चौबीस तीर्थंकर महापुराण (हरिलाल जैन) | Chaubis Tirthankar Mahapuran

११

भगवान श्रेयांसनाथ

[११]

श्रेयहेतु भव्यजीवों को आश्रय लेने योग्य-ऐसे भगवान श्रेयांसनाथ तीर्थंकर का मंगलचरित्र सर्व जीवों को श्रेयरूप हो।

[श्रेयांसनाथ-पूर्वभव : नलिनप्रभ राजा]

तीसरे पुष्कर द्वीप के पूर्वविदेह में क्षेमपुर नगर है। महाराजा नलिनप्रभ वहाँ राज्य करते थे। वे जैनधर्म के प्रेमी तथा आत्मस्वरूप के ज्ञाता थे; संसार में रहकर भी मोक्ष के साधक थे; धर्म, अर्थ, काम इन तीन पुरुषार्थोंके साथ मोक्ष का पुरुषार्थ भी उनके निरन्तर चल रहा था। राजवैभव के मध्य रहने पर भी उनकी कोई प्रवृत्ति धर्म से विरुद्ध नहीं थी। उनका जीवन एक आदर्श श्रावक समान उज्ज्वल था।

उनके राजउद्यान में हजारों आम्रवृक्षों से सुशोभित एक रमणीय उपवन था। एक बार वहाँ अनन्त जिनेन्द्र का आगमन हुआ। मोर नाच उठें, कोयलें कुहुकने लगीं, आम्रवृक्ष हजारों फलों से झुक गये-मानो हाथ में फल लेकर प्रभुजी की पूजा कर रहे हों ! वनपाल ने आकर राजा को बधाई दी कि-हे महाराजा ! अपनी नगरी के उद्यान में भगवान अनन्त जिनका पदार्पण हुआ है।

सर्वोत्कृष्ट बधाई सुनते ही राजा के हर्ष का पार नहीं रहा…तपोवन में पहुँचकर प्रभुके दर्शन एवं उपदेश से उनका आत्मा प्रसन्न हो उठा। आत्मज्ञान तो उन्हें था ही, तदुपरान्त महान वैराग्य जागृत हुआ…और जिनचरणों में दीक्षा लेकर मुनि हो गये। उनको ग्यारह अंग का ज्ञान उदित हुआ और रत्नत्रय की शुद्धि के उपरान्त सोलह प्रकार की विशुद्ध भावनाओं द्वारा बिना इच्छा के तीर्थंकर प्रकृति का आगमन हुआ-मानो केवलज्ञान की दूती उसके आगमन के समाचार लेकर आ पहुँची। वे नलिन मुनिराज विशुद्ध-चारित्र का पालन करते हुए, आयु पूर्ण होने पर समाधिमरण करके सोलहवें स्वर्ग में इन्द्र हुए। वहाँ उनकी आयु बाईस सागर की थी। अनेक दिव्य देवियों तथा देवलोक का आश्चर्यकारी वैभव के बीच असंख्यात वर्ष तक रहने पर भी वे सम्यक्त्व के प्रताप से चैतन्य की महिमा को कभी क्षणमात्र भी भूले नहीं थे। राग होने पर भी उनकी चेतना राग से विरक्त थी। स्वर्गलोक के उत्तम सुखों को भी चैतन्य के वीतरागी सुखके समक्ष वे दुःख ही समझते थे। ‘धन्य वीतराग-मुनिदशा और धन्य परमात्मदशा !-उसे हम कब प्राप्त करेंगे ?’ ऐसी मोक्ष-भावना वे भावी तीर्थंकर स्वर्ग में बैठे-बैठे भाते थे। अन्तमें, स्वर्ग के दिव्यसुखों से संतुष्ट न होकर मोक्षसाधना हेतु वे महात्मा स्वर्ग पुरी छोड़कर मनुष्यलोक में आये।

सिंहपुरी (काशी) में श्रेयांसनाथ-अवतार

भरत क्षेत्र में काशी देश अत्यंत रमणीय है; वहाँ अनेक महापुरुष हुए। अभी तक सातवे और आठवें (सुपार्श्वनाथ और चन्द्रप्रभ) भगवन्तों के कल्याणकों से जो देश पावन हुआ, उस काशी देश में (वर्तमान बनारस से दस किलोमीटर दूर) सिंहपुरी नामक सुन्दर नगरी थी। (वर्तमान मे उसे ‘सारनाथ’ कहते हैं और वहाँ भगवान श्रेयांसनाथ का सुन्दर मन्दिर है।) वहाँ इक्ष्वाकुवंशी राजा विष्णु राज्य करते थे; उनकी महारानी का नाम था सुनन्दा। उन सुनन्दा माता के गर्भ मे सोलह मंगल-स्वप्न के साथ भगवान श्रेयांस-तीर्थंकर का जीव अवतरित हुआ…(ज्येष्ठ कृष्णा षष्ठी)…तत्पश्चात् सवा नौ मास बीतने पर फाल्गुन कृष्णा एकादशी के दिन भरतक्षेत्र के ग्यारहवें तीर्थंकर का अवतार हुआ। इन ज्ञानके धारी और तीन लोक के नाथ ऐसे तीर्थंकर का अवतार होने से तीनों लोक के जीव हर्षित हो उठे। सर्व ऋतुएँ एक साथ खिल उठीं और जीवों को शान्ति का अनुभव हुआ। पापी जीव भी धर्मात्मा बन गये। इन्द्रों ने आनन्दपूर्वक धामधूमसे दिव्यतासहित प्रभुका जन्मोत्सव मनाया-जो जगत के उत्कृष्ट मंगल-महोत्सव में अद्वितीय था! प्रभु के जन्मोत्सव की महिमा देखकर अनेक जीवों ने आश्चर्यकारी चैतन्य तत्त्व की महिमा का चिन्तन करके सम्यग्दर्शन द्वारा अपना श्रेय प्राप्त किया। अहा ! श्रेयांसनाथ तीर्थंकर का अवतार होते ही जीवों के श्रेय का प्रारम्भ हो गया। उनसे पूर्व भरतक्षेत्र में अनेक वर्षों तक जैनधर्म की धारा विच्छिन्न हो गई थी जो पुनः प्रवाहित हो गई। इन्द्र उन्हें ‘श्रेयांसनाथ’ नाम दे उससे पूर्व ही प्रभुने जीवों का श्रेय प्रारम्भ कर दिया था। उनके चरण में ‘गैंडा’ का चिह्न था-जिस प्रकार गेंडा का शरीर शस्त्रों से नही भिदता, उसी प्रकार श्रेयांसनाथ प्रभुके अभेद्य अनेकान्त शासन को किसी एकान्तवादी कुचक्र से नहीं भेदा जा सकता। इन्द्र ने प्रभु का जन्माभिषेक करने के पश्चात् स्तुति करते हुए कहा कि-हे देवं ! आप इस अवतार में ही सर्वज्ञ परमात्मा होंगे और रत्नत्रयरुप मोक्षमार्ग का उपदेश देकर अनेक जीवों का श्रेय करेंगे। आप जीवों के हितरुप श्रेयमार्ग के रक्षक तथा पोषक हैं, इसलिये सचमुच आप ‘श्रेयांसनाथ’ हैं।

कुमार श्रेयांसनाथ मात्र सिंहपुरी के नहीं परन्तु समस्त काशी देश के गौरवरुप थे और उनके कारण काशी देश सारी दुनिया में प्रसिद्ध था। काशी देश की प्रजा ने सुपार्श्वनाथ और चन्द्रप्रभ के पश्चात् इन तीसरे बालतीर्थंकर को अपनी नगरी में क्रीड़ा करते और किलकिलते देखा। उन्हें देखते ही प्रजाजनों के हृदय आनन्द से बोल उठते थे कि-अहा ! जहाँ ऐसे महात्मा प्रभु विचरते हैं उस देश को धन्य है ! हमारे नेत्र सफल हुए जो हमें ऐसे भगवान के दर्शन हो रहे हैं; हमारा जीवन धन्य है कि ऐसे प्रभु के साथ हम जी रहे हैं !-‘वाह प्रजाजनों ! आपको धन्य है।’

हजारों प्रजाजन प्रतिदिन सुप्रभात में श्रेयांसकुमार के दर्शन करने आते…और परमात्मा के दर्शन जैसा आनन्द प्राप्त करते; क्योंकि श्रेय प्रभु एक मंगल-आत्मा थे…उनका द्रव्य भी परमात्म द्रव्य था..अर्थात् वे स्वयं द्रव्य-परमात्मा थे। उनके साथ दो शब्द बोलने से भी परम आनन्द होता था। एक बार एक श्रेष्ठ नागरिकने प्रभु से पूछा-हे देव ! इस चौबीसी में इस काशी देश में सुपार्श्वनाथ एवं चन्द्रप्रभ-इन दो तीर्थंकरों के पश्चात् आप तीसरे तीर्थंकर अवतरित हुए हैं..क्या अब भविष्य में इस काशी देश में और किसी तीर्थंकर का अवतार होगा ? । यह प्रश्न सुनकर प्रभु कुछ मुस्कराये और कहा-हे सुभागी प्रजाजनो ! अभी एक चौथे तीर्थंकर भी इस काशी देश को पावन करेंगे। इस चौबीसी के तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का भी इस काशी देश की वाराणसी नगरी में अवतार होगा; वे कुमारअवस्था में सर्पयुगल को धर्मोपदेश देकर उनका उद्धार करेंगे.. अहा, छोटे-से श्रेयकुमार के श्रीमुख से ऐसी आनन्दकारी बात सुनकर प्रजाजन अति हर्षित हुए और उल्लासपूर्वक ‘श्रेयांस तीर्थंकर की जय हो..पार्श्वनाथ तीर्थंकर की जय हो’..ऐसे आनन्दकारी जय-जयकार से समस्त नगरी गूँज उठी। वह गगनभेदी जयनाद सुनकर महारानी सुनन्दादेवी ने महल के झरोखे से देखा तो उनका लाड़ला पुत्र श्रेयकुमार प्रजाजनों से बातें करके उन्हें आनन्दित कर रहा है ! वह दृश्य, देखकर माताजी प्रसन्न हुईं और उसी क्षण माताजी को झरोखे में देखकर प्रजाजनों ने पुनः आनन्दपूर्वक ‘सुनन्दामाता की जय’…ऐसे जयकार से आकाश गुँजा दिया।

किशोर अवस्थामें उन बाल तीर्थंकर का विनोद भी पुण्यानुबंधी शुभ था। आनन्द-किल्लोलपूर्वक वृद्धिगत होते-होते राजकुमार श्रेयांसनाथ युवावस्था को प्राप्त हुए। पिताने उनका विवाह किया और राज्याभिषेक करके उन्हें सिंहपुरी के राजसिंहासनपर बिठाया पुण्यकर्म उत्तम भोगसामग्री द्वारा उनकी सेवा करते थे। यद्यपि वे धर्मात्मा राजकुमार तो चैतन्यसुख की श्रेष्ठता के समक्ष उन उत्तम भोगों को तुच्छ ही समझते थे। मात्र बाह्य समृद्धि में ही नहीं अपितु अंतरंग श्रेयमार्ग में भी वे वृद्धिगत थे। पुण्य प्रताप से समस्त उत्तम अर्थोंकी प्राप्ति उनको स्वयमेव होती थी, इसलिये उन्हे अर्थ प्राप्ति हेतु कोई पुरुषार्थ करना नहीं था, मात्र मोक्ष हेतु ही पुरुषार्थ करना था,-जो वे राज्य संचालन के साथ भी गुप्त रुपसे करते ही रहते थे। इस प्रकार महाराजा श्रेयांसनाथ ने अपनी गुप्त ज्ञाननिधी की सुरक्षापूर्वक ब्यालीस लाख वर्षोतक सुखसे राज्य किया। चौरासी लाख वर्ष की आयु में से तीन भाग अर्थात् त्रेसठ लाख वर्ष बीत गये।

एक बार महाराजा श्रेयांसनाथ वनक्रीड़ा हेतु उद्यान में गये . माघ का महिना था, वसन्तऋतु का आगमन निकट होने से वृक्षों के पत्ते खिर गये पुष्प-पत्रों से रहित वृक्षों की शोभा लुप्त होगई .. मानो वृक्ष अपना शृंगार और वैभव छोड़कर विरक्त हो गये हो !! ऐसा ऋतु-परिवर्तन देखकर महाराजा श्रेयांसनाथका चित्त भी अचानक संसार से विरक्त हो गया।वे सोचने लगे-यह पुण्यवैभव भी क्षणभंगुर है। पतझड़ आनेपर इन वृक्षों की भाँती मेरे भी यह संयोग छूट जायेंगे। संयोगो से पार ऐसे अपने असंयोगी सिद्धपद की साधना जब तक मैं नहीं करूँगा तब तक इस संसार मे कहीं स्थिरता नही है; आज ही ऐसे अस्थिर संसार को छोड़कर मैं मुनि होऊँगा और अपने सिध्दपद की साधना करूँगा। पत्तों जैसे इस पुण्य के भरोसे मैं बैठा नहीं रहूँगा ! ध्रुवपद तो मेरा सिध्दपद है, उसे साधकर सादि अनन्त काल उसमें बैठूँगा। इस प्रकार महाराजा की वैराग्यधारा वेगवान होती गई; उनकी चेतना सातवें गुणस्थान में आरोहण करने हेतु तत्पर बनी और ‘श्रेयस्कर’ नामक पुत्र को राज्य सौंपकर बारह वैराग्य भावनाओं का चिंतवन करते हुए जिनदीक्षा हेतु उद्यमी हुए. उसी समय ब्रम्हलोक से लौकांतिक देव उतर आये। मानो वैराग्य का शृंगार सजा हो ऐसे श्वेतदिव्यवस्त्रोंसे वे सुसज्ज थे। उन्होंने वैराग्यवन्त महाराज को वंदन किया और वैराग्यवर्धक स्तुति करते हुए कहा : अहो देव ! आपका नाम ‘श्रेयांसनाथ’ है और आप स्वयं श्रेयरुप हैं… तथा इस समय आप रत्नत्रयरूप उत्तम श्रेयोमार्गपर विचर रहे हैं।-ऐसी आपकी वीतरागता देखकर हम प्रसन्नता पूर्वक उसका अनुमोदन करने हेतु ब्रह्मलोक से यहाँ आये हैं। [अहा, यह भी एक आश्चर्य की बात है कि तीर्थंकरों के समवसरण में भी कभी नहीं आनेवाले वे विरगी देव मात्र भगवान के वैराग्य प्रसंगपर ही उनके वैराग्य की अनुमोदना करने मनुष्यलोक में गृहस्थ-तीर्थंकरके पास आते हैं।]

वास्तवमें तीर्थंकरोंका वैराग्य वह जगतका कल्याण करनेवाला महान मांगलिक अवसर है। उस अवसर के अनुरूप ‘विमलप्रभा’ नामक पालकी लेकर देवोंसहित इन्द्र वहाँ आ पहुँचे..और स्वानुभूतिसहित तीन ज्ञानकी विमलप्रभा से शोभायमान भगवान श्रेयांसनाथ उस पालकी में आरूढ़ हुए तब उसका ’ विमलप्रभा’ नाम सार्थक हुआ। पालकी में आरूढ़ होते समय,स्वयं इन्द्रने अपने हाथ का सहारा देकर प्रभु का सन्मान किया और इस प्रकार अपना भी सन्मान बढ़ाया। प्रभु को कहीं इन्द्र के आधार की आवश्यकता नही थी, परन्तु वह तो प्रभुकी महिमा बढ़ाने की एक विधि थी-जिसे देखकर वैभवी इन्द्रकी अपेक्षा उन वैराग्यवन्त तीर्थंकर की अपार महिमा को जगत जान सके ! वाह, इन्द्र भी हाथ बढ़ाकर जिनकी सेवा में तत्पर हो उन भगवन्त के गुणोंकी महिमा का क्या कहना !!

वह कल्याणकारी दिन था फाल्गुन कृष्णा एकादशीका मनोहर उद्यान में पहुँचकर महाराजा श्रेयांसनाथने वस्त्राभूषण, मुकुट आदि समस्त राजवैभव का त्याग किया, स्फटिक समान उज्वल शीलापर बैठकर ‘ॐ नमः सिद्धेभ्यः’ ऐसे उच्चार पूर्वक सिद्ध भगवन्तों को नमस्कार करके स्वयगुरु ऐसे उन प्रभु ने अपने दृढ़ हाथ से कोमल केशोंका लुंचन किया। उसी समय एक हजार राजा भी प्रभुका अनुकरण करके सर्वसंगत्यागी दिगम्बर मुनि बन गये। उन एक हजार मुनियों के बीच सूर्य समान तेजस्वी ऐसे वे श्रेयांसनाथ मुनिराज एकत्वभावनामें झूलते-झूलते आत्मचिन्तनमें एकाग्र हुए और उसी क्षण अनंत गुणगम्भीर चिदानन्दतत्त्वमें लीन होकर शुद्धोपयोगरुप परिणमित हुए, साक्षात् श्रमण हुए, सर्वत्र समभावी हुए। अहा, उन परम वीतरागी मुनिराजकी अचिन्त्य शांत मुद्रा देखकर उस समय इन्द्र, देव, मनुष्य और तिर्यंच भी अपने चित्तमें अनुपम शान्तिका अनुभव करने लगे। सिंह और शशक प्रभुचरणोमे एकसाथ एकत्रित हुए थे तथापि किसीके हृदय में क्रूरता अथवा भय नहीं था, दोनों अत्यन्त शान्तिसे प्रभुकी वीतरागी छवि निहार रहे थे…और मन मे विचारते थे कि-'वाह, यह महात्मा कैसा सुन्दर ध्यान लगाये बैठे हैं !! उस समय हजारो प्रजाजनोंने भी वैराग्य भावना पूर्वक श्रावकव्रत अंगीकार किए और अनेक जीव अपूर्व सम्यकदर्शन को प्राप्त हुए। धन्य था उन तीर्थंकर प्रभुका दीक्षा कल्याणक का महोत्सव !

दीक्षा लेकर आत्मध्यानमें विराजमान उन श्रेयांस
मुनिराजको शुद्धोपयोगके साथ ही सातवाँ गुणस्थान,
चौथा दिव्यज्ञान तथा सात महान ऋद्धियाँ प्रगट हुई,

संज्वलन के अतिरिक्त सर्व कषायों का अभाव होगया, वीतराग रत्नत्रयरूप के तेज से उनका आत्मा दीप्तमान हो उठा। दो दिन उपवास के पश्चात् वे मुनिराज सिद्धार्थनगर मे पधारे .वहीं नन्दराजाने भक्तिसहित विधीपूर्वक प्रथम पारण कराया। राजाके महान पुण्ययोगसे वहाँ देवों ने दुंदुभि वाद्य बजाये और रत्न वृष्टिकी इस प्रकार मोक्षमार्गी मुनिवरोको आहार दान की अलौकिक महिमा जगत में प्रसिद्ध हुई।

महामुनि श्रेयांसनाथने लगभग दो वर्षतक मौनदशापूर्वक विहार किया। तत्पश्चात् पुनः अपनी जन्म-नगरी सिंहपुरीमे पधारे, जिस मनोहर उद्यान में दीक्षा ली थी उसी मे एक वृक्ष के नीचे दो दिन उपवास रखकर विराजमान हुए और आत्मध्यान की उग्र श्रेणी लगायी। शुद्धोपयोग की तलवार को शुक्लध्यान द्वारा सजाकर भयंकर मोहशत्रुपर प्रहार करने लगे। मोहशत्रु काँप उठा, उसकी सेना नष्ट होने लगी। बाह्य मे परमशांत दिखनेवाले वे श्रेयांस मुनिराज अंतरमे मोहशत्रुके साथ कल्पनातीत शूरवीरतासे युध्द कर रहे थे और ध्यानचक्र द्वारा उसे छेद रहे थे। मात्र कुछ ही समय के युध्द मे प्रभुने मोह का सर्वथा नाश कर दिया। अनादि से जो मोह अविजित था उसे सम्पूर्णतया जीतकर भगवान परिपूर्ण विजेता-जिन हुए, वीतराग हुए और दूसरे ही क्षण अपने केवलज्ञान-निधान को प्राप्त करके सर्वज्ञ परमात्मा हुए वह मंगल दिवस एव मंगल घड़ी थी माघ कृष्णा अमावस्याकी संध्या। अमावस्या होनेपर भी प्रभुके आसपास अंधकार नहीं था, वहाँ तो अमावस्याकी रात्रि मे भी किसी दैवी प्रकाश का पूंज फैला हुआ था।

ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांसप्रभुको केवलज्ञान होनेपर उस चौथे कल्याणक का उत्सव करने के लिये काशी देश की सिंहपुरी नगरी मे स्वर्ग से इन्द्रादि भी चौथीबार आ पहुँचे। एक ही नगरी मे प्रभुके चार कल्याणक ! धन्य वह नगरी !! दो घड़ी मे तो समवसरण की रचना हो गई। उसकी शोभा ऐसी अद्भुत थी कि अरे, "यह रचना इन्द्रोने की है या तीर्थंकर के सातिशय पुण्य से हुई है ?-ऐसा निर्णय नही हो सकता था। तीर्थंकर प्रभु के धर्म दरबार मे भव्यजीवो की टोलियाँ आयीं। मात्र देव नही, मनुष्य तथा सिंह और शशक, वाघ और बन्दर, हाथी और सर्प आदि प्राणी आये और शान्तिसे धर्मोपदेश सुनने लगे। वे मात्र सुनकर नहीं बैठे रहे परन्तु उसमे कहे हुए अपने चैतन्यतत्त्व की सुन्दरता को अपने में देख लिया और आत्मज्ञान करके मोक्ष के मार्ग मे चलने लगे, अपने भीतर विद्यमान ‘परमात्मा’ के उन्होने दर्शन कर लिये।

श्रेयांसनाथ तीर्थंकर की दिव्य धर्मसभा मे कुन्थुराज आदि सत्तर धर्म-मंत्री (गणधर) थे, वे सब बारह अग के धारी श्रुत केवली थे तथा महान लब्धियोंके धारक थे। करोडो श्लोक मात्र दो घड़ी मे शुध्द उच्चारण पूर्वक बोल सके -ऐसी उनकी वचन शक्ति थी, हजारो लोग एकसाथ बोलकर कोलाहल कर रहे, है तथापि उन सब मे से प्रत्येक की भिन्न-भिन्न बात एकसाथ सुन सके ऐसी उनकी श्रवणशक्ति थी; उन प्रभुके समवसरण मे मुनिवरोंकी सभा के श्रीमण्डप के ऊपर (पाच हजार धनुष ऊँचे निरालम्बी आकाश मे) साढ़े छह हजार केवलज्ञानी भगवन्त, प्रभुसमान ही अर्हतपदपर विराजते थे। अहा, ऊपर दृष्टि करते ही जहाँ एकसाथ ६५०१ परमात्मोओं के साक्षात दर्शन हों, उस धर्मसभा की शोभा का क्या कहना !! तथा वहाँ तेरह सौ श्रुतकेवली भगवन्त थे, उन सबका सम्यक्त्व अप्रतिहत था, तथा उनमे से अनेक तो क्षायिक सम्यकदृष्टि और चरमशरीरी थे,. हजार अवधिज्ञानी, छह हजार मनःपर्यय ज्ञानी थे; ११ हजार मुनिवर विक्रियाऋध्दिधारी थे। ४८ हजार दो सौ उपाध्याय-शिक्षक थे; पाँच हजार मुनि वाद-विवाद में कुशल थे-जो अनेकान्त विद्याके द्वारा किसी भी कुतर्कका खण्डन करके जिनधर्म की सत्यता सिद्ध कर सकते थे।-इस प्रकार उन तीर्थंकर प्रभुके परिवार में ८४००० मुनिवर सुशोभित थे। वे त्रिरूप शुद्धरत्नत्रय सहित थे। एक लाख बीस हजार आर्यिकाएँ पंचम गुणस्थान में उत्तम आत्म साधना करती थीं; तथा देव देवियों की संख्या का तो कोई पार नहीं था। धर्मप्रेमी तिर्यंच भी वहाँ हजारों-लाखों की संख्या में एकत्रित हुए थे और प्रभुकी धर्मदेशना श्रवण करने में लीन थे। दिव्य ध्वनि द्वारा श्रेयमार्ग का अर्थात रत्नत्रयरूप मोक्षमार्ग का उपदेश देते हुए श्रेयांसनाथ तीर्थंकरने कहा कि-हे भव्य जीवों जैसा चेतनस्वभाव हमारे आत्मा का है वैसा ही तुम्हारे आत्मा का है; सुख के निधान उसी में भरे हैं, सुख की अनुभूति हेतु स्वयं अपने आत्मा में देखो।

‘अहा, हम आत्मा ही स्वयं परमात्मा हैं’ ऐसा प्रभु कह रहे है; वह सुनते ही भव्यजीव अपूर्व आश्चर्यसे चौंक उठते और दूसरे ही क्षण अपने परमात्मस्वरूपका अवलोकन कर लेते थे। कोई सम्यकदर्शन प्राप्त करते, तो किन्हीं को एक साथ सम्यकदर्शन-ज्ञान चारित्र तीनो की प्राप्ति हो जाती और इसप्रकार वे श्रेयमार्गमे लग जाते।

श्रेयांस प्रभुने भरत क्षेत्र के अनेक देशोंमें इक्कीसलाख वर्ष तक विहार किया; धर्मदेशना द्वारा अनेक जीवोंको श्रेय मार्ग की प्राप्ति करायी और अपने तीर्थंकर प्रकृति आदि कर्मोंकी निर्जरा की। अन्त मे एक मास आयु शेष रहने पर प्रभु सम्मेद शिखर की ‘संकुल टूंक’ पर पधारे और वहाँ स्थिर हुए। विहार और वाणी का उदय रुक गया. .. योग भी कम होने लगे…श्रावण शुक्ला पूर्णिमा के दिन अन्तिम दो शुक्ल ध्यानों द्वारा शेष कर्मोंका भी क्षय किया। प्रथम शुक्ल ध्यान द्वारा मनयोग, वचनयोग तथा स्थूल काययोगका भी निरोध करके ७२ कर्मप्रकृतियोंका क्षय किया, पश्चात् समुद्र घातकी एक अलौकिक-अचिन्त्य विधीद्वारा चारों अघातिकर्मों की स्थिती एकसमान कर दी और अंत में चौदहवें गुणस्थान के अंतभाग में अन्तिम शुक्लध्यान द्वारा शेष १३ कर्म प्रकृतियोंका भी सम्पूर्ण क्षय करके द्रव्य कर्म-भाव कर्म-नोकर्म से रहित हुए वे प्रभु, अपने केवलज्ञानादि अनन्त चैतन्य वैभव को साथ लेकर मुक्ति पुरी में पधारे। देवोंने उनके मोक्षका महोत्सव मनाया। आज भी प्रभु मुक्तिपुरी में सिद्धस्वरूपमें विराज रहे है; उन्हे नमस्कार हो !

श्रेयांसनाथ जिनराजकी, संकुल कूट है जेह,
मन-वच-तन कर पूज हूँ शिखरसम्मेद यजेह।

पूर्वभव में जो विदेहक्षेत्र में नलिनप्रभ राजा थे, वहाँ से सोलहवें स्वर्गमें अहमिन्द्र हुए; पश्चात् ग्यारहवें तीर्थंकर रूपसे सिंहपुरीमें अवतार लेकर जीवोंका श्रेय किया और अन्त में सम्मेद शिखर से सिध्दालय में सिधारे. उन भगवान श्रेयासनाथ तीर्थंकर का मगल पुराण यहाँ पूरा हुआ।

चैतन्य वैभव और पुण्यवैभव

भगवान आदिनाथ तो तीसरे युग के अत भाग में अवतरित हुए और मोक्ष भी तीसरे युगमें ही , प्राप्त किया। तत्पश्चात् शेष २३ तीर्थंकर चौथे युगमें हुए। चौथे युग के प्रारम्भ से श्रेयांस भगवान तक अभी तो १० तीर्थंकर हुए, उतने मे तो जीवोकी आयु, शरीर प्रमाण आदि वैभव तो कितनी शीघ्रता से कम होने लगे ! -वह परिवर्तन देखो-भगवान ऋषभदेव की आयु ८४ लाख पूर्व की (अर्थात ८४ लाख x ८४ लाख x ८४ लाख = ५९२७०४०००,०००,०००० इतने वर्ष की) थी, जब कि ११ वें श्रेयांसनाथ तीर्थंकर की आयु मात्र ८४ लाख वर्ष की ही थी। कितना विशाल गुणाकार घट गया ! प्रथम तीर्थंकर का शरीर प्रमाण ५०० धनुष था जब की ११वे तीर्थंकर का शरीर प्रमाण ८० धनुष था। इस प्रकार अन्य भी अनेक बाह्य प्रकारों में क्रमशः हानि होती गई; परन्तु भगवन्तोंके रत्नत्रयमार्ग में या केवलज्ञानादि आत्मवैभव में कोई हानि नहीं हुई; सर्व भगवन्तोंका वीतरागी आत्मवैभव तो एकसमान ही था। उसीसे प्रगट होता है कि आत्मवैभव ही जीवोंका सच्चा वैभव है; देह वैभव अथवा आयु वह जीव का वैभव नहीं है। इसलिये हे भव्य जीवों ! तुम भी तीर्थंकरोंके बाह्य वैभव में मोहित मत होना, उनकी सर्वज्ञता-वीतरागता आदि गुणवैभव द्वारा उनकी महानता को पहिचानना; तो तुम्हे भी वैसे गुणों की प्राप्ति होगी। चैतन्य वैभव के समक्ष पुण्यवैभव सेवकरूप से हो तो भले हो, उसका हम तिरस्कार न करें, परन्तु उसमें मोहित होकर सन्तुष्ट भी न हो जायें और चैतन्यवैभव को न भूल जाये; अर्थात् उस पुण्यवैभवको अपने चैतन्य वैभव से बाह्य जानकर, उसमें मूर्च्छित हुए बिना अपने चैतन्यवैभव में ही लीन रहे और अन्त में उस बाह्य वैभव को छोड़कर सिद्ध-परमात्मपद मे स्थिर रहें। वही अपना इष्ट, ध्येय और साध्य है;-ऐसा तीर्थंकर भगवन्तोंका जीवन हमे शिक्षा देता है।

भगवान श्रेयांसनाथ का मोक्षगमन होने के पश्चात-

प्रथम बलदेव-वासुदेव-प्रतिवासुदेव (विजय, त्रिपृष्ठ और अश्वग्रीव) हुए, प्रत्येक चौबीसी में २४ तीर्थंकर, १२ चक्रवर्ती, ९ बलदेव, ९ वासुदेव तथा ९ प्रतिवासुदेव होते हैं, इन कुल ६३ महापुरुषोंको ६३ शलाका पुरुष कहते हैं। वे सब यद्यपि मोक्षगामी तो होते है परन्तु उनमे से २४ तीर्थंकर नियमसे उसी भव में मोक्ष प्राप्त करते हैं; १२ चक्रवर्तियोंमे से अनेक तो उसी भव में मोक्ष प्राप्त करते है; कोई स्वर्ग में जाते हैं तो कोई नरक में भी जाते है बलदेव या तो उस भव मे मोक्ष प्राप्त करते हैं अथवा स्वर्ग में जाते हैं, नरक में नहीं जाते; ९ वासुदेव तथा प्रतिवासुदेव (पूर्व काल मे किये हुए भोग निदान के कारण) नरकमें जाते है और पश्चात अल्पभवमें मोक्ष प्राप्त करते हैं। महापुराण में ऐसे ६३ शलाका पुरुषों के जीवन चरित्र का तथा उनके पूर्व भवोंका वर्णन है, उनमें से अभी तक ११ तीर्थंकरोंका वर्णन पूरा हुआ। प्रथम दो चक्रवर्ती (भरत और सगर) का भी संक्षिप्त वर्णन हुआ। अभी तक एक भी बलदेव, वासुदेव तथा प्रतिवासुदेव नहीं हुए थे। (वे तीनों एक साथही होते हैं।) ११ वें श्रेयांसनाथ तीर्थंकर के मोक्षगमन के पश्चात् उनके तीर्थ में कितने ही वर्षों बाद, इस चौबीसी के प्रथम बलदेव-वासुदेव तथा प्रतिवासुदेव हुए। वासुदेव वे तीन खण्डके स्वामी अर्धचक्रवर्ती होते हैं। प्रथम वासुदेव का नाम ‘त्रिपृष्ठ’; वह अन्तिम तीर्थंकर महावीर का जीव और वही भगवान ऋषभदेवका पौत्र मरीचि। इस प्रकार ऋषभदेव, उनका पुत्र भरत और पौत्र मरीचि-यही जीव अनुक्रम से इस चौबीसी के प्रथम तीर्थंकर, प्रथम चक्रवर्ती और प्रथम अर्ध चक्री (तथा अन्तिम तीर्थंकर) हुए। उन त्रिपृष्ठ वासुदेव आदिका चरित्र इस पुस्तक में महावीर भगवान के पूर्वभवों मे तथा शान्तिनाथ प्रभुके पूर्वभवके वर्णन में पढ़ना।

(भगवान श्रेयांसनाथ तीर्थंकर के मोक्षगमन के पश्चात ५४ सागरोपम तक उनका शासन चला; परन्तु अन्तिम पल्य के तीसरे भाग जितने काल तक धर्म-परम्पराका विच्छेद हो गया। यह तिसरी बार धर्म विच्छेद हुआ। यह विच्छेद विजयार्द्ध-श्रेणीयों में लागू नही होता।

एक मजे की बात-श्रीमती इन्दिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री होनेपर भी दादी माँ के रूप में अपने पौत्रों को आनन्द से कहानियाँ सुनाती थी; तो हे मम्मी ! और हे दादी ! तुम भी अपने पुत्र पौत्रों को प्रतिदिन धर्म की कहानियाँ सुनाना… तुम्हें और बच्चोंको खूब आनन्द आयगा।

१२

भगवान वासुपूज्य

[१२]

चंपापुरी मंदरगिरि

भगवान वासुपूज्य

इस तीर्थंकर-चौबीसी के पाँच बाल ब्रह्मचारी तीर्थंकरोंमें जो सर्व प्रथम थे, जिनके पाँचो कल्याणक अंगदेश के चम्पापुरी राज्य में हुए और सर्वज्ञ होकर जिन्होंने समस्त विश्वका ज्ञान साम्राज्य प्राप्त किया, ऐसे हे वासुपूज्य देव ! मैं अपने अल्प तथापि सम्यक् मति-श्रुत ज्ञान द्वारा आपके महान सर्वज्ञपद की पूजा करता हूँ। आपकी स्तुति करते हुए समन्तभद्र स्वामी कहते हैं।

‘मयापि पूज्योल्पधिया मुनीन्द्रः दिपार्चिषा किं तपनो न पूज्यः’

-हे देव ! लोकमें अल्प प्रकाशी दीपक द्वारा महाप्रकाशी सूर्य की पूजा क्या नहीं होती ? - होती है, क्योंकि प्रकाश स्वरुप दोनों एक ही जाति के हैं; तो मेरा ज्ञान अल्पप्रकाशी होनेपर भी, वह आपके अतीन्द्रिय महाप्रकाशी केवलज्ञान की जाति का ही है इसलिये उस ज्ञान द्वारा मैं आपकी पूजा करता हूँ।

भगवान वासुपूज्य : पूर्वभव : रत्नपुरीके पद्मोत्तर राजा

चम्पापुरी के महाराजा वसु के पुत्र और वासव (इन्द्र) द्वारा पूजित, ऐसे हे वासुपूज्य स्वामी ! तीर्थंकर से पूर्वके भवमें आप पुष्करद्वीप में रत्नपुरी नगरी के महाराजा थे, तब आपका नाम पद्मोत्तर था। आपकी रत्नपुरी नगरी मे सम्यक्त्वादि रत्न के धारक धर्मात्मा जीव निवास करते थे; आप प्रजा के लिये कल्पवृक्ष समान थे; शास्त्र के ज्ञाता थे और जैनधर्मकी उपासना द्वारा आत्मतत्त्वको जानकर मोक्षके मार्ग मे गमन करते थे। आपकी नगरी में धर्म का साम्राज्य था। आपकी बुद्धि नीतिमार्ग में और आपका धन दान में लगा हुआ था। आपकी भक्ति जिन भगवान में ही थी, और आपका प्रचण्ड प्रताप शत्रुराजाओं के प्रति था, धर्मात्मा गुणीजनों के प्रति तो आप शांत एवं नम्र थे। आपके ऐसे सुन्दर गुणों से आकर्षित होकर लक्ष्मी भी आपके पास ही रहती थी।

यद्यपि आत्मानुभूतिके कारण आपका जीवन शांत और सतुष्ट रहता, तथापि मोक्षकी पूर्ण साधना के लिये संयम दशाकी भावना आपके चित्त मे सदैव रहती थी और उपादान के अनुसार निमित्त होता है- इस न्याय से आपको भी एक बार ऐसे उत्तम निमित्तका सुयोग मिला। आपकी रत्नपुरी के मनोहर उद्यान मे ‘युगंधरा’ जिनराज पधारे। परमभक्ति पूर्वक जिनराज के दर्शन करने से आपका चित्त अति प्रसन्न हुआ। प्रभुकी वाणीमें आपने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप मोक्षमार्ग का उपदेश सुना। उसमे रत्नत्रयवन्त साधु की वीतरागता का स्वरूप सुनकर आप वैराग्य मे झूलने लगे और देहादि सयोगकी -अनित्यता, अशरणता आदिका चिन्तन करने लगे। “इस ससार भ्रमण के दु खसे अब बस होओ, हमारे चैतन्य के एकत्व मे जो परमसुख है उसी को अब साधेंगे। अरे, ऐसे अस्थिर, क्षण भगुर तथा आकुलता के ही निमित्त इन इन्द्रिय विषयोका क्या प्रेम करना ? वे कभी तृप्ति देनेवाले नही है, तृप्ति तो अतर्मुख उपयोग द्वारा चैतन्य की शान्ति मे ही है।”-ऐसे वैराग्यपूर्वक, हे वासुपूज्य देव ! पूर्वभव मे युगधर स्वामी के चरणो मे आपने जिनदीक्षा ली, पद्मोत्तर महाराजा मिटकर आप मोक्षपदके साधक महात्मा बने, रत्नत्रयधारी साधु बने। अन्य अनेक राजाओने भी राजपाट छोडकर मोक्षमार्ग मे आपका अनुसरण किया। प्रभो ! रत्नत्रयसे आर्कषित होकर आपके मोक्षकी काललब्धि एकदम निकट आगई।

दीक्षा लेकर आप आत्मध्यान मे लवलीन रहने लगे। आपका ज्ञान भी विकसित होने लगा और केवलज्ञान से भेट करने हेतु दौडने लगा। आपके परिणामो की विशुध्दता भी वृध्दिगत होने लगी। दर्शन विशुध्दि आदि सोलह भावनाओ की उत्तम सम्पत्ति द्वारा तीर्थंकर प्रकृति भी आपने क्रय कर ली। अहा, जगत के जितने उत्तम पदार्थ थे उन सबको आपके गुणोके साथ रहने का मन हुआ, तब फिर हम भी आपके साथ ही क्यो नही रहे ! ?

हे वासुपूज्य स्वामी ! फिर तो आपने रत्नत्रय की अखण्ड आराधना सहित समाधिमरण किया और पद्मोत्तर मुनि की पर्याय छोड़कर आप महाशुक्रस्वर्ग मे इन्द्र हुए। हे देव ! फिर जब तीर्थंकर रुप मे आपका गर्भकल्याणक उत्सव हुआ और इन्द्र आपके माता-पिता का सन्मान करने आये तब उन इन्द्रोमे आप (महाशुक्र इन्द्र) भी साथ थे !!

इन्द्र पर्याय मे आप सोलह सागर तक रहे, आपको पद्मलेश्या थी, सोलह हजार वर्ष मे मात्र मानसिक अमृत का आहार लेते थे। सदैव चैतन्यामृत का अनुभव होने से पौद्गलिक अमृत की अभिलाषा शान्त होगई थी, इतना ही नही, अनेक देवागनाओके साथ रहनेपर भी उनके साथ शारीरिक कामभोग आपको कदापि नही था। मात्र परस्पर मधुर शब्दोमे ही आपकी वासनाएँ शात हो जाती थी।-इस पर से सिध्द होता था कि जिसका चित्त स्वय तृप्त है उसको बाह्य विषय भोग निरर्थक है। विषय भोगो की ओर तो दु खी आकुलित जीव ही दौड लगाते है। वहाँ नेत्रो के बिना चौध नरक तकका ज्ञान कर सके ऐसा शक्तिवान सम्यक अवधिज्ञान आपको वर्तता था, इसलिये वहाँ बैठे-बैठे भी आप मध्यलोक के तीर्थंकरो को देख सकते थे। वहाँ आपको कोई रोग-शोक नही थे, आपका आत्मिक जीवन भी सुखी था और बाह्य जीवन भी। शास्त्र कहते है कि चारो गतियो मे दु ख ही है, यह बात सच है.. किन्तु अज्ञानियो के लिये, आत्मज्ञानी को तो सर्वत्र सुख है, क्योकि सुख का भण्डार अपने में है वह उसमे जान लिया है। प्रभो ! वहाँ आपने असख्य तीर्थंकरो के पचकल्याणक महोत्सव मनाये और स्वर्ग मे धर्म चर्चा द्वारा कितने ही देवोको सम्यग्दर्शन की प्राप्ति करायी। हे प्रभो ! इस प्रकार आत्मसाधना सहित आपने महाशुक्र पर्याय मे असख्य वर्ष व्यतीत किये। जब उस देव पर्याय मे छह मास आयु शेष रही तब, मानो मुक्ति सुन्दरी अपने स्वयंवर हेतु आपको बुला रही हो, इस प्रकार आप मध्यलोकमें आने के लिये तैयार हुए। देवगति के भव पूर्ण करके, शेष रहे अन्तिम मनुष्यभवका भी अभाव करके परमात्मा बनने के लिये आप उत्सुक हुए। भव के अभाव का यह अन्तिम भव चम्पापुरी नगरी में था।

वासुपूज्य भगवानके पंचकल्याणक

प्रभो ! महाशुक्र के इन्द्रविमानमे बैठे-बैठे आप देख रहे हैं कि-यह है चम्पापुर नगरी। उसकी शोभा अद्भुत तो थी ही; उसमें भरतक्षेत्र के बारहवें तीर्थंकर रूपसे आपका अवतार होना था इसलिये उसकी शोभा में दिव्यता आ गयी। स्वयं कुबेर उस नगरी का शृंगार करने लगा, इतना ही नहीं..वहाँ प्रतिदिन करोड़ों रत्नों की वर्षा होने लगी। वह चम्पापुरी नगरी अंगदेश की राजधानी थी और वहाँ के महाभाग्यवान महाराजा थे वसुपूज्य। वे इक्ष्वाकुवंशी थे, उनकी महारानी का नाम जयावती था। आषाढ कृष्णा षष्ठी के उत्तम दिन जब उन जयावती महारानी ने सोलह मंगलस्वप्न देखे और आप स्वर्गलोक को छोड़कर माता जयावती की कुक्षि में अवतरित हुए उस समय इन्द्रोंने आकर महाराजा वसु तथा महारानी जयावती का तीर्थंकर के माता-पिता होने के कारण सन्मान किया। हे देव ! आपके कारण आपकी माता रत्नकुक्षिधारिणी बनीं, इतना ही नही, समस्त चम्पानगरी रत्नवती बन गई। आपके अवतार से बाह्य दरिद्रता तो दूर हुई, तथा जो धार्मिक दरिद्रता भरत क्षेत्र में आ गई थी वह भी नष्ट हो गई; क्योंकि आपके अवतार से पूर्व श्रेयांसप्रभु के शासन के अन्तभाग मे करोडों-अरबों वर्ष तक भरतक्षेत्र में जैनधर्म का जो विच्छेद था वह दूर हुआ और पुनः धर्मशासन प्रारम्भ हो गया।

हे देव ! फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशी के दिन चम्पापुरी मे आपका जन्म हुआ। आपके जन्म के हर्षोल्लास से देवलोक भी कंपित हो उठा और इन्द्रासन डोलने लगा। इन्द्रोंने आकर आपके जन्म का महोत्सव मनाया। धन्य हुई चम्पानगरी और धन्य हुआ भारतदेश ! वासु ऐसा जो इन्द्र, उसके द्वारा पूजित होने से आप सचमुच ‘वासुपूज्य’ थे.. और इन्द्र ने आपका नाम भी ‘वासुपूज्य’ रखा। आपका चरणचिह्न ‘भैंसा’ था। आपकी आयु बहत्तर लाख वर्ष, तथा शरीर की ऊँचाई सत्तर धनुष (७०० फुट) थी। जन्माभिषेक के पश्चात् स्वयं इन्द्राणीने स्वर्गलोक के आभूषणो से आपका शृंगार किया; अरे आपका शरीर तो स्वयमेव सर्वोत्कृष्ट सुन्दरता को प्राप्त था ही, उसकी शोभा के लिये कहाँ आभूषणो की आवश्कता थी ? परन्तु इन्द्रलोक मे उत्पन्न हुए उत्तम आभूषणों को अन्यत्र कहाँ रखा जाय ? उनके योग्य कोई उत्तम स्थान नहीं मिलने से, अन्त मे इन्द्राणी ने वे आपको पहिनाकर सन्तोष माना। आपकी शोभा कहीं उन आभूषणों से नही थी, उलटे आपके स्पर्श से वे आभूषण भी सुशोभित हो उठे ! माता-पिता के हर्ष की तो कोई सीमा नही थी। आप जैसे तीर्थंकर जिसकी गोदमे विराजते हो और आँगनमें खेलते हों, उनके परम भाग्य की क्या बात ! समस्त राज्य में गुण वैभव की वृद्धि होने लगी। जिस प्रकार ‘मघा’ नामक नक्षत्र की उत्तम वर्षा होने से ढेरो अनाज उत्पन्न होता है उसी प्रकार आपका अवतार होने से धर्मवृद्धि होने लगी थी; प्रजाजन सद्गुणों का पालन करते थे।

हे देव ! धीरे-धीरे बाल्यकाल व्यतीत करके आपने युवावस्था में प्रवेश किया। आपका अद्भुत रूप सबको मुग्ध करता था और उससे आकर्षित होकर कामदेव भी आपके शरीर में प्रवेश करना चाहता था, परन्तु आपके हृदय मे स्थित वैराग्यादि सद्गुणोंने उस दुष्ट कामदेवको अंतर में प्रविष्ट नहीं होने दिया, इसलिये आप कामवासना से मुक्त बालब्रह्मचारी ही रहे। यद्यपि आपके माता-पिता को पुत्रवधू का सुख देखने की अति लालसा थी, परन्तु उन्हें आपने निराश किया; निराश करने पर भी आपने अकेले ही अपने दिव्य रूप-गुणों द्वारा माता-पिताको ऐसी तृप्ति दी कि उन्हें कोई खेद नहीं हुआ। विषय-भोगों के बिना ही सुख और आनन्द होता है-वह आपने अपने जीवन द्वारा जगत को बतला दिया। चम्पा नगरीके युवराज के रुपमें आप अठारह लाख वर्ष तक रहे; तथापि चैतन्यवैभव से रंगा हुआ आपका चित्त राजवैभव से नहीं रँगा था, उससे अलिप्त ही रहता था। अपने श्रीमुख से अनेक प्रकार की धर्मचर्चा द्वारा तथा अपनी दिव्य मुद्रा के दर्शनों से माता-पिता एवं प्रजाजनों में आपने सर्वत्र आनन्द प्रसारित किया।

तत्पश्चात् एक बार फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशी आयी। वह आपके जन्म का मंगल दिवस था। प्रजाजनों ने आपका जन्मोत्सव खूब धामधूम से मनाया। स्वर्गलोक से अनेक पूर्वपरिचित देवमित्र भी जन्मोत्सव मे आये। उस समय चम्पानगरी का श्रृंगार वास्तव मे अद्भुत था। लोग नृत्य-गान द्वारा अपना हर्षोल्लास व्यक्त कर रहे थे। आप यह सब ठाट बाट देख रहे थे परन्तु आपका चित्त कहीं अंतर की गहराई मे उतर रहा था। इतने में वह शोभा देखते-देखते अचानक पूर्वभव में इन्द्र लोक में देखी हुई अद्भुत शोभा का स्मरण हुआ; जातिस्मरण ज्ञान मे अपने पूर्वभव का इन्द्रभव तथा उससे पहले के पद्मोत्तर राजा का भव आपको साक्षात् जैसा ही दिखाई दिया। तुरन्त ही आपका चित्त मसार से विरक्त हुआ कि-"अरे, कहाँ गये स्वर्ग लोक के वे दिव्य वैभव ! और कहाँ गये वे दिव्य शरीर !! इन क्षणभंगुर विषयों तथा शरीर मे आसक्ति कैसी ? निर्बुद्धि जीव व्यर्थ ही विषयो मे आसक्त होकर ससार मे भ्रमण करते हैं। शरीर भले ही चाहे जितना सुदर हो, निरोगी शोभायमान हो, असख्य वर्ष की आयु वाला हो, तथापि वह चैतन्य स तो भिन्न ही है, उसका वियोग निश्चित ही है, फिर उसमे आसक्त होकर स्वय ही अपने आत्मा को बधन किस लिए करना। मै शरीर और सयोगो के मोह बधन को तोड कर अपने आत्मा को इस भव भ्रमण से मुक्त करूँगा. मेरी चेतना अब जागृत हो उठी है, इसलिए आज ही ससार को त्याग कर मोक्ष की साधना के लिए मै मुनिदशा अंगीकार करूँगा ‘’

अहो देव ! ऐसे उत्तम वैराग्य विचारों द्वारा आपने तो जन्मदिन को दीक्षा का दिन बना दिया, हर्ष के अवसर को परम वैराग्य का अवसर बना दिया; तुरत जिन दीक्षा लेने का आपने अटल निर्णय किया। लोग आश्चर्य मे पड़ गये कि-अरे, अचानक यह कैसा महा परिवर्तन हुआ ? माता-पिता भी विस्मित हो गये। आपकी वैराग्य-परिणति को वे जानते ही थे और यह भी जानते थे कि आप तीर्थंकर होने के लिए अवतरित हुए है। इस लिए मुनि मार्ग में जाते हुए आप को रोकने की उन्होंने कोई चेष्टा नहीं की। हमारा पुत्र अब परमात्मा बनने के लिये मोक्षमार्ग मे आगे बढ़ रहा है-ऐसा समझ कर वे अनुमोदना सहित मौन रहे, उन्होंने न खेद किया.. न हर्ष !

हे वासुपूज्य देव ! आप तो चैतन्यरस में निमग्न होकर बारह वैराग्य भावनाओं का चिन्तवन कर रहे थे; उसी समय ब्रह्मलोक से लौकान्तिक देव चम्पापुरी मे आये और आप के वैराग्य की प्रशंसा करके स्तुति की। उसी समय स्वर्ग के देव ‘रत्नमाला’ नामक पालकी लेकर दीक्षाकल्याणक मनाने के लिए आ पहुँचे और दीक्षा प्रसग का अभिषेक, श्रृंगार आदि मगलविधि की। आप “रत्नमाला” पालकी में आरूढ़ होकर “रत्नत्रय” की माला पहनने के लिये वन मे चल दिये। मनोहर वनमें जाकर आपने सर्वसंग का परित्याग किया-मुकुट छोड़ा और हार छोड़े, वस्त्र भी छोड़े और सिर के केशों को भी स्वहस्त से उखाड़ दिया; उस समय दिगम्बर दशा में आपकी वीतरागता किसी अनुपम स्वरूप में खिल उठी। आपकी निर्विकार शान्त मुद्रा देखकर हजारों-लाखों जीवों को निर्विकार चैतन्य सुख की प्रतीति हो गयी। आप तो “ॐ सिद्धेभ्यः नमः” ऐसे उच्चारण पूर्वक आत्मध्यान में लीन हुए; शुद्धापयोग से निज परम तत्त्व की अनुभूति में एकाग्र हुए। उसी समय प्रत्याख्यान कषाय दूर हो गये; आपको सातवाँ गुणस्थान तथा मनःपर्याय प्रकट हुआ, अनेक लब्धियाँ भी प्रकट हुई। सैकड़ों राजाओं ने तथा अन्य कितने ही मुमुक्षु जीवों ने भी आपके साथ ही संसार छोड़कर संयम दशा अंगीकार की और धर्म का महान उद्योत हुआ। दो उपवास के पश्चात् फाल्गुन शुक्ला प्रतिपदा के दिन आप नगरी में पधारे और “सुन्दर” नाम के राजा ने आपको प्रथम आहारदान देकर अपने आत्मा में “तद्भवमोक्षगामी” की मुद्रा लगा दी। उस समय देवों ने भी आश्चर्य कारी मंगल वाद्य तथा पुष्पवृष्टि आदि द्वारा अपना हर्ष प्रकट किया।

हे वासुपूज्य देव ! आत्मध्यान सहित मुनिदशा में विचरते हुए आप आत्मशुद्धि में अत्यंत वृद्धि कर रहे थे। इसलिए आप पूरे एक वर्ष भी छद्मस्थ दशा में नहीं रहे; फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशी को आप मुनि हुए और भाद्र पद कृष्णा द्वितीया को आप केवलज्ञान प्रकट करके सर्वज्ञ परमात्मा बन गये। चम्पापुरी के जिस मनोहर वन में आपने दीक्षा ली थी उसी दीक्षा वन में आपने केवलज्ञान प्रकट किया। जिस वन में चौथा ज्ञान प्रकट हुआ था उसी वन में पाँचवाँ ज्ञान प्रकट हुआ। जिस वन में छठवाँ-सातवाँ गुणस्थान प्रकट हुआ था उसी वन में ८-९-१०-१२ और १३ वाँ गुणस्थान आपने प्रकट किया। धन्य हुई चम्पानगरी कि जहाँ आपके पाँचो कल्याणक मनाये गये। वाह प्रभो ! आप सर्वज्ञ हुए वह देखकर हम जैसे साधकों का हृदय अतीन्द्रिय आनन्द के प्रति उल्लासित हो जाता है। हे सर्वज्ञ परमात्मा ! इन्द्र अपने वैभव सहित आपकी पूजा करने आ पहुँचे। इन्द्र ने कुबेर को आज्ञा दी कि हे कुबेर ! इन्द्रलोक के उच्च से उच्च वैभवों का उपयोग करके तीर्थंकर प्रभु के समवसरण (धर्म सभा) की रचना करो। तद्नुसार आपके दिव्य समवसरण की ऐसी अद्भुत रचना हुई कि उसे देखकर इन्द्र भी आश्चर्यचकित हो गये। अरे ऐसी अलौकिक रचना करने का सामर्थ्य हमारा नहीं था, यह तो तीर्थंकर के अचिंत्य पुण्य का ही प्रताप है ! अहो देव ! उदयभाव जनित समवसरण की ऐसी अद्भुतता है, तो क्षायिक भाव जनित आपके केवलज्ञान की अचिंत्य महिमा का क्या कहना !!

उस अद्भुत समवसरण के बीच, उससे भी अद्भुत शोभावान आप विराजते थे। देव, मनुष्य और तिर्यंच आपकी धर्मसभा मे आ पहुँचे। आपके दर्शन करके जीव वीतरागता की प्रेरणा प्राप्त करते थे और क्रूर प्राणी भी हिंसक भाव छोड़कर शांत हो जाते थे। हे तीर्थंकर वासुपूज्य ! आप पुनः वासु-पूज्य (इन्द्र द्वारा पूजित) बने. और सहज दिव्य ध्वनि द्वारा आपने जगत के भव्य जीवों को मोक्षमार्ग बतलाया। पहले बाल ब्रह्मचारी रहकर लाखों वर्ष तक आपने चम्पापुरी का राज किया, अब सर्वज्ञ होकर सारे जगत में ५४ लाख वर्ष तक धर्मसाम्राज्य, का प्रवर्तन किया और कितने ही जीवों को मोक्ष के मार्ग में लगाया। अहा, आपने जीवों को मोक्षमार्ग का जो सुख प्रदान किया उसकी महिमा का क्या कहना ! हे देव ! आपकी धर्म सभा में “धर्म वीर” आदि ६६ गणधर आपको वन्दन करते थे; १२००० पूर्वधारी-श्रुत केवली थे; ३९२०० शिक्षक उपाध्याय थे; १०,००० विक्रिया ऋद्धिधारी तथा ४२०० वादी थे। तथा ५४०० अविधि ज्ञानी और ६००० मनःपर्ययज्ञानी मुनिवर थे। तथा ६००० केवलज्ञानी-अर्हंत परमात्मा भी गगन-मंडल में आपके साथ ही धर्मसभा को सुशोभित कर रहे थे। अहा, एक साथ हजारों अर्हंत देवों के समूह सहित आप तीर्थंकर रूप में अद्भुत शोभायमान होते थे। आपके श्री मण्डप में कुल ७२००० मुनिवर और १०६००० आर्यिकायें थीं। आपका वह वैभव देखकर अनेक जीवोंका मान तथा मिथ्यात्व मिट जाता था और वे सम्यक्दर्शन प्राप्त करते थे। ऐसे धर्म प्राप्त दो लाख श्रावक और चार लाख श्राविकायें समवसरण में आपकी उपासना कर रहे थे; देवों का तो कोई पार नहीं था और सिंह, सर्प, शशक, हिरण आदि तिर्यंचों की संख्या भी बड़ी विशाल थी।

हे तीर्थंकर वासुपूज्य देव ! ऐसे महान धर्मवैभवसहित आपने ५४ लाख वर्ष तक भरत क्षेत्र में विहार किया और धर्मोपदेश द्वारा लाखों-करोड़ों जीवों को मोक्ष के मार्ग मे लगाया आपके चतुर्विध संघ से मोक्षमार्ग की सरिता प्रवाहित हो रही थी। इस प्रकार देश-देश में बिचरण करके धर्मचक्र का प्रवर्तन करते-करते जब एक हजार वर्ष की आयु शेष रही तब आप पुनः चम्पापुरी राज्य में पधारे और अंतिम मास में रजतमाला नदी के किनारे मंदार गिरि के मनोहर उद्यान मे स्थिर हुए. .आपका बिहार एवं वाणी रुक गये ..और भाद्र पद शुक्ला चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी) को सायंकाल संपूर्ण योग निरोध करके ९४ मुनिवरों सहित अ.प लोकाग्र में-सिद्धालय मे सिधारें।

वासुपूज्य जिन सिद्ध भये चम्पापुर के देश,
मंदारगिरि पर पूज हूँ बालब्रह्म जिनेश।

प्रभो ! आपको मोक्ष की परमदशा प्राप्त हुई, विजय के अभिलाषी सामान्य राजा संधि, विग्रह आदि छह गुणों द्वारा भी विजय प्राप्त कर लेते है, तो फिर जिन्होने ८४ लाख शीलगुण पूर्ण किये हैं ऐसे आपको सिद्धि (मुक्ति) क्यों प्राप्त नहीं होगी ? प्रभो, परम मोक्षपद प्राप्त करके आप सिद्धालय में विराजमान हैं, तथापि हे सिद्ध प्रभो ! हम जैसे साधकों के हृदय मे भी आप विराज रहे है। देवों ने आपका निर्वाणमहोत्सव मनाया। आपका पंचमकल्याणक मनाने हेतु इन्द्रादिदेव इस चम्पापुरी राज्य मे पाँचवीं बार आये। आपके पाँचो कल्याणकों मे ‘चम्पा’ धन्य-धन्य हुई और हम साधक भी आपकी उपासना से धन्य हुए !

प्रभो ! आपने स्व-पर तत्त्वों की भिन्नता बतलायी और प्रत्येक तत्त्व को सत्-असतरूप तथा उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यरूप बतलाया। तदनुसार आप भी भव-पर्यायो से असत् (व्ययरूप) होने पर भी मोक्षपर्यायो से सतरूप हो, ध्रुव भी आप हो और उत्पादव्यय भी आप ही हो। हे ब्रह्मचारी देव ! ऐसा अनेकान्त तत्त्व बतलाकर आपने हमे मिथ्यामार्ग से हटाकर मोक्ष के मार्ग में लगाया फिर हम क्यो आपको नही पूजे ? धर्मात्माओं द्वारा आप पूज्य हो। पहले आप पद्मोत्तर राजा थे तब भी युगंधर जिनराजके उपदेश द्वारा विरक्त होकर आपने राज्य छोड़ा और रत्नत्रय मे उपयुक्त हुए, फिर महाशुक्र स्वर्ग की दिव्य विभूति मे भी आप मूर्च्छित नहीं हुए; अन्त मे चम्पापुरी का साम्राज्य छोड़कर तथा समस्त ससार को भी छोड़कर आपने अक्षय मोक्षसाम्राज्य को प्राप्त किया। ‘वासव’ द्वारा पूजित ऐसे हे वासुपूज्य ! आप मात्र वासव द्वारा नही, ‘हरि’ द्वारा भी पूज्य हो आपके चरणो मे ‘हरि’ वन्दन करता है।

[इतिश्री वासुपूज्य तीर्थंकर का मगल पुराण पूर्ण हुआ ']

चम्पापुरी (मन्दारगिरि) परिचय

चम्पापुरी अंग देश की मुख्य नगरी, वासुपूज्य भगवान के पाँचों कल्याणक यहाँ हुए। निर्वाणप्राप्ति चम्पापुरी के उद्यानमें (भागलपुर से ३० मील दूर) मन्दारगिरि पर्वत के ऊपर हुई। “बाँसी” रेल्वे स्टेशन से दो मील दूर मदारगिरि सिद्धक्षेत्र है। यह शुद्ध दिगम्बर जैन तीर्थ है। मंदारगिरि पर्वत अखण्ड एक पत्थर का, अतिसुन्दर है। पर्वत के समीप “पापहारिणी” नामक मनोहर सरोवर है।

❁ उपसर्ग विजेता और मोक्षगामी महात्मा सुदर्शन भी इस चम्पानगरी में ही हुए।

※ मिथिलानगरी के राजा पद्मरथ दृढ़ सम्यक्त्वी थे; उन्होंने चम्पापुरी में विराजमान वासुपूज्य तीर्थंकर की महिमा सुनी और तत्काल दर्शन करने चल पड़े। मार्ग में भिन्न-भिन्न प्रतिकूलताओं द्वारा देव ने उनकी भक्ति की परीक्षा की, परन्तु पद्मराजा डिगे नहीं…और अन्त में चम्पापुर वासुपूज्य प्रभु के चरणों में पहुँचे; वहाँ प्रभु के दर्शन करके तथा उपदेश सुनकर संसार से विरक्त होकर प्रभुचरणों में मुनिदीक्षा ली, और प्रभु के गणधर होकर मोक्ष प्राप्त किया… ※ चम्पानगरी मे राजकुमारी रोहिणी जो हस्तिनापुरी के राजपुत्र अशोक की रानी थी; वे दोनों वासुपूज्य प्रभु के दर्शन करने चम्पापुर आये; वहाँ महाराज अशोक तो भगवान का उपदेश सुनकर मुनि हो गये, और प्रभु के गणधर बने। रोहिणी भी आर्यिका बनकर अच्युत स्वर्ग मे देवरूप से उत्पन्न हुई।

※ चम्पापुरी मे धर्मघोष मुनिको एक महीने के उपवास थे; पारणे के समय उपसर्ग आया; उस उपसर्ग को जीतकर केवलज्ञान प्राप्त करके वहींसे मोक्ष प्राप्त किया।

※ पाँच पाण्डवो का ज्येष्ठ भ्राता कर्ण चम्पापुरी का राजा था। ※ जिसके शील के प्रताप से घड़े मे बन्द नाग हार बन गया था, वह सती सोमा; ※ नि काक्ष गुण मे प्रसिद्ध सती अनन्तमती; ※ कुष्ठरोगी से वैरागी बने राजा श्रीपाल;

-वे सब भी इसी चम्पानगरी के रत्न थे। जिनके गुणो के सौरभ से आज भी चम्पानगरी
गौरवान्वित होती है।

※ भगवान महावीर भी चम्पानगरी मे पधारे थे।

※ सोनागढ के संत कानजीस्वामी ने हजारो मुमुक्षु भक्तोंसहित चम्पापुरी-मन्दारगिरि की यात्रा की थी तथा वासुपूज्य के जिनबम्ब का अभिषेक किया था।

[इतिश्री चम्पापुरी तीर्थ-महिमा]

वासुपूज्य भगवान के समय में हुए, द्वितीय वासुदेव- द्विपृष्ठ, बलदेव-अचल,

प्रतिवासुदेव-तारक

ग्यारहवे श्रेयासनाथ तीर्थंकर के मोक्षगमन पश्चात् उनके शासन मे प्रथम वासुदेव-बलदेव हुए; तत्पश्चात् वासुपूज्य तीर्थंकर के समय मे द्वितीय वासुदेव आदि हुए; उनकी कथा भव्य जीवों को जीव के परिणाम की विचित्रता बतलाकर संसार के प्रति वैराग्य जागृत करती है।

दूसरे वासुदेव का नाम द्विपृष्ठ था, पूर्वभव में वह भरतक्षेत्र के कनकपुर का राजा सुषेण था। उसके राज दरबार मे गुणमंजरी नामकी एक अति सुन्दर नर्तकी थी। विध्यशक्ति नामक राजा उस नर्तकी पर मोहित हुआ और युद्ध में सुषेण को पराजित करके उस नर्तकी को ले गया। अरेरे, पुण्य क्षीण हो जाने पर प्रिय वस्तु भी क्षण में छूट जाती है।

जिस प्रकार हाथी के दन्तशूल टूट जाने पर उसकी शोभा नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार मानभंग हुए राजा सुषेण का हृदय टूट गया; राज्य में कहीं भी चैन नही मिला। अत में, एक बार सुव्रत जिनेन्द्र का धर्मोपदेश सुनकर उसका चित्त संसार से विरक्त हुआ और उसने जिनदीक्षा धारण कर ली। परन्तु एक बार शत्रु को देखकर क्रोध आया और स्वधर्म को भूलकर मिथ्यात्वशल्यपूर्वक उसने धर्म के फल में भोगों की इच्छा की, तथा ‘परभव’ मे मैं अपने शत्रु को मारूँगा’-ऐसा पाप-संकल्प किया। वह मरकर संयम-तप के कारण प्राणत नामके १४ वें स्वर्ग में देव हुआ।

जिन सुव्रत-जिनेन्द्र के धर्मोपदेश से उस सुषेण राजाने दीक्षा ली थी, उन्हीं सुव्रत-जिनेन्द्र के धर्मोपदेश से वायुरथ नामके राजाने भी जिनदीक्षा ली थी और समाधिमरण करके वह भी प्राणत स्वर्ग में ही उत्पन्न हुआ। दोनों जीव असंख्यात वर्षतक प्राणत स्वर्ग में रहे।

वहाँ से आयु पूर्ण होने पर वे दोनों जीव, भरतक्षेत्र में जब भगवान वासुपूज्य विचरते थे तब, द्वारावती नगरी में ब्रह्मराजा के पुत्र द्विपृष्ठ वासुदेव तथा अचल बलदेव हुए। दोनों का मिलन गंगा-यमुना जैसा था। जिस प्रकार एक गुरु द्वारा दी जा रही विद्या का सेवन शिष्य जन बिना किसी भेदभाव के भाग किये बिना करते हैं, उसी प्रकार वे दोनों भाई बिना किसी भेदभाव के राज्य का उपभोग करते थे; परन्तु उनमें विशेषता यह थी कि-अचल बलभद्र तो आत्मज्ञान के संस्कारसहित होने से विषय-भोगों में कहीं सुख माने बिना मोक्ष को साध रहे थे; जबकि द्विपृष्ठ वासुदेव पाप के निदान द्वारा आत्मज्ञान से भ्रष्ट हुआ होने से विषय-भोगों मे लवलीन रहता था और नरकगति के पापों का बंध करता था। देखो, दोनो भाई साथ रहकर एकसमान भोगोपभोग करते हुए भी परिणाम मे कितना अंतर !! एक तो मोक्ष की साधना कर रहा है और दूसरा नरक की ओर जा रहा है !! यह जानकर भव्य जीवों का चित्त विषय-भोगों से भयभीत होकर मोक्षसाधना मे लगता है।

अब, द्विपृष्ठ वासुदेव का पूर्वभव का शत्रु विध्य राजा का जीव भी भवभ्रमण करता हुआ किसी कारणवश वैराग्यको प्राप्त हुआ और धर्म अंगीकार करके पुन- भोगो की आकाक्षा द्वारा धर्म से भ्रष्ट हुआ; वह भरतक्षेत्र मे ‘तारक’ नामका अर्धचक्री हुआ, उसे दैवी सुदर्शनचक्र प्राप्त हुआ था और तीन खण्ड के हजारों राजाओं को उसने अपना दास बना लिया था, परन्तु अभी द्विपृष्ठ अभी अविजित था, इसलिये वासुदेव-बलदेव को भी अधीनस्थ करने की इच्छा से उसने द्वारावती को दूत भेजकर कहलाया कि-हमारी आज्ञा स्वीकार करके तुम्हारे पास गधहस्ती नाम का जो विशाल हाथी है 'वह शीघ्र हमारे पास भिजवा दो, नहीं तो युद्ध के लिये तैयार रहो।

दूत की बात सुनते ही पूर्वभव के वैर के संस्कारवश द्विपृष्ठका क्रोध भड़क उठा और उन दोनो के बीच महान युद्ध हुआ। राजा तारक ने द्विपृष्ठ पर सुदर्शनचक्र फेंका; परन्तु द्विपृष्ठ के पूर्वपुण्य के कारण उस चक्रने उसका वध नही किया, उलटा शांत होकर उसके आधीन हो गया। उत्तेजित द्विपृष्ठने भयंकर क्रोधवश उसी चक्रद्वारा तारक-प्रतिवासुदेव का शिरच्छेद करके तीन खण्ड का राज्य प्राप्त कर लिया। तारक का जीव मरकर सातवें नरक मे गया।

इस प्रकार द्विपृष्ठ तथा अचल दोनों भाई इस भरतक्षेत्र में द्वितीय वासुदेव-बलदेव हुए। उन्होंने तीनो खण्ड की दिग्विजय की, लौटते समय मार्ग मे चम्पापुरी नगरी आयी; वहाँ वासुपूज्य तीर्थंकर विराजमान थे; उनके दर्शन करके दोनों को अत्यन्त हर्ष हुआ। वहाँ से द्वारावती आकार दोनों भाइयो ने अनेक वर्ष तक तीन खण्ड का राज्य भोगा। अन्त में, द्विपृष्ठ का जीव तीव्र भोगलालसापूर्वक रौद्रध्यान से मरकर सातवें नरक में गया। भाई के वियोग से अचल बलभद्र को अति शोक हुआ। द्वारावती में भगवान वासुपूज्य का आगमन होने पर उनके धर्मोपदेश से उनका चित्तशांत हुआ और संसार से विरक्त होकर जिनदीक्षा धारण कर ली, आत्मसाधना द्वारा केवलज्ञान प्रगट किया और गजपंथा सिद्धक्षेत्र से उन्होंने मोक्षप्राप्त किया।

अरे, देखो तो सही विचित्रता ! दो भाइयोंने पुण्य द्वारा तीन खण्ड की विभूति का एक साथ उपभोग किया, परन्तु एक तो ऊर्ध्वपरिणाम द्वारा उस पुण्यविभूतिको छोड़कर मोक्षमें गये और दूसरा अधोपरिणाम द्वारा उस पुण्यविभूति को छोड़कर सातवें नरक में गया ! इसलिये अपनाहित चाहनेवाले बुद्धिमान जीवों को विषयों की वासना तथा पापभाव छोड़कर मोक्षसुख हेतु धर्म का सेवन करना चाहिये। तीर्थंकर का योगप्राप्त होने पर भी हृदय से विषयभोगों का शल्य नहीं छूटा तो वह त्रिखण्डाधिपति भी भयंकर दुर्गति को प्राप्त हुआ…इसलिये हे जीव ! तू जागृत हो, धर्म का सुअवसर प्राप्त करके विषयों में मत अटक जाना; आत्मा का वीतरागी सुख विषयरहित है, उसका विश्वास करके उसकी साधना करना।

[इतिश्री वासुपूज्य तीर्थंकर के समय में हुए द्वितीय वासुदेव-द्विपृष्ठ, बलदेव-अचल, तथा प्रतिवासुदेव-तारक की कथा यहाँ समाप्त हुई।]

* * * * हे परमोपकारी गुरु कहान ! चौबीस तीर्थंकर भगवन्तों का यह महापुराण लिखते हुए प्रत्येक पृष्ठ में आपका स्मरण होता है। आपने मुझे जैन धर्म दिया इसलिये ऐसे तीर्थंकर भगवन्तों की मुझे प्राप्ति हुई और आपने जो उत्तम बोध दिया उसीसे तीर्थंकर भगवन्तों का जीवनरहस्य जानने में आया। आपके प्रताप से ही यह सब हुआ है, इसलिये यह तीर्थंकरों का महापुराण भी आपके द्वारा ही लिखा जा रहा है-ऐसा मैं मानता हूँ। तीर्थंकरों का मार्ग देकर आपने परम उपकार किया है। आप भी भावी तीर्थंकरों की पंक्ति में ही विराजमान हो न !

त्रिकालवर्ती तीर्थंकर भगवन्तों को नमस्कार !

हे विमल-वाहन देव ! आपका नाम सार्थक है, क्योकि "विमल वाहन पर आरूढ़ होकर आपने मोक्षपुरी में प्रयाण किया। कैसा है आपका विमल-वाहन ?

सम्यक्श्रद्धा और सम्यक्ज्ञान यह दो जिसके दंतशूल है; अनन्त पवित्र गुण जिसका शरीर है, चार आराधना जिसके चार पग है, शुद्धोपयोग रूप धर्म जिसकी विशाल सूँड़ है; ऐसे महान निर्दोष-विमल हाथी को वाहन बनाकर, तथा “ज्ञायक भाव” को ध्येय रुप रखकर, आपने रत्नत्रयरूप सन्मार्ग मे गमन किया और पाप-शत्रुओं को जीतकर मोक्षपुरी मे प्रवेश किया.. इसलिये सचमुच आप ‘विमल-वाहन’ है। (पहले आप धातुकी-द्वीप मे पद्मसेन राजा थे और पश्चात मुनि होकर आठवे स्वर्ग के इन्द्र हुए, उस इन्द्रपद को भी छोड़कर आप विमल तीर्थंकर हुए, और वर्तमान सिद्धपद मे विराज रहे है।)

परम इष्ट ऐसे हे प्रभो ! इस महापुराण द्वारा आपको वन्दन करता हूँ।

१३

भगवान विमलनाथ

भगवान विमलनाथ

शुद्ध सम्यक्त्वादि विमल रत्नत्रय द्वारा विमल ऐसे मोक्ष पद को प्राप्त हे विमल जिन ! विमलभाव से आपके स्वरूप का चिन्तन करते हुए हमारे रत्नत्रय भी विमल होते हैं; इसलिये इष्ट रूप हे विमल देव ! आपको विमल भाव से नमस्कार करके आपका विमल चरित्र कहता हूँ।

(विमलनाथ-पूर्वभव : विदेह में राजा पद्मसेन)

मध्य लोक में मनुष्य क्षेत्र और मोक्ष प्राप्त करने की भूमि ढाईद्वीप है-एक जम्बूद्वीप; एक धातुकी खण्डद्वीप और आधा पुष्कर द्वीप। उनमें से दूसरे द्वीप के पश्चिम भाग में विदेह क्षेत्र की सीतोदा नदी के किनारे “रम्यक” नाम का सुन्दरदेश है। अपने चरित्र नायक भगवान विमलनाथ पूर्वभव में रम्यक नगरी के राजा थे। उनका नाम था पद्मसेन। उस सुन्दर नगरी में एक दिन सर्वगुप्त नाम के केवली भगवान पधारे। राज्य का उद्यान एकदम फलफूलोंसे खिल उठा, चारों ओर शीतलता और शान्ति छा गई। राजा पद्मसेन भक्तिपूर्वक केवलीप्रभु की वन्दना करने गये; उनका धर्मोपदेश सुना। संसार के दुखोंका वर्णन सुनकर उनका चित्त भव से भयभीत हो गया और अब इस भवचक्र का अन्त कब आयेगा ? ऐसा चिन्तवन करने लगे। इतने में भगवान की वाणी में आया कि "यह पद्मसेन राजा निकटभव्य है, और अब इस संसार में उनको मात्र दो भव शेष है। एक भव पश्चात वे तीर्थंकर होंगे और उसी भव में मोक्ष जायेंगे।

सर्वज्ञ परमात्माके श्रीमुख से अपने भविष्य की ऐसी महान मंगल बात सुनते ही राजा पद्मसेन को अपार आनन्द हुआ। अहा, अपने मोक्ष की बात सुनकर भव्य को जो प्रसन्नता होगी उसका क्या कहना !! दो भव के बाद मोक्ष… और वह भी तीर्थंकर होकर .. फिर उन महात्मा को हर्ष क्यों नहीं होगा !! “अहा, मानों वर्तमान में ही मैं तीर्थंकर होऊँ”- ऐसा महान उत्सव उन्होंने मनाया। लाखो प्रजाजनों ने भी अपने महाराजा को भावी तीर्थंकर के रूप में देखकर अपार हर्षपूर्वक उत्सव में भाग लिया। अहा, हम एक भावी तीर्थंकर के साथ रहते है ऐसे उत्तम भावपूर्वक “द्रव्य तीर्थंकर रूप में” उनके दर्शन करते हुए अनेक जीवों की धर्मभावना पुष्ट हुई। वास्तव में रम्यक नगरी के प्रजाजनों के लिये एक गौरव की बात थी कि एक ही भव पश्चात तीर्थंकर होनेवाले महात्मा की छत्रछाया में वे निवास करते थे। (और गुजराती में इस पवित्र पुराण के लेखक हरि को भी ऐसा ही महान पुण्य गौरव प्राप्त हुआ है कि-तीन ही भव पश्चात तीर्थंकर-गणधर होने वाले महात्माओं के सहवास में रहकर आत्मसाधना सहित यह पुराण लिखा जा रहा है।) भवचक्र से अति भयभीत तथा मोक्ष के लिये परमउत्सुक ऐसे उन राजा पद्मसेन ने सर्वगुप्त केवली के निकट जिन दीक्षा ग्रहण की। बारह अंग का ज्ञान किया, दर्शनविशुद्धि आदि सोलह भावनायें भायी; उनको तीर्थंकर-प्रकृति सहित उत्तम पुण्यकर्मोंका संचय हुआ। यद्यपि जीव को कर्मों का संचय हो वह अच्छा नहीं है, परन्तु आराधकभाव सहित वर्तते हुए उस जीव को जिस पुण्य कर्म का संचय हुआ वह ऐसा था कि जो उदय काल में आत्मसाधना में विघ्नरूप न हो; और तीर्थंकर प्रकृति का उदय तो नियम से केवलज्ञान के साथ अविनाभावी है, इसलिये तीर्थंकर प्रकृति का आगमन तो केवलज्ञान की दूती के समान है … वह आकर कहती है कि अब शीघ्र केवलज्ञान महाराजा पधार रहे है !!

