावी तीर्थंकर होने का पुराणों में उल्लेख है।) त्रिलोक के इन्द्रों द्वारा पूज्य तथा सर्वोत्कृष्ट ज्ञान साम्राज्य के स्वामी ऐसे परमात्मा नेमिनाथ ने, सर्व प्रथम गिरनार के तपोवन में दिव्यध्वनि द्वारा मोक्षमार्ग बतलाकर भव्य जीवों को परम आनन्दित किया। हस्तिनापुर से युधिष्ठिर भीम, अर्जुन आदि पाण्डव ( जो कि नेमिनाथ प्रभुके बुआ-मामा के भाई होते थे) भी प्रभुदर्शन हेतु गिरनार आ पहुँचे और वह सर्वज्ञ की धर्मसभा देखकर अति आनन्दित हुए।
नेमिप्रभुकी धर्मसभा मे महाराजा वरदत्त (जिन्होंने नेमिनाथ प्रभुको मुनिदशा में प्रथम आहार दान दिया था) दीक्षित हुए और प्रभु के धर्ममंत्री बने उन वरदत्तसहित ११ गणधर समवसरण-सभा को सुशोभित करते थे; इतना ही नहीं, प्रभु के सह-दीक्षित हजारों मुनियों में से डेढ़ हजार(१५००) मुनिवर तो केवलज्ञान प्राप्त करके अरिहंतपद पर (समवसरण में ५००० धनुष ऊपर आकाश में) विराजते थे वास्तव में अद्भुत था वह भगवन्तों का सम्मेलन ! तदुपरान्त अवधि, मनःपर्यय ज्ञानी, श्रुतकेवली तथा विविध ऋद्धियो के धारी कुल १८००० मुनिवर उस धर्मसभा में मोक्ष की साधना कर रहे थे; राजीमती आदि आर्यिकाएँ भी अब गिरिगुफा का निवास छोड़कर ४०००० आर्यिकाओंके संघ सहित प्रभुके समवसरण में शोभायमान थी। एक लाख श्रावक और तीन लाख श्राविकाएँ सम्यक्त्व एवं व्रतसहित मोक्ष की उपासना कर रहे थे। देवों और तिर्यंचों का तो कोई पार नही था। प्रभु की धर्मसभा में सबको आत्मवैभव का अपूर्वनिधान मिलते थे। अहा, कितना शोभायमान होगा गिरनार की वह धर्म सभा ! और जगत में सौराष्ट्र के गिरनार तीर्थ का कितना महान गौरव होगा ! आज भी वह गिरनार लाखो-करोड़ों जीवों द्वारा तीर्थरूप में पूजित है और भगवान नेमिनाथ की महिमा जगत मे प्रकाशित कर रहा है।
गिरनार के उस आम्रवन के बीच आश्चर्यकारी धर्मसभा मे प्रभु नेमिनाथ ने दिव्यध्वनि द्वारा धर्मोपदेश दिया और सर्वाधिक आश्चर्य जनक ऐसा परमात्मवैभव भव्य जीवों को बतलाया-भो ..भो.. भव्यजीवो ! हमे जो सर्वज्ञ-परमात्मपद प्रगट हुआ वह आत्मा में से ही प्रगट हुआ है, तुम्हारे आत्मा में भी ऐसा ही परमात्मपद भरा है; उसे पहिचानकर श्रद्धा-ज्ञान-चारित्र द्वारा उसकी उपासना करके तुम भी परमात्मा बन सकते हो।-इसप्रकार चैतन्यतत्त्व की अगाध महिमा जानकर अपने में उसकी अनुभूति करना सो जैनशासन है। जिस प्रकार भगवान ऋषभदेव की धर्मसभा में मोक्षगामी भरत राजने धर्म का श्रवण किया था, उसी प्रकार नेमिनाथ की धर्मसभा मे मोक्षगामी पाण्डवों ने तथा गजकुमार, प्रद्युम्न आदि ने धर्मका श्रवण किया। प्रभुकी आयु १००० वर्ष थी· उसमें से ३०० वर्ष की आयु में प्रभु केवली परमात्मा हुए; पश्चात् ७०० वर्ष तक तीर्थंकर रुप मे विहार करके भारतभूमि मे धर्मामृत की वर्षा की।
धर्मचक्रसहित देशदेशान्तर में विचरते हुए प्रभुनेमिनाथ कभी-कभी रैवतगिरि (गिरनार) पधारते थे। एक बार प्रभुका आगमन होनेपर श्रीकृष्ण-बलभद्र परिवार सहित प्रभु के दर्शन करके अति आनन्दित हुए और धर्मोपदेश सुनने के पश्चात् पूछा-हे देव ! इस संसार में आत्मा के अस्तित्व सम्बन्धी अनेक मिथ्या मान्यताएँ चलती हैं कि-आत्मा जैसी कोई वस्तु है ही नहीं; कोई उसे पृथ्वी, जलादि अचेतन के संयोग से हुआ मानते हैं; कोई उसे जड़-शरीररुप ही मानते हैं; कोई उसे एकान्त कूटस्थ अपरिणामी मानते हैं तो कोई एकान्त क्षणिक नाशवान मानते हैं, कोई उसे पर्याय गुणरहित मानते हैं;-ऐसे अनेक प्रकार की मिथ्या मान्यताएँ चलती हैं;-तो हे प्रभो ! आत्मा का सत्यस्वरुप क्या है वह समझाइये ! ?