इस प्रकार, जिन्होंने केवलज्ञान को निकट बुला लिया है ऐसे वे पद्ममुनिराज घोर आराधना सहित समाधिमरण करके सहस्रार नामक देवलोक में इन्द्र हुए। स्वर्गलोक की विभूतियाँ देखकर “अरे यह सब क्या है”- ऐसा आश्चर्य हुआ और अवधिज्ञान से उन्होंने जान लिया कि मैंने पूर्वभव में धर्म की उपासना की थी उसके पुण्य का यह फल है। ऐसा जानकर उनका चित्त धर्म में तत्पर हुआ और भक्तिपूर्वक जिनपूजा आदि करने लगे यद्यपि उनके अनेक देवांगनाये थी, परन्तु कामवासना इतनी मन्द थी कि देवांगनाओं को मात्र देखने से उनका चित्त शात हो जाता था; और देवांगनाओं का चित्त भी उनका अद्भुत रूप देखकर तृप्त हो जाता था। इस प्रकार कामभोग न होने पर भी बिचले देवोंकी अपेक्षा वे अधिक सुखी थे; इससे सिध्द होता है कि जीव को इन्द्रिय-विषयों से सुख नहीं है परन्तु उन विषयोंकी निवृत्ति से सुख है। सुखरूप से जीव स्वयं अपने भाव से ही परिणमता है, क्योंकि सुख वह जीव का ही स्वभाव है। शरीर में कहीं सुख नहीं है, और शरीर कहीं सुख रूप नहीं होता।

ऐसा भेदज्ञान उन महात्मा को देव पर्याय मे भी निरन्तर वर्तता था; इसलिये स्वर्गलोक के दिव्य वैभव में रहते हुए भी उनकी चेतना अरिक्त रहकर मोक्ष की ओर गमन कर रही थी। इस प्रकार स्वर्गलोक में असंख्य वर्ष बीतने के बाद जब उनकी आयु छह मास ही शेष रही तब भरत क्षेत्र में १३ वें तीर्थंकर के अवतार की पूर्व तैयारी होने लगी।

भगवान विमलनाथ : पंचकल्याणक

यह है भरत क्षेत्र की कम्पिलानगरी ! ‘कृतवर्मा’ इस नगरी के महाराजा भगवान ऋषभदेवके वंशज हैं, उनकी महारानी का नाम जयश्यामा-वे ही तेरहवें तीर्थंकर के माता-पिता। ज्येष्ठ कृष्णा दशम से छहमास पूर्व कुबेरने रत्नवृष्टि प्रारम्भ करके उस नगरी का तथा माता-पिता का सन्मान किया। नगर जन तो आश्चर्यचकित हो गये कि अरे, अपनी नगरी में प्रतिदिन यह रत्नवृष्टि कैसी ! अवश्य ही कोई अद्भुत घटना हो रही है ! अब लाखों- करोड़ों वर्षसे मिथ्याज्ञानमें जलती हुई भरत क्षेत्र की, जनता को निर्मल ज्ञानवृष्टि द्वारा शान्ति प्रदान करनेवाले प्रभु के आगमन की तैयारी हो रही है; अधर्म में डुबी हुई जनता का उध्दार करने के लिये एक महात्मा, तीर्थंकर परमात्माके रूपमें अवतरित हो रहे हैं। चौबीस अवतारों में से यह तेरहवें तीर्थंकर का अवतार है।

छह मास पश्चात ज्येष्ठकृष्णा दशम के दिन, वह राजा पद्मका जीव स्वर्गलोकसे इन्द्र पर्याय छोड़कर, तीर्थंकर होने के लिये मनुष्यपर्याय में अवतरित हुआ। उसी समय महारानी जयश्यामाने अति उत्तम हाथी-वृषभ-सिंह-लक्ष्मीदेवी-माला-चन्द्र-सूर्य-मीन-कुम्भ-सरोवर-समुद्र- सिंहासन- देवविमान-नागभवन- रत्नराशि तथा निर्धूम अग्नि- ऐसे १६ मंगल स्वप्न देखे…देवोंने आकर प्रभुके गर्भकल्याणकका उत्सव मनाया, और माता-पिता की स्तुति करते हुए कहा- ‘अहो ! आपके आँगनमें तेरहवें तीर्थंकर का आगमन हुआ है। हे माता ! आपकी कुक्षि में एक तीर्थंकर का आत्मा विराजता है इसलिये आप जगतमाता हैं। हे पिता ! आप जगतपूज्य हो, आप भी नियमसे मोक्षगामी हो।’ अहा, जिनके यहाँ तीर्थंकर अवतरित होता हैं उनकी इन्द्र भी स्तुति करें उसमें क्या आश्चर्य !! गर्भवृध्दि होनेपर भी महादेवी जयश्यामा के न तो उदरवृध्दि हुई और न रूप में कोई हानि हुई, इसके विपरीत उनकी शोभामें वृध्दि होती गई।

इस प्रकार कम्पिलानगरी में अवतरनेवाले तीर्थंकर का गर्भागमन जानकर माता-पिता तथा प्रजाजन उन तीर्थंकर का दिव्यमुख देखने को अधीर हो उठे… नौ महीने तक सर्वत्र उन्होंकी महिमा का गान होता था कि- अहा, अपनी नगरीमे जो तीर्थंकर अवतरित होंगे वे कैसे अद्भुत होंगे ! उन्हें देखकर हम सब धन्य हो जायेंगे ! इस जीवन में एक तीर्थंकर को प्रत्यक्ष देखने का परम सौभाग्य हमें प्राप्त होगा !

तीर्थंकर आत्मा के सम्पर्क से माता जयश्यामा अति प्रसन्न रहती थीं; उनके अतर मे कोई अचिन्त्य परिवर्तन हो रहा था; उनकी , ज्ञानकला शीघ्रतासे विकसित होने लगी थी, परिणाम अधिकाधिक उज्ज्वल हो रहे थे; मिथ्याभाव दूर होकर सम्यक्-विमलभाव जागृत हो रहे थे। भवनवासी छप्पन दिक्कुमारी देवियाँ माताकी सेवा करती थीं… जगतके लोग तो उन तीर्थंकरको अभी नौ महीने बाद देखेंगे, परन्तु उन कुमारी देवियोंको तो अभी से माता के उदरमें विद्यमान तीर्थंकर की सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त होता था… जिससे उनकी स्त्रीपर्याय भी धन्य हो गई और स्त्रीवेद का छेदन करके भविष्यमें मोक्ष प्राप्त करना निश्चित् हो गया ! वाह ! देखो, तीर्थंकर के सान्निध्य का अचिन्त्य प्रताप !!

वे देवियाँ कभी-कभी तात्विक प्रश्नोत्तर द्वारा माताजी के साथ विनोद करती थीं:-

※ एक देवीने पूछा-हे माता ! सेवा किसकी करें ?
-माताने कहा-मेरे पुत्रकी, अर्थात् तीर्थंकर की।

※ हे माता ग्रहण किसका करें ?
-जिनदेवके वचनोंका।

※ हे माता ! सर्वप्रथम कौनसा कार्य करना ?
-आत्माका ज्ञान… आत्माका कल्याण… रत्नत्रयकी उपासना

हे माता ! किसका नाश करें ?
-भवभ्रमण के कारण ऐसे मिथ्यात्वका और कषायोंका। ❈
हे माता ! पवित्र कौन है ?
-जिसके हृदयमें अरिहंतदेव एवं शुद्धात्माका वास है वह।
हे माता ! मलिन कौन है ?
-कषायोंसे जिसका चित्त मलिन है वह।
हे माता ! निर्धन कौन है ?
-अपने परमात्मवैभवको जो नहीं जानता और दूसरोंके पास सुखकी याचना करता है वह निर्धन है। ❈
हे माता ! धनवान-संतोषी कौन है ?
-जिसके पास सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप आत्मवैभव है वह।
हे माता ! विषसमान क्या है ?
-विषय-भोग विष के समान है।
हे माता ! अमृत समान क्या है ?
-वीतरागता वह अमृत समान हैं। ❈ ❈
हे माता ! आपका चित्त सदा प्रसन्न क्यों रहता है ?
-क्योंकि मेरे हृदयमें तीर्थंकर प्रभु विराजते हैं इसलिये।

-इस प्रकार १००८ भिन्न-भिन्न प्रश्नोंद्वारा देवियाँ माताको आनन्द प्राप्त कराती थी और माताजी भी अद्भुत उत्तर देकर उन देवियोंको हर्षित कराती थी। ऐसे प्रश्नोत्तरोंद्वारा वे तीर्थंकर-महिमा को प्रगट करते हुए तत्त्वज्ञान का मंथन करती थी।

माघ शुक्ला चतुर्थीके दिन महारानी जयश्यामाने तीन ज्ञानके धारी और त्रिलोकपूज्य ऐसे तीर्थंकर को जन्म दिया। प्रभुकी दिव्य देह से पृथ्वी जगमगा उठी.. .सर्वत्र प्रकाश फैल गया… तीनों लोकमें आनन्दकारी विस्मय छा गया… देवगण हर्षित हो उठे और कम्पिलानगरीमें आकर तीर्थंकर के जन्मकल्याणकका कल्पनातीत उत्सव मनाया। बाल तीर्थंकर को विराजमान करने के लिये एक देव ने ऐरावत हाथी का अद्भुत रूप धारण किया, जिसकी १०० सूँढोंमें सरोवरोंके बीच कमल खिल रहे थे और उनकी प्रत्येक पंखुरीपर देवियाँ नृत्य कर रही थीं… आश्चर्यजनक था वह देवीदृश्य !! ऐसे ऐरावत हाथीपर प्रभुको विराजमान करके मेरुपर्वत पर ले गये; वहाँ इन्द्रोंने हजार हाथसे प्रभुका जन्माभिषेक किया। उस आनन्दकारी अवसर पर इन्द्र-इन्द्राणी भी एक-दूसरे के हाथ पकड़कर नाच रहे थे। इन्द्र ने उन तेरहवें तीर्थंकर को “विमलवाहन” नाम दिया। बाल तीर्थंकर के शरीर में अनेक मंगल-चिन्ह थे, चरणोंमे शूकर का शुभ चिन्ह था। जन्माभिषेक के पश्चात स्तुति करते हुए इन्द्र ने कहा-हे देव ! आपकी महिमा का क्या कहना ! इस आकाश का कागज, मेरू पर्वत की लेखनी, तथा स्वयंभूरमण समुद्र को स्याही बनाऊँ तब भी आपकी गुण महिमा का आलेखन नहीं हो सकता। स्वानुभवज्ञान द्वारा ही आपकी अगाध महिमा जानी जा सकती है। हे देव ! आपके अवतार से पूर्व भगवान वासुपूज्य के शासन के अन्त भाग में लगभग एक पल्य तक भरत क्षेत्र में धर्म का जो विच्छेद था वह आपका जन्म होते ही दूर हो गया और परमकल्याणकारी जैनधर्म का सूर्य अपनी सम्पूर्ण कलाओं सहित जगमगा उठा। अपनी नगरी में तीर्थंकर के जन्म का ऐसा महोत्सव देखकर कम्पिलानगरी के प्रजाजनों के हर्ष का कोई पार नहीं था। अद्भुत तीर्थंकर महिमा देखकर कितने ही जीवोंने चैतन्य महिमा के चिन्तन द्वारा उसी दिन सम्यक्दर्शन प्राप्त कर लिया।

भगवान विमलनाथ की आयु ६० लाख वर्ष थी। बचपनमें भी उनकी कलायें अद्भुत थी; देव भी बालक समान बनकर उनके साथ क्रीड़ा करने आते थे। खेलते समय भी वे महात्मा अनुभूतिसंपन्न थे। सम्यक्त्व का शृंगार तो वे पूर्वजन्म से ही साथ लेकर आये थे। अद्भुत था उन अन्तरात्मा का जीवन ! सचमुच वे चलते-फिरते छोटे से परमात्मा ही थे। उन्हें किसी के पास विद्या पढ़ने नहीं जाना पड़ा, स्वयं ही स्वयंबुध्द जगत्गुरू थे।

युवावस्था में अनेक राजकुमारियों के विवाह उनके साथ हुए। और पंद्रह लाख वर्ष की आयु में कम्पिलानगरी में उनका राज्याभिषेक हुआ…यों तो जन्म के समय ही लोक में श्रेष्ठ मेरू पर्वत पर उनको स्नान कराके इन्द्र ने तीन लोक के राज्यपर उनका अभिषेक किया था। अहा, उसी भव में त्रिलोकपति तीर्थंकर होनेवाले महात्मा जिस नगरी के महाराजा हों उस नगरी के लोगों के सुख सौभाग्य का क्या कहना !! बढते हुए विशुध्द परिणामों से कुछ ही काल में जिनको अनन्त मोक्ष सुख की प्राप्ति होना है, उनको राजसुख की क्या गिनती !! अनेक बार इन्द्र भी उनके साथ गोष्ठी करने आते और तीर्थंकर के सम्पर्क से इन्द्रपुरी की अपेक्षा से भी अधिक आनन्द प्राप्त करते। इस प्रकार राज्यअवस्था में तीस लाख वर्ष बीत गये।

माघ शुक्ला चतुर्थी कम्पिलानगरी के महाराजा विमलनाथ आज अपने जन्मदिन पर प्रातःकाल वनक्रीडाके.लिये गये थे। एक तालप्रब के किनारे अतिरम्य शान्त वातावरण था। रंगीन प्रभात की आभा विकसित होने वाली थी… मानो बाल प्रभु के दर्शन से रंगबिरंगा शृंगार सजकर आकाश अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर रहा हो। तालाब मे खिले हुए पुष्पों की पखुड़ियो पर मोती समान ओस बिन्दु अपनी सप्त रंगी आभा से जगमगा रहे थे, मानो प्रभु के दर्शन पाकर वे पुष्प हँस रहे हो और प्रभु के जन्मदिन का हर्ष मना रहे हों। वह दृश्य विमल महाराजा के चित्त में प्रसन्नता उत्पन्न कर रहा था… पूर्वाकाश मे सूर्योदय हो रहा था। थोड़ी देर में रंगबिरंगी उषा के बदले आकाश ने लाल रंग धारण किया… और महाराजने क्षणभर पश्चात तालाब में देखा तो वहाँ सच्चे मोती जैसे वे रंगबिरंगी ओस बिन्दु गलकर विलीन हो गये थे… और उन पुष्पों की शोभा भी अदृश्य हो गयी थी, अरे, ऐसी क्षणभंगुरता देखते ही विमलमहाराजा का चित्त बिजली के झटके की भाँती वैराग्य से झनझना उठा; उसी समय उनको अपने पूर्वभवों का जातिस्मरण ज्ञान हुआ।

वे संसार का असार स्वरूप विचारने लगे-अरे, यह पुण्य का ठाट भी ओस बिन्दुओं के समान क्षणभंगुर है जिस प्रकार ओस बिन्दुओं पर महल नहीं बनाया जा सकता उसी प्रकार पुण्य वैभवद्वारा सच्ची आत्मशांति की साधना नहीं हो सकती। मुझे तो इस भव मे परमात्मा होकर मोक्ष प्राप्त करना है। ४५ लाख वर्ष तो इस राजपाट में बीत गये, अब ऐसे मोह में रहना मुझे शोभा नहीं देता। यद्यपि मुझे तीन ज्ञान हैं, परन्तु वे तो मर्यादित जानने वाले हैं, ऐसे अधूरे ज्ञान से भवका अन्त कैसे आयेगा ? तथा सम्यक्त्व होने पर भी अभी चारित्र अतिअल्प है अभी मुझे प्रत्याख्यानावरण तथा सज्ज्वलन कषायोंको जितना हैं और चारित्र की वीतराग दशा प्रकट करना है। अभी तो मुझे प्रमाद और परिग्रह भी है, पुण्य कर्म के भोग से कर्मोंका आस्रव भी होता है, निर्जरा अभी अल्प है। जब तक कषायोंका तथा पुण्य कर्म का भी अन्त नहीं करूँगा तब तक मुझे मोक्ष सुख की प्राप्ति नहीं होगी। इसलिये मोक्ष हेतु मुझे शीघ्र उद्यमी होना चाहिए।

तीर्थंकर महाराज विमलनाथ वैराग्य से दीक्षाभावना भा रहे हैं कि- इस संसार में प्रत्येक जीव अपने-अपने भावों का ही फल भोगता है। राग-द्वेष द्वारा जीव संसार में दुःख प्राप्त करता है और वीतरागता द्वारा मोक्ष सुख की प्राप्ति होती है। चाहे जैसे इन्द्रिय विषय हों तथापि उनके सेवन में सुख तो नहीं मिलता, मात्र पाप का बंध होता है। मेरे इस इक्षुवंश में मुझसे पूर्व कितने ही राजा-महाराजा-चक्रवर्ती हो गये. कहाँ गया उनका राज्य ? मेरे वे पूर्वज तो उस राज्य सम्पदा का त्याग करके मोक्ष में चले गये। मैं भी उनके मार्ग पर चलूँगा। भगवान ऋषभदेव ने जो मार्ग परम्परा प्रारम्भ की है उसी परम्परा का में अनुसरण करूँगा। आज मैं भव-तन-भोग का मोह छोड़कर वीतरागी रत्नत्रय को धारण करूँगा और आत्मध्यान द्वारा केवलज्ञान प्रकट करूँगा। आज अपने जन्मदिन पर पुनः जन्म का अभाव करने के लिये मैं मुनि बनूँगा और मोक्ष साधूँगा।

इस प्रकार महाराजा विमलनाथ ने दीक्षाका निश्चय किया की तुरन्त पाँचवे ब्रह्मस्वर्गसे सारस्वत आदि ४०७८२० लौकांतिक देव कम्पिला नगरी में आये और विनयपूर्वक शांत रसभरे वचनोंद्वारा प्रभु के; वैराग्य का अनुमोदन करने लगे की -“हे देव ! आपके विचार श्रेष्ठ हैं… दीक्षा सम्बन्धी आपकी वैराग्य भावना जगत के लिये भी कल्याणकारी है। जिस प्रकार चन्दन वृक्ष के सम्पर्क से अन्य वृक्ष भी सुगन्धमय हो जाते हैं उसी प्रकार हे परम वीतराग देव ! आपके सम्पर्क से अन्य जीव भी मोक्ष मार्ग प्राप्त कर लेंगे। प्रभो ! लाखो वर्ष से भरत क्षेत्र के जीव मुक्तिमार्ग के लिये लालायित हो रहे हैं, आपकी दीक्षा से उनकी वह लालसा शीघ्र पूर्ण हो जायेगी।” ऐसा कहकर वे ‘देव-पण्डित’ लौकान्तिक देव ब्रह्मलोक में चले गये और उसी समय इन्द्रादिदेव ‘देवदत्ता’ नामक पालकी लेकर दीक्षा कल्याणक मनाने आ पहुँचे। प्रभु सर्वत्र समभाव धारण करके पालकी मे आरुढ होने चले उस समय इन्द्र महाराजने हाथसे प्रभुको सहारा दिया। प्रभुको कहाँ सहारे की आवश्यकता थी ? परन्तु उस बहाने उन्होंने प्रभुका स्पर्श कर लिया और अपनी भक्ति व्यक्त की। भक्ति के बहाने उन्होंने प्रभुके हाथ में अपना हाथ सौंप दिया और प्रभुके सीधे स्पर्श द्वारा अपना एकावतारी पना निश्चित कर लिया। ऐसा सौभाग्य तो इन्द्र जैसोंको ही प्राप्त होता है हाँ, उनकी इन्द्राणी को जन्माभिषेक के समय प्रभुको गोद में लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था और प्रभुके स्पर्श से कृतकृत्य होकर वे मोक्ष की अधिकारिणी बन गयीं थीं। पारस के स्पर्श से लोहे को तो मात्र ‘सुवर्णपना’ प्राप्त होता है, जब की परमात्मा के स्पर्श से तो आत्मा को परमात्मापने की प्राप्ति हो जाती है !

सहेतुक नामके दीक्षावन में पहुँचकर महाराजा विमलनाथने अंतर-बाह्य समस्त परिग्रह का त्याग कर दिया.. दैवी वस्त्राभूषण रहित सर्वथा अपरिग्रही दिगम्बर दशा मे सुशोभित हो उठे। दैवी वस्त्रोंकी अपेक्षा वस्त्र रहित दशा में वे अधिक शोभा दे रहे थे। देव, मनुष्य तिर्यंच भी भगवान का वीतरागी रुप देखकर मुग्ध हो गये . उन्हें भी परिग्रह नीरस लग रहे थे। कितने ही भव्य मुमुक्षु तो उसी समय परिग्रह छोड़कर प्रभु के साथ दीक्षाग्रहण करने हेतु तैयार हो गये, अन्य कितनों ने श्रावक व्रत अंगीकार किये और अनेक जीवोंने आत्मसुखकी श्रद्धाद्वारा सम्यकदर्शन प्रगट किया। अत्यन्त मंगलकारी था प्रभुके वैराग्यका वह प्रसंग !

विमल प्रभुने ‘ॐ सिद्धेभ्यः नमः’ ऐसे उच्चार सहित सिद्धोंको नमस्कार किया और अपने सिद्धस्वरुप में चित्त लगाया; तुरन्त ही शुद्धात्मध्यानरूप शुद्ध उपयोग हुआ, साथ ही मनःपर्याय ज्ञान भी प्रगट हुआ। प्रभुका आत्मा रत्नत्रयरूप होकर मोक्षमार्ग में विहरने लगा। दीक्षा के पश्चात् केवलज्ञान होने तक उन्होंने मौन धारण किया।

दीक्षा के दो दिन पश्चात विमल मुनिराज नन्दन नगर में पधारे और जयराजाने उन्हें भक्ति पूर्वक पारणा कराया। अहा, तीर्थंकर मुनिके हाथ में आहार देते समय उनके चित्त में परमात्मपद की प्राप्ति समान महान हर्ष हुआ और तीर्थंकर के साथ इतने निकट सम्बन्ध के कारण वे भव्यात्मा उसी भव में मोक्षगामी हुए। (तीन वर्ष पश्चात जब भगवान विमलनाथ को केवलज्ञान हुआ तब उन जयराजाने प्रभुके चरणों में दीक्षा ग्रहण की और कर्मोंका क्षय करके मोक्ष प्राप्त किया)

भगवान विमलनाथने मुनिदशामे तीन वर्ष तक विहार किया। मुनिदशामे यद्यपि वे मौन थे, तथापि उनकी परमशांत ध्यानमुद्राके दर्शन से कितने ही जीव धर्म का स्वरूप समझ जाते थे; कषाय रहित शान्ति कैसी होती है?..वह प्रभु की मुद्रामे जीवन्त दिखायी देती थी और विभावोंसे चैतन्य भावोंका भेदज्ञान हो जाता था। इसप्रकार तीन वर्ष तक मुनिदशा में छद्मस्थरूप से विहार करते हुए, ठीक दीक्षा के दिन वे पुनः कम्पिलानगरी के दीक्षावन मे पधारे और वहाँ दो दिन का ध्यानयोग धारण किया। भगवान का मात्र नाम ही 'विमल’नही था, उनके भाव भी विमल थे; शुद्धोपयोगकी धारा से उनका मोहमल धुल गया था। इस प्रकार परिणामोंकी विशुद्ध श्रेणी द्वारा मोहका सर्वथा नाश करके प्रभुने माघ शुक्ल षष्ठी के दिन केवलज्ञान प्रगट किया; वे सर्वज्ञ परमात्मा- अरिहंत हुए; उसीकाल तीर्थंकर प्रकृति का उदय प्रारम्भ हुआ। इद्र भक्तिसे दौडे आये और केवलज्ञानी प्रभुकी पूजा की। दिव्य समवसरण की रचना हुई। प्रभु के उपदेश से अनेक जीव धर्म को प्राप्त हुए और भरत क्षेत्र पुनः विदेह क्षेत्र समान धर्म क्षेत्र बन गया प्रभु विमलनाथ तीर्थंकरने गुजरात-सौराष्ट्र, अग-बंग आदि अनेक देशो में विहार किया।

विमलनाथ तीर्थंकर की धर्मसभा में मेरू-मंदर आदि ५५ गणधर थेः ऊपर आकाशमें निरालम्बी (पाँच हजार धनुष ऊँचे तीर्थंकर की समकक्ष मे) ५५०० केवली भगवन्त विराजते थे। तदुपरान्त ११०० श्रुतकेवली, ३६५३० शिक्षक उपाध्याय मुनि, ४८०० अवधिज्ञानी मुनि, ५५०० मनःपर्यय ज्ञानी, ९००० विक्रिया ऋद्धिधारी, ३६०० वाद-विद्यामें निपुण मुनिवर थे, एक लाख तीन हजार आर्यिकाएँ, दो लाख श्रावक तथा चार लाख श्राविकाएँ थी। देवदेवियों का तो कोई पार नही था; सिंह, चित्ते, हाथी, हिरन आदि तिर्यंचोंके झुंड भी धर्म श्रवण करने आते और आत्मज्ञान प्राप्त करते थे। भगवान विमलनाथ १५ लाख वर्ष तक तीर्थंकर रूप से भरत भूमि में विचरे और धर्मचक्र का प्रर्वतन किया।

मथुरा के राजकुमार : मेरु तथा मंदर गणधर

एक बार भगवान विमलनाथ उत्तर-मथुरानगरी में पधारे उस समय वहाँ राजा अनन्तवीर्य राज्य करते थे; उनके मेरू तथा मंदर नामके दो श्रेष्ठ पुत्र थे; दोनो राजकुमार चरमशरीरी, महाबुद्धिमान, धर्मरसिक और एक-दूसरे पर अतिस्नेह रखते थे। मथुरापुरी में भगवान विमलनाथ के दर्शन से दोनों भाइयोंको परम हर्ष हुआ, मानो उन्हे कोई अचिंत्य निधान प्राप्त हुआ ! मानो भगवान उनको मोक्ष मे ले जाने के लिए ही आये हों। वे बारम्बार भगवानके समवसरणमे जाकर उपदेश सुनते और आत्मध्यान करते थे। भगवान की वाणी में श्रावकधर्म तथा मुनिधर्मका उपदेश सुनकर दोनों भाइयोंने अपने परिणामोंको अति विशुद्ध बनाया। ‘मेरु और मंदर, तुम दोनों भाई इसी भवमें मोक्षगामी हो’ ऐसा भगवान की वाणी मे सुनकर उन दोनों भाइयोंको अपार हर्ष हुआ। अहा, अपने मोक्ष की बात से विशेष आनन्द मुमुक्षुको और किस बात में होगा ! प्रभुकी वाणी सुनकर उन दोनों राजकुमारों को अपने अनेक पूर्व भवोंको भी ज्ञान हुआ। पश्चात् वैराग्य प्राप्त करके विमलनाथ प्रभुके समीप जिनदीक्षा लेकर वे मेरु और मंदर दोनों मुनिवर भगवानके गणधर बने।

मेरू गणधर का जीव पूर्वभवमें लांतव स्वर्ग में आदित्यभ नामक देव था। उससे पूर्व वह विदेहक्षेत्र में वीतभय नामक बलभद्र था तब उसका भाई विभीषण (मंदर गणधर का जीव) वासुदेव था और दूसरे नरकमें गया था। उसे आदित्यभ देवने (मेरू गणधर के जीवने) नरक में जाकर प्रतिबोध दिया था। वही दोनों बलदेव-वासुदेव भाई अन्तिम अवतार में मेरु और मंदर नामके भाई हुए और विमलनाथ तीर्थंकरके गणधर होकर मोक्ष प्राप्त किया।

भगवान विमलनाथ जब सौराष्ट्र में पधारे तब द्वारामती नगरीमें त्रिखण्डाधिपति ‘धर्म’ बलभद्र और ‘स्वयंभू’ नारायण ने उनकी वन्दना की थी। (उनकी कथा आप अब पढ़ेंगे।)

इस प्रकार लाखों वर्ष तक करोड़ों जीवोंको प्रतिबोधकर भगवान विमलनाथ को जब एक मास संसार अवशेष रहा तब वे सम्मेदशिखर की सुवीर टूंक पर पधारे… उनका विहार और वाणी थम गये। वैशाख कृष्णा अष्टमी के प्रातः काल अतिशीघ्र (एक सेकण्डके असंख्यातवें भाग में) समुद्घात करके वे तीर्थंकर सर्वज्ञ प्रभु एक समय के लिये सर्वलोकव्यापी हुए और तीन अघाति कर्मोंकी स्थिति, आयुस्थितिसे जितनी अधिक थी उतनी खिरादी। दूसरे ही क्षण तृतीय शुक्ल ध्यानद्वारा योगकी सूक्ष्म क्रियाका भी अभाव करके अयोगी हुआ और तत्क्षण चौथा शुक्ल ध्यानद्वारा सर्व कर्मोंका सर्वथा क्षय करके ‘स्वास्थ्य’ (अर्थात् स्वरूप में अवस्थिति) रूप सिध्दपद को प्राप्त हुए।

हे विमलदेव ! आपके विमल चैतन्यभाव अतीन्द्रिय हैं, उन्हें जानकर सम्यग्दृष्टि जीव ही आपकी उपासना कर सकते हैं। इन्द्रियोंमें लुब्ध जीव अतीन्द्रिय ज्ञानमय ऐसे आपको कैसे जान सकेंगे ? --इसप्रकार देव-देवेन्द्रों तथा राजा-महाराजाओंने सिध्द प्रभुके गुणोंकी स्तुतिपूर्वक मोक्षकल्याणक उत्सव मनाया और सम्मेदशिखर को सिध्दभूमि समझकर भक्तिसहित वन्दना की :-

विमलनाथ जिनराजका कूट सुवीर है जेह;
मन-वच-तनकर पूजहूँ शिखरसम्मेद यजेह।

आज असंख्य वर्षों के बाद भी उस निर्वाणभूमिपर जाकर हम जैसे साधक जीव सिध्दपदका स्मरण और भावना करते है। हे विमलदेव ! वीतरागता से सुशोभित आपका विमल जीवन यह दरशाता है कि-जिस प्रकार पापकषाय द्वारा मलिन हुआ जीव संसार में भटकता है, उसी प्रकार पुण्यराग द्वारा मलिन हुआ जीव भी संसारभ्रमण करता है; इसलिये उन पाप या पुण्य दोनों विकल्पोंसे रहित आत्मगुणों को ऐसे विशुध्द बनाना चाहिये ताकि उपयोग ‘शुध्द’ होकर सिध्दपदको प्राप्त करे। आपके दरशाये हुए जिनमार्गका यही सिध्दान्त है कि:-

रे ‘शुध्द’ ने श्रामण्य भाख्युं, ज्ञान दर्शन ‘शुध्द’ ने,
छे ‘शुध्द’ ने निर्वाण, ‘शुध्द’ ज सिध्द; प्रणमुं तेहने।
ज्यम लोहनुं त्यम कनकनुं जंजीर जकडे पुरुष ने,
तेवी रीते शुभ के अशुभ कृत कर्म बांधे जीवने।
जीव रक्त बांधे कर्मने, वैराग्य प्राप्त मुकाय छे;
ऐ-जिनतणो उपदेश, तेथी न राघ तुं कर्मों विषे।

शुध्दोपयोगी जीव ही श्रमण है, वही मोक्ष तथा मोक्षका मार्ग है-ऐसा बतलानेवाले हे विमलजिन ! हम भी अपने ज्ञानको विमल करके आपके विमल-मार्गपर आ रहे हैं।

चार आराधना जिसके पग हैं और शुद्धोपयोग जिसकी सूँढ है-ऐसे ‘विमल’ गजराजरूपी श्रेष्ठ वाहनपर आरूढ़ होकर जो मोक्षपुरीमें पहुँचे, ऐसे भगवान ‘विमल-वाहन’ का पवित्र पुराण यहाँ समाप्त हुआ।

तृतीय वासुदेव-स्वयंभू, बलदेव-धर्मराज और प्रतिवासुदेव-मधुराजा

इस भरतभूमिमे जब विमलनाथ तीर्थंकर धर्मचक्रसहित विचरते थे उस समय सौराष्ट्रकी द्वारावती नगरीमें स्वयंभू नामके वासुदेव और धर्मनामक बलदेव राज्य करते थे। वे त्रिखण्ड के स्वामी अर्धचक्रवर्ती थे। सोलह हजार राजा उनकी सेवा करते थे और अड़तालीस करोड़ ग्राम उनके आधीन थे। दोनों भाई जैनधर्म मे तत्पर थे और उनमे अद्वितीय स्नेह था। उनमे बलभद्र का चित्त विशेष रूपसे आत्मसाधनामे लीन रहता था, जब कि वासुदेव स्वयंभूका चित्त पूर्वभवके निदानका मिथ्या संस्कारवश विषय-परिग्रहोंमें लगा रहता था।

भगवान विमलनाथ एक बार सौराष्ट्र मे द्वारावती नगरी में पधारे; सर्वत्र आनन्द व्याप्त हो गया। वन-उपवन फलफूलोंसें आच्छादित हो गये! दूसरों की तो क्या बात, पशु-पंखी भी प्रभुके दर्शनसे आनन्द-किल्लोल करने लगे। मालीने आकर महाराजा स्वयंभू तथा धर्मराजको प्रभुके आगमन की मंगल बधाई दी, वे अतिप्रसन्न हुए और मालीने रत्नहार आदिका पारितोषिक दिया तथा नगरजनोंसहित धामधूमसे प्रभुदर्शन के लिये चले। अहा, जिस नगरी में साक्षात् तीर्थंकर प्रभुका पदार्पण हुआ हो उसके पुण्योदय एव हर्षका क्या कहना !!

दूर से समवसरणकी अचिन्त्य शोभा देखकर बलदेव-वासुदेव भी आश्चर्यचकित हो गये। प्रभुके उस बाह्य दिव्य वैभवके समक्ष तीनों खण्डका वैभव भी उन्हें तुच्छ भासित हुआ, और उस दिव्यवैभवसे भी अलिप्त ऐसे परमात्मा-वैभववान भगवान विमलनाथके दर्शन-पूजन-स्तवन करके उनका धर्मोपदेश सुना। भगवानने संसारके बाह्य पदार्थोंसे आत्माकी भिन्नता, राग-द्वेष मोहादि विभावोंकी असारता और चैतन्यवैभवकी अचिन्त्य महिमा बतलायी। ‘आत्मा नित्य रहकर अपने किये हुए भावों का फल भोगता है। विषय-कषायोंमें लीन जीव नरकादिके दुःख भोगते हैं और आत्मसाधनमें रत जीव मोक्षसुख प्राप्त करते हैं। इसलिये हे जीवों ! तुम विषयोंमें सुखबुद्धि छोड़ो और आत्माके अतीन्द्रिय सुख स्वभावकी श्रद्धा करो, उसमें लीनता करो।’ भगवानके श्रीमुखसे ऐसा धर्मोपदेश सुनकर सब आनन्दित हुए; अनेक जीव संसारसे विरक्त हुए. अनेक जीवोंने आत्मज्ञान प्राप्त किया।

उस समय बलदेव-वासुदेव दोनों को अपने पूर्वभव जानने की उत्कण्ठा हुई कि-‘हे प्रभो ! हमने पूर्वभव में कौन से पुण्य किये थे कि जिससे हमें यह तीन खण्ड की विभूति प्राप्त हुई ?’ भगवान की वाणी में उनके पूर्वभव इस प्रकार आये:-

(‘धर्मराज’ बलदेव का पूर्वभव)

हे धर्मराज ! पूर्वभव मे तुम विदेह क्षेत्र मे मित्रनन्दिनामके राजा थे। एक बार तुम्हारी नगरी मे केवली भगवान का आगमन होने पर तुमने अत्यन्त हर्षपूर्वक उनके दर्शन किये और उनके उपदेश से वैराग्य प्राप्त करके जिनदीक्षा ग्रहण कर ली। मुनि होकर तुमने उत्तम आराधना की और समाधिपूर्वक शरीर त्यागकर सर्वार्थसिद्धि में उत्पन्न हुए, वहाँ से चवकर इस द्वारावती नगरी के भद्रराजा की रानी सुभद्रा की कोख से धर्मनामक बलभद्र के रूपमें अवतरित हुए हो; तुम चरमशरीरी हो।

(‘स्वयंभू’ वासुदेव का पूर्वभव)

वह जीव पूर्वभव में भरत क्षेत्र की श्रावस्ती नगरी में सुकेतु नामका राजा था। अनेक सद्गुण होनेपर भी उसमे जुएका दुर्व्यसन था। मांसभक्षणादि सात व्यसनों में जुएका व्यसन भी महान दुर्गुण है; सत्य आदि अन्य गुणों का भी वह नाश कर देता है। जुआरी जुए में जीते या हारे, परन्तु जुआ खेलने के लिये बैठते ही वह अपने उत्तम आचरण को तथा धर्म को गँवा बैठता है। एक बार शत्रुराजा के साथ जुआ खेलने में वह राजा सुकेतु अपनी समस्त राजसम्पदा हार बैठा; जिससे आर्त्तध्यान करके वह दुःखी रहने लगा और शत्रुराजा के प्रति वैरबुद्धि रखकर वनमें भटकने लगा। दुःखी राजा सुकेतु उस समय पाप में तथा वैभवकी वासना में लिप्त होने पर भी, वह जीव भव्य था, भविष्य में मोक्षगामी, शलाका पुरुष था; इसलिये एकबार उसके सौभाग्य से उसे वन में सुदर्शन नामक मुनिराज के दर्शन हुए; उनके निकट रत्नत्रयधर्म का उपदेश सुनकर उसने रत्नत्रय अंगीकार किये।

एक बार वे सुकेतु मुनि वन में बैठे थे; उस समय उनकी सम्पत्ति को जीत लेनेवाला शत्रुराजा वैभवसहित वहाँ से निकला; उसे देखकर मूर्खतापूर्वक उसने निदान किया कि-अपने धर्म के फल में मैं भविष्य में महान वैभवप्राप्त करूँ और अपने शत्रु का नाश करके उसकी विभूति छीन लूँ ! (अरे ! रत्नत्रय के निधान बेचकर उनके फल में मूर्ख जीव ने भोग-वासना की इच्छा की।) वह सुकेतु का जीव मोक्षमार्गी था, परन्तु धर्म के फल में विषयों की अभिलाषा करके वह धर्मभ्रष्ट हो गया और उसने नरक का बीजारोपण किया। इसलिये हे जीवो ! धर्मके फल में विषयों की अभिलाषा कदापि नहीं करना। विषयों की अभिलाषा से धर्म को गँवाकर मिथ्यादृष्टि हुआ वह राजा सुकेतु का जीव वहाँ से मरकर, शेष रहे अल्प पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग मे देव हुआ, और वहाँ से चयकर इस द्वारावती नगरीमें स्वयंभू वासुदेव के रूपमे उत्पन्न हुआ है।

पूर्वभव में जिस शत्रुराजा ने उसकी राजसम्पदा जुए में जीत ली थी वह राजा भी पश्चात् किसी कारणवश वैराग्य प्राप्त कर रत्नत्रय धारण करके मुनि हुआ; परन्तु उसने भी मूर्खतासे धर्मके फलमें भोगप्राप्तिका निदान किया, इसलिये धर्म से भ्रष्ट होकर अल्प पुण्यके कारण स्वर्ग में गया और वहाँ से चयकर वर्तमान में रत्नपुरका राजा मधु हुआ है; उस मधुराजा को चक्र की प्राप्ति होने से इस समय वह तीन खण्ड का राजा है। वह ‘प्रतिवासुदेव’ है।

-इस प्रकार विमलप्रभु की वाणी में अपने पूर्वभव सुनकर वे धर्म और स्वयंभू दोनों भाई (बलदेव-वासुदेव) अपने महल में आये। एक बार कुछ राजसेवक मधुराजा के लिये उत्तम रत्नो की भेट लेकर जा रहे थे, तब पूर्वभव के वैर संस्कारवश स्वयंभू राजाने वे रत्न छीन लिये। उनके भाई धर्म-बलभद्रने ऐसा अन्याय नही करने के लिये समझाया, परन्तु परिग्रह की तीव्र लालसा के रौद्र परिणाम के कारण उसने धर्म की बात नही मानी।

जब प्रतिनारायण मधुराजाने जाना कि उसके बहुमूल्य रत्न स्वयंभू राजाने छुड़ा लिये हैं तब चक्रसहित सेना लेकर उसने स्वयंभू के साथ महान युद्ध किया। स्वयंभूको मारने के लिये उसने अपना दैवी सुदर्शनचक्र फेंका, परन्तु पूर्वपुण्य का प्रभाव समाप्त हो जाने से उसका चक्र निष्फल गया और वह स्वयंभू के हाथ में आ गया। स्वयंभूने भयंकर क्रोध पूर्वक उसके चक्र द्वारा उसीका शिरच्छेद कर दिया।घोर रौद्र परिणाम सहित मरकर वह तमतम नामके सातवे नरकमे जा पड़ा! कुछकाल पश्चात स्वयभू वासुदेव भी विषयवासना के रौद्र परिणामों से मरा और मानो अब भी अपने शत्रु को मारने के लिये उसके पीछे लगा हो तदनुसार वह भी सातवे नरक मे पहुँचा। दोनो जीव वहाँसे निकलकर अमुक भव मे पुन धर्म प्राप्त करके मोक्ष मे जायँगे।

वासुदेव स्वयभू की मृत्युसे बलदेव धर्म को पहले तो अति शोक हुआ, परन्तु विमलनाथ भगवान के समवसरण में जाकर धर्मोपदेश सुननेसे उनका चित्त शांत हुआ, और ससार से विरक्त होकर जिनदीक्षा अगीकार की, पश्चात उत्तम ध्यान द्वारा केवलज्ञान प्रकट करके गजपथा क्षेत्र से सिध्ददशा प्राप्त कर ली।

[इस प्रकार भगवान विमलनाथ के समयमे तृतीय बलदेव धर्म, वासुदेव स्वयभू और प्रतिवासुदेव मधु की कथा समाप्त हुई, यह कथा जीवोंको धर्मके फलमें उत्साहित करके विषय-भोगोंके प्रति वैराग्य जागृत करती है।]

१४

भगवान अनन्तनाथ

[१४]

ज्ञान-आनन्दमय चैतन्यस्व का अनन्त वैभव बतानेवाले अनन्त तीर्थंकर को नमस्कार करके उनका मंगल जीवन कहता हूँ।

हे अनन्तनाथ ! आप केवलज्ञानादि अनन्त गुणोंका भण्डार हो; अनन्त गुण पर्यायरूप आपका जो शुध्द अस्तित्व है वही आपका सम्यक स्वरूप है। हे देव ! आपके ऐसे अनन्त भावरूप अस्तित्व को जानते ही हमे अपने में अनन्त गुण पर्यायोंसे भरपूर चेतनवैभव दृष्टि गोचर होता है, अनन्त गुणों के सम्यक स्वाद का अनुभव होता है और मिथ्यात्वादि अनन्त दोष दूर हो जाते हैं।

हे भगवान ! ‘आप ऐसे हैं, आप वैसे हैं’- ऐसे अपने अल्पमति के किंचित प्रलाप द्वारा क्या आपके अनन्त गुणों की पूर्ण महिमा प्रगट हो सकती है ? तथापि, जिस प्रकार अमृत के समुद्र को पूरा नहीं पिया जा सकता, परन्तु उसके किंचित अमृतपान से भी क्या तृषा शांत होकर तृप्ति नहीं होती ? उसी प्रकार हे अनंत गुणसागर ! आपके अल्प गुणों के चिन्तन सें भी हमारा हृदय तृप्त हो जाता है।

जो अनन्त गुणसम्पन्न भगवान अनन्तनाथ अपने हृदयमें विराजमान होते ही सर्व विभाव चैतन्यसे बाहर रह जाते हैं; अनन्त भवोंका अन्त होकर, अनन्त ऐसी सिद्धदशा प्रारम्भ हो जाती है; ऐसे प्रभु अनन्तनाथका मंगल जीवन, हे भव्य जीवो ! तुम आदरपूर्वक सुनो।

भगवान अनन्तनाथ : पूर्वभव : राजा पद्मरथ

अनन्त भवचक्रका अंत करनेवाले भगवान अनन्तनाथ पूर्वके तीसरे भव में धातकी खण्ड में अरिष्ट नगरीका राजा पद्मरथ थे। वह नगरी रत्नमालाओंसे सुशोभित थी, तो उसके राजा भी सम्यक्त्वादि रत्नोंसे विभूषित थे। पुण्योदयसे बाह्यमें सर्व सुखसामुग्री उन्हें प्राप्त थी, परन्तु चैतन्यसुखके वेदनमें उन्हें वैसी किसी सामग्री की आवश्यकता नही पड़ती थी। राज्यवैभवके बीच रहते हुए भी उनका चित्त पापोंसे अलिप्त और सदा पञ्चपरमेष्ठी की भक्तिमे लिप्त रहता था। उनके महान भाग्यसे मुनिवरों तथा केवली भगवन्तोंका कई बार उनकी नगरीमे आगमन होता था।

एक दिन भगवान स्वयप्रभ उनकी नगरीमे पधारे; चारों ओर आनन्द - मंगल छा गया। भावी तीर्थंकर समान राजा पद्मरथ बड़ी धामधूमसे गाजेबाजे के साथ भगवान के दर्शन करने गये। अत्यन्त भक्तिपूर्वक केवली प्रभुके दर्शन किये। प्रभुका रूप देखकर उनका चित्त परमशांत हुआ, इतना ही नहीं, ज्ञानकी निर्मलता होनेसे उन्हे अपने कुल सात भवोंका ज्ञान हुआ; उनमें यद्यपि भविष्यके तो दो ही भव शेष थे, इसलिये वे दो भव जाने और भूतकाल के चार भवोंको भी जान लिया;-इस प्रकार वर्तमानसहित उन्हे कुल सात भवोका ज्ञान हुआ और उनमे अपना अन्तिम भव तीर्थंकर का है-ऐसा जानकर उनका चित्त हर्षसे रोमाचित हो गया। अहा, अपने मोक्षका ज्ञान हो, उससे विशेष आनन्द की बात और क्या होगी ?

भावी तीर्थंकर ऐसे राजा पद्मरथने भगवानके समवसरणमें बैठकर धर्मोपदेश सुना; उसे सुनते ही वैराग्यपूर्वक वे चिन्तवन करने लगे कि-इस जीवको शरीर के साथका सम्बन्ध कही नित्य रहनेवाला नही है, अनन्त शरीरों के साथ सम्बन्ध हुआ, किन्तु एक शरीर स्थायी नही रहा, सब पृथक् हो गये; क्योंकि जीव और शरीर पृथक् ही है। उसी प्रकार पाँच इन्द्रियाँ और उनके विषयोंका सम्बन्ध भी नित्य् रहनेवाला नही है, क्षणभंगुर है, दो में से कोई एक छूट जाता है-या तो इन्द्रियाँ छूट जाती हैं या विषयोंका सयोग छूट जाता है। इस प्रकार जीव, शरीर-इन्द्रियो से तथा उनके विषयोसे पृथक् है। (वैराग्यवन्त राजा विचारते है—) अन्य मतके मोहासक्त जीव भले उसमे मोहित रहे, परन्तु मैंने तो अरिहन्त भगवानके मतकी शरण लेकर जड़-चेतनका भेदज्ञान किया है, इसलिये मैं बाह्यविषयोंमे कहीं मोहित नहीं होऊँगा, अरिहतदेवने मेरा अनन्त चैतन्यवैभव मुझे बतलाया है उसीकी मै साधना करूँगा।

इस प्रकार राजा पद्मरथका चित्त संसारसे विरक्त हुआ। जैसे-दीर्घकाल से अपने पुराने स्थानमे रहनेवाला शशक वनमे आग लगने पर उससे बचने के लिये उस स्थान को छोड़कर दूर भाग जाता है; पुराने स्थानका ममत्व नहीं करता, उसी प्रकार अतिदीर्घकाल से ससार मे रहने पर भी, कषायोंकी आगसे भयभीत हुए भव्यात्मा पद्मरथ, संसार-राजपाट को छोड़कर मोक्षकी साधनाके लिये तत्पर हुए। उन्होने स्वयंप्रभ केवली भगवानके चरणोमे जिनदीक्षा ग्रहण की; ग्यारह अगका ज्ञान प्रगट किया और दर्शनविशुद्धि आदि उत्तम भावनाएँ भाकर तीर्थंकर नामकर्म बाँधा। चार प्रकारकी उत्तम आराधनासहित प्राण त्यागकर अच्युतस्वर्गके इन्द्र हुए। वहाँ असङ्ख्य वर्षोतक सम्यक्त्वपूर्वक निवास किया। पश्चात अभी मनुष्य लोक में अवतरित होनेमें उनको छहमास शेष थे कि उनके पुण्यप्रतापसे मनुष्य लोकमें दिव्यपरिवर्तन होने लगा।

अयोध्यानगरीमे अनन्तनाथका अवतार

भरतक्षेत्रकी अयोध्यानागरीमे अब तक चार तीर्थंकर (ऋषभदेव, अजितनाथ, अभिनन्दननाथ और सुमतिनाथ) अवतरित हो चुके है; अब पाँचवेके अवतारकी तैयारी है; इसलिये कुबेरने पुरानी अयोध्यानगरीकी नवरचना करके उसे पुन. अतिसुन्दर बना दिया। उस समय अयोध्या नगरीके महाराजा सिंहसेन थे; उनकी रानीका नाम था जयश्यामा। अचानक ही नगरीमे परिवर्तन होने लगा; राजमहलके प्रांगणमें प्रतिदिन करोड़ों रत्नोंकी वर्षा होने लगी। प्रजाजन हर्षित हो उठे। महादेवी जयश्यामाको धर्मके उत्तम विचार आने लगे…और कार्तिक कृष्णा प्रतिपदाके पूर्वकी पिछली रात्रिमें उन्होंने सिंह, हाथी, रत्नोंकी राशि आदि १६ उत्तम स्वप्न एकसाथ देखे। वे स्वप्न तीर्थंकरके जीवका आगमन सूचित करते थे। उन स्वप्नोंका फल जानकर माता-पिता को अपार हर्ष हुआ। स्वर्गसे इन्द्रोंने आकर माता-पिताका तथा गर्भस्थ तीर्थंकर के जीवका सन्मान किया और गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया।

जेष्ठ कृष्णा द्वादशी को अयोध्यामें तीर्थंकर भगवान अनन्तनाथ का जन्म हुआ। तेरहवें विमलनाथ तीर्थंकर के पश्चात नौ सागरोपम के असंख्यात वर्षों बाद चौदहवे तीर्थंकर का अवतार हुआ। उनके अवतार से पूर्व लाखों-करोड़ों वर्ष तक भरत क्षेत्र मे जैनधर्म का विच्छेद हो गया था; उनका अवतार होने से वह विच्छेद दूर हुआ और पुनः जैनशासनका धर्मचक्र चलने लगा । तीर्थंकरों का अवतार धर्म की वृद्धि के लिये ही है।

मेरुपर्वत पर महा महोत्सव से इन्द्रोंने चौदहवें तीर्थंकर का जन्माभिषेक किया। भरत क्षेत्रमें असंख्यात वर्षों बाद भगवान के जन्म कल्याणक का यह अवसर आया था। जन्माभिषेक के पश्चात् ‘अनन्तनाथ’ ऐसे सम्बोधनपूर्वक इन्द्रने बालतीर्थंकर की स्तुति की, इतना ही नही, प्रभुके दर्शन-से उसे ऐसा महान आनन्द हुआ कि उसने ताण्डवनृत्य किया;- जगतके सर्व नृत्योंमें इन्द्र-इन्द्राणीका यह ताण्डवनृत्य सर्वश्रेष्ठ है-जिसमें इन्द्र स्वयं हजार हाथों द्वारा हावभावसहित भक्ति करके नाचता है।

भगवान अनन्तनाथ की आयु तीस लाख वर्ष थी। उनके चरणमें सेही का चिह्न था। उनका बाल्यकाल अद्भुत था। शरीर की बाल्यावस्था होनेपर भी उनका आत्मा तो सम्यक्त्वादि अनन्त गुणोंद्वारा प्रौढ़ था। सात लाख पचास हजार वर्ष तक वे युवराज रूपमें रहे; सर्वोत्कृष्ट पुण्यसामग्री उनकी सेवामें उपस्थित होनेपर भी भगवान तो अपने चिदानन्द परमात्मा का ही सेवन करते थे; यह अवतार परमात्मा होनेके लिये है-ऐसा लक्ष उनको निरन्तर वर्तता था।

कुछ समय पश्चात् महाराजा सिंहसेनने युवराज अनन्तनाथका राज्याभिषेक किया। अयोध्याके राजसिंहासनपर उन्होंने १५ लाख वर्ष तक राज्य किया। अयोध्या तो पूरे भरतक्षेत्रकी राजधानी, वहाँसे अनेक तीर्थंकर-चक्रवर्ती भारतका राज्य करते आये हैं… इतना ही नहीं, वह राज्य छोड़कर तीन लोकके राज्य की साधना कर-करके अयोध्यापुरी के असंख्यात राजा इस चौबीसी में मोक्ष को प्राप्त हुए हैं। ऐसे ही मोक्षगामी, तदुपरान्त तीर्थंकर ऐसे भगवान अनन्तनाथ के राज्यमें प्रजाजन धर्म एवं धन दोनों में वृद्धिगत थे। इतने में अचानक एक घटना हुई।

ज्येष्ठ कृष्णा द्वादशी : अयोध्याके महाराजा अनन्तजिनका आज जन्मदिन था। आज उनकी आयु २२ लाख ५० हजार वर्षकी हुई थी। एक तो अयोध्यापुरी के महाराजा और वे भी तीर्थंकर इसलिये उनका जन्मोत्सव मनाने के लिये देश-देशके हजारों राजा सुदर भेट लेकर आये थे। एक दिन पूर्वसे ही सारी नगरी अद्भुत श्रृंगारसे शोभायमान हो रही थी। महाराजा अनन्तजिन राजमहलकी छतसे उस दिव्य शोभा का अवलोकन कर रहे थे… -इतने में आकाशमें भारी गड़गड़ाहट के साथ प्रकाश की एक तेजरेखा खिंची और एक तारा खिर गया-उल्कापात हुआ। उसे देखते ही महाराजा अनन्तनाथके चित्तमें भी वैराग्यकी चमक के साथ चेतना जागृत हो उठी-उन्हें पूर्वभवका जातिस्मरण हुआ और वे वैराग्यपूर्वक चिंतवन करने लगे कि-अरे, जिसप्रकार यह उल्का क्षणभंगुर है, उसी प्रकार रागादि समस्त विभाव तथा यह राजसम्पदा के संयोग भी क्षणभंगुर हैं; जीवके साथ यह कोई स्थिर रहनेवाले नहीं हैं, मात्र अपना सिध्दपद ही स्थिर है, इसलिये वही साधने योग्य है। इस जीवन में मुझे मोक्षकी साधना पूरी करना है, इसलिये अब प्रमाद करना उचित नहीं है। मैं शीघ्र ही यह संसार छोड़कर मुनि बनूँगा और मोक्षको साधूँगा।

भगवान के दीक्षा सम्बन्धी निर्णय से चारों ओर खलबली मच गई, देव भी जान गये और दीक्षा महोत्सव मनाने आ पहुँचे। जन्मका उत्सव मोक्षके महोत्सवमें परिवर्तित हो गया। देवोंमें गुरूसमान ब्रह्मर्षि ऐसे लौकान्तिक देवोंने प्रभुकी स्तुति करके अचिन्त्य वैराग्यका अनुमोदन किया। उसी समय इन्द्र ‘सागरदत्ता’ नामक पालकी लेकर आ पहुँचे। सागर समान गंभीर प्रभुने सागरदत्ता पालकी में बैठकर तपोवनकी ओर प्रयाण किया।जन्मोत्सव हेतु आये हुए एक हजार राजा भी प्रभुके साथ तपोवन की ओर चले और प्रभुके साथ ही दीक्षा ले ली। अहा, एक तीर्थंकर के साथ हजारों राजा दीक्षा लेकर आत्मध्यान करते होंगे तब उन हजारों ध्यानस्थ मुनियोंका वह सामूहिक दृश्य कैसा अद्भुत, अद्वितीय, शांत और वैराग्यप्रेरक होगा ! वह दृश्य देखकर वनके हिंसक पशु भी शांत हो जाते थे।

इस प्रकार भगवान अनन्तनाथ अपने जन्मदिन पर ही दीक्षा लेकर आत्मध्यानमें लीन हो गये। उनको तुरन्त अनेक लब्धिसहित मन:पर्ययज्ञान प्रगट हुआ; उसमें भी शुध्द परिणामोंकी लब्धिने तो निकट में ही केवलज्ञानादि नवक्षायिक भावोंकी महालब्धिके आगमन की सूचना दी। दो दिन तक उपवास के पश्चात् मुनिराज अनन्तनाथ साकेतपुरोमें पधारे, तब राजा विशाखने उन्हें भक्तिपूर्वक प्रथम पारणा कराया। उसी समय पारणा करानेवाले को मोक्षसूचक दैवी वाद्य बजने लगे और आकाश से रत्नवृष्टि हुई।

मुनिदशामें विचरण करते-करते प्रभु अनन्तनाथ दो वर्ष पश्चात् पुनः अयोध्यानगरीमें पधारे और जिस तपोवनमें दीक्षा ली थी उसी में चैत्र कृष्णा अमावस्या के दिन शुक्लध्यान द्वारा केवलज्ञान प्रगट किया; चौदहवें तीर्थंकर तेरहवें गुणस्थानमें-परमात्मपद में विराजमान हुए। देवेन्द्रोंने पंचमज्ञान प्राप्त प्रभुके चौथे कल्याणक का महोत्सव मनाया, और समवसरणकी रचना की। अनन्तनाथ भगवानकी अनन्तभावोंसे भरी दिव्यध्वनि सहजरूपसे खिरने लगी। ‘जय’ आदि ५० गणधर एकसाथ उस दिव्यवाणी को झेल रहे थे; तदुपरान्त कितने ही मुनिवर समवसरणमें ही आत्मलीन होकर केवलज्ञान प्राप्त करते और पृथ्वी को छोड़कर आकाश में निरालम्बरूप से पाँच हजार धनुषकी ऊँचाई पर स्थिर होते थे। ऐसे पाँच हजार केवली-अरिहंत भगवान उस समवसरण में विराजते थे।

अहा, एक तीर्थंकर और अन्य पाँच हजार केवली भगवन्त;-हजारों अरिहंतों के मेलेका वह दृश्य कैसा अद्भुत होगा !! एक क्षेत्रमें दो तीर्थंकर साथ नहीं होते, परन्तु केवली भगवन्त -अरिहंत तो समवसरण में हजारों एक साथ होते हैं! वाह, मानो केवलज्ञान उगने का खेत ! वहाँ पाँच हजार केवलियोंके उपरान्त पाँच हजार मनःपर्ययज्ञानी, चार हजारसे अधिक अवधिज्ञानी मुनिवर, एक हजार बारह अंगधारी श्रुतकेवली, तीन हजार से अधिक वादविद्यामें निपुण मुनिवर, चालीस हजार जितने उपाध्याय-शिक्षक तथा आठ हजार विक्रिया ऋद्धिधारी मुनिवर विद्यमान थे। -कुल ६६ हजार मुनिवर, एक लाख आठ हजार आर्यिकाएँ, दो लाख श्रावक और चार लाख श्राविकाओंका चतुर्विध संघ प्रभुके साथ मोक्षमार्गमें चल रहा था। तदुपरान्त तिर्यंचोंका राजा सिंह, हाथी, सर्प, बन्दर, मोर आदि लाखों प्राणी भी प्रभुके दर्शन से हर्षित होते दिव्यध्वनिका श्रवण करके आत्मज्ञान प्राप्त करते थे। तेरहवें गुणस्थानमें विराजमान चौदहवें तीर्थंकर प्रभु अनन्तनाथ दिव्यध्वनि द्वारा आत्माका अनन्त चैतन्य वैभव बतलाते थे। उस अद्भुत अचिन्त्य वैभवके साथ समक्ष देव भी अपने स्वर्ग लोक के वैभवको तुच्छ समझकर आत्मवैभवकी उपासना करते थे। इस प्रकार समवसरण में आकर कितने ही मिथ्यादृष्टि जीव भी सम्यग्दृष्टि बन जाते थे।

भगवान अनन्तनाथ ने लाखों वर्षतक धर्मोपदेश देकर धर्मचक्रका प्रवर्तन किया। वे दिव्यध्वनिमें कहते थे कि- हे जीवो ! आत्मामें एक ही नहीं, किन्तु अनन्तधर्म एकसाथ विद्यमान हैं। एक ही समयमें सत्पना और असत्पना, एकपना और अनेकपना, नित्यपना और अनित्यपना, ज्ञान और आनन्द, कर्तृत्व और अकर्तृत्व,-ऐसे अनन्तधर्म किसी प्रकारके विरोध बिना एक साथ वस्तुमे विद्यमान हैं और वही वस्तुका स्वरूप है। वस्तुमें उसके सर्व शुध्दधर्म एकसमान, तन्मयरूपसे विद्यमान हैं, उनमें कोई गौण नहीं है। वक्ता अपने अभिप्रायानुसार उनमें से किसी को मुख्य करके कथन करता है तब दूसरे धर्म भी गौणरूपसे उसकी स्वीकृतिमे हैं, उनका निषेध नहीं है। प्रत्येक वस्तु द्रव्य-गुण-पर्यायस्वरूप तथा उत्पाद-व्यय-ध्रुवस्वरूप स्वाधीन है, उसके द्रव्य -गुण-पर्यायमें किसीका हस्तक्षेप नहीं है। अपने स्वाधीन स्वरूप को समझनेवाला जीव अपने अनन्त धर्म स्वभावोंसे ही परितृप्त रहता है और सम्यक्त्वसे लेकर मोक्ष तक के सुखका अपनेमें ही अनुभव करते हैं।

धर्मोपदेशमें ऐसी सत् वस्तुकी प्ररूपणा करते-करते भगवान अनन्तनाथने साढ़ेसात लाख वर्षतक विहार किया और करोड़ों जीवोंको मोक्षमार्गमें लगाया… अन्तमें जब एक मास आयु शेष रही तब सम्मेदशिखर की स्वयंभू टूंक पर आकर स्थिर हुए; विहार और वाणी रूक गये… और जिस दिन केवलज्ञान प्रगट हुआ था उसी तिथि (चैत्र कृष्णा अमावस्या) को सम्पूर्ण योग निरोध करके, भगवान अनन्तनाथ तीर्थंकर अनन्तधर्मोकी शुद्धिसहित मोक्षपदको प्राप्त हुए। इन्द्रोंने मोक्षकल्याणक महोत्सव मनाकर पूजा की-

अनन्तनाथ जिनराजका, कूट स्वयंभू जेह;
मन-वच-तनकर पूज हूँ शिखरसम्मेद यजेह।

अनेकान्त स्वरूप आत्माके अनन्त धर्मोंको प्रकाशित करके अपने अनन्तधर्मोंकी शुद्धिसहित जो सिद्धालयमें विराजमान हैं–ऐसे ‘समयसार’ रूप शुद्धात्माको स्वानुभूतिसहित नमस्कार हो। प्रत्येक आत्मामें अपने अनन्तधर्म हैं, वे परसे भिन्न हैं; ऐसे एकत्व-विभक्त आत्मस्वरूपको दरशानेवाली तथा अशुद्ध भावोंको छुडाकर शुद्ध भावों को प्रगट करनेवाली भगवान अनन्तनाथ की अनेकान्त वाणी सदा प्रकाशमान हो। हे देव ! आपकी अनेकान्त सहित सम्यक्नयोंकी किरणोंने जगतके जीवोंको मिथ्यात्व अंधकारसे छुड़ाकर सम्यक्त्वका अपूर्व प्रकाश दिया है। अनन्तनयात्मक स्वानुभव-प्रमाण द्वारा अनन्तभवचक्रसे छुड़ानेवाले तथा अनन्तचैतन्य निधान की प्राप्ति करानेवाले अनन्तनाथ जिनको नमस्कार हो !

[इति श्री चौबीस तीर्थंकरोंके महापुराण में अनन्तजिन तीर्थंकर की मंगलकथा समाप्त हुई।]

[भरतक्षेत्रमे भगवान अनन्तनाथका धर्मशासन चार सागरोपम (असंख्यात वर्ष) तक चला, और उसमे असख्य जीव मोक्षको प्राप्त हुए। पश्चात् अन्तभागमें अर्द्धपल्योपम तक धर्मका विच्छेद रहा। भरत क्षेत्रमें यह छठवी बार धर्मविच्छेद हुआ।]

अनन्तचतुर्दशी (भाद्रपद शुक्ला चौदस)

दसलक्षण पर्वका अन्तिम दिवस भाद्रपद शुक्ला १४ ‘अनंतचतुर्दशी’ के रूप मे प्रसिद्ध है। भगवान अनन्तनाथके साथ उसका सम्बन्ध जोड़कर कुछ कथाकार एक कथा कहते हैं, जो इस प्रकार हैः- सोमशर्मा नामके एक मनुष्यने पूर्वभवमें किसीप्रकार धर्मकी निन्दा करके महान पापका बंध किया था; उस पापके उदयसे वह अत्यन्त निर्धन तथा कुष्ठ व्याधिसे ग्रस्त था; वह जहाँ भी जाता उसका तिरस्कार होता था; उससे वह बहुत खेदखिन्न और अशांत रहता था। एक बार भाद्रपद शुक्ला १४ के दिन उसने भगवान अनन्तनाथका समवसरण देखा उनके अचिन्त्य वैभवके दर्शन किये। समवसरणमें जाते हुए लोग बड़े उत्साहित एवं प्रसन्न थे, इसलिये वह भी उनके साथ भगवान के समवसरणमें जा पहुँचा। प्रवेश करते ही उसका रोग दूर हो गया, दरिद्रता मिट गई और भगवानके दर्शन तथा उपदेशसे उसे धर्मकी श्रध्दा हुई; व्रताचरण पूर्वक मरकर वह सोमशर्मा स्वर्गलोकमें महान विभूतिवान देव हुआ ! (इसीसे उस दिनको ‘अनन्तचतुर्दशी’ मानकर जिनेन्द्रपूजा-अभिषेक-उपवासादि विधिपूर्वक १४ वर्षतक ‘अनन्तचतुर्दशी’ व्रत करनेका लोगोंमे प्रचार हुआ है।) तत्पश्चात सोमशर्माका वह जीव स्वर्गलोकसे असंख्य वर्ष पश्चात् निकलकर भरतक्षेत्रमे विजयनगरका राजकुमार ‘अरिंजय’ हुआ। उसने राजगृही जाकर विपुलाचलपर समवसरणमें भगवान महावीर तीर्थंकर का उपदेश सुना, और उसे अपनी पूर्वभवकी आराधना का स्मरण हुआ; उसने सयम धारण कर लिया और कर्मक्षय करके अनन्त मोक्षसुख प्राप्त किया।

(इति अनन्तचतुर्दशी-व्रत-कथा)

१५

भगवान धर्मनाथ (भाग १)

[१५]

रत्नपुरी सम्मेदशिखर हे भगवान धर्मनाथ ! आप वीतरागी उत्तम क्षमादि दस धर्मोंके धारक हो; तथा उन धर्मोंका उपदेश देकर अनेक जीवोंके तारक हो; इसलिये उन धर्मोंकी उपासना पूर्वक मै आपको नमस्कार करता हूँ, और रत्नत्रयादि उत्तम धर्मोंसे शोभायमान आपके मंगल जीवन का आलेखन करता हूँ।

भगवान धर्मनाथ : पूर्वभव-वर्णन

भरतक्षेत्र के चौबीस तीर्थंकरों मे भगवान धर्मनाथ १५ वें तीर्थंकर थे और उनका चरणचिन्ह ‘वज्र’ का था। पूर्व भव में वे दशरथ नामके राजा थे और धातकी खण्डकें विदेहक्षेत्रमें सुसीमा नगरीका राज्य करते थे। धर्मप्रधान सुखों को भोगते हुए, पुण्य वैभव के बीच भी उनका चित्त जैनधर्म की उपासनामें लीन रहता था। एकबार चैत्री पूर्णिमा की रात में वे पूर्ण चन्द्र की शोभा निहार रहे थे… अहा, कितना सुन्दर है चन्द्रमा ! इतनेमें उस जगमगाते हुए चन्द्र की शोभा एक काले धब्बे से ढँकने लगी। अरे, यह क्या ? कहाँ गई वह शोभा ? उसके बदले यह काला धब्बा कैसा ?-यह चन्द्रग्रहण था। (देखो, चित्र पृ.२०८)वह देखते ही राजा दशरथ को वैराग्य भावना जागृत हुई कि-अरे, ऐसे सुन्दर चन्द्रमा को भी क्षण में राहु ग्रस लेता है और उसकी शोभा नष्ट हो जाती है; तो पुण्योदयसे प्राप्त हुए यह सब राजवैभव भी कहाँ स्थिर है ?। जिस प्रकार विशाल समुद्रके बीच जहाज पर बैठे हुए पंखी को उस जहाज के अतिरिक्त अन्य कोई शरण नहीं है; वह उड़-उड़कर अन्त में तो जहाज पर ही आयगा; उसी प्रकार संसार रुपी समुद्रमें जीवको अपने आतमाके सिवा अन्य कोई शरण नही है; सर्व संयोग पृथक् हो जानेवालेअध्रुव है; शान्ति के लिये अन्त में तो अपनी चैतन्य- नौका की ही शरण लेना है। यह जीव परिवार के निमित्त से जो पाप करता है उनका फल तो वह स्वयं अकेला ही भोगता है। पाप करके परिवार के लिए धन एकत्रित करना वह तो अपने शरीर के ऊपर गुड़का लेप करके चींटों को सौंप देने जैसा है,- जिसमे अपने को तो दुःख ही भोगना पडता है। ऐसे संसार से और धन- परिवार के मोह से बस होओ। तृषा शांत करने के लिये मृगतृष्णा के पिछे तो मूर्ख हिरन ही दौडते हैं, बुद्धिमान नहीं; मुमुक्षु-धर्मात्मा तो उसे छोडकर अपने चैतन्य सुखको साधते हैं। मैं भी कल प्रातःकाल मुनिदीक्षा ग्रहण करूँगा और स्वानुभव से देखे हुए अपने चैतन्य सुखको साधूँगा। इसप्रकार उन वैरागी दशरथ महाराजाने निश्चय किया…मानो मोक्षपुरीमें जाने हेतु धर्म के दश- रथ तैयार किये।

दूसरे दिन प्रातःकाल महाराजा दशरथने राजसभा में मंत्रियों के बीच जिनदीक्षा धारण करने की घोषणा की। अनेक लोगोंने महाराजा के वैराग्य की प्रशंसा की, परन्तु विचित्रमति नामके मंत्रीने जो कि नास्तिक जैसा था, और जिसे आत्माका या मोक्षका कोई ज्ञान नही था; उसने कहा कि- हे महाराज ! पाँच इन्द्रियोंके सर्व सुख आपके समक्ष उपस्थित हैं; इन प्रत्यक्ष सुखोंको छोडकर, अनदेखे अर्थात परोक्ष (अतीन्द्रय) सुखको प्राप्त करनेका उद्यम किस लिये करते हो ? शरीर से भिन्न आत्मा किसने देखा है ? परलोक और मोक्षसुख किसने देखे हैं ?..और आपको कौन से सुख की कमी है कि यह सब छोडकर दूसरे सुखके लिये वन में जाते हो ? इसलिये आप, व्यर्थ परिश्रम न करके यह जो राजसुख प्राप्त हुआ है इसीको भोगिये।

नास्तिक मंत्रीके विचित्र वचनोंका भावी तीर्थंकर महाराजा के मन पर कोई प्रभाव नहीं हुआ; उन्होने शांति एवं गंभीरतासे वैराग्य की दृढतापूर्वक मंत्रीको उत्तर दिया -'हे मंत्री, सुनो ! राज्य व्यवस्था में तुम्हारी बुध्दि जितनी चलती है उतनी आत्मतत्व के निर्णय में नही चलती। श्री जिनेश्वर भगवन्तोंने प्रत्यक्ष ज्ञानपूर्वक आत्माका स्वरूप सिध्द किया है, और जैनधर्म के प्रतापसे मुझे भी अपने स्वानुभव द्वारा देह से भिन्न आत्माकी सिध्दि हुई है, तथा विषय रहित मोक्षसुखके आस्वादन से उसकी प्रतीति हुई है। आत्मा में जैसा सुख है वैसा विषयों में कहीं नहीं है। कोई भी विषय सुख आत्माको कदापि तृप्ति नहीं दे सकते, परन्तु आकुलता ही उत्पन्न करते है, इसलिये वे वास्तवमें सुख नहीं किन्तु दुःख ही हैं। -ऐसा कहकर फिर महाराज दशरथने देह से भिन्न आत्माकी सिध्दि की -

देह से भिन्न आत्माकी सिध्दि

जीवको अंतर में जो सुख-दुःख की अनुभूति या विचार होते हैं उन अनुभूतियों या विचारोंको जीव स्वयं अंतरमें अपने वेदन से स्पष्ट जानता है कि’-मुझे ऐसे विचारआये।’ उसी समय दूसरा जीव पास बैठा हो और इस शरीर को देख रहा हो, तथापि इस जीवके विचारों को वह इन्द्रियों द्वारा नहीं जान सकता, क्योकि विचारो की उत्पत्ति शरीरमे नही होती किन्तु शरीर से भिन्न जीवमें होती है। जीव अरूपी है इसलिये उसके विचार एव अनुभूतियाँ भी अरूपी है; वे नेत्रादि इन्द्रियोंद्वारा दृष्टिगोचर न होनेपर भी इन्द्रियरहित स्वसंवेदनरुप ज्ञानसे जाने जा सकते हैं। इस प्रकार स्वसंवेदन करनेवाला जो तत्त्व है वही जीव है। शरीर की चेष्टाएँ इन्द्रियो द्वारा दिखायी देती है, क्योकी वे मूर्त है; वही रहनेवाले जीवके विचार इन्द्रियों द्वारा दृष्टिगोचर नही होते क्योकी वे अमूर्त है; इस प्रकार अरुपी एवं ज्ञानमय ऐसे जीवका अस्तित्व प्रत्येक को अपने स्वसंवेदनसे सिध्द हो सकता है। ‘मैं हूँ’ ऐसी अपनी अस्तिका जो वेदन है वही जीव है। ‘मै नहीं हूँ’ ऐसी अपनी नास्ति किसी प्रकार सिध्द नही हो सकती।

* तथा एक मनुष्यको अमुक ज्ञान है; हाथ-पैर कट जानेसे कहीं उसका ज्ञान उतना कट नहीं जाता, ज्योंका त्यों रहता है; क्योंकि ज्ञान शरीर मे नहीं था किन्तु शरीरसे भिन्न ऐसे जीव में ही था। वह ज्ञानमय जीव यदि शरीर से भिन्न नहीं होता तो, शरीर कटने से उतना ज्ञान भी कट जाता ! -परंतु ऐसा नहीं होता। इसप्रकार ज्ञान वह जीव का लक्षण है, शरीरका नहीं। शरीर संयोगी वस्तु होने से उसके दो टुकड़े हो सकते हैं; जीव असंयोगी होने से उसके दो टुकड़े किसी प्रकार नहीं हो सकते।

❖ तथा कई बार देखा जाता है कि- किसी जीव को शरीर में रोगादि प्रतिकूलता होनेपर भी अथवा शरीर अग्निमें जलता होनेपर भी शान्ति रखता है और धर्म ध्यान करता है; तथा किसी जीव को बाह्यमें स्वस्थ-सुन्दर शरीर होनेपर भी अंतर मे वह किसी भंयकर चिन्तामें जल रहा होता है। -इस प्रकार दोनों तत्त्वोंकी क्रिया बिलकुल भिन्न -भिन्न होती है। -ऐसी तभी हो सकता है यदि जीव और शरीर दोनों पदार्थ बिलकुल भिन्न हों।

-इसप्रकार महाराजने जीव का अस्तित्व और शरीर से उसकी भिन्नता समझायी; उसे सुनकर सभाजन तथा मंत्री भी प्रसन्न हुए।

मंत्रीने पूछाः हे महाराज ! आपने स्वसंवेदन से जीवकी सिध्दि की तथा शरीर और जीव की भिन्नता युक्तिपूर्वक समझायी, वह तो बराबर है; किन्तु इन बाह्य विषयों के बिना आत्मा में सुख कैसे होगा ? वह समझाइये।

महाराजने कहाः सुनो; विषयोके बिना ही आत्मामें सुख होता है उसकी सिध्दिः-अनादि से अभी तक जीव बाह्य विषयों मे मोहित होकर उनसे सुखी होना चाहता है, समस्त विषयों को वह भोग चुका है, परंतु अभी तक सुखी नही हुआ, किन्ही विषयोंमे से सुख या तृप्ति नहीं मिली;- क्योंकि उनमे सुख है ही नही; उनके पीछे दौडनेमें मात्र दुःख और आकुलता ही है। जब किसी धर्मात्मासे सुनकर या जानकर मुमुक्षु जीव अपने आत्मस्वरूप का शान्तिपूर्वक विचार करता है उस समय वह पाँच इन्द्रियोंके किसी भी विषयको वह भोगता नही हैं या उसका चिंतवन भी नही करता, आत्मविचार ही करता है कि- ‘मेरा आत्मतत्त्व शरीर से भिन्न है, उसे साधकर मैं मोक्ष प्राप्त करूंगा’ …ऐसे विचार के समय पाँच इन्द्रियोंके बाह्य विषय यद्यपि छूट गये हैं, परंतु वह जीव कहीं दुःखी नहीं होता, परन्तु अंतर मे उसे एकप्रकार की शान्तिका-सुखका वेदन होता है। वह आत्मा में अधिक गहराई तक उतरकर तन्मय हो तो उसे अतीन्द्रिय सुखका वेदन होगा; वही मोक्षसुखका स्वाद है। इस प्रकार विषयोंके बिना अकेले आत्मा से मोक्षसुख का अनुभव होता है। आत्मा व्दारा होनेवाला ऐसा सुख वह नित्य रहनेवाला परमार्थ सुख है। स्वसवदेन से मुझे ऐसे सुखकी प्रतीति हुई है, और उसकी पूर्ण साधना के लिये सर्व परिग्रह छोड़कर मैं आज वन में जाता हूँ। जिन्हे मोक्षसुख साधने की अभिलाषा हो वे भी मेरे साथ चलो !

वैराग्यवन्त महाराजाकी ऐसी सरस बात सुनकर समस्त सभाजन प्रसन्न हुए; और जब भावी तीर्थंकर उन महाराजा दशरथने जिनदीक्षा हेतु वनगमन किया तब हजारो प्रजाजन भी उनके साथ वन में गये। वहाँ श्री विमल वाहन भगवानके निकट सबने जिनदीक्षा धारण की। पश्चात दशरथ मुनिराज ने रत्नत्रयसहित उत्तम तप किया; उत्तम क्षमादि दसधर्मोंकी आराधना पूर्वक, दर्शनविशुध्दि, पंचपरमेष्ठी की भक्ति आदि गुणों का भी पालन किया और तीर्थंकर प्रकृति बांधी। अन्त में समाधि मरण करके सर्वार्थ सिध्दिमें देव हुए।

वे महात्मा आत्मज्ञानी थे, मुनिदशा कि वीतरागी शान्ति का उन्होंने अनुभव किया था; इसलिये सर्वार्थ सिद्धि को देवविमान में असंख्य वर्षोंतक रहनेपर भी उनकी चित्तवृत्ति शांत थी; देवियों के बिना भी वे महान सुखी थे। विषयों की वासना अथवा बाह्य विषयों के बिना भी आत्मा स्वयं उत्कृष्ट सुखरूप परिणमित हो सकता है-यह बात उनको तो ‘अनुभव सिध्द’ थी, और वह सुख दूसरों को 'अनुमानसिध्द’कराने के लिये वे ‘साधन’ हो रहे थे। अपने जैसे सर्वार्थ सिद्धिके देवोंसे वे सदा आत्मतत्वकी अद्भुत महिमाकी चर्चा और उसका चिन्तन करते थे। आत्मिकसुख से ही सुखी थे। उनका जीवन शुक्ललेश्यायुक्त अत्यन्त शांत था। अनेक असंख्यात वर्षों तक आत्माकी आराधना सहित वे सर्वार्थसिद्धिमें- सिध्दालयके पडोसमें रहे।

भावी तीर्थंकर ऐसे उन महात्माको सर्वार्थसिद्धिमें जब आयुके छहमास शेष रहे तब भरतक्षेत्र की रत्नपुरी नगरीमे एक सुन्दर घटना हुई…उसकी कथा अब सुनो।

रत्नपुरी में धर्मनाथ तीर्थंकर का अवतार

इस भरत क्षेत्र मे अयोध्याके निकट ‘रत्नपुरी’ नामकी सुन्दर नगरी है। असंख्य वर्षों पूर्व वहाँ के महाराजा भानुसेन (जिनका दूसरा नाम महासेन) और महारानी सुप्रभा (जिनका दूसरा नाम सुव्रता) था। वे भानु और सुप्रभा सम्पूर्ण राजवैभव सहित एवं गुणसम्पन्न होने पर भी एक बात से दुःखी थे. . अभी तक उनको पुत्रप्राप्ति नहीं हुई थी। पुत्रके बिना उन्हें राजभोग निरस प्रतीत होते थे। जिस प्रकार सम्यक्त्व रहित ज्ञानवैभव से या तपसामग्री से मुमुक्षु जीवका चित्त सन्तुष्ट नहीं होता, उसी प्रकार मातृहृदया महादेवीका चित्त महान राजभोग के बीच भी अतृप्त रहता, उन्हें कहीं चैन नही पडता था। भयसे भयभीत मुमुक्षु जिस प्रकार सम्यकदर्शन के लिये लालायित रहता है उसी प्रकार वह महारानी पुत्रप्राप्ति की लालसा रखती थी। दिन प्रतिदिन उसकी लालसा बढ़ती गई, और उसे उदास देखकर महाराजा भानु भी चिंतीत रहने लगे। जिस प्रकार सम्यक्त्व के लिये लालायित सच्चे मुमुक्षु को उसकी प्राप्ति अवश्य होती है, उसी प्रकार महापुण्यवंत महाराजा और महारानी को भी पुत्रप्राप्ति के सम्बन्धमें एक अद्भुत घटना हुई. . एक बार (कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी के दिन) वे राजसभा मे बैठे थे। इतने में अचानक वनपाल उत्साह पूर्वक वहाँ आया और महाराजाके चरणो में आम्रफल भेट किये। पके हुए सुन्दर आम्रफल देखकर सभाजन भी आश्चर्यचकित होगये; (क्योंकि अभी आम्रफल पकने का मौसम नहीं था।) फिर मालीने हर्षपूर्वक बधाई दी- हे महाराज ! आज अपने उपवनमें मैंने अद्भुत- आश्चर्यकारी दृश्य देखे -(चित्र सामनेवाले पृष्ठपर देखें )

एक सिंह का और एक गायका बच्चा साथ-साथ खेल रहे थे। सिंह और गाय एक साथ तालाब में पानी पी रहे थे; सिंह का बच्चा गाय को अपनी माँ समझकर उसका दूध पी रहा था और गाय का बच्चा निर्भय होकर सिंहनी का दूध पी रहा था; सिंहनी गाय के बच्चे को और गाय उस सिंहनी के बच्चे को दुलार रही थी। अभी मेरा आश्चर्य समाप्त हो इतने में मैंने देखा कि शेर और खरगोश दोनों एक साथ बैठे हैं, इस कार्तिक मासमें भी आम्रवृक्ष अचानक ही फलाच्छादित होकर झुक गये हैं; सचमुच असमयमें ही आम्र पक गये। यह सब आश्चर्यजनक घटनाएँ देखकर मैं विस्मय विमूढ होगया ! मैं आसपास खोज कर रहा था तो मैंने देखा कि-आकाशमार्ग से एक दिगम्बर मुद्राधारी साधु उपवनमे उतरे और शुध्द-स्वच्छ स्थान में बैठकर आत्मध्यान करने लगे। उनकी शांतमुद्रा अदभुत है, उनके दर्शनसे अलौकिक शान्तिका अनुभव होता है;- मोर और सर्प, शेर और बन्दर, हाथी और सिंह एक साथ मुनिराजके निकट बैठकर मानो शान्ति का अनुभव कर रहे हैं; कोई किसीकी हिंसा नही करता और न किसीको किसीका भय है। हे महाराज ! ऐसे ऋद्धिधारी मुनि महाराज का अपनी नगरी मे पदार्पण हुआ उसकी बधाई देने मैं आया हूँ।

टिप्पणी :-यहाँ धर्मनाथ स्वामी के अवतारसे पूर्व पन्द्रह मास पहले रत्नपुरी में ऋद्धिधारी मुनिराजके आगमन की जो सुन्दर घटना आप पढ़ रहे हैं वह भगवान धर्मनाथ के एक पुराण में से ली है। यद्यपि इस घटना का उल्लेख उत्तर पुराण में नहीं है, क्योंकि उसमें धर्मनाथ प्रभुके अवतारसे पूर्व कुछ काल तक भरत क्षेत्र में जैन धर्म का विच्छेद कहा है। ऐसा होने पर भी मुनिसमागम का यह प्रसंग धार्मिक रोमांच से भरपूर होने के कारण यहाँ लिया है। कथा साहित्य में इस प्रकार की छूट ली जा सकती है।

मुनिराज के आगमन की बधाई सुनते ही रत्नपुरी के महाराजा भानु आनन्दविभोर हो गये कि - अहा, मेरी नगरी में ऐसे मुनि भगवन्त का आगमन !-ऐसे हर्षोल्लास में पुत्र के अभाव की चिन्ता को भूलकर महारानी को साथ लेकर अत्यंत भक्तिपूर्वक उन मुनिराज के दर्शन हेतु तपोवन की ओर चले…लाखो प्रजाजन भी उनके साथ थे… तपोवन उपवन के निकट आते ही वहाँ की शोभा देखकर वे मुग्ध हो गये। सर्व ऋतुओं के रंग-बिरंगे पुष्पों एवं फलों की सुन्दरता को देखकर महारानी को ऐसा रोमांच हुआ मानो अब अपने जीवन-उद्यान में भी सुन्दर पुत्ररूपी पुष्प खिल उठेगा ! आगे बढ़ने पर ध्यानस्थ ‘प्रचेतस’ मुनिराज को देखा…अहा, कैसी तृप्ति ! जिनके चरणों की शीतल छाया में हिरन और शेर एकसाथ बैठे हैं और शान्ति से मुनिराज की मुद्रा निहार रहे हैं…नेवला और सर्प एक-दूसरे से सटकर शांति से बैठे हैं-न कोई भय है न वैरभाव !

वनके समस्त वृक्ष उत्तम फल-फूलों से झुक रहे हैं-मानो मुनिराज को वन्दन करके फलों द्वारा पूजा कर रहे हों ! मुनिराज तो अपने परमतत्त्व के अवलोकन में तल्लीन हैं, मानो सिद्ध लोक से आकर सिद्ध भगवान ही विराजमान हों !-ऐसे आनन्द का अनुभव वे कर रहे हैं। अहा, ऐसे साधु-संतका साक्षात् योग मुमुक्षु को इन्द्रपद की अपेक्षा विशेष हर्ष देनेवाला है।

रत्नपुरी के राजा-रानी के हर्ष की कोई सीमा नहीं थी। कुछ देर तो मुग्ध होकर वे मुनिराज को देखते ही रहे…मानो मोक्ष का अमृत पी रहे हो !-इस प्रकार वे समस्त संसार दुःख को भूल गये थे। मुनिराज का ध्यानयोग पूर्ण होने पर उन्होंने नेत्र खोले; उन नेत्रों से धर्म का अमृत झर रहा था। राजा-रानीने नमस्कार किया और मुनिराजने उन्हें धर्मवृद्धि का आशीर्वाद दिया। रानी सुप्रभा का हृदय आज किसी कल्पनातीत प्रसन्नता का अनुभव कर रहा था, उनके आत्मा मे धर्म की एक नई झंकार हो रही थी।

भानुराजाने विनयपूर्वक हाथ जोड़कर मुनिराज की स्तुति की-हे प्रभो ! आज अचानक आपके दर्शनों से हमें महान कल्याण की प्राप्ति हुई, हमारे पाप धुल गये, आप आकाशमार्ग से यहाँ पधारे वह हमारे किसी महाभाग का संकेत है। आपके दर्शन से हो रहा परम हर्ष हमारे अंतर मे नहीं समाता, और आपके श्रीमुख से धर्मकथा सुनने की उत्कण्ठा जागृत हुई है।

मुनिराज ने कहा-हे भव्य ! तुम दोनों जीव मोक्षगामी हो। संसार के चाहे जैसे पुण्यसंयोग भी जीवको तृप्ति नहीं दे सकते; जीवको तृप्ति दे ऐसा स्वभाव आत्मामें है; निजस्वभाव में सुखका जो भण्डार है उसे देखते ही अपूर्व सुखानुभव और तृप्ति होती है, उस सुखके लिये किसी बाह्यसामग्री की अपेक्षा नहीं होती। राजवैभवादि चाहे जितने होने पर भी जीव मानसिक चिन्ताओं से दुःखी रहता है। देखो, तुम्हें स्वयं ही अनुभव है कि अपार बाह्य पुण्यसामग्री होने पर भी तुम मानसिक चिन्ता से कितने दुःखी हो !!

राजा को लगा जैसे मुनिराज उनके मन की बात समझ गये हों ! इसलिये उन्होंने अपना हृदय खोलकर कहा-हे स्वामी ! आपकी बात सत्य है; सर्व प्रकार का राजवैभव होने पर भी हम पुत्र के बिना बहुत दुःखी हैं; पुत्रकी चिन्ता के कारण धर्मकी साधना में भी हमारा चित्त नहीं लगता, तो हे स्वामी ! हमारी पुत्रसम्बन्धी चिन्ता कब दूर होगी ?

श्री मुनिराज बोले-हे राजन् ! हे सुप्रभा माता ! सुनो ! तुम कोई सामान्य मनुष्य नहीं हो, तुम्हारे महान पुण्यका उदय आजसे ही प्रारम्भ होता है। तुम्हारी पुत्रेच्छा शीघ्र पूर्ण होगी,-इतना ही नहीं, तुम्हारा होनहार पुत्र तीन लोक को आनन्दित करेगा। आजसे ठीक छह मास पश्चात् महारानी के गर्भ में एक भव्य जीव आयगा, और वह भरतक्षेत्र में पन्द्रहवाँ तीर्थंकर होकर जगत का कल्याण करेगा। जगत के गुरु ऐसे तीर्थंकर के माता-पिता होने से तुम भी जगतपूज्य बनोगे।

वाह ! हमारे यहाँ पुत्र होगा और वह भी तीर्थंकर ! -यह बात मुनिराजके श्रीमुखसे सुनकर दोनों के हर्षका पार नहीं रहा। पन्द्रह मास पश्चात् अपनी रत्नपुरी में तीर्थंकर का अवतार होगा-यह जानकर समस्त प्रजाजन भी आनन्दित हो गये और सर्वत्र महान धर्मोत्सव का वातावरण छा गया। पुत्र के बिना दुःखी महारानी को एक साथ दो उत्तम पुत्रों की प्राप्ति हुई-एक तो सिद्धसुख का दाता ऐसा सम्यक्त्व-पुत्र उनके आत्मा में प्रगट हुआ, और दूसरा त्रैलोक्यपूज्य तीर्थंकर समान पुत्र की निकट भविष्य में प्राप्ति होगी ! अहा, उनके हर्ष का क्या कहना ! और यह हर्ष से भी जो राग बिना अतीन्द्रिय आनंद का अनुभव हुआ उनका तो क्या कहना ! उन्हें प्रतीति हो गई कि संसार में पुत्रसुख की अपेक्षा (भले ही वह पुत्र तीर्थंकर होनेवाला हो) सम्यक्त्व का सुख महान है और वही सच्चा सुख है। ऐसे अतीन्द्रिय सुख के विश्वास पूर्वक उसी क्षण उन्हें सम्यक्त्व की प्राप्ति हुई। स्त्री पर्याय में जन्म लिया तब तो वे मिथ्यादृष्टि थीं; परन्तु आज तीर्थंकर की माता बनने की विशिष्ट पात्रता होनेसे वे सम्यक्त्व प्राप्त करके पवित्र हुईं। तीर्थंकर समान धर्मरत्न जिस पात्र में रखा हो, वह तो सम्यक्त्व से पवित्र होगा ही न ! उनका आत्मा और शरीर दोनों पवित्र थे, अशुचिरहित थे।

इस प्रकार सम्यग्दृष्टि माता और उसकी कोख में सम्यग्दृष्टि पुत्र का अवतरण,-यह जानकर धर्मात्मा भानुराजा को महान प्रसन्नता हुई; साथ ही उन्हें एक जिज्ञासा जागृत हुई, इसलिये मुनिराज से पूछा-हे स्वामी ! हमारे घरमें तीर्थंकररूप से अवतरित होनेवाला वह जीव वर्तमान में कहाँ विराजमान है? और पूर्वभव में उसने ऐसी कोनसी साधना की, जिससे वह तीर्थंकर होगा ? -कृपा करके अपने दिव्य ज्ञान से जानकर हमें बतलायें।

श्री मुनिराज ऐसे तो अवधिज्ञान का उपयोग जहाँ-तहीं नहीं ले जाते; परन्तु विशिष्ट प्रयोजन समझकर एक तीर्थंकर आत्मा के पूर्वभव जानने के लिये उन्होंने क्षणभर अवधिज्ञान का उपयोग लगाया, और प्रसन्नतापूर्वक कहा : हे राजन्; सुनो ! वे होनेवाले तीर्थंकर वर्तमान में ‘सर्वार्थसिद्धि’ स्वर्गलोक में विराजते हैं, और वहाँ उनकी छह मास आयु शेष है। छह मास पूर्ण होने पर वे वहाँ से च्यवकर रत्नपुरी में तुम्हारे यहाँ अवतरित होंगे। तुम शीघ्र ही अनेक आश्चर्यजनक चिह्न देखोगे।

राजा-रानी तथा लाखों प्रजाजन अति हर्षपूर्वक मुनिराज के श्रीमुख से धर्मनाथ तीर्थंकर की आनन्दकारी कथा सुन रहे हैं। मुनिराज ने कहा : हे राजन् ! इससे पूर्व भवमें वे भव्यात्मा विदेहक्षेत्र की सुसीमा नगरी में दशरथ नाम के राजा थे। एक दिन चैत्रशुक्ला.पूर्णिमा को चन्द्रग्रहण देखकर वे संसार से विरक्त हुए और दीक्षा लेकर दर्शनविशुद्धि आदि १६ उत्तम भावनाओंपूर्वक तीर्थंकरनामकर्मरूप सर्वोत्कृष्ट पुण्यप्रकृति का बंध किया। अब वे तुम्हारे पुत्ररूप में 'अवतरित होकर भरतक्षेत्र के पन्द्रहवें तीर्थंकर होंगे और जैनधर्म का महान उद्योत करेंगे।

इस प्रकार प्रचेतस मुनिराज के श्रीमुख से अपनी नगरी में अवतरित होनेवाले धर्मनाथ तीर्थंकर के तीन भव की कथा सुनकर रत्नपुरी के प्रजाजनों में सर्वत्र आनन्द व्याप्त हो गया। राजा-रानी मुनिराजके धर्मोपदेश से तथा पुत्रप्राप्ति के समाचारों से तृप्त होकर नगर में लौटे। रत्नपुरी नगरी में तीर्थंकर का अवतार हो गया हो -इस प्रकार सर्वत्र आनन्द छा गया और उत्सव होने लगे।-वह दिन था कार्तिक शुक्ला त्रयोदशी का।

महाराजा भानु और महारानी सुप्रभा हाथी पर बैठकर अभी तो राजमहल के मुख्य द्वार में प्रवेश कर रहे थे कि उन्होंने आश्चर्यजनक घटना देखी-आकाश में से दिव्य रुप धारी देवियाँ उतर रही हैं और चारों ओर रत्नों की वर्षा हो रही है ! रत्नपुरी की शोभा में अचानक वृद्धि हो गई है ! कभी नहीं देखे अनुपम दृश्य देखकर प्रजा के हर्ष का पार नहीं था। उन देवियों ने राज महल में प्रवेश किया और राजा-रानी को वन्दन कर कहने लगीं-हे देव ! हे माता ! आप धन्य हैं ! आप तो जगत के माता-पिता हो। छह मास पश्चात् आपके यहाँ तीर्थंकर का आगमन होना है, इसलिये इन्द्र महाराजने हमें आपकी सेवामें भेजा है। हम दिक्कुमारी देवियाँ हैं, और तीर्थंकर की माता एवं बालतीर्थंकर की सेवा करने का महान लाभ हमें प्राप्त होता है-जिसके प्रताप से हम भी मोक्षगामी हैं। रत्नपुरी में प्रारम्भ होनेवाली यह रत्नवृष्टि भी आपके घर में तीर्थंकर के आगमन की पूर्वसूचना है; यह रत्नवृष्टि पन्द्रह मास तक होती रहेगी !

महाराजा भानु और महादेवी सुप्रभा यह सब सुनकर तथा दृश्य देखकर परमतृप्त हुए ! एक तो सम्यग्दर्शन की प्राप्ति और पश्चात् तीर्थंकर के कल्याणकों की प्राप्ति का सुअवसर ! सोने में सुगन्ध ! इससे अच्छा और क्या होगा ?

भगवान धर्मनाथ : पंचकल्याणक

उपरोक्त घटना को छह मास बीत गये. इतने में वैशाख शुक्ला त्रयोदशी की रात्रि को एक उत्तम घटना हुई। महादेवी सुप्रभा मीठी नींद मे सो रही थीं कि उन्हें-दिव्य हाथी, सिंह, वृषभ, लक्ष्मी, पुष्पमालाएँ, मगल घट, कल्लोल करती मछलियाँ, चन्द्र, सूर्य, सरोवर, देवविमान, नागभवन, सिंहासन, रत्नराशि एवं निर्धूम अग्नि-ऐसे सोलह मंगलस्वप्न दिखायी दिये; वे आनन्दविभोर हो गईं। अन्त मे ऐसा लगा जैसे एक हाथी उनके मुखमे प्रवेश कर रहा हो ! ठीक उसी क्षण सर्वार्थसिद्धि विमान में आयु पूर्ण करके तीर्थंकर के जीव ने उनके उदर में प्रवेश किया। स्वर्गलोक के वैभव से असंतुष्ट वे धर्मात्मा मोक्ष की साधना के लिये मनुष्य लोक में अवतरित हुए। ‘धर्म’ का अवतार हुआ। उसी समय पन्द्रहवें तीर्थंकर के गर्भकल्याणक का महोत्सव मनाने हेतु देव-देवेन्द्र आ पहुँचे। उत्तम वस्त्रालंकारों की भेट द्वारा माता-पिता का सन्मान करके उन्हे ‘जगतमाता’ एवं ‘जगत-पिता’ कहकर बहुमान किया। रत्नपुरी की शोभा दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी, प्रजाजनों में धर्मभावना जागृत हुई; माता सुप्रभा के विचारों में भी उच्च परिवर्तन हुआ। उन्हें ऐसी इच्छा हुई कि राज्य के कारागार में तथा पिंजरों में बन्द समस्त मनुष्यों एवं पशु-पक्षियों को बधन से मुक्त किया जाय ! उनकी कोख में मुक्त होनेवाला जीव पल रहा था, इसलिये उन्हें इच्छा भी वैसी उत्पन्न हुई कि-सर्व जीवों को मुक्ति मिले ! भगवान धर्मनाथ भी अवतार लेकर जीवों को मुक्ति का मार्ग बतलाकर बधन से मुक्त करानेवाले हैं।

आश्चर्य है कि नौ महिने गर्भ मे रहने पर भी उन बाल तीर्थंकर का शरीर अशुचिमय -मैला नहीं हुआ था। तीन ज्ञानधारी उन महात्मा का शरीर गर्भ में भी पवित्र था। देवियाँ गर्भ में भी उनकी सेवा करती थीं। उन पुत्र को गर्भावस्था के कोई दुःख नहीं सहना पड़ते थे; इतना ही नहीं, उनकी माता को भी कोई कष्ट नहीं होता था। देवियाँ चर्चा, विनोद, नाटक, संगीत आदि द्वारा सर्व प्रकार से उन्हें प्रसन्न रखती थी। आकाश से प्रतिदिन करोड़ो रत्नों की वर्षा होती थी।

माघ शुक्ला त्रयोदशी के दिन . अचानक १४ ब्रह्माण्ड में हर्ष छा गया…स्वर्ग के वाद्य अपने आप बज उठे . .माता सुप्रभाने धर्मपुत्र को अवतार देकर तीनों लोक को प्रकाशित कर दिया। अभी रत्नपुरी मे राजा-प्रजा को उसकी बधाई मिले उससे पूर्व ही तीर्थंकर के अवतार स्वर्गलोक में तथा नरक में भी पहुँच गया। नरक में कभी नहीं देखी गई शान्ति का अनुभव करके नारकी जीव भी दो क्षण चकित हो गये…और तीर्थंकर के अवतार का प्रभाव जानकर कितने ही जीवों ने सम्यक्त्व प्राप्त किया। सिंह, शशक, हाथी, बन्दर आदि तिर्यंचों के समूह आश्चर्यचकित होकर राजमहल की ओर आने लगे। स्वर्गलोक के देवेन्द्रों ने तीर्थंकर के जन्म की खबर पड़ते ही सिंहासन से उतरकर नमस्कार किया और भक्तिपूर्वक बाल तीर्थंकर के दर्शन करने रत्नपुरी में आ पहुँचे।

पश्चात् बाल प्रभु को सौ सूँढ़वाले ऐरावत हाथीपर विराजमान करके विदेहक्षेत्र के मध्य मेरु पर्वत पर ले गये… ‘अहा ! सर्व तीर्थंकरों को मैं अपने सिरपर धारण करता हूँ’-ऐसे महान गौरवपूर्वक वह मेरुपर्वत अपना मुँह एक लाख योजन (६४ करोड़ किलोमीटर) ऊँचा करके ठेठ सौधर्म स्वर्ग तक पहुँच गया। ऐसे उन्नत मेरुपर्वतपर उससे भी महान तीर्थंकर का जन्माभिषेक करके इन्द्रने आनन्दकारी ताण्डवनृत्य किया, और पश्चात् स्तुति करके प्रभुका नाम ‘धर्मकुमार’ रखा। उनके चरण में वज्र का चिह्न था। वह वज्र मात्र उनके चरणों में ही था-हृदय में नहीं था, हृदय तो फूल-सा कोमल था। प्रभुके जन्माभिषेक से मेरुपर्वत की शोभा इतनी अद्भुत हो गई थी जिसे देखकर देवों को भी शंका उत्पन्न होती थी कि-पहले हमने जो मेरुपर्वत देखा था वह यही है या कोई दूसरा नवीन मेरु प्रगट हुआ है । सचमुच, तीर्थंकर के सान्निध्य का प्रभाव कोई आश्चर्यजनक है। इन्द्र तो प्रभु को सम्बोधन कर कहता है-हे देव ! स्वर्ग के देव कोई इष्ट देव नहीं हैं, आप ही इष्ट देव हैं। आप मनुष्य हो-ऐसा मानकर यदि स्वर्गका कोई देव आपका अनादर करे तो वह अद्वितीय मूर्ख है, उस जैसा मूर्ख कौन होगा ? हे धर्म प्रभो ! आपके धर्मका स्वीकार करते ही स्वर्ग तो एकदम निकट आ जाता है; और आपके धर्मपर जो आरोहण करता है वह तो भवाटवी को पार करके मोक्षपुरी मे पहुँच जाता है। हे प्रभो ! जिसने आपके वचनों का आस्वादन किया उसे अमृत का क्या काम है ? जिसने आपकी प्रार्थना की उसे अब कल्पवृक्ष से क्या माँगना है ? जिसने हृदय में आपका चिन्तन किया वह अब चिन्तामणि से क्या याचना करेगा ? जिसने आपका कहा हुआ अनेकान्तमय तत्त्वज्ञान प्रगट किया उसे अब अज्ञान-अंधकार दूर करने के लिये चन्द्र-सूर्य की क्या आवश्यकता है ? और हे देव ! आपके द्वारा कथित स्वानुभूति का सुख जिसने प्राप्त कर लिया उसे सुख के लिये अब विषयों का क्या काम है ? प्रभो ! आप ही हमें धर्म के दाता तथा धर्म के रक्षक हो; इसलिये आप सचमुच धर्मनाथ है। इस प्रकार ‘धर्मनाथ’ नामसे सम्बोधन करके इन्द्रने बालतीर्थंकर की स्तुति की।

इस प्रकार आनन्दपूर्वक मेरु पर अभिषेक और स्तुति करने के पश्चात् जिनेन्द्रप्रभु की शोभायात्रासहित इन्द्र रत्नपुरी में लौटा; वहाँ माता-पिता एवं प्रजाजनों के समक्ष पुनः बालतीर्थंकर के जन्म का भव्य महोत्सव मनाया और आनन्दकारी अद्भुत नाटक का प्रदर्शन किया। साथ ही ताण्डव नृत्य भी किया। अहा, इन्द्र-इन्द्राणी स्वयं आकर जिस नगरी में नाचते हों उसके महाभाग्य का क्या कहना ।।

धर्मनाथ का अवतार होने से रत्नपुरी के हर्ष का कोई पार नहीं है; आज वह इन्द्रपुरी की अपेक्षा विशेष गौरव का अनुभव कर रही है ! इन्द्रपुरी के इन्द्र भी जिनके चरणों में झुक रहे हैं ऐसे तीर्थंकर देव का अवतार आज हमारे आँगन मे हुआ है और वे बाल-तीर्थंकर लाखों वर्षतक हमारी नगरी में रहेंगे, लाखों वर्ष तक हम उनके साथ रहकर उन बाल-तीर्थंकर को हँसते-खेलते-बोलते प्रत्यक्ष देखेंगे।-इस प्रकार रत्नपुरी के प्रजाजनों को हर्ष का पार नही था। जबकि उन अवधिज्ञानी एवं आत्मज्ञानी बालतीर्थंकर की ज्ञान चेतना तो हर्ष से पार तथा पुण्ययोग से भी अलिप्त वर्तती थी। धन्य थी उन धर्म कुमार की धर्मचेतना ! उनका अवतार होते ही देश के प्रजाजन निरोग हो गये थे। इतना ही नहीं, अब वे तीर्थंकर होकर भव्य जीवों के भवरोग को भी दूर करेंगे। अहा, तीर्थंकर का अवतार जगत में किसे सुख का निमित्त नही होता ? सचमुच तीर्थंकर का जन्म त्रिलोक आनन्दकारी है; उस समय सर्व जीव वैरभाव छोड़कर एक-दूसरे के मित्र बन गये थे। तीर्थंकर रुपी धर्मरत्न के समागम से उन नगरी का ‘रत्नपुरी’ नाम वास्तव मे सार्थक हो गया था। उनके प्रताप से नगरी में चारों ओर रत्न बिखरे पड़े थे, तथापि सब लोगो का चित्त उन जड़रत्नों में नहीं किन्तु चेतनवन्त ‘धर्मरत्न’ में ही लगा हुआ था। इन्द्र तो एकसाथ हजार नेत्र बनाकर प्रभु को निरखता हुआ आनन्द से नाच उठता था। बालतीर्थंकर धर्मनाथ को देख-देखकर सर्व जीव परमतृप्ति का अनुभव कर रहे थे।

कविगण ‘भगवान का मुख चन्द्र जैसा है’-ऐसा अभी तक कहते थे जब तक उन्होंने भगवान के श्रीमुख की शोभा अपनी आँखों से नहीं देखी थी। प्रभु के दिव्य मुख को साक्षात् देखने के पश्चात् तो उसे चन्द्र की उपमा देते हुए सकोच होता था। जैसे-दिव्य देवलोक के वैभव तभी तक सुखकारी या आश्चर्यकारी लगते है जब तक चैतन्य के अतीन्द्रिय सुख का साक्षात्कार नहीं हुआ है। चैतन्यसुख का रसास्वादन करने के पश्चात् वे विषयसुख चैतन्य सुख से विपरीत भासित होते हैं।

प्रभुका मुख कहीं चन्द्र जैसा तेजस्वी नही, किन्तु उससे भी अधिक तेजस्वी-आभावान था। उनकी आँख कहीं हिरन जैसी नहीं किन्तु उससे भी अधिक सुन्दर थी, मानो उसमें शांत रसका सरोवर भरा हो ! उनकी नाक कही तोते की नाक जैसी टेढ़ी नहीं थी, उससे अतिसुन्दर थी; उनके हाथ कहीं हाथी की सूढ़ जैसे नही थे, उससे अति बलवान थे। उनका कण्ठ कहीं कोयल जैसा नहीं था, किन्तु उससे अति मधुर था…मोर भी उनकी ध्वनि सुनकर नाच उठते थे !-इस प्रकार भगवान के बाह्य शरीर-अवयवों को भी अन्य अवयवों की उपमा लागू नहीं होती थी तो उनके अंतरंग अनुपम आत्मिक गुणों का तो क्या कहना ?

धर्मकुमार धीरे-धीरे बड़े होने लगे। नन्हें से पुत्र को सुप्रभा माता जब गोद में लेतीं तब उनके स्पर्श-सुख की तृप्ति से क्षणभर उनके नेत्र मुँद जाते ! और कभी-कभी तो उन बालतीर्थंकर के स्पर्शसुख के साथ अंतरमें चैतन्य स्पर्श के अतीन्द्रिय सुख का स्वाद भी ले लेती थीं; नन्हा धर्मकुमार भी आनन्दित होकर माता के हाथ का चुम्बन कर लेता और हँस-हँसकर उन्हें अनुपम-सुख देता था। माता भी पुत्रको चूम-चूम कर वात्सल्य का स्रोत बहाती थीं। वे बाल-तीर्थंकर मात्र माता की आँखों के नहीं किन्तु समस्त नगरजनों के भी ध्रुवतारे थे। नगरजनों की दृष्टि उनपर केन्द्रित थी। जिस प्रकार समुद्र के बीच ध्रुवतारा मार्गदर्शक होता है, उसी प्रकार संसार समुद्र के बीच बालतीर्थंकर का जीवन ध्रुवतारे की भाँति मोक्षका मार्ग प्रदर्शित करता था। प्रतिदिन प्रातःकाल वे राजमहल के झरोखों में आते और लाखों प्रजाजन उनके दर्शन करके अपने जीवन में धर्म की प्रेरणा प्राप्त करते। उन द्रव्य तीर्थंकर के दर्शन भी मंगलकारी थे…क्योंकि वह आत्मा त्रिकाल मंगल था :

‘बेटा, जन्म तुम्हारा रे…जगत को मंगलकारी है।’

धर्म कुमार को पूर्वभव से ही आत्मज्ञान था, अवधिज्ञान था; उनकी बुद्धि सर्व विषयों में पारंगत थी; अब उन्हें कौनसी विद्या पढ़ना बाकी थी जो दूसरे गुरु उन्हें पढ़ाते ? हाँ एक कैवल्यविद्या अधूरी थी, परन्तु उसके लिये तो स्वयं ही अपने गुरु-स्वयंबुद्ध थे। जगत्गुरु होने के लिये उनका अवतार था, इस भव में उन्हें किसी का शिष्यत्व करना पड़े ऐसा नहीं था।

धर्म कुमार अपनी समान आयु के बालकों के साथ जब खेलते-क्रीड़ा करते तब उनकी आनन्दमय चेष्टाएँ देखकर मोर भी हर्षित हो, पंख फैलाकर नाच उठते; हिरन और खरगोश भी निर्भयता से निकट आकर उछलकूद करने लगते; हाथी का बच्चा उन बालकुँवर को अपनी सूँड़ से उठाकर मस्तक पर बैठाता और सूँड़ में झुलाता था। यह देखकर वृक्षों पर बैठे हुए बन्दर चिल्ला-चिल्लाकर आनन्द से कूदते थे। नन्हीं सी देवियाँ उन्हें टिंगाटोली करके हाथों में झुलाती और इस बहाने बालप्रभु का स्पर्श पाकर किसी अनुपम रोमांच का अनुभव करती थीं।

१५

भगवान धर्मनाथ (भाग २)

धीरे-धीरे धर्म कुमार ने यौवनावस्था में प्रवेश किया। चोर की भाँति कामने भी उनके शरीर में किंचित् प्रवेश कर लिया; यद्यपि उनकी चेतना जागृत थी इसलिये वह कामचोर उनके सम्यक्त्वादि गुणों को लूट नहीं सकता था, तथापि उसने अपना किंचित् कार्य तो किया। एक बार विदर्भ देश के राजा की ओर से दूत आया और अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मनाथ के साथ करने का आमंत्रण लेकर आया। महाराजा भानुने वह आमंत्रण स्वीकार कर लिया और यथा समय धामधूमसे बारात लेकर दूल्हा धर्मकुमार विवाह के लिये चले। उनका वैभव अद्भुत था। कितने ही देवमित्र भी साथ रहकर उनकी सेवा करते थे। विदर्भ की ओर जाते समय बीच में गंगानदी आयी, परन्तु सेवक-देवों ने क्षण में ऐसे दैवी सेतु की रचना कर दी कि किसी प्रकार की असुविधा के बिना धर्मकुमार का हाथी और सेनासहित सारी बारात गगा के उस पार पहुँच गई। पश्चात् आगे चलने पर मार्ग में रमणीय विन्ध्याचल पर्वत और सुन्दरी-नर्मदा नदी आयी; वहाँ के अधिपतिने दूल्हाराजा धर्मकुमार से प्रार्थना की कि यहाँ विश्राम करके हमे पावन करे। तीर्थंकर होने के पश्चात् तो प्रभु विहार करेंगे, परन्तु उससे पूर्व धर्मराजकुमार पृथ्वीपर विहार करते-करते हमारी नगरी मे पधारे और साक्षात् दर्शन देकर हमें पावन किया-इस प्रकार सर्वत्र अति प्रसन्नता से हर्षविभोर होकर प्रजाजन उनका स्वागत-सत्कार करते थे। उनके वैभव की दिव्य शोभा देखकर लोग चकित हो जाते थे। सामान्य लोगों के लिये तो यह एक आश्चर्य की बात थी कि-अरे ! मुक्तिसुन्दरी का वरण करने के लिये अवतरित यह धर्मराजा एक राजकन्या का वरण करने जा रहे है !! परन्तु उन्हे भगवान के हृदय का कहाँ पता था ? इसलिये राजकुमार धर्मनाथ जब विवाह के लिये बारात लेकर जाने को तैयार हुए तब किसी सखीने ईर्षावश मुक्ति सुन्दरी से कहा कि -तुम्हारे पति तो दूसरी स्त्री से विवाह करने जा रहे है ! यह सुनकर मुक्तिसुन्दरी को किंचित् भी आघात नही लगा, उसने निःशंक होकर उत्तर दिया हे सखी ! मै अपने स्वामी के हृदय को जानती हूँ..मैंने तो पहले से ही निश्चय कर लिया है कि विवाह करूँगी तो इन परमात्मा से ही करूँगी, और उन्होने भी पूर्व के तीसरे भवमें ही मुझसे विवाह करने का वचन दिया है तीर्थंकर प्रकृति उमकी साक्षी है। वर्तमान मे भले ही वे पुण्ययोग से किसी अन्य स्त्रीसे विवाह कर ले, परन्तु उनके हृदय मे तो मेरा एकका ही स्थान है, अन्य किसी का नही। और अभी वे महान ‘परमात्मा’ नही हुए है, यह तो उनके बचपन का खेल है, जब वे बड़े परमात्मा होगे तब मेरे सिवा किसी के साथ परिणति नही जोड़ेंगे। -इस प्रकार मुक्तिसुन्दरी ने भगवान के अन्तरग जीवन की अद्भुत बात समझायी और इस प्रकार उदयभाव तथा धर्मभावों की भिन्नता भी बतलायी। वास्तव मे विवाह के समय भी महाराजा धर्मनाथ अपनी मुक्तिसाधक चेतना को नही भूले थे, वह तो उनके हृदय मे तन्मयरूप से विद्यमान ही थी। साधक की लीलाएँ अलौकिक होती है; उनमें एकसाथ दो-दो भाव क्रीड़ा करते है; उन दो भावों की भिन्नता कोई विरले ही जान सकते हैं।

चलते-चलते विदर्भ देश मे पहुँचे। वहाँ के महाराजा ने अतिभव्य स्वागत किया-अहा, एक भावी तीर्थंकर हमारे आँगन मे पधारे है ! और ऐसे उत्कृष्ट पुण्यात्मा के समागम से राजकुमारी शृंगारवती ने अपना परम सौभाग्य माना। विवाह करके कुछ दिन वहाँ रहे। इतने मे रत्नपुरी से महाराजा भानुने उन्हें बुलाने के लिये विशेष दूत भेजा, और दैवी-विमान मे बैठकर युवराज धर्मकुमार अपनी रानी सहित रत्नपुरी पहुँचे। माता-पिताने परम हर्षपूर्वक उन्हें आशीर्वाद दिया। योग्य समयपर धर्मनाथ की रानी शृंगारवती ने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया ‘सुधर्मकुमार’।

महाराजा धर्मकुमार की आयु दस लाख वर्ष की थी; दो लाख पचास हजार वर्ष की आयु में रत्नपुरी के राजसिंहासनपर उनका राज्याभिषेक हुआ। पाँच लाख वर्ष तक धर्म की प्रधानता सहित भली भाँति राज्य का संचालन किया। समस्त राजा उनका सन्मान करके उत्तम भेट देते थे; उन्हे कहीं युद्ध नहीं करना पड़ा, शान्ति पूर्वक राज्य किया। उनकी छत्रछाया मे प्रजाजन सर्व प्रकार से सुखी थे। वह प्रजा प्रशसनीय है जो अपने चित्त मे सदा जिनेन्द्र का चिन्तवन करती है; जबकि यहाँ: तो स्वय जिनेन्द्र ही सदा प्रजाहित का चिन्तवन करते थे .तो उस रत्नपुरी की प्रजा के पुण्य का क्या कहना !! उनके देश में कहीं दुर्भिक्ष, चोरी-डकैती या महामारी नहीं थी। जिनके जन्म से पूर्व आकाश से रत्नों की वर्षा हुई, तो उनके शासनकाल मे उत्तम जलवृष्टि हो उसमे क्या आश्चर्य ! इससे प्रजाजन सदा नये-नये मगल-उत्सव करते थे। राज्य की सम्पत्ति के लिये प्रजा के उपर किसी करका भार नहीं. डाला जाता था। प्रजाजन स्वेच्छा से उत्तम वस्तुएँ ला-लाकर राज्यभण्डार छलका देते थे तथा राज्य का भंडार भी प्रजाजनों के लिये सदा खुला रहता था। प्रभु धर्मनाथ का राज्य वास्तव में धर्मराज्य था; उनके राज्य में मात्र रत्नपुरी में नहीं, समस्त भरतक्षेत्र में जैनधर्म को पुनर्जीवन मिला था और जैनधर्म की समृद्धि दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी।

धर्मकुमार को राजभोग दशामें आयु के सात लाख पचास हजार वर्ष बीत गये. एक बार माघशुक्ला त्रयोदशी को उनके जन्मदिन का भव्य उत्सव मनाने की तैयारियाँ चल रही थीं .देवों ने आकर रत्नपुरी का अद्भुत श्रृंगार किया था। रात्रि को चन्द्रमा के प्रकाश मे महल की छत से रत्नपुरी की अनुपम शोभा निहारते हुए अपने जीवन का विचार कर रहे थे ..इतने मे अचानक खर…खर…खर की ध्वनि के साथ एक चमत्कार हुआ…क्या हुआ ? उल्कापात हुआ. ,विशाल तारा प्रकाश की तेज रेखा खींचता हुआ खिर गया। तुरन्त ही महाराज के चित्त मे भी वैराग्य की बिजली कौंध गई, दिव्य चेतना का चमत्कार हुआ। उनका आत्मा पुकार उठा-अरे, अपने शुद्ध आत्मा को जानकर भी अब उसे इस संसार के कारागृह में पड़ा हुआ कैसे देखा जा सकता है ? अब मैं अपने आत्मा को संसाररूपी कारागृह से शीघ्र ही छुड़ाऊँगा। मेरा आत्मा भवभ्रमण कर-करके बहुत थक गया है, अब एक भी भव में भ्रमण करना सहन नहीं कर सकता; अब तो बस, इस भवचक्रका अंत करके, मोक्षपुरी में जाकर सदाकाल-शाश्वत सिद्धसुखमें रहना है; उस सिद्धपदकी साधना पूर्ण करने हेतु मैं मुनिदशा अंगीकार करूँगा। यद्यपि तीर्थंकर प्रकृति होने, से इसी भव मे मोक्ष निश्चित है, किन्तु उससे क्या ? शुद्धोपयोगी होकर स्वरूप में लीन होऊँगा तब केवलज्ञान होगा; कहीं तीर्थंकर प्रकृति मुझे केवलज्ञान नही देगी। अस्तु, कषाय है तभी तक (आठवें गुणस्थान तक ही) वह बँधेगी, और मुझे केवलज्ञान होने तक तो वह तीर्थंकर प्रकृति छूटकर मेरे आत्मा में से भागने लगेगी। उसका और मेरा क्या सम्बन्ध ? मेरा केवलज्ञान तो मेरा क्षायिकस्वभाव है, और तीर्थंकर प्रकृति तो विभावकृत है वह जड़ है, मैं चेतन हूँ। हम में अत्यन्त भिन्नता है। देखा तो सही, भेदज्ञानी प्रभुका वीतरागी चिन्तन ! -ऐसा वैराग्यचिन्तन करते-करते प्रभु को जातिस्मरण ज्ञान हुआ-पूर्वभव में आकाश में चन्द्रग्रहण देखकर वैराग्य हुआ था और इस भव में आकाश से खिरते हुए तारे को देखकर वैराग्य हुआ।

इस प्रकार जन्मदिन के उत्सव के समय वैराग्य प्राप्त करके धर्मनाथ प्रभु दीक्षा लेने को तैयार हुए; राजमहल से तपोवन में जाने को और रागी से वीतरागी होने को तत्पर हुए; प्रभुने जिनदीक्षा ग्रहण करने का निश्चय किया कि तुरन्त पंचम स्वर्ग से लौकान्तिक देवों ने आकर स्तुति करते हुए कहा : हे देव ! आप साक्षात् धर्म हैं, आप दीक्षा हेतु जो वैराग्यचिन्तन कर रहे हैं, वह मात्र आपको ही नहीं किन्तु जगत के भव्य जीवों को भी कल्याणकारी है। अहा, वैराग्यमय दीक्षा का यह अवसर धन्य है ! आपकी जिनदीक्षा वह मोहशत्रु का सर्वनाश करने के लिये अमोघ कृपाण है। आपकी यह दीक्षा आपको तथा जगत को रत्नत्रय-निधान प्राप्त करायगी; हम भी उस धन्य अवसर की भावना भाते हैं और आपका अनुमोदन करते हैं। इस प्रकार स्तुति करके वे देव ब्रह्मस्वर्ग में चले गये। उसी समय इन्द्र महाराज धर्मनाथ भगवान का दीक्षा कल्याणक मनाने के लिये ‘नागदत्ता’ नामकी दिव्य पालकी लेकर आ पहुँचे। जन्म कल्याणक की भाँति दीक्षा के समय भी इन्द्रने प्रभुका अभिषेक किया, किन्तु ताण्डवनृत्य नहीं किया, क्योंकि प्रभुके वैराग्य-समुद्र में उसका चित्त भी वैराग्य से भीग गया था। यद्यपि देवों ने दिव्यवाद्य बजाये, परन्तु उनमें से हर्ष की ध्वनि के बदले शान्ति के प्रशांत स्वर निकल रहे थे। प्रभु ने सर्व जीवों के प्रति प्रशांत रस झरती हुई अमृतदृष्टि से देखा, सर्वत्र रागद्वेषका शमन करके समभाव धारण किया; प्रभुकी परम शांतदृष्टि को लोग स्तब्ध होकर देख रहे थे। उनसे क्या कहा जाय…उसकी किसी को कोई सूझ नहीं पड़ती थी। “अब हमें छोड़कर भगवान अपने जीवन का एक अति उत्तम कार्य कर रहे हैं, और कुछ ही काल में वे परमात्मा होकर रत्नपुरी में पधारेंगे !” ऐसी महान भावनापूर्वक सब लोग अब क्या होता है वह कौतूहल से देख रहे थे। जिनदीक्षा का यह प्रसंग उनके लिये बिलकुल नवीन था; वैराग्य के नये-नये दृश्य देखकर उन्हें आश्चर्य तथा आनन्द भी होता था-अहा, ऐसे महान वैभवशाली महाराजा यह सब छोड़कर तपोवन में आत्मा की साधना के लिये जा रहे हैं ! धन्य है उनकी शूरवीरता को ! धन्य है उनके वैराग्य को !!

इधर संसार की अनित्यता आदि बारह भावनाओं के चिन्तन मे तत्पर महाराज धर्मनाथ वनगमन हेतु पालकी में विराजमान हुए…उस समय इन्द्रने हाथ बढ़ाकर प्रभु को सहारा देने की व्यर्थ चेष्टा की; तथापि उसको अपने लिये तो वह सफल हुई -अहा, उस बहाने त्रिलोकीनाथ ने उसका हाथ पकड़ा !.. मानों प्रभुको हाथ देकर वह कहता था कि-‘हे देव ! मैं विवश हूँ कि देवपर्याय में होने के कारण आपके साथ दीक्षित नहीं हो सकता, परन्तु अपना हाथ आपके हाथ में देकर, यह देवपर्याय पूर्ण होते ही आपके मार्ग में-मोक्षमें आ रहा हूँ।’

पालकी में आरूढ़ होकर प्रभु रत्नपुरी के मनोहर वन में पहुँचे। सिर मुकुट उतारा, गलेसे हार निकाला, वस्त्राभूषण छोड़े और सिरके केशों का लुंचन किया। सिद्धों को वन्दन करके प्रभु आत्मध्यान में एकाग्र हुआ और शुद्धोपयोग द्वारा रत्नत्रय प्रगट करके मुनि बने। अन्य कितने ही राजा तथा प्रजाजन भी वैराग्य प्राप्त कर प्रभु के साथ दीक्षित हो गये; कितने ही धर्मात्मा मनुष्य तथा तिर्यंचोंने भी उस समय श्रावक के देशव्रत धारण किये और कितने ही जीव वह दृश्य देख कर विषयों से तथा राग से भिन्न आत्मा के शांत स्वरूप की पहिचान करके सम्यग्दृष्टि हुए। चारों ओर धर्म का प्रभाव फैल गया;

रत्नपुरी मानो धर्मपुरी बन गई।

महाराज धर्मनाथ ने रत्नहार छोड़कर रत्नत्रय अंगीकार किये। अब वे बाह्य में वस्त्रालंकार रहित होने पर भी उन्होंने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र से निर्मित सुन्दर रत्नाहार द्वारा अंतर में अपने आत्मा का ऐसा श्रृंगार किया कि मोक्षसुन्दरी भी उनपर मोहित होकर उनका वरण करने को उत्सुक हुई।

केशलुंच के समय प्रभुने मात्र काले बालों को नहीं किन्तु अंतर के काले कर्मों को भी जड़ से उखाड़कर फेंक दिया था। अरे, यह बाल पहले प्रभुके सिर पर शोभायमान थे, ऐसा विचार कर इन्द्रने उन बालों को आदरपूर्वक रत्नमणि की पेटी में रखा और फिर लाखों योजन दूर पवित्र क्षीरसागर में उनका क्षेपण कर दिया।

भगवान का आज ही जन्म हुआ हो इस प्रकार वे निर्वस्त्र एवं निर्विकार थे…तथापि वीतरागता से अद्भुत शोभायमान हो रहे थे। भव्य जीवों ने देखा कि जीव की सच्ची शोभा बाह्य अलंकारों द्वारा नहीं किन्तु सम्यक्त्वादि वीतरागभाव द्वारा ही है।

मुनिराज धर्मनाथ जब ध्यानयोग में स्थिर होते, तब देखनेवालों को ऐसा लगता था कि-क्या यह भगवान की मूर्ति है ? उनका चरित्र ऐसा उत्तम था कि-शंकर-महादेव सहित समस्त विश्व को जीतनेवाला बेचारा कामदेव उनके सामने दृष्टि भी नहीं डाल सकता था ! शंकर के तो क्रोधसे खुला हुआ तीसरा नेत्र था, उसके सामने वह भस्म हो गया था, तब फिर जिन-मुनिराजको तो वीतरागता से खुले हुए चार नेत्र थे, उनके समक्ष वह कैसे टिक सकता था ?

अरे, उन शांत मुनिराज के समीप एकेन्द्रिय ऐसे वायु और बनस्पति भी अनुकूल प्रवर्तन करते थे, प्रतिकूल नहीं होते थे, और प्रभुके सान्निध्य में प्रसन्नता से खिल उठते थे; तो फिर सिंह या सर्प जैसे पंचेन्द्रिय जीव अपना दुष्टभाव छोड़कर, प्रभुके निकट शांत एवं अनुकूल वर्तन करें-इसमें क्या आश्चर्य ! वे धर्ममुनिराज यद्यपि बोलते नहीं थे तथापि सबको मोक्षमार्ग समझाते थे; स्वयं प्रयोग से साक्षात् मोक्षमार्ग दर्शाते थे; वे स्वयं मोक्षमार्ग थे।

भगवान का चारित्र आश्चर्यकारी था-यद्यपि वे समभावी थे, तथापि चिर-परिचित राग के प्रति अनादरबुद्धि और नवीन परिचित ऐसी मुक्ति के प्रति पक्षपात रखते थे, क्योंकि अभी पूर्ण वीतराग नहीं हुए थे। उनका चित्त स्फटिक जैसा नहीं किन्तु उससे भी अधिक निर्मल था, क्योंकि स्फटिक पत्थर तो बाह्यविषयों के संसर्ग से विकृत हो जाता था, परन्तु इन धर्ममुनिराज का चित्त किन्हीं भी बाह्यविषयों द्वारा विकृत नहीं होता था, अपने स्वरूप में ही स्थिर और शुद्ध रहता था।

इस प्रकार मुनिराज धर्मनाथ उपवासपूर्वक दो दिन तक आत्मध्यान में रहे। तीसरे दिन पारण हेतु पाटलीपुत्र नगरी में पधारे, वहाँ उत्तम दाता ऐसे महाभागी धन्यसेन राजाने उन उत्तम सुपात्र को आहारदान दिया। उत्तम दान के अवसर पर देवोंने भी आनन्दित होकर वहाँ पुष्पवृष्टि, मंगलवाद्य आदि पंचाश्चर्य प्रगट किये और ‘अहो दानं…महादानं’-ऐसी आकाशवाणी द्वारा उस दान की प्रशंसा की। धर्म मुनिराज मौन ही रहते थे; मौन होने पर भी उनका श्रुतज्ञान तो अंतर में केवल ज्ञान को पुकार-पुकार कर बुला रहा था…और उस श्रुतज्ञान के अतीन्द्रिय नाद को सुनकर केवलज्ञान अति शीघ्रता से उनके पास आ रहा था।

इस प्रकार स्वानुभव से चैतन्य की मस्ती में झूलते-झूलते करीब एक वर्ष तक विहार के पश्चात् प्रभु धर्म मुनिराज पुनः रत्नपुरी के उसी दीक्षावन में पधारे और ध्यान योग में स्थिर हुए। उनके शुद्धोपयोग की धारा एकदम वृद्धिंगत होने लगी। उन्होंने अपूर्व शुक्लध्यान द्वारा क्षपक श्रेणी में प्रवेश किया और अति शीघ्रता से चौथे कल्याणक के हेतुभूत ऐसा पचमज्ञान प्रगट करके तीर्थंकर परमात्मा बन गये। ‘पौष शुक्ला पूर्णिमा’ को इन्द्रोंने प्रभुके केवलज्ञान-कल्याणक का भव्य महोत्सव मनाया। प्रभुके केवलज्ञान से प्रभावित होकर जड़- आकाश भी प्रसन्नता से वाद्य बजाने लगा और सर्वत्र निर्मल हो गया, तो फिर चेतनवंत जीवों का चित्त प्रसन्न एवं निर्मल हो जाय उसमें क्या आश्चर्य !!

रत्नपुरी के भाग्यवान जीवों ने अपनी नगरी में तीर्थंकर प्रभुके चार कल्याणक प्रत्यक्ष देखे। उनमें भी जन्म कल्याणक की अपेक्षा केवलज्ञान-कल्याणक की विशेषता थी, क्योंकि जन्मकल्याणक के समय रत्नपुरी के प्रजाजन मेरुपर्वत पर नहीं जा सके थे, जबकि इस केवलज्ञान कल्याणक के समय तो धर्मनाथ भगवान की धर्मसभा मे देवों के साथ मनुष्य और तिर्यंच भी आये और प्रभु की वाणी सुनकर धर्म प्राप्त किया। पहले मुनिदशा के समय मौनव्रत था, अब केवलज्ञान होने पर भगवानने उस मौन को भंग कर दिया, उनकी दिव्यध्वनि खिरने लगी। यद्यपि वाणी निकलने पर भी भगवान तो मौन ही थे, क्योंकि एक तो उन्हें वचन सम्बन्धी कोई विकल्प नही था, और दूसरे उनके सर्वांग से ध्वनि उठती थी इसलिये ओष्ठ नहीं खुलते थे; -इस प्रकार एकसाथ सात सौ भाषाएँ बोलने पर भी भगवान तो मौन ही थे..वास्तव मे यह एक आश्चर्यजनक बात है ! ऐसा आश्चर्यकारी अतिशय हे तीर्थंकर देव ! आपके अतिरिक्त अन्य किसी का नहीं हो सकता। एक समय मे उत्पाद-व्यय-ध्रुवरूप वस्तुस्वभाव का प्रकाशक आपका केवलज्ञान सर्व जीवों को आनन्दकारी है। एक ही प्रदेश में तथा एक ही समय मे एकसाथ वस्तुका उत्पाद-व्यय-ध्रुवपना,-उसे जानने की शक्ति हे सर्वज्ञदेव ! आपके ही ज्ञान में है; इसलिये आपके द्वारा उपदेशित अनेकान्तमय वस्तुधर्म ही सत्य है। प्रभुकी वीतरागवाणी सुनकर अनेक देव, मनुष्य एव तिर्यंच आत्मज्ञान को प्राप्त हुए; -उनमें व्रत-महाव्रत ग्रहण करने के लिये तो देवों की अपेक्षा मनुष्य विशेष अधिकारी थे। उस अधिकारी की विशेषता से अरिष्ट सेन आदि भव्यात्मा, प्रभुके निकट ही पचमहाव्रत अंगीकार करके उनके गणधर बने और उन्हे तत्काल ही बारहअंगरूप श्रुतकेवलीपना तथा मनःपर्ययज्ञान एव आकाशगामित्वादि अनेक लब्धियाँ प्रगट हुईं। ऐसे तेतालीस गणधर प्रभुकी सभा को सुशोभित करते थे। उस समवसरण मे तीर्थंकर प्रभुके समकक्ष अन्य साढ़े चार हजार अरिहत-केवली भगवंत श्रीमण्डप के ऊपर आकाश मे विराजते थे अदभुत था वह दृश्य ! उस परमात्मसमूह को देखते ही आत्मा शांतरस में निमग्न हो जाता था। तदुपरान्त अवधिज्ञानी, मन पर्ययज्ञानी, वादी, विक्रियालब्धिधारी, बारह अगधारी तथा उपाध्याय,-ऐसी विशेषताओ से विभूषित हजारों मुनिवरों सहित कुल चौंसठ हजार मुनिवर, बासठ हजार चारसौ आर्यिकाएँ; दो लाख श्रावक एव चार लाख श्राविकाओं के धर्मसंघसहित प्रभुकी धर्मसभा अतिशय सुशोभित होती थी। अहा, वह तो प्रभुकी नगरी में मोक्षगामी जीवों का विशाल मेला था।

इस प्रकार धर्म तीर्थंकर के सान्निध्य में चेतनवंत भव्यजीव तो धर्म प्राप्त करके आनन्द से खिल उठे थे, तथा आकाश और पृथ्वी, वायु और वृक्ष-यह भी सब हर्ष से रोमांचित हो गये थे। आकाश मे वाद्य बजने लगे और पुष्पवर्षा होने लगी, वायु सुगन्धित हो गई, वृक्ष भी कल्पवृक्ष बनकर इच्छित पदार्थ देने लगे। अरे, वहाँ की वापिकाओं का जल भी इतना उज्ज्वल-स्वच्छ हो गया कि उसमें मात्र अपना मुँह नहीं किन्तु पूर्वभव भी दिखने लगे। प्रभुके आसपास का जल भी जब इतना पवित्र हो गया तब वहाँ के जीवों का ज्ञान कितना पवित्र हुआ होगा !! वहाँ पूर्व-पश्चिम या उत्तर-दक्षिण चारों दिशाओं मे बैठे हुए जीवों को ऐसा लगता था कि हम प्रभुके सन्मुख ही हैं। भगवान का मुख चारों दिशाओं से एकसमान ही दिखता था। प्रभुका मुख चारों दिशाओं मे होने पर भी उनका उपयोग कही चारों दिशाओंमें नहीं फिरता था, उपयोग तो अपने स्वरूप में ही लीन था। स्वमें लीन रहकर ही वे समस्त स्व-पर को जानते थे। ऐसा केवलज्ञान वह प्रभुका सर्वोत्कृष्ट अतिशय था। उसके अतिरिक्त अन्य अनेक अतिशय थे।

भगवान को क्षुधा-तृषा नहीं थे इसलिये आहार-जल का ग्रहण भी नहीं था। लाखों वर्ष तक आहार-जल के बिना पुण्य-अतिशय के कारण उनका शरीर ज्यों का त्यों तेजस्वी था। आत्मामें से प्रगट होते पूर्ण आनन्द के आहार से, तथा परमशान्ति के पानसे वे परमात्मा सम्पूर्ण तृप्त थे। उनका मोहरूपी रोग सम्पूर्ण दूर हो गया था इसलिये अन्य रोगों को भी कोई अवकाश नहीं था। शेष बचे चार कर्म तो कथन मात्र ही थे; कहीं उन कर्मों का उदय उनको बंध का कारण नहीं होता था; अपितु भव्यजीवों को धर्मप्रभावना का ही हेतु था। भगवान के अनंत चेतनचक्षु एकसाथ खुल गये, वहाँ इन बेचारे दो जड़ नेत्र तो हताश होकर ऐसे स्तब्ध हो गये कि पलक झपकने की शक्ति भी गँवा बैठे। प्रभु के पाप तो दूर हो गये थे, परन्तु उनके प्रभाव से अन्य जीवों के पाप भी ऐसे दूर भाग गये कि उनके आसपास दो सौ योजन में (अर्थात् ढाई हजार किलो मीटर में) रहनेवाले किसी जीव को रोग, हिंसा, चोरी, दुर्भिक्ष आदि कोई उपसर्ग नहीं होता था। सिंह और हिरन, नेवला और सर्प एक-दूसरे के मित्र होकर शान्तिपूर्वक साथ रहते थे। रोगियों का रोग दूर हो जाता था; वहाँ कोई अपाहिज या दरिद्र नहीं रहता था…मात्र बाह्य नहीं अंतर के चैतन्यवैभव को भी अनेक जीव प्राप्त करते थे।

अहा, प्रभुकी महिमा का कितना वर्णन किया जाये ! उन परमात्मा की पूर्ण महिमा जानने के लिये तो उनके जैसा होना पड़ेगा, क्योंकि वह ज्ञानगोचर है वचनगोचर नहीं है। अहा, इन्द्र जिनकी सेवा करने आये और इन्द्रलोक की सामग्री लाकर भक्तिसहित पूजा करे उन परमात्मा की महिमा का क्या कहना !! इससे ऐसा सिद्ध होता था कि-जो जीव इन्द्रपद की विभूति का भी अनादर कर सकता हो वही अपने चित्त में जिनदेव की उपासना कर सकता है। इन्द्र के वैभव की भी अभिलाषा छोड़कर जिनपद की भावना में जो अपना चित्त लगाता है वही मोह को जीतकर मोक्षको प्राप्त करता है। अहा, एक क्षणभर भी प्रभु का दर्शन भव्य जीवों के लिये मनोहर मंगल महोत्सव है; प्रभुकी सर्वज्ञता देखते ही परमात्मभावना जागृत हो उठती है, इसलिये मिथ्यात्वरूपी पाप दूर भागते हैं और सम्यक्त्व की प्राप्ति होती है; सर्व प्रकार से मंगल होता है। प्रभु के समवसरण में यद्यपि दस प्रकार के कल्पवृक्ष है जो इच्छित पदार्थ देते हैं, परन्तु वे कहीं धर्म नहीं देते। धर्मरूपी रत्नत्रय प्रदान करनेवाले महान कल्पवृक्ष तो धर्मजिनेन्द्र हैं। उन चेतन कल्पवृक्ष को छोड़कर अचेतन पदार्थ देनेवाले कल्पवृक्षों के पास कोई मुमुक्षु भिक्षा माँगने के लिये नहीं रुकता था। 'अरे, मोक्षफल देनेवाले महान कल्पवृक्ष जिनदेव यहाँ साक्षात् विराजमान हैं और हम यहाँ अपनी शाखाएँ फैलाकर उनके सामने खड़े हैं !-इस प्रकार उन कल्पवृक्षों को लज्जा भी नहीं आती थी..सच ही है, अचेतन को लज्जा कैसी ? अथवा ऐसा मानो कि अमृत फल-अमृतपानादि द्वारा जिनदेव के भक्तों का स्वागत करने के लिये देव ही उन कल्पवृक्षों का रूप धारण करके वहाँ खड़े थे, और इस प्रकार जिनदेव की दासानुदासता घोषित करते थे।

देवों के दुंदुभिवाद्य अति मधुर स्वर में जगत के समक्ष जिनेन्द्र महिमा प्रसिद्ध कर रहे थे कि-अरे जीवों ! देखो…देखो ! कहाँ यह समवसरण की आश्चर्यकारी दिव्यविभूति ! और कहाँ यह जिनपरमात्मा की निःस्पृहता ! जगत में कहाँ है ऐसा ज्ञान और कहाँ है ऐसी वीतरागता ! तुम वीतरागी शान्ति का मार्ग जानना चाहते हो तो यहाँ आओ और इन सर्वज्ञ-वीतराग परमात्मा की सेवा-उपासना करो ! और फिर, समवसरण में आकर मुमुक्षु जीव जहाँ उन जिनेश्वर की परम शांत मुद्रा का अवलोकन करते वहाँ मुग्ध हो जाते; तथा दिव्यध्वनि में सुनते कि-अहो, जीवों ! आत्मा के परमात्मपने का ऐसा वैभव (हमारे जैसा ही) तुममें भी है . .उसे तुम देखो .यह सुनते ही मुमुक्षु जीवों की दृष्टि अन्तर्मुख हो जाती और अपने परम निधान को देखकर वे कल्पनातीत तृप्ति-शान्ति एव आनन्द का अनुभव करते। पश्चात् वे जीव उल्लास पूर्वक कहते-अहा, हे धर्मजिनेश्वर ! हमें आपके शासन का रग लगा है, उसमें अब कभी भंग नहीं पड़ने देंगे; प्रभो ! आपके बतलाये धर्म के सिवा अन्य किसी धर्म को अपने मनमन्दिर में स्थान नहीं देंगे। आपके मार्ग को स्वानुभव से ग्रहण किया है, अब हमें भवभ्रमण नहीं हो सकता; अब हमारी मोक्षकी साधना प्रारम्भ हो गई है. और हम आपके परिवार के हो गये; आपकी भाँति हम भी अल्पकाल में परमात्मा होंगे और मोक्ष प्राप्त करेंगे।

परमात्मपने का वैभव बतलानेवाली वह दिव्यवाणी वास्तव मे अद्भुत आश्चर्यकारी थी . और प्रभु के निकट एक आश्चर्य तो देखो ! उनका समवसरण पृथ्वी से बीस हजार सीढ़ियाँ ऊपर था और उसे समवसरण में विशाल मानस्तम्भ, मन्दिर, वापिकाएँ, कल्पवृक्ष, पर्वतों की रचना तथा बारह सभाओं में लाखों-करोड़ों देव, मनुष्य, तिर्यंच बैठते है, तथापि उस समवसरण को नीचे पृथ्वी का कोई आधार नही है अथवा कोई खम्भा आदि नही है; सम्पूर्ण समवसरण पृथ्वी से अस्पर्शी-निरालम्बी है और उस समवसरण मे अद्भुत दैवी गधकुटी है, परन्तु तीर्थंकर देव तो उसका भी स्पर्श किये बिना निरालम्बीरूप से विराजते है। अद्भुत सचमुच आश्चर्यजनक !! स्वयंभू सर्वज्ञ हुए आत्माने अपने ज्ञानसुख के लिये रागका और इन्द्रियों का अवलम्बन छोड़ दिया और निरालम्बी हो गये वहाँ उनका शरीर भी निरालम्बी होकर आकाश मे स्थित हुआ ! वाह प्रभो ! परालम्बन से रहित आपका स्वाश्रित मार्ग ! वह वास्तव मे प्रशंसनीय है।

इस प्रकार निरालम्बी समवसरण मे विराजमान उन निरालम्बी धर्मनाथ भगवान ने, जिसमे शुभरागका भी आलम्बन नही है ऐसे परम निरालम्बी रत्नत्रयरूप मोक्ष मार्गका उपदेश दिया कि-हे जीवो ! तुम्हारे आत्मा का मोक्षमार्ग तुम्हारे आत्मा के ही आश्रित है, इसलिये आत्मा मे से ही मोक्षमार्ग प्रगट करो। पर द्रव्य का अवलम्बन लेने मत जाओ, उपयोग को परद्रव्यों मे मत घुमाओ; अपने आत्मस्वरूप मे ही एकाग्र करके सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप परिणमित होओ !-

चारित्र-दर्शन-ज्ञानमां तुं जोड रे निज आत्मने;
चारित्र-दर्शन-ज्ञानने बस ! मोक्षमार्ग जिनो कहे।
-तुं स्थाप निजने मोक्षपथे, ध्या-अनुभव तेहने;
तेमां ज नित्य विहार कर, नहि विहर परद्रव्यो विषे।

जिनोपदेश को अतर मे उतारकर अनेकों जीव स्वाश्रय से रत्नत्रय धर्मरूप परिणमित हुए और अपने आत्मा को मोक्ष मार्ग में लगाया। इस प्रकार लाखो वर्ष तक भगवान धर्मनाथ ने धर्मचक्रप्रवर्तन किया। वे धर्म साम्राज्य के नायक थे; वे पृथ्वीपर पाँव नही रखते थे। आकाश में ही (पचास हजार फुट ऊँचे) विहार करते थे। समवसरण में पहुँचने के लिये देवों द्वारा निर्मित बीस हजार सीढ़ियाँ थी और भव्य जीव अंतर्मुहूर्त में ही वे बिना किसी थकान के चढ़ जाते थे ..अरे, प्रभु के ध्यान द्वारा मोक्षकी साधना भी दो घड़ी में हो सकती है तो बीस हजार, सीढ़ियों की क्या गिनती ?! भगवान के समवसरण में प्रवेश करते ही ‘मानस्तम्भ’ की दिव्यता देखकर उस आश्चर्यजनक जिनवैभव के समक्ष भव्यजीवों का हृदय नम्रीभूत हो जाता और अंतर में जिनमहिमा जागृत होकर उसे जिनदेव की तथा जिनशासन की प्रतीति हो जाती थी। भगवानने दिव्यध्वनि मे जिस मोक्षमार्ग का उपदेश दिया है उस मोक्षमार्गरूप धर्मकी मुख्य उपासना निर्ग्रन्थ मुनिवरों को होती है और उसके एक अंश की उपासना श्रावक-गृहस्थ को होती है। उस मुनिधर्म या श्रावकधर्म दोनों में सम्यग्दर्शन तो मूलभूत होता ही है। जीवअजीवादि नवतत्त्वों के स्वरूप का ज्ञान और उसमें शुद्ध द्रव्य-पर्यायरूप जीवतत्त्व की अनुभूतिरूप श्रद्धान, वह सम्यग्ज्ञान और सम्यग्दर्शन है।

भगवान धर्मनाथ ने सम्यग्दर्शन जिसका मूल है ऐसे चारित्रधर्म का उपदेश दिया। सम्यग्दर्शन की पात्रतावाले जीवको उसकी भूमिका रूप से देव-गुरु-धर्म की श्रद्धा होती है तथा मांस-मदिरा-अण्डा आदि महापापकारी अभक्ष्यका त्याग होता है। जिनमें मांसभक्षण, मदिरापान या वेश्यागमन, बलात्कार, चोरी, हत्य आदि महापापके दृश्यों द्वारा उन पापों की पुष्टि अथवा अनुमोदना होती हो ऐसे दृश्य (नाटक-सिनिमादि) मुमुक्षु धर्मात्मा जीव नहीं देखते; त्रसहिंसा के कारणरूप रात्रिभोजन नहीं करते; अनछना पानी नहीं पीते। धर्मी श्रावक के परिणाम संसार से तथा विषय-भोगों से विरक्त होते हैं, परिणामों की शुद्धिपूर्वक यह ‘सामायिक’ भावना द्वारा वीतरागता का अभ्यास करता है, उसके द्वारा वह गहरे संसारसमुद्र को मात्र घुटनेभर पानी जितना कर देता है। पश्चात् मोक्षमार्ग की पूर्णता के लिये वह घर-परिवार, धन-वस्त्रादि समस्त परिग्रहो को तथा कषायों को छोड़कर शुद्धोपयोगपूर्वक मुनि होता है; रत्नत्रयवत मुनिदशा तो त्रिलोकपूज्य परमेष्ठी पद है। उन शुद्धोपयोगी मुनि में और सिद्धभगवन्त में क्या कोई अन्तर है?-नही, दोनों परमात्मसुख में ही लीन हैं।

तीर्थंकर धर्मनाथ प्रभु का धर्मोपदेश सुनकर कितने ही जीव तुरन्त संसार से विरक्त होकर मुनि हो गये, कितने ही जीव सम्यक्त्वसहित व्रत धारण करके श्रावक हुए. अरे, सिह शशक, बैल, बन्दर, सर्प, हाथी आदि कितने ही तिर्यंच जीव भी आत्मज्ञानसिहत व्रत धारण करके श्रावक हो गये। इंद्रादि देव जो दशा (पंचम गुणस्थान) प्रगट नहीं कर सके वह दशा तिर्यंच जीवों ने प्रगट कर ली। भगवान ने भारत में विहार किया। गुजरात में और सौराष्ट्र मे, बिहार में और बंगाल में, हिमाचल प्रदेश में और नेपाल मे, श्रीलंका में और ब्रह्मदेश में, नर्मदा के किनारे और विंध्यप्रदेश में, राजस्थान में और महाराष्ट्र में, कर्नाटक में और आन्ध्र में-सर्वत्र धर्मविहार करते हुए उन गगनविहारी प्रभुको कोई नदी या पर्वत बीच में बाधक नहीं होते थे। उनके विहार समय आगे-आगे एक हजार दिव्य आरोंवाला धर्मचक्र चलता था; जो कुचक्र को जीतकर ऐसा प्रसिद्ध करता था कि जगत में धर्म के राजा यह धर्मनाथ तीर्थंकर ही हैं, उनकी धर्माज्ञा का कोई उल्लंघन नहीं कर सकता। मोक्ष के हेतु हे मुमुक्षु जीवों ! इन धर्मनाथ प्रभु के शासन का सेवन करो और निर्भय होकर मोक्ष को साधो।

केवलज्ञान प्राप्त होने के पश्चात् भगवान धर्मनाथने ढाई लाख वर्ष तक तीर्थंकर रूप से विचरण किया। अन्त में, शाश्वत मुक्तिधाम ऐसे सम्मेदाचल पधारे और एक मास तक वहाँ स्थिर रहे। यद्यपि प्रभुका उपयोग तो स्थिर था ही, अब उनके योग भी कम्पन छोड़कर स्थिर होने लगे। चैत्र शुक्ला चतुर्थी आयी; अब प्रभु का संसार मात्र दो घड़ी शेष रहा था…बस ! मोक्ष की तैयारी हो गई। प्रभु की आयु तो एक मुहूर्त की ही शेष थी, परन्तु अन्य तीन अघाति कर्म लम्बी स्थिति के थे, इसलिये प्रभुने आत्मप्रदेशों के लोकव्यापी विस्तार द्वारा उन कर्मों की स्थितिको तोड़कर बराबर आयु जितनी ही कर डाली। क्षणमात्र में आयुसहित चारों अघाति कर्मों ने अपना कर्मपना छोड़ दिया और निष्कर्म दशा को प्राप्त हुए। उसी समय धर्मनाथ का आत्मा ‘धर्मनाथ या तीर्थंकर’ ऐसे नामों को भी छोड़कर, सर्व विभावरहित परम शुद्ध सिद्धपदरूप परिणमित हुआ; वे सिद्धप्रभु अनंत सिद्ध सदाकाल जहाँ विराजते हैं ऐसी परम-आनन्दमय सिद्धभूमि में जाकर विराजमान हुए। उन सिद्ध भगवन्त को नमस्कार हो।-

धर्मनाथ जिनराज का कूट सुदत्तवर जेह;
मन-वच-तन कर पूजहूँ शिखर सम्मेद यजेह।

प्रभु धर्मनाथ के मोक्ष प्राप्त करते ही इन्द्रादि देवों ने तथा सुधर्म आदि राजा-महाराजाओंने उस मुक्त आत्मा की स्तुति करके मोक्षका महोत्सव मनाया।

श्रमणो-जिनो-तीर्थंकरो ओ रीत सेवी मार्गने,
सिद्धि वर्या, नमुं तेमने; निर्वाणना ते मार्गने।

अहा…जयवंत वर्तो वीतराग भावरूप वह मोक्षमार्ग.. कि जिसके प्रसाद से भव्यजीव सिद्धि को प्राप्त हुए…हो रहे हैं..और होंगे ! नमस्कार हो उन भगवन्त धर्मजिनेश्वर को, जिन्होंने उत्तमक्षमादि दस धर्मों के वीतराग-रथ को मोक्षमार्ग मे चलाकर भव्यजीवों को शाश्वत आनन्दपुरी में पहुँचाया।

[इतिश्री धर्मनाथ भगवान-पन्द्रहवे तीर्थंकर-का मंगल पुराण पूर्ण हुआ।]

‘म हा पु रा ण’ सुन्दर और सस्ता…उत्तम साहित्य चौबीस तीर्थंकरों के जीवन चरित्र का एक ही पुस्तक में समावेश कर लेनेवाला यह महापुराण अर्थात् प्रत्येक जैनके घरकी शोभा ! अनेक शास्त्रों के आधार से अध्यात्मशैली में लिखा गया यह पुराण जिन्होंने पढ़ा उन सबने प्रसन्नता व्यक्त की है। एक विद्वानभाई तो लिखते हैं कि-यह महापुराण अर्थात् तत्त्वज्ञान का खजाना और चारित्र का भण्डार। उत्तम संस्कारों हेतु आप भी इसे अपने घरमें अवश्य स्थान दें।

१६

भगवान शान्तिनाथ (भाग १)

[१६]

भ ग वा न शा न्ति ना थ

चक्रवर्ती त्रिपुटी तीर्थंकर त्रिपुटी शांतिनाथ शान्तिनाथ कुन्थुनाथ कुन्थुनाथ अरहनाथ अरहनाथ (जन्म) (मोक्ष) हस्तिनापुर सम्मेद शिखर

ध्रुव अचल ने अनुपम गति पामेल शांतिनाथ ने,
करूँ याद मारा आत्म मां सम्यक्त्वभाव जगाडीने।
छे सुख साचुं आत्मनुं, धारवी अहो मुज आत्ममां,
ए सिद्धसुखने साधतो आवी रह्यो तुज पासमां।

हे प्रभो ! शान्तिनाथ ! वर्तमान में तो आप साध्यरुप सिद्ध होकर सिद्धालय में विराज रहे हैं; इससे पूर्वभूतकाल में जब आप संसारमें थे उस समय के आपके अन्तिम बारह भवों का विचार करने पर आपकी आत्मसाधना दृष्टि-समक्ष तैरती है। संसार की सर्वोत्कृष्ट पदवियाँ-इन्द्रपद, चक्रवर्तीपद तथा तीर्थंकर पद की अचिंत्य विभूति प्राप्त करनेपर भी आप उसमें कहीं आसक्त नहीं हुए; मात्र चैतन्य के अतीन्द्रिय वैभव को ही आपने इष्ट माना, और किसी भी बाह्यवैभव से संतुष्ट हुए बिना अंतर के आत्मवैभव की साधना मे ही आगे बढ़ते गये। आपका जीवनचरित्र पढ़ते-विचारते हुए हमारे आत्मा में भी आत्मसाधना का रंग चढ़ जाता है. और सांसारिक विभूतियों से उठ जाता है। इस प्रकार आपका आदर्श जीवन हमें आत्मसाधना का मार्ग बतलाता है।

हे शान्तिनाथ देव ! ऐसे सुन्दर आदर्शरूप से आपको ध्यान में लेते हुए भी हमें अपने चित्त में कैसी शान्ति का अनुभव होता है ! ऐसी आत्मस्पर्शी शान्ति संसार के किन्ही विषयों में कभी प्राप्त नहीं हुई थी। देव ! आप ‘शान्तिके नाथ’ हो, आपके धर्मशासन में हमें जो शान्ति प्राप्त हुई है उसके आप रक्षक हो, और उसमे वृद्धि करके पूर्णशान्ति प्राप्त करानेवाले हो, इसलिये आप सचमुच हमारे शान्तिनाथ हो। आपका नाम भी शान्ति है, आप स्वयं शान्त भावरूप हो; और आपका स्मरण हममें भी शान्ति जागृत करनेवाला है, इसलिये आपको नमस्कार करते हैं।

अहा, त्रिलोक को प्रतिबिम्बित करने वाला आपका केवलज्ञानदर्पण महान उज्ज्वल एवं आश्चर्यकारी है, उसमे हमे अपने मोक्षका सुन्दर प्रतिबिम्ब दृष्टिगोचर होता है, वह ज्ञान और ज्ञेय दोनो महामंगलरूप हैं। हे प्रभो ! ऐसे अपूर्व मंगल-विधानपूर्वक, अब आपके अन्तिम बारह भवों के वर्णन द्वारा आपकी आत्मासाधना की महिमा का वर्णन करते हैं और ऐसी उत्तम आत्मसाधना हेतु अपने आत्माको भी उल्लसित करके आपके मार्गपर आते हैं।

[इति श्री मंगलाचरण]

भगवान शान्तिनाथ : पूर्वभव बारहवाँ

श्रीषेण राजा (भावी तीर्थंकर) और अनिन्दिता रानी (भावी गणधर)

हे भव्य जीवो ! अपने अंतर में भगवन्त पंचपरमेष्ठी को विराजमान करके, शान्तभाव पूर्वक भगवान शान्तिनाथ की यह मंगल-कथा सुनो-भगवान शान्तिनाथ पूर्वके १२ वें भव में जम्बूद्वीप के रत्नसंचयपुर नगर में श्रीषेण नामक राजा थे। उनके सिंहनन्दिता तथा अनिन्दिता नाम की दो रानियाँ थीं। (अनिन्दिता का जीव बारहवें भव में शान्तिनाथ प्रभु का भाई-चक्रायुध गणधर होगा।) उन दोनों रानियो के इन्द्र तथा उपेन्द्र नामके राजकुमार थे।

उस नगर मे सात्यकि ब्राह्मण के सत्यभामा नामकी पुत्री थी। उसका विवाह कपिल ब्राह्मण के साथ हुआ था (जो वास्तव मे ब्राह्मण नही किन्तु शूद्र-दासीपुत्र था।) सत्यभामा ने जाना कि उसका पति कोई कुलीन ब्राह्मण नही परन्तु हीन संस्कारो का है, इसलिये उस शीलवती स्त्रीने कपिलका त्याग कर दिया और श्रीषेण राजा की शरण लेकर उनकी रानी के साथ रहने लगी। इससे दुष्ट कपिल श्रीषेण पर क्रोधित हो गया और सत्यभामा के प्रति आसक्ति रह गई।

एक बार राजा श्रीषेण के महाभाग्य से दो मुनिवर उनके घर पधारे, उन्हे भक्तिपूर्वक आहारदान देकर श्रीषेणने भोगभूमि की आयु का बंध किया। उस समय दोनो रानियो ने तथा सत्यभामाने भी उन मुनिराज का आदर-सत्कार करके आहारदान का अनुमोदन किया और उन तीनों ने भी भोगभूमिका पुण्य बाँधा।

एक बार राजा श्रीषेण के दोनो पुत्र एक दासी पर मोहित होकर परस्पर झगड़ने लगे, जिससे राजा श्रीषेण अत्यन्त दुःखी हुए, और भोग मे आसक्त यह दोनों पुत्र मेरी आज्ञा नहीं मानेंगे-इस प्रकार मानभंग से दुःखी होकर उन्होंने विषफल सूँघकर प्राणत्याग किया। उनके साथ उनकी दोनों रानियों तथा सत्यभामानेभी प्राण छोड़े…वे चारों जीव कहाँ उत्पन्न हुए?-वह अब देखें।

भगवान शान्तिनाथ : पूर्वभव ११ वाँ (भोगभूमि में)

अज्ञानभाव से प्राणत्याग करके, दान-पुण्य के प्रताप से वे चारों जीव धातकी खण्ड की भोगभूमि में अवतरित हुए।

श्रीषेण राजा और अनिन्दिता रानी वे दोनों भोगभूमि के आर्यपुरुष हुए और सिंहनन्दिता तथा सत्यभामा वे दोनों उनकी आर्या-स्त्रियाँ हुईं। यहाँ शास्त्रकार कहते हैं कि-देखो, पात्रदान की महिमा !-यह चारों जीव विष सूँघकर अपमृत्यु (आत्महत्या) से मरे थे, तथापि दान के प्रभाव से इस भोग भूमि की शुभगति में उत्पन्न हुए और देवों जैसे सुख भोगने लगे।

[पश्चात्-वे श्रीषेणराजा के दोनों पुत्र (इन्द्र और उपेन्द्र) तो दासी कन्या के लिये लड़ रहे थे, तब मणिकुण्डल विद्याधरने (जोकि पूर्वभव में उनकी माता थी) आकर कहा : ‘अरे, तुम लोग क्यों लड़ रहे हो ? जिस दासीकन्या के लिये तुम लड़ रहे हो वह तो पूर्वभव में तुम्हारी छोटी बहिन थी !’ यह सुनते ही दोनों राजकुमार वैराग्य को प्राप्त हुए; उन्होंने मुनिदीक्षा ग्रहण कर ली और शुद्धभाव से आत्मा की साधना द्वारा केवलज्ञान प्रगट करके तथा मोक्षदशा प्राप्त की। जीव के परिणामों का आश्चर्य तो देखो ! कि जिन पुत्रों के झगड़े से दुःखी होकर राजा श्रीषेणने आत्महत्या की और ग्यारह भव पश्चात् मोक्ष प्राप्त करेंगे- वे दोनों राजकुमार तो उसी भव में भवका अन्त करके मोक्ष में चले गये।]