प्रभुकी वाणी में आया-हे भव्यराज ! तुम भावीतीर्थंकर हो, तुमने उत्तम प्रश्न पूछा। सुनो, सत्रुप इस विश्वमें अनन्त जीवात्माएँ स्वतंत्ररुप से विद्यमान तत्त्व हैं, उनमें से ‘मैं’ ऐसे स्वसंवेदन द्वारा आत्मा सदा सर्वत्र अपने अस्तित्व को प्रसिद्ध करता है। कोई भी जीव किसी भी स्थिति में, ‘मैं नहीं हूँ’-ऐसा अपना अभाव सिद्ध नहीं कर सकता, अपने अस्तित्व का अस्वीकार नहीं कर सकता; क्योंकि ‘मैं नहीं हूँ’-ऐसा कहनेवाला स्वयं ही जीव है। आत्मा सत्-विद्यमान है, वह ज्ञानमय-सुखमय वस्तु है, स्वयं अपने में है; अपने गुण-पर्यायरुप भावों में स्थित, उत्पाद-व्यय-ध्रुवरुप सत् है। सदा शरीर से भिन्न लक्षणवाला उसका अस्तित्व है, वह ‘ज्ञाता’ ऐसे चिह्न द्वारा ज्ञात होता है। यद्यपि अरुपी होने के कारण वह इन्द्रियों द्वारा दृष्टिगोचर नही होता, परन्तु अंतर में इन्द्रियों से परे अपने अनुभवज्ञान द्वारा वह स्पष्ट ज्ञात होता है-अनुभव में आता है। राग के तथा बाह्यविषयों के बिना एकाकी ही सुखी होने का उसका स्वभाव है। ऐसे परमतत्त्व रुप अपने आत्माको जानकर हे भव्यो ! तुम कषायों से भिन्नरुप उसकी उपासना करो. . यही मोक्ष साधनेकी रीति है।
आत्मा के अस्तित्व की ऐसी सुन्दर सिद्धि सुनकर सर्व श्रोताजनो का चित्त प्रसन्न हो गया, अनेक भव्यजीवों ने अपने सम्यक्त्व को उज्ज्वल किया। श्रीकृष्ण ने प्रभुकी वाणी में अपने पूर्वभव तथा भविष्य के भी मोक्षतक के दो भव जान लिये। पूर्वभव में स्वय मुनि थे, परन्तु निदान बन्ध के कारण धर्म की भावना मे मन को स्थिर किया; परन्तु आयुबध के कारण वे व्रत नही ले सके। अनेक जीवों ने प्रभु के उपदेश से आत्माका शुद्ध स्वरुप जैसा जाना वैसा ही अनुभव मे लिया और मोक्षमार्ग मे प्रविष्ट होकर परम आनन्दित हुए।
तत्पश्चात् श्रीकृष्ण की माता देवकी ने वरदत्त गणधर को वन्दन करके अपने मन की शका पूछी कि-हे देव ! मेरे आँगन मे दो मुनिराज आहार के लिये पधारे थे, दूसरे दिन वे ही मुनिराज फिर पधारे और तीसरे दिन भी वे ही दो मुनिराज मेरे घर आहार लेने पधारे; तो वे मुनिवर मेरे यहाँ बार-बार क्यों पधारे ? उन्हे देखकर मेरे अतर मे अत्यन्त स्नेह उमडता था, उसका क्या कारण ?