पात्रदान के प्रभाव से भोगभूमि में उत्पन्न हुए उन श्रीषेण आदि चारों जीवों ने असंख्य वर्षों तक कल्पवृक्षों के वचनातीत सुख भोगे। वहाँ के दस प्रकार के कल्पवृक्ष इच्छानुसार (१) अमृतसमान निर्दोष मादक पेय, (२) उत्तम वाद्य, (३) हार आदि दिव्य आभूषण, (४) सुगन्धित पुष्पमालाएँ, (५) रत्नमणि के दीपक, (६) दिव्य प्रकाश, (७) राजभवन-नृत्यशाला, (८) अमृतसमान स्वादिष्ट भोजन, (९) सुवर्ण एवं रत्नों के बरतन और (१०) अति सुन्दर वस्त्र,-इत्यादि उत्तम भोगसामग्री वहाँके पुण्यवान जीवों को देते हैं। वे कल्पवृक्ष कोई वनस्पति काय के वृक्ष नहीं हैं, तथा देवकृत भी नहीं हैं, अनादिनिधन पृथ्वी की रचना ही वैसी है और जीवों के पुण्यप्रभाव के कारण अन्य किसी निमित्त के बिना स्वभाव से ही वैसे उत्तम फल देनेवाले हैं। हे भव्य पाठक ! ऐसी सुन्दर भोगभूमिका वर्णन पढ़कर तु एक बात ध्यान में रखना कि वह जड़ रत्नभूमि एवं जड़ कल्पवृक्ष चाहे जैसे सुन्दर हो तथापि, मात्र बाह्य इन्द्रियविषयों के भोग ही देते हैं; कहीं चैतन्य का अतीन्द्रिय सुख या सम्यक्त्व वे नहीं दे सकते; अतीन्द्रिय सुख तो अपना चैतन्य कल्पवृक्ष ही प्रदान कर सकता है इसलिये उसीका सेवन करने योग्य है।

भोगभूमि के जीवों को व्रत-संयम दशा या मोक्षप्राप्ति नहीं होती; किन्हीं जीवों को सम्यग्दर्शन; आत्मज्ञान तथा चौथा गुणस्थान हो सकता है। कोई जीव मनुष्यायु का बंध करके पश्चात् क्षायिक सम्यक्त्व प्राप्त करे तो वह भी भोगभूमि में उत्पन्न होता है। तथा आत्मज्ञान के बिना पात्रदान देनेवाले अत्यन्त भद्रजीव भी भोगभूमि में उत्पन्न होते हैं। वहाँ किसी पशुका भय नहीं है, रात-दिन अथवा ऋतु-परिवर्तन नहीं है, शीत-उष्णता नहीं है, कोई एक-दूसरे को दुःख नहीं देते; सर्व जीव शान्त एवं भद्रपरिणामी हैं; वहाँ के सिंह आदि पशु भी मांसाहारी नहीं हैं, अहिंसक हैं। वहाँ कीड़े-मकोड़े-मच्छर आदि तुच्छ जीव नहीं होते। वहाँ के सर्व जीव सर्वांगसुन्दर होते हैं। कभी-कभी ऋद्धिधारी मुनिवर भी उस भोगभूमि में पधारते हैं और उनके उपदेश से अनेक जीव आत्मज्ञान प्राप्त करते हैं। पापी जीवों का वहाँ अभाव है। वहाँ के सब जीव मरने के पश्चात् स्वर्ग में ही उत्पन्न होते हैं, अन्य किसी गति में नही जाते। वहाँ कोई जीव दुराचारी नहीं है; किसी जीव को इष्ट वियोग नहीं होता; वहाँ किसी जीव को निद्रा, आलस्य या मल-मूत्र नहीं है, थूक या पसीना नहीं है; सब जीव मृदुभाषी, मन्दकषायी और वज्रशरीरी हैं। उस भोगभूमि के जीवों को जो निश्चित सुख है वह चक्रवर्ती के वैभव में भी नहीं है। वे स्वयं अपने-अपने राजा हैं, उनके ऊपर दूसरा कोई राजा नहीं होता। जन्म के पश्चात् छह सप्ताह में वे पूर्ण युवा हो जाते हैं, मृत्यु के समय भी उन्हें कोई पीड़ा नहीं होती, अंतकाल में मात्र छींक या जँभाई आने पर वे सुखपूर्वक प्राण छोड़कर सौधर्म स्वर्ग में जाते हैं।

हे वैरागी पाठक ! तुम तीर्थंकर जैसे उत्तम पुरुषों का जीवन चरित्र पढ़ रहे हो; उसमें पुण्यफलरूप से भोगभूमि के भोगों का या स्वर्गलोक के वैभव का जो वर्णन है वह कोई उसमें राग कराने हेतु नहीं है, परन्तु पुण्यफलरूप ऐसे भोगों में भी आत्मा का सच्चा सुख नहीं है-ऐसा समझाकर उनका मोह छुड़वाने के लिये तथा आत्मा की वीतरागी धर्म की साधना में लगाने के लिये यह वर्णन है। सर्व जैन-उपदेश का अंतिम सार तो यही है कि -

‘‘तेथी न करवो राग जरीये क्यांय पण मोक्षेच्छुओ,
वीतराग थईने ए रीते ते भव्य भवसागर तरे।’’

अज्ञान से तू ऐसे पुण्यफल की या राग की इच्छा मत करना-जोकि संसार में परिभ्रमण कराता है; राग और ज्ञान की भिन्नता का भेदज्ञान करके तू आत्मस्वभाव के सुखको ही अनुभव में लेना,-जोकि संसार से छुड़ाकर सिद्धपद की प्राप्ति कराता है।

अपने चरित्रनायक तीर्थंकर शान्तिनाथ का जीव-जोकि पूर्वभव में श्रीषेण राजा था-वह इस भोगभूमि में उत्पन्न हुआ है .दूसरे तीन जीव भी उसके साथ उत्पन्न हुए हैं। असंख्य वर्षों तक भोगभूमि में रहने के पश्चात् आयु पूर्ण होने पर वे चारों जीव सौधर्म स्वर्ग में उत्पन्न हुए।

भगवान शान्तिनाथ : पूर्वभव १० वाँ सौधर्मस्वर्ग में श्रीप्रभ देव

❁ राजा श्रीषेण (भावी शान्तिनाथ) का जीव श्रीप्रभ देव हुआ। ❁ रानी सिंहनन्दिता का जीव उसकी देवी विद्युत्प्रभा हुई। ❁ रानी अनिन्दिता (भावी चक्रायुधगणधर) का जीव विमलप्रभ देव हुआ। ❁ ब्राह्मणकन्या सत्यभामा का जीव उसकी शुक्लप्रभा देवी हुई।

स्वर्गलोक में वे चारों जीव जिनभक्ति करते थे, जिनेन्द्रदेव के पंचकल्याणक में जाते थे, समवसरण में जिनवाणी सुनते थे, तथा मेरु-नन्दीश्वर आदि की यात्रा करते थे और स्वर्गलोक के दैवी वैभव का भोग करते थे। अभी तक वे सम्यग्दर्शन प्राप्त नहीं कर पाये थे। असंख्य वर्षों तक देवलोक के दिव्यवैभव में रहकर भी अन्त में तो वे चारों देवलोक से पदभ्रष्ट हुए, क्योंकि पुण्य भी अध्रुव एवं अशरण है, उसका फल नित्य नहीं रहता। सिद्धपद ही जीवका ध्रुवपद है; संसार के शेष सर्वपद अध्रुव हैं।

देवलोक से निकलकर वे चारों जीव भरतक्षेत्र में उत्पन्न हुए:-(१) राजा श्रीषेण (भावी तीर्थंकर) का जीव विजयार्द्ध पर ‘अमिततेज’ विद्याधर हुआ। (२) रानी अनिन्दिता (भावी गणधर) का जीव त्रिपृष्ठ वासुदेव का पुत्र ‘श्रीविजय’ हुआ।

(३) रानी सिंहनन्दिता का जीव वह अमिततेज की पत्नी ‘ज्योतिप्रभा’ हुई। (श्रीविजय की
बहिन)।

(४) सत्यभामा का जीव वह अमिततेज की बहिन (और श्रीविजय की पत्नी) ‘सुतारा’ हुई। (सत्यभामा का पति दुष्ट कपिल भव में भटकते-भटकते ‘अशनिघोष’ विद्याधर हुआ।)

भगवान शान्तिनाथ : पूर्वभव ९ वाँ

भरतक्षेत्र में अमिततेज-विद्याधर और सम्यक्त्व-प्राप्ति

इस मध्यलोक में जम्बूद्वीप से लेकर स्वयंभूरमण समुद्र तक असंख्य द्वीप-समुद्र हैं; उसमें बीचोंबीच अपना यह जम्बूद्वीप है, वह सर्व द्वीपों में चक्रवर्ती समान सुशोभित होता है। उसके मध्य में एक लाख योजन ऊँचा सुदर्शन मेरु है। उसके चार वनों की चार दिशाओं में शाश्वत जिनालय हैं; इन्द्रादि देव तथा विद्याधर वहाँ दर्शन-पूजन करने आते हैं। वहाँ के पाण्डुक वन में अतिसुन्दर सिद्धशिला समान चार दिव्य शिलाएँ हैं; उस पाण्डुक शिलापर भरत-ऐरावत तथा विदेहक्षेत्र के अनन्त तीर्थंकरों का जन्माभिषेक इन्द्रने किया है, इसलिये वह पावन तीर्थ है।

उस मेरुपर्वत की दक्षिण दिशा के छोर पर अपना यह भरतक्षेत्र है। इस भरतक्षेत्र में २४ तीर्थंकर, चक्रवर्ती तथा मोक्षगामी जीव उत्पन्न होते हैं। भरतक्षेत्र के पूर्व-पश्चिम छोर पर बीच में वैताढ्य-विजयार्द्धपर्वत पर उत्तर श्रेणी में ६० और दक्षिण श्रेणी में ५०-इस प्रकार कुल ११० अति सुन्दर नगरियाँ हैं, जिनमें विद्याधर-मनुष्यों का वास है; वे जैनधर्म के उपासक हैं; वहाँ विधर्मी नहीं बसते और सदा सुकाल वर्तता है। जब छठवें आरे में भरतक्षेत्र के अन्य समस्त भागों में महाप्रलय होगा तब भी विजयार्द्धपर्वत के ऊपर की नगरियाँ ज्योंकी त्यों शाश्वत रहेगी। वहाँ एक शाश्वत जिनमन्दिर भी है; वहाँ के मनुष्य सदा जिनपूजा, शास्त्र स्वाध्याय तथा पात्रदान करते हैं। वहाँ अनेक मुनिवर भी विचरते हैं।

उस विजयार्द्ध पर रथनूपुर-चक्रवाल नामकी एक सुन्दर नगरी है। अपने चरित्रनायक भगवान शान्तिनाथ (श्रीषेण राजा) का जीव स्वर्गलोक से चयकर उस नगरी में ‘अमिततेज’ नामका विद्याधर हुआ। उस काल भरतक्षेत्र में ११ वें तीर्थंकर का शासन चल रहा था।

उस रथनूपुर नगरी में ‘ज्वलनजटी’ नामक राजा थे। वे जैनधर्म के प्रेमी सम्यग्दृष्टि और चरमशरीरी थे। उनका पौत्र ‘अमिततेज।’

❁ राजा ज्वलनजटी का अर्ककीर्ति नामक गुणवान पुत्र था; वह अर्ककीर्ति का विवाह पोदनपुर के राजकुमार त्रिपृष्ठ वासुदेव (महावीर का जीव) की बहिन ज्योतिमाला के साथ हुआ था। उन अर्ककीर्ति-ज्योतिमालाका पुत्र अमिततेज; उसका विवाह मामा त्रिपृष्ठ की पुत्री ज्योतिप्रभा के साथ हुआ था।

❁ यह त्रिपृष्ठ ही महावीर प्रभु का जीव (पूर्व के १४ वें भवमें) है और अमिततेज वह शान्तिनाथ भगवान का जीव (पूर्व के ९ वें भवमें) है;-इस प्रकार दोनों तीर्थंकरों के जीव उस भवमें मामा-भानजा, (अथवा तत्कालीन रीति के अनुसार श्वसुर-जमाई) थे।

❁ त्रिपृष्ठ के पुत्र ‘श्रीविजय’ (जो कि भावी शान्तिनाथ के भाई चक्रायुध गणधर का जीव है) के साथ अमिततेज की बहिन ‘सुतारा’ का विवाह हुआ। (अमिततेज के जीव ने पूर्वभव में सत्यभामा ब्राह्मणी के प्रति वात्सल्य दिखाया था, इसलिये इस भव में वह उसकी बहिन हुई।)

‘अमिततेज’ की बहिन का विवाह श्रीविजय से हुआ और श्रीविजय की बहिनका अमिततेज से, -इस प्रकार बारह भव तक साथ रहनेवाले वे दोनों (तीर्थंकर-गणधर के) जीव इस नौवें पूर्वभव में परस्पर बहनोई थे। (श्रीविजय वे ऋषभदेवकी वंशपरम्परा के थे और अमिततेज नमि-विनमि विद्याधर की वंशपरम्परा के थे; वंश परम्परा से दोनों कुल का विवाह-सम्बन्ध चला आता था।)

ऐसे उम पुत्र-पौत्र के परिवार सहित महाराजा ज्वलनजटी विजयार्द्ध के विद्याधरों पर राज्य करते थे। राज्य का सचालन करते हुए भी वे धर्मात्मा आत्मसाधना को नहीं भूलते थे। धर्मजीवन जीनेवाले उन महाराजा ज्वलनजटी के महाभाग्य से एकबार जगनन्दन तथा अभिनन्दन नामके दो गगनगामी मुनिवर उनकी नगरी में पधारे। राजा ने अत्यन्त भक्तिभाव से वहाँ जाकर वन्दना के पश्चात् स्तुति की-देव ! आप रत्नत्रय के वीतरागी वैभव से सुशोभित हो, आपके पास बाह्य में धन-वस्त्रादि कोई वैभव न होने पर भी आपके वीतरागी वैभवपर मुग्ध होकर मुक्ति सुन्दरी भी आपसे भेट करने के लिये लालायित है। हे प्रभो ! आपका वीतरागी जीवन ही सुखी जीवन है। इस प्रकार राजाने स्तुति की और मुनिराजने उनको धर्मवृद्धि का आशीर्वाद दिया। राजाने सम्यक्त्वसहित व्रत अंगीकार किये।

एकबार महाराजा ज्वलनजटी राजसभा में बैठे थे। वहाँ एक दूत समाचार लाया कि त्रिपृष्ठ वासुदेव के पिता (पोदनपुर के राजा प्रजापति) दीक्षा लेकर मुनि हुए और केवलज्ञान प्रगट करके मोक्ष प्राप्त किया है; वह सुनकर राजा ज्वलनजटी वैराग्य को प्राप्त हुए और जगनन्दन मुनिराज के निकट मुनिदीक्षा ग्रहण कर ली; पश्चात् शुद्धोपयोग द्वारा केवलज्ञान प्रगट करके वे भी मोक्षको प्राप्त हुए।

तत्पश्चात्, त्रिपृष्ठ वासुदेव तो मरकर सातवें नरक मे गया; उमके भाई विजय बलभद्र दीक्षा लेकर मोक्षको प्राप्त हुए, तथा अर्ककीर्ति (अमिततेज के पिता) भी वैराग्य प्राप्त करके दीक्षा लेकर मोक्षको प्राप्त हुए। रथनूपुर मे तो अब अपने चरित्रनायक ‘अमिततेज’ विद्याधरो के राजा बन गये, और पोदनपुर के राजा श्री विजय हुए। उन दोनों मे परस्पर अति स्नेह है, दोनों एक-दूसरे के बहनोई हैं और आठभव के पश्चात् वे तीर्थंकर तथा गणधर होनेवाले हैं।

एक बार राजा श्रीविजय अपनी रानी सुतारा के साथ विमान में बैठकर वन विहार करने गये थे। वहाँ उनका पूर्वभव का शत्रु कपिल-जोकि वर्तमान अशनिघोष नामक बलवान विद्याधर राजा था, वह सुतारा पर मोहित होकर उसका अपहरण कर ले गया। इससे अमिततेज तथा श्रीविजय विशाल सेनासहित अशनिघोष से युद्ध करने चले। अशनिघोष भयभीत होकर भागा। उसके सद्भाग्य से ठीक उसी समय विजय बलभद्र मुनि-जोकि केवलीरूप से विचर रहे थे वे-गंधकुटी सहित वहाँ पधारे। अशनिघोषने उन भगवान की धर्मसभा मे प्रवेश किया और प्रभुके दर्शन से उसका चित्त शांत हुआ।

अमिततेज तथा श्रीविजय भी क्रोधाविष्ट होकर उसे मारने के लिये उसके पीछे दौड़े; परन्तु केवलीप्रभु की धर्मसभा में आते ही उनका क्रोध दूर हो गया। इस प्रकार प्रभु के समीप सबके परिणाम बिलकुल शांत हो गये और परस्पर का वैरभाव भूल गये; उसी समय अशनिघोष की माता भी सुताराको लेकर वहाँ आ पहुँची और सुतारा को उसके पति को सौंपकर अपने पुत्रके अपराध हेतु क्षमायाचना की। अहा, जिनेन्द्रदेव के सान्निध्य मे क्रूर पशु भी वैरभाव छोड़कर शांत हो जाते हैं वहाँ मनुष्यों की तो बात ही क्या ।।

प्रभु की परमशांत मुद्रा के दर्शन से सब अत्यन्त प्रसन्न हुए और सबने विजयप्रभु के समवसरण में बैठकर धर्मोपदेश श्रवण किया .(श्री विजय राजा वे त्रिपृष्ठ वासुदेव के पुत्र हैं; त्रिपृष्ठ वासुदेव के भाई विजयबलभद्र दीक्षा लेकर केवली हुए हैं ।) दिव्यध्वनि में प्रभुने कहा : हे जीवो ! आत्मा ज्ञानस्वरूप है, क्रोध उसका स्वभाव नहीं है। जीव का स्वभाव शांति एवं ज्ञान-आनन्दमय है। क्रोधादि कषायों द्वारा जीव की शांति का घात होता है। अंतर में चैतन्य परमतत्त्व है; उस स्वतत्त्व की महिमा का चिन्तन करने से क्रोधादि भाव शांत हो जाते हैं और सम्यक्त्वादि भाव प्रगट होते हैं; भव्य जीव ऐसे सम्यक्त्व को प्रगट करके भवदुःख से छूट जाते हैं और सिद्धिसुख प्राप्त करते हैं।

अमिततेज (जो कि भावी तीर्थंकर है) को प्रभु का उपदेश सुनकर अंतर्मुख दृष्टि जागृत हुई. .उसकी चेतना एकदम शांत होकर कषायों से भिन्न हो गई और अंतर में अपने परमात्मतत्त्व का अनुभव करके उसी समय उसने अपूर्व सम्यग्दर्शन प्रगट किया। अहा, आठ भव पूर्व एक तीर्थंकर की आत्मसाधना प्रारम्भ हुई।

श्रीविजयने भी उसी समय सम्यग्दर्शन धारण किया। यहाँ से अपने चरित्रनायक (शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा उनके भाई चक्रायुध गणधर) का धर्मसाधनामय मंगल जीवन प्रारम्भ होता है। धन्य वह सम्यक्त्व जीवन ! सम्यक्त्व-प्राप्ति से उनको मोक्षप्राप्ति जैसा महान सुख हुआ।

तत्पश्चात, सम्यक्त्वप्राप्ति से जिनके चैतन्यप्रदेशो मे अपूर्व आनन्द तरंगे उछल रही हैं और जिन्होंने देशव्रत धारण किये है-ऐसे उन अमिततेज विद्याधर को अपने पूर्वभव जानने की जिज्ञासा हुई। इसलिये उन्होने विनयपूर्वक पूछा-हे सर्वज्ञदेव ! मुझे और इस श्री विजय को एक दूसरे के प्रति परम स्नेह क्यों है ? तथा इस अशनिघोषने मेरी बहिन (सुतारा) का अपहरण क्यों किया ?

भगवान ने दिव्यध्वनि मे उनके पूर्वभव बतलाये - ※ हे अमिततेज ! पूर्व भव मे तू श्रीषेण राजा था; वहाँ आत्महत्या से मरकर, पात्रदान के पुण्य से भोगभूमि मे उत्पन्न हुआ, पश्चात् श्रीप्रभ देव और वहाँ से यह अमिततेज हुआ है।

※ यह श्रीविजय का जीव पूर्वभव में तेरी (श्रीषेण की) अनिन्दिता रानी थी; भोगभूमि में भी वह जीव तेरे साथ था, देव के भवमें भी वह तेरे साथ विमलप्रभ देव था; और वहाँ से तेरा स्नेही (बहनोई) श्रीविजय हुआ है।

तेरी बहिन सुतारा पूर्व मे सत्यभामा नामकी ब्राह्मण कन्या थी; तब यह अशनिघोष का जीव उसका पति (कपिल) था, परन्तु सत्यभामा उसे छोड़कर तेरी (श्रीषेण की) शरण मे आ गई थी। वह सत्यभामा पात्रदान का अनुमोदन करके भोगभूमि में तथा स्वर्गलोक में तेरे साथ ही थी ..वही यहाँ पूर्वभव के स्नेह के कारण तेरी बहिन हुई है।

※ पूर्वभव के मोह के कारण अशनिघोष ने सुतारा का अपहरण किया था; परन्तु अन्त मे तुझसे भयभीत होकर वह यहाँ (धर्मसभा मे) आया; उसके पीछे तू भी यहाँ आया और सम्यग्दर्शन प्राप्त करके मोक्षकी साधना प्रारम्भ की।

इस प्रकार पूर्वभव बतलाकर केवली प्रभुने कहा : हे अमिततेज ! अब आत्मसाधना में उन्नति करते-करते ९वें भवमें तुम्हारा आत्मा भरतक्षेत्र में पंचमचक्रवर्ती तथा १६ वाँ तीर्थंकर होकर मोक्ष प्राप्त करेगा…और तब यह श्रीविजय तुम्हारा भाई होकर चक्रायुध गणधर होगा। अब शेष भवों में वह तुम्हारे साथ ही साथ रहेगा।

अहा, केवली प्रभु के श्रीमुख से अपने तीर्थंकर पद की और मोक्ष की ‘आज्ञा’ सुनकर राजा अमिततेज अतिशय आनन्द में निमग्न हो गये और मानो वर्तमान में ही उन्हें अरिहंतपद की विभूति प्राप्त हो गई हो इस प्रकार संतुष्ट हुए। अपने गणधर पदकी बात सुनकर श्रीविजय को भी महान आनन्द हुआ।

अशनिघोष को अपने पूर्वभव की कथा सुनकर जातिस्मरण हुआ और वैराग्य प्राप्त करके उसने दीक्षा ले ली। सुतारादेवी तथा ज्योतिप्रभा भी अपने पूर्वभव सुनकर संसार से विरक्त हो गई और दीक्षा लेकर आर्यिका बन गईं। इस प्रकार सब जीवों ने केवली प्रभु के उपदेश से आत्महित किया।

अपने चरित्र अभिनेता अमिततेज और श्रीविजय दोनों ने अपूर्व सम्यग्दर्शन द्वारा चैतन्यनिधान प्राप्त किये और देशव्रत अंगीकार करके अपनी-अपनी नगरी में लौटे।

अब राजा अमिततेज के अंतरंग जीवन मे, एक महान परिवर्तन हो गया। ‘दास भगवन्त के उदास रहें जगत सों’-ऐसा आदर्श श्रावकजीवन वे जी रहे थे। विद्याधरों की दोनों श्रेणी के स्वामी होने से वे ‘विद्याधरों के चक्रवर्ती’ थे, तथापि इतने महान राजवैभव में रहते हुए भी अपनी आत्मसाधना को क्षणभर नहीं भूलते थे। अनेक लोगों को प्रश्न उठता कि- ‘क्या, ऐसे राजवैभव में रहकर भी धर्म की साधना हो सकती है?’ महाराजा अमिततेज का जीवन देखकर उनके इस प्रश्न का समाधान हो जाता कि-हाँ, गृहस्थ दशा में भी आत्मज्ञान के बलसे धर्मसाधना (मोक्षमार्ग) चलती रहती है; क्योंकि ज्ञानी की चेतना राग से तथा सयोग से अलिप्त रहती है। महाराजा अमिततेज ऐसा धर्मजीवन जीते थे, और उनका वह मंगलजीवन अन्य जीवों को भी आत्महित की प्रेरणा देता था।

एक बार राजा अमिततेज तथा श्रीविजय रमणीय तीर्थों की यात्रा करने निकले। वहाँ एक शांत उद्यान में अमरगुरु तथा देवगुरु मुनिराजों को देखा। अहा, वीतरागी आत्मतेज से प्रकाशित उन मुनिवरों की शांतमुद्रा देखकर वे दोनों मुग्ध हुए। मुनिराजने उनको सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र का उपदेश दिया और तीर्थंकरादि महापुरुषों का चरित्र सुनाया।

तब श्रीविजयने अपने पिता त्रिपृष्ठ वासुदेव के पूर्वभव पूछे।

मुनिराज ने कहा-हे भव्य, सुन! तेरे पिता इस चौवीसी में अन्तिम तीर्थंकर (महावीर) होंगे। पूर्वभव मे वह जीव ऋषभदेवका पौत्र (मारीचिकुमार) था, परन्तु उसे धर्म की प्राप्ति नहीं होने से, दीर्घकाल तक संसार में भटक-भटककर नरक-निगोद के असंख्य भव किये। पश्चात् विश्वनन्दि राजकुमार हुआ, उद्यान के निमित्त से वैराग्य धारण करके धर्म प्राप्त किया और मुनि हुआ; परन्तु भोगों के निदान से धर्मभ्रष्ट हुआ, और अनुक्रम से त्रिपृष्ठ वासुदेव हुआ। वह तीन खण्ड की श्रेष्ठ विभूति का भोक्ता था; उसका वैभव अपार था; तीनों खण्डों के हजारों देव और सोलह हजार राजा उसकी सेवा करते थे; परन्तु धर्मको भूलकर विषय-भोगों की तीव्र लालसामें जीवन गँवाकर वह नरक में गया है और महा दुख भोग रहा है। (नरक से निकलकर अगले भवों में सिंह होकर वह धर्म प्राप्त करेगा; फिर अनुक्रम से चक्रवर्ती होकर अन्त में महावीर तीर्थंकर होगा।)

राजा श्रीविजय अपने पिता की तीन खण्ड की विभूति का वर्णन सुनकर आश्चर्यचकित हो गया और स्वयं भी धर्म के फल में ऐसी विभूति की लालसा करके उसका निदान बंध कर बैठा! अरेरे! हाथ में आये हुए धर्म का अमृत छोड़कर उसने विषयों के विषकी वांछा की!

वहाँ से घर आकर दोनों ने अनेक वर्षों तक राजसुख भोगा। उनके पुण्ययोग से एकबार पुनः दो मुनिराजों के दर्शन हुए। धर्मकथा के पश्चात् मुनिराज ने कहा : हे भद्र! अब तुम दोनों की आयु का एक मास शेष है, इसलिये धर्मसाधना में चित्त लगाओ।

वह बात सुनकर अमिततेज तथा श्रीविजय दोनों वैराग्यभावना का चिंतवन करने लगे। यह शरीर-संसार-भोग अस्थिर और क्षणभंगुर हैं; उनमें सुख नहीं है; चैतन्यतत्त्व ही स्थिर अविनाशी एवं सुखका धाम है। ऐसे चिंतन द्वारा वैराग्य में वृद्धि करके वे संसार से विरक्त हुए; दोनों ने अपने-अपने पुत्रों को राज्य सौंपकर सिद्धकूट चैत्यालय में जाकर महान पूजा की, दान दिया और पश्चात् वहाँ के नन्दनवन में नन्दन मुनिराज के निकट जिनदीक्षा धारण कर ली। अन्त में, प्रायोपगमन संन्यासपूर्वक शरीर का त्याग करके कहाँ उत्पन्न हुए ? वह अब देखें।

भगवान शान्तिनाथ : पूर्वभव ८ वाँ : आनतस्वर्ग में

अपने चरित्रनायक तीर्थंकर शान्तिनाथ तथा उनके भाई चक्रायुध गणधर-दोनों जीव पूर्व नौवें भव में अमिततेज और श्रीविजय राजा थे; उन्होंने मुनि होकर संन्यासपूर्वक शरीर छोड़ा और १३ वें आनतस्वर्ग में देव पर्याय मे उत्पन्न हुए। उनके नाम रविचूल और मणिचूल थे। उस देवविमान में सौ योजन लम्बा, पचास योजन चौड़ा और पचहत्तर योजन ऊँचा रत्नमय अकृत्रिम जिनमन्दिर है और उसमें १०८ जिन प्रतिमाएँ हैं। वहाँ जाकर दोनों देवों ने जिनबिम्ब की पूजा की। उस स्वर्ग लोक में आश्चर्यकारी वैभव थे; उन्हें अवधिज्ञान तथा अनेक लब्धियाँ थीं; वहाँ प्रतिदिन नये-नये उत्सव होते थे। स्वर्गलोक में उन दोनों देवों ने पुण्य के फल में असंख्य वर्षों तक उत्तम दैवी सुख भोगे; परन्तु वे पुण्यवैभव उन्हें तृप्त नहीं कर सके, मात्र आकुलता ही दी। अन्त में थककर वे मनुष्य लोक में आने को तैयार हुए; तब उनके शेष बचे पुण्य भी मनुष्य लोक में उनके साथ आये। मनुष्यलोक में वे कहाँ अवतरित हुए ? वह अब देखें।

भगवान शान्तिनाथ : पूर्वभव ७ वाँ

विदेहक्षेत्र में अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य वासुदेव

जम्बूद्वीप के विदेहक्षेत्र में वत्सकावती देश है, जहाँ सदा अनेक केवली भगवन्त और मुनिवर विचरते हैं तथा जैनशासन का धर्मचक्र सदा चलता रहता है। वहाँ के लोग जैनधर्म में तत्पर हैं और स्वर्ग के देव भी वहाँ धर्मश्रवण करने आते हैं। उस देश की प्रभाकरी नगरी में धर्मात्मा स्मित सागर महाराजा राज्य करते थे। अपने कथानायक ‘तीर्थंकर-गणधर’-यह दोनों जीव (रविचूल देव तथा मणिचूल देव) स्वर्गलोक से निकलकर उन राजा के पुत्र हुए; उनके नाम-अपराजित और अनन्तवीर्य थे। वे अपने साथ महान पुण्य लेकर आये थे इसलिये वे बलदेव-वासुदेव हुए।

राजा स्मित सागर दोनों पुत्रों को राज्य सौंपकर संसार से विरक्त हुए और स्वयंप्रभ जिनेन्द्र के निकट दीक्षा लेकर मुनि हो गये; परन्तु एक बार धरणेन्द्रदेव की दिव्यविभूति देखकर उन्होंने उसका निदान किया, इसलिये चारित्र से भ्रष्ट होकर पुण्य को अति अल्प करके, मृत्यु के पश्चात् धरणेन्द्र हुए। अरेरे ! निदान वह वास्तव में निन्दनीय है जोकि जीव को धर्म से भ्रष्ट करके दुर्गति में भ्रमण कराता है।

यहाँ प्रभाकरी नगरी में अपराजित तथा अनन्तवीर्य के राज्यवैभव में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होने लगी। उनकी राजसभा में बर्बरी और चिलाती नामकी दो राजनर्तकियाँ थीं; वे देशविदेश में प्रख्यात थीं। उन दिनों शिवमन्दिर नाम की विद्याधर नगरी में राजा दमितारी राज्य करता था; वह प्रति वासुदेव था; उसने तीन खण्ड पृथ्वी जीत ली थी और उसके शस्त्रभण्डार में एक दैवी चक्र उत्पन्न हुआ था। उस दमितारी राजाने दो नर्तकियों की प्रशंसा सुनी; उसने बलदेव-वासुदेव को आदेश दिया कि दोनों नर्तकियाँ मुझे सौंप दो और मेरी आज्ञा में रहकर राज्य करो।

दोनों भाइयों ने युक्ति सोची; वे स्वयं ही नर्तकी का रूप धारण करके दमितारी के राजमहल में गये और उसकी पुत्री कनकश्री का अपहरण कर ले गये।

कनकश्री के अपहरण की बात सुनते ही राजा दमितारी सेना लेकर उन दोनों के साथ युद्ध करने गया। वह जब किसी प्रकार जीत नहीं सका तब उसने अपना दैवी चक्र अनन्तवीर्यको मारने के लिये उस पर फेंका, परन्तु अनन्तवीर्य के पुण्यातिशय के कारण वह चक्र उसके निकट आते ही शांत हो गया और उलटा उसका आज्ञाकारी बन गया। अनन्तवीर्य ने क्रोधपूर्वक उस चक्र द्वारा दमितारी का शिरच्छेद कर दिया। अरेरे ! उसीके चक्रने उसीका वध कर दिया ! मरकर वह नरक मे गया। [दमितारी प्रति वासुदेव के पिता कीर्तिधर मुनि हुए थे और केवलज्ञान प्रगट करके अरिहंत रूप में विचर रहे थे। अरे, पिता तो केवली हुए और पुत्र नरक में गया ! पुत्री कनकश्री अपने दादा कीर्तिधर भगवान के समवसरण में अपने पूर्वभव जानकर, संसार से विरक्त होकर आर्यिका हुई और समाधिमरण करके स्वर्ग में देवीरूप से उत्पन्न हुई।]

अपराजित और अनन्तवीर्य दोनों भाई (अर्थात् शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रायुध गणधर के जीव, पूर्व के सातवे भव में) विदेहक्षेत्र में बलदेव-वासुदेव रूप में प्रसिद्ध हुए। हजारों राजा तथा देव उनकी सेवा करते थे; तीन खण्ड की उत्तम विभूति उन्हे प्राप्त हुई थी, अनेक दैवी विद्याएँ भी उनको सिद्ध थी। यह सब जिनधर्म की सेवा-भक्ति का फल था। शास्त्रकार कहते है कि-हे भव्य जीवो ! तुम मोक्षके हेतु जैनधर्म की उपासना करो। अहा, जैनधर्म की उपासना तो मोक्षफल प्राप्त कराती है, वहाँ बीच में स्वर्गादिकी तो गिनती ही क्या !

विदेह क्षेत्र की प्रभाकरी नगरी में बलदेव-वासुदेव सुखपूर्वक तीन खण्ड का राज्य करते थे। एक बार अपराजित बलदेव की पुत्री सुमतिदेवी के विवाह की तैयारियाँ चल रही थी, अति भव्य विवाह-मण्डप के बीच सुमति कुमारी सुन्दर शृंगार सजकर आयी थी कि इतने मे आकाश से एक देवी उतरी और सुमति से कहने लगी-हे सखी ! सुन, मै तेरे हितकी बात करती हूँ। मैं स्वर्ग की देवी हूँ, तू भी पूर्व भव में देवी थी और हम दोनों सहेलियाँ थी। एक बार हम दोनो साथ नन्दीश्वर जिनालयों की पूजा करने गये थे। पश्चात् हम दोनों ने मेरु जिनालय की भी वन्दना की, वहाँ एक ऋद्धिधारी मुनि के दर्शन किये और धर्मोपदेश सुनकर हमने उन मुनिराज से पूछा कि हे स्वामी ! इस संसार से हम दोनो की मुक्ति कब होगी ?

मुनिराज ने कहा-तुम चौथे भव में मोक्ष प्राप्त करोगी। देवी कहने लगी-हे सुमति ! यह सुनकर हम दोनों अति प्रसन्न हुए थे और हम दोनों ने मुनिराज के समक्ष एक-दूसरे को वचन दिया था कि-हम में से जो पहले मनुष्य लोक में अवतरित हो, उसे दूसरी देवी संबोधकर आत्महित की प्रेरणा दे, इसलिये हे सखी ! मैं स्वर्ग से उस वचन का पालन करने आयी हूँ। तू इन विषय-भोगों मे न पड़कर संयम धारण कर और आत्महित कर ले !

विवाह-मण्डप के बीच देवी की यह बात सुनते ही भावी तीर्थंकर ऐसे बलदेव की वीरपुत्री सुमति को अपने पूर्वभव का स्मरण हुआ और वैराग्य को प्राप्त हुई; उसने अन्य सात सौ राजकन्याओं के साथ जिनदीक्षा ग्रहण की और आर्यिका व्रत का पालन करके, स्त्रीपर्याय छोड़कर उस सुमति का जीव १३ वें स्वर्ग में देव हुआ।

अचानक विवाह-मण्डप में ही राजकुमारी को ‘विवाह के समय वैराग्य’ की घटना से चारों ओर आश्चर्य फैल गया। बलभद्र का चित्त भी संसार से उदास हो गया। यद्यपि उनको संयम भावना जागृत हुई, किन्तु अपने भ्राता अनन्तवीर्य के प्रति तीव्र स्नेह के कारण वे-संयम धारण न कर सके। ऐसा महान वैराग्य प्रसंग प्रत्यक्ष देखकर भी अनन्तवीर्य वासुदेवके (पूर्व काल के निदानबंध के मिथ्या संस्कार वश) किंचित भी वैराग्य नहीं हुआ; उसका जीवन दिन-रात विषय-भोगों में ही आसक्त रहा। तीव्र विषयासक्ति के कारण सदा आर्त-रौद्र ध्यान में वर्तता हुआ वह पंचपरमेष्ठी को भी भूल गया। अरे, जिस धर्मानुराग के कारण वह ऐसे पुण्यभोगों को प्राप्त हुआ था, उस धर्म को ही वह भूल गया था ! अपने भाई के साथ अनेकों बार वह प्रभु के समवसरण में भी जाता था और धर्मोपदेश भी सुनता था; परन्तु उसका चित्त तो विषय-भोगों से रंगा हुआ था। अरे रे ! जिसका चित्त ही मैला हो उसे परमात्मा का संयोग भी क्या कर सकेगा ? तीव्र आरम्भ परिग्रह के कलषित भाव के कारण वह अनन्तवीर्य रौद्रध्यानपूर्वक मरकर नरक में गया।

१६

भगवान शान्तिनाथ (भाग २)

नरक में उत्पन्न होते ही वह अर्धचक्रवर्ती का जीव महाभयंकर बिल मे से औंधे सिर नीचे की कर्कशभूमि पर जा गिरा। नरकभूमि के स्पर्शमात्र से उसे इतना भयंकर दु ख हुआ कि पुनः पाँचसों धनुष उपर उछला और फिर नीचे गिरा। उसे असह्य शारीरिक वेदना थी; उसे देखते ही दूसरे हजारो नारकी मारने लग गये। ऐसे भयकर दुःख देखकर उसे विचार आया कि अरे, मैं कौन हूँ ? कहाँ आकर पड़ा हूँ ? मुझे अकारण ही इतना दुःख देनेवाले यह क्रूर जीव कौन है ? मुझे क्यों इतनी भयंकर पीड़ा दी जा रही है ? अरे रे ! मै कहाँ जाऊँ ? अपना दुःख किससे कहूँ ? यहाँ कौन मुझे बचायगा ? भीषण ताप और भूख-प्यास के कारण मुझे मृत्यु से भी अधिक वेदना हो रही है, मुझे बहुत प्यास लगी है, लेकिन पानी कहाँ मिलेगा ? इस प्रकार दुःखों से चिल्लाता हुआ वह जीव इधर से उधर भटकने लगा। वहाँ उसे कुअवधिज्ञान हुआ और उसने जाना कि-अरे, यह तो नरक भूमि है; पापो के फलसे मै नरकभूमि मे आ पड़ा हूँ और यह सब नारकी तथा परमाधामी असुर देव मुझे भयंकर दुःख देकर मेरे पापो का फल चखा रहे है। अरेरे ! दुर्लभ मुनष्यभव विषयभोगो मे गँवाकर मै इस घोर नरक मे पड़ा हूँ ! मुझ मूर्ख ने पूर्व भव मे धर्म के फल मे भोगो की चाह करके सम्यक्त्व रुपी अमृतको ढोल दिया और विषसमान विषयों की लालसा की। उस भूल के कारण मुझे वर्तमान मे कैसे भयंकर दुःख भोगना पड़ रहे है ! अरेरे, विषयो मे से सुख तो मुझे किंचित् नही मिला, उलटा उनके सेवन से दुःखों के इस समुद्र में आ पड़ा हूँ ! बाह्य विषयों में सुख है ही कहाँ ? सुख तो आत्मा मे है। अतीन्द्रिय आत्मसुख की प्रतीति करके मैं पुनः अपने सम्यक्त्व को ग्रहण करूँगा, ताकि फिर कभी ऐसे घोर नरकों के दुःख नही सहना पड़े ! -इस प्रकार पश्चाताप सहित नरक के घोरातिघोर दुःखों को सहन करते हुआ वह अनन्तवीर्य का जीव (भावी गणधर का जीव) अपनी असंख्यात वर्ष की नरकायुका एक-एक पल बड़ी कठिनाई पूर्वक रो-रोकर व्यतीत कर रहा था। अरे, उसके दुःख का अल्प वर्णन लिखते हुए भी कँपकँपी आती है तो वह दुःख सहन करनेवाले की पीड़ा को तो हम क्या कहें ? वह तो वही वेदे और केवली प्रभु ही जानें !

अब, इस ओर प्रभाकरी नगरी में अपने भ्राता अनन्तवीर्य वासुदेव की अचानक मृत्यु हो जाने से अपराजित बलभद्र को तीव्र आघात लगा। ‘मेरे भाई की मृत्यु हो चुकी है’-ऐसा स्वीकार करने को उसका मन तैयार नहीं था। यद्यपि स्वात्मतत्त्व के सम्बन्ध में उस समय उनका ज्ञान जागृत था, परन्तु वे भ्रातृस्नेह के कारण मृतक को जीवित मानने की परज्ञेय सम्बन्धी भूल कर बैठे। वे अनन्तवीर्य के मृत शरीर को कन्धे पर उठाकर इधर-उधर घूमते फिरे; उसके साथ बात करने की तथा खिलाने-पिलाने की चेष्टाएँ कीं ! उदयभाव की विचित्रता तो देखो !..कि-सम्यक्त्व की भूमिका में स्थित एक भावी तीर्थंकर स्वयं भावी गणधर के मृत शरीर को लेकर छह महीने तक फिरते रहे, किन्तु धन्य है उनकी सम्यक्त्व-चेतना को..,जिसने अपने आत्मा को उस उदयभाव से भिन्न का भिन्न ही रखा ! भाग्ययोग से उसी काल उन बलभद्रजी को यशोधर मुनिराज का समागम हुआ; उन्होंने चैतन्यतत्त्व का अद्भुत उपदेश देकर कहा कि-हे राजन् ! तुम तो आत्मतत्त्व के ज्ञाता हो। इसलिये अब इस बन्धुमोह को तथा शोक को छोड़ो और संयम धारण करके अपना कल्याण करो। छह भव के पश्चात् तो तुम भरत क्षेत्र में तीर्थंकर होगे; यह मोहासक्तिपूर्ण चेष्टाएँ तुम्हें शोभा नहीं देतीं; इसलिये अपने चित्त को शांत करो और उपयोग को आत्मध्यान में लगाओं।

मुनिराज का उपदेश सुनते ही बलदेव को वैराग्य उत्पन्न हुआ; उनकी चेतना चमक उठी-अरे ! किसका शरीर और कौन भाई ? जहाँ यह शरीर ही अपना नहीं है वहाँ दूसरा कौन अपना होगा !

’ ‘नथी मोह ते मारो कंई, उपयोग केवल ओक हूँ।’ ’

अरे, मैंने मोहचेष्टा में व्यर्थ ही समय गँवा दिया-ऐसा विचार कर उन्होंने दीक्षा ग्रहण कर ली। दीक्षा लेकर उन अपराजित मुनिराज ने अपना मन आत्मसाधना में ही लगाया, और अंत समय में उत्तम ध्यानपूर्वक शरीर त्यागकर वे महात्मा १६ वे अच्युत स्वर्ग में इन्द्र हुए।

भगवान शान्तिनाथ : पूर्वभव छठवाँ अच्युतस्वर्ग में इन्द्र

अपने चरित्रनायक भगवान शान्तिनाथ जो अपराजित बलभद्र थे और पश्चात् मुनि दीक्षा लेकर समाधिमरण करके अच्युत स्वर्ग में इन्द्र हुए; उनके अवतरित होते ही स्वर्गलोक में मंगलवाद्य बजने लगे। देव देवियाँ उन्हे वन्दन करके आदर सत्कार करने लगे। वहाँ की आश्चर्यजनक विभूति देखकर भी उन्हे आश्चर्य नहीं हुआ; क्योंकि वे जानते थे कि मैंने पूर्वभव में आत्मा की आराधना की है और वह आराधना करते हुए साथ मे जो राग शेष रह गया उसका यह फल है; इस वैभव का एक रजकण भी मेरे आत्मा का नहीं है, सब कुछ मुझसे भिन्न ही है…इस प्रकार निर्मोह रूप से धर्म की महिमापूर्वक सर्व प्रथम उन्होंने इन्द्रलोक मे विराजमान जिनप्रतिमा की भक्ति सहित पूजा की और पश्चात् इन्द्रपद स्वीकार किया। ऐसा करके उन्होंने अपने ऐसा भाव प्रगट किया कि-हे जिनदेव ! हमें यह स्वर्गवैभव इष्ट नहीं है, हमें तो आप जैसा वीतरागी आत्मवैभव ही इष्ट है। आश्चर्यकारी इन्द्रलोक के वैभव में भी लुभाना नहीं-यह कोई साधारण बात है ? नहीं, यह तो असाधारण बात है। आत्मतत्त्व की अद्भुतता को जाननेवाले भगवान शान्तिनाथ जैसे सम्यग्दृष्टि महात्मा ही वह कर सकते हैं।

उन अच्युत इन्द्र को महान अवधिज्ञान तथा विक्रियादि ऋद्धियाँ थीं…वे बारम्बार तीर्थंकरों के पंचकल्याणक में जाते, भव्य इन्द्रसभा मे सम्यग्दर्शन की चर्चा करके उसकी अपार महिमा प्रगट करते और चारित्रदशा की भावना भाते।-इस प्रकार सुखपूर्वक स्वर्ग की आयु व्यतीत करते थे।

अरे, जीवनभर तथा भव-भवान्तर से साथ रहनेवाले तथा भविष्य में भी तीर्थंकर-गणधर होनेवाले वे भाई पृथक् हो गये-एक स्वर्ग में और दूसरा नरक में ! उसका नरक-दुःख देखा नहीं जाता, इसलिये कथा को आगे बढ़ाने से पूर्व उस अनन्तवीर्य के जीव को नरक से बाहर लायें और स्वर्ग में दोनों भाइयों का मिलाप करा दें।

पहले हम पढ़ चुके हैं कि अपराजित और अनन्तवीर्य के पिता स्मितसागर दीक्षा लेकर मुनि हुए थे और निदान बन्ध करके धरणेन्द्र पर्याय में उपजे थे। एक बार उन धरणेन्द्र ने अवधिज्ञान से जाना कि पूर्वभव का मेरा पुत्र अनन्तवीर्य मरकर नरक में गया है; इसलिये तुरन्त वे धरणेन्द्र उसे प्रतिबोधने के लिये नरक में पहुँचे। धरणेन्द्र को देखते ही नारकी जीवों को आश्चर्य हुआ कि-यह कोई प्रभावशाली देव हमें मारने के लिये नही किन्तु शान्ति प्रदान करने आये हैं;-ऐसा समझकर वे सब नारकी क्षणभर के लिये एक-दूसरे के साथ लड़ना झगड़ना छोड़कर धरणेन्द्र की बात सुनने को आतुर हुए।

धरणेन्द्र ने अनन्तवीर्य के जीव को सम्बोधते हुए कहा-हे भव्य ! इससे पूर्व के भवमें तू तीनखण्ड का स्वामी वासुदेव था और मैं तेरा पिता था। धर्मको भूलकर विषय-भोगों की तीव्र लालसा के कारण तुझे यह नरक मिला है। अब फिर से अपने आत्मा की सुरक्षा कर और अपने खोये हुए सम्यक्त्व-रत्न को पुनः प्राप्त कर ले ! मैं धरणेन्द्र हूँ और तुझे प्रतिबोधने के लिये ही यहाँ आया हूँ।

अहां, मानो नरक मे अमृत पीने को मिला हो !-तदनुसार धरणेन्द्र के वचन सुनकर उस नारकी जीव को महान शान्ति हुई। वह गद्गद होकर हाथ जोड़कर कहने लगा-हे तात ! आपने इस नरक में भी मुझे धर्मोपदेश रुपी अमृत-पान कराके महान उपकार किया है ! अरे, मनुष्यभव में मैं त्रिखण्डाधिपति था, और भविष्य में तीर्थंकर होनेवाले महात्मा अपराजित बलदेव मेरे भाई आहर जीवन के साथी थे; उस काल जो मेरे साथ थे उनमें से अनेक जीवों ने तो मोक्ष प्राप्त कर लिया, अनेक जीव स्वर्ग में गये और मैं यहाँ नरक में पड़ा हूँ ! पुण्यफल को भोगनेवाले तो कितने ही जीव मेरे साथी थे, अब इस पापफल को भोगने में कोई मेरा सहचर नहीं है; मैं अकेला ही पाप का फल भोग रहा हूँ-

जन्म-मरण एकहि करे, सुख-दुःख वेदे एक;
नरक गमन में अकेला, मोक्ष जाय जीव एका

यहाँ अकेला मेरा आत्मा ही शरण है।-इस प्रकार एकत्व भावना द्वारा अंतरस्वभाव की गहराई में उतरकर उसने पुनः सम्यक्त्व ग्रहण कर लिया…इतना ही नहीं, उस समय और भी अनेक नारकी जीव शान्ति एवं सम्यक्त्व को प्राप्त हुए…और अति उपकार बुद्धि से हाथ जोड़कर धरणेन्द्र को नमस्कार करने लगे। अपना प्रयोजन पूर्ण हुआ जानकर वे धरणेन्द्र भी अपने स्थान पर चले गये।

देखो तो सही, जीवों के परिणाम की विचित्रता ! त्रिखण्ड का राजवैभव भोगने में अपराजित और अनन्तवीर्य दोनो भाई साथ थे; तथापि एक तो विशुद्ध परिणाम के कारण स्वर्ग में गया और दूसरा संक्लेशपरिणाम के कारण नरक में। नरक में भी पुनः सम्यक्त्व प्राप्त कर लिया। दो भाइयों में से एक असंख्य वर्षों तक स्वर्ग में और दूसरा असंख्य वर्ष तक नरक में, तथापि गहरी अंतर्दृष्टि से देखें तो दोनों जीव सम्यग्दृष्टि हैं, दोनो चतुर्थ गुणवास्थान वर्ती है और सम्यक्त्व सुख दोनों को समान है। दोनों के संयोग में तथा उदयभाव में महान अंतर होनेपर भी स्वभावदशा की इस समानता को भेदज्ञानी जीव ही जान सकते हैं; उदय और ज्ञानको जो भिन्न देख सकते हैं वे ही ज्ञानियों की अंतरदशा को पहिचान सकते हैं।

अन्त में वह अनन्तवीर्य का जीव सम्यक्त्व का पालन करते हुए नरक की घोर यातना से छूटकर भरतक्षेत्र में विद्याधरों का स्वामी मेघनाद राजा हुआ। एक बार वह मेघनाद मेरुपर्वत के नन्दनवन में विद्या साध रहा था; ठीक उसी समय अच्युतेन्द्र भी वहाँ जिनवन्दना हेतु आये; उन्होंने मेघनाद को देखकर कहा-हे मेघनाद ! पूर्वभव में हम दोनों भाई थे; मैं अच्युतेन्द्र हुआ हूँ, और तू नरक में गया था, वहाँ से निकलकर मेघनाद विद्याधर हुआ। विषय-भोगों की तीव्र लालसा से तूने घोर नरक-दुःख भोगे; उनका स्मरण करके अब सावधान हो; इन विषय-भोगों को छोड़ और संयम की आराधना कर ! तुझे सम्यग्दर्शन तो है ही, चारित्र धर्म को अंगीकार कर ! तृष्णा की आग विषय-भोगों द्वारा शांत नहीं होती परन्तु चारित्रजल से ही शांत होती है; इसलिये तू आज ही भोगों को तिलांजलि देकर पारमेश्वरी जिनदीक्षा धारण कर। यह दीक्षा मोक्ष की जननी है, जिसकी पूजा देव भी करते हैं।

अपने भाई अच्युत इन्द्र के मुँह से चारित्रदशा की अपार महिमा तथा वैराग्य का महान उपदेश सुनकर उस मेघनाद को जाति स्मरण हुआ; तुरन्त उसका चित्त संसार से विरक्त हो गया और घर लौटने से पूर्व वहीं उसने एक मुनिराज के समीप वस्त्राभूषण एवं राजमुकुट आदि सर्व परिग्रह छोड़कर चारित्रदशा अंगीकार कर ली। ‘धन्य मुनिदशा !’ इस प्रकार प्रशंसापूर्वक उसे वन्दन करके अच्युतेन्द्र अपने स्वर्ग में चले गये। (देखो तो सही, गुण का बहुमान ! एक तीर्थंकर के आत्माने गणधर के आत्मा को वन्दन किया।)

श्री मेघनाद मुनि आत्मध्यान पूर्वक विचर रहे थे। इतने में सुकण्ठ नामके एक असुरकुमार देवने उन पर उपसर्ग किया। धरणेन्द्र को उपसर्ग का ज्ञान होते ही उन्होंने उस उपसर्ग को टाला और असुर को भगा दिया। अन्त में वे मुनिराज शांतभाव से समाधिमरण करके सोलहवे अच्युत स्वर्ग में प्रतीन्द्र हुए। इन्द्र तो शान्तिनाथ तीर्थंकर का जीव और प्रतीन्द्र चक्रायुध गणधर का जीव-इस प्रकार दोनों भाइयों का पुनःमिलाप हुआ। अपने पूर्वभव के भाई, तथा भविष्य के भवके भी भाई की भेट होने से उस प्रतीन्द्र को अति प्रसन्नता हुई; उसने उनका बहुत उपकार माना। वे इन्द्र और प्रतीन्द्र दोनों असंख्यात वर्षों तक चैतन्य की अखण्ड साधनापूर्वक स्वर्ग लोक में साथ ही रहे। अब मोक्ष तक के शेष पाँचों उत्तम भवों मे भी साथ ही रहेंगे और आत्मासाधना में वृद्धि करते करते, तीर्थंकर-गणधर होकर, मोक्षपद प्राप्त करेंगे। [हम इस कथा द्वारा मोक्ष तक उनके साथ ही रहेंगे। प्रथम विदेहक्षेत्र में- जहाँ वे क्षेमंकर तीर्थंकर के पुत्र होते हैं वहाँ चलें।]

भगवान शान्तिनाथ : पूर्व भव पाँचवाँ

क्षेमंकर-तीर्थंकर के पुत्र वज्रायुध-चक्रवर्ती (शांतिनाथ का जीव)

वज्रायुध के पुत्र सहस्रायुध (चक्रायुध गणधर का जीव)

अहा, चैतन्यरस से भरपूर शांत जीवन जीनेवाले हे शांतिनाथ प्रभु ! तीर्थंकर होने से पूर्व पाँचवें तथा तीसरे दोनों अवतार में आप विदेहक्षेत्र में तीर्थंकर देव के पुत्र थे। दोनों बार स्वर्गलोक की इन्द्रसभामें इन्द्रने आपके उत्तम गुणों की प्रशंसा की थी और देव-देवी आपकी परीक्षा करने आये थे; तब जैनतत्त्वज्ञान एवं ब्रह्मचर्य में आप इतने अडिग थे कि देव भी आपको डिगा नहीं सके। ज्ञान-वैराग्य की दृढ़ता के प्रेरक आपके जीवन की उत्तम घटनाएँ हम जैसे मुमुक्षु जीवों को भी आत्मसाधना हेतु उत्साहित करती हैं। यहाँ आपके जीवन की उन घटनाओं का आलेखन करनेके मंगल-अवसर पर आपश्रीको अपने हृदय में विराजमान करके नमस्कार करते हैं…अहो, आपके मंगल-जीवन का आलेखन करते हुए हमें इतनी अपार प्रसन्नता होती है मानों आप स्वयं ही हमारे हृदय में बैठे-बैठे बोल रहे हों !

अपने हृदयेश्वर भगवान शान्तिनाथ और उनके गणधर वे दोनों जीव छठवें पूर्वभव में अच्युतस्वर्ग में इन्द्र तथा प्रतीन्द्र हुए हैं; वहाँ से निकलकर अब जिस नगरी में तीर्थंकर के पुत्र-पौत्र रुप में अवतरित होनेवाले हैं उस पावननगरी में अपनी कथा प्रवेश करती है।

यह है जम्बूद्वीप के विदेहक्षेत्र में मंगलावती देश की रत्नसंचयपुर नगरी ! जहाँ के महाराजा क्षेमंकर तीर्थंकर हों उस नगरी की शोभा का क्या कहना ! जैनधर्म के उपासक पुण्यवन्त जीव वहाँ निवास करते हैं और उच्च शिखरों से सुशोभित जिनमन्दिर हैं। वह ‘रत्नसंचयपुरी’ बाह्य में तो जिन मन्दिरों के शिखर पर जड़े हुए रत्नों के प्रकाश से शोभायमान है, और अंतरंग में, धर्मात्माओं के हृदय में विद्यमान सम्यग्दर्शनादि रत्नों से सुशोभित हो रही है। महाराजा क्षेमंकर महापुण्यवान हैं, धीर-वीर हैं, शुद्ध सम्यग्दृष्टि हैं, अवधिज्ञानी हैं, चरमशरीरी हैं और तीर्थंकर हैं।

उन क्षेमंकर महाराजा की महारानी कनकमाला की कोख से शान्तिनाथ प्रभुके जीवने (पूर्वके अपराजित बलभद्र के जीवने) अच्युतस्वर्ग में से अवतार लिया…उसका नाम वज्रायुध ! [पाठक, तुम्हें स्मरण होगा कि शान्तिनाथ प्रभुने पूर्व १२ वें भव में भी इस रत्नसंचयपुर नगरी में ही ‘श्रीषेण राजा’ के रुप में अवतरित होकर राज्य किया था।] वाह, रत्नपुरी तो मानो तीर्थंकरों की खान ! विदेहक्षेत्र के वर्तमान तीर्थंकर के घर भरतक्षेत्र के भावी तीर्थंकर पुत्ररुप में अवतरित हुए। वैसे तो, दो साक्षात् तीर्थंकरों का मिलन नहीं होता, परन्तु एक तीर्थंकर के घरमें दूसरे तीर्थंकर का अवतार हुआ; इसलिये एक वर्तमान और एक भावी-ऐसे दो तीर्थंकर-आत्माओं का पिता-पुत्र रुप में मिलाप हुआ।

क्र भावी गणधर का जीव, जोकि पूर्व में अपराजितका भाई अनन्तवीर्य वासुदेव था, पश्चात् नरक में गया था और वहाँ से निकलकर मेघनाद होकर अच्युतस्वर्ग में प्रतीन्द्र हुआ था, वह वहाँ से निकलकर रत्नसंचयपुरी मे वज्रायुध का पुत्र हुआ। उसका नाम सहस्रायुध। (भावी तीर्थंकर और गणधर वर्तमान मे पिता-पुत्र हुए।)

उस सहस्रायुध का एक चरमशरीरी पुत्र था जिसका नाम कनकशान्ति।

इस प्रकार शान्तिनाथ प्रभु के जीवन में एकसाथ चार पीढ़ियों के महापुरुषों का जीवन पढ़ रहे हैं-(१) क्षेमंकर महाराजा (विदेहक्षेत्र के तीर्थंकर-रत्नसंचयपुरी के राजा) (२) उन क्षेमंकर के पुत्र वज्रायुध कुमार (चक्रवर्ती; भावी तीर्थंकर शान्तिनाथ) (३) उन वज्रायुध के पुत्र सहस्रायुध (भावी गणधर चक्रायुध) (४) उन सहस्रायुध के पुत्र कनकशान्ति (जो चरमशरीरी हैं और केवलज्ञान प्रगट करके धर्मोपदेश द्वारा अपने दादाको भी वैराग्य का निमित्त होंगे।)

एक बार रत्नपुरी की राजसभा में वे चारों महात्मा बैठे हैं। तीर्थंकर क्षेमंकर महाराजा पुत्र, पौत्र एव प्रपौत्र सहित शोभायमान हो रहे हैं; इतने में उस राजसभा में एक पण्डित आया…और आश्चर्यजनक घटना हुई। क्या हुआ?-वह सुने।

[इन्द्रसभा में वज्रायुध की प्रशंसा] और [देव द्वारा परीक्षा तथा स्तुति]

जब यहाँ रत्नपुरी में अद्भुत राजसभा भरी थी उसी समय अमरपुरी में अद्भुत इन्द्रसभा चल रही थी; उसमें इन्द्र महाराज ने वज्रायुधकुमार की प्रशंसा करते हुए कहा-'हे देवो! मैं मध्यलोक के एक धर्मात्मा की बात कहता हूँ सो सुनो! । यह बात सुख देनेवाली तथा धर्म की महिमा में वृद्धि करनेवाली है। देखो, इस समय विदेहक्षेत्र की रत्नसंचयपुरी नगरी में तीर्थंकर भगवान श्री क्षेमंकर महाराज की राजसभा में उनके पुत्र वज्रायुध कुमार बैठे हैं, वे भी भरतक्षेत्र के भावी तीर्थंकर हैं, महाबुद्धिमान हैं, अवधिज्ञानी हैं, गुणों के सागर हैं, तत्त्वों के ज्ञाता हैं, धर्मात्मा हैं, सम्यग्दर्शन के निःशंकतादि गुणों से शोभित हैं और जिनप्रणित तत्त्वार्थश्रद्धान में अडिग हैं…" ऐसे अनेक प्रकार से इन्द्रने वज्रायुधकुमार की स्तुति की।

इन्द्रसभा में वज्रायुध कुमार की ऐसी प्रशंसा सुनकर ‘विचित्र शूल’ नामका एक देव परीक्षा करने के लिये रत्नपुरी में आया और एकान्तवादी पण्डित का रूप धारण करके वज्रायुध कुमार से पूछने लगा-'हे कुमार ! आप जीवादि पदार्थों का विचार करने में चतुर हैं तथा अनेकान्त रूप जैनमत के अनुयायी हैं; परन्तु वस्तु या तो एकान्त क्षणिक होती है अथवा एकान्त नित्य होती है ! तो फिर यह बतलाइये कि-जीव सर्वथा क्षणिक है? या सर्वथा नित्य है?

उत्तर में वज्रायुधकुमार अनेकान्त स्वभाव का आश्रय लेकर अमृतसमान मधुर एवं श्रेष्ठ वचनों द्वारा कहने लगे-'हे विद्वान ! मैं जीवादि पदार्थों का स्वरूप पक्षपातरहित कहता हूँ; तुम अपने मन को स्थिर रखकर सुनो ! जबतक तुमने अनेकान्तमय जैनधर्म का अमृत नहीं पिया तभी तक तुम्हारी वाणी में एकान्तवाद रूप मिथ्यात्व का विष आता है। अनेकान्त के अमृत का स्वाद लेते ही तुम्हारा मिथ्यात्वरूपी विष उतर जायगा और तुम्हें तृप्ति होगी। सुनो ! जिन भगवान के अमृतसमान वचनों में ऐसा कहा है कि-जीवादि कोई पदार्थ सर्वथा क्षणिक नहीं हैं, और न सर्वथा नित्य हैं, क्योंकि यदि उसे सर्वथा क्षणिक माना जाय तो पुण्य-पाप का फल या बंध-मोक्ष आदि कुछ नहीं बन सकते, पुनर्जन्म नहीं बन सकता, विचारपूर्वक किये जानेवाले कार्य मकान-व्यापार-विवाहादि नहीं बन सकते; ज्ञान-चारित्रादि का अनुष्ठान या तपादि भी निष्फल जायेंगे, क्योकि जीव क्षणिक होगा तो उन सबका फल कौन भोगेगा ? तथा गुरु द्वारा शिष्य को ज्ञानप्राप्ति या पूर्वजन्म के संस्कार भी नहीं रहेंगे; और प्रत्यभिज्ञान, जातिस्मरण ज्ञान आदि का भी लोप हो जायगा। इसलिये जीवको सर्वथा क्षणिकपना नहीं है। और यदि जीवके सर्वथा नित्य माना जाय तो बंध-मोक्ष नहीं बन सकेंगे, अज्ञान दूर करके ज्ञान करना या क्रोधादि की हानि या ज्ञानादि की वृद्धि नहीं बन सकेगी, पुनर्जन्म भी नही बन सकेगा; गति का परिवर्तन भी किस प्रकार होगा ? इसलिये जीव सर्वथा नित्य भी नहीं है।

एक ही जीव एकसाथ नित्य तथा अनित्य ऐसे अनेक स्वरूप है, (आत्मा द्रव्य से नित्य है, पर्याय से पलटता है।)-उसे अनेकान्त कहते हैं। उसी प्रकार जीवादि तत्त्वों में जो अपने गुण-पर्याय हैं उनसे वह सर्वथा अभिन्न नहीं है, तथा एकान्त से भिन्न भी नहीं हैं; अनेकान्त स्वरूप द्वारा ही सत्य की सिद्धि है। अनेकान्त यह अमृत है; इसलिये बुद्धिमानों को परीक्षापूर्वक अनेकान्त स्वरूप जैनधर्म का स्वीकार करना चाहिये; क्योंकि वही सत्य है। एकान्त नित्यपना या एकान्त क्षणिकपना वह सत्य नहीं है।

इस प्रकार वज्रायुध कुमारने वज्रसमान वचनों द्वारा एकान्तवाद के तर्कों को खण्ड-खण्ड कर दिया। विद्वान पंडित के वेश में आया हुआ वह देव भी वज्रायुध की विद्वत्ता से मुग्ध हो गया। मनमें प्रसन्न होकर अभी विशेष परीक्षा के लिये उसने पूछा कि-हे कुमार ! आपके वचन बुद्धिमत्तापूर्ण तथा विद्वानों को आनन्द देनेवाले हैं। अब, यह समझायें कि-क्या जीव, कर्मादिका कर्त्ता है ? या सर्वथा अकर्त्ता है ?

उत्तर में वज्रायुद्ध ने कहा-जीव को घट-पट-शरीर-कर्म आदि परद्रव्य का कर्ता उपचार से कहा जाता है, वास्तव में जीव उनका कर्ता नहीं है। अशुद्धनय से जीव अपने क्रोध-रागादि भावों का कर्ता है, परन्तु वह कर्त्तापना छोड़ने योग्य है, शुद्धनय से जीव उन क्रोधादिका कर्त्ता नहीं हैं; वह अपने सम्यक्त्वादि शुद्ध चेतनभावों का वास्तव में कर्ता है; वह उसका स्वभाव है। इस प्रकार जीव को कर्त्तापना तथा अकर्त्तापना समझना।

विद्वान ने फिर पूछा-क्या जीव कर्म के फल का भोक्ता है ? या नहीं ?

विदेह के वर्तमान तीर्थंकर की सभा में बैठे हुए भारत के भावी तीर्थंकर ने उत्तर दिया कि-‘अशुद्धनय से जीव अपने किये हुए कर्मों का फल भोगता है; शुद्धनय से वह कर्मफल का भोक्ता नहीं है; अपने स्वाभाविक सुखका ही भोक्ता है।’

(देव-) जो जीव कर्म करता है वही उसके फल का भोक्ता है ? या कोई दूसरा ?

(वज्रायुध) एक पर्याय में जीव शुभाशुभ कर्म को करता है और दूसरी पर्याय में (अथवा दूसरे जन्म में) उसके फलको भोगता है; इसलिये पर्याय-अपेक्षासे देखने पर जो करता है वही नहीं भोगता; और द्रव्य-अपेक्षासे देखने पर जिस जीवने कर्म किये वही जीव उनके फल को भोगता है; एक जीव के सुख-दुःखको दूसरा नहीं भोगता।

देवने फिर पूछा-जीव सर्वव्यापी महान है ? या तिल्लीके दाने जितना सूक्ष्म है ?

वज्रायुध ने कहा-निश्चय से प्रत्येक जीव सदा असंख्य प्रदेशी है। केवली समुद्घात के समय वह सम्पूर्ण लोक में सर्वव्यापी हो जाता है (-जो मात्र एक समय ही रहता है।) उसके अतिरिक्त समय मे छोटा-बड़ा जैसा शरीर हो वैसे आकारवाला होता है। उसका कारण यह है कि दीपक के प्रकाश की भाँति जीवमें संकोच-विस्तार होने की शक्ति है, इसलिये वह शरीर के आकार जैसा हो जाता है। मुक्तदशामें विद्यमान शरीररहित जीव भी सर्वथा निराकार नहीं है तथा सर्वव्यापी नहीं है, परन्तु लगभग अन्तिम शरीर-प्रमाण चैतन्य आकारवाला होता है।

अन्तमें उस परीक्षा करने आये देवने पूछा-हे कुँवरजी ! यह बतलायें कि-क्या जीव स्वयं ज्ञान से जानता है ? या इन्द्रियों से ?

वज्रायुधकुमारने कहा-हे वत्स ! जीव स्वय ज्ञानस्वरूप है इसलिये वह स्वय जानता है: इन्द्रियाँ कहीं जीवस्वरूप नहीं हैं; शरीर और इन्द्रियाँ तो अचेतन-जड़ हैं; उनसे जीव भिन्न है। अरिहंत एवं सिद्ध भगवन्त तो इन्द्रियों के बिना ही सबको जानते हैं; स्वानुभवी धर्मात्मा भी इन्द्रियों के अवलम्बन बिना ही आत्मा को अनुभवते हैं। इस प्रकार आत्मा अतीन्द्रिय ज्ञानस्वरूप है।

-इस प्रकार आत्मा का स्वरूप भली प्रकार समझाकर अन्तमें वज्रायुधकुमारने कहा-जीवका नित्यपना-क्षणिकपना, बंध-मोक्ष, कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि सब अनेकान्त-नयों से ही सिद्ध होता है, एकान्तनयसे वह कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकता। इसलिये हे भव्य जीव ! तुम अनेकान्तमय जैनधर्मानुसार सम्यक् श्रद्धा करके आत्मा का कल्याण करो !

-इस प्रकार पण्डित वेश में आये हुए उस देवने जो भी प्रश्न पूछे, उन सबका समाधान वज्रायुधकुमारने बड़ी गंभीरता और दृढ़ता से अनेकान्तानुसार किया। भारत के भावी तीर्थंकरके श्रीमुखसे ऐसी सुन्दर धर्मचर्चा सुनकर विदेह के समस्त सभाजन अति प्रसन्न हुए। उनके अमृतभरे वचन सुनकर तथा उनके तत्त्वार्थ श्रद्धान की दृढ़ता देखकर वह मिथ्यादृष्टि देव भी जैन धर्म का स्वरूप समझकर सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुआ और उसे इतना सन्तोष एवं प्रसन्नता हुई-मानो मोक्षपद मिल गया हो।

पश्चात्, तुरन्त ही उस देवने अपना मूल स्वरूप प्रगट किया और स्वर्ग में इन्द्र द्वारा की गई उनकी प्रशंसा कह सुनाई। हे प्रभो ! मुझे क्षमा करो, मैंने आपके तत्त्वज्ञान में शंका करके आपकी परीक्षा की। आपके प्रताप से मुझे जैनधर्म की श्रद्धा हुई और मैंने सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लिया, इसलिये आपका मुझपर महान उपकार है। आपका तत्त्वज्ञान उज्ज्वल है और आप भावी तीर्थंकर हो…’ इस प्रकार भिन्न-भिन्न प्रकार की स्तुति करके महान भक्ति-सहित उसने स्वर्ग के वस्त्राभूषण भेंट देकर वज्रायुधकुमार का बहुमान किया।

अहा, जगत में वे धर्मात्मा जीव धन्य हैं कि जो सम्यक्त्वादि निर्मल रत्नों से विभूषित हैं, इन्द्र भी जिनकी प्रशंसा करते हों और देव आकर परीक्षा करें तथापि तत्त्वश्रद्धानसे जो किंचित् भी चलायमान नहि होते-ऐसे धर्मात्माओं के सम्यग्दर्शनादि गुण देखकर मुमुक्षुका हृदय उनके प्रति प्रमोद से उल्लसित होता है। भावी शान्तिनाथ ऐसे श्रीवज्रायुधकुमार का निर्मल तत्त्वज्ञान जिज्ञासु जीवों को अनुकरणीय है।

उपरोक्त घटना के कुछ समय पश्चात्, वज्रायुधकुमार के पिताश्री क्षेमंकर तीर्थंकर संसार से विरक्त हुए; वज्रायुधकुमार का राज्याभिषेक करके, बारह वैराग्य अनुप्रेक्षा के चिन्तनपूर्वक वे स्वयं दीक्षा लेकर मुनि हुए। आत्मध्यान द्वारा अल्पकाल में केवलज्ञान प्रगट करके तीर्थंकर हुए और समवसरण में दिव्यध्वनि द्वारा भव्य जीवों को धर्मोपदेश देने लगे।

इधर, वज्रायुध महाराजा रत्नपुरी का शासन चला रहे थे; उनके शस्त्रभण्डार में अचानक सुदर्शनचक्र प्रगट हुआ, और छहों खण्डपर विजय पाकर उन्होंने चक्रवर्ती पद प्राप्त किया। पिताजी धर्मचक्री तो पुत्र राज्यचक्री हुए। धर्म और पुण्य दोनों का कैसा उत्तम सुयोग ! तथापि धर्मों के लिये एक सरस है तो दूसरा नीरस !

अब, उन वज्रायुध चक्रवर्ती का पौत्र (-क्षेमंकर तीर्थंकर का प्रपौत्र) कनकशान्ति जोकि चरमशरीरी है,-वह एक बार परिवार सहित वनविहार करने गया। जिस प्रकार मिट्टी खोदते हुए रत्नभण्डार प्राप्त हो जाय, तदनुसार उसे वनमें रत्नत्रयवन्त मुनिराज के दर्शन हुए। उन मुनिराज के निकट धर्मोपदेश सुनकर वह कनककुमार वैराग्य को प्राप्त हुआ और दीक्षा ग्रहण करने की तैयारी करने लगा। तब उसके दादा वज्रायुध ने तथा सहस्रायुधने कहा : बेटा अभी तुम्हारी आयु छोटी है; अभी तुम राजभोग भोगो; फिर हम जब दीक्षा लेंगे तब तुम भी हमारे साथ दीक्षा ग्रहण कर लेना।

परन्तु वैरागी कनककुमारने कहा-हे दादाजी ! हे पिताजी ! जीवन का क्या भरोसा ?..और मनुष्य भव के यह दुर्लभ दिन विषय-भोगों में गँवा देना मुमुक्षुको शोभा नहीं देता। मुमुक्षु को यमराज का विश्वास किये बिना, बचपन से ही धर्म की साधना कर्त्तव्य है; इसलिये मैं तो आज ही दीक्षा लूंगा।-ऐसा कहकर कनकशान्ति ने वनमें जाकर जिनदीक्षा ले ली। वे कनक मुनिराज विद्याधर के अनेक उपसर्गों में भी आत्मध्यान में अडोल रहकर अल्पकाल में केवलज्ञान को प्राप्त हुए।

अपने पौत्र को केवलज्ञान होने के समाचार सुनते ही अति आनन्दित होकर वज्रायुध चक्रवर्ती ने ‘आनन्द’ नाम की गंभीर भेरी बजवाकर उत्सव किया और स्वयं धूमधाम से उन जिनराज की वन्दना-पूजा के लिये गये। वहाँ स्तुतिपूर्वक प्रार्थना की- हे जिनराज ! सांसारिक कषायों से डरकर मैं आपकी शरण में आया हूँ; मुझे धर्मोपदेश सुनाने की कृपा कीजिये। अनेक देव और विद्याधर भी केवलज्ञान के उत्सव में आये थे। प्रभु की दिव्य महिमा देखकर वह उपसर्ग करनेवाला विद्याधर भी उनकी शरण में आ गया और वैरभाव छोड़कर धर्मकी प्राप्ति की। श्रीकनक केवली ने दिव्यध्वनि में कहा-‘संसार अनादिअनन्त है, अज्ञानी जीव उसका पार नहीं पा सकते; परन्तु भव्यजीव आत्मज्ञान द्वारा अनादि संसार का भी अंत कर देते हैं। जो रत्नत्रयरूपी धर्मनौका में नहीं बैठते वे अनंतबार संसार-समुद्र मे डूबते और उतराते हैं; परन्तु जो आत्मज्ञान करके एक बार धर्म नौका में बैठ जाते हैं; वे भवसमुद्र को पार करके मोक्षपुरी में पहुँच जाते है। इसलिये मोक्षार्थीजीव को भवसमुद्रसे पार होने के लिये अवश्य धर्म का सेवन करना चाहिये। धर्म ही माता-पिता के समान हितकारी है, वही जन्म-मरण के दुःखों से उबारकर जीवो को उत्तम मोक्ष सुखों मे स्थापित करता है।’ (अहा, पौत्र तो केवली बनकर उपदेश दे रहा है और दादा-जोकि स्वयं भावी तीर्थंकर हैं वे भक्तिपूर्वक उपदेश सुनते हैं) इस प्रकार केवली भगवान का उपदेश सुनकर धर्मात्मा वज्रायुधचक्रवर्ती का चित्त संसार के विषय-भोगों से विरक्त हो गया। अरे, देखो तो सही, जिनके पिता तीर्थंकर, जो स्वयं भावी तीर्थंकर, वे इस समय अपने पौत्र के उपदेश से वैराग्य प्राप्त करते हैं। वैराग्य पाकर वे वज्रायुध महाराजा विचार करने लगे कि-अरे, इस संसार में विषय-भोगों की प्रीति प्रबल है; आत्म ज्ञानी को भी उसका अनुराग छोड़कर मुनिदशा धारण करना दुर्लभ है। आश्चर्य है की जो कनक शान्ति मेरा पौत्र था उसने तो अपने आत्मबल से बचपन में ही केवलज्ञान सम्पदा प्राप्त कर ली और परमात्मा बन गये। धन्य है उन्हें !