दिव्यज्ञानी गणधरदेव ने देवकी माता के मनका समाधान करते हुए कहा-हे माता ! आपके आँगन में तीन बार जो मुनि-युगल पधारे वे मुनि-युगल वही के वही नही थे, परन्तु हर बार अलग अलग थे; और वे मुनिवर आपके पुत्र ही थे। श्रीकृष्ण के अवतार से पूर्व तीन बार जो युगल-पुत्र अवतरित हुए थे उनका आपके भाई कस के भय से अन्यत्र लालन-पालन हुआ था, वे छहों पुत्र जिनदीक्षा लेकर मुनि हो गये थे। आपने बचपन से ही अपने उन पुत्रों को नही देखा था, उन छहो का रुप एक-सा था, इसलिये आप उन्हे नही पहिचान सकी, परन्तु वे आपके पुत्र होने से प्राकृतिक रुप से आप को उनके प्रति पुत्रवत स्नेह उमड़ा था और सुनिये, हे देवकी माँ ! वे छहो मुनिवर कि जिनका नाम देवदत्त-देवपाल, अनिकदत्त-अनिकपाल तथा शत्रुघ्न-जितशत्रु है, वे छहो चरमशरीरी हैं, इसी भव मे मोक्ष प्राप्त करेगे। पूर्वभव में भी वे छहों भाई थे और आपके ही पुत्र थे। अपने छहों पुत्र मुनि हुए हैं-ऐसा जानकर तथा उनके पूर्वभव सुनकर देवकी माता आश्चर्य पूर्वक वैराग्य को प्राप्त हुई, परन्तु श्रीकृष्ण के प्रति मोह के कारण दीक्षा नही ले सकी।
तत्पश्चात् श्रीकृष्ण ने अपनी आठ मुख्य रानियों-१.सत्यभामा २. रुक्मिणी, ३ जाम्बुवती, ४ सुसीमा, ५. लक्ष्मणा, ६. गांधारी, ७ गौरी तथा ८ पद्मावती-के पूर्वभव पूछे।
उत्तर मे गणधरदेव ने प्रथम सत्यभामा के पूर्वभव कहे-शीतलनाथ प्रभु के तीर्थ में वह जीव मथुरा राज्य की शौरीपुर नगरी मे एक अभिमानी विद्वान था; तब जैनधर्म की निन्दा करने तथा विषय-कषायपोषक कुधर्मका उपदेश देने से वह सातवें नरक में गया और अनेक निचले भवों में परिभ्रमण किया। पश्चात् भील के भव मे उसने एक मुनिराज के उपदेश से मद्य, मास, मदिरा, अण्डा, शहद आदि का त्याग किया और मरकर राजपुत्र हुआ; वहाँ भी आत्मज्ञान के बिना व्रत करके शुभ परिणाम से देव हुआ और वहाँ से च्यवकर यहाँ श्रीकृष्ण की पटरानी सत्यभामा के रुप में अवतरित हुआ है। अब भगवान नेमिनाथ के शासन में धर्मप्राप्त करके वह स्त्रीपर्यायका छेद करेगा और अनुक्रम से मोक्ष प्राप्त करेगा।
इसी प्रकार दूसरी सातों रानियों ने भी पूर्वभव में धर्म की कैसी विराधना की थी, और फिर मुनिवरोंको आहार दान, व्रतादि से धर्म के संस्कार प्राप्त किये, परन्तु अभी तक आत्मज्ञान नहीं किया होने से स्त्री पर्याय में अवतरित हुईं; अब वे नेमिप्रभु के शासन में धर्मप्राप्त करके अपना कल्याण करेंगी।-वह बात गणधर ने बतलायी।
इस प्रकार गणधरदेव के मुख से अपने पूर्वभव सुनकर तथा स्वयं निकट भविष्य मे मोक्षगामी होना जानकर वे सब रानियाँ अति प्रसन्न हुईं और अभी तक आत्मज्ञान के बिना ही ऐसी नीच स्त्रीपर्याय मे भटकती रही-ऐसा विचारकर उन्होंने वैराग्यपूर्वक जैनधर्म में अपनी बुद्धि लगायी और भक्तिसहित नेमिप्रभु के चरणों में चित्त लगाया। धर्मरहित मूर्ख जीवों का जीवन निन्दनीय तथा धर्म ही प्रशंसनीय है,-ऐसा समझकर अनेक जीवों ने अपना चित्त धर्ममें लगाया और पापप्रवृत्ति छोड दी।
पश्चात् बलदेव ने श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्नकुमार तथा शम्बुकुमार का जीवन चरित्र पूछा। उसका गणधरदेव ने संक्षेप में वर्णन किया।