वैरागी वज्रायुध महाराजा ने राजभवन मे आकर रत्नपुरी कें राज्य का भार अपने पुत्र सहस्रायुध को सौंप दिया और अपने पिताश्री क्षेमंकर तीर्थंकर के समवसरण में जाकर जिनदीक्षा धारण की। वैराग्य पौत्र के उपदेश से प्राप्त किया था, और दीक्षा पिता के निकट ली। छह खण्ड का चक्रवर्ती वैभव छोड़कर दीक्षा पश्चात् श्री वज्रायुध मुनिराज सिद्धाचल पर्वत पर एक वर्ष का प्रतिमायोग धारण कर अचल मुद्रा में स्थित हुए। बाहुबलि भगवान की भाँति उन्होंने भी एक वर्ष तक अडोलरूप से ऐसा ध्यान तप किया कि लताएँ कण्ठ तक लिपट गईं; सिह, सर्प, हिरन, खरगोश आदि प्राणी उनके चरणों में आकर शान्तिपूर्वक रहने लगे। उनकी शांत ध्यान मुद्रा से प्रभावित होकर हिंस्र पशु भी शांत हो जाते थे। पूर्व के बैरी असुर देव ने उन्हें ध्यान से डिगाने के लिये घोर उपसर्ग किया, तथापि वज्र मुनिराज तो ध्यान मे वज्रसमान स्थिर रहे; उनका चित्त चलायमान नहीं हुआ। अंत में भक्त-देवियों ने आकर असुर देवों को भगा दिया; देवों ने स्तुति कर के उनसे क्षमायाचना की। मुनिराज वज्रायुध अनेक वर्षों तक रत्नत्रय की आराधना सहित विदेहक्षेत्र में विचरे।

इधर, वज्रायुध महाराज के पुत्र सहस्रायुधने कुछ काल तक रत्नपुरी का राज्य किया, फिर उनका चित्त भी संसार से विरक्त हुआ; वे विचारने लगे कि-मेरे दादाजी तो तीर्थंकर हैं, पिताजी भी चक्रवर्ती की सम्पदा छोड़कर, मुनि बनकर मोक्षकी साधना कर रहे हैं, मेरा पुत्र भी दीक्षा लेकर केवलज्ञानी हो गया, और मैं अभी तक विषय-भोगों में पड़ा हूँ! अरे, यह दुःखदायक एवं पापजनक विषय-भोग मुझे शोभा नहीं देते ! इनमें कहीं शान्ति नहीं है; मैं तो मोक्ष की साधना हेतु आज ही मुनिदीक्षा लूँगा।-ऐसे निश्चयपूर्वक जिनदीक्षा लेकर वे भी वज्रायुध मुनिराज के साथ विचरने लगे। पिता-पुत्र (भावी तीर्थंकर-गणधर) दोनों मुनिराजों ने अनेक वर्षों तक साथ-साथ विहार किया। अन्त में विदेहक्षेत्र के वैभार पर्वत पर उन दोनों मुनिवरों ने रत्नत्रय की अखण्ड आराधनापूर्वक समाधिमरण किया और ऊर्ध्व ग्रैवेयक में अहमिन्द्र हुए।

इस प्रकार क्षेमंकर तीर्थंकर और उनके पुत्र वज्रायुध चक्रवर्ती, उनके पुत्र सहस्रायुध और उनके पुत्र कनक शान्ति,-इन चार पीढ़ियों में से दो पीढ़ी के जीवों ने तो मोक्ष प्राप्त किया, और बीच की दो पीढ़ी के जीव अहमिन्द्र हुए; वे तीन भव के पश्चात् मोक्ष प्राप्त करेंगे।

[इस प्रकार भगवान शान्तिनाथ के पंचम पूर्वभव-वज्रायुध चक्रवर्ती की कथा पूर्ण हुई।]

भगवान शान्तिनाथ : पूर्वभव चौथा : ग्रैवेयक में अहमिन्द्र

अपने चरित्रनायक तीर्थंकर शान्तिनाथ और उनके गणधर चक्रायुध;-यह दोनों चौथे पूर्वभव में ग्रैवेयक में अहमिन्द्र देव हुए हैं। ग्रैवेयक के देवों के देवियाँ नहीं होतीं, तथापि पहले १६ वें स्वर्ग में इन्द्र पद के समय इन्द्रानियों के बीच या चक्रवर्ती पद के समय ९६००० सुन्दर रानियों के संग में उन्हें जो पुण्यजन्य सुख था, उसकी अपेक्षा अत्याधिक सुख यहाँ इन्द्रानियों के बिना ही उन्हें था। वही सिद्ध करता है कि सुख विषयों के भोगोपभोग में नहीं होता। हाँ, इतना अवश्य है कि पूर्वकाल में मुनिदशा में उनको जो महान वीतरागी सुख था उतना सुख इस अहमिन्द्र पद में नहीं था, क्योंकि सच्चा सुख तो वीतरागता ही है। राग के फल में सच्चा सुख कैसे होगा ?- नहीं हो सकता। यह बात वे अहमिन्द्र भलीभाँति जानते थे। और-

'तेथी न करवो राग जरीये क्यांय पण मोक्षेच्छुओ,
वीतराग थईने ए रीते ते भव्य भवसागर तरे।

-ऐसी मुमुक्षु भावना सहित स्वर्गलोक की असंख्य वर्ष की आयु पूर्ण करके वे दोनों महात्मा मनुष्य लोक में अवतरित होने को तैयार हुए।

[भगवान शान्तिनाथ के चौथे पूर्वभव का वर्णन पूरा हुआ।]

भगवान शान्तिनाथ : पूर्वभव तीसरा

विदेह में धनरथ तीर्थंकर के पुत्र : मेघरथ और दृढ़रथ

इस जम्बूद्वीप के विदेह क्षेत्र में पुष्कलावती देश और उसमें पुण्डरीकिणी नगरी है। वह विद्यमान सीमंधर भगवान आदि कितने ही तीर्थंकरों की जन्मनगरी है। वहाँ मोक्ष जाने के द्वार सदा खुले हुए हैं; इसलिये स्वर्ग के देवों को भी वहीं अवतरित होने की इच्छा होती है। महाराजा धनरथ उस नगरी के राजा थे। नगरी अति सुन्दर थी और उसके राजा उससे भी अधिक सौन्दर्यवान थे, क्योंकि वे एक तीर्थंकरथे। अहमिन्द्र हुए अपने दोनों चरित्रनायक वहाँ से चलकर धनरथ तीर्थंकर के पुत्र हुए-भगवान शान्तिनाथ का जीव मेघरथकुमार और गणधर चक्रायुध का जीव दृढ़रथकुमार हुआ। वे मेघरथ और दृढ़रथ दोनों भाई आत्मज्ञानी, शांत परिणामी, विद्वान तथा मनोहर रुपवान थे। भवोंभव के तथा मोक्ष तक के साथी होने से दोनों को एक-दूसरे के प्रति परमसनेह था। दोनों साथ खेलते, साथ खाते; परस्पर धर्मचर्चा करते और भगवान के समवसरण में या राजदरबार में भी साथ ही जाते। उनकी चेष्टाएँ सबको आनन्द प्राप्त कराती थीं।

दो कुक्कुटोंके उद्धार का प्रसंग

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भगवान शान्तिनाथ (भाग ३)

एक बार महाराजा घनरथ तीर्थंकर राजसभा में सपरिवार बैठे थे; युवराज मेघरथ कुमार भी दरबार में उपस्थित थे और धर्म की महिमा के सम्बन्ध में अद्भुत चर्चा चल रही थी।अहा, जिस सभा में वर्तमान एवं भावी तीर्थंकर एकसाथ विराज रहे हों उस राजसभा में राज्यचर्चा के बदले धर्मचर्चा चले उसमें आश्चर्य ही क्या ? परन्तु अचानक ही उस चर्चा में भंग पड़ा और एक अन्य घटना हो गई। महाराजा घनरथ की दृष्टी दो लड़ते हुए कुक्कुटों पर पड़ी, दोनों बड़े क्रोधपूर्वक एक दूसरे से लड़ रहे थे। वह युध्द दोनों कुक्कुटों को दुःखका कारण था और उसमे रुचि लेनेवालों को भी अशुभ ध्यान का कारण था। दयालु महाराजाने तुरन्त उन दोनों का युद्ध रोकने की भावना से मेघरथ को सम्बोध कर पूछा- हे मेघरथ ! इन दोनों कुक्कुटों को एक- दूसरे के प्रति इतना वैरभाव क्यों है ?

तब अवधिज्ञानी मेघरथ कुमार ने उन दोनों कुक्कुटों का पूर्वभव जानकर कहा- सुनिये ! यह एक वैराग्य की बात है। इन दोनों का वैरभाव पूर्वभव से चला आ रहा है। यह दोनों कुक्कुट पूर्वभव में सगे भाई थे, परन्तु एक बैल के स्वामित्व को लेकर दोनों में लड़ाई हुई और दोनों ने एक-दूसरे को मार डाला। फिर दोनों जंगली हाथी हुए, वहाँ भी लड़कर मरे; फिर दोनों भैंसा हुए, वहाँ भी परस्पर लड़ मरे; पश्चात दोनों मेंढा हुए और इसी प्रकार मरे। अब वे दोनों भाई इस भव मे कुक्कुट होकर लड़ रहे हैं। अरे, एकबार के दो सगे भाई क्रोधवश संसार में भटकते हुए कितनी बार परस्पर लड़ मरे ! कषाय के संस्कार जीव को कितना दुःख देते हैं ! कषाय से छूटे तभी जीव को शान्ति मिलेगी।

मेघरथ की वाणी इतनी शांत एव मधुर थी कि क्षणभर वे दोनों कुक्कुट भी युध्द करना भूलकर उसे सुनने मे लीन हुआ। कुक्कुटों के पूर्वभव की कथा सुनकर सभाजन आश्चर्य से वैराग्य को प्राप्त हुए और मेघरथ के दिव्यज्ञान की प्रशंसा करने लगे। दोनों कुक्कुट भी अपने पूर्वभवों की बात सुनकर एकदम शांत हो गये; लड़ाई रोककर दोनों विचार में पड़ गये कि- ‘अरे यह तो मेरा भाई !’ उस समय उन दोनों को अपने पूर्वभव का जातिस्मरण ज्ञान हुआ, उनकी आँखो से अश्रुधारा बहने लगी; वैरभाव दूर हो गया और घनरथ तथा मेघरथ की ओर भक्ति भावसे देखने लगे। मेघरथने वैराग्यमय सम्बोधन किया हे भद्र ! अब तुम हिंसकभाव छोड़ो अहिंसामय जिनधर्म की शरण लो, ताकि ऐसे दुःखमय जन्मों से तुम्हारा छुटकारा हो।दोनों ने हिंसकभाव छोड़कर जैनधर्म का स्वीकार किया और अहिंसकभाव पूर्वक शरीर का त्याग किया।

वे दोनों कुक्कुट मरकर व्यंतर देव हुए। देव होकर उन्होंने अपने उपकारी मेघरथ कुमार की कैसी भक्ति की वह अब आगे पढ़ेंगे; उससे पूर्व एक अन्य आश्चर्यजनक घटना राजसभामें हुई-वह पढ़िये।

उन दो कुक्कुटों की कथा सुनाने के पश्चात् मेघरथने दिव्य ज्ञान से जानकर सभाजनों से कहा कि-इस समय इस राजसभा मे दो विद्याधर भी आये हुए है और गुप्तरुपसे कुक्कुटों के भव की बात सुन रहे हैं।

सभाजनोंने आश्चर्य से पूछा-अरे, कौन हैं वे दो विद्याधर ?.. और यहाँ किस लिये आये हैं ? मेघरथ ने कहा-सुनो, यह आनन्द की बात है। यहाँ आये हुए दोनों विद्याधर चरमशरीरी हैं और महाराजा धनरथ के साथ उनका पूर्वभव का सम्बन्ध है। [मेघरथ कुमार अपने पिता तीर्थंकर के पूर्व भव की बात करते हैं और धनरथ तीर्थंकर स्वयं अपने पुत्र के मुँह से अपने पूर्वभव की सुन रहे हैं। एक वर्तमान तीर्थंकर के पूर्वभव की बात भावी तीर्थंकर कह रहे हैं] पूर्वभव में यह बात पिताश्री-धनरथ महाराजा ऐरावत क्षेत्र में ‘अभय घोष’ राजा थे, तब यह दोनों विद्याधर उनके पुत्र थे। एकबार वे तीनों जीव संसार से विरक्त होकर मुनि हो गये और अभयघोष मुनिराजने तीर्थंकर नामकर्म बाँधा। वहाँ से समाधि मरण करके तीनों जीव १६ स्वर्ग में उत्पन्न हुए। वहाँ से चयकर पिता अभयघोष तो धनरथ तीर्थंकर हुए हैं और दोनों पुत्र विद्याधर हुए है। वे दोनों विद्याधर मेरुपर्वतपर जिनालयोंके दर्शन हेतु गये थे; वहाँ अवधिज्ञानी मुनिराज के पास अपने पूर्वभवकी बात सुनी और जाना की हमारे पूर्वभव के पिता धनरथ तीर्थंकर रुप से अवतरित हुए हैं और इस समय पुण्डरगिरी नगरी के राजसभा में विराज रहे हैं; इसलिये वे दोनों विद्याधर अतिस्नेह वश अपने पूर्वभव के पिता (और वर्तमान तीर्थंकर देव) के दर्शन करने यहाँ आये हैं मेघरथ की बात पूर्ण होते ही दोनों विद्याधर प्रसन्नता से प्रगट हो गये और अत्यन्त आदर सहित अपने पूर्वभव के पिताश्री धनरथ तीर्थंकर के दर्शन किये। ‘अहा, हमारे पिता तीर्थंकर !’ ऐसा जानकर उनका हृदय आनन्दित हुआ। पुनः पुनः धनरथ तथा मेघरथ दोनों 'द्रव्य तीर्थंकरों’की स्तुति की, सन्मान किया और प्रसन्नता से कहने लगे-अहो, अपने पूर्वभव के पिताश्री को तीर्थंकर रुपमें देखकर हमें महान हर्ष हो रहा है। हे देव ! आप त्रिलोकपूज्य हो, मोक्षमार्ग के प्रदर्शक हो ! प्रभो ! हम भी आपके परिवार के हैं; जिस प्रकार इस भवमें मेघरथ और दृढ़रथ आपके पुत्र हैं उसी प्रकार हम भी आपके पूर्वभव के पुत्र ही हैं। आप विदेह के तीर्थंकर हैं और भाई मेघरथ भरत क्षेत्र का भावी तीर्थंकर हैं। आप दोनों को देखकर हमे अपार आनन्द हो रहा है।-इसप्रकार वे विद्याधर अति आनन्दित हुऐ और उन्हें अपने पूर्वभवों का जातिस्मरण ज्ञान हुआ; इसलिये संसार से विरक्त होकर उन्होंने जिनदीक्षा ग्रहण की. . और केवलज्ञान प्रगट करके मोक्षपद को प्राप्त हुए।

[ढाई द्वीपकी यात्रा]

अब, ज्यों ही वे विद्याधर विदा हुए की तुरन्त ही अचानक दो देव दिव्य विमान लेकर वहाँ आये, और मेघरथकुमार को दिव्यवस्त्राभूषणों की भेट देकर कहने लगे हे देव ! पूर्वभव में हम दोनों कुक्कुट थे और अब देव हुए हैं। हम तो निर्दय, हिंसक, मांसभक्षी प्राणी थे; जैन धर्म के उपदेश द्वारा आपने हमारा उध्दार किया है। आप हमारे महान उपकारी हैं और भावी तीर्थंकर हैं। हमारे पूर्वभव बतलाकर आपने हमारा बैरभाव मिटाया और जैनधर्म की प्राप्ति करायी; जिससे हम देव हुए, और आपके उपकार का स्मरण करके हम आपकी सेवा करने आये हैं। आप हमारे देवविमान में विराजो, हम आपको ढाई द्वीप की यात्रा करावेंगे। हमारे विमान में बैठकर आप मनुष्यक्षेत्र के पाँच मेरु तथा अन्य रमणीय तीर्थोंके दर्शन करो। मनुष्य जहाँ तक जा सकते हैं उस मानुषोत्तर पर्वत तक के समस्त क्षेत्र हम आपको बतलावेंगे।

मेघरथ कुमारने देवों की बात स्वीकार कर ली, और देवोंने उन्हें सपरिवार उस सुशोभित देव विमानमे बिठाया। विमान को आकाश मे उड़ाते हुए वे देव एक के बाद एक क्षेत्र बताने लगे-( यद्यपि अवधिज्ञान द्वारा उन क्षेत्रों को जान लेने की शक्ति उनमें थी, तथापि परिवार सहित विमान में विहार करते हुए वे वह सब देख रहे थे।) देवने कहा-हे स्वामी ! देखिये, यह जम्बूद्वीप के बीच में अपना विदेहक्षेत्र है और इसके मध्य भाग मे यह सुन्दर सुदर्शनमेरुपर्वत है। जम्बूद्वीप के भरत, ऐरावत एवं विदेह क्षेत्रके सर्व तीर्थंकरों का जन्माभिषेक इस मेरुपर्वत पर होता है। आपके पिताश्री महाराजा घनरथ तीर्थंकर का जन्माभिषेक भी यही हुआ था, और आप स्वयं अब तीसरे भवमें भरत क्षेत्रमें शान्तिनाथ तीर्थंकर के रुप मे जब अवतरित होंगे, तब आपका भी जन्माभिषेक इसी मेरुपर्वत पर होगा। इस मेरु की उत्तर दिशा मे रम्यक्, हैरण्यवत तथा ऐरावत यह तीन क्षेत्र हैं, और दक्षिण में हरिवर्ष, हेमवत एवं भरत यह तीन क्षेत्र हैं। जम्बूद्वीप के यह सात क्षेत्र-विभाग करनेवाले छह महापर्वत है-हिमवान, महाहिमवान, निषध, नील, रुक्मि और शिखरी। उनके बीच महा सुदर्शन मेरु है; उसपर शाश्वत जिनमन्दिर है।

सबने विमान से उतरकर जिनबिम्बों के दर्शन किये। अद्भुत शांत-वीतरागी जिनबिम्बों के दर्शन से सबको अति प्रसन्नता हुई; मेघरथकुमारने तो क्षणभर आत्मध्यान करके शांतरसका पान कर लिया।

फिर विमान मे बैठकर आगे बढे। देवों ने पुनः भरत क्षेत्रपर चक्कर लगाकर बतलाया कि-हे स्वामी ! देखिये, यह अयोध्यापुरी दिख रही है ..यहाँ ऋषभदेव आदि अनन्त तीर्थंकरों ने जन्म लिया है, उसके बाजू मे वह हस्तिनापुरी है। भगवान ऋषभदेव मुनिराज को इसी नगरी मे राजा श्रेयांस ने सर्व प्रथम इक्षुरसका पारणा (एक वर्ष तक तप करने के पश्चात् प्रथम पारणा) कराया था, और आप (मेघरथ कुमार) भी तीसरे भव मे इसी नगरी मे तीर्थंकर रुपसे अवतरित होंगे। और उधर जो ऊँचा रमणीय पर्वत दिखायी देता है वह शाश्वत तीर्थ सम्मेद शिखर है, वहाँ से अनन्त जीवों ने मोक्ष प्राप्त किया है; आप भी वही से मुक्ति प्राप्त करेंगे।

इस प्रकार भरतक्षेत्र दिखाकर उनका विमान लवणसमुद्र पार करके दूसरे धातकी खण्ड द्वीप में पहुँचा। वहाँ विराजमान स्वयंप्रभ आदि आठ तीर्थंकर भगवन्तों के दर्शन करके फिर तीसरे पुष्कर द्वीप में आये; वहाँ भी तीर्थंकर भगवन्तों के समवसरणादिके दर्शन किये। पाँचों मेरु के तथा बारम्बार तीर्थंकर भगवन्तो के दर्शनों से सबको अति आनन्द होता था। अन्त मे पुष्कर द्वीप के मध्य स्थित मानुषोत्तर पर्वत पर चार दिशाओं मे चार शाश्वत जिनालयों के दर्शन किये। फिर विमान को विदेह क्षेत्र की और मोड़ते हुए उन देवो ने कहा कि-हे स्वामी ! यहाँ मनुष्यों के गमन की सीमा समाप्त होती है। हमने आपको भक्तिपूर्वक ढाई द्वीप के तीर्थों की तथा तीर्थंकरो की यात्रा करायी- यह हमारा सद्भाग्य है। अब यहीं से आगे मनुष्यों का गमन नही है।

मेघरथ और दृढरथकुमार ढाई द्वीपकी यात्रा से प्रसन्न हुए और पुनः पुण्डरीकिणी नगरी मे आये। दोनों देव उन्हे वन्दन करके स्वर्ग लोक चले गये। अहो, सज्जन पुरुष अपने ऊपर किये गये उपकार को नही भूलते. .और उसमें भी अन्य उपकारों की अपेक्षा धर्म का उपकार तो सर्व श्रेष्ठ है।

[भगवान शान्तिनाथ . पूर्वभव में ढाई द्वीप की यात्रा समाप्त हुई]

घनरथ और मेघरथ- एक वर्तमान तीर्थंकर, दूसरे भावी तीर्थंकर ऐसे पिता-पुत्र ने अनेक वर्षों तक साथ रहकर पुण्डरीकिणी नगरी को सुशोभित किया। उत्तम धर्मशासन द्वारा प्रजाजनों को सुखी किया। एक बार मोक्षकी काललब्धि से प्रेरित हुए महाराजा घनरथ तीर्थंकर को स्वयंबुद्धरूप से संसार से वैराग्य जागृत हुआ, उन्होने मेघरथ को राज्य सौंपा और स्वयं वनमें जाकर जिनदीक्षा धारण की। देवोंने उनका दीक्षाकल्याणक महोत्सव किया। धनरथ मुनिराज शुक्लध्यान द्वारा केवलज्ञान प्रगट करके तीर्थंकर हुए और दिव्यध्वनि द्वारा अनेक जीवोंको मोक्षमार्ग बतलाते हुए विदेह क्षेत्र में विचरने लगे।

इधर महाराजा मेघरथ महान पुण्योदय से पुण्डरीकिणी नगरी के राज्य का संचालन कर रहे थे। वे शुद्ध सम्यकदर्शन के धारी एवं अवधिज्ञानी थे; व्रत एवं शील गुणों से शोभित थे; पंचपरमेष्ठी के प्रति विनयवान एवं जिनवाणी के भक्त थे; दानधर्म के ज्ञाता होने से सुपात्र जीवों को आदर पूर्वक दान देते थे।

भावी तीर्थंकर वे मेघरथ महाराजा एकबार आष्टाह्निका पर्वमें जिनपूजा करके उपवास पूर्वक सभामें बैठे थे और जैनधर्म के उपदेश द्वारा अहिंसा धर्म का स्वरूप समझा रहे थे। इतने में एक आश्चर्यजनक घटना हुई-अचानक वहाँ एक कबूतर आया; वह भय से काँप रहा था। उसके पिछे एक भयंकर गिद्ध पडा था। भयभीत कबूतर ने गिद्ध से बचने के लिये महाराजा मेघरथ की शरण ली।

तुरन्त ही वह गिद्धपक्षी (मनुष्य की भाषा में) बोला- हे महाराजा ! आप दयालु है, दानेश्वरी है, मै बहुत भूखा हूँ और मांस ही मेरा भोजन है; इसलिये यह कबूतर मुझे दे दिजिये। नहीं तो मैं भूख से मर जाऊँगा। आपको कबूतर की रक्षा करना हो तो उसके जितने वजन का मांस मुझे अपने शरीर में से काट दीजिये।

गिद्धपक्षी को मनुष्य की भाषा बोलते देखकर सभाजनों को आश्चर्य हुआ। छोटे भाई दृढरथने मेघरथ से पूछा हे पूज्य बंधु ! यह गिद्धपक्षी मनुष्य की भाषा क्यो बोलता है ? इसमे क्या रहस्य है ?..तब मेघरथ ने अवधिज्ञान से सब जान लिया और कहा- सुनो, मै वह रहस्य बतलाता हूँ।

कबूतर और गिद्ध की घटना; देव द्वारा परीक्षा, दानका स्वरूप

यह कबूतर और गिद्ध दोनों जीव पूर्वभव में वणिक पुत्र थे और सगे भाई थे। वे अत्यन्त लोभी थे, इसलिये धन के लिये लडे और एक-दूसरे को मारकर यह कबूतर तथा गिद्ध हुए है। कषायवश जीव को कैसे दुखः सहना पडते है। वह जानकर हे भद्र जीवों ! तुम कषाय छोडो, वैरभाव छोडो ! [भावी तीर्थंकर के दर्शन तथा उनके मुँह से अपने पूर्वभव की बात सुनकर उन दोनों पक्षियों का चित्त शांत हुआ। वैरभाव छोडकर वे मेघरथ की बात सुनने लगे]

[राजा मेघरथ कहते हैं-] आज इन्द्रसभा मे इन्द्रमहाराज ने मेरी प्रशंसा की कि- ‘राजा मेघरथ भावी तीर्थंकर है, आत्मज्ञानी है, जैनसिद्धांत मे कुशल है, दानधर्म का स्वरूप जाननेवाले विवेकी है, महान दाता है।’-यह मेरी प्रशंसा सहन नही होने से एक देव द्वेषवश मेरी परीक्षा करने यहाँ आया है गिद्ध के शरीर में प्रवेश करके मनुष्य की भाषा में यह कबूतर माँग रहा है।

-ऐसा कहकर मेघरथने उस देव के पूर्वभव भी बतलाये और फिर कहा- गिद्ध के शरीर में स्थित हे देव ! सुन तेरी यह माँग अनुचित है। कबूतर वह कोई भक्ष्य नही है और न दान देने की वस्तु है। मांसादि अभक्ष्य वस्तुओ का दान देना धर्म में निषिद्ध है। मांस भले अपने शरीर का हो तब भी वह दान देने योग्य वस्तु नहीं है; तथा गिद्ध आदि मांसभक्षी जीव दान में देने के लिये पात्र भी नही है। [हाँ, पूर्वकाल में कबूतर के बदले अपने शरीरका मांस दान मे देनेवाले एक अज्ञानी राजा की कथा लोगों में प्रसिद्ध है, परन्तु वह बात धर्मसिद्धान्त में मान्य नही है; तथा वह राजा और वह दान प्रशंसनीय नही है। अरे क्या मांस का दान दिया जाता है ? नही वह तो पाप है, हिंसा है, अविवेक है, लेने तथा देनेवाले दोनों के लिये दुर्गति का कारण है। 'तो दान का सच्चा स्वरूप क्या है ? -ऐसा पूछे जाने पर महाराज मेघरथ कहते हैं- हे गिद्ध, हे देव ! हे सभाजनो ! तुम दान का सच्चा स्वरूप सुनो !-❀ दान ऐसी वस्तु का देना चाहिये जो निर्दोष हो; स्व-पर (देने लेने वाले) दोनों को हितकारी हो, और ज्ञान तथा संयम का साधन हो। ❀ मांसादि अभक्ष्य वस्तुओं का दान नही दिया जाता। आहार दान और औषधिदान भी मधु-मासं अण्डा- शराब- मछली का तेल आदि के सम्बन्ध से रहित होना चाहिये। ऐसी अभक्ष्य वस्तुओं का स्वयं भी भक्षण नहीं किया जाता और दूसरे को दान में नही दी जाती। ❀ दान सदा बदलेकी भावना या आशा के बिना देना चाहिये। ❀ दान ऐसे सुपात्र जीवों को आदर पूर्वक देना चाहिये जो कि धर्म के साधक हों। रत्नत्रयवन्त मुनि-श्रावक- धर्मात्मा- साधर्मी आदि सुपात्र जीवों को आदरपूर्वक दान देना वह श्रेष्ठ दान है और ऐसा सुपात्रदान वह गृहस्थ- श्रावकों का मुख्य कार्य है। ❀ योग्य वस्तु का दान ऐसी विधि से देना चाहिये जोकि स्व- पर को हितका कारण हो, और जिससे मोक्षमार्ग का लाभ हो।

यदि गिद्ध को कबूतर का दान किया जाय तो बेचारे कबूतर को कितना दुःख होगा ? तथा गिद्ध को भी उसका मांस भक्षण करने से कितना महान पाप लगेगा। दोनोंका अहित ही होगा। पुनश्च, मांस का दान देनेवाले के हृदय में से दयाधर्म का नाश हो जायगा और हिंसा का महान पाप लगेगा। इसलिये यह कबूतर या मांसादि अशुद्ध वस्तुएं दान देने योग्य नही है; मांसकी इच्छा करनेवाला जीव भी दान के लिये योग्य पात्र नही है, और ऐसा दान करनेवाला जीवदाता नहीं है। शुद्ध भावना से, शुद्ध वस्तु, धार्मिक सुपात्र जीवको, निर्दोष विधि से देना ही सच्चा दान है उसका फल महान है।

इस प्रकार महाराजा मेघरथने युक्तिपूर्वक दान का स्वरूप समझाया।

तब गिद्ध के शरीर में स्थित (परीक्षा हेतु आया हुआ) वह देव, उनके वीतरागी उपदेश से अतिप्रभावित हुआ। उसने प्रगट होकर मेघरथ राजाकी स्तुति भी की कि- हे देव ! आप दान धर्म के यथार्थ ज्ञाता हैं। भगवान ऋषभदेवके समय में भरत क्षेत्र की जिस भूमि मे (हस्तिनापुरी में) दानतीर्थ का प्रवर्तन हुआ है, उसी भूमि मे आप तीसरे भव के तीर्थंकर होनेवाले हैं। इन्द्रमहाराजने आपके गुणों की जो प्रशंसा की, उन गुणों को प्रत्यक्ष देखकर मैं धन्य हुआ। इस प्रकार स्तुति करके वह देव अपने स्थान पर चला गया।

गिद्ध और कबूतर के जीव भी मेघरथ राजा का उपदेश सुनकर अत्यन्त प्रभावित हुए और धर्म के संस्कार सहित शरीर त्यागकर व्यन्तर देव हुए उन दोनों देवों ने आकर मेघरथ स्वामी का उपकार माना कि-हे देव ! आपने हमें जैनधर्मका और दान का स्वरूप समझाकर महान उपकार किया है; आपकी कृपासे ही हम तुच्छ पशुपर्यायसे छूटकर देव हुए है।

इस प्रकार भावी तीर्थंकर ऐसे वे महात्मा, दो भव से अनेक देवों द्वारा पूजे जा रहे है; दोनो भवमें तीर्थंकर के पुत्र हुए और इन्द्रने उनकी प्रशंसा की; देवोने आकर परीक्षा की; परन्तु वे महात्मा तो निन्दा-प्रशंसा से परे ऐसी धर्मसाधना में अग्रसर होते ही रहे। दो बार तीर्थंकर के पुत्र हुए, चक्रवर्ती भी हुए; तथापि अपने चैतन्यवैभव की महत्ता से वे कभी च्युत नही हुए; चैतन्यरसके अतिरिक्त अन्यत्र कहीं संतुष्ट नहीं हुए। इसप्रकार सर्वत्र निर्ममत्वरूप से आत्माको मोक्षमार्ग पर चलाते- चलाते अपने चरित्रनायक अब तो भवसमुद्रके किनारे आ पहुँचे हैं। अहा उनतीर्थंकर का पूर्व जीवन भी अद्भुत आश्चर्यकारी एवं धन्य है… साक्षात् तीर्थंकर जीवन का तो कहना ही क्या ?

महाराजा मेघरथ महान राज्य के बीच रहकर भी उत्तम श्रावकधर्म का पालन करते थे। सामायिकादि व्रतों के पालन पूर्वक वे अपनी आत्मशुद्धि में वृद्धि करते थे। उनका चित्त संयम भावना में रमण करता था। संयम धारी मुनिवरों को देखकर वे अतिप्रसन्न होते थे। एक बार आकाशमार्गसे चारणऋद्धिधारी मुनिवर पधारने पर उन्होंने महान भक्ति पूर्वक शुद्ध आहारदान दिया…और आकाश में देवोंने बाजे बजाये तथा रत्नवृष्टि हुई। अहा, जिन मुनिवरों को आहार दान देने की इतनी महिमा है, उस मुनिदशा की महिमा का तो क्या कहना !-वे महाराजा रत्नवैभव में नही ललचाये, परन्तु मुनिदशा के रत्नत्रय प्राप्त करने को उनका मन लालायित था कि-अहो, मै कब ऐसी मुनिदशा प्राप्त करूँगा !

इन्द्रसभा में प्रशंसा और देवियों द्वारा परीक्षा

आत्मसाधनामें तत्पर तथा संयम की भावना में तल्लीन रहने वाले महाराजा मेघरथ ने एकबार पर्वतिथि में प्रोषध उपवास किया था; दिनभर आत्मसाधना में रहकर रात्रि के समय एकान्त उद्यान में जाकर वे धर्मात्मा ध्यान में स्थित हुए। वे धीर-वीर महात्मा प्रतिज्ञापूर्वक प्रतिमायोग धारण करके एकाग्रचित्त मेरुसमान अचल होकर आत्मध्यान कर रहे थे; कभी- कभी निर्विकल्प शुद्धोपयोगी होकर मुनिसमान शोभा देते थे। इतने में एक विशेष घटना हुई…क्या हुआ ?

ईशानस्वर्ग की इन्द्रसभा में इन्द्रने आश्चर्यपूर्वक उनकी प्रशंसा की कि-“अहो, उन महात्मा को धन्य है ! वे सम्यक्त्वादि गुणों के सागर हैं, ज्ञानवान एवं विद्वान हैं, अत्यन्त धैर्यवान है; शीलवान है; इस समय वे मेरु समान अचल दशामें आत्मध्यान कर रहे हैं। आत्मचिन्तन में उनकी तत्परता देखकर आश्चर्य होता है। अहो ! उन्हे नमस्कार हो !”

इन्द्र द्वारा प्रशंसा सुनकर देवों को आश्चर्य हुआ और पूछा- हे नाथ ! इस समय आप किस सज्जन की स्तुति कर रहें है ? मनुष्य लोक में कौन ऐसे महात्मा है- जिनकी प्रशंसा इस देवसभा में हो सकती है ?

तब इन्द्रने कहा-हे देवो, सुनो !-मनुष्य लोक के विदेहक्षेत्र में इस समय राजा मेघरथ ध्यान मग्न हैं, उन्हींकी प्रशंसा मैं कर रहा हूँ ! एक भव के पश्चात वे भरतक्षेत्र में शान्तिनाथ तीर्थंकर होनेवाले हैं, उन्होने शरीर का भी ममत्व छोडकर इससमय प्रतिमायोग धारण किया है और आश्चर्यकारी आत्मध्यान में स्थित हैं… उनका शीलगुण भी अद्भुत है।

इन्द्रसभामें प्रशंसा और देवियों द्वारा परीक्षा तथा स्तुति

इन्द्रकी बात सुनकर दूसरे सब देव तो प्रसन्न हुए; परन्तु दो देवियाँ उनकी परीक्षा करने के लिये पृथ्वी पर आयी और उन्हें ध्यान से डिगाने के लिये भिन्न-भिन्न प्रकार के हावभाव दिखलाकर उपद्रव करने लगीं। परन्तु महाराजा मेघरथ तो काया और माया दोनों से परे ऐसे समता भाव में ही लीन थे; अत्यन्त धीर-वीर एवं सागर समान गंभीर वे अपने परमात्म-तत्त्वके आनन्द में लीन थे। उनके परिणाम अत्यन्त शान्त थे; आत्मा के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं उनका चित्त नहीं लगा था। अहा, मानो उपसर्ग के कारण बर्फोंसे ढँके हुए कोई निर्ग्रन्थ मुनिराज खडे हो ! -ऐसे लग रहे थे।

स्वर्ग से आयी हुई देवियोंने अनेक प्रकारके उपसर्ग प्रारम्भ किये-कायर मनुष्य का तो कलेजा काँप उठे ऐसे भयकर दृश्य उपस्थित किये, तथा मनोहर हावभाव गीत-विलास-आलिंगनादि रागवर्द्धक कामचेष्टाएँ कर-करके उन्हे ध्यान से च्युत करने के लिये अनेक उपद्रव किये; परन्तु मेघरथ तो मेरु समान अचल ही रहे। अरे ! मोक्ष के आनन्द मे जिनका मन लगा है वे कहीं विषयोंमे ललचायेंगे ? बाह्य में क्या- क्या चेष्टाएँ हो रही है- उनके प्रति उनका लक्ष ही कहाँ है ? अन्तमे, देवियाँ थक गई और खीझकर तिरस्कार भरे वचन बोली, शरीर की अनेक बीभत्स चेष्टाएँ की, परन्तु वे ध्यानी वीर आत्मध्यानसे नही डिगे सो नही डिगे। दुष्ट देवियाँ उनके वैराग्य रुपी कवच को नही भेद सकी। जो उपयोग को निजपरमात्मा मे एकाकार करके जो बैठे है उन्हे बाह्य उपद्रव क्या कर सकेंगे ? परमात्मतत्त्वमें उनका प्रवेश ही कहाँ है ? जिस प्रकार बिजली की तीव्र गडगडाहट भी मेरुपर्वत को हिला नहीं सकती उसी प्रकार देवियोंकी रागचेष्टा उन महात्मा के मन-मेरु को किंचित भी डिगा नहीं सकी। अन्तमें देवियाँ हार गई; उन्हे विश्वास होगया कि इन्द्रराजने जो प्रशंसा की थी वह यथार्थ है। इस प्रकार उनके गुणों से प्रभावित होकर उन देवियोंने उन्हे वन्दन किया, क्षमायाचना की और उनकी स्तुति करके स्वर्ग लोक में चली गईं। रात्रि व्यतीत होते ही महाराजा मेघरथ ने निर्विघ्नरुपसे अपना कायोत्सर्ग पूर्ण किया।

"अहा, सदा आत्मचिन्तन में तत्पर ऐसे धर्मात्माओं को धन्य है… कि जिनका ज्ञान, शील एवं ध्यान प्रशंसनीय है, और दोनो देवों द्वारा भी जिनका चित्त चलायमान नही होता। मोक्ष की साधना में लीन महात्माओंकी शूरवीरता वास्तवमें अद्भुत आश्चर्यकारी है।

भगवान शान्तिनाथ के तीसरे पूर्वभवकी कथा चल रही है। विदेह की पुण्डरीकिणी नगरीमें महाराजा मेघरथ, उनके भाई दृढरथ के साथ राज्य कर रहे है। दोनों भ्राताओं को धर्म- अर्थ-काम के साथ मोक्ष की साधना का पुरुषार्थ भी चल रहा है। मेघरथकी महारानी का नाम प्रियमित्रा है; वह भी धर्मसाधना में साथ दे रही है; वह शीलवान, गुणवान तथा अतिशय रुपवान है। एक बार इन्द्रसभामें इन्द्राणीने प्रियमित्रा के गुणोंकी तथा रुप की प्रशंसा की; जिससे प्रभावित होकर दो अप्सराएँ उसका रुप देखने के लिये स्वर्गसे पुण्डरीकिणी नगरी में आयीं। उस समय महारानी प्रियमित्रा अलंकार उतारकर सादे वेश में थी; उन्हे अलंकार रहित सादा वेश मे देखकर भी वे अप्सराएँ आश्चर्यचकित हो गई; और कहने लगी कि-हे महारानी ! हमने इन्द्रसभामें तुम्हारे रुप की जैसी प्रशंसा सुनी थी वैसा ही रुप प्रत्यक्ष देखा !

तब, ‘इन्द्रसभा में मेरे सौन्दर्य की प्रशंसा हुई !’- ऐसे गर्वसे प्रियमित्राने कहा-हे देवियों ! अभी नही, कुछ समय पश्चात जब मै श्रृंगार करके वस्त्राभूषण सहित तैयार होऊँगी तब तुम मेरा अद्भुत रुप देखना .. !

कुछ ही समय पश्चात वस्त्राभूषणों से सुसज्ज होकर जब महारानी सिंहासन पर बैठी, तब उसका रुप देखकर दोनों देवियोने प्रसन्न होने के बदले निराशा से सिर हिलाया !

रानी ने पुछा-क्यो ?

देवीने कहा-हे सुभागी ! पहले श्रृंगाररहित तुम्हारा जो रुप हमने देखा था वैसा अब नही रहा; सोलह श्रृंगार सजने पर भी अब तुम्हारे रुप में कोई विकृति उत्पन्न हो गई है !

यह सुनते ही रानी एकदम उदास हो गई। उसने अपने स्वामी मेघरथ की ओर देखा। उन्होने कहा- हां देवी ! इन अप्सराओं की बात सच है; तुम्हारे चहेरे की कान्तिमें कुछ न्यूनता आ गई है ! अरे, शरीर के सौन्दर्य की ऐसी क्षणभंगुरता देखकर रानी प्रियमित्रा को एकदम वैराग्य आ गया और वह दीक्षा लेने को तैयार हो गई।

तब महाराजा मेघरथने उसे धैर्य बँधाया कि हे देवी ! अभी दीक्षा मत लो; कुछ समय ठहरो; मेरा चित्त भी अब इन राजभोगोंसे उदास हो गया है, इसलिये अल्पकाल में ही तीर्थंकर प्रभुका सुयोग मिलने पर हम दोनो साथ ही दीक्षा लेगे !

उपरोक्त घटना को कुछ समय बीत गया; इतने में एकबार परमपिता भगवान धनरथ तीर्थंकर का नगरी में आगमन हुआ। पिता और प्रभु पधारने की बधाई सुनते ही मेघरथके हर्षका पार नहीं रहा। -अहा, महान भाग्योदय से धर्मका कल्पवृक्ष हमारे आँगन में फलित हुआ ! ऐसे आनन्द पूर्वक महाराजा मेघरथ सपरिवार महान उत्सवपूर्वक समवसरण मे गये। एक तो उनके पिता और वे भी तीर्थंकर !..उनके दर्शन से अति आनन्द हुआ। जैसा आनन्द परमपिता भगवान आदिनाथ के दर्शन से महाराजा भरत को हुआ था, वैसा ही आनन्द परमपिता धनरथ तीर्थंकर के दर्शनों से राजा मेघरथ को हुआ। सबने भक्तिसहित परमात्मा की वन्दना करके उनकी दिव्यवाणी का श्रवण किया। अहा, एक तीर्थंकर के श्रीमुख से उन्हीं के पुत्र (और भावी तीर्थंकर) धर्मोपदेश सुन रहे हैं, और साथ मे उनके भ्राता (भावी गणधर) भी बैठे हैं। भगवान की वाणीमें सम्यक्त्व से लेकर मोक्षकी साधना तक का वर्णन आया। रागरहित शुद्धोपयोग द्वारा ही आत्मसाधना का प्रारम्भ और पूर्णता होती है- ऐसा भगवान ने बतलाया।

प्रभुकी वाणीमें मोक्षसाधना का अद्भुत वर्णन सुनकर राजा मेघरथ के चित्त में मोक्ष साधना की उत्सुकता उत्पन्न होगई और वे संसार छोडकर मुनिदीक्षा लेने को तैयार हुए। उनके भ्राता दृढरथ उन्हींके साथ दीक्षित होने को तैयार होगये।

‘मेघरथने उनसे राज्य सँभालने को कहा, परन्तु वे बोले कि- हे पूज्य बधुवर ! जिस राज जिन विषयभोगोंको असार जानकर आप त्याग रहे हैं, मैं भी उनको असार ही मानता हूँ’

त्याग रहे हैं, उनका ग्रहण करनेको मुझसे क्यों कहते हैं? आप इन सबका मोह छोड़ रहे हैं तो मैं उनके मोहमें क्यों पडूँ ? मैं तो आपका भव-भवान्तरका साथी-सहोदर हूँ और मोक्ष होने तक आपके साथ ही रहूँगा । इसलिये मैं भी आपके साथ दीक्षा लेकर परमपिता के चरणोंमें रहूँगा।

-इस प्रकार घनरथ तीर्थंकर के चरणोंमें उनके पुत्र मेघरथ तथा दृढरथ दोनोंने जिनदीक्षा अंगीकार कर ली, उनके साथ अन्य सात हजार राजाओंने भी दीक्षा ग्रहण की, तथा महारानी प्रियमित्रा आदि अनेक श्राविकाएँ भी दीक्षा लेकर आर्यिका बन गईं दीक्षा लेकर मेघरथ और दृढरथ दोनों मुनिवरोंने आत्मध्यान द्वारा शुद्धरत्नत्रय धारण किये, उत्तम तप किया और बारह अंग का ज्ञान प्रगट करके श्रुतकेवली हुए। वे सदैव उत्तम वैराग्य भावनाओंमें तत्पर रहते थे। घनरथ तीर्थंकर के चरणसान्निध्य मे मेघरथ मुनिराजने क्षायिकसम्यक्त्व प्रगट किया, तथा दर्शनविशुद्धि आदि सोलह उत्तम भावनाओं द्वारा सर्वोत्कृष्ट ऐसी तीर्थंकर प्रकृति बाँधना प्रारम्भ किया,-मानो एक तीर्थंकर पिताके पाससे उन्हींके पुत्र ने तीर्थंकरत्व का उत्तराधिकार प्राप्त किया। पिता घनरथ प्रभु तो पूर्वकालमें बाँधी हुई तीर्थंकर प्रकृति को छोड़ रहे थे, जबकि पुत्र मेघरथ मुनिराज (भविष्य में तीर्थंकर होने के लिये) नवीन तीर्थंकर प्रकृति बाँध रहे थे। -तो क्या घनरथ तीर्थंकर द्वारा छोड़े गये उसी तीर्थंकर प्रकृतिके परमाणु मेघरथ मुनि के आत्मामें प्रवेश करते होंगे?- आश्चर्य!

ज्ञानी-ध्यानी दोनों मुनिवर अनेक वर्षोतक साथ-साथ विचरे। वे उपवासादि बाह्यतप तथा आत्मध्यानादि अंतरंग तप करते थे। वे शीत -उष्ण आदि समस्त परीषह सहते थे; -यद्यपि विशेष पुण्योदय के कारण ऋतुएँ उनके अनुकूल रहतीं और बाह्य में भी अन्य उपसर्ग नहीं आते थे। चाहे जैसी परिस्थितिमें वे क्रोधादि कषाय नहीं होने देते थे; वीतरागी शांतभाव द्वारा उत्तम क्षमा-मार्दव-आर्जव-शौच-सत्य-संयम-तप-त्याग-आकिंचन्य एवं ब्रम्हचर्य, -इन दस धर्मों का पालन करते थे। वैराग्य की वृद्धि तथा कर्मोंकी हानिके हेतु वे सदा अध्रुव- अशरण -एकत्व- अन्यत्व-अशुचि- संसार- आस्रव- संवर- निर्जरा- लोक- धर्म एवं बोधिदुर्लभ- इन बारह अनुप्रेक्षाओंका चिन्तन करते थे; उन वैराग्य भावनाओंका चिन्तवन उनके चित्तमे आनन्द उत्पन्न करता था। और बारम्बार शुद्धोपयोग द्वारा निर्विकल्प मोक्ष सुखका वेदन करते थे। शुद्धोपयोगी मुनि और सिद्धमें क्या कोई अन्तर है? बाह्य स्थित जीव उनमें अन्तर देखते हैं तो देखें; उन्हे स्वयं तो निर्विकल्प आनन्द में लीनता होनेसे कोई द्वैत दिखायी नहीं होता।

अहा, इससे विशेष उस मुनिदशा की क्या महिमा लिखें? उस अतीन्द्रिय सुखको इन इन्द्रियजन्य अक्षरों द्वारा कैसे बतलाया जा सकता है? ऐसी आनन्दमय दशामें झूलते झूलते वे मेघरथ-दृढरथ मुनिवर अनेक वर्षोतक विचरे और धर्मोपदेश द्वारा अनेक जीवोंका कल्याण किया। चौंसठ महान् ऋद्धियोंमें से केवलज्ञान के अतिरिक्त अन्य सर्व ऋद्धियाँ उनको प्रगट हुई थीं, किन्तु उन लब्धियोंका उपयोग करना उनका लक्ष नहीं था; उनका लक्ष तो चैतन्य की साधना ही था। जब उनकी आयु एक ही मास शेष रही तब उन्होंने विधिपूर्वक समाधि मरण करने हेतु प्रायोपगमन संन्यास धारण किया; शरीर की अत्यंत उपेक्षा करके वे ध्यान- स्वाध्याय मे ही रहने लगे; उन्होने आहार- जल का सर्वथा त्याग कर दिया; वे अपने शरीर की किसी प्रकार की सेवा शुश्रूषा करते नही थे तथा दूसरों के पास कराते नही थे। महान शूरवीरतापूर्वक वे चार आराधना मे तत्पर थे। परिणामों की विशुद्धि बढते-बढते वे शुक्लध्यान में आरुढ हुए और उपशम भाव से गुणस्थान श्रेणी चढने; लगे। राग-द्वेष-मोहका उपशम करके वे ११ वे वीतरागी गुणस्थान में पहुँचे .. और …वीतरागी यथाख्यात चारित्र सहित उत्तम समाधिपूर्वक देहको त्याग कर, संसार के सर्वोत्कृष्ट स्थान ऐसे ‘सर्वार्थसिद्धि’ स्वर्गलोक में उत्पन्न हुए।

[भगवान शान्तिनाथ के तीसरे पूर्वभव मेघरथ का वर्णन यहाँ समाप्त हुआ]

भगवान शान्तिनाथ: पूर्वभव दूसरा

अपने चरित्र नायक भगवान शान्तिनाथ और उनके भ्राता यह दोनों जीव सर्वार्थसिद्धि में विराजते हैं…जब वे सर्वार्थसिद्धि में विराजते थे तब भगवान कुन्थुनाथ के आत्मा भी वहीं सवार्थ- सिद्धि में उत्पन्न हुए थे। वाह, यहाँ एक क्षेत्र में दो तीर्थंकर कभी साथ नही होते, परन्तु वहाँ तो अनेक तीर्थंकर असंख्य वर्षोंतक एकसाथ रहत है और एक-दूसरे से अदभुत अचिन्त्य चैतन्य चर्चा करते हैं। अरे पाठको ! तुम्हे यह जानकर आश्चर्य होगा कि स्वर्गलोकमें ( तथा नरक में भी) वर्तमान मे असंख्य तीर्थंकर जीव ऐसे हैं जो वहाँ की आयु पूर्ण होने पर सीधे तीर्थंकर रूप से अवतरित होंगे…और एक-एक तीर्थंकर करोड़ों अरबों जीवों को संसार से तारेगा। वाह, कैसी है जैनधर्म की विशालता ! सर्वार्थसिद्धि-स्वर्गलोक सर्व श्रेष्ठ है; सिद्धशिलासे वह मात्र बारह योजन नीचे है, वहाँ के देव जिस प्रकार क्षेत्र से सिद्धालय के निकट हैं उसी सर्वार्थ सिद्धिमां प्रकार भावसे भी सिध्दपदके बिलकुल निकट हैं। शुद्धरत्नत्रयवान उत्तम मुनिवर ही सर्वार्थसिद्धिमें उत्पन्न होते हैं; इसलिये वहाँ भी उनका जीवन एकदम शांत होता है। धर्मात्मा जीवों में तीर्थंकर पद प्राप्त करनेवाले असंख्य जीव उत्पन्न होते हैं तब सर्वार्थसिद्धिका पदमात्र एक जीव प्राप्त करता है। वे सर्वार्थसिद्धि देव मात्र संख्यात ही है; वे सब अप्रतिहत सम्यग्दृष्टि है और असंख्य वर्षों तक वीतराग विज्ञान के अमृत का पान करते है; मुक्तिरमणी उन्हे पुकार कर मोक्षपुरी में बुला रही है; और वे देव भी विषय भोगो में अनासक्त होनेपर भी मुक्तिरमणी में उनका चित्त आसक्त है। -दिव्य रत्नों की प्रभासे झलकते हुए देव विमानोंमें उन अहमिन्द्र देवोको उत्कृष्ट पुण्य जनित सर्व सुख विद्यमान होनेपर भी, उन सबसे परे अंतर के अतीन्द्रिय चैतन्य सुख को ही वे इष्ट मानते है। उनके शुक्ल लेश्या है, किसी प्रकार का पाप या प्रतिकूलता नहीं है, दुःख या रोग नहीं है; अहा, जहाँ के सर्व जीव पूर्वकालमें मुनिजीवनकी वीतरागता का अनुभव करके आये हों, सब सम्यग्दृष्टि हों, सब आत्मा अनुभवी हों और सभी एक भव पश्चात परमात्मा बनकर मोक्ष जानेवाले हों; उस स्वर्गलोक के धार्मिक वातावरण का क्या कहना !! वहाँ सबके परिणाम एकदम शांत है, बाह्य में कोई छोटा-बड़ा नहीं है, कहीं ईर्ष्या या क्लेश नहीं है; एक क्षणमात्र में सर्वत्र जाने की शक्ति होनेपर भी अपने विमान के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं जानेकी आकुलता नही है। वे देव अपने देवविमान में विद्यमान शाश्वत जिनप्रतिमाओं को दर्शन-पूजन-स्तवन करते हैं। अवधिज्ञानद्वारा तीर्थंकरोका पंचकल्याणक देखकर जिन-महिमा करते है, और सदा मोक्षके कारणभूत तत्त्वचर्चा करते है। उन देवों के देवियाँ नहीं होती, तथापि इन्द्रोंकी अपेक्षा वे अधिक सुखी है। अंतर मे स्वयं साक्षात् अनुभव किये हुए आत्मतत्त्वके अगाध अपार-वैभव की अनन्त महिमा की चर्चा एवं चिन्तन वे असंख्य वर्षों तक करते रहते है; उसमें उन्हें कभी अरुचि नहीं होती; उनको निद्रा नहीं है, आहार नहीं है, मात्र ३३००० वर्ष मे एक बार अपने ही कण्ठसे झरते अमृत के स्वाद का मनमें चिन्तवन करके तृप्त हो जाते है। उनको कभी इष्ट का वियोग या अनिष्ट का संयोग नही होता। पूर्वभव में वे रत्नत्रयके प्रताप से सुखी थे, वर्तमान मे सुखी हैं और अगले भवमें मोक्षसुख प्राप्त करनेवाले है। उनको कोई चिंता या भय नहीं है, किसी के प्रति द्वेष या वैरभाव नहीं है; निचले देवोंकी अपेक्षा उनका शरीर छोटा है, परन्तु सुन्दरता महान है। उनको समस्त त्रसनाडी के असंख्यात योजनोंको जानने का अवधिज्ञान तथा उतनी ही महान विक्रिया ऋद्धि होती है परन्तु वे उस ऋद्धि का उपयोग कभी नहीं करते, क्योंकि वे मुनिसमान इच्छा रहित होते हैं। इस प्रकार मेघरथ और दृढरथ-जोकि सर्वार्थ सिद्धि मे अहमिन्द्र हुए हैं वे दोनो भ्राता तेतीस सागर तक सुखसागर में निमग्न रहने पर भी, भवसागरको पार करके बाहर निकले और अब मोक्षपुरीमें जाने के लिये मनुष्य लोक में आने को तैयार हुए। [चलो, वे आयें उससे पूर्व उनका स्वागत करने तथा जन्मोत्सव देखने के लिये हम हस्तिनापुरी मे पहुँच जायें]

[भगवान शान्तिनाथ के दूसरे पूर्वभव सवार्थसिद्धिका वर्णन पूरा हुआ]

हस्तिनापुरी में शान्तिनाथ - अवतार

१६

भगवान शान्तिनाथ (भाग ४)

निजवैभव कर प्राप्त, आपने पायी शान्ति अनन्त;
ध्याते हैं हे नाथ, माँगते हम भी भवका अन्त।
चक्रवर्ती-पद छोड प्रभो पहुँचे शिवपुर थान;
जीवों को शान्ति प्रदान कर, पाया पद निर्वाण।

हे प्रभु शान्तिनाथ ! आपका जीवन सचमुच अदभुत है, संसार का अंत करते- करते आपने संसार के सर्वोच्च पद (चक्रवर्ती पद, सर्वार्थ सिद्धपद तथा तीर्थंकर पद भी) प्राप्त कर लिये; और अंतमें उन सबसे परे ऐसे सिद्धपद को प्राप्त करके मोक्षपुरी मे विराज गये…इसलिये आपका जीवन आनन्द-मंगलकारी है।

अहा, प्रभु के उत्तम चारित्र की महिमाका क्या कहना ! 'मै शांतिनाथ भगवान का जीवन चरित्र पढता हूँ इस प्रकार इस कथा मे उपयोग लगाने से भी संसार की सर्व अशांति दूर होकर आत्मा में कोई नवीन शान्ति प्रगट होती है। शान्ति प्रिय श्रोताओ ! तुम भी भक्तिपूर्वक स्थिरचित्त से यह शान्तिनाथ प्रभु का चरित्र सुनो !

अपने इस भरतक्षेत्र में हस्तिनापुरीनगरी है, पूर्वकाल में भगवान ऋषभदेव उस नगरी में विचरे थे और दीक्षा के पश्चात् सर्व प्रथम (वर्षों तपका) पारणा उस हस्तिनापुरीनगरी में राजा सोमप्रभ तथा श्रेयांस कुमार के हाथ से किया था, इसलिये इस चौबीस में उत्तम दान तीर्थ का प्रारम्भ उस नगरी में ही हुआ था। पश्चात् उन सोमराजा के पुत्र जयकुमार हस्तिनापुर के राजा हुए, वे भरत चक्रवर्ती के सेनापति थे, पश्चात दीक्षा लेकर ऋषभदेव भगवान के गणधर हुए और मोक्ष प्राप्त किया। तत्पश्चात उन सोमराजा के कुरुवंश में असंख्य राजा हुए और उन्होंने भी मोक्ष प्राप्त किया। तपश्चात उन सोमराजा के कुरुवंशमे असंख्य राजा हुए और उन्होने भी मोक्ष प्राप्त किया। अब,जिस समय की अपनी यह कथा है उस समय, उस हस्तिनापुरी के कुरुवंशमे विश्वसेन महाराज राज्य करते थे; उनकी महारानी ऐरादेवी (अचिरादेवी) उनकी कुक्षिसे से सोलहवे तीर्थंकर का अवतार हुआ। उनका यह मंगल जीवन भव्य जीवों को अपूर्व शान्तिदायक ह। हे सुभव्य साधर्मियो ! अतीन्द्रिय शान्तिवान भगवान शान्तिनाथ को ध्यान द्वारा हृदय में विराजमान करके, उनका वह मंगल चरित्र पढ़ो..सुनो !

अरे, जिससे कषायकी वृद्धि होकर वैराग्य का नाश हो- ऐसी विकथा, अपने आत्म कल्याणके इच्छुक जीवों को कभी नहीं सुनना चाहिये; क्योंकि वह कथा सुनने से पाप का बंध होता है और धर्म के संस्कार नष्ट हो जाते हैं। जिस कथा के श्रवण से वैराग्य की वृद्धि हो और परिणाम शांत-उज्ज्वल हों, वही कथा सत्पुरुष के मुख से निरन्तर भक्तिपूर्वक श्रवण करना चाहिये; क्योंकि उसके श्रवण-पठन से धार्मिक संस्कार का पोषण होता है और पूर्वकृत पाप नष्ट हो जाते है। इसलिये कर्ण-अंजलि द्वारा इस धर्म कथा के श्रेष्ठ अमृत कथा का पान करो।

अहा तीर्थंकरादि महापुरुषों की धर्मकथा बड़े या छोटे, स्त्री या पुरुष सबको आनन्द प्राप्त कराती है और उत्तम संस्कारों के सिंचन द्वारा सन्मार्ग बतलाकर जीव को मोक्षमार्ग में लगाती है। अरे, मनुष्य तो ठीक… देवों को भी आनन्द प्राप्त कराये ऐसी यह धर्मकथा हे भव्य जीवो ! तुम आत्म कल्याण हेतु सुन रहे हो, वह सचमुच तुम्हारे उत्तम भाग्य का संकेत है।

भरतक्षेत्र में ऋषभदेव से लेकर धर्मनाथ तक १५ तीर्थंकर और भरतादि चार चक्रवर्ती हो गये; अब, उनके पश्चात् होनेवाले तीन तीर्थंकर तथा वे ही तीन चक्रवर्ती जहाँ अविरत होने वाले हैं ऐसी सुन्दर हस्तिनापुरी में चले। यहाँ के राजा-प्रजा पुण्यवन्त है और देव-गुरू-धर्म की उपासना में तत्पर रहते है; व्यापार-धंधा तथा रसोई में आरम्भ से उन्हे जो थोडा पाप लगता है उस पापको जिनपूजा-स्वाध्याय-दानादि सत्कार्यों द्वारा प्रतिदिन धो डालते हैं। दुनिया की श्रेष्ठ वस्तुऐं इस नगरी में आती है। यहाँ के पुण्यवान लोगो कों भविष्य की कोई चिन्ता नहीं है इसलिये जितना कमाते है उतना दानादि में व्यय कर देते है; तथापि पुण्योदय से उनकी सर्व वस्तुओंमें वृध्दि होती रहती है। उत्तम दान के लिये तो यह नगरी भगवान ऋषभदेव के शासनकाल से जगप्रसिद्ध है।

माघ का महिना चल रहा था.. अचानक ही हस्तिनापुरमें राजभवन के प्रागण मे करोडो रत्नोंकी वर्षा होने लगी; और छह मास पश्चात् भाद्रपद कृष्णा सप्तमी को महारानी अचिरा देवी (ऐरादेवी) ने अति मंगल सूचक सिंह हाथी, माला, रत्नराशि आदि १६ उत्तम स्वप्न देखे। अहा, प्रकृति की रचना तो देखो ! सर्व तीर्थंकरोंकी माताऐं एक समान १६ मंगलस्वप्न नियम से देखतीं है। ऐसे उत्तम १६ स्वप्न तीर्थंकर की माताके अतिरिक्त और किसीको नही आते। जिस समय अचिरा माताने स्वप्न देखे उसी समय, असंख्य योजन दूर ऐसे सर्वार्थसिद्धि स्वर्गसे प्रभु शान्तिनाथ का जीव तीर्थंकर-अवतारके रुपमें उनके उदर में अवतरि हुआ। महारानीने अल्पनिद्रा में देखा कि एक महासुन्दर सुगध युक्त हाथी उनके मुखमें प्रविष्ट हो रहा है।

महारानी जाग उठी; अति हर्षपूर्वक पचपरमेष्ठी का चिंतन किया। पश्चात् राजसभा में पहुँची और महाराजा से आनन्ददायक मंगलस्वप्नों की बात कही। अवधिज्ञानी विश्वसेन महाराजने जान लिया कि अहो ! अपने यहाँ त्रिलोकनाथ तीर्थंकर का आगमन हुआ है। हे देवी ! सोलहवें तीर्थंकर का जीव तुम्हारे गर्भ में अविरत हो चुका है। इतना ही नही, वह महान आत्मा चक्रवर्ती होकर सारा ये भरतक्षेत्र का राज्य करेगा और पश्चात् तीर्थंकर होकर समस्त विश्वमें धर्मका साम्राज्य चलायगा। उसका रुप अद्भुत सुन्दर होगा वह कामदेव, चक्रवर्ती एवं तीर्थंकर-ऐसी तीन उत्तम पदवियोंका धारी होगा।

वाह ! ऐसी बात सुनकर किसे हर्ष नही होगा ? महादेवी अचिरामाता के हर्षानन्दका पार नही रहा-‘अहा, ऐसा धर्मात्मा और मोक्षगामी जीव मेरे उदर में !’ ऐसे परम उल्लास से उनके अंतर में चैतन्य महिमा के अपूर्वभाव जागृत हुए; असंख्य प्रदेशोंमे उन्हें किन्हीं अपूर्व चैतन्य भावोंका वेदन हुआ उनके अंतर से मोहांधकार दूर होकर चैतन्य प्रकाश खिल उठा। अहो, धन्य तीर्थंकर महिमा ! वह त्रिकाल मंगल आत्मा जिसके उदर में विराज मान हो उसके अंतर में मोहांधकार रह ही नही सकता।

शान्तिनाथ प्रभुके गर्भावतार कल्याणक का उत्सव करने हेतु स्वर्ग से इन्द्र आ पहुँचे; उन्होने महाराजा विश्वसेन तथा महादेवी अचिरामाता का तीर्थंकर के माता पिता रुपमें सन्मान किया; दिव्यवस्त्राभूषण भेट किये और स्तुति की कि-अहो, आपके यहाँ सोलहवें तीर्थंकर का आगमन हुआ है… आप तीर्थंकर के माता पिता होने से जगत के माता-पिता है।

हस्तिनापुरीके भाग्य का उदय हुआ; उसे अयोध्यातीर्थ जैसा गौरव प्राप्त हुआ। वहाँ प्रतिदिन रत्नोंकी वर्षा होती थी; शान्ति एवं समृद्धि बढ़ती जा रही थी। कमलवासी श्री-ह्रीं-धृति-कीर्ति-लक्ष्मी-सरस्वती आदि देव कुमारियाँ भी इन्द्रकी आज्ञा से अचिरा माता की सेवा करने आ गई थीं। वे देवियाँ आनन्द-विनोदपूर्वक चर्चा करके माता को आनन्दित करती थी और उदरस्थ प्रभुकी महिमा प्रगट करती थी।

❀ एक बार श्रीदेवीने पूछा-हे सखी ! इन माताजी के आसपास सर्वत्र इतनी अधिक शान्ति क्यों है ?

* तब लज्जावती ह्रीदेवीने कहा-सुन हे देवी ! भगवान शान्तिनाथ स्वयं माताजीके उदर में विराज रहे है, उन्ही के प्रताप से इतनी अधिक शान्ति छा रही है !

❀ धैर्यदेवीने पूछा- हे सखी ! महाराजा विश्वसेन एवं अचिरामाता की कीर्ति अचानक ही जगत मे कैसे फैल गई ?

[चित्र] ❀ कीर्तिदेवीने कहा-हे देवी! तीन लोककी कीर्तिको वश करनेवाला तीर्थंकरका आत्मा उनके यहाँ पुत्ररुपसे आया है इसलिये।

❀ लक्ष्मीदेवीने पूछा-हे देवी सरस्वती! आजकल अचिरामाता के अंतर से सरस्वती उमड़ रही है और सम्पूर्ण राज्य में लक्ष्मीकी खूब वृध्दि हो रही है-उसका क्या कारण है?

* सरस्वतीदेवीने कहा-हे लक्ष्मी! इस समय माताजीके उदर में जो तीर्थंकर विराज रहे हैं वे तीन लोककी लक्ष्मी तथा तीन लोक में श्रेष्ठ सरस्वतीके (केवलज्ञान के) स्वामी होनेवाले हैं, इसलिये यहाँ लक्ष्मी और सरस्वती दोनों उमड़ने लगी हैं।

-ऐसी उत्तम चर्चामें प्रसन्नतापूर्वक भाग लेकर माताजी भी देवियों को आनन्द प्राप्त कराती थी। इस प्रकार प्रसन्नता के वातावरण में सवानौ महीने बीत गये…तत्पश्चात्… ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी के दिन माता अचिरादेवीने एक सर्वोत्कृष्ट पुत्रको जन्म दिया… मानो जगत् प्रकाशक दीपक प्रज्वलित हुआ। उसी क्षण उसके तेजसे तीन लोक प्रकाशित हो गये। अभी केवलज्ञान का दिव्यप्रकाश तो फिर होगा, उससे पूर्व ही पुण्योदय के महातेज से पृथ्वी जगमगा उठी; मात्र मनुष्यलोक का ही नहीं, स्वर्ग का तथा नरक का वातावरण भी दो क्षण के लिये शान्तिमय हो उठा; सर्वत्र ही एक प्रकार का नूतन आह्लाद छा गया। स्वर्ग के दिव्य वाद्य एकसाथ बजने लगे और दिव्य ऐरावत हाथी पर बैठकर इन्द्र महाराज हस्तिनापुरी में प्रभु का जन्मोत्सव मनाने देवो के ठाटबाट सहित आ पहुँचे। तीर्थंकर प्रभुके जन्मका ऐसा महान उत्सव हुआ कि मानो दुनिया भर का आनन्द यहीं एकत्रित हुआ हो! ‘शान्ति’ प्रभुका अवतार होने से तीनों लोक के अंतर मे ‘शान्ति’ अवतरित हुई।

उन बाल तीर्थंकर को गोद में लेकर इन्द्राणी धन्य हो गई। अहा, तीर्थंकर समान धर्मात्मा का सीधा स्पर्श होने से वह परम वात्सल्यपूर्वक रोमांचित हो गई। देव पर्याय में यद्यपि पुत्र नहीं होते परन्तु किसी सातिशय पुण्य योग से तीर्थंकर शिशु को अपनी गोद में लेते हुए उस इन्द्राणी को पुत्रसुख की अपेक्षा विशेष किसी लौकिक संतोषका अनुभव हुआ। वह भूल गई कि मैं इन्द्राणी हूँ; वह तो ऐसा वेदन करने लगी मानो वही बच्चे की ‘माँ’ हो… और प्रभुभक्ति में तल्लीन होकर स्वयं को ही प्रभुरूप से अनुभव करने लगी। अहा, बालतीर्थंकर भी अनेक जीवों को सम्यक्त्व में कारण होते हैं। मोक्षगामी बालक को गोद में लेनेसे वह इन्द्राणी भी मोक्षमार्गी बन गई। आनन्द के अपूर्व रोमांचपूर्वक इन्द्राणीने उन बालतीर्थंकर को इन्द्र के हाथ में दे दिया। इन्द्र तो उन बालतीर्थंकर का रुप देखकर मानो हर्षोन्मत्त ही हो गया! वह एक साथ हजार नेत्र बनाकर प्रभुका रुप निहार रहा था। उसे आश्चर्य हुआ कि इन्द्रलोक से भी सुन्दर वस्तु इस मनुष्यलोक में हो सकती है! अरे, सच बात है कि-मुनिदशा और मोक्ष समान सर्वश्रेष्ठ वस्तु इन्द्रलोक में कहाँ है? वह तो मनुष्यलोक में ही है न! इन्द्रका गर्व उतर गया और मनुष्यलोक की तीर्थंकर-विभूति के समक्ष स्वर्गलोक की इन्द्रविभूति भी उसे तुच्छ लगने लगी। हजार नेत्रोंवाला इन्द्र प्रभुका रुप देखकर में ऐसा तल्लीन था कि अपनी इन्द्राणी के दिव्य रुप को भी वह भूल गया…वह ऐसा सूचित करता है कि- वीतराग स्वरुप का अवलोकन करनेवाले मुमुक्षु भव्यात्मा का चित्त उसमें ऐसा तल्लीन हो जाता था कि जगत के विषय कषायों से उसका चित्त सहज ही हट जाता है।

प्रभु को दैवी ऐरावत हाथी पर विराजमान करके महान शोभा यात्रा सहित इन्द्र मेरुपर्वत पर ले गया और वहाँ अतिशय भक्तिपूर्वक अभिषेक किया। असंख्य देवों पूर्व के इन्द्रने क्षीरसागर के पवित्र जल से भगवान आदिनाथका जैसा महाभिषेक किया था, वैसा ही इन इन्द्रने शान्तिनाथ भगवान का किया। बालतीर्थंकर प्रभुकी शोभायात्रा से वह हाथी भी धन्य हो गया ! बास्तव में वह कोई हाथी नहीं था, वह तो सौधर्म स्वर्ग का एक देव था, और प्रभुको अपनी पीठपर विराजमान करने के लिये उसने स्वयं विक्रियाद्वारा हाथीका रुप धारण किया था…हाथी भी कैसा ?

-दैवी ! जिसका वर्णन कल्पनातीत है। एक लाखयोजन बड़ा, कितनी ही सूँडें; प्रत्येक सूँड में सरोवर; सरोवर में कमल, और उन कमलों की प्रत्येक पंखुरी पर भक्तिसहित नृत्य करती हुई अप्सराएँ अद्भुत थी वह रचना ! अहा, जिसकी पीठपर तीर्थंकर बैठे हों उसकी शोभा का क्या कहना !! पुराणकार कहते हैं कि उस समय ऐरावत हाथी के साथ इन्द्र की सात प्रकार की सेना मे करोड़ों वाद्यों सहित अरबों हाथी घोड़े-त्यादि थे। वास्तव में वे कोई तिर्यंचजीव नहीं थे, किन्तु देवों की ही उसप्रकार की अद्भुत विक्रिया थी। इन्द्रका ठाटबाट वैभव इतना विशाल और अचिन्त्य था कि सम्पूर्ण मनुष्यलोक मे जिसका समावेश न हो, ऐसी अचिन्त्य विभूतिवान इन्द्र को भी ऐसी अद्भुत जिनभक्ति करता देखकर अनेक मिथ्यादृष्टि देव भी जैन धर्म की श्रद्धा से सम्यग्दृष्टि बन जाते थे। इसीसे ‘जिनमहिमा-दर्शन’ को सम्यगदर्शनका कारण कहाँ है। वे इन्द्र-इन्द्राणी, वह ऐरावत हाथी, वे देव-देवी-सब तीर्थंकर की भक्ति से जितने पुण्यकर्मोंका उपार्जन एवं पाप कर्मों का विसर्जन करते थे, उनमे अल्पता- अधिकता किसीकी थी वह हम नहीं कह सकते; परन्तु इतना अवश्य कह सकते हैं कि उस समय उस जिनमुद्राके दर्शन से वीतराग रसकी जो पुष्टि होती थी वह सबसे महान थी और मोक्षका कारण थी। शान्तिप्रभु के सान्निध्य में शान्ति का वह एक चमत्कार था। भक्ति की चेष्टांए सबकी भिन्न-भिन्न थी परन्तु उस भक्तिका फल तो सबको समान ही था। धन्य जिन महिमा !

उन शिशु भगवान का स्वरुप यद्यपि स्वय सुशोभित था, शोभाके लिए किसी बाह्य अलंकार की आवश्यकता उनको नही थी; तथापि-"स्वर्गलोक स्थित मानस्तंभ के दिव्य पिटारोंमे उत्पन्न हुए सर्वोत्कृष्ट अलंकार मै तीर्थंकर के अतिरिक्त किसे पहनाऊ ? इन दिव्य अलकार को धारण कर सके ऐसा तो विश्वमे दूसरा कोई है नही " ऐसा सोचकर इन्द्रानीने स्वर्ग के दिव्य वस्त्राभूषण बालतीर्थंकर को पहिनाये . और साथ ही प्रभुके मस्तक पर रत्नो का मंगल तिलक लगाया; इस बहाने मानो उसने अपने आत्मा को ही मोक्षका तिलक लगा दिया। पश्चात वह इन्द्राणी इधरसे और उधरसे और मुँह फेर- फेरकर आश्चर्य पूर्वक प्रभुकी शोभा निहारने लगी।

उन प्रभु के दर्शन से सर्व जीवों को शान्ति हो रही थी, इससे इन्द्रने उन सोलहवें तीर्थंकर का नाम ‘शान्तिनाथ’ रखा। उनके चरण में मृग का चिन्ह था। जन्माभिषेक के पश्चात् १००८ मंगल नामोंसे इन्द्रने प्रभुकी स्तुति की। अद्भुत ताण्डव नृत्य किया और प्रभुकी शोभायात्रा के साथ हस्तिनापुर लौटे।

हस्तिनापुर के राजमहल में आकर इन्द्रने सन्मान पूर्वक भगवान के माता पिताको उनका पुत्र सौंपा और उनके समक्ष पुनः बालतीर्थंकर की भक्ति की। इन्द्र स्वयं इन्द्राणी के साथ थिरक थिरककर नाच उठा। अंतर में अपार उल्लास होनेपर कौन नहीं नाच उठता ? अहा, इन्द्र के नृत्य का क्या कहना ! वह एकसाथ हजार हाथ उठाकर और उस प्रत्येक हाथ पर उसी जैसा इन्द्र उसी जैसे हावभाव प्रदर्शित करके नृत्य कर रहा हो - ऐसी विक्रिया करके नाच रहा था। और उसका नृत्य इतना अधिक-गतिशील था कि - तबले पर धाधीन्…एवं धातीन्…इस प्रकार एक तालके पश्चात दूसरा ताल पड़े उससे पूर्व वह ( दो तालो के अन्तराल मे ) मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा करके आ जाता था और ताल में ताल मिलाकर नृत्य करता था।

अहा, राजभवन के प्रांगण में करोड़ो प्रजाजनों के समक्ष एक और इन्द्र ऐसा अदभुत नृत्य कर रहा था और सामने अचिरामाता की गोदमें बैठा-बैठा वह शान्तिकुँवर उस नृत्यको देखकर अपने अतंर मे इन्द्र के उस नृत्य से भी अदभुत ऐसो आनन्दमय ज्ञानचेतनाको नचा रहा था। अंतर के उस नृत्य को देखनेवाले कोई विरले ही थे। हस्तिनापुरी के प्रजाजनों के हर्ष का कोई पार नही था, क्योंकि उन्हे तो एक ओर तीर्थंकर के साक्षात दर्शन तथा दूसरी ओर इन्द्रका नृत्य,-ऐसी दो अदभुत वस्तुए एकसाथ देखने को मिल रही थीं। देव तो हस्तिनापुरमें एक ही वर्ष में यह दूसरी बार आये थे इसलिये उनके आनेका कोई आश्चर्य नहीं लगता था, परन्तु भगवान के दर्शनों से सबको हार्दिक आनन्द प्राप्त होता था। पुत्र की ऐसी अदभुत महिमा देखकर माता-पिता के तथा नगर जनों के अंतर में अनुपम चैतन्य महिमा का उदय हुआ। अनेक जीव उस अवसर पर सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए। उस समय सातवे नरक के जीवों को चित्तमें भी क्षणभर शान्ति का अनुभव हुआ तो दूसरों का क्या कहना ! शान्तिनाथ का अवतार सर्व जीवों को शान्तिका कारण हुआ। वे जिस राजभवनमें विराजते थे उस नंदावर्त भवन की शोभा अदभुत थी। उस भवन के प्रागण में प्रति दिन प्रातःकाल हजारो लाखों की भीड प्रभुके दर्शन हेतु उमड़ी थी। उस भवन में ‘जीवंत जिन’ का निवास होने से वह एक साक्षात ‘जिनमन्दिर’ था दूसरे जिनमन्दिरोंमें तो जिनबिम्बरुप ‘स्थापना-जिन’ होते है, जब कि इस मन्दिरमें तो साक्षात् ‘द्रव्यजिन’ स्वयं विराज रहे थे, इसलिये वह जगत का एक मंगल तीर्थ था।

पन्द्रहवे तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ का शासन लगभग तीन सागर तक चला; उसके अन्त भाग में पाव-पल्य (लाखों करोड़ों वर्ष) तक धर्मका विच्छेद हो गया था; तत्पश्चात् सोलहवे तीर्थंकर शान्तिनाथ भगवान का अवतार हुआ और धर्मकी धारा पुनः प्रवाहित हुई। उनकी आयु एकलाख वर्ष थी, शरीर की ऊँचाई ४० धनुष (लगभग १००मीटर) थी, उसमें चक्र-ध्वज-शंख-पद्म-मृग-तोरण आदि उत्तमोत्तम १०८ चिह्न थे। जगत में श्रेष्ठ ऐसा चक्रवर्ती पद, सर्वार्थसिद्धि- इन्द्रपद या तीर्थंकर पद धर्माराधक जीवों को ही प्राप्त होते है; धर्मरहित जीवोंकों ऐसा उत्तम पुण्य नहीं होता। ऐसी समस्त पदवियों धर्मसाधक भगवान शान्तिनाथ के जीव को धर्म की साधना युक्त उत्तम पुण्य द्वारा प्राप्त हुई थीं, तथापि अंत में तो उन सब कर्मजनित संयोगी पदवियों को छोड़कर प्रभुने स्वभावभूत ऐसे असंयोगी सिद्धपदको ही साधा। प्रभु का जीवन हमे ऐसा बतलाता है कि-भव में अविरत होना वह वास्तव में कृतार्थता नहीं है, परन्तु अवतार का अन्त करके अनंत सिद्धपद की प्राप्ति में ही कृतार्थता है।

कामदेव के रुप में चक्रवर्ती के रुपमें और तीर्थंकर के रुपमें उनके शरीर की सुन्दरता सर्वोत्कृष्ट थी, तो अतंर में अपूर्व भेदज्ञान, क्षायिकसम्यक्त्व और अवधिज्ञान द्वारा उनके आत्मा का सौदर्य भी महान था। उनकी दस अंगुलियों की कोमलता मे मानो उत्तमक्षमादि दस धर्मोंका वास था, इसलिये उनमें किंचित् कठोरता नही थी। उन बालतीर्थंकर शान्तिकुमार के मस्तक के कोमल-मरोड़दार बालोंसे लेकर पैरोंके चमकदार नखों-तक शरीर के समस्त अवयवों की शोभा का भिन्न-भिन्न वर्णन करने की क्या आवश्यकता है ? इतना कहना ही बस होगा कि-उस शरीर के सर्वांग में व्याप्त होकर एक महामंगलरुप तीर्थंकर प्रभु विराज रहे थे; शरीर के सर्व प्रदेशोंमें सर्वत्र एक धर्मात्मा-तीर्थंकर जीवकें असंख्य प्रदेश (क्षायिकसम्यक्त्व-सहित) भरे हुए थे; इसलिये किसी निक्षेपसे तो वह शरीर स्वयं ‘भगवान’ तथापि, उन प्रभुके दर्शन से सम्यग्दर्शन उन्ही को प्राप्त होता था जो गहरे उतरकर शरीर से परे ऐसी अचिन्त्य शोभा द्वारा प्रभुकी पहिचान करते थे। धन्य तीर्थंकर अवतार !