श्रीकृष्ण के पुत्र चरमशरीरी शम्बु तथा प्रद्युम्न के पूर्वभव
रुक्मिणी का पुत्र प्रद्युम्न तथा जाम्बुवती का पुत्र शम्बु (शभव); वे दोनों जीव कुछ भव पहले मगधदेश में अग्निभूति तथा वायुभूति नाम के दो भाई थे। दोनों भाई नास्तिक थे। एक बार उन्होंने एक जैनमुनि के साथ वाद-विवाद किया। मुनिराजने अनेकान्त विद्या द्वारा जीव का अस्तित्व, उसका ज्ञानस्वभाव, तथा सर्वज्ञतारूप परमात्म पद की सिद्धि करके उन दोनों भाइयों को पराजित कर दिया। उस से अपमानित हुए वे दोनों भाई रात्रि के समय उन ध्यानस्थ मुनि को मारने के लिये तैयार हुए कि एक यक्षदेवने उन्हें वहीं किल दिया।
तब उनके माता-पिताने यक्षसे पुत्रों को छुड़ाने की प्रार्थना की। यक्षदेव ने कहा-तुम हिंस्रधर्म को छोड़कर मुनिराज से क्षमायाचना करो और परम अहिंसारूप जैनधर्म को स्वीकार करो तो तुम्हारे पुत्रों को मुक्त कर दूँगा। उन्होंने यक्ष की आज्ञा का पालन किया और दोनो भाई छूट गये। फिर उनके पिताने कहा-बेटा, अब तुम जैनधर्म को छोड़ दो, क्योंकि हमने तो मात्र दिखाने के लिये स्वार्थवश जैनधर्म का स्वीकार किया था। तब दोनों भाइयों ने उसकी बात मानने से इन्कार किया और कहा कि-‘जैनधर्म के कारण ही हमारी रक्षा हुई है, इसलिये हम उसे नहीं छोड़ सकते’-इस प्रकार दोनों ने दृढ़ता से जैनधर्म आस्था प्रगट की और श्रावकधर्म का पालन करके स्वर्ग में गये। वहाँ से निकलकर वे दोनो अयोध्यापुरी में पूर्णभद्र तथा मणिभद्र नामक श्रेष्ठिपुत्र हुए। जैनधर्म की उपासना करके पुनः स्वर्ग मे गये और फिर हस्तिनापुर मे राजाके पुत्र हुए। उनके नाम मधु और क्रीड़व। (मधु वह प्रद्युम्न का जीव है।)
एक बार राजामधु ने अपने मित्र कनकरथकी स्त्रीपर मोहित होकर उसका अपहरण किया। स्त्री के वियोग से दुःखी होकर कनकरथ ने संन्यास ले लिया और मरकर धूमकेतु देव हुआ।
पश्चात् राजामधु को अपने दुराचार के लिये पश्चात्ताप हुआ और मुनिराज के निकट धर्मोपदेश सुनकर अपने भाई के साथ संयम धारण किया और धर्म की आराधना द्वारा पापों को धो डाला। दोनों भाई पुण्य से स्वर्गमें गये और वहाँ से निकलकर राजा मधु का जीव तो रुक्मिणी का पुत्र प्रद्युम्न और उसके भाई क्रीड़व का जीव जाम्बुवतीका पुत्र शम्बुकुमार हुआ है। श्रीकृष्ण के वे दोनों पुत्र चरमशरीरी हैं और इस गिरनार से ही मोक्ष प्राप्त करेंगे।
प्रद्युम्न और शम्बुकुमार के जीवन की यह बात सुनकर सबको बड़ा हर्ष हुआ। पश्चात् विशेषरूप से गणधर देवने कहा-यह प्रद्युम्नकुमार द्वारिका नगरी में जब मात्र छह दिन का बालक था तब धूमकेतु देव वहाँ से विमानमार्ग से जा रहा था। रुक्मिणी के महल पर उसका विमान थम गया। अवधिज्ञान से उसने जाना कि यह कुमार मेरा पूर्वभवका शत्रु है; पूर्वभवमें इसने मेरी रानीका अपहरण किया था। इसलिये शत्रुता का बदला लेने के लिये उसने दैवी विद्यासे प्रद्युम्नकुमार का अपहरण कर लिया। वह उसे मार डालने का विचार कर रहा था, परन्तु चरमशरीरी प्रद्युम्न की आयु के प्रताप से उसमें दया का संचार हुआ, और वह बालक प्रद्युम्न को वन में एक शिला के नीचे दबाकर चला गया।
उसी समय कालसंवर नामका एक विद्याधर राजा वहाँ से निकला। शिला ऊँची-नीची होते देखकर वह आश्चर्यचकित हुआ और उसके नीचे अत्यन्त सुन्दर चरमशरीरी बालक को देखकर उसके हर्षका पार नहीं रहा। उसने वह बालक अपनी रानी कंचनमाला को दिया, और युवराजपद पर स्थापित करके उन्होंने उसका पुत्रवत् लालन-पालन किया। प्रद्युम्न बड़ा होने पर कंचनमाला के दूसरे पुत्र उसकी ईर्ष्या करने लगे और उसे मारने के अनेक प्रपंच किये; परन्तु पुण्यात्मा प्रद्युम्न को कोई हानि होने के बदले उसके पुण्यप्रताप से उसे महान दैवी वैभव प्राप्त हुए। धीरे-धीरे वह सोलह वर्ष का किशोर हुआ। दूसरी ओर द्वारिका में पुत्रवियोग से तड़पती रुक्मिणी का क्या हुआ वह सुनो।
द्वारिका नगरी में, अपने छह दिन के पुत्र को न देखकर रुक्मिणी व्याकुल हो उठी। महल में चारो ओर खोजने पर भी उसका कहीं पता नहीं लगा। श्रीकृष्ण भी उसकी खोज नहीं कर सके। श्रीकृष्ण और रुक्मिणी पुत्र-वयोग से अत्यन्त शोकमग्न रहने लगे; इसलिये श्रीकृष्ण के मित्र नारदजी उसे खोजने के लिये विदेहक्षेत्र गये और वहाँ विराजमान स्वयंप्रभ तीर्थंकर (सीमंधर स्वामी) के समवसरण में जाकर प्रद्युम्न की कथा सुनी। द्वारिका आकर श्रीकृष्ण तथा रुक्मिणी से कहा-सुनो, मैं एक आनन्द की बात करता हूँ-तुम प्रद्युम्नका शोक छोड़ो, क्योंकि वह कुशल है और १६ वें वर्ष में महान वैभवसहित लौटकर आपसे मिलेगा। मैं यहाँ से विदेहक्षेत्रमें सीमंधर प्रभु के समवसरण में गया था। अहा, वहाँ की आश्चर्यकारी शोभा का क्या कहना ! वहाँ तीर्थंकर परमात्मा के साक्षात् दर्शन से मुझे अति आनन्द हुआ और मैंने प्रद्युम्न की बात पूछी। उसके पूर्वभवका वैरी उसका अपहरण करके ले गया था, और इस समय वह एक विद्याधर के यहाँ पुत्ररूप में उसका लालन-पालन हो रहा है। १६ वें वर्ष में जब वह यहाँ लौटेगा तब अनेक शुभचिह्न दृष्टिगोचर होंगे-सूखे सरोवर जल से छलक उठेंगे, उनमें कमल खिल जायेंगे, मोर नाचने लगेंगे, बिना ऋतुके आम्रवृक्ष फलित होंगे और रुक्मिणी के स्तनों से दूध बहने लगेगा। वह पुत्र इसी भव में मोक्ष प्राप्त करेगा-ऐसा मैंने प्रभुकी वाणी में सुना है।
वाह ! सीमंधर प्रभु की धर्मसभा में नारदजी द्वारा सुनी गई अपने पुत्र की बात सुनकर श्रीकृष्ण तथा रुक्मिणी को अतीव प्रसन्नता हुई, उनका शोक मिट गया और वे चातक की भाँति प्रद्युम्न के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे।
इधर नवयुवा प्रद्युम्न का सुन्दर रूप देखकर उसकी पालक माता रानी कंचनमाला उन पर मोहित हो गई; उसके मनमे विकारभाव जागृत हुए। उसने अपनी महत्त्वपूर्ण प्रज्ञप्ति विद्या उन्हें दे दी और अनेक हावभावों से ललचाने का प्रयत्न किया; परन्तु धीर-गंभीर प्रद्युम्नकुमार शीलव्रत में अडिग रहे। इससे कुपित होकर रानी कंचनमालाने उन पर कुशील का झूठा आरोप लगाकर राजा को भड़काया। राजाने उन्हें मार डालने का काम अपने ५०० पुत्रों को सौंपा; परन्तु वे किसी प्रकार प्रद्युम्न को मार नहीं सके। चरमशरीरी को कौन मार सकता है ? उलटे उन्हें दिव्य विभूतियाँ प्राप्त हुई।