भगवान शान्तिनाथ का अवतार होने के कुछ समय पश्चात् महाराजा विश्वसेन की दूसरी रानीने भी एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया। पूर्वकालमे मेघरथ के भवमें जो दृढ़रथ नामका भाई था और जो सर्वार्थ सिद्धि मे साथ था, वह जीव वहाँ से च्यवकर यहाँ शान्तिनाथ प्रभुके भ्राता रुप में अविरत हुआ, उसका नाम चक्रायुध।

दोनो भ्राता (जो कि तीर्थंकर और गणधर की जोड़ी है) दिन-प्रतिदिन वृद्धिगत होने लगे; उनके गुणों का वैभव अधिकाधिक विकसित होने लगा। उनकी बालक्रीड़ाएँ भी आश्चर्यजनक थी। देव भी उनके साथ क्रीड़ा करने हेतु उन्ही जितने बालक का रुप धारण करके हस्तिनापुरी में रहते थे। अहा, तीर्थंकर का सहवास किसे अच्छा नही लगेगा ? पुण्यजनित राज्यलक्ष्मी और धर्म जनित मोक्षलक्ष्मी दोनों के वे एकसाथ स्वामी थे, तथापि मोक्षलक्ष्मी का सन्मान करते और पुण्यलक्ष्मी के प्रति उदासीन रहते थे। (अर्थात् मोक्षलक्ष्मी जो महारानी के स्थान पर थी और पुण्यलक्ष्मी मात्र दासी समान थी।) दोनो भ्राता आत्मानुभवी, चरमशरीरी तथा अत्यन्त आत्मरसिक थे। अनेक बार जब वे आत्मानुभव की गंभीर एव आनन्दकारी चर्चा करते तब, तीर्थंकर-गणधरकी वह अद्भुत धर्मचर्चा सुनकर जिज्ञासु जीव मुग्ध हो जाते थे और तत्त्वस्वरुप को समझकर अनेक जीव आत्मानुभव कर लेते थे। ‘वे आत्मानुभवकी कैसी अद्भुत चर्चा करते होगे ?’ हे पाठक ! तुम्हारे अंतर की वह जिज्ञासा पूर्ण करने के लिये यहाँ थोडीसी बानगी देता हूँ।

एक बार शान्तिकुमार और चक्रायुध कुमार दोनो भ्राता मनोहरउद्यान में पर्यटन हेतु गये; साथ में और भी अनेक लोग थे। आनन्द-प्रमोद मे दिन पूरा हुआ। सायकाल शान्तिनाथ ने अपने भाईसे कहा-भाई चक्र ! चलो, शान्तिसे दो घड़ी अंतरमे परमात्मतत्त्व का चिंतन करें। यह बात सुनकर चक्रकुमार प्रसन्न हुए, और दोनो भाई ध्यानमे बैठकर आत्मस्वरुप का चिन्तवन करने लगे। तुरन्त ही परिणाम शांत हुए और एक एक उपयोग निजस्वरुप में एकाग्र होनेसे स्वानुभूतिके निर्विकल्प आनन्द का अनुभव हुआ। वे जीवन मे बारम्बार ऐसा अनुभव करते थे…उस समय तो मानों कोई दो सिद्धभगवंत वहाँ विराजते हों ! ऐसा लगता था। योगी समान ध्यानस्थ उन दोनों राजकुमारों को देखकर सब लोग भी प्रभावित हुए और सब प्रवृति छोडकर आत्मचिन्तनमें बैठ गये चारो ओर शान्ति का स्तब्ध वातावरण छा गया। अरे, वन के सिह और शशक, सर्प और मोर आदि पशुपक्षी भी उनकी शांत ध्यानमुद्रा देखकर आश्चर्य को प्राप्त हुए और वैर या भय छोडकर सब शांतपरिणामसे प्रभुसन्मुख बैठ गये…मानो समवसरण मे नही बैठे हों ! किसी प्रकार के कोलाहल बिना अधिक समय ऐसे ही परमाशान्ति में बीत गया, -जिसे देखकर क्रोध से भिन्न चैतन्य शान्ति कैसी होती है-वह भव्य जीवो की प्रतीति में आ जाता था और परम शांत मोक्षतत्त्व की श्रद्धा हो जाती थी।

ध्यान पूर्ण होने पर तृप्त-तृप्त होकर जब दोनो राज्यकुमारोंने आँखे खोली तब आसपासका एकदम प्रशांत वातावरण देखकर तथा सर्व जीवोको आत्मशान्ति के विचारमें देखकर, दोनों को अत्याधिक प्रसन्नता हुई। अहा, मानो तीर्थंकर का समवसरण ही हो !

प्रभुकी मधुर दृष्टि से सब सभाजन प्रसन्न हुए। कुछ समय पश्चात नगर सेठ बोले-हे देव ! आपका आश्चर्यजनक ध्यान देखकर हम सबको भी आत्मध्यान की प्रेरणा जागृत हो उठती है और बिना सीखे सहज ही आत्मध्यान आ जाता है। हे प्रभो ! आप दोनों भ्राताओंने किस प्रकार आत्मध्यान किया ? और उस ध्यान में क्या देखा ? वह जानने की हम सबको उत्कण्ठा है…तो कृपा करके बतलाइये।

नगर सेठ का ऐसा उत्कठा भरा प्रश्न सुनकर दोनों भाई प्रसन्न हुए और उनकी जिज्ञासा पूर्ण करने के लिये साथ वे स्वानुभव की चर्चा करने लगे। (अहा, दो भाई…दोनों सम्यग्दृष्टि-चरमशरीरी-मोक्षगामी; एक तीर्थंकर और दूसरे गणधर; कैसी सुन्दर जोड़ी ! उनकी स्वानुभूति की चर्चा सुनो ।-)

शान्तिकुमार : हे भाई चक्रायुध ! शुद्ध आत्मतत्त्व का ध्यान कौन कर सकता है ? और उसके लिये पात्रता कैसी होती है, वह कहो ।

चक्रायुधकुमार : आत्म तत्व अति अदभुत है, अचिन्त्य महिमावान है। प्रथम जिसने जैन धर्म के ज्ञाता-अनुभवी के निकट रहकर आत्मतत्व का यथार्थ स्वरूप समझा हो, उसके शुद्ध द्रव्य-गुण-पर्यायों को रागसे विभक्त तथा चैतन्य स्वरूप से एकत्वरूप जाना हो, उसे जाननेपर चैतन्यरसकी मिठास-लगन लगी हो और रागरसके प्रति उदासीनता हो गई हो; ऐसा मुमुक्षु जीव विषय-कषाययोंसे विरक्त होकर शांतपरिणाम द्वारा चैतन्यानुभव के लिये चित्तको आत्मामें एकाग्र करनेका सतत प्रयास करता रहता है। -ऐसे सुपात्र जीवको जब चैतन्यरस की पराकाष्ठा होती है तब उसका उपयोग आत्मोन्मुख स्थिर हो जाता है, उसका नाम स्वानुभूति है। हे बन्धुवर ! अनेक भवों से आपके उत्तम समागम के कारण मैने ऐसी स्वानुभूतिका स्वरूप जाना है।

शान्तिनाथ : हे बन्धु ! तुम्हारी बात उत्तम है। उस स्वानुभूति के समय अंतरमे क्या दिखायी
दिया ?

चक्रायुध : अहो देव ! उस समय आत्माने स्वयं अपने को देखा…दृष्टा और दृष्टिगोचर होनेवाली वस्तु (शुद्धनय और उसका विषय) ऐसे भाव- भेदरूप भिन्नता भी उसी समय नहीं था; एकाकार आत्मा सर्वगुणों के रस सहित स्वयं अपने को अनुभवता था वह आत्मानुभूति वचनातीत एवं विकल्पातीत थी ! आश्चर्य से भी परे ऐसे परमशांतस्वरूप से आत्मा स्वयं ही प्रत्यक्ष अतीन्द्रिय ज्ञान के स्वयंस्वाद में आता था। वहाँ इन्द्रियाँ नही थी, राग नहीं था द्रव्य-गुण-पर्याय के कोई भेद भी नही थे; अकेला ज्ञायक आत्मा स्वयं अपने आनन्द में लीन होकर सर्वोपरि परमतत्वरूपसे प्रकाशित हो रहा था।

शान्तिनाथ : वाह, अद्भुत है आत्मानुभूतिका वर्णन ! प्रथम बार की अपूर्व स्वानुभूति के समय तो मानो आत्माके असंख्य प्रदेशोंमे आनन्द का कोई भारी भूकम्प हो रहा हो ऐसी उथल-पुथल हो जाती है, क्रोध रुपी पर्वतके टुकडे-टुकडे हो जाते हैं और उसके स्थानपर शान्तिका गंभीर समुद्र हिलोरे लेता है। दुःख के बदले परम सुखका वेदन होता है; भव के बदले आत्मा परम सुखमें बैठा हो -ऐसी तृप्ति का अनुभव होता है। अहा, उस अनुभूति में अपने सर्व गुणों का शांत- अतीन्द्रयरस एकसाथ स्वाद में आता है और सिद्धसमान वीतरागी तृप्ति का वेदन होता है इसलिये-

आमां सदा प्रीतिवंत बन, आमां सदा संतुष्ट ने
आनाथी बन हूँ तृप्त, तुजने सुख अहो ! उत्तम थशे।

(दो भाईयों के बीच स्वानुभव की सुन्दर चर्चा चल रही है और सभाजन वह स्वानुभूतिका रसपान करने में तल्लीन है।)

शान्तिनाथ: उस स्वानुभूति के समय निर्विकल्प उपयोग में स्व-पर प्रकाशकपना किस प्रकार होता
है ?

चक्रायुधः उस समय अंतर्मुख उपयोग में मात्र आत्मप्रकाशन; है, आत्मा ही स्वज्ञेय है; स्वयं ही ज्ञाता और स्वयं ही ज्ञेय-इस प्रकार ज्ञेय-ज्ञायक की अभिन्नता है। उस समय उपयोग में परज्ञेय नहीं होता; क्योंकि साधक का उपयोग स्वमें तथा पर में-दोनों में एकसाथ नहीं लगता; एक समय एकमें ही उपयोग होता है।

शान्तिनाथः तो क्या उस समय जीव को स्वपर का ज्ञान नहीं है ?

चक्रायुधः है; परन्तु उपयोग स्वज्ञेय में ही वर्तता है। जिस भेदज्ञान द्वारा परवस्तु को पररूप जाना है वह ज्ञान उस पर्याय में वर्तता अवश्य है,-परन्तु लब्धरूप वर्तता है; उपयोग में तो आत्मा ही ज्ञाता और आत्मा स्वयं ही ज्ञेय है। परसे भिन्नता का ज्ञान करने के लिये कहीं परसन्मुख उपयोग होना आवश्यक नहीं है। अपने शुध्द आत्मा को ही स्वज्ञेय रूपसे जाना और उसमें राग की या जड़की मिलावट नहीं की, वही भेदज्ञान है। ज्ञानी को वह निरंतर वर्तता है।

शान्तिनाथः धर्मीका उपयोग अंतर मे हो तब तो उस अतीन्द्रिय उपयोग मे इन्द्रियविषय छूट गये है, परन्तु जब उसी धर्मीका उपयोग बाह्य मे हो और इन्द्रियज्ञान हो तब उस बाह्य उपयोग के समय, क्या उसे मात्र इन्द्रियज्ञान ही होता, है ?- अथवा अतीन्द्रियज्ञान भी होता है ?

चक्रायुधः धर्मीको बाह्य उपयोग के समय इन्द्रियज्ञान होता है .. तथा उसी समय उसे उस पर्याय मे अतीन्द्रियज्ञान भी चलता ही रहता है; मात्र इन्द्रियज्ञान नही है। हा उस समय उपयोगरूप से अतीन्द्रियज्ञान नही है, तथापि उसी पर्याय मे पहले जो आत्मज्ञान किया है उसकी धारणा वर्तती है…इसलिये अतीन्द्रियज्ञान का परिणमन (लब्धरूपसे) उसी पर्याय मे चल रहा है। यदि मात्र इन्द्रियज्ञान हो तो सम्यग्ज्ञान स्थिर नहीं रह सकता और मोक्षमार्ग भी नही चल सकेगा। इसलिये अतीन्द्रिय ज्ञान तथा अनन्तानुबंधी कषाय के अभावरुप शान्ति, सम्यक् श्रद्धा आदि इन्द्रियातीत शुद्धभाव धर्मीकी पर्याय में सदा वर्तते ही होते हैं; और उन भावों द्वारा ही धर्मी जीव की सच्ची पहिचान होती है।

अहा चैतन्यरस से परिपूर्ण ऐसी सरस तत्वचर्चा और वह भी तीर्थंकर-गणधर होनेवाले दो महात्माओं के श्री मुख से सुनकर सभाजन स्वानुभूति के गम्भीर रहस्य स्पष्टरूप से समझ गये और उसी समय अनेक जीवोंने शांत परिणाम द्वारा स्वानुभूति भी प्राप्त कर ली। तीर्थंकर-प्रकृति का उदय आने से पूर्व ही भगवान शान्तिनाथ ने धर्म तीर्थका प्रर्वतन प्रारम्भ कर दिया,-मानो उसके द्वारा प्रभुने ऐसा बतला दिया कि-धर्म को कर्मोदय के साथ कहाँ सम्बन्ध है ?

(यह चर्चा स्वानुभूति प्रिय सज्जन मुमुक्षुओंको तथा ज्ञानियों को अति रुची है।) पाठक ! स्वानुभव की इस सुन्दर चर्चा द्वारा तुम्हे यह जानकर प्रसन्नता होगी कि तीर्थंकरों का समस्त जीवन कैसा महान, सुन्दर एवं गम्भीर भावोंसे भरा होता है ! और उनके समागमसे जीवों को धर्मकी कैसी उत्तम प्रेरणाएँ प्राप्त होती रहती हैं ! धन्य वह जीवन ! सचमुच सत्पुरुषोंका संग जीवोंको कल्याण का कारण होता है।

शान्तिनाथ और चक्रायुध, तीर्थंकर और गणधर-दोनों राजकुमार युवा.हुए। उनकी उपस्थिती में हस्तिनापुरी के राज दरबार की शोभा बदल जाती थी। विश्वसेन महाराजाने अनेक उत्तम गुणवतीराजकन्याओं के साथ उनके विवाह किये। माता अचिरादेवी तो ऐसे पुत्रसुख प्राप्त करके इतनी तृप्त हो गई थी कि अब उन्हे संसार के किसी सुख की अभिलाषा नही रही थी, मात्र मोक्ष की ही अभिलाषा है।

एक लाख वर्ष की आयुवाले राजकुमार शान्तिनाथ जब पच्चीस हजार वर्ष के हुए तब महाराजाने उनका राज्याभिषेक करके उन्हें हस्तिनापुरीका साम्राज्य सौंप दिया और चक्रायुधकुमार को युवराज पद दिया। ‘अहा, यह तीर्थंकर जैसे स्वामी हमें कहाँ मिलेगे !’ ऐसा विचारकर जगतकी समस्त विभूतियाँ उनके पास आने लगी उनके शासनमें सर्वत्र शान्ति थी। देश-देशके राजा उनका सन्मान करते थे।

जब महाराजा शान्तिनाथ को राज्य का संचालन करते करते-दूसरे पच्चीस हजार वर्ष बीते, अर्थात् वे पच्चास हजार वर्ष के हुए तब अचानक उनके शस्त्र भंडार में चक्रवर्ती पदका सूचक सुदर्शनचक्र प्रगट हुआ; उस चक्ररत्न के साथ ही दैवी छत्र, कृपाण, राजदण्ड, काकिणी, चर्म तथा चूडामणि-ऐसे कुल सात अजीव रत्न उन्हे प्राप्त हुए। उस प्रत्येक रत्न की एक-एक हजार देव रक्षा करते थे। तदुपरान्त उनके महान पुण्योदयसे विशेष पुरोहित, स्थपति, सेनापति और गृहपति हस्तिनापुरीमें उत्पन्न हुए; छह खण्डमें श्रेष्ठ ऐसा कन्या रत्न, गजरत्न तथा अश्वरत्न विजयार्द्ध पर्वत में उत्पन्न हुए, और विद्याधर भक्तिपूर्वक से भेट दे गये। यह सातो रत्न शान्तिनाथ चक्रवर्ती की सेवा करने प्रगट हुए और एक एक हजार देव उस प्रत्येक रत्न की सेवा करते थे। इस प्रकार कुल चौदह रत्न प्राप्त हुए। तदुपरान्त उस पुण्य कालमें समुद्र एवं सरिताओ के संगम के निकट नौ महानिधियाँ प्रगट हुई। उन्हें लाकर देवों ने शान्तिनाथ महाराज की सेवा में अर्पित कर दी थीं। यद्यपि बाह्य में चौदह रत्न प्राप्त हुए, किन्तु उससे पहले प्रभुने तो हजारो वर्ष पूर्व मात्र आठ वर्ष की बाल्यावस्था में ही अंतर में चौदह श्रेष्ठ रत्न प्राप्त कर लिये थे…जिनमें (१) सुदर्शन चक्र जैसा क्षायिक सम्यक्त्व तो पूर्वभवसे ही साथ लाये थे; उसके साथ निःशंकितादि आठ गुण तथा पाँच अणुव्रत-ऐसे चौदह रत्न प्रभु के पास पहले से ही थे, जो कर्मोंको जीतनेवाले तथा क्षायिकलब्धि के अखण्ड नवनिधान को प्राप्त करानेवाले थे; उस अखण्ड चैतन्य निधान के समक्ष छहखण्डके नव निधान को प्रभु तुच्छ मानते थे, तथापि वे नवनिधियाँ प्रभुको महान समझकर उनकी शरण में आयी थीं। पुण्यरूपी लौहचुम्बक के कारण जगतकी सर्वोत्तम वस्तुएँ वहाँ खिंची चली आती थी। वे चक्रके बलसे नहीं किन्तु पुण्य के बल से चक्रवर्ती हुए…और चक्र भी पुण्य के प्रतापसे ही आया था न ! परन्तु वे धर्मचक्री तो सम्यक्त्वरूपी सुदर्शन चक्र के बलसे हुए थे। छहखण्डकी विभूति प्राप्त करनेके लिये उन्हें किसी के साथ युध्द नही करना पडा, छहोखण्डके राजा महाराजा तथा व्यंतरदेव भी उत्तमोत्तम वस्तुएँ ले लेकर स्वेच्छासे प्रभुको भेट देने आते थे और उनकी आज्ञा शिरोधार्य करते थे। अरे, जिनका जन्म होते ही इन्द्र अपनी विभूति सहित सेवा करने आये और चरणों में झुक जाये, वहाँ दूसरों की तो बात ही क्या ?

प्रभु शान्तिनाथ जब धर्म चक्री होंगे तब धर्मचक्र सहित भरत क्षेत्र के मात्र आर्यखण्ड में ही विहार करेंगे, अनार्यखण्डों में नहीं जायेंगे। और वर्तमान में राज्यचक्रवर्तीरूप से उन्होंने सुदर्शन चक्रसहित छहों खण्ड में विहार किया, अनार्यखण्डों में भी गये। अभीतक कोई तीर्थंकर अनार्यखण्डों में नहीं गये थे। भाग्यशाली हुए भी अनार्यखण्ड भी…कि वहाँ के जीवों को भावी तीर्थंकर के दर्शन हुए। चक्रवर्ती के रुप में प्रभु शान्तिनाथ सौराष्ट्र में भी पधारे थे और पश्चात धर्मचक्री तीर्थंकर के रुप में भी उनका सौराष्ट्र में पदार्पण हुआ था; शत्रुंजयगिरिके जिनमन्दिर में विराजमान जिनप्रतिमा आज भी उनका स्मरण कराती है।तीन खण्ड की विजय के पश्चात् प्रभु शान्तिनाथ चक्री जब विजयार्धपर्वतपर गये तब वहाँ रहनेवाले विद्याधर राजाओंने अति हर्षपूर्वक उनका एक परमात्मा जैसा सन्मान किया और (१) विजयपर्वत नामका श्वेत हाथी, (२) पवनंजय नामका उत्तम अश्व तथा (३) सुभद्रानामक सुन्दर कन्या-यह तीन उत्तमोत्तम रत्न उन चक्रवर्ती महाराजा को अर्पण करके महान आदरसहित उनके शासनका स्वीकार किया।विद्याधरों में तीर्थंकर उत्पन्न नहीं होते और सामान्य रुपसे वहाँ कोई तीर्थंकर जाते भी नहीं हैं, परन्तु इस विशेष चौबीसी में एक ही जीव एकसाथ तीर्थंकर एवं चक्रवर्ती-दोनों पदवी के धारक होनेसे विजयार्धपर्वतपर तथा अनार्यखण्डों में भी छद्मस्थ-तीर्थंकर का पदार्पण हुआ,-यह वहाँ के निवासियोंके लिये एक अति आश्चर्यकारी एवं महा आनन्दकारी घटना थी। प्रभुका सुदर्शन चक्र भी धर्मचक्र जैसा ही था, क्योंकि उसके द्वारा कभी किसी जीवकी हिंसा होने का प्रसंग नहीं आता था, इतना ही नहीं, वह चक्रधारी मात्र चक्रवर्ती ही नहीं थे, साथ ही तीर्थंकर भी थे, इसलिये उनके ‘सु-दर्शन’ से भव्यजीव धर्म भी प्राप्त करते थे। प्रभु कहीं हाथी-घोड़े या रत्न आदि देने के लिये छह खण्ड में नहीं गये थे, रत्नों के ढेर तो उनके जन्म से पूर्व ही राजभवन में लग गये थे। अहा, एक भावी तीर्थंकर, तीर्थंकर रुप से अवतरित होने के पश्चात छह खण्ड में विहार करके म्लेच्छ खण्ड के लोगों को भी दर्शन दे वह उनका कितना महान भाग्य ! हे शान्तिनाथ !आपने तो अनार्य जीवों को भी शान्ति प्रदान की . फिर आर्य जीवों की तो बात ही क्या ! वास्तव में-

प्रभु पुनित पगलां ज्यां थया ते देशने पण धन्य छे;
अेनां कर्यां दर्शन अहा ! ते जीव सौ कृतपुण्य छे।

१६

भगवान शान्तिनाथ (भाग ५)

पचम चक्रवर्ती प्रभु शान्तिनाथ को छह खण्ड की दिग्विजय करने में ८०० वर्ष लगे थे। जब कि चक्रवर्ती भरतराजा को ६०,००० वर्ष लगे थे। प्रत्येक चक्रवर्ती अपनी विजयगाथा वृषभाचल पर्वतकी एक शिलापर उत्कीर्ण करता है, -परन्तु वह उत्कीर्ण करने के स्थान के लिये उसे पूर्वकाल के किसी एक चक्रवर्ती का लेख मिटाना पड़ता है; और तब उनका गर्व उतर जाता है कि-अरे, इस भरत क्षेत्र का मैं कोई सर्वप्रथम अधिपति नहीं हूँ, मुझ से पहले तो असंख्य चक्रवर्ती इस पृथ्वी का उपभोग कर चुके हैं और उपभोग करके छोड़ दी है। आज इस शिला पर से उनका नाम भी मिट गया है, मेरा नाम भी मिट जायेगा।-परन्तु प्रभु शान्तिनाथ चक्रवर्ती की बात उन सब चक्रवर्तियोंसे अलग थी, क्योंकि उन सब चक्रवर्तियों में कोई तीर्थंकर नहीं थे .जबकि यह तो चक्रवर्ती के उपरान्त तीर्थंकर भी थे, उन्हें लेख लिखने के लिये किसीका नाम मिटाना नहीं पड़ा; उस शिला के अग्रभाग में उनके पुण्य प्रभावसे नाम लिखने का सुन्दर स्थान बन गया था। वहाँ “इस भरतक्षेत्र के भावी सोलहवें तीर्थंकर शान्तिनाथ महाराजा छह खण्ड की दिग्विजय करके भरतक्षेत्र के पाँचवें चक्रवर्ती हुए…” ऐसा शिलालेख स्वहस्ते वज्र द्वारा उत्कीर्ण किया। (आज भी प्रभुके हस्ताक्षर वहाँ विद्यमान होंगे।)

इस प्रकार हस्तिनापुरीके महाराजा शान्तिनाथ यह दूसरी बार चक्रवर्ती हुए। इससे पहले पूर्व पाँचवें भवमें भी वे विदेहक्षेत्र में क्षेमंकर तीर्थंकर के पुत्र वज्रायुध थे; तब चक्रवर्ती पद प्राप्त किया था और पश्चात् उसे छोड़ दिया था; परन्तु वह चक्रवर्ती पद मानों अब भी प्रभुका संग छोड़ना नहीं चाहता हो इसलिये इस भव में भी उनके पास आया। सच ही है, तीर्थंकर समान उत्तम पुरुष का संग छोड़ना किसे अच्छा लगेगा ? देखो न, भगवान शान्तिनाथ तो राज्य छोड़कर तथा शरीर को भी त्यागकर मोक्ष में पहुँचे…उसे असंख्यवर्ष बीत जानेपर भी, वे चक्रवर्ती और तीर्थंकर पद आज भी उनका पीछा नहीं छोड़ते, इसलिये उनके साथ 'चक्रवर्ती’शान्तिनाथ, ‘तीर्थंकर’ शान्तिनाथ-इसप्रकार विशेषण रुप से लगे हुए ही हैं।

पंचम चक्रवर्ती प्रभु शान्तिनाथ महाराजाने भरतक्षेत्रपर २५००० वर्ष तक राज्य किया। वे मात्र बाह्यराज्य नहीं करते थे, अंतर में सम्यग्दर्शनरुपी ‘सुदर्शन’ चक्र द्वारा अपना चैतन्यसाम्राज्य भी बढ़ा रहे थे। यहाँ चक्रवर्तीपदकी उनकी बाह्य विभूतियों का अधिक वर्णन करने का हमें मन नहीं होता क्योंकि प्रभु जिन्हें स्वयं उपादेय नहीं मानते हों…और कुछ समय पश्चात् जिनको छोड देना हो-उनका क्या वर्णन करें ? परन्तु…हाँ, प्रभुने कितनी विभूतियाँ एक क्षण में छोड दी थीं-उनकी जानकारी देने के लिये यहाँ उन विभूतियोंका संक्षिप्त वर्णन देखो-उन चक्रवर्ती को ९६००० सुन्दर रानियाँ, ६४००० राजकुमार, ९६ करोड गाम, ३२ हजार आज्ञाकारी राजा, लाखों-करोडों की संख्या में हाथी-घोडे-रथ-हल-उत्तम दूध देनेवाली गायें, पैदलसेना, मनवांछित रत्न-आभूषण-मिष्ट पदार्थ आदि देनेवाले अटूट नवनिधान, संसार में सर्वोत्कृष्ट राजकन्या-हाथी-घोडा-चक्र-कृपाण आदि १४ रत्न, नंद्यावर्त नामका भव्य राजभवन, स्वर्गलोक के दिव्य वस्त्राभूषण, १६००० सेवक-देव…आदि…यहाँ लिखने से जिसका पार न आये ऐसा अद्भुत अपार वैभव था…परन्तु वैराग्य होने से उस समस्त वैभव को एक क्षण में छोड़कर प्रभु वन में चले गये और उससे भिन्न प्रकार का रत्नत्रयरुपी अनन्त वीतरागी वैभव प्राप्त किया. उसका वर्णन आप अगले वैराग्य-प्रकरण में पढ़ेंगे।

चक्रवर्ती शान्तिनाथ वैराग्य [हस्तिनापुर : ज्येष्ठ कृष्णा १४]

आज महाराजा शान्तिनाथ चक्रवर्ती का जन्म-दिवस मनाया जा रहा है। हस्तिनापुर में सर्वत्र महान धामधूम चल रही है। प्रभुके अवतार को आज ७५ हजार वर्ष पूरे हुए हैं। चारों ओर मंगलवाद्य बज रहे हैं; यत्र-तत्र ध्वजा-पताकाएँ और घर-घर तोरण-बन्दनवार शोभा दे रहे हैं। देश-देश से उत्तम भेट लेकर एक हजार राजा उत्सवमें सम्मिलित होने आये हैं। महाराजा शान्तिनाथ भी राजदरबार में जाने की तैयारी करके दर्पण में मुँह देख रहे है. इतने में तो… ‘…अरे, यह क्या !’ महाराजा अचानक चौंक पड़े…दर्पण के प्रतिबिम्ब में पहले जो सुन्दर रुप दिखायी दिया वह दूसरे क्षण बदल गया दिखा ! ‘क्षणभर में ऐसा परिवर्तन !’ शरीरकी ऐसी क्षण भंगुरता !’ [अथवा चक्रवर्तीपद और मुनिदशा यह दोनों रुप उन्हें दिखायी दिये] उसीसमय उन्हें अपने निर्मल ज्ञानदर्पण में अपने अनेक भवों के अनेक रुप दृष्टिगोचर हुए…मैं ही सर्वार्थसिध्दि में था और मैं ही धनरथ तीर्थंकर का पुत्र था…तथा विदेहक्षेत्र के क्षेमंकर तीर्थंकर का पुत्र वज्रायुध चक्रवर्ती भी मैं ही था। अरे, दूसरे भोगों की तो क्या बात ! यह चक्रवर्तीपद की विभूति भी मेरे लिये कोई नवीन नहीं है,-पूर्वभवमें यह भी मैं प्राप्त कर चुका हूँ, इतना ही नहीं, उसे छोड़कर मैंने साधुदशा भी ग्रहण की है…मेरे रत्नत्रयनिधान के निकट अन्य किसी निधान का क्या मूल्य है !

इस प्रकार दर्पणके दिखायी दिये प्रतिबिम्ब के निमित्तसे अपने पूर्व भवों का जातिस्मरण होते ही प्रभु शान्तिनाथ चक्रवर्ती वैराग्य को प्राप्त हुए, और विचारने लगे कि-अरे, मेरे जीवनके ७५ हजार वर्ष बीत गये ..मुझे अभी केवलज्ञान की साधना करना है।अब इन क्षणभंगुर वैभवों में या राग में रुकना मेरे लिये उचित नहीं है। बस, मै आज ही इस राजवैभव को छोड़कर दीक्षा अंगीकार करूँगा और जिन बनूँगा। जन्म दिवसका उत्सव बन्द करो। जन्मसे आत्मा की शोभा नहीं हैं, जन्म तो आत्मा के लिये कलंक हैं; मुझे अब यह लज्जाजनक जन्म पुनः नहीं लेना है। अब शुद्धोपयोगी होकर हम केवलज्ञान प्राप्त करके मोक्षकी साधना करेगे।-ऐसे चिन्तनपूर्वक प्रभु दीक्षा लेने को तैयार हुए।

राजसभामें खलबली मच गई। अरे इन्द्रसभा भी आश्चर्य में पड गई। प्रभु राजपाट छोडकर दीक्षा ले रहे हैं-यह जानते ही लोग स्तब्ध रह गये। नृत्यकारोंका नृत्य रुक गया और बजानेवालोंके वाद्य अटक गये। क्या किया जाय ? किसी को कुछ सुझ नहीं रहा था। अरे, अभी जन्मोत्सव के समय प्रभु दीक्षा ग्रहण करेगे ? क्या होता है उसकी प्रतिक्षा में सब आतुरतासे प्रभुकी ओर देख रहे थे।

महाराजा शान्तिनाथ तो अपने वैराग्य चिन्तन में एकाग्र है, बारह भावनाओं द्वारा संसार की असारता का चितवन करके, परम सारभूत निजपरमात्मतत्त्वमें उपयोग लगा रहे है। इतने में आकाशमें से ब्रह्मस्वर्ग के लौकान्तिक देव वहाँ उतरे। श्वेतवस्त्रधारी वे वैरागी देव जैनऋषियोंके समान शोभते थे; उन्होने आकर तीर्थंकर के चरणों में वदन किया और उनके परमवैराग्यकी प्रशंसा की-अहो देव ! आप इस भरत क्षेत्र के १६ वे तीर्थंकर है, दीक्षा सम्बन्धी आपके विचार उत्तम है; आप दीक्षा लेकर केवलज्ञान प्रगट करेंगे और जगत के जीवों को मोक्षमार्ग दर्शायेंगे। भरतक्षेत्र में अनेक वर्षोंसे विच्छिन्न धर्मप्रवाह को पुनः अविच्छिन्न धारारुप करने का समय आ गया है, और वह आपके द्वारा ही होगा। धन्य है यह चारित्र का अवसर ! हम भी इस अवसर के लिये लालायित है, इस लिये आपके चारित्र का अनुमोदन करने आये है। ऐसी स्तुति एव वन्दनाके पश्चात वे लौकान्तिक देव पुनः ब्रह्मस्वर्ग में चले गये उसी समय करोड़ो देवोंके साथ प्रभुका जयजयकार करते हुए स्वर्गसे इन्द्र आ पहुँचे। प्रभुको दीक्षावन मे ले जाने के लिये स्वर्गलोकसे ‘सर्वार्थसिद्धि’ नामक दिव्य शिबिका भी वे साथ लाये थे। उस अवसर एक ओर तो महाराजा शान्तिनाथ ने राजपुत्रको राज्य सौंपकर उसका राज्याभिषेक किया और दूसरी ओर इन्द्रोने भगवान शान्तिनाथ का दीक्षा अभिषेक करके स्वर्गलोकसे लाये हुए दिव्य वस्त्राभूषण पहिनाये। आश्चर्य होता है कि जन्माभिषेक की भाँति प्रभुके दीक्षाकल्याणक के अवसर भी इन्द्रने क्षीरसागरके जलसे प्रभुका अभिषेक किया और स्वर्ग लोक के उत्तम वस्त्राभूषण पहिनाए ! बस भगवान शान्तिनाथ का संसार में यह अन्तिम स्नान एव अन्तिम वस्त्र थे !

दीक्षा से पूर्व भगवान की स्तुति करते हुए, इन्द्रने कहा-हे देव ! मोक्षगमन हेतु आपकी तीव्र वैराग्य धारा देखकर बेचारा चारित्र मोह मृत्यु के डर से काँप रहा है .. और आपसे मिलने को आतुर मोक्षसुन्दरी प्रसन्न हो रही है। हे प्रभो ! संसार के धर्म, अर्थ और काम-यह तीन पुरुषार्थ तो आपने अनेक भावसे सिद्ध कर लिये है; अब मोक्ष पुरूषार्थ का अवसर आया है यह महान आनन्द की बात है। काम, पुरुषार्थ द्वारा आप कामदेव हुए, अर्थपुरुषार्थ द्वारा आप चक्रवर्ती हुए और धर्म (पुण्य ) पुरुषार्थ द्वारा आप तीर्थंकर हुए; अब अन्तिम मोक्ष पुरुषार्थ द्वारा आप परमात्मा होंगे।

वैराग्यपूर्वक सबसे विदा लेकर प्रभु वनगमन हेतु शिबिका में आरुढ हुए। वाह, शिबिका भी कैसी ? जिसका नाम ‘सर्वार्थसिद्धि’। ‘सर्वार्थसिद्धि’ से आये हुए भगवान पुनः ‘सर्वार्थसिद्धि’ में आरुढ हुऐ और अपने ‘सर्वअर्थ की सिद्धि’ हेतु वनगमन किया। प्रभु जब शिबिका में आरुढ होने लगे तब इन्द्रने अपने हाथ का सहारा दिया। कुछ लोगोंको ऐसा लगा कि ‘अरे, इन्द्र महाराज भूले; तीर्थंकर को कहीं उनके सहारे की आवश्यकता पड़ती होगी ?’…परन्तु नहीं; वे भूले नहीं थे। वे इन्द्र भी महान बुद्धिशाली थे; वे जानते थे कि ‘मैं भी अब यह इन्द्रपर्याय पूर्ण होनेपर मनुष्य होऊँगा और प्रभुके समान ही जिन दीक्षा लेकर केवलज्ञान प्रगट करके मोक्ष प्राप्त करूँगा। मोक्षकी साधना तो चली ही रही है और अब मेरा भी भव का अन्त निकट है।’ -यह बात इन्द्रने प्रभुको अपना हाथ देकर प्रसिद्धि की ..इस प्रकार प्रभुके साथ मोक्षमार्ग में सहचर हुए। वाह इन्द्रराज ! धन्य है तुम्हें …तुम तीर्थंकर प्रभुके मात्र सेवक नही हो, तुम तो तीर्थंकर के सहचर हो।

शिबिका मे बैठकर शान्तिनाथ भगवानने जब वनगमन किया तब प्रथम राजाओंने, पश्चात् विद्याधर राजाओंने और तत्पश्चात् इन्द्रोंने वह शिबिका कन्धोपर उठायी और आकाशमार्गमे चलने लगे। उस समय देवोके करोडो वाद्य बज रहे थे; उनके द्वारा इन्द्र ऐसी घोषणा कर रहे थे कि-भगवान शान्तिनाथ अब मोहपर विजय प्राप्त करने जा रहे है; भगवान अब त्रिलोक का श्रेष्ठ साम्राज्य जीतने जा रहे है। भगवान विजयी हो ! हे जीवो ! तुम भी मोहको जीतने के लिये भगवान के मार्ग में आओ !’ इन्द्र की घोषणा सुनकर लोग वैराग्य की महिमा करते थे-अहा, छहखण्डका वैभव छोडकर भगवान मोक्षकी साधना करने जा रहे है . तो वह मोक्षसुख कितना महान होगा ! इस प्रकार जीवों के परिणाम भोगोंसे विमुख और मोक्षके सन्मुख हो रहे थे … और भोगी से योगी बनने जा रहे शान्तिनाथ भगवान पर सबकी दृष्टि केन्द्रित थी। उस समय लोग कोई शोक या रुदन न करके आनन्द पूर्वक मंगल आशीष दे रहे थे कि हे प्रभो ! आप मुक्तिकी साधना हेतु जा रहे हैं…आपकी मोक्ष साधना शीघ्र सफल हो और हमे भी मोक्ष पथ की प्रेरणा दो। शांतरस में झूलते हुए वे वैरागी महाराजा शान्तिनाथ भी अतिमधुर शांत दृष्टिसे नगरजनोंको देख लेते थे। अहा, प्रभुकी पावन दृष्टि पडते ही वे प्रजाजन अपने को धन्य मानते थे कि ’ प्रभुने हमारी ओर दृष्टि की !’

उन चक्रवर्ती महाराजाके वनगमन के समय उनकी हजारों रानियाँ क्या रुदन करके सिर पीटकर बैठ गई थीं?-नही; वे कोई सामान्य स्त्रियाँ नहीं थी, एक भावी तीर्थंकर के साथ हजारो वर्ष रहनेवाली वे रानियाँ शूरवीर थी, धर्मसंस्कारी थीं और कितनी ही सम्यग्दृष्टि भी थीं। हाँ, इतना अवश्य हुआ कि अपने स्वामी के अचानक वैराग्य की बात सुनकर उन्हे आघात लगा। इन्द्राणी उन्हे आश्वासन देने का विचार कर रही थी, इतने में तो उन रानियोंने स्वयं विवेक बुद्धि से समाधान करके शूरवीरता से दृढनिश्चय किया कि-हम जिसप्रकार भोगमें स्वामी की सहचरी थी उसी प्रकार अब योग में भी स्वामी के साथ रहेंगी। प्रभु जब वनमें रहे तब हमारे लिये राजमहल में क्या उचित है ?-नही; हम भी अब देशव्रत धारण करके वैराग्य जीवन जियेंगे। हमारे स्वामीको जब केवलज्ञान होगा तब हम भी समवसरणमें जाकर आर्यिका बनेगे और प्रभुके चरणोमे रहकर आत्मकल्याण करेंगे। इस प्रकार वे रानियाँ भी अब राजवैभव के प्रति बिलकुल उदासीन होगई थी और देशव्रत का पालन करते हुए उत्तम श्राविकाओं जैसा वैरागी जीवन जीने लगी थी। इन्द्राणीने उनकी प्रशसा करते हुए कहा-तुम्हें तो इस भवमें देशव्रत का अवसर है, परन्तु हमे इस देवीपर्याय मे संयमका कोई अवसर नही है। तीर्थंकरके संग से तुम्हारा जीवन धन्य हुआ है।

हजारो वर्ष से चक्रवर्ती की सेवा करनेवाले १६००० देव, प्रभुका वैराग्य देखकर खेदखिन्न होकर हाथ जोडे खड़े थे कि- अरे, जिनकी सेवासे हमे आनन्द मिलता था वे हमारे स्वामी तो दीक्षा ले रहे है; हम भी यदि मनुष्य होते तो अपने स्वामी के साथ ही दीक्षा ग्रहण करते ! अब तो, जब वे केवलज्ञान प्राप्त कर धर्मचक्री बनेगे तब समवसरण मे जाकर उनकी सेवा करेंगे और दिव्यध्वनि सुनकर आत्मकल्याण करेगे। पहले राजचक्री और फिर धर्मचक्री-इस प्रकार एक ही भव मे दो चक्रवर्ती पद प्राप्त करनेवाले भगवान शान्तिनाथ की सेवा का अवसर हमे प्राप्त होगा-ऐसा मानकर उन देवों ने मन मे सतोष किया।

प्रभुशान्तिनाथ की दीक्षायात्रा ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी चक्रवती के १४ रत्नों मे से सेनापति आदि रत्नों ने तो प्रभुके साथ दीक्षा ले ली, सुदर्शन चक्रादि अजीव रत्नों के अधिष्ठाता देव प्रभु को वदन करके चले गये। अरे, पुण्यसंयोग तो कहाँ तक स्थिर रह सकते हैं ? मुमुक्षु जीव तो स्वेच्छासे उसे छोड़कर मोक्षमें चले जाते हैं। जिसकी एक हजार देव सेवा करते थे वह गजरत्न, अर्थात् चक्रवर्ती के ८४ लाख हाथियों में श्रेष्ठ हाथी,-वह भी विचारने लगा कि-अरे, मुझपर आरूढ़ होने वाले स्वामी तो सब छोड़कर वन में जा रहे हैं…फिर मैं यहाँ राज्य में रहकर क्या करूँगा ?-ऐसा विचारकर वह विजय हाथी भी प्रभुके पीछे-पीछे वनमें चला गया और वैराग्यपूर्वक प्रभुके निकट ही रहने लगा। धन्य उस हाथी को !

प्रभु के जन्मोत्सव में सम्मिलित होने के लिये आये हुए एक हजार राजा भी प्रभुके साथ ही दीक्षा लेने हेतु तैयार हुए; चक्रवर्ती के भाई चक्रायुध कुमार भी दीक्षा ग्रहण करने हेतु तत्पर थे;-इस प्रकार अनेक राजपुत्र तथा हजारों मुमुक्षु जीव दीक्षा लेने के लिये बनकी ओर चले। अहा, हजारों जीवोकी दीक्षा हेतु बनयात्रा अद्भुत लगती थी…मानो मोक्ष की शोभायात्रा निकाली हो…जिसमें इन्द्रों द्वारा उठायी हुई सर्वार्थसिद्धि-शिबिका में मोक्षसुन्दरी के वर शान्तिनाथ (तीर्थंकर) शोभायमान हो रहे थे, साथ में उपवर समान चक्रायुध (गणधर) शोभा दे रहे थे…और मोक्ष के बराती जैसे हजारों राजा, लाखों प्रजाजन, हाथी आदि तिर्यंच तथा वैराग्यभावना में तत्पर देव उस दीक्षाकल्याणक की वैराग्ययात्रा को सुशोभित कर रहे थे। देवों के करोड़ों बाजे बज रहे थे और उनमें से वीतरागता के स्वर निकल रहे थे।

प्रभु की शिबिका दीक्षावन में आयी। वन भी कैसा?- जिसका नाम है ‘सहस्राम्रवन!’ (जिस प्रकार गिरनार में सहस्र-आम्रवन नेमिनाथ प्रभुकी दीक्षा का धाम है, उसी प्रकार हस्तिनापुर का यह सहस्राम्रवन शान्तिनाथ प्रभु की दीक्षाका धाम है।) जहाँ आमके वृक्ष हैं और उन पर अति सुन्दर हजारों आम्रफल झूल रहे थे। आम्रवृक्ष भी हर्षित हो रहे है कि-वाह, प्रभु जब मुनि होकर यहाँ आत्मध्यानमें विराजमान होंगे…तब हम उनपर शीतल छाया फैलकर उनकी सेवा करेंगे और प्रभु शान्तिनाथ के सान्निध्य से हमारे वनमें सर्वत्र परमशान्ति फैल जायगी;-इस प्रकार वे आम्रवृक्ष ‘अशोक वृक्ष’ जैसे गौरव का अनुभव कर रहे थे।

वैरागी महाराजा शान्तिनाथ पालकी से उतरे और एक शुद्ध शिला पर उत्तराभिमुख बैठ गये। बाजे शांत हो गये, कोलाहल थम गया, विभाव भी शांत हो गये, सारे वनमें शान्ति छा गयी। प्रभु शान्तिनाथने शांतभाव धारण करके मस्तक से मुकुट उतारा, गले से हार निकाल दिया, वस्त्राभूषण उतार दिये…उपयोग को स्थिर करके, हाथ जोड़कर ॐ नमः सिद्धेभ्यः ऐसे उच्चारण पूर्वक सिद्ध भगवन्तों को नमस्कार किया। (छद्मस्थ दशामें प्रभुका यह अन्तिम वाक्य ..संसार दशामे यह उनका अक्षरात्मक वचन; पश्चात् छद्मस्थ मुनिदशा में वे सम्पूर्ण मौन रहे और केवली होनेपर वाणी निकली, – तो निरक्षरी दिव्यध्वनि थी।) सिद्धों को वन्दन करके पश्चात् प्रभुने सिरके काले घुंघराले कोमल केशों का स्वहस्त से लोच किया, साथ ही साथ भीतरके मोह का लुंचन कर दिया। अहा, शरीर से उदासीनताकी वह चरमसीमा थी। बाह्य तथा अभ्यंतर परम , दिगम्बर हुए वे निर्ग्रन्थ-मुनिराज तत्क्षण शुद्धोपयोगी होकर आत्मध्यान में एकाग्र हो गये…उपयोग की विशुद्धता द्वारा अपने आत्मा को सामयिक चारित्र में स्थिर किया। (तीर्थंकर मुनिराज का चारित्र उत्तम सुविशुद्ध होता है, उसमें कोई दोष नहीं लगता, इसलिये उनको छेदोपस्थापना या प्रायश्चित नहीं होता।)

ध्यान में स्थिर होते ही उन परम श्रमण को सातवाँ गुणस्थान तथा चौथा ज्ञान प्रगट हुआ; ज्ञानके साथ सर्वोत्कृष्ट ऋद्धि-सिद्धियाँ प्रगट हुई और कषायभाव दूर भागे। मिथ्यात्व एवं चार कषाय तो असंख्य वर्ष पहले पूर्वभवों में ही सर्वथा नष्ट हो गये थे; दूसरे चार कषाय आठ वर्ष की बाल्यावस्था में ही प्रभुने छोड़ दिये थे; तीसरे चार कषाय अभी-अभी ध्यानके समय दूर हो गये और चौथे चार कषाय भी निर्जीव समान होकर मृत्युशय्या पर पड़े हैं। प्रभु शान्तिनाथ वीतरागतासे सुशोभित हो उठे…चक्रवर्तीत्व के काल में जो शोभा थी उसकी अपेक्षा मुनिदशा में उनकी शोभा एकदम बढ़ गई। सच ही है कि-वीतरागता में जो शोभा है वैसी राग में कहाँ से होगी ? निर्ग्रन्थता में जो सुख है वह परिग्रह में कहाँ से होगा ?-नहीं हो सकता। इसलिये हे प्रभो ! आपने चक्रवर्तीपद छोड़ा वह कोई दुःखकी बात नहीं है; आपने तो उससे भी महान ऐसा परमेश्वर पद प्राप्त करने के लिये चक्रवर्ती पद छोड़ा हैं; परम अतीन्द्रिय सुख प्राप्त करनेके लिये इन्द्रियसुखों का त्याग किया है; चंचल एवं अशुचिपूर्ण ९६००० रानियों को छोड़ कर स्थिर एवं पवित्र ऐसी मुक्तिसुन्दरी में आसक्त हुए हैं; मोक्षके तीन रत्नों को प्राप्त करके आपने संसार के चौदह रत्न छोड़े है। इस प्रकार हे प्रभो ! आपने जो त्याग किया उसकी अपेक्षा अधिक ग्रहण किया है। वास्तव मे आप ही हेय-उपादेयका परम विवेक करनेवाले हैं। आप स्वयं मोक्षमार्ग हो, आप स्वयं ही धर्म हो। क्योंकि-

आगम में कौशल्य है अरु मोहदृष्टि विनष्ट है;
वीतराग चरितारूढ हैं…वे मुनिमहात्मा धर्म हैं।

प्रभु शान्तिनाथने चक्रवर्ती पद से निकलकर परमेष्ठीपदमें प्रवेश किया। बारह भव के साथी ऐसे उनके भाई चक्रायुधकुमारने भी प्रभुके साथ ही जिनदीक्षा ग्रहण की; अन्य हजारों राजा भी मुनि हो गये। जो मुनि नही बन सके ऐसे लाखों जीवोंने वैराग्यपूर्वक श्रावक के व्रत लिये, कुछ तिर्यंच जीव भी वैराग्य पाकर व्रतधारी हुए।

‘अरे, यदि बाह्य विषयोमे सुख होता तो इन चक्रवर्ती महाराजा के समक्ष तो जगतके सर्वोत्कृष्ट भोगोपभोग विद्यमान थे, फिर उन्हे स्वेच्छा से त्यागकर वे वनवासी मुनि क्यों हाते ? और आत्मध्यान क्यों करते ? और उस चक्रवर्ती पद की अपेक्षा इस समय मुनिदशा में वे अधिक सुखी हैं-यह स्पष्ट दिखायी देता है; इसलिये निश्चित् होता है कि बाह्यसामग्री में, विषयभोगो मे या उनके संग में कहीं सुख है ही नही। सुख तो चैतन्यस्वरुप की अनुभूति मे ही है। सुख आत्मा का स्वभाव है और उसके ध्यान में जो अतीन्द्रिय शान्ति का वेदन होता है वही सच्चा पारमार्थिक सुख है।’

भगवान शान्तिनाथ की ध्यानदशा देखकर अनेक जीव आत्मा के अतीन्द्रिय सुख की प्रतीति करके सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए। तीर्थंकर प्रभु के दीक्षाकल्याणक का मंगल महोत्सव अनेक जीवों के कल्याण का कारण हुआ।

मुनिराज शान्तिनाथ बारम्बार शुद्धोपयोगी होते थे। दीक्षा के पश्चात् दो दिन के उपवास करके वे ध्यान के प्रयोग में रहे। पश्चात् तीसरे दिन पारणे हेतु मन्दिरपुरी में पधारे। अहा, साक्षात् मोक्षमार्गरुप ऐसे अद्भुत उत्तमसुपात्र को अपने प्रागण मे देखते ही राजा सुमित्र को अपार हर्ष हुआ; उसने भक्तिसहित पड़गाहन किया-‘प्रभो ! पधारो.. पधारो…पधारो !’ मुनिराज शान्तिप्रभु के खड़े रहने पर सुमित्र राजाने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक प्रदक्षिणा करके पुनः पुनः नमस्कार किया; उस समय उन राजा का मन शुद्ध था, वचन शुद्ध था, काया शुद्ध थी, आहार-जल शुद्ध थे; उन्होंने भक्तिसे प्रभुके चरणों का प्रक्षालन किया, साथ ही अपने पाप भी धो डाले; मुनिराज को उच्चासन पर विराजमान करके अर्घ्य द्वारा पूजा की। इस प्रकार नवधाभक्तिसहित मुनिराज के कर कमल में आहारदान दिया। उस समय उन्हें परम प्रसन्नता हो रही थी, -होगी ही न ! क्योंकि तीर्थंकर को मुनिदशा में प्रथम आहारदान दाता के रुप में उन्हें तद्भवमोक्षगामीपना प्राप्त हुआ था। अपने मोक्ष से किसे आनन्द नहीं होगा ?! उस आहारदान के हर्षोपलक्ष में उसी समय आकाश में (१) देवों के दुंदुभि वाद्य बज रहे थे; (२) रत्नवृष्टि हो रही थी; (३) अहो दानं…महादानं…कहकर देव उस दानकी प्रशंसा कर रहे थे; (४) शीतल वायुसहित सुगन्धित जल की बूँदें गिर रही थीं, और (५) देव पुष्पवर्षा कर रहे थे। वहाँ दान उत्तम था, दाता महान थे और सुपात्र तो सर्वोत्कृष्ट थे, -इसलिये पुण्यप्रभाव से तत्काल वहाँ पंचाश्चर्य प्रगट हुए।

अहा, कुछ ही समय पूर्व जो छहखण्ड के अधिपति थे और सुवर्ण एव रत्न के थाल में भोजन लेते थे, वे आज सर्वथा वस्त्र-पात्रके परिग्रह रहित होकर, रागरहित होकर हाथ के पात्र में खड़े रहकर भोजन करते हैं। वाह, जैन मुनियों की वीतरागता ! वह जगत में अद्वितीय है। २८ मूलगुणों के धारी उन शुध्द दिगम्बर मुनिराज का चित्त अतीन्द्रिय आनन्द के भोग में ऐसा प्रीतिवान बन गया था कि पूर्व में भोगे हुए चक्रवर्ती पद के भोगों का उन्हें स्मरण भी नही होता था। पाँच इन्द्रियों के विषयों का तथा क्रोधादि कषायों को उन्होंने जीत लिया था और बाईस प्रकार के परीषह सहन करने का उनमें सामर्थ्य था यद्यपि वे तीर्थंकर होने से दंशमशक-अदर्शन आदि अनेक उपसर्ग-परीषह तो उनके आते ही नहीं थे। पुण्य प्रताप से सर्व ऋतुएँ तथा धरती उनके अनुकूल बन जाती थी, इसलिये शीत-उष्ण या काँटे-कंकरादि परीषह उनके आते ही नहीं थे, तथा कोई क्षुद्र जीव-जन्तु उनको उपद्रव नहीं करते थे, उल्टे उनके सान्निध्य में दूसरों के उपद्रव भी दूर हो जाते थे।

परम साम्यभाव से कहीं भी रागके प्रतिबंध बिना आत्मसाधना करते-करते उन शान्तिनाथ मुनिराजने १६ वर्ष तक सुक्षेत्र में विहार किया। वे जहाँ-जहाँ आते वहाँ-वहाँ सैकड़ों कोस तक सर्व जीव शांत परिणामी हो जाते थे; कहीं भी वैर-विरोध, अशान्ति या दुष्काल नहीं रहता था; सर्व जीवों के अंतरमें मैत्रीभाव का पवित्र झरना बहता था। वहाँ सिंह से लगकर शशक आराम से सोते थे; गायका बछड़ा सिंहनी को अपनी माता समझकर उसका स्तनपान करता था और सिंहनी उसे जिह्वा से चाँटकर प्यार करती थी। सिंहनी का बच्चा प्रेमसे गाय का दूध पीता और गाय निर्भय होकर प्रेमपूर्वक उसे देखती रहती थी। नेवला और सर्प दोनों साथ खेलते थे। प्रभुके सान्निध्य में सर्व जन अति वात्सल्यपूर्वक एक-दूसरे की धर्मभावना पुष्ट करते थे। भगवान् शान्तिनाथ मुनिदशा में यद्यपि मौन रहते, तथापि उनके शांत नेत्रों एवं उपशांत मुद्रासे झरते हुए शांतरस को देखकर भव्यजीव आत्माके शांत स्वभाव का दर्शन कर लेते थे। आत्मा का स्वभाव क्रोधादि रहित कैसा शांत है-वह प्रभु की मुद्रा मौन रहकर भी दरशा रही थी। यद्यपि प्रभु एकलविहारी-जिनकल्पी थे, तथापि चक्रायुध आदि मुनिवर और वह हाथी भी उनके सान्निध्य मे ही रहा करते थे। तीर्थंकर का सहवास छोड़कर दूर रहना किसे अच्छा लगेगा ?

इस प्रकार १६ वर्ष तक मौन रूप से आत्मसाधना करके मोक्षमार्ग में आगे बढ़ते-बढ़ते शान्तिनाथ मुनिराज पुन हस्तिनापुरी के सहस्राम्रवनमें पधारे। हस्तिनापुरी के प्रजाजन अपने महाराजा को मुनिदशा में देखकर अत्यन्त हर्षित हुए। जहाँ दीक्षा ली थी उसी वन में आकर मुनिराज शान्तिनाथ ध्यानस्थ हुए। साथ मे चक्रायुध आदि हजारों मुनिवर भी वैराग्यवन मे आत्मध्यान कर रहे थे ।

[-फिर वहाँ जो महान आनन्दकारी घटना हुई-उसका वर्णन अब पढ़ेंगे ।]

के…व…ल…ज्ञा…न पौष शुक्ला एकादशी का मंगल-दिन है; हस्तिनापुरी के सुन्दर उद्यान मे हजारों आम्रवृक्ष असमयमें (पौष मासमें) ही आम्रफलों के भार से झुक गये हैं, क्योंकि मुनिराज शान्तिनाथ प्रभु उस वनमें विराजमान हैं और आत्मध्यान कर रहे हैं। पहले सुदर्शनचक्र द्वारा छह खण्ड को जीतने वाले प्रभु, अब मुनिदशा में शुद्धोपयोग द्वारा मोह पर विजय प्राप्त करने तथा अखण्ड ज्ञान को साधने के लिये तीन करण द्वारा सुसज्ज हो गये हैं। ‘मोह का सर्वथा नाश करने तथा नव क्षायिकलब्धियों सहित केवलज्ञान-साम्राज्य की प्राप्ति में यह पुण्यजन्य ऐसा सुदर्शनचक्र काम नहीं आयगा’-ऐसा समझकर प्रभुने उस चक्र को छोड़ दिया और शुक्लध्यानरूपी धर्मचक्र धारण किया। उस चक्रके तेज से भयभीत होकर कर्मकी अनेक प्रकृतियाँ नष्ट हो गई, अधिकांश कर्मप्रकृतियों का आना रुक गया; अरे, मेघरथके तीसरे भवसे प्रारम्भ हुई और असंख्यवर्षों से सतत बाँधती हुई ऐसी वह तीर्थंकर प्रकृति भी अब अटक गई थी। मोक्षकी सम्पूर्ण साधना में सतत उद्यमवंत उन महामुमुक्षु को अब किंचित् भी कर्मबंधन कैसे रुचता ? वे मोह की अधिकांश सेना का नाश तो पहले शुद्धोपयोग द्वारा कर ही चुके थे, शेष रहे साधारण मोह को मारने में क्या देर ? शुक्लध्यान चक्र द्वारा शीघ्रता से संज्वलन कषाय पर प्रहार करके उसे नष्ट कर दिया और वीतरागता प्राप्त कर ली। रागके अत्यंत अभाव के कारण अब उन्हें किसी कर्म का बंधन नहीं होता था, मात्र निर्जरा ही होती थी। इस प्रकार मोह के विशाल समुद्र को पार कर लेने के पश्चात् तुरन्त पुन. वह शुक्लध्यान चक्र चलाकर, शेष तीनों घातिकर्मरूपी ‘अरि’ को एकसाथ ‘हनकर’ प्रभु ‘अरिहंता’ हुए और नव क्षायिकलब्धियों के अक्षयनिधान "सहित केवलज्ञान-साम्राज्य प्राप्त कर लिया। [नमो अरिहंताणं] पहले चक्र द्वारा छह खण्ड साधने में प्रभुको ८०० वर्ष लगे थे; जबकि साधु होकर शांत भावरूप इस धर्मचक्र द्वारा केवलज्ञान का अखण्ड साम्राज्य तो उन्होंने मात्र १६ वर्ष में ही साध लिया !

हे अरिहंत ! हमें आश्चर्य तो इस बात का होता है कि-मोह जैसे महान शत्रुको तथा घातिकर्मों जैसे वैरियों का घात करने में आपने किंचित् क्रोध नहीं किया, क्रोध के बिना ही मात्र शांत वीतराग भाव द्वारा आपने उन्हें नष्ट कर दिया। वास्तव में वीतरागता की शक्ति कोई आश्चर्यकारी है…और आपका ‘शान्ति’ नाम सार्थक है। जिस प्रकार हिम-प्रपात अपनी शीतल शक्ति द्वारा भी बड़े-बड़े वृक्षोंको जला देते है, उसी प्रकार हे देव ! आपने भी वीतरागी शांतभाव की अद्भुत शक्ति द्वारा महामोहशत्रु को क्षणमात्र में नष्ट कर दिया। उसके द्वारा आपने हमें ऐसा समझाया कि- ‘शान्ति’ में जितनी है उतनी शक्ति क्रोध में या राग में नहीं है। मोक्ष की साधना शांतभाव द्वारा ही होती है, क्रोध के या राग के द्वारा नहीं। इस प्रकार आपकी साधना ने हमें शान्ति और क्रोध बीच भेदज्ञान कराया है। जो महान कार्य आपने वीतरागता द्वारा किया वह कार्य क्या कोई क्रोधी या रागी जीव कर सकता है ? -कदापि नहीं। अहो देव ! आप वीतरागता के बलसे अपनेमे से ही केवलज्ञान निधान प्रगट करके स्वयंभू परमात्मा हुए; अनन्त चतुष्ट्य द्वारा आप धर्मसाम्राज्य के नायक धर्मचक्रवर्ती हुए; इन्द्रियो से पार होकर आप स्वयं परिपूर्ण ज्ञान एवं सुखरूप परिणमित हो गये। वह दशा परम इष्ट है…इसलिये आपकी स्तुति द्वारा हरि उसका अनुमोदन करते हैं :-सर्वज्ञ लब्धस्वाभव ने त्रिजगेन्द्र-पूजित ऐ रीते, स्वयमेव जीव थयो शको तेने ‘स्वयंभू’ जिनो कहे। प्रक्षीण घातीकर्म, अनहद वीर्य अधिक प्रकाशने इन्द्रिय-अतीत थयेल आत्मा ज्ञान सौख्ये परिणमे। अत्यंत, आत्मोत्पन्न, विषयातीत, अनुप, अनंत ने विच्छेदहीन छे सुख अहो ! शुद्धोपयोग-प्रसिद्ध ने। ‘अहो उस सहजज्ञान एवं सहजसुख की अचिन्त्य महिमा !’

भगवान शान्तिनाथ सर्वज्ञ होकर ऐसे ज्ञान एवं सुखरूप परिणमित हुए। तीनों लोक में आनन्दमय आश्चर्य से खलबली मच गई। उसी समय तीर्थंकर प्रकृतिरूपी दासी प्रभुकी सेवाके लिये इन्द्रादि देवों को बुला लायी। देवों ने आकर भक्तिपूर्वक उन सर्वज्ञ परमात्मा की पूजा की…और सोलहवें तीर्थंकर का केवलज्ञान कल्याणक महोत्सव मनाया। कुबेर ने स्वर्गलोककी उत्तम सामग्री द्वारा दिव्य शोभायुक्त समवसरण की रचना की; इन्द्रानी ने उसमे रत्नों का चौक पूरा; करोड़ों दुंदुभि वाद्य मधुर स्वर में मानो भव्य जीवों को बुला रहे थे कि-आओरे आओ.. हे जीवों ! जिन्हे मोक्ष साधना हो वे यहाँ आओ ! आत्मकल्याण हेतु अन्य समस्त कार्य छोड़कर यहाँ आओ। आओ और इन शान्तिनाथ प्रभु की सेवा करो। आत्मा के अनन्त-अक्षय निधान देखना हों तो इन प्रभुके वीतराग मार्ग का अनुसरण करो।

भो भो भव्यो ! अवधुणी तमारा प्रमादो सहु ने,
आवी सेवो, शिवपुरीतणा सार्थवाह प्रभुने।

हस्तिनापुरी के भाग्यवान नगरजनोंने शान्तिनाथ प्रभुके गर्भ-जन्म-तप ऐसे तीन कल्याणक पहले देखे थे और आज अपनी नगरी मे चौथे ज्ञानकल्याणक का महोत्सव प्रत्यक्ष देखा। अहा, धन्य वह नगरी और धन्य वे जीव !

जिस समय शान्तिनाथ प्रभुको पचमज्ञान प्रगट हुआ उसी समय उनके भ्राता चक्रायुध मुनिराज को भी उन्ही के सान्निध्य मे चौथा ज्ञान प्रगट हुआ। दो सहोदरों में से एक तीर्थंकर हुए और दूसरे गणधर। दिव्य समवसरण की बारह सभाएँ देवो, मनुष्यों एव तिर्यंचों से भर गई। आश्चर्य है कि वहाँ स्थान के माप की अपेक्षा बैठनेवाले जीवों की संख्या अत्यधिक होनेपर भी किंचित् भीड नहीं थी। प्रभुके दर्शनों में सब इतने लीन थे कि किसीको कोई आकुलता नही थी। सर्वांग से खिरती हुइ प्रभुकी दिव्यध्वनि सबने शान्तिपूर्वक श्रवण की। प्रभुने आत्मतत्त्व की परम गभीर महिमा दरशाते हुए कहा – हे जीवों ! यह आत्मतत्त्व स्वय स्वतत्र सत् है, वह अनादि-अनन्त अपने उत्पाद-व्यय-ध्रुवस्वरूप मे बर्तनेवाला है, ज्ञान और आनन्द उसका मुख्य स्वभाव है-जोकि जीवके अतिरिक्त अन्यत्र नही है। प्रत्येक आत्मा अपने स्वकीय असंख्य प्रदेश मे रहकर प्रति समय जानता और परिणमता है इसलिये वह ‘समय’ है।

वह ज्ञान और परिणमनस्वरूप आत्मा, स्व-पर का भेदज्ञान करके जब परसे विभक्त अपने ज्ञानस्वरूप को जानता है और उसीमे एकत्वरूप से परिणमता है तब तक वह ‘स्वसमय’ है, वह सुदर है, वही ‘शुद्ध’ और सुखी है। तो भी वह आत्मा जब तक अपना ज्ञानस्वरूप को भूलकर परको जानता हुआ परके साथ अर्थात् रागादि के साथ एकत्वरुप परिणत होता है तब तक वह परसमय है, उसमें विसवाद है, अशुद्धता है, और दु ख है।

इसलिये हे जीवो ! तुम ज्ञान और राग का भेदज्ञान करके, रागरहित शुद्ध सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररुप मोक्षमार्ग मे ही आत्मा को दृढ़रुप से परिणमित करो। हम सब अरिहंत तीर्थंकर इसी विधि से मोक्षको प्राप्त हुए है और तुम्हारे लिये भी मोक्षका यह एक ही उपाय है

दर्शन वली नित्य ज्ञान ने चारित्र साधु सेववां;
पण ऐ त्रणे आत्मा ज केवल जाण निश्चय दृष्टियां।
तुं स्थाप निजने मोक्षपंथे, ध्या-अनुभव तेहने,
तेमां ज नित्य विहार कर, नहि विहर परद्रव्यो विषे।

बस, शुद्धस्वद्रव्य मे ही मोक्षमार्ग का समावेश है। राग का कोई अंश उसमें नहीं है। सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररुप शुद्धभाव से परिणमित आत्मा स्वयं ही मोक्षकारण है और स्वयं ही मोक्षरुप है। इस प्रकार ‘शुद्ध आत्मा’ ही साध्य है। ऐसे निज परम तत्त्व को जानकर उसीकी अन्तर्मुख श्रद्धा और उसीमें उपयोग को एकाग्र करके स्थिर होओ तुम्हें परम सुख होगा।

आमां सदा प्रीतिवंत बन, आमां सदा संतुष्ट ने
आनाथी बन तुं तृप्त, तुजने सुख अहो ! उत्तम छे।

अहाहा, कैसी मधुर वह वीतरागवाणी ! तीर्थंकर परमात्मा का ऐसा धर्मोपदेश सुनकर अनेक जीव आत्मज्ञान को प्राप्त हुए, अनेक जीवों ने श्रावकधर्म तथा अनेकों ने मुनि धर्म अंगीकार किया। पन्द्रहवें तीर्थंकर धर्मनाथ प्रभुके मोक्षगमन पश्चात् लगभग तीन सागरोपम का दीर्घकाल व्यतीत होनेपर सोलहवें शान्तिनाथ तीर्थंकर हुए। उनकी धर्मसभा में चक्रायुध-प्रधान ३६ गणधर, ८०० श्रुतकेवली, ४१८०० उपाध्याय, ३००० अवधिज्ञानी मुनिवर, ६००० विक्रियाऋद्धिधारी मुनिवर, ४००० मनःपर्ययज्ञानी और २४०० वादविद्यामें निपुण मुनिवर विराजते थे ६०३०० आर्यिकाएँ, दो लाख सम्यक्त्वादि से सुशोभित धर्मात्मा श्रावक तथा चार लाख श्राविकाएँ थीं। सब मोक्षकी उपासना कर रहे थे। सम्यग्दर्शन प्राप्त करनेवाले तिर्यंचों और देवों का तो प्रभु की धर्मसभा में कोई पार नहीं था।

और इस समस्त धर्मवैभव के उपरांत, अति दिव्य श्रीमण्डप के ऊपर गगनमे प्रभुके समकक्ष, सर्व आत्मिक गुणों में प्रभुके समान ४००० केवलज्ञानी-अरिहंत भगवंत विराजते थे। अहा, जिनेश्वरों का मंगल-समारोह ! उसे देखकर मुमुक्षुनेत्र तृप्त-तृप्त हो जाते थे और जी भरकर धर्मामृतका पान करते थे। समवसरण अर्थात् धर्मचक्रवर्ती-तीर्थंकर प्रभुका धर्मदरबार ! उसकी अद्भुतता का क्या कहना ! उस धर्म-दरबार में धर्म का तो महा भण्डार है और पाप का प्रवेश भी नहीं है; वहाँ पापी जीव नही होते। आनेवाले पापी जीव भी प्रभु के दर्शन से धर्मी बन जाते हैं और शान्ति प्राप्त करते हैं। अहो, शान्तिनाथ भगवान ने वीतरागधर्मके उपदेश द्वारा जगत के जीवों को अपूर्व शान्ति प्रदान की.. उन्हें नमस्कार हो ! [पन्द्रहवे तीर्थंकर के शासन के अन्तिम काल में लाखों-करोड़ों वर्ष तक धर्मका जो विच्छेद था वह शान्तिनाथ प्रभुके अवतार से दूर हुआ और पुन. जैनधर्म की परम्परा चलने लगी; वह आज तक अविच्छिन्न धारा से चल रही है, बीचमे कहीं विच्छेद नही हुआ।]

१६

भगवान शान्तिनाथ (भाग ६)

समवसरण मे प्रभु का धर्मोपदेश पूर्ण होने पर इन्द्रों ने १००८ मंगल नामों द्वारा प्रभुकी स्तुति की। हे देव ! इन्द्रको आपकी गुणमहिमा प्रसिद्ध करने के लिये भले ही १००८ नाम ढूंढना पड़े परन्तु हम तो मात्र एक ‘सर्वज्ञता’ द्वारा ही आपकी सर्वगुणमहिमा को जान लेते हैं। हे प्रभो ! जहाँ आपकी सर्वज्ञता को लक्ष मे लेते है वहाँ आपके अनन्त गुणों की स्वीकृति एकसाथ हो जाती है। वचन द्वारा तो संख्यात ही गुण और वे भी क्रमश बोले जा सकते हैं, जबकि सर्वज्ञातादि किसी भी गुण द्वारा आपकी अभेद अनुभूति करने पर आपका सर्वगुणसम्पन्न आत्मा हमारी स्तुति में-हमारी अनुभूति मे समा जाता है और शुद्धात्मा का अनुभव होकर हमारे मोह का क्षय हो जाता है। अहो देव ! आपके उपदेश से सिंह और सर्प जैसे क्रूर तिर्यंच भी विशुद्धपरिणामो द्वारा स्वर्ग प्राप्त कर लेते हैं, तो फिर हमारे जैसे भव्य मनुष्य मोक्ष प्राप्त करे-इसमें क्या आश्चर्य है !

प्रभो ! आप तो शुद्धात्मा मे से ही उत्पन्न पूर्ण अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करनेवाले हो; आपको मोह नहीं है इसलिये आहार-जल का ग्रहण भी नहीं है। केवलज्ञान के साथ आपका यह एक आश्चर्यजनक अतिशय है कि-पच्चीस हजार वर्ष तक अरिहंत अवस्था में मनुष्य शरीर सहित विचरने पर भी आपको कदापि क्षुधा-तृषाकी वेदना नही हुई और कभी आहार-जल का ग्रहण नहीं किया। आहार के बिना ही आपमें अनन्तवीर्य एवं अनन्तसुख था। हाँ, यद्यपि आपको अभी वेदनीय कर्म था, परन्तु मोहकर्म का सग न होने से वह अकेला बेचारा मृत समान था, आत्मामे उसका कोई प्रभाव नहीं था; और शरीर की सुन्दरता को सुरक्षित रखनेवाले पुण्यपरमाणु आहार के बिना भी स्वयमेव शरीर में आ जाते थे। प्रभो ! आपकी सर्वज्ञता या आपके पूर्णसुखो को जो नहीं जानते ऐसे अज्ञानीजनों की बुद्धि में आपके केवलज्ञानका यह अतिशय नही आसकता, क्योंकि वे विषयरहित आत्मिक सुखो नहीं जानते। तथा हे जिनेश ! आप लोकोत्तर हैं, सामान्य मनुष्यों जैसे नहीं हैं, इसलिये आपके शरीर की परछाईं नहीं पड़ती, नेत्रों की पलकें नहीं झपती, आप पृथ्वीपर नहीं चलते, आप चारों दिशासे दिखनेवाले चतुर्मुख भगवन्त हैं, और एकसाथ सब भाषाएँ बोलने पर भी आपके ओष्ठ नहीं हिलते,-यह भी क्या आश्चर्य की बात नहीं है ? ऐसा आश्चर्य हे केवली परमात्मा ! आपके सिवा अन्यत्र कहाँ है ?

तथा हे अचिंत्य सामर्थ्यवान सर्वज्ञप्रभु ! सर्व पदार्थों को जानने में आपको ज्ञानका क्रम नहीं है, आपका ज्ञानअक्रम है; वैसे ही आकाश में मगल विहार के समय आपके पगों में भी क्रम नहीं है, क्रमशः डग भरे बिना आपका गमन है। इस प्रकार ज्ञान और गमन दोनों में आप क्रम से रहित हैं। आपके श्रीविहार के समय आगे-आगे चलनेवाला आपकी धर्मविजय की घोषणा करता हुआ एक हजार आरों वाला रत्नमय धर्मचक्र, करोड़ों वाद्यों तथा करोड़ों ध्वजाओं के साथ चलता है। चक्रवर्ती पद के समय तो आपके चक्रकी सेवा एक हजार देव करते थे, वर्तमान में तीर्थंकर पद के समय असंख्य देव आपके धर्मचक्रकी सेवा कर रहे हैं, तीनों लोकोंमें उसका प्रभाव वर्तता है।

हे शान्तिनाथ प्रभो ! पूर्वभवों में आप दो बार तीर्थंकर के पुत्र हुए। इन्द्रसभा में आपकी प्रशंसा हुई, महावीर तीर्थंकर के आत्मा के साथ भी (त्रिपृष्ठ के भवमें) आपका मामा-भानजा का सम्बन्ध हुआ, आप बलभद्र हुए, चक्रवर्ती भी हुए, इन्द्र हुए, सर्वार्थसिद्धि में भी गये, अन्तिम भव में पुनः दूसरी बार चक्रवर्ती हुए, कामदेव हुए, और अन्तमें जिनदेव होकर तीर्थंकर भी हुए; और अब सर्वोत्कृष्ट सिद्धपद प्राप्त करने की तैयारी हैं। इस भरतक्षेत्र में २५००० वर्ष तक तीर्थंकर रूप में मंगल विहार करके आपने मोक्ष का मार्ग खोला है। हे देव ! आपके अवतार से पूर्व सात तीर्थंकरों के शासन के अंत भाग में धर्म का विच्छेद हुआ, परन्तु आपके द्वारा भी प्रकाशित मोक्षमार्ग निर्बाधरूप से आज पंचमकाल में भी अविच्छिन्न रुप से चल रहा है। इससे पुराणकार गुणभद्रस्वामी कहते हैं कि-हे बुद्धिमान जीवो ! तुम शान्तिनाथ की शरण लो; क्योंकि आज जो धर्मशासन प्रवर्तमान है…जो मोक्षमार्ग चल रहा है उसके ‘आद्यगुरु भगवान शान्तिनाथ’ हैं:-

देवेनाभिहितस्त्वनेन समगादव्याहतः स्वावधिं ।
तत् शान्तिं समुपेत तत्र भवतां आद्यं गुरुं धीधनाः ।।
(महापुराण-उत्तरपुराण : ६३-५१०)

भगवान शान्तिनाथ चक्रवर्ती पद में २५००० वर्ष रहे, और उसे छोड़ने के पश्चात् धर्मचक्रवर्ती होकर तीर्थंकरपदमें भी २५००० वर्ष रहे। अन्त में, जिस प्रकार चक्रवर्ती पदका त्याग किया उसी प्रकार अब तीर्थंकर पद को त्यागकर प्रभु मोक्षगमन के लिये तैयार हुए। जब उनकी आयु एक मास शेष रही तब वे सम्मेदशिखर पर आकर स्थिर हुए। विहार एवं वाणी थम गये। ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी के दिन तृतीय शुक्लध्यान द्वारा समस्त योगों का निरोध करके प्रभु अयोगी हुए और दूसरे ही क्षण चतुर्थ शुक्लध्यान में प्रवेश किया। कर्मकी १४८ प्रकृतियों में से समस्त घाति कर्मों सहित कुल ६३ प्रकृतियों का सर्वथा नाश तो प्रभुने केवलज्ञान प्राप्त करने से पूर्व ही कर दिया था; शेष ८५ में से ७२ का (अथवा उनमें से जितनी हों उतनी का) संसार के द्विचरम समय में नाश किया; और शेष १३ कर्म प्रकृतियों का चरम समय में नाश करके प्रभु मुक्त हुए, सिद्ध हुए, अशरीरी हुए, कर्मरहित हुए, विभावरहित हुए, पूर्ण शुद्धस्वभावरुप परिणमित हुए, अनादि संसारतत्त्व को सर्वथा छोड़कर स्वयं अभूतपूर्व ऐसे मोक्षतत्त्वरूप हो गये और सिद्धालय में जाकर विराजमान हुए। वहाँ सर्व चैतन्यगुण ही उनका शरीर है, चैतन्यस्वभाव की निर्बाधता ही उनका सर्वोत्कृष्ट परमसुख है। अब वे अनन्तानन्त काल तक सदा सिद्धरूप ही रहेंगे। अहा, उस सिद्धपद की अपार महिमा स्वानुभव द्वारा ही समझ में आती है। समस्त संत उस सिद्धपद को चाहते हैं और उसकी कैसी अद्भुत महिमा गाते हैं-वह तुम भी सुनो-कर्माष्टवर्जित, परम, जन्म-जरा-मरणहीन शुद्ध छे; ज्ञानादि चार स्वभाव छे, अक्षय, अनाश, अभेद्य छे। अनुपम, अतीन्द्रिय, पुण्य-पापविमुक्त, अव्याबाध छे, पुनरागमन विरहित, निरालंबन, सुनिश्चल, नित्य छे। ज्यां दुःख नहि, सुख ज्यां नहीं, पीडा नहीं, बाधा नहीं, ज्यां मरण नहि, ज्यां जन्म छे नहीं, त्यां ज मुक्ति जाणवी। नहि इन्द्रियो, उपसर्ग नहि, नहि मोह, विस्मय ज्यां नहीं, निद्रा नहीं, न क्षुधा, तृषा नहि, त्यां ज मुक्ति जाणवी। दृग-ज्ञानकेवल, सौख्य केवल, वीर्यकेवल होय छे, अस्तित्व, मूर्त्तविहीनता, सप्रदेशमयता होय छे।

अशरीर ने अविनाश छे, निर्मल अतीन्द्रिय शुद्ध छे,
ज्यम लोकअग्रे सिद्ध, ते रीत जाण रे तुज आत्म ने।

इस प्रकार सिद्धपद की अपार महिमा करके जैन संत ऐसा बतलाते हैं कि-अपना आत्मस्वरुप भी वास्तव में वैसा ही है; सिद्धपद ही आत्मा का निजपद है और तीर्थंकरादि पुराणपुरुषों का जीवन हमें ऐसे सिद्धपद की साधना करने की प्रेरणा देता है।

प्रभु शान्तिनाथ के साथ उनके भ्राता चक्रायुध गणधर भी केवलज्ञान प्रगट करके मोक्षको प्राप्त हुए। भवभवान्तर के साथी मोक्षगमन में भी साथ रहे. धन्य उनका जीवन ! प्रभुके मोक्षगमन से सम्मेदशिखर की जो टूंक पावन हुई उसका नाम ‘कुन्दप्रभा’ टूंक है। वाह, कितना सुन्दर नाम और कैसा आनन्द का धाम !

शान्तिनाथ जिनराज की कुन्दप्रभ टूंक है जेह,
मन-वच-तन कर पूज हूँ शिखरसम्मेद यजेह।

उस कुन्दप्रभा टूक के ऊपर सिद्धालय में, लोक के सर्वोच्च स्थान पर जहाँ पूर्वकाल में अनन्तानन्त सिद्ध जीव विराजते थे उनके सान्निध्य मे वे भी शाश्वतरूप से विराजमान हुए और वर्तमान में भी विराज रहे हैं।

प्रभुश्री शान्तिनाथ के मोक्षकल्याणक प्रसंग पर इन्द्र ने निर्वाण महोत्सव किया और पुनः ‘आनन्द’ नाम का अति भव्य नाटक किया…उसमें श्रीषेण राजा से लेकर शान्तिनाथ तीर्थंकर तक के १२ भवों में भगवान ने जो मोक्षसाधना की उसे अद्भुत ढंग से प्रदर्शित किया। अहा, उस नाटक द्वारा प्रभुका जीवन देखकर अनेक जीव मुक्ति साधना हेतु प्रेरित हुए। नाटक द्वारा प्रभु के गुणों का स्मरण करते हुए इन्द्र कहते है कि-हे नाथ ! आप ‘कामदेव’ होने पर भी काम को तो आपने नष्ट कर दिया था इसलिये हे प्रभो ! आपको ‘कामदेव’ कहते हुए तो हमे शर्म आती है; वास्तवमें आप कामदेव नही किन्तु कामके शत्रु ऐसे ‘धर्मदेव’ हैं।

तथा हे देव ! आपको चक्रवर्ती महाराजा कहते हुए भी हमें सन्तोष नहीं होता, क्योंकि आपने तो उस छह खण्ड के साम्राज्य को तृणवत् त्यागकर केवलज्ञान द्वारा अखण्ड विश्व का साम्राज्य प्राप्त किया था। जिसका आपने त्याग कर दिया उसके द्वारा आपकी महिमा कैसे हो सकती है ?

तथा हे प्रभो ! तीन लोक में श्रेष्ठ आपका शरीर अत्यन्त सुन्दर था-यह सच है, परन्तु आपके चैतन्य की अतीन्द्रिय सुन्दरता के समक्ष उसका कोई मूल्य था ? -नहीं; क्योंकि जब आप सिद्धपुरी में पधारे तब उस चैतन्य की सुन्दरता को तो साथ ही ले गये थे, परन्तु शरीर की उस दिव्य सुन्दरता का आपने त्याग किया, इसलिये वह पुद्गल में विलीन हो गई। अहा, उस कार्य द्वारा तो आपने हमें जड़-चेतन का भेदज्ञान कराया। आज भी आपके स्वरुप का चिन्तन करने से जगत के जीवों को भेदज्ञान होता है और वे मोक्ष के पथपर चलते हैं। आपका शासन जयवन्त हो !

शान्तिनाथ-तीर्थंकर और चक्रायुध-गणधर यह दोनों जीव

१२ भव तक साथ रहकर अन्त में मोक्षको प्राप्त हुए; वह इस प्रकार-

(१) शान्तिनाथ भगवान जब श्रीषेण राजा थे, तब चक्रायुध उनकी ‘अनिन्दिता’ नामक रानी थी। (२) दोनों जीव भोगभूमि में उत्पन्न हुए। (३) प्रथम स्वर्ग में श्रीप्रभ देव तथा विमलप्रभ देव हुए। (४) शान्तिनाथ का जीव अमिततेज विद्याधर हुआ और उसे सम्यक्त्व की प्राप्ति हुई। चक्रायुध का जीव (त्रिपृष्ठ वासुदेव का पुत्र) श्रीविजय हुआ। (वे दोनों परस्पर एक-दूसरे के बहनोई थे।) (५) तेहरवें स्वर्ग में रविचूल और मणिचूल देव हुए। (६) अपराजित बलदेव तथा अनन्तवीर्य वासुदेव हुए। (७) शान्तिनाथ अच्युतस्वर्ग में इन्द्र हुए; चक्रायुध (नरक मे जाकर, विद्याधर होकर फिर) उस अच्युतस्वर्ग में प्रतीन्द्र हुए। (८) शान्तिनाथ का जीव वज्रायुध चक्रवर्ती (क्षेमंकर तीर्थंकर का पुत्र) हुआ और चक्रायुध का जीव वह वज्रायुध का पुत्र हुआ। (९) दोनों जीव ग्रैवेयक में अहमिन्द्र हुए। (१०) विदेह में घनरथ तीर्थंकर के पुत्र मेघरथ तथा दृढरथ हुए। (११) दोनों जीव सर्वार्थ सिद्धि में गये। (१२) शान्तिनाथ कामदेव-चक्रवर्ती-तीर्थंकर हुए। चक्रायुध उनके भाई और गणधर हुए।

[अत में भवचक्र का अंत करके दोनों जीव मोक्ष में विराज रहे हैं।]

उन मोक्षगामी महात्माओं के मंगलजीवन का चिन्तन सर्व जीवों को शान्ति प्रदान करो, सर्व जीवों का कल्याण करो, सर्वत्र मंगल हो। अहा, सत्पुरुष की एक क्षणभर की संगति से भी जीव का कल्याण होता है, तो फिर अनेक भवतक अति सौहार्दपूर्वक तीर्थंकर के आत्मा का संग करनेवाले भव्यात्मा मोक्षका परमसुख प्राप्त करें-इसमें क्या आश्चर्य ?

भगवान शान्तिनाथ का जीवन वास्तव में अद्भुत है। संसार के साधारण जीवों की तो क्या बात करें, तीर्थंकर या चक्रवर्ती आदि त्रेसठ शलाका-महापुरुषों में भी शान्तिनाथ भगवान जैसी बारह भवों तक वृद्धिंगत विभूति अन्य कौन प्राप्त कर सका है?..परन्तु वह समस्त बाह्यविभूति तो आत्मा से बाहर की है! अंतर की चैतन्यविभूति में तो सर्व मोक्षगामी जीव एकसमान हैं! इसलिये-हे भव्य जीवों! तुम आत्मा का कल्याण चाहते हो तो, सम्पूर्ण चैतन्य वैभवसम्पन्न ऐसे आत्मा का चिन्तवन करो; प्रभु समान ही अपने आत्मा का स्वरुप है-उसका ध्यान करो; यही प्रभु शान्तिनाथ की उपासना है और यही पूर्ण शान्तिरूप मोक्ष का पंथ है। शान्तिनाथ तीर्थंकर देव द्वारा प्रकाशित यह मोक्षपंथ भरतक्षेत्र में आज भी अविच्छिन्न रुप से चल रहा है…तुम हृदय में उन शान्तिनाथ प्रभु का स्मरण करके आज ही मोक्षमार्ग का अनुसरण करो!

ध्रुव, अचल ने अनुपमगति पामेल शांतिनाथने,
करूँ याद मारा आत्म मां सम्यक्त्व भाव जगाडीने।
छे सुख साचुं आपनुं, चाखी अहो मुज आत्ममां,
ऐ सिद्धसुखने साधतो आवी रह्यो तुज पासमां।
पुराण अद्भुत आपनुं आ गूंथीने हिन्दी मां,।
बस, जीव थाय पवित्र मारु ए ज आशा हृदयमां।

हे शान्तिनाथ भगवान ! आज आपके जन्म, दीक्षा एवं मोक्ष इन तीन कल्याणक के मंगलदिवस आपके पवित्र जीवन का आलेखन सोनगढ़ के जिनमन्दिर में आपके अभिषेक पूर्वक समाप्त होता हैं; वह हमें भी आप जैसे कल्याणपद की प्राप्ति का कारण हो !

(-वीर संवत् २५०९, ज्येष्ठ कृष्णा चुतुर्दशी)

[पंचम चक्रवर्ती तथा सोलहवें तीर्थंकर भगवान शान्तिनाथ का पवित्र एवं धर्मरोमांचक पुराण यहाँ समाप्त हुआ।]

अब आप पढ़ेंगे-भगवान कुन्थुनाथ तथा अरहनाथ भगवन्तों का मंगल चरित्र। इन दोनों भगवन्तों का चरित्र वीर सं. २५०९ के ज्येष्ठ मास में आयी भीषण बाढ़ में समुद्र जैसे जल में घिरे हुए पोरबन्दर शहर में ‘कंचन-कॉटिज’ भवन की तीसरी मंजिल पर बैठे-बैठे लिखा गया है।

१७

भगवान कुन्थुनाथ

[१७]

भ ग वा न कु न्थु ना थ

चक्रवर्ती त्रिपुटी तीर्थंकर त्रिपुटी शांतिनाथ शान्तिनाथ कुन्थुनाथ कुन्थुनाथ अरहनाथ अरहनाथ (जन्म) (मोक्ष) हस्तिनापुर सम्मेद शिखर

रत्नो छोडी चौद प्रभुजी रत्नत्रयने वरीया,
चक्र छोडी राजतणुं प्रभु धर्मचक्रने धरीया,
कामदेव-रुप जड़ समजीने चेतन-रुपने वरीया,
ऐवा जिनवर कुंथु प्रभुजी, दास हरिने गमीया।

अभी-अभी आपने हस्तिनापुरीके महाराजा पंचमचक्रवर्ती तथा सोलहवे तीर्थंकर श्री शान्तिनाथ भगवान का उत्तम चरित्र पढ़ा। तत्पश्चात् छठवे चक्रवर्ती तथा सत्रहवें तीर्थंकर भगवान ‘कुन्थुनाथ’ भी उस हस्तिनापुरी में ही हुए। उनका मंगल पुराण अब हम पढ़ेंगे।

भगवान कुन्थुनाथ पूर्वभव : सिंहरथ राजा

भगवान कुन्थुनाथ पूर्वभव में जम्बू-विदेहकी सुसीमानगरी के राजा थे। उनका नाम सिंहरथ था, वे धर्मके परम उपासक थे; विदेह क्षेत्रमें तीर्थंकर भगवंत सदा विचरते हैं, इसलिये वे पुण्यवन्त महाराजा बारम्बार तीर्थंकर भगवान के साक्षात् दर्शन करते, जिनवाणी सुनते और मुनिओको आहारदान देते थे; वे मात्र इन व्यवहार धर्मों में ही सन्तुष्ट नही हो जाते थे, परन्तु रागरहित आत्मा के परमार्थ स्वभाव को भी जानते थे, और अनेको बार उसकी अनुभूति करते थे इस प्रकार राजवैभव के बीच भी सम्यकदर्शन द्वारा चैतन्य वैभव को जाननेवाले वे सिहरथ राजा मोक्षमार्गी थे। अब उनका मोक्ष अति निकट था।

एक बार वे महाराजा राजमहल की छत पर आत्मचिन्तन करते हुए वैराग्य भावनाएँ भा रहे थे। ठीक उसी समय आकाश से भारी उल्कापात हुआ,-भयंकर आवाज के साथ बिजली गिरी। उस उल्कापात को देखकर तुरन्त उन वैरागी राजाने विचार किया कि- ‘अरे, यह चकाचौंध मुझे मोहनिद्रासे जगाने के लिये ही है; यह बिजली की चमक मुझे सासारिक भोगोंकी अनित्यता ही बतला रही है। जिस प्रकार यह वज्र समान बिजली का प्रहार पर्वतके भी टुकड़े कर देता है, उसी प्रकार मैं चारित्रधर्म के वज्र द्वारा मोहरूपी पर्वतके टुकडे-टुकडे कर दूँगा। ऐसा विचारकर वे महाराजा सिहरथ वनमे गये और वहाँ एक वीतरागी गुरू के निकट जिनदीक्षा धारण की। जैसे चारित्र का पालन भगवान शान्तिनाथ के जीवने मेघरथ के भवमें किया था, वैसा ही उत्तम चारित्र इस कुन्थुनाथ के जीव ने सिहरथ के भव में पाला; दर्शन विशुद्धिआदि सोलह उत्तम भावनाएँ जैसी उन मेघरथ मुनिराज ने भायी थी, वैसी ही इन सिहरथ मुनिराजने भायी और उन्ही की भाँति तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया। पश्चात् उत्तम आराधना पूर्वक समाधिमरण करके वे सिंहरथ मुनिराज भी सर्वार्थ सिद्धि मे उत्पन्न हुए . कि जहाँ शातिनाथ प्रभु का आत्मा भी विराजता था। इस प्रकार भगवान शान्तिनाथ और कुन्थुनाथ दोनो तीर्थंकरो के आत्मा सर्वार्थसिद्धि मे असख्य वर्षोतक साथ रहे। वहाँ वे दोनो भावी तीर्थंकर कैसी आनन्ददायी चर्चा करते थे उसका रसास्वादन मल्लिनाथ’ प्रभुके जीवन चरित्र मे (पृष्ठ मे) करायेंगे।

भगवान कुन्थुनाथ का जीव भगवान शान्तिनाथ का अनुसरण कर रहा था। शान्तिनाथ के जीवने जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्र में तीर्थंकर प्रकृतिका बध किया था, तो कुन्थुनाथ ने भी वहीं तीर्थंकर की प्रकृति बाधी, शान्तिनाथ प्रभु सर्वार्थसिद्धि मे गये तो यह भी सेवार्थसिद्धि मे गये, वहाँ से आकर शान्तिनाथ प्रभु कामदेव और चक्रवर्ती हुए तो यह भी हस्तिनापुरीमे ही आकर कामदेव तथा चक्रवर्ती हुए। धन्य तीर्थंकर परम्परा ! और धन्य हस्तिनापुरी !

हस्तिनापुरी में कुन्थुनाथ-अवतार

जब सर्वार्थसिद्धि मे कुन्थुनाथ के जीवकी आयु छहमास शेष रही उस समय हस्तिनापुरी मे महाराजा शूरसेन राज्य करते थे। उनकी महारानी का नाम श्रीकान्ता था। हस्तिनापुरी की महिमा से तो (शान्तिनाथ प्रभुके कालसे ही) हम परिचित है इसलिये पुन उसकी शोभाका वर्णन नहीं लिखते। हाँ, वहीं एकके पश्चात् एक तीन तीर्थंकर (सोलहवे, सत्रहवे, और अठारहवे) तथा चार चक्रवर्ती (चौथे, पाँचवे, छठवे और सातवें) उत्पन्न हुए वह उसका महान गौरव है। महापुरुष पाण्डव भी उसी नगरीमें तथा उन्ही तीर्थंकरो के वंश मे हुए। ऐसी उस नगरी मे श्रावण कृष्णा दशम के दिन, सर्वार्थसिद्धिसे सत्रहवे तीर्थंकर का जीव १६ मंगलस्वप्नोंके दर्शन पूर्वक महादेवी श्रीकान्ता की कुक्षि में अवतरित हुआ हस्तिनापुरीमे रत्नवृष्टि, इन्द्रोका आगमन आदि भव्य प्रसंग पुन हुए।

वैशाख शुक्ला प्रतिपदा के दिन भरत क्षेत्र के १७ वे तीर्थंकर का जन्म हुआ और इन्द्रोने मेरुपर्वतपर अभिषेक करके महान जन्मकल्याणक महोत्सव मनाया। इन्द्रने स्तुति करते हुए कहा-हे देव ! आप कुथवा जैसे सूक्ष्म जीवों की भी रक्षाका उपदेश देनेवाले है इसलिये आप कुन्थुनाथ हैं ! प्रभुके चरणों में अज (बकरा) का चिन्ह था। शान्तिनाथ प्रभु द्वारा प्रवर्तित धर्मशासन अविच्छिन्नरूप से चल रहा था; उसमें अर्धापल्य के पश्चात् कुन्थुनाथ प्रभुका अवतार हुआ। उनकी आयु ९५००० वर्ष थी। रुप में कामदेव, वैभवमें चक्रवर्ती और धर्म में तीर्थंकर-ऐसी महान पदवियों वे धारण करते थे। उनका जीवन शान्तिनाथ भगवान जैसा ही था। जीवन का चतुर्थ भाग (२३७५० वर्ष) व्यतीत होने पर वे हस्तिनापुरीके राजा बने; दूसरा चतुर्थ भाग बीतनेपर, अपनी जन्मतिथिके दिन ही (वैशाख शुक्ल प्रतिपदा को) उनके राजभण्डार में सुदर्शन चक्र उत्पन्न हुआ तथा उन्हे चक्रवर्ती पद की राज्यलक्ष्मी प्राप्त हुई। शान्तिनाथ चक्रवर्ती की भाँति उन्होने भी छह खण्ड में विजय विहार किया। प्रभु कुन्थुनाथ चक्रवर्ती पदपर २३७५० वर्ष तक रहे। उस काल वे मात्र चक्रवर्ती पद के ही वैभव का नही; किन्तु साथ ही चैतन्य वैभव का भी उपयोग करते थे।

चक्रवर्ती होने के पश्चात् २३७५० वर्ष की घटना है-एकबार वैशाख शुक्ला प्रतिपदा के दिन उनका जन्मोत्सव तथा चक्रवर्ती पद प्राप्ति का उत्सव मनाया जा रहा था। हस्तिनापुरी की सजावट एवं अद्भुत शोभा को महाराजा कुन्थुनाथ चक्रवर्ती प्रसन्नचित्त से निहार रहे थे और विचार कर रहे थे कि-कहाँ चैतन्य की अचिन्त्य शोभा ! और कहाँ इस चक्रवर्तीपदकी शोभा !-एक शोभा तो आत्माका धर्म है और दूसरी शोभा कर्मका फल है। गहरा चिन्तन करते हुए उन्हें तत्क्षण जातिस्मरण ज्ञान हुआ। पूर्वभव में इससे भी अति श्रेष्ठ ऐसे अहमिन्द्र पद का उपभोग कर चुके हैं उसका स्मरण होते ही तत्क्षण राजभोगों से उनका चित्त विरक्त हो गया ! अरे, छह खण्ड के राज्य में तथा विषय-भोगों में क्या आत्माका किंचित्मात्र सुख है ?-नहीं, कदापि नहीं; बाह्य विषय भोगों की सामग्री में से कभी भी आत्मा को सुख की एक बूँद भी नहीं मिल सकती; सुख का समुद्र तो अंतर में लहराता है, उसमें उपयोग को लगाने से, उस शुद्धोपयोग में ही परम सुख का अनुभव होता है। इसलिये मैं भी अब अपने उपयोग को इस गजवैभवसे हटाकर अपने चैतन्यसमुद्र में स्थिर करूँगा। अपने चैतन्यतत्त्व के सुखका स्वाद मैंने ले लिया है, उसी में अब मैं लीन होऊँगा। मैं आज ही वनमें जाकर जिन दीक्षा धारण करके मोक्ष की साधना करूँगा।

ऐसा निर्णय करके महाराजा कुन्थुनाथ संसार की अनित्यता आदि बारह वैराग्य भावनाओंका चिन्तन कर रहे थे। उसी समय स्वर्ग से लौकान्तिक देवोंने आकर स्तुतिपूर्वक उनकी दीक्षा का अनुमोदन किया। इन्द्र भी ‘विजया’ नामकी शिबिका लेकर आ पहुँचे। महाराजा कुन्थुनाथ छह खण्ड की विभूति को क्षणमात्र में त्यागकर वन में पहुँचे और सिद्धों को वन्दन करके शुद्धोपयोगी साधु बन गये…उस समय प्रभु द्वारा छोड़े गये चौदह रत्न और नवनिधान मानो अनाथ हो गये जबकि मोक्ष लक्ष्मी सनाथ होकर प्रफुल्लित हो रही थी !-क्योंकि प्रभु उसे अंगीकार करने को आतुर थे।

अरे, कहाँ कुछ क्षण पूर्व का चक्रवर्तीपद और कहाँ दिगम्बर साधुदशा ! वह निष्परिग्रही वीतरागी दशा जगत् को प्रगटरूप से बतलाती है कि-हे जीवो ! परिग्रह में सुख नहीं है,सुख तो वीतरागता में है; सुख बाह्य में नहीं, अंतर में हैं।

भगवान कुन्थुनाथ के साथ एक हजार राजा भी दीक्षा लेकर मुनि हो गये। शान्तिनाथ प्रभुने भी अपने जन्म के दिन दीक्षा ली थी, प्रभु कुन्थुनाथ ने भी जन्मदिन पर दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के पश्चात् तीसरे दिन मुनिराज कुन्थुनाथ हस्तिनापुरी में पधारे; तब ‘धर्ममित्र’ नामके श्रावक ने उन्हें उत्तम विधिसहित आहारदान दिया। शान्तिनाथ तीर्थंकर की भाँति वे भी १६ वर्षतक मुनिदशा में रहे और भरतभूमि में विहार किया। तत्पश्चात् वे पुनः हस्तिनापुरीके दीक्षावन में पधारे और चैत्रशुक्ला तृतिया के दिन शुक्लध्यान द्वारा क्षपकश्रेणी मे आरूढ होकर केवल ज्ञान प्रगट किया।

तुरन्त ही समस्त इन्द्रलोक मे हर्षका कोलाहल छा गया। देवों ने आकर प्रभु के केवलज्ञानका भव्य महोत्सव किया और समवसरण की रचना की। उस समवसरण मे ‘स्वयभू’ आदि ३५ गणधर, ७०० पूर्वधारी मुनिवर, ४३१५० उपाध्याय-शिक्षक, २५०० अवधिज्ञानी मुनिवर, ५१०० विक्रिया ऋद्धिधारी, ३३०० मनःपर्ययज्ञानी, २०५० वादविद्या में पारगत मुनिवर थे; तदुपरान्त ३२०० केवली भगवन्त भगवान के समकक्ष गगन मे विराजते थे। कुल ६०००० मुनिवर तथा ६०३५० आर्यिकाएँ थी। दो लाख आत्मज्ञानी श्रावक एवं तीन लाख श्राविकाएँ थी। देवों तथा तिर्यंचों का तो कोई पार नही था। सिंह और वृषभ जैसे पशु भी पशुता को छोड़कर आत्मज्ञान प्राप्त कर लेते थे और सम्यक्त्वादि अपूर्व चैतन्य भाव द्वारा मोक्षमार्गी बन जाते थे।

प्रभु कुन्थुनाथ २३७३४ वर्षतक भरतक्षेत्र मे विचरे और धर्मचक्र का प्रवर्तन किया। पश्चात् जब उनकी आयु एक मास शेष रही तब वे सम्मेदशिखरपर पधारे। विहार एव वाणी थम गये और प्रभु शान्तिनाथ की भाँति अपने जन्म तथा दीक्षादिवस (वैशाख शुक्ला प्रतिपदा के दिन) पर वे योगनिरोध करके सिध्दपुरी में पधारे। प्रभु स्वय अचिन्त्य ज्ञानधारी थे, और जिस टूंक से मोक्ष पधारे उस टूकका नाम भी ‘ज्ञानधर’ टूंक पड़ा।

कुन्थुनाथ जिनराजकी ज्ञानधर टूंक है जेह,
मन-वच-तनकर पूज हूँ शिखरसम्मेद यजेह।

[इस प्रकार भरतक्षेत्र के छठवे चक्रवर्ती एवं सत्रहवे तीर्थंकर श्री कुन्थुनाथ भगवान का जीवनचरित्र पूर्ण हुआ।]

छ्यानवे हजार नार छिनकमें दीनी छार;
अरे मन ! ता निहार काहे तू डरत है !
छहों खण्ड की विभूति छांडत न देर कीनी,
सेना चतुरंगनसों नेह न धरत हैं।
नौ-निधान आदि जे चउदहरतन त्याग,
देह से भी नेह तोड़ी वन विचरत हैं,
ऐसी विभौत्यागत विलंबजिन कीनो नाहिं,
तेरे कहो केती निधि सोच क्यों करत है ?

अरे जीव, तू तीर्थंकरोंका जीवन तो देख ! वे चक्रवर्ती पद की विभूति को भी एक क्षण में छोड़कर मोक्षसाधना के लिये चल दिये। तू भी अपने उन भगवन्तों के जीवन का अनुसरण करके आत्मसाधना में शूरवीर बन; व्यर्थ का सोच-विचार मत कर।

१८

भगवान अरहनाथ

[१८]

भ ग वा न अ र ह ना थ

चक्रवर्ती त्रिपुटी तीर्थंकर त्रिपूटी शांतिनाथ शान्तिनाथ कुन्थुनाथ कुन्थुनाथ अरहनाथ अरहनाथ (जन्म) (मोक्ष) हस्तिनापुर सम्मेद शिखर हे अरहनाथ जिनेश ! आपने छहखण्ड के राजवैभवरूप चक्रवर्ती के सुदर्शन चक्र को कुम्हार के चाक की भाँति त्याग दिया और धर्मचक्र को धारण करके भरतक्षेत्रके १८ वें धर्म चक्री हुए, मोह को जीतकर सर्वज्ञ-तीर्थंकर हुए। सर्वज्ञतारूप आपके अद्भुत आत्मवैभवका आदर करके मैं आपको नमस्कार करता हूँ और आपका मंगल जीवनचरित्र कहता हूँ।

भगवान अरहनाथ भी अपने पुरोगामी दो चक्रवर्ती तीर्थंकरों की भाँति पूर्वभव में जम्बूद्वीप के विदेहक्षेत्र में थे। वहाँ वे क्षेमपुरी नगरी के धनपति नामक राजा थे…वे मात्र राजलक्ष्मी के ही नहीं, आत्मलक्ष्मी के भी स्वामी थे; स्वानुभूतियुक्त थे; क्षायिक सम्यग्दृष्टि थे। उनकी अंतःचेतना संसार से विरक्त रहती थी। पुण्यजन्य राजवैभव और आत्मजन्य धर्म वैभव- इन दोनों का सुयोग होने पर भी वे दोनों वैभवों को भिन्न ही रखते थे, एकमेक नहीं करते थे; इतना ही नहीं, वे सदा धर्म की ही प्रधानता रखते थे और उनका मन मोक्ष की साधना में लगा रहता था।

मोक्ष के साधक को मोक्षसाधना के अनुकूल संयोग मिलते ही रहते हैं, तदनुसार मोक्षार्थी महाराजा धनपति को भी एक उत्तम सुयोग प्राप्त हुआ। उनकी नगरी में अर्हत्‌नन्दन तीर्थंकर का पदार्पण हुआ। उनकी दिव्यध्वनि का श्रवण करते हुए राजा धनपति को एकदम रत्नत्रय की भावना जाग उठी और उनका चित्त संसार से विरक्त हो गया। राज्य छोड़कर उन्होंने प्रभुके चरणों में जिन दीक्षा धारण कर ली। वे शुद्ध परिणाम द्वारा रत्नत्रयरूप मोक्षमार्ग की साधना करने लगे। उनको बारह अंग का ज्ञान उदित हुआ और दर्शनविशुद्धि आदि १६ भावनाओ द्वारा उन्होंने तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया। अनेक वर्षोंतक चारित्रपालन करके अंत में उत्तम आराधना सहित उन्होंने प्रायोपगमन संन्यास धारण किया और समाधिमरण करके, ‘सर्वार्थसिद्धि’ के चारों ओर जो दूसरे चार अनुत्तर-विमान हैं, उनमें से ‘जयन्त’ विमान मे अहमिन्द्र हुए।

अगले भवमे जो अरहनाथ तीर्थंकर होनेवाले हैं उन अहमिन्द्र की आयु ३३ सागर थी। वहाँ बाह्यविषयों के बिना भी उनको महान सुख था और तीर्थंकर प्रकृति तो सदा आती ही रहती थी। उनका आत्मा अब मोक्ष के अत्यन्त निकट आ चुका था और राग-द्वेष शांत हो गये थे। अहमिन्द्र पर्याय मे असंख्यात वर्ष व्यतीत हो जाने पर. क्या हुआ?-वह देखने के लिये हम फिर तीसरीबात हस्तिनापुर चले !

उस समय हस्तिनापुर में भगवान शान्तिनाथ के वंशज राजा सुदर्शन राज्य करते थे। उनकी महारानी का नाम मित्रसेना था। जब स्वर्ग में उन अहमिन्द्र की आयु छहमास शेष रही तब उनके आगमन की पूर्व सूचनारूप यहाँ हस्तिनापुरके राजभवन में प्रतिदिन करोड़ों रत्नोंकी वर्षा के साथ-साथ सारी नगरी में पुण्यवृद्धि होने लगी।फाल्गुन कृष्णा तृतिया की पिछली रात्रि में महादेवी मित्रसेनाने उत्तम गज आदि १६ मंगल-स्वप्न देखे और उन स्वप्नोंका फल तीर्थंकर का गर्भागमन जानकर वह अति आनन्दित हुई। मानो त्रिलोक का राज्य मिल गया हो-इतना हर्ष उन्हें हो रहा था। उसी समय देवेन्द्रोंने आकर तीर्थंकर के माता-पिता रुप में उनका सन्मान किया और दिव्य वस्त्राभूषणों की भेट दी; इतना ही नही गर्भस्थ मंगल-आत्मा की भी स्तुति एवं बहुमान किया कि-अहो देव ! गर्भ में भी आप आत्मज्ञान एवं अवधिज्ञानसहित विराजमान हैं, अभी नेत्रादि अवयवों की रचना होने से पूर्व भी आप अतीन्द्रिय ज्ञान धारण कर रहे हैं, आपका आत्मा सदा मंगलरुप है; आपका चैतन्यप्रवाह मोक्षदशा से सम्बन्धित है . तथा अनेक जीवों के मोक्ष मे आप निमित्त हैं।-ऐसी अनेक प्रकारकी स्तुति करके देवोंने गर्भकल्याणक मनाया।

माता के दिन प्रसन्नता पूर्वक बीत रहे थे। गर्भवृद्धि होने पर भी उन्हे कोई कष्ट नहीं है। तथा गर्भस्थ बालक को भी गर्भावस्था का कोई कष्ट नहीं हैं। स्वर्गलोक की देवियाँ माता-पुत्रकी सेवा कर रही हैं। प्रतिदिन रत्नवृष्टि हो रही है।

सबानौ मास बीतने पर मगसिर शुक्ला चतुर्दशीके दिन मातामित्र सेना महारानीने दिव्य पुत्र को जन्म दिया। सातवें चक्रवर्ती और अठारहवें तीर्थंकर का एक साथ अवतार हुआ। सर्वत्र आनन्द-मंगल छा गया। शान्तिनाथ तथा कुन्थुनाथ की भाँति अरहनाथ तीर्थंकर का जन्मकल्याणक महोत्सव इन्द्रोंने तथा हस्तिनापुर के प्रजाजनों ने मनाया। अरे, हस्तिनापुरी मे प्रभुका जन्मोत्सव मनाया गया ऐसा कहना वह तो सामान्य बात है, क्योंकि प्रभुके मंगल जन्म के पुण्यप्रभाव तो सातवे नरकसे लेकर सर्वार्थसिद्धि के विमानोंतक त्रिलोक में सर्वत्र फैल गया था और तीनो लोक के सर्व जीव क्षणभर संतुष्ट हुए थे।

कुन्थुनाथ तीर्थंकर के मोक्षगमन पश्चात् पाव पल्य व्यतित होने पर अरहनाथ तीर्थंकर हुए। उनके शरीर की ऊँचाई ३० धनुष तथा आयु ८४००० वर्ष थी। उनका शरीर सौन्दर्य सर्व श्रेष्ठ था। उनके चरणों में सुन्दर मत्स्य (मछली) का चिन्ह था। वे तीर्थंकर, चक्रवर्ती तथा कामदेव थे। सोलह-सत्रह-अठारहवें तीन तीर्थंकरोंकी त्रिपुटी जोकि तीन-तीन पदवियोंकी धारक थी, उसका जन्म हस्तिनापुर में हुआ था। युवावस्था में प्रवेश करने पर राजकुमार अरहनाथ का विवाह अनेक देशों की सर्वगुणसम्पन्न राजकुमारियों के साथ हुआ। २१००० वर्ष की आयुमें राजा सुदर्शन ने उनका राज्याभिषेक करके उन्हें मंडलेश्वर राजा बनाया। दूसरे २१००० वर्ष तक राज्य करने के पश्चात् उनके शस्त्रभण्डार में सुदर्शन चक्रकी उत्पत्ति हुई और छह खण्ड पर विजय प्राप्त करके वे भरत क्षेत्र के सातवें चक्रवर्ती हुए। इस प्रकार हस्तिनापुरी में एक के बाद एक ऐसे चार चक्रवर्ती और तीन तीर्थंकर उत्पन्न हुए। धन्य वह नगरी !

महाराजा अरहनाथने तिसरे २१००० वर्ष तक चक्रवर्ती रुप-से राज्य किया। पश्चात् एकबार चक्रवर्ती अरहनाथ आकाशमें शरद ऋतु के बादलों की सुन्दर रचना देख रहे थे कि बादल एकदम बिखर गये ! वह देखकर उन्हे संसार के समस्त संयोग की क्षणभंगुरता का विचार आया ..अरे, यह राजवैभव, यह शरीर और आयु समस्त सयोग क्षणभंगुर है; वे कोई जीव के साथ स्थिर रहनेवाले नही है; स्थिर रहनेवाले शाश्वत तो अपना ज्ञायक स्वभाव है:-

'मारो सुशाश्वत एक दर्शन-ज्ञानलक्षण जीव छे,
बाकी बधा संयोगलक्षण भाव मुजथी बाह्य छे,
कर्मोतणो जे विविध उदय विपाक जिनवर वर्णव्यो,
ते मुज स्वभावो छे नही, हूँ एक ज्ञायकभाव छुं.

-ऐसा विचारकर वे महाराजा वैराग्य भावनाओंका चिंतवन करने लगे; उसी समय उन्हे जातिस्मरण ज्ञान होनेपर वैराग्य दृढ़ हुआ और चक्रवर्ती पद त्याग कर जिनदीक्षा लेने को तत्पर हुए। उसी समय ब्रह्मस्वर्गसे लौकांतिक देवोंने आकर उन्हे वन्दन किया और उनके वैराग्य की प्रशंसा की। इन्द्रादि देव ‘वैजयन्त’ नामकी दिव्य शिबिका लेकर प्रभुके दीक्षा कल्याणक का मंगल-महोत्सव मनाने हस्तिनापुरी मे आ पहुँचे। चारो ओर महान वैराग्य का वातावरण छा गया। अरहनाथ प्रभुके साथ एकहजार राजा भी दीक्षा ग्रहण करने हेतु वनमें चले और उन चक्रवर्ती की हजारो रानियाँ भी संसार से विरक्त होकर आर्यिकाव्रत लेने को तैयार हो गई।

वैशाख शुक्ला दशम के सायंकाल चक्रवर्ती पदका समस्त वैभव त्यागकर महाराजा अरहनाथ हस्तिनापुरी के सहेतुक नामक सुन्दर वनमें आये; समस्त वस्त्राभूषण उतारकर सम्पूर्ण दिगम्बर दशा धारण की, और सिद्धों को वन्दन करके मुनि बन गये। तुरन्त शुद्धोपयोगी होकर आत्मध्यानमें लीन हुए कि उसी समय उनको चौथा ज्ञान एवं सप्तम गुणस्थान प्रगट हुआ।

दो दिन तक उपवास के पश्चात् मुनिराज अरहनाथने चक्रपुर नगरी के राजा अपराजित के हाथ से पारणा किया। वे राजा अपराजित तीर्थंकर मुनिराज को सर्वप्रथम आहारदान देकर धन्य हुए और मोक्षगामी बन गये। उस समय देवोंने भी आनन्दित होकर वहाँ रत्नवृष्टि, मंगलवाद्य आदि पांच आश्चर्य प्रगट किये।

हस्तिनापुरी के प्रथम दौ तीर्थंकरों की भाँति भगवान अरहनाथ भी १६ वर्ष मुनिदशा में विचरे। तत्पश्चात् हस्तिनापुरी के दीक्षावन में आकर आत्मध्यान में विराजमान हुए। कार्तिक शुक्ला द्वादशी के दिन श्रेष्ठ शुक्लध्यान द्वारा क्षपक श्रेणी चढ़कर केवलज्ञान प्रगट किया; प्रभु अरहनाथ अरिहंत परमात्मा बन गये…और १८ वें तीर्थंकर हुए। इस प्रकार भरत क्षेत्र के एकसाथ तीन तीर्थंकरों के कुल १२ कल्याणकमनाकर हस्तिनापुर नगरी धन्य हुई ! उसी समय तीर्थंकर प्रकृति रुपी दूती की प्रेरणा से इन्द्रादिदेव प्रभुकी सेवा करने आ पहुँचे और दिव्य समवसरण की रचना की, स्वर्ग की अपेक्षा उस समवसरण की अधिक शोभा देखकर इन्द्र भी आश्चर्यचकित हो गये। प्रभु अरहनाथ ने दिव्यध्वनि द्वारा नव तत्त्वोंका तथा रत्नत्रयरुप मोक्षमार्ग का अलौकिक उपदेश दिया। उसे सुनकर लाखों जीव धर्म को प्राप्त हुए और मोक्ष मार्ग मे चलने लगे।

प्रभु की धर्म सभामे २८०० केवलज्ञान प्राप्त अर्हतजिनेश्वर श्रीमण्डपमें प्रभुके समकक्ष गगनमें विराजते थे। अहा, अद्भुत आनन्दकारी था वह धर्मसभाका दृश्य ! श्री कुम्भस्वामी आदि ३० गणधरों सहित ५० हजार मुनिवर मोक्ष की साधना कर रहे थे, और ६० हजार आर्यिकाएँ मात्र एक श्वेतवस्त्र धारण करके पंचम गुणस्थान मे विराजती थी १,६०,००० धर्मात्मा श्रावक और ३००००० श्राविकाएँ थी। सर्वज्ञ भगवान अरहनाथ तीर्थंकर ने २१००० वर्ष तक भरत क्षेत्र के अनेक देशोंमें विहार करके धर्मोपदेश देकर वीतरागी धर्मचक्रका प्रर्वतन किया। जब आयुकर्म एक मास शेष रहा तब विहार एवं वाणी रुक गये और भगवान सम्मेदाचल के शिखर पर स्थिर हुए। चैत्र कृष्णा आमावस्या को सम्पूर्ण योग निरोधपूर्वक शेष अघातिकर्मोंका क्षय करके, ससार से मुक्त होकर शाश्वत मोक्षपुरी सिद्धालय में विराजमान हो गये। उन्हे नमस्कार हो !

‘अरि’ ( मोह) और ‘रज’ (तीन कर्म) से रहित हुए प्रभु अरहनाथ संसार के नाटक का अन्त करने सम्मेद शिखर की ‘नाटक’ टूक से मोक्ष पधारे।

अरहनाथ जिनराजकी नाटक टूंक है जेह,
मन-वच-तन कर पूज हूँ शिखर सम्मेद यजेह।

हे अरहनाथ देव ! अरि-रज से रहित जैसा सिद्धपद आपने प्राप्त किया वैसा सिद्धपद हमे भी शीघ्र प्राप्त हो !

[सातवे चक्रवर्ती तथा १८ वे तीर्थंकर श्री अरहनाथ भगवान का पावन चरित्र यहाँ पूर्ण हुआ।]

* * * ### सिद्धांत और प्रयोग… अर्थात…द्रव्यानुयोग और कथानुयोग भगवान तीर्थंकर देवकी वाणी द्वारा कहा गया द्रव्यानुयोग हो या कथानुयोग-कोई भी अनुयोग हो, उसमें जीवों के हितार्थ वीतरागताका ही उपदेश है। सबमें एक ही तात्पर्य है कि जीवों का कल्याण हो।

द्रव्यानुयोग मे जो बात सिद्धान्तरुप मे दर्शाई है वही बात कथानुयोग में प्रयोगरुप से बतलायी गई है जैसे कि “भूतार्थ स्वभाव का आश्रय करनेवाला जीव सम्यग्दृष्टि है-भूयत्थमस्सिदो खलु सम्माइट्ठी हवइ जीवो।” -ऐसा सम्यग्दर्शन का स्वरुप द्रव्यानुयोग मे बतलाया है, जब कि कथानुयोग में इस प्रकार भूतार्थ स्वभाव का आश्रय करके कौन-कौन से जीव किसप्रकार सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए-वह बात, भगवान महावीर की सिह पर्याय, भगवान ऋषभदेव का जुगलिया का भव, भगवान पार्श्वनाथ का हाथी का भव आदि के वर्णन द्वारा प्रयोगरुप से समझायी है, और वह भव्य जीवों को सम्यक्त्वकी प्रेरणा देती है। इस प्रकार सम्पूर्ण जिनवाणी भव्य जीवों को इष्टोपदेश देनेवाली है।

१९

भगवान मल्लिनाथ (भाग १)

[१९]

हे जिनवर ! तमे सत्यपुरुष छो मोक्षतणा पुरुषार्थी.
साधक जीवो सेवे तमने, आत्माना थई अर्थी;
प्रभुजी तारा सेवक कदिये स्त्री-अवतार न पामे,
भव भ्रमणनो अंत करीने पदवी सिद्धनी पामे.

हे भगवान मल्लिनाथ ! आप परम पुरुष हैं। आपका यह पवित्र पुराण भक्तिपूर्वक जो भव्य जीव सुनेंगे उनको चैतन्य धर्मकी आराधना जागृत होगी और संसारमें स्त्रीपर्यायका छेद हो जायगा। अहा, चैतन्य परमपुरुष की प्रतीति करनेवाले धर्मी जीव को कभी स्त्रीवेद का बंधन नहीं होता, तब फिर अनेक पूर्वभवों में रत्नत्रयसहित चैतन्य की आराधना करनेवाले तीर्थंकर-महात्माको स्त्रीपर्याय होने की बात ही कैसी ? अरे, तीर्थंकर जैसे महापुरुषको ‘स्त्री’ कहना वह तो उनकी कैसी आसातना है ? सिद्धान्तानुसार द्रव्यस्त्रीवेद का उदय मात्र पाँचवें गुणस्थान तक और भावस्त्रीवेद का उदय नौंवे गुणस्थान तक ही होता है, उससे ऊपर के गुणस्थानों में द्रव्य से पुरुषवेदीपना और भाव से अवेदीपना होता है।

हे प्रभो मल्लिनाथ जिनेश ! आपका पवित्र जीवन पूर्व भवों से ही रत्नत्रय द्वारा अलंकृत था, इसलिये स्त्रीवेद आदि अशुभ प्रकृतियाँ-जोकि मिथ्या दृष्टि जीवों को ही बँधती हैं, वे आपसे अत्यन्त दूर थीं; आपके आराधक जीवन की पहिचान और उसका चिन्तन करनेवाले जीव देव-गुरु सम्बन्धी मिथ्यात्व के शल्य को मल्ल की भाँति चूर-चूर कर देते हैं, सम्यक्त्व प्रगट करते हैं। आपको तो स्त्रीपर्याय नहीं थी, परन्तु जो भी आपकी प्रतीति करे उसको भी भविष्य की स्त्री पर्याय का सर्वथा छेद हो जाता है।

हे परमपुरुष तीर्थंकर मल्लिनाथ ! आप तो हमारे इष्टदेव हैं; इसलिये जीवों को मिथ्याभावों से छुड़ानेवाला तथा रत्नत्रयकी आराधना में लगानेवाला आपका सम्यक् जीवन यहाँ भक्तिपूर्वक कहता हूँ।

भगवान मल्लिनाथ पूर्वभव : विदेह में वैश्रवण राजा

जम्बूद्वीप के विदेहक्षेत्र में वीतशोका नामकी एक सुन्दर नगरी है। मोक्षाभिलाषी धर्मात्माओंसे भरपूर उस नगरी में जिनमन्दिरो के उन्नत शिखरों पर लहराती हुई धर्मध्वजाएँ मानो देवों को पुकार रही हैं कि-हे भाई देवो ! देवलोक में तुम्हें मोक्ष प्राप्त न होता हो तो वह प्राप्त करने के लिये यहाँ आओ ! इस नगरी में सदा केवली भगवन्त विचरते हैं और मोक्षके द्वार सदा खुले हैं।

तुम्हें प्रश्न होगा कि ऐसी सुन्दर नगरी का राजा कौन होगा ? सुन्दर नगरी का राजा भी सुन्दर ही होगा न ! तीर्थंकर मल्लिनाथ का आत्मा स्वयं पूर्वभव में इस मनोहर वीतशोका नगरीका राजा था…उनका नाम था वैश्रवण, वे आत्मज्ञानी थे, और उनका चित्त सदा रत्नत्रय की आराधना में लीन रहता था। एक बार वे राजसभा में बैठे थे, वहाँ उद्यान के मालीने आकर आनन्दपूर्वक बधाई दी कि-हे स्वामी ! अपनी नगरी के चन्दनवन में आज सुगुप्ति नामके महा मुनिराज पधारे हैं; जिस प्रकार साधक जीवों का हृदय रत्नत्रय द्वारा खिल उठता है उसी प्रकार सारा उद्यान बिना मोसम के आम्र आदि सुन्दर फल-फूलों से खिल उठा है। यह सुनते ही राजाने अत्यन्त हर्षविभोर होकर आनन्दभेरी बजवायी और नगरजनों सहित धामधूम से मुनिराज की वन्दना करने आये।

श्री मुनिराज ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा-हे राजन् ! तुम्हें मोक्ष के कारणरूप रत्नत्रय धर्म की वृद्धि हो !

मुनिराज के आशीर्वाद से राजा प्रसन्न हुए और बोले-हे नाथ ! आपके श्रीमुख से रत्नत्रय धर्म का स्वरूप श्रवण करने की चाहना है, कृपा करके रत्नत्रय का स्वरूप सुनाइये !

मुनिराज के श्रीमुख से मानो अमृत झरता हो ऐसी वाणी निकली-हे राजन् ! सुनो ! अनेक प्रकार के दुःखों से भरे हुए इस ससार से छुड़ाकर जो अनन्तसुख के धाम-ऐसे मोक्ष की प्राप्ति कराये उसका नाम धर्म है। वह धर्म अर्थात् मोक्षमार्ग सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ऐसे त्रिरत्नस्वरूप है; उसे पहिचानकर उसकी आराधना करो।

राजाने कहा-प्रभो ! उस रत्नत्रय धर्म में से प्रत्येक धर्म का स्वरूप सुनने की आकांक्षा है।

श्री मुनिराज ने कहा-सुनो ! रत्नत्रय में सर्व प्रथम सम्यग्दर्शन है। सर्वज्ञ-वीतराग जिनवर देव, निर्मोही गुरू और जीवअजीवादि सात तत्त्वों का स्वरूप बराबर जानकर, उनमें से सारभूत (भूतार्थ) अपने शुद्धात्मतत्त्व की अनुभूति करना सो सम्यग्दर्शन है। ‘शुद्धनय भूतार्थ है’ अर्थात् शुद्धनय और उसके विषयरूप शुद्ध आत्मा, उन्हें अभेद करके ‘भूतार्थ’ कहा है, और उस भूतार्थ का आश्रय करनेवाला जीव सम्यग्दृष्टि होता है। (भूयत्थमस्सिदो खलु सम्माइट्ठी हवइ जीवो।)

उस सम्यग्दर्शन के आठ अंग हैं :-※ तलवार की तीक्ष्ण धार जैसा श्रेष्ठ जिनमार्ग वह सन्मार्ग है; उसमें बिना किसी शंका के निश्चल रुचि करना, सो निःशंकित अंग है। (१)

※ धर्म के फल में संसारसुख की वांछा नहीं करना, किन्हीं भी विषयों में (पुण्यफल में) सुख नही मानना, सो निःकांक्षित अंग है। (२)

※ मलिन शरीरादि को देखकर धर्मात्मा के प्रति घृणा नहीं करना किन्तु उसके गुणों में प्रीति करना, सो निर्विचिकित्सा अंग है। (३)

※ सुखकर ऐसा जिनमार्ग और दुःखकर ऐसे अन्य मिथ्यामार्ग,-उनका स्वरूप जानना और मिथ्यामार्गों में किसी प्रकार सम्मति नहीं देना अथवा उनकी प्रशंसा नहीं करना, सो अमूढदृष्टि अंग है। (४)

※ साधर्मी के अवगुणों को ढँकना, वीतरागभावरूप जिनधर्म की वृद्धि करना; तथा धर्म की या धर्मात्मा की निन्दा के प्रसंग आने पर उन्हें योग्य उपायों द्वारा दूर करना, सो उपगूहन-अंग है। (५)

※ तीव्र दुःखादि किन्हीं भी कारणों से अपना या परका आत्मा धर्ममें शिथिल होने का प्रसंग आये, तो वैराग्य भावना द्वारा तथा जिनधर्म की महिमापूर्वक उसे धर्ममें स्थिर करना, सो स्थितिकरण अंग है। (६)

※ अपने साधर्मी भाई-बहिनों के प्रति हृदय में उत्तम भाव रखकर उनका आदर-सत्कार करना, सो वात्सल्य अंग है। (७)

※ अपनी शक्ति द्वारा जैनधर्म की शोभा बढ़ाना, अज्ञान को दूर करके तथा सम्यग्ज्ञान की महिमा प्रगट करके जिनधर्म को दिपाना, सो प्रभावना अंग है। (८)

इस प्रकार मुनिराज ने आठ अंगसहित सम्यग्दर्शन का स्वरूप समझाया।

पश्चात् वैश्रवण राजाने कहा-हे स्वामी ! सम्यग्दर्शन के आठ अंग और उनकी महिमा सुनकर अति प्रसन्नता हुई; अब कृपा करके सम्यग्ज्ञान का और उसके आठ अंगों का स्वरूप समझाइये।

सम्यग्ज्ञान और उसके आठ अंग

श्री मुनिराज बोले-जिनमार्ग में देव-गुरु-शास्त्र तथा उनके कहे हुए जीवादि नवतत्त्वों का स्वरूप जानकर, परभावों से भिन्न तथा अपने निजभावों से परिपूर्ण ऐसे, अपने ज्ञानमय शुद्धात्मा की अनुभूतिरूप ज्ञान सो सम्यग्ज्ञान है। सम्यग्दर्शन के साथ ही ऐसा सम्यग्ज्ञान नियम से होता है। सम्यग्ज्ञान अष्ट प्रकार की विनय से सुशोभित होता है:-(१) शब्द की शुद्धि, (२) अर्थ की शुद्धि, (३) शब्द तथा अर्थ दोनों की शुद्धि, (४) योग्य काल मे अध्ययन, (५) उपधान अर्थात् किसी नियम-तपसहित अध्ययन, (६) शास्त्र के विनयपूर्वक अध्ययन, (७) गुरुके प्रति उपकारबुद्धि प्रगट करना, ज्ञानदाता गुरु के नाम आदि नहीं छिपाना, सो अनिह्नव, और (८) स्तुति-पूजा, रथयात्रा आदि उत्सव तथा शास्त्रप्रचार द्वारा देवगुरु-आगमका और जिनधर्म की कीर्ति प्रगट करना।

इस प्रकार अष्ट अंगसहित विनय-आचार द्वारा सम्यग्ज्ञान शोभायमान होता है। सम्यग्ज्ञान अमृतसमान है, वही मोक्षमार्गी जीव की आँख है; सम्यग्ज्ञान चक्षु द्वारा सारा जगत दृष्टिगोचर होता है और वस्तुस्वरूप की प्रतीतिपूर्वक मोक्षमार्ग सधता है। उसकी नित्य आराधना करो।

राजाने प्रसन्नतापूर्वक कहा-हे प्रभो ! सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानपूर्वक जिसका पालन आप जैसे वीतराग मुनिवर करते है ऐसे सम्यक्चारित्र का स्वरूप कृपा करके कहिये।

सम्यक्चारित्र का स्वरूप; उसके तेरह प्रकार

चारित्रधारी मुनिराजने सम्यक्चारित्र का स्वरूप बतलाते हुए कहा-हे राजन् ! सुनो ! सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानपूर्वक शुद्धोपयोग द्वारा आत्मस्वरूप में लीन होना-विचरना सो चारित्र है। उस चारित्र में राग नहीं है। मुनियों को ऐसे शुद्धभावरूप चारित्र के साथ हिंसादि समस्त पापों का अभाव तथा अहिंसादि महाव्रतों का पालन होता है; इसलिये व्यवहार से चारित्र के तेरह प्रकार हैं - अहिंसा, सत्य, दत्त, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (यह पाँच महाव्रत), मनगुप्ति, वचनगुप्ति, कायगुप्ति (यह तीन गुप्ति), ईर्या, भाषा, एषणा, आदाननिक्षेपण तथा प्रतिष्ठापन (वह पाँच समिति)।

सर्वसंगपरित्यागी निर्ग्रन्थ मुनिवरों को रत्नत्रय की शुद्धपरिणति सहित ऐसे तेरह प्रकार के चारित्र का पालन होता है। यह सम्यक् चारित्र साक्षात् मोक्ष सुख देनेवाला है; उसकी महिमा अपार है।

हे भव्य ! इस प्रकार सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र का स्वरूप बतलाया; उन तीनों को तुम रागरहित जानो। “सरधो जानो भावो लाई, तीनों मे ही रागा नाही !”

हे मुमुक्षु जीवो ! रत्नत्रय की अचिन्त्य महिमा जानकर उससे आत्मा को अलंकृत करो। सम्यग्दर्शन रुपी हार को गले से लगाओ, सम्यग्ज्ञान के कुण्डल कानों में पहिनो, और सम्यक्चारित्ररूपी मुकुट को मस्तक पर धारण करो। सिद्धान्त का सर्वस्व यह रत्नत्रय है; यही जीव का सच्चा जीवन है; उसमें निश्चय रत्नत्रय शुद्धात्मा के आश्रित होने से परम उत्तम है; ध्यानमार्ग द्वारा उसकी प्राप्ति होती है और वह मोक्ष का साक्षात् कारण है; इसलिये मुमुक्षु जीवों को अवश्य ही प्रयत्नपूर्वक उसका आराधन करना चाहिये।

रत्नत्रय व्रतका विधान

रत्नत्रय की सुन्दर महिमा सुनकर भावी तीर्थंकर ऐसे उन वैश्रवण राजा ने कहा-हे स्वामी ! मेरी भावना ऐसे रत्नत्रय धारण करनेकी है, परन्तु इस समय मैं असमर्थ हूँ। इस समय तो सम्यग्दर्शन एवं सम्यग्ज्ञान की आराधना पूर्वक चारित्र की भावना भाता हूँ। हे प्रभो ! उस रत्नत्रय के प्रति परम भक्ति एवं बहुमानपूर्वक ठाटबाट से उसकी महापूजा करने की मेरी भावना है, इसलिये उस रत्नत्रय व्रत का निधान मुझे समझाइये। उसके द्वारा मैं रत्नत्रय की भक्ति करूँगा और भविष्य में उसकी साक्षात् आराधना करके चारित्रपद अंगीकार करूँगा।

श्री मुनिराज ने कहा-हे राजा ! आप भव्य हो, आपकी भावना उत्तम है, आगामी मनुष्यभव में आप भरतक्षेत्र के तीर्थंकर होनेवाले हो। रत्नत्रय के प्रति आपकी भक्ति प्रशंसनीय है। उस रत्नत्रय का व्रत-विधान मैं संक्षेप में कहता हूँ-सो सुनो :-भाद्रपद मासके शुक्लपक्ष में त्रयोदशी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमा-यह तीन दिन रत्नत्रय-विधानके उत्तम दिवस हैं। रत्नत्रय व्रत का उपासक जीव श्रद्धां-भक्तिपूर्वक एक दिन पूर्व जिनमन्दिर में जाकर पूजन करे, श्रीगुरु के निकट जाकर आत्महितकारी शास्त्र श्रवण करे, मुनिराज का सुयोग प्राप्त हो जाय तो उन्हें तथा अन्य साधर्मी जनों को आदरसहित आहारदानादि करे और रत्नत्रय व्रत का संकल्प करके अत्यन्त आनन्दोल्लासपूर्वक उसका प्रारम्भ करे।

पश्चात् त्रयोदशी-चतुर्दशी-पूर्णिमा तीनों दिन उपवास (अथवा शक्ति अनुसार एकाशनादि) करे; आरम्भकार्य छोड़कर गृहवाससे विरक्त रहे, सत्संग तथा धर्मध्यान में विशेषरूप से रहकर रत्नत्रय के स्वरूप का चिन्तवन करे, उसकी प्राप्ति कैसे हो उसका उपाय विचारकर अंतर में उसके लिये विशेष प्रयत्न करे। प्रतिदिन जिनमन्दिर में जाकर साधर्मिजनों के साथ जिनेन्द्र देव की पूजा करे तथा रत्नत्रय धर्म की स्थापना (मांडना) करके महान उल्लासपूर्वक उसकी पूजा करे। (जाप आदि विशेष विधिका योग बने तो वह विधि भी करना चाहिये। सुविधानुसार माघ एव चैत्र मास के इन तीन दिनों मे भी रत्नत्रय उपासना की विधि करते हैं।)

व्रत-उपासना के दिनों में उत्तम-पवित्र जीवन जीना चाहिये। प्रतिदिन प्रातःकाल वीतरागताके अभ्यासरूप (अर्थात् शुद्धोपयोग के प्रयोगरूप) सामायिक करना; दिनमें तथा रात्रि मे प्रमाद छोड़कर आत्मसन्मुख भावोंका अभ्यास करना; रत्नत्रयवन्त मुनियों के जीवन का चिन्तवन करके उसकी भावना करना; रत्नत्रयवन्त जीवों के प्रति आदरभाव से आत्माको रत्नत्रय के प्रति उत्साहित करना।

इस प्रकार शुद्धरत्नत्रय के प्रति तीव्र भक्ति एवं प्रेम के गद्गदभाव से अत्यन्त उल्लासपूर्वक तीन दिन तक पूजनादि करके, चौथे दिन उसकी पूर्णता के निमित्त से महान उत्साहपूर्वक जिनेन्द्र देवका अभिषेक करना। पूजन, शास्त्र-श्रवण, धर्मात्माओंका सन्मान, आहारदानादि करके फिर प्रसन्नचित्त से स्वयं पारणा करना, और इस अवसर पर दानादि द्वारा धर्मप्रभावना करना।

इस प्रकार तीन वर्ष तक (अथवा भावनानुसार पाँच या तेरह वर्ष तक) रत्नत्रयव्रत करके पश्चात् देव-गुरु-धर्म के महान उत्सव-भक्तिपूर्वक उसका उद्यापन करना। तन-मन-धन से-शास्त्रसे अनेक प्रकार उल्लासपूर्वक रत्नत्रयधर्म का उद्योत हो तथा सर्वत्र उसकी महिमा फैले इस प्रकार प्रभावना करना। जिनमन्दिर में तीन छत्र, तीन कलश, तीन शास्त्रादि अनेक प्रकारकी तीन-तीन वस्तुओं का दान करना; प्रीतिभोज आदि के द्वारा साधर्मियों का सन्मान करना। हे राजन् ! इस प्रकार रत्नत्रय व्रत का विधान जानो।

श्री मुनिराज के मुख से रत्नत्रय व्रत का विधान सुनकर वैश्रवण राजाने अत्यन्त हर्षपूर्वक वह व्रत धारण किया और महान उत्सव सहित उसका उद्यापन करके जैनधर्म की प्रभावना की।

इस प्रकार धर्म का आचरण करते-करते एक दिन राजा वैश्रवण वनविहार करने गये। प्रातःकाल उरते समय मार्ग में एक सुन्दर विशाल वटवृक्ष देखकर उन्हें विचार आया कि-वाह, यह कितना विशाल वटवृक्ष है ! मेरा राज्य भी इस वटवृक्ष जैसा विशाल एवं सुन्दर है ! परन्तु सायंकाल वनविहार करके लौटते समय उन्होंने देखा तो वह सुन्दर वटवृक्ष बिजली गिरने से जलकर भस्मीभूत हो गया था !-ऐसी क्षणभंगुरता देखकर राजा का चित्त एकदम संसार से विरक्त हो गया-अरे, मेरा यह राज्य और शरीर-भोग भी इस वटवृक्ष की भाँति क्षणभंगुर हैं-ऐसा विचारकर उत्तम बारह वैराग्य भावना पूर्वक, संसारभोगों से

रत्नत्रय-पुष्पों से शोभायमान धर्मवृक्ष

सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र वह मोक्षसुख का उपाय है। वे रत्नत्रय रागरहित हैं; इसलिये हे मोक्षार्थी जीवों ! उस रागसे भिन्न चेतना द्वारा रत्नत्रय की उपासना करो, और तीर्थंकर भगवन्तों की भाँति मोक्षसुख का अनुभव करो।

उदास होकर तथा शरीर का भी ममत्व छोड़कर, श्रीनग नामक मुनिराज के पास जाकर उन्हें जिनेश्वरी दीक्षा अंगीकार की, और आत्मध्यान में शुद्धोपयोग द्वारा सम्यक्रत्नत्रय दशा प्रगट की।

रत्नत्रयधारी उन वैश्रवण मुनिराज ने दर्शनविशुद्धि आदि षोडशकारण भावनाओं द्वारा तीर्थंकर नामकर्म बाँधा; बारह अंग के ज्ञान द्वारा वे श्रुतकेवली हुए; पश्चात् चार आराधना सहित समाधिमरण किया।

भगवान मल्लिनाथ : अपराजित विमान में

भावी तीर्थंकर ऐसे वैश्रवण मुनिराज समाधिमरण करके अपराजित विमान में अहमिन्द्रदेव हुए। वहाँ रत्नमयी शय्या में उत्पन्न होने पर कुछ ही समय पश्चात् वे देव अति उत्तम वस्त्रालंकारों से सम्पूर्ण सुसज्जित यौवनावस्था को प्राप्त हुए। उस स्वर्गलोककी अद्भुत-आश्चर्यजनक ऋद्धियाँ देखकर क्षणभर तो वे स्तब्ध रह गये कि-अरे, यह सब क्या है !! उसी समय उनको अवधिज्ञान प्रगट हुआ और उन्होंने जान लिया कि-“पूर्वभव में मैंने जैनधर्म के रत्नत्रय का उत्तम प्रकार से पालन किया था, तथा उत्तम तप किया था, उसीके पुण्यबंध का यह फल है।” अहो, धर्म की महिमा का क्या कहना !! आत्माकी अनुभूति में जो कल्पनातीत आनन्द है उसकी तुलना इस स्वर्गलोक की विभूति से नहीं हो सकती। चैतन्य विभूति की महिमा का चिन्तवन करते ही उनका स्वर्गलोक की विभूति सम्बन्धी विस्मय शांत हो गया। सर्व प्रथम वे उस देवविमान के शाश्वत जिनमन्दिर में गये और भक्तिपूर्वक जिनेन्द्र-पूजा की। उस स्वर्गलोक में समस्त देव सम्यग्दृष्टि थे और अधिकांश तो एकावतारी थे। समस्त आत्मानुभवी धर्मात्माओं का जीवन विषय-वासनारहित, संसार से विरक्त तथा-अन्यत्र उपशांत था। वे स्वानुभवपूर्वक जानते थे कि सच्चा सुख आत्मा स्वयं ही है; जिस प्रकार ज्ञान वह आत्मा ही है, आत्मा से भिन्न नहीं है, उसी प्रकार सुख भी आत्मा ही है, आत्मा से भिन्न अन्यत्र कहीं सुख नहीं है। ऐसा जानने के कारण वे महात्मा स्वर्ग लोक की दिव्यविभूति के बीच असंख्य वर्ष तक रहनेपर भी उसमें मूर्च्छित नहीं हुए थे, अपनी चेतना को उससे अलिप्त रख सके थे…परसे विभक्त एवं आत्मा से एकत्वरूप परिणमन द्वारा उनकी मोक्षसाधना चल ही रही थी। अपराजित विमान में दूसरे अहमिन्द्रों के साथ वे कैसी सुन्दर धार्मिक एवं आध्यात्मिक चर्चा करते थे उसका थोड़ा रसास्वादन जिज्ञासु पाठकों को कराता हूँ।

[अपराजित विमान में अहमिन्द्रो की अद्भुत चर्चा]

एक बार तीर्थंकर भगवान के केवलज्ञान-कल्याणक का प्रसंग बना। अहमिन्द्रों को भी खबर पड़ी कि मनुष्य लोक में किन्हीं तीर्थंकर को केवलज्ञान हुआ है; उन्होंने वहीं बैठे-बैठे अवधिज्ञान द्वारा वह दृश्य प्रत्यक्ष देखा। यद्यपि स्वर्गलोकके जीवन में उन्होंने तीर्थंकरों के कल्याणक असंख्य बार देखे थे, परन्तु जब भी देखते तब उनके अंतर में उस परमात्मपद की अचिन्त्य महिमा की उर्मियाँ जागृत होती थीं। तीर्थंकर के केवलज्ञान का प्रसंग बनते ही अहमिन्द्र मिलकर आनन्दसहित चर्चा करने लगे :-एक अहमिन्द्र बोले : अहा, इस समय मनुष्यलोक में किन्हीं तीर्थंकर को केवलज्ञान हुआ है; वे परमात्मा हो गये। यद्यपि मनुष्यलोक में प्रत्येक छह महीने में ६०८ जीव केवलज्ञान प्राप्त करते हैं…

दूसरे : वाह, केवलज्ञान की महिमा अद्भुत-अचिन्त्य है; उस पदमें चैतन्य के सर्व निधान खुल जाते
हैं!

तीसरे • अहा, अब हमें यहाँ से मनुष्यलोक में जाकर ऐसे केवलज्ञान की साधना करना है, केवलज्ञान अब अपने लिये दूर नहीं है; दिन-प्रतिदिन निकट ही आता जा रहा है।

चौथे : वास्तव में केवलज्ञान सर्वोत्कृष्ट मांगलिक है।

पाँचवें : और हम सबका आत्मा भी उस केवलज्ञान के साथ सम्बन्धित है, इसलिये हम सब भी
मंगलरूप हैं।

छठवें · आपकी बात सच है! वास्तव में आत्मा का चेतन-स्वभाव त्रिकाल मंगलरूप है, वही केवलज्ञानरूप परिणमता है सातवे • अहा यह एक अद्भुत बात है आत्मा त्रिकाल मंगल और उसे स्वीकार करनेवाला सम्यक्त्वादिभाव भी मंगल ; इस प्रकार आत्मा द्रव्य-पर्याय दोनों से मंगल रुप है।

आठवे : अहा, आत्मस्वभाव के सन्मुख होकर उसमें तन्मयरुप से परिणमित जो भी भाव हैं वे सब
मंगलरूप है।

नौवें ऐसे भावरूप परिणमित आत्मा सर्वत्र सुन्दर है। यहाँ सम्यक्त्वरुप हुए हम अहमिन्द्र अथवा सातवें नरक मे सम्यक्त्वरूप परिणमित जीव,-वे सब मगल हैं, श्रेष्ठ है।

दसवें : ठीक है, स्वभाव में एकत्वरुप तथा विभावों से विभक्तरूप ऐसे एकत्व-विभक्तरूप हुए आत्मा जगत मे सर्वत्र शोभायमान होते है। [अहमिन्द्रों में होनेवाली यह अद्भुत तत्त्वचर्चा हम पढ़ रहे हैं। सर्व अहमिन्द्र श्रुतज्ञान में पारंगत हैं, स्वानुभव में कुशल हैं तथा वैराग्यरस में निमग्न हैं, इसलिये उनकी चर्चा भी त्रुटिरहित और शांतरस से भरपूर है। सभी समान विचारवाले हैं और एक-दूसरे के ज्ञान-वैराग्य की पुष्टि करनेवाले हैं। चर्चा करनेवाले उन अहमिन्द्रों मे से अनेक जीव तो वहाँ से सीधे तीर्थंकर रूप से अवतरित होनेवाले हैं; जिनमें अपने चरित्रनायक मल्लिनाथ भगवान भी हैं। वे सब जो आनन्दकारी चर्चा असंख्यात वर्षों तक करते हैं-यह उसके एक अंश का आस्वादन है:-]

ग्यारहवें · अपना जीवन इस स्वर्गलोक में यद्यपि सम्यक्त्वादि के कारण मंगलरूप है, परन्तु केवलज्ञानरूप पूर्ण मंगल हमें यहाँ प्राप्त नहीं होता।

बारहवें : हम इस एक देव पर्याय में असंख्यात तीर्थंकरों के पंचकल्याणक अवधिज्ञान द्वारा प्रत्यक्ष देखते हैं, और उनमें भी दीक्षा कल्याणक तथा केवलज्ञान देखकर हम जिनदीक्षा और केवलज्ञान की भावना भी भाते हैं; परन्तु हम संयम धारण नहीं कर पाते।

तेरहवें : तथापि जिसमें से केवलज्ञान प्रगट होना है ऐसे चैतन्यस्वभाव की अगाध-गम्भीर महिमा हम स्वानुभव से साक्षात् जानते हैं- अहा, उस गहरे-गहरे आत्म स्वभाव में कैसी अद्भुतता है।।

चौदहवें : वाह! उस स्वभाव की साधना तो हम कर ही रहे हैं; हमारा आत्मा चारित्र तथा केवलज्ञान के सन्मुख ही जा रहा है। हम सब पूर्वभव में मुनि थे और चारित्रदशा का रसास्वादन हमने किया है।

पन्द्रहवें : हाँ, और अब आगामी भवमें भी चारित्रदशा प्रगट करके मुनि होंगे तथा केवलज्ञान प्राप्त करेंगे सोलहवें : अरे, रत्नत्रय की वीतरागी दशा जैसा सुख तो इस अहमिन्द्रपद में भी नहीं हैं। आत्मसाधना अपूर्ण रही और रागभाव शेष रह गया, इसलिये यह अवतार हुआ है।

सत्रहवें : यहाँ असंख्य वर्षों तक हम सब इस धर्मात्माओं के मेले में अहमिन्द्ररूप से साथ रहे; सचमुच धर्मात्माओं को देखकर हृदय में प्रेम एवं प्रसन्नता उमड़ते हैं!

अठारहवें : सच है, और यहाँ तो अपने साथी अहमिन्द्रों में से कुछ तो तीर्थंकर होनेवाले हैं। देखो, यह जो पास बैठे हैं यह पूर्वभव में वैश्रवण मुनि थे और कुछ ही वर्षों पश्चात् भरतक्षेत्र में मल्लिनाथ तीर्थंकर होंगे। (सर्व अहमिन्द्रोंने प्रसन्नतापूर्वक उन भावी तीर्थंकर की ओर देखा।)

तब वे उन्नीसवें अहमिन्द्र बोले : अहा, रत्नत्रय के साधक हम सब संसार समुद्र के किनारे पहुँच गये हैं। अपने आत्मा के रत्नत्रय ही हमारे तारणहार हैं.. भले उनके साथ तीर्थंकरत्व हो या न हो; तीर्थंकरत्व तो कर्म के उदय का कार्य है; रत्नत्रय तो अपना आत्मिकभाव है, उसमें हम सब समान हैं।

बीसवें : यथार्थ है प्रभो! (सर्व अहमिन्द्र परस्पर प्रभु कहकर सन्मानपूर्वक सम्बोधन करते हैं-प्रभो!) तीर्थंकरत्व यद्यपि कर्मोदयजनित है, तथापि वह उदय नियम से केवलज्ञान के साथ ही होता है। इस प्रकार महामंगल रूप केवलज्ञान-परमात्मपद का सहकारी होने से वह तीर्थंकरत्व भी मंगल है, तथा जगत के जीवों को भी वे सम्यक्त्वादि मंगल का कारण होते हैं। वास्तव में तीर्थंकर अपने परमात्मपद को साधकर जगत को भी परमात्मपद का उपाय बतलाते हैं।

भरतक्षेत्र में एक हजार करोड़ (१,०००,०००००००) वर्ष तक कोई तीर्थंकर नहीं हैं, अब वहाँ १९ वें तीर्थंकर का अवतार होने की तैयारी है। अपने यह १९ वें अहमिन्द्र छह महिने पश्चात् यहाँ से भरतक्षेत्र में १९ वे तीर्थंकर के रूप में अवतरित होंगे और यह जो दूसरे अहमिन्द्र विराजते हैं वे भी भरतक्षेत्र मे २१ वें नमिनाथ तीर्थंकर होंगे। इस चर्चा से अहमिन्द्रों में पुनः प्रसन्नता की लहर दौड़ गई।

-इस प्रकार लाखों-करोड़ों अहमिन्द्र-धर्मात्मा चर्चा मे भाग लेते और सबके अंतर में से केवलज्ञान की परम महिमा प्रगट होती थी। इस प्रकार ज्ञायकस्वभाव की महिमा का मथन करते-करते अनेक अहमिन्द्र तो पुनः पुनः निर्विकल्प स्वानुभूति कर लेते थे। यद्यपि उनके गुणस्थान-परिवर्तन नहीं होता था, तथापि स्वानुभूतिकी विशुद्धि वृद्धिंगत होती थी।

इस प्रकार परम चैतन्य महिमा से भरपूर धर्मचर्चा करते-करते वर्षों के वर्ष कहाँ बीत जाते-उसकी खबर नहीं पड़ती थी। क्षेत्र से तथा भावसे मोक्षनगरी के निकट ही स्थित वे मोक्षसाधक महात्मा लगभग सिद्धसमान सुखी जीवन जीते थे; इसलिये असंख्य असंख्य वर्षतक वहाँ रहने में उन्हें अरुचि, थकान, या बेचैनी नहीं होती थी।

वे अहमिन्द्र जानते थे कि इस स्वर्गलोक में सम्यक्त्वसहित तथा धर्म भावना पूर्वक असंख्य वर्ष रहने पर भी चारित्ररूप मुनिदशा के बिना यहाँसे मोक्ष की साधना नहीं हो सकेगी; मोक्ष की साधना तो मनुष्य लोक में ही होगी;-इसलिये चारित्रपूर्वक मोक्ष साधना की भावनासे वे महात्मा स्वर्ग लोक से विमुख और मनुष्य लोक के सन्मुख रहने लगे।

अभी उनको मनुष्य लोक में आने में छहमास शेष थे, परन्तु तीर्थंकर प्रकृति के प्रभाव से मनुष्य लोक में कैसे-कैसे आश्चर्य एवं चमत्कार होने लगे! वह देखने के लिये हम मिथिलापुरी चलेंगे।

[यहाँ भगवान मल्लिनाथ के पूर्वभवका वर्णन पूरा हुआ।]

भगवान मल्लिनाथ : पंचकल्याण

नमुं हु मल्लिनाथने ब्रह्मचारी भगवान;
विनवुं प्रभुजी आपजो… रत्नत्रय गुणवान।

भरतक्षेत्र में तीर्थंकरों की विहारभूमि के रूपमें प्रसिद्ध ऐसे बिहार देश के निकट बंगभूमि है; उसके मध्यभाग में अत्यन्त शोभायमान मिथिलानगरी थी; जैनधर्म के परम उपासक महाराजा ‘कुंभ’ वहाँ राज्य करते थे; वे वास्तव में सम्यक्त्वादि गुणों से भरपूर कुंभ थे; उनकी पटरानी का नाम ‘प्रभावती’ था। धार्मिक समृद्धि से सुशोभित उस मिथिलानगरी में एक बार महान पुण्योदय होने से अचानक चमत्कार हुआ…राजभवन के प्रांगण में बहुमूल्य करोड़ों रत्नों की वर्षा होने लगी; उन रत्नों का दिव्य प्रकाश मिथ्यात्व-अंधकार के नाश की सूचना दे रहा था। उसी समय आकाश मार्ग से कुछ देवांगनाएँ मिथिलापुरी में आयीं और महारानी प्रभावती की स्तुति करके कहने लगीं-हे माता ! छहमास पश्चात् अपराजित स्वर्गलोक से १९ वें तीर्थंकर का जीव आपकी कुक्षि में अवतरित होनेवाला है; उसके महान पुण्यातिशय से आकर्षित होकर हम आपकी सेवा करने आये हैं ! जगत की माताओं में आप सर्वश्रेष्ठ एवं भाग्यवान हैं कि तीर्थंकर समान त्रिलोकपूज्य पुत्रको जन्म देंगी !

यह शुभ समाचार सुनकर तथा नये-नये दृश्य देखकर महारानी प्रभावती की प्रसन्नता का पार नहीं रहा। सारी मिथिलानगरी में भी चारों और आनन्द छा गया। भगवान ऋषभदेव-अवतार के समय अयोध्या नगरी जैसी शोभायमान हो उठी थी वैसी ही मिथिलानगरी भगवान मल्लिनाथ-अवतार के समय सुशोभित हो उठी। अहा, स्वर्गके देव स्वयं जिसका श्रृंगार कर रहे हों, और जिस नगरी में स्वयं तीर्थंकर अनेक वर्ष तक निवास करने वाले हो उसके गौरव और शोभा का क्या कहना !!

महाराजा कुम्भ और महारानी प्रभावती के जीवन में भी विशिष्ट परिवर्तन होने लगा; उनके विचार महान होने लगे, परिणामों में विशुद्धता आने लगी। महादेवी प्रभावतीने चैत्र शुक्ला प्रतिपदा के दिन तीर्थंकर के जन्मसूचक दैवी ऐरावत हाथी आदि अतिमंगलमय सोलह स्वप्न देखे…और ठीक उसी समय अपने चरित्रनायक भगवान मल्लिनाथ के जीवने अपराजित विमान से चयकर महारानी के गर्भ में प्रवेश किया। जगत के लिये वह एक महामांगलिय क्षण था। इन्द्रादि देव मिथिलापुरी में आये और माता-पिता का सन्मान करके अपना हर्ष व्यक्त किया। उदरमें विद्यमान तीर्थंकर के प्रताप से महारानी प्रभावती को धर्मके उत्तम मनोरथ जागृत होने लगे…देवकुमारियाँ उनका मनोरंजन करती थीं और माताजी भी विभिन्न प्रकार की आश्चर्यजनक बातों से उन देवियों को मुग्ध करती थीं। माताजी की बातें सुनकर ऐसा लगता था मानों उनके उदर में विद्यमान तीर्थंकर ही बोल रहे हों ! जिससे वे देवकुमारियाँ भी अति आनन्दित होती थीं।

एक बार एक देवीने 'माताजी से पूछा-हे माता ! इस संसार में जीवराशि भिन्न-भिन्न जाति की है, तथापि उन स्त्रियों में महान सौभाग्यशाली कौन होता है ?

माताजीने उत्तर दिया-तीर्थंकर की जननी परम सौभाग्यशालिनी है; तथा स्त्री पर्याय में भी जो सम्यग्दर्शनादि प्रगट करे, उसका अवतार धन्य है ।…और तुम देवियाँ भी परम भाग्यशाली हो कि तीर्थंकर के सान्निध्य में रहकर उनकी सेवा करने का परम सौभाग्य तुम्हें प्राप्त हुआ है !-यह सर्व स्त्रियाँ निकट मोक्षगामी हैं; तथा वह इन्द्राणी भी महाभाग्यशालिनी है कि तीर्थंकर का जन्म होते ही उन्हें सर्व प्रथम गोदमें लेने का सुअवसर उसे प्राप्त होता है और वह भी एक मोक्षगामी होती है। अहा, तीर्थंकर होनेवाले आत्मा की महिमा कोई अचिन्त्य है !.. * एक देवी ने पूछा-हे माता ! मुमुक्षु जीवों को पीने योग्य अमृत कौन सा है ? -माताजी मुस्कराते हुए बोलीं ‘मेरे पुत्रकी वाणी।’

* हे माता सर्वश्रेष्ठ कार्य कौनसा है ? … ‘आत्मा की अनुभूति ।’

* जगत में मूर्ख कौन है ? … जो तीर्थंकर के मार्ग में न चले वह !

* जगत में सचमुच कौन बुद्धिमान है ?..तीर्थंकर का मार्ग प्राप्त करके जो आत्महित साधे
वह।

* हे माता ! जगत में कौन सच्चा वैभव सम्पन्न है ?.. जिसके पास रत्नत्रयरूपी धन है , वह सच्चा वैभवसम्पन्न है ?

* जगत में निर्धन-भिखारी कौन है ? … जो धर्मको भूलकर विषयों में आसक्त है वह।

* जगत में महान् पुण्य कौनसा है ?..तीर्थंकर परमात्मा के साक्षात् दर्शन हों वह।

* हे माता ! इन्द्र भी किसका सेवक है ?

  • ‘मेरे पुत्रका।’ (तीर्थंकर जिनदेव का इन्द्र सेवक है।)

-ऐसे अनेक प्रकार से वे तीर्थंकर की महिमा कर-करके अपनी धर्मभावना को पुष्ट करती थीं। एक आश्चर्य की बात यह थी कि गर्भस्थ शिशु की वृद्धि हो रही थी किन्तु माता का उदर नहीं बढ़ता था। माता-पुत्र दोनों के दिन सुखमय व्यतीत हो रहे थे।

मार्गशीर्ष शुक्ला एकादशी का दिन है; स्वर्गलोक में इन्द्रसभा हो रही है; अनेक प्रकार से संगीत-नृत्य द्वारा तथा जिनशासन की महिमा की चर्चा से सर्वत्र आनन्द छा रहा है; इतने में अचानक समस्त स्वर्गलोक दिव्य घण्टारव से झनझना उठा, इन्द्रासन भी डोलने लगा। सब आश्चर्य में पड़ गये कि-अरे, यह क्या ! इन्द्रने आश्चर्यचकित होकर अवधिज्ञान का प्रयोग करके जान लिया-‘अहा ! भरतक्षेत्रकी मिथिलापुरी में तीर्थंकर का अवतार हुआ है…आनन्द…महाआनन्द ! चलो देवो, प्रभुका जन्म-महोत्सव मनाने मिथिलापुरी में चलें।’

माता प्रभावतीने तीर्थंकर पुत्र को जन्म दिया। सारी नगरी दिव्य प्रकाश से जगमगा उठी। नगरजनों का आनन्द का सागर उमड़ पड़ा !..आकाश में देवों वाद्य बजने लगे…रत्नवृष्टि होने लगी…और देवों के विशाल समूह सहित इन्द्र-इन्द्राणी जयजयकार करते हुए मिथिलापुरी में उतरे। उस समय इतने देवों का दैवी ठाटबाट देखकर आश्चर्य होता था कि अरे, यह मिथिलापुरी है या अमरापुरी !..एक देवने स्वयं ऐरावत हाथी का रूप धारण किया था, उसकी शोभा अद्भुत-चमत्कारिक थी !

ऐरावत पर आकर इन्द्र महाराजने मिथिलापुरी नगरी की तीन प्रदक्षिणाएँ करके उसका सन्मान किया…फिर इन्द्राणी राजभवन में जाकर बालतीर्थंकर को गोदमें लेकर आ गई। अहा, देवी पर्यायमें इन्द्राणी को यद्यपि पुत्र नहीं होता, परन्तु तीर्थंकर समान पुत्रको अपनी गोदमें लेते हुए उसके आनन्दका पार नहीं रहा। तीर्थंकरके स्पर्श से उसका आत्मा किसी कल्पनातीत अनुपम सुख का वेदन कर रहा था ! और स्पर्श से भी परे आत्मा के अतीन्द्रिय स्वभाव की महिमा का चिन्तवन करके उस देवीने सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लिया। उन बालतीर्थंकरको ऐरावत पर विराजमान इन्द्र को सौंपते हुए इन्द्राणी बोली-अहा देव ! आज मेरा जीवन धन्य हो गया . तीर्थंकर को गोदमें लेकर उनके सीधे स्पर्श से मैं मोक्षगामी हो गई ! माताजी के निकट उनकी सेवा में रहनेवाली छप्पन कुमारी देवियों के आनन्द का तो आज पार नहीं था उन्हें विचार आ रहा था कि-इन्द्राणी तो जन्मकल्याणक मना कर आज ही स्वर्ग में चली जायेंगी, जबकि हम तो वर्षों तक बालतीर्थंकर के साथ रहेंगे और उन्हें प्रतिदिन गोद में लेकर खिलायेंगे ।

मेरु पर्वतपर ले जाकर इन्द्रने तीर्थंकर के जन्माभिषेकका अति भव्य महोत्सव किया। मेरु पर ध्यान करने वाले मुनिवर भी यह देखकर जिनेन्द्रमहिमा में लीन हो गये; विद्याधर भी आश्चर्यचकित एव मुग्ध होकर तीर्थंकर-महिमा देख रहे थे। अरे, स्वयं इन्द्र-इन्द्राणी भी जिन्हें देखकर आनन्द से नाच उठें-उन तीर्थंकर की महिमा का क्या कहना ! और अभी जब बाल-तीर्थंकर (द्रव्य-तीर्थंकर) की इतनी महिमा है तो केवलज्ञान को प्राप्त साक्षात् भाव-तीर्थंकर की महिमा का तो कहना ही क्या !! जन्माभिषेक मे एक विशेषता थी-सामान्यतः तो स्नान किया हुआ मनुष्य शरीर से स्पर्शित जल.अपवित्र हो जाता है जबकि भगवान के दिव्य शरीर का स्पर्श करके वह जल तो ऐसा पवित्र एवं सुगन्धयुक्त हो गया था कि देवो ने भी उस गन्धोदक को मस्तक पर चढ़ाया। प्रभु का जन्माभिषेक करने के पश्चात् इन्द्र ने जगत को आश्चर्यचकित कर देनेवाला ताण्डवनृत्य किया, और इन्द्राणीने स्वर्ग से लाये हुए सर्वोत्तम वस्त्राभूषणों द्वारा भगवानका श्रृंगार किया, मंगलतिलक किया। भगवान के चरण में कुम्भ (कलश) का मंगल-चिह्न था, जो ऐसा सूचित करता था कि यह भगवान ‘अमृत के कुम्भ’ हैं, धर्मरूपी अमृत के घट उनके अंतर में भरे हैं। इन्द्रने ‘मल्लिकुमार’ सम्बोधनपूर्वक १००८ उत्तम गुणों के वर्णन द्वारा प्रभु की महान स्तुति की-अहो देव मल्लिनाथ ! आप परम पुरुष हो, कामशत्रु को जीतने के लिये आप मल्ल हो; मोक्ष पुरुषार्थ के आप नायक हो। हे देव ! आपकी स्तुति करके हम किसी सांसारिक विभूति की याचना नहीं करते, हम तो रागरहित परमात्म पद की अभिलाषा करते हैं; आप जैसी चैतन्यविभूति प्राप्त करने के लिये हम आपका सेवन करते हैं।

इस प्रकार विदेह क्षेत्र के मध्यस्थित मेरु पर्वत पर जाकर वहाँ सिद्धशिला के समान सुशोभित पाण्डुक शिला पर मल्लिकुमार प्रभुका जन्माभिषेक करने के पश्चात् वह प्रभु की शोभायात्रा सहित इन्द्रसेना भरतक्षेत्र में आयी और मिथिलापुरी के राजभवन में आनन्दमय नृत्य-नाटक द्वारा पुनः भव्य महोत्सव किया। पिता महाराजा कुम्भ एव माता महादेवी प्रभावती का भी सन्मान किया। अहा उस समय राजभवन की शोभा अनुपम थी ! जिसमें तीर्थंकर स्वयं निवास करते हों-उसकी महिमा का क्या कहना !-देखो न, मुमुक्षु के अंतर में परमात्मा विराजते हैं, इसलिये उसकी अद्भुत शोभा पर मुक्तिसुन्दरी भी मुग्ध हो जाती है ! मिथिला के प्रजाजन आज अपने को स्वर्ग, के देवों से भी गौरवशाली मान रहे थे,-क्योंकि स्वर्गलोक का राजा इन्द्र उनकी नगरी में आकर नृत्य कर रहा था ! ऐसी अपूर्व जिनमहिमा देखकर अनेक जीव तो जैनधर्म की श्रद्धा से सम्यग्दृष्टि हो गये थे।

१९

भगवान मल्लिनाथ (भाग २)

प्रभु के जन्मोत्सवके हर्षोपलक्ष में महाराजा कुम्भ की ओर से याचकों को इच्छानुसार दान दिया जा रहा था; परन्तु प्रजाजन इतने तृप्त थे कि ‘किमिच्छक’ दान लेनेवालों की भीड़ नहीं थी। प्रभुजन्मके हर्ष में अपराधी जनों को भी कारागृह से मुक्त कर दिया गया, और उन अपराधियों ने भी जिनेन्द्र महिमा जानकर अपने हृदय परिवर्तन द्वारा पाप प्रवृत्ति छोड़कर सदाचार युक्त धार्मिक जीवन अंगीकार किया। गली-गली में और घर-घर में ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं, मंगल बधाई के गीत गाये जा रहे थे और रंगबिरंगे रत्नों के चौक पूरे जा रहे थे। ‘अहा, अपनी नगरी में भगवान का जन्म हुआ है’…यह एक ही बात स्त्री-पुरुष एवं बालबृद्धों की चर्चा का विषय थी। लोगों के झुंड के झुंड राजभवन के प्रांगण में जाते और बालप्रभु का दिव्य तेज देखकर हर्षविभोर होकर लौटते थे। ‘अहा, हमने भगवान के साक्षात् दर्शन किये’-ऐसी तृप्ति का अनुभव करते और जीवन को धन्य मानते। यद्यपि अनेक लोग तो प्रभु के शरीर की ही दिव्यता देखकर मोहित होते थे; शरीर से भिन्न उनके सम्यक्त्वादि आत्मगुणों की सुन्दरता का अनुभव तो कोई भेदविज्ञानी ही करते थे; और जो आत्मिक सौन्दर्य के दर्शन करते वे अपने में भी सम्यक्त्वादि भावों द्वारा अपने आत्मा की शोभा का अनुभव करते थे। क्योंकि-

चेतनमयी शुद्ध भावसे जो जानता अरहंत को;
सम्यक्त्व ले आनन्द से वह जानता निज आत्म को।

१८ वें तीर्थंकर अरहनाथ के पश्चात् एक हजार करोड़ वर्ष बीतने पर १९ वें तीर्थंकर मल्लिनाथ हुए; उनका बचपन अनोखा था। उनके साथ देव क्रीड़ा करने आते थे; कोई हाथी के बच्चे का रुप धारण करके नन्हें-से प्रभु को सूँड़ पर बैठाकर झुलाते और पीठ पर सवारी कराते थे; कोई बन्दर का रुप बनाकर उन्हें हँसाते थे। देवियाँ प्रभुको झूला झुलातीं और ऊँचे-ऊँचे पेंग भरातीं…परन्तु बालप्रभु डरते नही थे। कभी-कभी तो देव रत्नमयी विमान में बैठाकर प्रभु की गगन-विहार कराते थे। उनकी बालक्रीड़ाएँ जीवहिंसारहित निर्दोष थीं। वे देव-देवियाँ मात्र प्रभुके साथ मनोविनोद ही नहीं करते थे, साथ ही आत्मा की नई-नई बातें पूछ कर प्रभुसे आत्मज्ञान भी प्राप्त कर लेते थे। मल्लिकुमार जब आनन्दपूर्वक शांतचेष्टासे आत्मा की महिमा कहते तब आठ-दस वर्षके कितने ही बालक तथा बालिकाएँ भी आत्मज्ञान प्राप्त कर लेती थीं। इस प्रकार तीर्थंकर प्रकृति का उदय आने से पूर्व ही उन बालतीर्थंकर ने तीर्थंकरत्व का कार्य प्रारम्भ कर दिया था। उनका आत्मा ही स्वयं तीर्थरुप था, -फिर जड़ प्रकृति की क्या आवश्यकता ? ज्ञानचेतना से भरपूर उनकी बाल चेष्टाएँ देखकर तथा अमृत जैसी मीठी वाणी सुनकर माता-पिता एवं प्रजाजन अति प्रसन्न होते और तृप्ति का अनुभव करते थे।

अब मल्लिकुमारने बचपन छोड़कर युवावस्था में प्रवेश किया। उनका शरीर वज्रसमान सुदृढ़, सर्वांगसुन्दर एवं उत्कृष्ट पुण्य रुप परमाणुओं से निर्मित था; उनकी आयु ५५००० वर्ष थी; उनके लिये इन्द्र स्वर्गलोक से उत्तमोत्तम भोगोपभोग की सामग्री भेजता था; ऐसे लोकोत्तर वैभव में भी राग-द्वेष से परे समभाव-वेदन उनके चल ही रहा था। उनका जीवन व्रतसम्पन्न था-‘सदन निवासी तदपि उदासी’…ऐसे वे प्रभु प्रतिदिन निर्विकल्प आत्मध्यान करते थे। अहा, निर्विकल्प रसका पान करनेवाले भगवान क्या संसार में थे ?-या संसार से अलिप्त थे ?-उनके अंतरके उस गुप्त रहस्य को ज्ञानीजन ही जानते थे।

युवराज मल्लिकुमार कभी-कभी राजसभा को भी सुशोभित करते और वहाँ न्याय-नीति एवं धर्म की आश्चर्यजनक चर्चा करके सभाजनों को मुग्ध कर देते थे। अब तो, माता-पिता भी पुत्रवधू को देखने के लिये आतुर थे, परन्तु कुमार की उदासवृत्ति देखकर वे आग्रह नहीं कर सकते थे।

युवराज मल्लिकुमार अब १०० वर्ष के हो गये। अत्यन्त सुन्दर रूपवान होने पर भी वे मुक्तिसुन्दरी के सिवा किसी अन्य स्त्री के प्रति आकर्षित नहीं हुए थे; मोक्षमें ही उनका मन लगा हुआ था। एक बार राजा पृथ्वीपति की ओर से अपनी पुत्री रतिकुमारी के लिये उनकी मँगनी आयी। रतिकुमारी अति रूपवती एवं सर्वगुण-सम्पन्न होने से मल्लिकुमार के माता-पिता को वह कन्या पसन्द आ गई; तब मल्लिकुमार मौन रहे, किन्तु उनकी मन्द मुस्कान से माता-पिता उनकी संमति समझ गये और तुरन्त ही विवाह की तैयारियाँ होने लगीं। मगसिर शुक्ला एकादशी उनका जन्मदिवस था, और विवाह का भी वही दिन निश्चित हुआ। मिथिलापुरी में सर्वत्र आनन्द छा गया और शोभा-सजावट होने लगी; राजभवन को दैवी अलंकारों से सजाया गया था। इतना ही नहीं, मित्रदेवोंने ‘अगम्य हेतु पूर्वक’ मिथिलाके राजभवन के प्रांगण मे एक नवीन अद्भुत दैवी रचना की थी-मानों देवों का ‘अपराजित विमान’ ही हो !

मल्लिकुमार ने पूछा-अरे, यह सब सजावट किसलिये की गई है ? माताने हँसकर कहा- बेटा, यह सब तुम्हारे विवाह की तैयारी हो रही है ! पुत्रवधू का मुख देखकर हमें कितना आनन्द होगा, तुम्हारी बारात मे जाने के लिये राजा-महाराजा भी आ गये हैं।

मल्लिकुमार क्षणभर स्तब्ध होकर माता की ओर देखते रहे फिर बोले-माँ, मैं अपने आत्मा को संसार बंधन मे नही बाँधना चाहता.. मुझे तो मुक्तिसुन्दरी की चाह है, इसलिये ससार की किसी स्त्री का मोह मुझे नहीं है, मुझे बहुत आत्मसाधना करना है।

माताने कहा- बेटा, यह सब मैं जानती हूँ, परन्तु अभी तो तेरी उम्र ही कितनी है ?- तू अभी छोटा है अभी तो राजसुख भोगकर हमें आनन्दित कर.. फिर आत्मसाधना करना।

मल्लिकुमार कुछ बोले बिना गहरे विचार में डूब गये। बारात का प्रस्थान हो रहा था…विशाल गजराज पर आरूढ़ अद्भुत अलंकारों से सुसज्जित दूल्हा मल्लिकुमार की बारातने विवाह हेतु प्रस्थान किया। जो भी मल्लिकुमार का वैभव देखता वह मुग्ध हो जाता था। बारात राजभवन के द्वार से बाहर निकल रही थी…तब नगरी की अद्भुत शोभा-सजावट, तथा अपराजित विमान जैसी रचना मल्लिकुमार को दृष्टिगोचर हुई। अचानक उनके ज्ञान मे आभास हुआ-अरे, ऐसी अनुपम शोभा तो मैने पूर्वकाल में भी देखी हैं, बस ! उन्हें जातिस्मरण हुआ; अपराजित विमान की विभूति दृष्टिगोचर हुई- अरे उस स्वर्गलोक की विभूति के समक्ष इस शोभा का क्या मूल्य ? मैं असंख्य वर्ष तक स्वर्गलोक की उस विभूति में रह चुका हूँ; जिसका ममत्व था उसका भी अंतमें तो वियोग ही हुआ !.. इस क्षणभंगुर शोभा के संयोग से आत्मा को क्या लेना-देना ? आत्मा की शोभा तो रत्नत्रय के वीतराग भाव से ही है। (फिर उन्हें दूसरे भवका ज्ञान हुआ-) अहा, उस भव में तो मैं वैश्रवण राजा था और मैंने रत्नत्रयव्रत किया था, पश्चात् जिनदीक्षा लेकर रत्नत्रय की आराधना की थी। वहाँ से अपराजित विमान में अहमिन्द्र होकर वहाँ के दैवी वैभवों का असंख्यात वर्ष तक उपभोग किया…तथापि आत्मा को तृप्ति तो नहीं हुई! अब इन तुच्छ भोगों में आसक्त रहना मुझे शोभा नहीं देता!

प्रभु मल्लिकुमार का चित्त संसार से विरक्त हो गया; जन्म दिन, विवाह की तैयारी और वैराग्य-इन तीनों प्रसंगों का मानो संगम हुआ। बारात की साजसज्जा के बदले अचानक जिनदीक्षा का वातावरण निर्मित हो गया। वैरागी प्रभु चिंतवन करने लगे-अरे, यह सांसारिक भोगोपभोग जीव को बन्धनकर्ता हैं; जिन्हें मात्र मोक्षकी अभिलाषा है, ऐसे मुमुक्षु को इस संसार के बंधनो में बंधना योग्य नहीं है; संसार के बंधनोंमें स्त्री का बंधन मुख्य है; विवाह कार्य मुमुक्षु के लिये लज्जास्पद और मोक्षसाधना में विघ्नकर्ता है। मैं विवाह नहीं करूँगा; मैं तो आज ही राजभवन छोड़कर वनमें जाऊँगा और जिनदीक्षा लेकर परमात्म पद की साधना करूँगा।

इस प्रकार परमवैराग्यपूर्वक प्रभु मल्लिकुमार ने अपने जिनदीक्षा सम्बन्धी निर्णय की घोषणा की और वैराग्य चिंतनमें तत्पर हुए। माता-पिता एवं प्रजाजन तो यह सुनकर स्तब्ध रह गये; चारों ओर विषाद छा गया; क्या कहा जाय वह सूझता नहीं था…किसकी शक्ति थी जो वैरागी सिंह को संसार के पिंजरे में बन्दी बनने को कहे! बारात में सम्मिलित होने आये राजा-महाराजाओं ने विचार किया कि-अरे, इस ससार की बारात को तोड़कर प्रभु अब मोक्षकी बारात जोड़ रहे हैं, तो उसमें भी हम उनके साथ ही रहेंगे; भोग में साथ थे तो योग में भी उनके साथ रहेंगे और मोक्ष साधेंगे।-इस प्रकार प्रभु मल्लिराज के साथ ३०० राजा भी दीक्षा लेने को तैयार हुए। ‘विवाह के समय वैराग्य’ यह तीर्थंकर मल्लिनाथ के जीवन की एक महत्त्व पूर्ण आश्चर्य जनक घटना हुई, तब स्वर्गलोक में भी खलबली मच गई।

राजभवन मे भी शोक छा गया। माता प्रजावती पुत्रविरह का यह दृश्य नहीं देख सकी, वे एकदम शोकविह्वल होकर रुदन करने लगीं। पिताश्री कुम्भराजा भी क्षणभर शून्यमनस्क हो गये-‘बेटा, तू जिनदीक्षा न ले’-ऐसा तो कैसे कहते? और ‘बेटा तू दीक्षा ग्रहण कर ले’-ऐसा विदा-वचन भी कैसे निकलता? दोनों जानते थे कि वैरागीपुत्र अब दीक्षा लेकर ही रहेगा, उसे कोई रोक नहीं सकता; परन्तु पुत्रमोह के कारण ऐसे कल्याणक के अवसर पर भी उन्हें क्षणभर शोक होने लगा कि-अरे मोह! तू कैसा दुष्ट है! दृष्टि समक्ष रखे हुए भरपूर आनन्द को भी भोगने नहीं देता!!

प्रभु मल्लिकुमारने अति कोमल वैराग्य सम्बोधन द्वारा उनका मोह दूर कराते हुए कहा-हे माता! हे पिता! यह मोह छोड़ो! मैं तुम्हारा पुत्र बनकर रहूँ, उसके बदले में परमात्मा बनकर तुम्हें दर्शन दूँ…यह क्या आपको परम इष्ट नहीं है? इस समय मुझे पुत्ररुप में देखकर आपको जो आनन्द होता है, उसकी अपेक्षा मुझे परमात्मा रूप में देखकर विशेष आनन्द होगा।…और हे मातुश्री, हे पिताश्री! आपको भी अन्त में तो संसार मोह छोड़कर वैराग्य पथपर आना है; आप तो तत्त्व के ज्ञाता हो, इसलिये शोक सताप छोड़ो और जिस परमात्मपाद की साधना हेतु मैं जा रहा हूँ उसका अनुमोदन करके आप भी उसकी भावना भाओं!

पिता बोले-देव! आपकी बात सत्य है; आप तीर्थंकर होने के लिये अवतरित हुए हो, आपको सांसारिक बन्धनों में नहीं बाँधा जा सकता। आप तो जगत् को भी मोक्षमार्ग बतलाकर बंधनमुक्त करनेवाले हो। बेटा! अब हमारा मोह दूर हो गया; अब हम तुम्हें मात्र पुत्ररुप में नहीं किन्तु परमात्मा रूप में देख रहे हैं! आप जब केवलज्ञान प्राप्त करके तीर्थंकर होंगे, तब हम भी आपके समवसरण में आकर व्रत-महाव्रत अंगीकार करके आत्मा का कल्याण करेंगे ! माताजी तो कुछ बोल नहीं सकीं, मौन रहकर प्रभुकी ओर देखती रह गई !

हे माताजी ! मैं आत्मसाधना में आलस्य नहीं करूँगा, कुछ ही दिनों में केवलज्ञान प्रगट करके परमात्मस्वरूप में आपको दर्शन दूँगा ।-ऐसा कहकर वे वैरागीकुमार उन्हें नमन करके वीतराग मार्ग पर चल दिये। माता-पिता वैराग्यभावपूर्वक अश्रुभीगी आँखों से उन परमात्मा को देख रहे थे !

उसी समय लौकान्तिक देवों ने आकर प्रभुको नमस्कार किया और स्तुतिगान करने लगे-हे देव ! आप कुमारावस्था मे दीक्षा ले रहे हैं वह उत्तम कार्य है . इस चौबीसीमें कुमार अवस्था में दीक्षा ग्रहण करनेवाले पाँच तीर्थंकरों में आप दूसरे हैं। पहले वासुपूज्य तीर्थंकरने भी बालब्रह्मचारी रहकर दीक्षा ली थी, उनके पश्चात् आप विवाह के समय वैरागी होकर बालब्रह्मचारी रूपसे दीक्षा लेने को तत्पर हुए हो और भविष्य में अन्तिम तीनों तीर्थंकर भी बालब्रह्मचारी रहकर दीक्षा लेंगे।

“श्री वासुपूज्य-मल्लि-नेम, पारस-वीर अति;
नमूँ मन-वच-तन धरि प्रेम, पाँचो बाल्यति।”

हे देव ! कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि तीर्थंकर को वैराग्य जागृत होने पर लौकांतिक देव आकर उन्हें सम्बोधते हैं और उनके वैराग्य को दृढ़ करते हैं; परन्तु हे देव ! यह बात कल्पनामात्र है; हम आपको सम्बोधनेवाले कौन ? आप स्वयंबुद्ध हैं परम वैरागी हैं और हम सबको बोध देनेवाले हैं। अखंड तेजसे स्वयं प्रकाशमान सूर्य को क्या दीपककी आवश्यकता होती है ? हे नाथ ! हम आपको सम्बोधने के लिये नहीं किन्तु मात्र भक्तिवश अपने वैराग्य की दृढ़ता हेतु आपकी सेवा में उपस्थित हुए हैं। ‘हे देव ! आप जैसी रत्नत्रयविभूति हमे भी प्राप्त हो।’-ऐसी भावना करके वे देव अपने निवासस्थान को चले गये। प्रभुका चित्त अपने आत्मचिन्तन मे लगा हुआ था, वे बारह प्रकार की वैराग्य-भावनाओं का चिन्तन कर रहे थे:-(१) चेतनरुप अपने स्वधर्म ही सदा मेरे साथ, एकत्वरूप हैं; शेष सब संयोग ‘अध्रुव’ हैं; वे कोई मेरे साथ शाश्वत नहीं रहेंगे।

(२) कोई भी स्नेहीजन या धन-वैभव मुझे शान्ति देनेवाले या दुःख से बचानेवाले नहीं हैं; इसलिये वे सब मुझे ‘अशरण’ हैं; रत्नत्रय धर्मरूप मेरा आत्मा ही मुझे शरण है।

(३) आत्मस्वरूप को भूलकर, मिथ्यात्व एवं कषायवश जीवने संसार मे भव धारण कर-करके अनंतबार अनंत महान दुःख भोगे हैं। उस संसार दुःख से छूटने के लिये वीतराग भाव ही कर्तव्य है।

(४) संसार में या मोक्ष मे सर्वत्र जीव ‘अकेला’ है; संसार मे पुण्य-पाप उसके साथी है और मोक्ष में जाने के लिये सम्यक्त्वादि उसके साथी हैं, अन्य कोई उसका साथी नहीं है।

(५) अरे, रागादि विभाव भी मेरे चिदान्द स्वभाव से ‘अन्य’ हैं तब शरीर और सगे सम्बन्धियोंकी बात ही कहाँ रही ? वे सबसे मैं पृथक हूँ।

(६) इस जीव को शरीर की मलिनता की अपेक्षा विषय कषाय के मलिनभाव अधिक ‘अशुचि’ एवं दुःखकारी है; मैं अपने पवित्र ज्ञान स्वरूपमें मलिनभावों को प्रविष्ट नहीं होने दूँगा। [कौन भा रहा है यह वैराग्य भावनाएँ ? प्रभु-मल्लिनाथ तीर्थंकर भा रहे हैं।

(७) अरे, मिथ्यात्वादि भावों की तो क्या बात ! एक सूक्ष्म शुभरागरूप छिद्र भी जीवकी नौका को भवसमुद्रसे पार नहीं होने देता, तथा कर्मास्रव द्वारा भवभ्रमण कराता है; इसलिये वे रागादि ‘आस्रव’ भाव सर्वथा रोकने योग्य हैं।

(८) उन रागादि आस्रवभावोंको सर्वथा रोकने और जीव की नौका को भवसे पार करने के लिये, आत्माके शुद्ध भावरूप ‘संवर’ ही उत्तम साधन है।

(९) पूर्वकाल में बाँधे हुए दीर्घ स्थितिवाले कर्मोंको भी मैं आत्मशुद्धि की वृद्धि द्वारा शीघ्र तोड़कर आत्मामें से उनकी ‘निर्जरा’ कर दूँगा।

(१०) आत्मस्वरूप में एकाग्र हुआ मेरा शुद्ध उपयोग वह मोह या क्षोभ रहित है; वीतरागी समभावरूप है, वही मेरा ‘धर्म’ है। उसके द्वारा मैं अपने आत्माको संसार से निकालकर सिद्धपद में स्थापित करूँगा।

(११) अपने अनन्त गुण-पर्यायोंसे भरपूर मेरा चैतन्य ‘लोक’ मुझमें परिपूर्ण है; मैं उसीका अन्तर्मुख होकर अवलोकन करता हूँ; उससे बाहर अनेक विचित्रतासे भरपूर ‘लोक’ में कुछ भी मेरा नहीं है।

(१२) नरक, तिर्यंचगति के अति घोर दुःख तथा देव, मनुष्य की विभूतियाँ भी जीव अनन्तबार प्राप्त कर चुका है, वह कुछ भी दुर्लभ या अप्राप्त नहीं है, जीव को अपने स्वरूप की अनुभूतिरूप ‘बोधि’ ही महान दुर्लभ है, और वही जीवको परम सुखदायी है। यह उसकी प्राप्ति का अवसर है; इसलिये अखण्ड बोधि की आराधना ही कर्तव्य है; उसमें आलस्य करना योग्य नहीं है। मुमुक्षु बुद्धिमान जीवों को कालका एक कण भी धर्मके बिना नहीं बिताना चाहिये।

इस प्रकार उत्तम वैराग्य भावनाओं का चिन्तवन करते हुए मल्लिकुमार ने जिनदीक्षा हेतु वनगमन का निश्चय किया और उसी समय इन्द्रादि देव भी दीक्षा कल्याणक मनाने हेतु ‘जयंती’ नामक सुन्दर शिबिका लेकर मिथिलापुरी आ पहुँचे। प्रभु शिबिका में आरूढ़ हुए।

मल्लिनाथ की बारात चली मुक्तिसुंदरी वरने…

अपने राजकुमार को युवावस्था में राजपाट छोड़कर वनगमन करता देखकर प्रजाजन वैराग्य से गद्गद होकर उनका अभिनन्दन कर रहे थे-अहा, देखो यह राजकुमार ! विवाह के अवसर पर ही राजभागों को छोड़कर साधु होने के लिये वनमें जा रहे हैं। लोग तो भोगोपभोग के पीछे दौड़ते हैं, भोग-भोगकर थक जायँ तथापि उन्हें नहीं छोड़ते; उससे विपरीत यह वैरागी राजकुमार तो उन्हें प्राप्त हुए दिव्य भोगों को भी भोगे बिना त्याग रहे हैं। धन्य है इनका अवतार ! धन्य है आत्मज्ञान ! और धन्य है वैराग्य !! कुछ ही समय पूर्व जो राजा-महाराजा और हाथी-घोड़ा आदि वैभव मल्लिकुमार की बारात में जाने को ठाटबाट से तैयार हुए थे, वे सब अब प्रभु के साथ मोक्ष की बारात में जाने को तैयार हुए. भोगमार्ग के सहचारी अब योगमार्ग के सहचर बने ! अनेक हाथी घोड़े आदि प्राणी भी प्रभुके पीछे-पीछे श्वेतवनमे चले। बारात के समय जिस मुख्य गजराज पर मल्लिकुमार आरूढ़ थे, वह गज भी उन्हे संसार मे विरक्त मुनिदशा में देखकर आश्चर्यपूर्वक अत्यन्त भावुकता से उनके निकट ही बैठा रहा; वह प्रभु की परमशान्त मुद्रा को एकटक देख रहा था, मानो स्वयं आँखें मूँदकर उस ध्यान का अभ्यास कर रहा हो ! उन हाथी आदिको भी वनका वह शान्तिपूर्ण वातावरण और प्रभुका सान्निध्य छोड़कर राजभवन में लौटने का मन नहीं हुआ, इसलिये वे भी वन में ही रह गये और प्रभु के सम्पर्क में रहकर आत्महित साधने लगे। धन्य है सन्तों का सान्निध्य !!

श्वेतवन के उपशान्त वातावरण में जिनदीक्षा का एक महामंगल उत्सव प्रारम्भ हुआ। जन्मकी भाँति दीक्षाकल्याणक के अवसरपर भी देव एक साथ साढ़े बारह करोड़ बाजे बजा रहे थे, परन्तु उनमे से इस समय वैराग्य के परम शान्तस्वर निकलते थे। अति रमणीय एवं शान्त ऐसे श्वेतवन में आकर प्रभु मल्लिनाथ ने क्षणभर आत्मचिन्तन किया; जनसमूह की ओर परम शांत दृष्टि से देखा। प्रभु की दृष्टि पाकर सब पावन हो गये। मानो उस समभावभरी शांत दृष्टि द्वारा प्रभुने सबसे विदा ली; मुकुट और हार उतार दिये, मस्तक के कोमल केशों का लोच करके शरीर के प्रति परम उपेक्षावृत्ति धारण कर ली; ‘ॐ नमः सिद्धेभ्य,’- ऐसे उच्चारणपूर्वक सिद्धों को वंदन करके पंचमहाव्रतधारी दिगम्बर मुनि हो गये और आत्मध्यान में उपयोग को एकाग्र किया। उसी क्षण मुनिराज मल्लिनाथ के निर्विकल्प शुद्धोपयोग दशा प्रगट हुई-स्वयं ही ‘धर्म’ हो गये, क्योंकि शुद्धोपयोगरूप हुआ आत्मा ही श्रमण है, वही मोक्षमार्ग है, वही केवलज्ञान है और वही सिद्ध है। तीर्थंकर मुनिराज के आत्मा आज (मगसिर शुक्ला एकादशी के दिन) रत्नत्रयरूप परिणमित होकर श्रमण हुए, साक्षात् मोक्षमार्गरूप परिणमित हुए।

दो दिन के उपवास के पश्चात् उन तीर्थंकर मुनिराज को मिथिलापुरी में नंदिषेणराजाने नवधाभक्तिपूर्वक आहारदान देकर पारणा कराया। तीर्थंकर मुनिराज जैसे सर्वोत्तम सुपात्र को आहारदान का प्रसंग होने से देवों ने भी आनन्दित होकर जयजयकार करते हुए आकाश से पुष्पों तथा रत्नों की वर्षा की, मोक्षगामी मुनिके कर-भाजन में आहार देनेवाले वे महात्मा स्वयं भी मोक्षके भाजन बन गये, क्योंकि ऐसा नियम है कि तीर्थंकर को मुनिदशा में प्रथम पारणा करानेवाला जीव उसी भवमें अथवा तीसरे भवमें मोक्षप्राप्त करता है।

प्रभु मल्लिनाथ की आत्मसाधना आश्चर्यजनक थी; मोहराजा के सेनापति ऐसे दुष्ट कामरूपी महाशत्रु का तो उन्होंने पहले ही घात कर दिया था, इसलिये शेष मोह को जीतने में उन्हें अधिक देर नहीं लगी। मुनिदशा में छद्मस्थ रूप से वे मात्र छह दिन ही रहे…शुद्धात्मा के ध्यान की प्रचण्ड अग्नि प्रज्वलित करके उसमे घाति कर्मों के ईंधन को इतनी शीघ्रता से दहन कर दिया कि छह दिनमें ही केवलज्ञान प्रगट करके परमात्मा बन गये। सर्व तीर्थंकरो में छद्मस्थरूप से रहने का न्यूनतम काल मल्लिनाथ मुनिराज का था। मुनि होने के पश्चात् भगवान आदिनाथ ने छद्मस्थदशा में एक हजार वर्ष तक केवलज्ञान प्राप्ति हेतु तपस्या की थी, जबकि भगवान मल्लिनाथ ने मात्र छह दिन तक तपस्या करके केवलज्ञान प्राप्त किया। मिथिलानगरी के जिस श्वेतवन में दीक्षा ली थी उसी वनमें केवलज्ञान हुआ। इस प्रकार मिथिलापुरी मल्लिनाथ प्रभु के चार कल्याणकों से पावन हुई। मात्र १०० वर्ष में मिथिलापुरी की प्रजा ने तीर्थंकर प्रभुके चार कल्याणक अपने गृह-आँगन में प्रत्यक्ष देखे। वाह रे धन्य वह देश ! धन्य वह काल ! धन्य वे जीव ! और सर्वाधिक धन्य यह भगवान-आत्मा !

पौष कृष्णा द्वितीया को १९ वें तीर्थंकर मल्लिनाथ भगवान को केवलज्ञान होते ही इन्द्रलोक में पुनः आनन्द की लहर दौड़ गई। देवगण भक्तिपूर्वक तुरन्त पृथ्वीपर उतर आये। क्षणभर में समवसरण की भव्य रचना की और सर्वज्ञ परमात्मा की पूजा करके केवलज्ञान का महोत्सव मनाया। उस समवसरण की अद्भुत शोभा का वर्णन शब्दों द्वारा नहीं हो सकता, प्रत्यक्ष देखने से ही उसकी दिव्यता ज्ञात होती है। अहा, जिसके बीचोंबीच परमात्मा स्वयं विराजते हों, उस स्थान की शोभा जगत में सर्वोत्कृष्ट हो उसमें आश्चर्य ही क्या ! अरे, एक छोटे-से साधकके हृदय में जहाँ ‘परमात्मा’ विराजते हों उसकी शोभा भी क्या तीन लोक के वैभव से श्रेष्ठ नहीं हो जाती ?! उस समवसरण में मात्र एक (तीर्थंकर) परमात्मा ही नहीं, किन्तु दूसरे दो हजार दोसौ सर्वज्ञ परमात्मा भी एकसाथ विराजते थे। अहा, उस आश्चर्यकारी धर्मसभा का क्या कहना !

उस धर्मसभा में जिनराज के दर्शन हेतु जीवों की रेलियाँ उमड़ पड़ीं. ..उनकी प्रसन्नता का पार नहीं था। तीर्थंकर प्रभु के समवसरण की शोभा सज्जनों को महाआनन्द देनेवाली थी। उसमें प्रवेश करते ही भव्यात्माओं को ऐसा अनुभव होता था मानों हम अपने ही मोक्ष मण्डप में आगये !! चारो ओर बैठकर धर्मश्रवण एवं आत्मसाधना करनेवाले गणधर देवों से लेकर देव, मनुष्य, तिर्यंचों की बारह सभाओं में मोक्षगामी भव्य जीवों का मंगल मेला वहाँ भरा हुआ था। सर्वज्ञ परमात्मा भगवान मल्लिनाथ चारों दिशाओं के जीवों को अपने सन्मुख देखते थे. उनके समक्ष देखनेवाले जीव उनके देहदर्पण में अपने सात भव देख सकते थे, परन्तु उनके आत्मदर्पण में दृष्टि डालनेवाला जीव अपने शुद्ध आत्मस्वरूप के भी दर्शन कर लेता था। अनेक जीव तो समवसरण में गये सो गये, वे फिर बाहर नहीं आये;-समवसरण में ही प्रभुसन्मुख आत्मज्ञान प्राप्त करके ऐसी आत्मसाधना की कि वहीं मुनि होकर, केवलज्ञान प्रगट करके मोक्ष प्राप्त किया और सिद्धपुरी में निवास करने लगे। समवसरण में भीतर गये परन्तु बाहर नहीं आये। समवसरण में किसी जीव का मरण नहीं होता, किन्तु मोक्ष होता है। मोक्ष होना वह कोई मरण नहीं है, वह तो शाश्वत जीवन है।

श्री तीर्थंकर प्रभु के पुण्यप्रताप से समवसरण भूमि का एक आश्चर्य यह है कि उसकी भूमि के क्षेत्रफल की अपेक्षा अनेक गुनी सख्या के देव, मनुष्य, तिर्यंचों का समावेश हो जाता है। समवसरण में किसी को रोग या पीड़ा नहीं होती, क्षुधा-तृषा नहीं लगती, वैर-विरोध नहीं होता; -समवसरण में प्रवेश करते ही वह सब दूर हो जाता है और मुमुक्षु जीवों का चित्त परम शान्ति पूर्वक उन साक्षात् परमात्माके दर्शन तथा धर्म श्रवण में लग जाता है.. . फिर अंतर की गहराई में उतरकर वे भव्यजीव, प्रभु द्वारा कहे हुए आत्मस्वरूप का अवलोकन करने में उपयोग लगाते हैं और निजवैभव को निहारकर निहाल हो जाते हैं। प्रभु मल्लिनाथ के समवसरण में दो हजार दो सौ केवली परमात्मा गगन में विराजते थे; तदुपरान्त विशाखसेन आदि २८ गणधर थे; विविध लब्धिवान ४० हजार मुनिवर एवं बंधुषेणा आदि ५५००० आर्यिकाएँ थीं; एक लाख श्रावक और तीन लाख श्राविकाएँ आत्मचिन्तन करती थीं। तिर्यंचों की संख्याका तो कोई पार नहीं था। सब जिनभक्ति में तत्पर थे और वीतराग के वचनामृत द्वारा शांतरसका पान करते थे।

सर्वज्ञ परमात्मा मल्लिनाथ के केवलज्ञान की पूजा करके इन्द्रने स्तुति की-हे देव ! आप परमपुरुष हो, पुरुषार्थ द्वारा आपने परमपद प्राप्त किया है, और जगत के जीवों को भी उस पुरुषार्थ का उपदेश देकर मोक्षमार्ग का प्रवर्तन कर रहे हैं; आप धर्मतीर्थ के नायक हो। मोह का मित्र काम तो आपके नाम मात्र से काँपता है। आपकी आयु ५५००० (पचपन हजार) वर्ष की होने पर भी आप मात्र १०० वर्ष तक ही छद्मस्थ रहे और १०० वर्ष में परमात्मा होकर अब ५४,९०० वर्ष तक आप तीर्थंकररुप से भरतक्षेत्र में मंगल विहार करेंगे और आपके दिव्य उपदेशसे लाखों-करोड़ों जीव धर्म प्राप्त करके अपना कल्याण करेंगे। अहा, हे अनन्त चतुष्टयधारी देव ! आपको नमस्कार हो…द्रव्य-गुण-पर्याय सर्वप्रकार से शुध्दचेतना रुप हे शुध्दात्मा ! आपको नमस्कार हो ! अनन्त आत्मवैभवधारी हे परमेश्वर ! आपको नमस्कार हो ! त्रिकालसहित समस्त विश्व के ज्ञाता हे सर्वज्ञ ! आपके ज्ञानकी महिमा अद्वितीय है। प्रभो ! आपका केवलज्ञान तीनों लोक के लिये मंगलरुप है। -इस प्रकार स्तुति द्वारा इन्द्र ने प्रभु के केवलज्ञान-कल्याणक का महामंगल महोत्सव किया।

अपने राजकुमार को मात्र छह दिन में ही परमात्मा के रुप में देखकर मिथिलापुरी के प्रजाजनों को अपूर्व आनन्द हो रहा था-इन १९ वें तीर्थंकर के चार कल्याणक अपनी नगरी में मनाये गये और अभी २१ वें तीर्थंकर के भी चार कल्याणक अपनी नगरी में मनाये जायेंगे…अहा ! अपनी यह नगरी आठ कल्याण को द्वारा धन्य होगी !! प्रभु मल्लिनाथ को केवलज्ञान होने की बात सुनते ही पिता श्री कुंभमहाराजा और माता श्री प्रजावती आश्चर्यमुग्ध होकर तत्काल समवसरण में आ पहुँचे और अपने पुत्र को परमात्मा के रुप में देखकर कल्पनातीत हर्षानन्द को प्राप्त हुए- “अहा ! हमारा पुत्र प्रभु बनकर हमें दर्शन देने आया !” उन्हें तो कल्पना भी नहीं थी कि मात्र छह दिन में हम अपने लाड़ले पुत्र को अपनी नगरी में ही भगवान रुप में देखेंगे ! छह दिन पूर्व जिस पुत्र के वियोग से शोकसतप्त हो रहे थे, उसी को आज दिव्यविभूतिसहित परमात्मारुप में देखकर वे आनन्दविभोर हो गये, उनका शोक-संताप एकदम मिट गया। और वह आनन्दातिरेक भी अधिक समय तक नहीं टिका; क्योंकि प्रभुकी वाणीमे चैतन्य के वीतराग स्वरुप की अद्भुत महिमा सुनते ही उन्होंने हर्ष-शोक से पार आत्मानुभव के लिये उपयोग को अंतर्मुख किया। क्षणभर शुध्दोपयोगी होकर, पश्चात् विशुध्द परिणाम की वृध्दि द्वारा चारित्रदशा ग्रहण करके उन्होंने अपना आत्मकल्याण किया। पिता कुम्भराजा तो उसी भव में मोक्ष को प्राप्त हुए और माता प्रजावती एकावतारी होकर स्वर्ग सिधारी। अहा, तीर्थंकर समान पुत्रका संयोग, उसका भी माता-पिता को वियोग हुआ . और अंतमें तो उस पिता-पुत्र या माता-पुत्र के भी सम्बन्ध का मोह तोड़कर आत्मा की अपनी वीतरागता ही शरणरुप हुई।

तेथी न करवो राग जरीये क्यांय पण मोक्षेच्छुए;
वीतराग थईने ऐ रीते ते भव्य भवसागर तरे।
हूँ परतणो नहि, पर न मारां, ज्ञान केवल एक हूँ,
-जे एम ध्यावे ध्यानकाले जीव ते ध्याता बने।

प्रभु श्री मल्लिनाथ देवने ५४ हजार नौ सौ वर्ष तक वीतराग मार्ग का उपदेश देकर भव्य जीवोंका कल्याण किया। अंत में जब एक मास आयु शेष रही तब प्रभु सम्मेदशिखरपर आकर स्थिर हुए…और काय-वचन-मन के योगोंका निरोध करके सिध्दपद में जाने की तैयारी की। फाल्गुन शुक्ला पंचमी के दिन क्षणभर १४ वें गुणस्थान का अनुभव करके, दूसरे ही क्षण वे प्रभुजी संसार से सर्वथा मुक्त होकर संबल टूंक से समश्रेणी में सिध्दालय में बिराजमान हो गये। देवोंने आकर पंचम कल्याणक का महोत्सव किया; मोक्ष के बाजे बजाये और प्रभुकी पूजा की:-

मल्लिनाथ जिनराजकी संकुलटूँक है जेह,
मन-वच-तन कर पूज हूँ शिखरसम्मेद यजेह।

पहले जो विदेहक्षेत्र में वैश्रवण राजा थे; वहाँ रत्नत्रयधर्म की महापूजा तथा उपासना करके जिन्होंने तीर्थंकर प्रकृतिका बंध किया, पश्चात् जो अपराजित विमान में अहमिन्द्र हुए और अंत में कुंभराजा के पुत्र रुप में अवतरित होकर, विवाह के समय ही वैराग्य प्राप्त करके, केवलज्ञान प्रगट करके भरतक्षेत्र के १९ वें तीर्थंकर हुए। उन परमपुरुष भगवान मल्लिनाथ का यह मंगल-जीवन भव्य जीवों को मोक्षपुरुषार्थ का प्रेरक हो। इस मल्लिनाथ पुराण द्वारा उनका भाव-स्तवन हमारे रत्नत्रय की विशुध्दि का कारण हो।

[ श्री मल्लिनाथ जिनराज का मंगल पुराण पूर्ण हुआ।]

* * * *

२०

भगवान मुनिसुव्रत

उत्तम ज्ञान-चारित्रसम्पन्न ऐसे हे मुनिसुव्रत देव ! आपको नमस्कार हो । मिथ्यात्वरुपी काले विषधरके दंशसे मूर्च्छित और अव्रत के कीचड़ में फँसे हुए जीवों को आपने सम्यग्ज्ञानरुपी गरुड़-रत्न द्वारा सचेत करके सुव्रतों के पवित्र आचरण में स्थिर किया है। आपकी उपासना हमें भी ज्ञानसम्पन्न-सुव्रतरुप बनाओ जिससे मोक्षमार्ग की पूर्णता द्वारा मोक्षपद को साधें।

हे मुनिसुव्रत देव ! आप पूर्वभवमें ‘हरिवर्मा’ राजा थे और इस भरतक्षेत्रकी जिस चम्पापुरी मे भगवान वासुपूज्य तीर्थंकर हुए उसी नगरी में आप राज्य करते थे। आप जिस प्रकार बाह्य शत्रुओं को जीतने मे वीर थे उसी प्रकार अंतर के मोहशत्रु पर विजय प्राप्त करने में भी शूरवीर थे; राजवैभव में रहकर भी राग को चेतना मे प्रविष्ट नहीं होने देते थे, इसलिये रागरहित आपकी चेतना मोक्ष को साधने का कार्य कर रही थी।

एक बार उद्यान के मालीने आकर आपको शुभसमाचार दिये कि-हे देव ! अपनी नगरी में मुनिराज अनन्तवीर्य पधारे हैं। यह सुनते ही आपको महान निधि प्राप्त होने की अपेक्षा अधिक हर्ष हुआ। अहा, वे मुनिराज श्रुतकेवली थे; उनके दर्शन से आपको परम प्रसन्नता हुई। वास्तव मे, वीतरागी गुरुओं के समागम से भव्य जीवों को जैसा सुख होता है, वैसा सुख जगत् के किसी अन्य पदार्थ की प्राप्ति से नही होता। हे देव ! मुनिराज के चरणों मे आपकी चेतना ऐसी उल्लसित हुई कि तत्क्षण दर्शन मोह का क्षय करके आपने क्षायिक सम्यक्त्व प्राप्त कर लिया।

उन श्रुतकेवली प्रभुके श्रीमुखसे आपने अस्ति-नास्तिस्वरुप अनेकान्त तत्त्व का मधुर उपदेश सुना; मोक्ष सुख का अद्भुत वर्णन तथा उस मोक्ष के साक्षात् कारणरुप वीतराग चारित्र की महिमा सुनी। बह सुनते ही आपका चित्त संसार से विरक्त और मोक्षसुख की साधना में अनुरक्त हुआ। तुरन्त ही आपने उन अनन्तवीर्य गुरु के निकट जिन दीक्षा ग्रहण कर ली। ध्यानदशा में आपके परिणाम अति विशुध्द हुए; आपको ग्यारह अंग का ज्ञान उदित हुआ; तथा दर्शनविशुध्दि आदि सोलह उत्तम भावनाओं द्वारा तीर्थंकर प्रकृतिका भी बंध हुआ। तत्पश्चात् संलेखनापूर्वक शरीर का त्याग कर के आप १४ वें प्राणत स्वर्ग में इन्द्र हुए। असंख्य वर्षोंतक उस स्वर्गलोक के दिव्य वैभव में आप आत्मज्ञान सहित रहे। इसप्रकार मोक्ष के आराधकरूप से स्वर्गलोक का अन्तिम भव पूर्ण करके, अब आप तीर्थंकर रुप से मनुष्यलोक में अवतरित होने को तैयार हुए हैं। प्रभो ! आपके अवतार का मंगल-महोत्सव देखने के लिये हम उस नगरी में पहुँच रहे हैं जहाँ आपका अवतार होना है।

राजगृहीनगरी में मुनिसुव्रत-अवतार

यह है राजगुही नगरी; यहाँ हरिवंश के राजा सुमित्र राज्य करते हैं,- कि जिस वंश में भगवान शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ एवं अरहनाथ तीर्थंकर अवतरित हुए और मुनिसुव्रत तथा नेमिनाथ तीर्थंकर होनेवाले हैं। उन महाराज सुमित्रकी महारानी का नाम सोमादेवी।

सोमादेवी सुन्दर, सुशील एवं नवयौवना थीं; परन्तु अभी तक उन्हें पुत्र सुख प्राप्त नहीं हुआ था। संतान के अभाव में उनका चित्त अशांत रहता था। महाराजा सुमित्र उन्हें समझाते थे कि-हे देवी ! तुम धैर्य धारण करो, दुःखी न होओ। जो कार्य मात्र दैवके आधीन है उसकी चिन्ता करना व्यर्थ है। मुमुक्षु जीव को दैवसाध्य पदार्थ की चिन्ता के बदले धर्मसाधना में प्रयत्नशील रहना चाहिये।-इसप्रकार समझाने से सोमादेवी का चित्त कुछ शांत होता और वह अपना मन धर्मसाधना में लगाती थीं।

इतने में एक आश्चर्य जनक घटना हुई-महाराजा सुमित्र तथा सोमादेवी एकबार राजमहलमें बैठे-बैठे पुत्रप्राप्ति सम्बन्धी वार्ता-लाप कर रहे थे कि अचानक आकाशसे उत्तम रत्नों की वर्षा होने लगी। ‘यह क्या हुआ !’-ऐसे विस्मयपूर्वक आकाश की ओर देखा तो आकाश से देवियाँ उतरकर उन्हें वंदन करने लगीं ! उनका आश्चर्य और भी बढ़ गया; तब देवियों ने कहा-हे माता ! हम दिक्कुमारी देवियाँ हैं। छह मास पश्चात् बीसवें तीर्थंकर का जीव आपकी कुक्षि में अवतरित होनेवाला है, इसलिये इन्द्र महाराज ने हमें स्वर्ग से आपकी सेवा करने भेजा है,…और यह रत्नवृष्टि उन्हीं तीर्थंकर के पुण्यप्रताप से ही हो रही है।

देवियों के मुख से यह अद्भुत बात सुनकर राजा-रानी को असीम आनन्द हुआ कि-अहा, हमें पुत्रकी प्राप्ति होगी और वह भी तीर्थंकर !.. ऐसा जानकर उनका हृदय इतना प्रसन्न हुआ कि जितनी प्रसन्नता मुमुक्षु को सम्यक्त्व की प्राप्ति से होती है ! छह मास पश्चात् श्रावण कृष्णा द्वितिया की रात्रि के पिछले प्रहर में महारानी सोमादेवीने सोलह स्वप्न देखे और उसी समय तीर्थंकर होनेवाले महात्मा उनकी कुक्षि में अवतरित हुए। इन्द्रादि देवोंने गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया।

छप्पन दिक्कुमारी देवियाँ सोमामाता की सेवा करती हैं और आनन्द-प्रमोदपूर्वक दिन बीत रहे हैं। सवानौ मास पश्चात् वैशाख कृष्णा दशम के दिन सोमामाताने जगत में सर्वश्रेष्ठ ऐसे पुत्ररत्नको जन्म दिया। त्रिलोक में आनन्द छा गया। इन्द्रों ने राजगुही में आकर तीर्थंकर के जन्म का महोत्सव किया। राजगुही नगरी धन्य हुई। इन्द्रने बाल तीर्थंकर का नाम मुनिसुव्रत रखा; उनके चरण में कच्छप का चिन्ह था। मल्लिनाथ तीर्थंकर के ५४ लाख वर्ष पश्चात् मुनिसुव्रत तीर्थंकर हुए। उनकी आयु ३०,००० (तीसहजार) वर्ष थी। शरीरका रंग मोर के कंठ समान सुन्दर था। अनेक देशों के राजकुमारों तथा बालरुपधारी देवों के साथ विभिन्न प्रकार की अद्भुत क्रीड़ाएँ करते-करते बचपन बिताकर बाल तीर्थंकर ने युवावस्थामे प्रवेश किया। अनेक उत्तम राजकन्याओं के साथ उनका विवाह हुआ। उनके लिये स्वर्गलोक से इन्द्र वस्त्राभूषणादि उत्तम भोगसामग्री भेजते थे; परन्तु वह सामग्री भी उन भावी परमात्मा के मनमें कोई आश्चर्य उत्पन्न नहीं करती थी। जो अचिंत्य-अद्भुत-आश्चर्यजनक चैतन्यवैभव उनके ज्ञान मे वर्तता था उसके समक्ष बेचारे पुण्यवैभव का क्या मूल्य ?

साढ़े सात हजार वर्ष की आयु में मुनिसुव्रत कुमार का राजगृही के राजसिंहासनपर राज्याभिषेक हुआ। उन्होने पन्द्रह हजार वर्षतक राजगृही का राज्य किया। उनके शासन में राजगृही एक विश्वप्रसिध्द धर्मनगरी बन गई।अहा, इन्द्र जिनकी सेवा करते हो-ऐसे तीर्थंकर स्वयं जिसनगरी के राजा हो उसकी महिमा का क्या कहना !!

महाराजा मुनिसुव्रत की आयु के जब २२,५०० वर्ष बीत गये, तब एकबार वैशाख कृष्णा दशम-उनके जन्म का महान दिवस धामधूम से मनाया जा रहा था; राजगृही नगरी में चारों और हर्षोल्लासका वातावरण था, ठीक उसी समय क्या हुआ ?-कि महाराजा के मुख्य गजराजने खाना-पीना छोड़ दिया और उदास होकर बैठ गया ! गजरक्षक महावत घबरा गये; उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक गजराज को क्या हो गया ? . वे हाथी को लेकर महाराजा मुनिसुव्रत के पास आये और कहने लगे-‘हे महाराज ! आज इस गजराज को क्या हुआ है, वह हमारी समझ में नहीं आता ! खाना-पीना छोड़कर शून्यमनस्क होकर बैठा है !’

तब अवधिज्ञान से उस गजराज के पूर्व भवों को जानकर महाराजा ने कहा-उसे कोई रोग नहीं हुआ है; मात्र मेघगर्जना सुनकर उसे अपने वन की याद आ गई है, इसी कारण वह उदास हो गया है। पहले वह सुन्दर वन में मुक्तरुप से विचरता था, उसके बदले यह बंधन उसे अच्छा नहीं लगता। अरे, हाथी जैसे तिर्यंचोंको भी मुक्ति अच्छी लगती है बंधन अच्छा नहीं लगता ! और सुनो ! यह हाथी पूर्वभवमें तालपुर नगर का बड़ा राजा था, अपने कुल एवं धन-वैभव का उसे बड़ा अभिमान था। एक बार वैभव के अभिमान पूर्वक उसने ‘जिसे जो चाहिये वह दान .’ (किमिच्छक दान) दिया, परंतु उसमे अज्ञानता के कारण सुपात्र या कुपात्र का कोई विवेक नहीं किया; तथा जैन धर्म का स्वरुप समझने की कोई परवाह नही की ; इसलिये अज्ञानजनित तुच्छ पुण्य के प्रभाव से वह राजा मरकर यह हाथी हुआ है उसे अपनी पूर्व सम्पदा की कोई खबर नहीं है, मात्र वन के मुक्त वातावरण का स्मरण होने से उसने खाना-पीना छोड़ दिया है। तुम लोग चिंता न करो, वह अभी प्रसन्न हो जायगा-ऐसा कहकर महाराजा मुनिव्रतने मधुर वचनो द्वारा उस गजराज को सम्बोधित किया-अरे भव्य ! तू जागृत हो ! अपने आत्महितको सँभाल ! ताकि इस पशुपर्याय के दुःख से तेरे आत्मा का छुटकारा हो !

प्रभुके मधुर बचन सुनकर गजराज मुग्ध हो गया; उसका आत्मा अपूर्व भाव से जागृत हो उठा-'अहा, यह प्रभु मुझसे मेरे हितकी मधुर बात कर रहे है ! मेरे पूर्व भवका स्मरण करा रहे है !. .और तुरन्त उसके अंतर में परिवर्तन हुआ; अपने पूर्व भवका स्मरण होते ही वह बिलकुल शांत हो गया और उसी क्षण उसने आत्मज्ञान सहित अणुव्रत ग्रहण कर लिये; भगवान के प्रति परम उपकार बुद्धि से सूँड़ झुकाकर उन्हे नमस्कार करने लगा।

गजराज की चेष्टा मे अद्भुत परिवर्तन देखकर सब आश्चर्य चकित हो गये ! उसी समय उससे भी एक अत्यन्त आश्चर्य जनक घटना हुई… हाथी के वैराग्य का प्रसंग देखकर महाराजा मुनिसुव्रत को भी उसी समय जातिस्मरण ज्ञान हुआ; समस्त संसार एवं राजभोगोंसे उनका चित्त सर्वथा विरक्त हो गया। वे जिनदीक्षा लेने को तैयार हो गये। तीर्थंकर प्रभुकी दीक्षा का उत्तम अवसर जानकर पंचमस्वर्ग से लौकांतिक देव राजगृही के राजभवन में उतर आये और प्रभुके परम वैराग्य की प्रशंसा एवं अनुमोदना की। अचानक हुए इस परिवर्तन से राजगृही में सर्वत्र आश्चर्य एवं वैराग्य का वातावरण छा गया। इन्द्रासन भी डोल उठा और देवगण ‘अपराजित’ नामकी शिबिका लेकर दीक्षा कल्याणक महोत्सव करने राजगृही मे आ पहुँचे। अपनी जन्मतिथि (अर्थात् वैशाख कृष्णा दशम) के दिनप्रभु मुनिसुव्रत नाथने राजगृहीके नील वन में एक हजार राजाओं सहित दीक्षा ग्रहण की और शुद्धोपयोगी मुनि हुए। उत्तम व्रतधारी उन मुनिसुव्रत मुनिराज को प्रथम आहार दान देकर राजगृही के राजा वृषभसेन धन्य हुए !

प्रभु मुनिसुव्रतनाथ एक वर्ष तक मुनिदशा में रहे और शुद्धात्मध्यान के उत्तम प्रयोग सहित विचरे … वैशाख कृष्णा नवमी के दिन प्रभु पुनः राजगृही पधारे और वहाँ के दीक्षावनमें ही अपने चैतन्य स्वरूपमें उपयोग को एकाग्र करके परमानन्द में मग्न हो गये; क्षणभर में क्षपकश्रेणी द्वारा मोह का क्षय करके केवलज्ञान प्राप्त किया, अरिहंतपरमात्मा बने, बुध्द हुए और समवसरण में बारह सभाओं के बीच दिव्य ध्वनि द्वारा मोक्षमार्गरूप रत्नत्रयतीर्थ का उपदेश देकर तीर्थंकर हुए…प्रभुके उपदेश से अनेक भव्य जीव मोक्षपथके पथिक बने। इन्द्र भी प्रभुकी पूजा करने तथा दिव्यध्वनिका श्रवण करने राजगृही में उतरे। तीर्थंकर प्रभुकी धर्मसभा एवं दिव्यवाणीसे राजगृही नगरी की शोभा इतनी बढ़ गई थी कि आज भी वह नगरी विश्वके प्रसिद्ध तीर्थरूप में पूज्य मानी जाती है। भरत क्षेत्र के उन बीसवें तीर्थंकर की धर्मसभामें मल्लिदेव आदि १८ गणधर तथा उनसे सौगुने १८०० केवली भगवंत उस धर्म सभाके श्रीमण्डप के उपर (आकाशमें पाँच सौ धनुष्य की ऊँचाई पर) विराजते थे …सर्वत्र भगवन्तों के सम्मेलन का वह दृश्य परम आह्लादकारी था। तदुपरान्त अनेक ऋद्धिधारी मुनिवरों सहित कुल ३०००० मुनिराज तथा ५०००० आर्यिका माताएँ थी। आत्म ज्ञान सहित एक लाख अणुव्रतधारी श्रावक और तीन लाख श्राविकाएँ धर्माराधन करते थे। देवों और तिर्यंचों का तो कोई पार ही नही था। प्रभुने साढ़ेसात हजार वर्ष तक तीर्थंकररूपसे विचरण करके भरतक्षेत्रके भव्य जीवों को धर्मामृतका पान कराया और भवदुःख से छुड़ाया। जब प्रभुकी आयु एकमास शेष रही तब वे सम्मेद शिखर सिद्धिधाम की ‘निर्जरटृंक’ पर आकर स्थिर हुए, और जहां से पूर्वकाल में अनन्तान्त तीर्थंकरो ने सिद्धिगमन किया था वहीं से उन्होने भी सिद्धिगमन किया, फाल्गुन कृष्णा द्वादशी के दिन प्रभुने मोक्ष प्राप्त किया। इन्द्रोंने उन मोक्षप्राप्त सिद्धप्रभु की पूजा करके मोक्ष का महोत्सव किया।

मुनिसुव्रत जिनराज की निर्जर टूंक है जेह
मन-वच-तन-कर पुजहूँ शिखर सम्मेद यजेह।

पूर्वभव मे जो भरतक्षेत्र की चम्पापुरी में हरिवर्मा राजाथे और पश्चात् राजगृही में बीसवें तीर्थंकर होकर वर्तमान मे मोक्षपुरी मे अनत सिद्धों के साथ विराज रहे है, उन परमात्मा को नमस्कार हो !

[इस प्रकार बीसवें तीर्थंकर श्री मुनिसुव्रत भगवन्त का जीवनचरित्र पूर्ण हुआ]

[चक्रवर्तियों एवं अर्धचक्रवर्तियोंका संक्षिप्त परिचय]

★ भगवान धर्मनाथके तीर्थ में मघवा नामके तीसरे चक्रवर्ती अयोध्यामें हुए; उन्होने जिनदीक्षा लेकर केवलज्ञान प्रगट करके मोक्ष प्राप्त किया तत्पश्चात् चौथे सनत्कुमार चक्रवर्ती हस्तिनापुर मे धर्मनाथ प्रभुके तीर्थ में हुए; इन्द्रने जिनके रुपकी प्रशसा की, तथापि उसका भी मोह छोडकर उन्होने अशरीरी पदको साधा। तत्पश्चात् १६ वे, १७वे तथा १८ वें-यह तीनो तीर्थंकर स्वय ही पाँचवे, छठवे और सातवे चक्रवर्ती हस्तिनापुर मे हुए।

★ तत्पश्चात् अरहनाथ प्रभुके शासन मे सुभौम नामक आठवाँ चक्रवर्ती हुआ; फल के स्वाद की लोलुपतासे, समुद्रके बीच धर्म की विराधना करके वह नरकमे गया। छठवें बलदेव, वासुदेव तथा प्रतिवासुदेव (नन्दिसेन,पुण्डरीक और निःशुंभ) भी अरहनाथ प्रभुके शासन में हुए; उनमें से नन्दिसेनने मोक्ष प्राप्त किया।

★ तत्पश्चात् मल्लिनाथ प्रभुके तीर्थ में पद्म नामके नौवे चक्रवर्ती हस्तिनापुरमें हुए; उन्होने मोक्ष प्राप्त किया । ( वात्सल्य मे प्रसिद्ध विष्णु कुमार उन्हीके पुत्र थे।) सातवे बलभद्र-नन्दिमित्र, नारायण-दत्त और प्रतिनारायण बलीन्द्र भी उसी तीर्थ में हुए; बलभद्र ,मोक्ष गये।

★ पश्चात् मुनिसुव्रत प्रभु के तीर्थ में दसवे हरिषेण चक्रवर्ती हुए, जे सर्वार्थ सिद्धिमें गये; और राम, लक्ष्मण तथा रावण-यह आठवें बलदेव, वासुदेव तथा प्रतिवासुदेव हुए; सीता, अजना और हनुमान भी उसी काल में हुए। राम और हनुमान ने तो मोक्ष प्राप्त किया; लक्ष्मण और रावण भविष्य में तीर्थंकर होकर मोक्ष प्राप्त करेंगे।

२१

भगवान नमिनाथ

[२१]

मिथिलापुरी सम्मेदशिखर

भ ग वा न न मि ना थ

श्री बीस तीर्थंकर भगवन्तों के मंगल जीवन-चरित्र के पश्चात् अब भरतक्षेत्र के २१ वें तीर्थंकर… जोकि पूर्वभव में भी भरतक्षेत्र में ही कौशाम्बीनगरी के राजा थे, उनका जीवनचरित्र प्रारम्भ होता है। पूर्वभव में स्वर्गलोक के साथी-ऐसे विदेहक्षेत्र के एकतीर्थंकर की वाणी में जिनकी महिमा प्रगट हुई, और वह बात सुनकर जो संसार से विरक्त होकर रत्नत्रय-रथ में आरूढ़ हुए, वे भगवान श्री नमिनाथ, हमारे साधना-रथ को मोक्षपुरी तक पहुँचाओं !

भगवान नमिनाथ - पूर्वभव : कौशाम्बी नगरी में सिद्धार्थ राजा

उस काल इस भरतक्षेत्र में कौशाम्बी नगरी प्रसिद्ध थी। धर्मात्माओं से सुशोभित उस नगरी में इक्ष्वाकुवंशी राजा पार्थिव राज्य करते थे, उनके सिद्धार्थ नामका एक पुत्र था जो महाप्रतापी एवं भावी तीर्थंकर था।

एक बार परम अवधिज्ञानी मुनिराज उस कौशाम्बीनगरी में पधारे। महाराजा पार्थिव तथा राजकुमार सिद्धार्थ उन मुनिराज के दर्शन करने गये और धर्मोपदेश श्रवण किया। श्री मुनिराजने संसार से वैराग्य उत्पादक उपदेश देते हुए कहा कि- अहा, यह जीव स्वयं अखण्ड सुखनिधान से परिपूर्ण परमात्मा, चैतन्यसम्राट है; तथापि निजनिधान को भूलकर, रत्नत्रयरूपी वैभव से रहित, विषयो का भिखारी होकर चारों गति में सुख की भीख माँगता हुआ भटक रहा है; परन्तु बाह्य में उसे कही सुखकी प्राप्ति नहीं होती; अंतर में अपने निकट ही चैतन्य भण्डार में सुख भरा है, उसे जाने तो स्वाधीन सुख का अनुभव हो। हे भव्य राजन् ! आप चरमशरीरी हो, और आपका यह पुत्र सिद्धार्थ भी तीसरे भवमे तीर्थंकर होकर सिद्धि प्राप्त करेगा। आप इस संसार का मोह छोड़कर आत्मा को रत्नत्रयधर्म की आराधना में लगाओ ! . और हे भव्य सिद्धार्थकुमार ! इस ससार मे तुम्हारे दो ही भव शेष हैं; तुम भी आत्मा के चैतन्यनिधान को पहिचानकर सम्यग्दर्शन प्रगट करो !

अहा, मुनिराज के श्रीमुख से ऐसी उत्तम बात सुनकर सबके हर्षका पार नही रहा ! तुरन्त ही सिद्धार्थकुमारके अतर मे चेतना उल्लसित हुई, आनन्द से रोमांचित होकर उन्होंने सम्यग्दर्शन प्रगट किया, और साथ ही श्रावक के अणुव्रत ग्रहण कर लिये। महाराजा पार्थिव का चित्त भी संसार से विरक्त हो गया था, उन्होंने पुत्र सिद्धार्थकुमार को कौशाम्बी का राज्य सौंपकर जिनदीक्षा अंगीकार कर ली और रत्नत्रय की उत्कृष्ट आराधना द्वारा केवलज्ञान प्रगट करके मोक्ष प्राप्त किया।

कुछ ही वर्ष बाद राजा सिद्धार्थ का चित्त भी संसार से उदास हो गया; और ठीक उसी काल कौशाम्बी नगरी मे महाबल नामक केवली भगवान का आगमन हुआ। उनके चरणों में नमस्कार करके सिद्धार्थ राजाने दीक्षा धारण की, उन्ही प्रभुके चरणों मे रहकर क्षायिकसम्यक्त्व प्राप्त किया और दर्शनविशुद्धि आदि सोलहकारण भावनाएँ भाकर तीर्थंकर प्रकृति का बध किया। वे एकावतारी महात्मा चारित्र द्वारा शोभायमान हो उठे और उत्तम आराधनासहित समाधिमरण करके अपराजित विमान मे उत्पन्न हुए।

भरतक्षेत्र के भावी तीर्थंकर जब अपराजित विमान में विराज रहे थे तब विदेह क्षेत्र के ‘अपराजित’ नामक भावी तीर्थंकर भी उसी विमान मे विराजते थे। असख्य वर्षों तक वे दोनों भावी तीर्थंकर अपराजित विमान मे साथ रहे, आत्मसाधना की तत्त्वचर्चा की, घोंट-घोंटकर स्वानुभवरस का पान किया। ३३ सागरोपम पश्चात् उन दो मे से एक अपराजित देव तो विदेहक्षेत्र की सुसीमानगरी में अपराजित तीर्थंकर रुपमे अवतरित हुए, और कुछ वर्ष पश्चात् दूसरे देव (अपने चरित्रनायक) ने इस भरतक्षेत्र मे नमिनाथ तीर्थंकर के रुप मे अवतार लिया। उनकी मगल-कथा अब पढ़ेगे।

मिथिलापुरी में नमिनाथ-अवतार

उस अपराजित विमान मे अहमिन्द्रकी आयु जब छहमास शेष रही तब मिथिलापुरी के राजभवन के प्रागण मे दिव्य रत्नो की वर्षा होने लगी। उस समय बंगदेश की मिथिलानगरी में ऋषभदेव के वंशज श्रीविजय महाराजा राज्य करते थे। उनकी महारानी वप्पिला देवी ने अश्विनकृष्णा द्वितिया की रात्रि मे १६ मंगलस्वप्न देखे और उसी समय अपराजित विमान से भगवान नमिनाथ का जीव उनकी पवित्र कोख मे अवतरित हुआ। गर्भस्थ पुत्र अवधिज्ञानी था और पिता विजयराज भी अवधिज्ञानी थे; उन्होंने अवधिज्ञान द्वारा जानकर कहा कि-हे देवी ! तुम्हारी कुक्षि मे आज रात्रि स्वर्ग लोक से तीर्थंकर का आत्मा आया है, तुम जगत्पूज्य तीर्थंकर की माता बन गई हो। यह जानकर महादेवी के हर्षकी सीमा नहीं रही। ठीक उसी ही समय स्वर्ग के देवविमान जयजयकार करते मिथिलापुरी मे उतरने लगे। अहा ! क्षायिक सम्यक्त्व तथा तीर्थंकर प्रकृतिसहित वे महात्मा अभी तो माता के गर्भ में आये कि स्वर्ग के इन्द्र तथा देव उनके माता-पिता का सन्मान करने हेतु मिथिलानगरी में आ पहुँचे और तीर्थंकर के आगमन का भव्य महोत्सव किया।

स्वर्गलोक की देवियाँ आनन्दपूर्वक माता की तथा गर्भस्थ पुत्रकी सेवा करती थीं। अरे, गर्भवास के दुःख तो कहीं दूर रहे, परन्तु गर्भमे भी देव जिनकी सेवा करते हों, उन महात्मा की महिमा का क्या कहना ! चैतन्यतत्त्व की आराधना का ही प्रताप है कि वह जीव को प्रत्येक स्थिति में सुख प्रदान करती है !

सवा नौ महीने बीतने पर श्रावण कृष्णा दशम के शुभदिन वप्पिला देवीने जगत्पूज्य पुत्रको जन्म दिया। उस मंगल आत्मा के प्रभाव से जगत में सर्वत्र आनन्द छा गया; स्वर्गलोक के मंगल वाद्य अपने आप बजने लगे; इन्द्र का आसन डोल उठा; सौधर्म इन्द्र एवं शची इन्द्राणी देवों की सेना के दिव्य ठाटबाटसहित बालतीर्थंकर का जन्माभिषेक करने मिथिलापुरी में आ पहुँचे। उन बाल तीर्थंकर को अपनी गोदमें लेते हुए इन्द्राणी को जो परम हर्ष हुआ उसका वर्णन कौन कर सकता है ? सम्यक्त्वसे होनेवाले आनन्द का वेदन क्या वचनों से कहा जा सकता है ? इन्द्राणीने उन बालप्रभु को जब इन्द्रके हाथ में दिया तब इन्द्र भी आश्चर्यमुग्ध होकर हजार नेत्र बनाकर प्रभुका रूप देखता रह गया ! ‘मैं इन्द्र हूँ’ यह बात तो वह क्षणभर भूल ही गया ! मैं तो प्रभुका सेवक हूँ-ऐसी भक्ति से वह नाच उठा। वह एकसाथ हजार हाथों को उछालता और उसके हाथों की प्रत्येक अँगुली पर अप्सरा देवियाँ उसी जैसी चेष्टा कर-करके नृत्य करती थीं.. जिस प्रकार सम्यक्त्व का अवतार होने पर एक चैतन्य-इन्द्र के साथ उसके अनन्त गुणों की परिणति आनन्द से नाच उठती है, उसी प्रकार तीर्थंकर का अवतार होने पर इन्द्र अपनी समस्त देवियोसहित आनन्द से नाच उठा। मेरु पर जन्माभिषेक करके इन्द्रने उन बालप्रभुकी अद्भुत स्तुति की . .और नाम रखा-नमिकुमार ।

मुनिसुव्रत तीर्थंकर के तीर्थ में ६० लाख वर्ष बीतने पर नमिनाथ तीर्थंकर का अवतार हुआ। उनकी आयु १० हजार वर्ष और शरीर की ऊँचाई १५ धनुष (१५० फुट) थी। उनके चरणोंमें ‘कमल’ का चिह्न था।

नमिकुमार माता-पिता को तथा प्रजाजनों को आनन्दित करते हुए दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे थे। आज इतने वर्षों बाद दूरदूरसे उनका चिन्तवन करने पर हम सब कितने आनन्दित होते हैं ! तो फिर अपने ही नगर मे, अपने ही आँगन में उन तीर्थंकर को प्रत्यक्ष बोलते-चालते, हँसते-खेलते देखकर मिथिलापुरी के राजा-प्रजा कितने आनन्दित होते होंगे !! वास्तव मे, तीर्थंकर का अवतार जगत के जीवों को आनन्द-मगलकारी है।

प्रभु नमिकुमार जब ढाई हजार वर्ष के हुए तब विजयराजाने उनका राज्याभिषेक करके मिथिलापुरी का राज्य सौंप दिया। अरे, उन्हें मात्र मिथिला के राजा कैसे कहें ? वे तो तीन लोक के श्रेष्ठ राजा है।

महाराजा नमिने पाँच हजार वर्ष तक मिथिलापुरी का राजसिंहासन सुशोभित किया। उनके राज्य में प्रजाजन सर्व प्रकार से सुखी और धर्मसाधन में तत्पर थे। एक बार वर्षा ऋतु में धरती पर चारों ओर हरियाली छायी हुई थी…मानो रत्नत्रय के उद्यान खिल रहे हों ! महाराजा नमिकुमार प्रकृति की उस अद्भुत शोभा का अवलोकन करने हेतु हाथीपर बैठकर वन-विहार के लिये चले। वन के आह्लादक वातावरण में प्रभुको आत्मज्ञान की ऊर्मियाँ जागृत होती थीं।

जब भरतक्षेत्र के प्रभु यहाँ वनविहार कर रहे थे, उस समय…विदेहक्षेत्र में अपराजित तीर्थंकर के समवसरण में एक अद्भुत आनन्दकारी घटना हुई। क्या हुआ ? वह जानने के लिये चलो विदेह में।

विदेहक्षेत्र में अपराजित तीर्थंकर विराजते थे; उन्हें आज ही केवलज्ञान हुआ था। दो देव उनके समवसरण में आये दिव्यध्वनि श्रवण करने के पश्चात् भक्ति से पूछा-हे जिनेश ! आप जैसे कोई तीर्थंकर इस समय भरतक्षेत्र में हैं ?

अपराजित तीर्थंकर ने दिव्यध्वनि में उत्तर दिया-हाँ, इस समय भरतक्षेत्र की मिथिलापुरी में इक्कीसवें तीर्थंकर नमिकुमार विचर रहे हैं; वर्तमान में वे राज्यावस्था में हैं और वन की शोभा निहारने के लिये वनविहार कर रहे हैं। कुछ समय पश्चात केवलज्ञान प्रगट करके वे तीर्थंकर होंगे। वे अपराजित विमान से अवतरित हुए हैं। पूर्वभव मे हम दोनों अपराजित विमान मे साथ थे।

प्रभु के श्रीमुख से भरतक्षेत्र के तीर्थंकर की कथा सुनकर वे दोनों देव अति प्रसन्न हुए और परमभक्तिपूर्वक उन नमि तीर्थंकर के प्रत्यक्ष दर्शन करने हेतु तुरन्त मिथिलापुरी आये।

मिथिलापुरी मे नमि महाराजा वनकी शोभा निहार रहे थे; इतने मे आकाशमार्ग से आकर उन दोनो देवो ने प्रभुको नमस्कार किया। यह दृश्य देखकर लोग आश्चर्यचकित हो रहे थे कि दोनों देव हाथ जोड़कर बोले-हे प्रभो ! आपको देखकर हम अति आनंदित हुए आप इस भरतक्षेत्र के २१ वें तीर्थंकर हो. विदेहक्षेत्र क तीर्थंकर अपराजित के श्रीमुख से यह बात सूनकर हम आपके दर्शन करने आये हैं।

देवो की बात सुनकर नमिप्रभु क मुखपर किंचित् मुस्कान आयी और तुरन्त ही गंभीर विचार में खो गये। जिनको निकट भविष्य मे ही केवलज्ञान होना है ऐसे वे भावी तीर्थंकर विदेहक्षेत्र के तीर्थंकर की धर्मसभा मे हुई बात विचारने लगे, तत्क्षण उन्हे जातिस्मरण हुआ कि-अहा, वे अपराजित तीर्थंकर और मै (नमि तीर्थंकर) दोनो पूर्वभव मे अपराजित स्वर्गलोक मे साथ थे; वहाँ असख्य वर्ष तक हम साथ रहे है। उन प्रभुने केवलज्ञान प्राप्त कर लिया और मै अभी राजभोग मे पडा हूँ। अब मुझे इस प्रकार समय गँवाना उचित नही हैं। मै आज ही मुनि बनूँगा और केवलज्ञान की साधना करूँगा। इस प्रकार दीक्षा का निश्चय करके प्रभु नमि महाराजा वैराग्य-चिन्तन करने लगे:

जीव स्वय ही मोह द्वारा अपने को बधन मे बाँधकर संसाररूपी कारागृह मे पड़ा है। जिस प्रकार पिजरेमे बन्द पक्षी दुःखी होता है अथवा गजस्तभ से बँधा हुआ गजराज-वनहस्ती दुःखी होता है, उसी प्रकार मोही जीव भवबन्धन मे निरन्तर दुःखी एव व्याकुल होता है। यद्यपि यह प्राणी मृत्यु एवं दुःखसे भयभीत होने पर भी उसके कारणो की ओर दौड़ता है, उनसे छूटने का प्रयत्न नही करता। तीव्र विषयतृष्णासे आर्त-रौद्र ध्यान कर-करके वह महान दुःखी होता है, चार गति के परिभ्रमण मे उसे कहीं विश्राम नहीं है। रत्नत्रयधर्म का सेवन ही इस भव दुःख से छुड़ाकर मोक्षसुख देनेवाला है। इस प्रकार भव-तन-भोग से विरक्त होकर मोक्षमे ही जिनका चित्त अनुरक्त है-ऐसे वे नमिमहाराजा दीक्षा ग्रहण करने को तत्पर हुए।

उसी समय, देवो में वीतराग और ब्रह्मचारी ऐसे सारस्वत आदि लौकांतिक देव ब्रह्मलोक से मिथिलापुरी मे आये और प्रभु नमिनाथ को नमस्कार करके स्तुति करने लगे-हे देव ! आपके विचार उत्तम है; आपकी वैराग्य भावना का अनुमोदन करने ही हम आये है। इस प्रकार स्तुति एव अनुमोदन के पश्चात् लोकांतिक देव लौट गये और इन्द्रादि देव ‘उत्तर-कुरु’ नामक पालकी लेकर दीक्षा कल्याणक मनाने आ पहुँचे। आषाढ़ कृष्ण दशम को (अपनी जन्मतिथि के दिन ही) नमिनाथ प्रभु सिद्ध भगवन्तो को नमन करके स्वय ही दीक्षित हुए। भगवान के साथ अन्य एक हजार राजाओ ने भी जिनदीक्षा अंगीकार की। उसी समय आत्मध्यान में एकाग्र होने पर नमि मुनिराज को मनःपर्ययज्ञान प्रगट हुआ। मुनिराज नमिनाथ को प्रथम पारणा वीरपुरी में दत्तराजाने कराया।

मुनिदशा मे नौ वर्ष तक विचरने के पश्चात् प्रभु नमि मुनिराज पुनः मिथिलापुरी में पधारे और वहाँ अपने दीक्षावन मे ही मगसिर शुक्ला एकादशी के दिन उन्हें केवलज्ञान प्रगट हुआ। इन्द्रादि देवो ने आकर समवसरण में प्रभुके केवलज्ञान का महोत्सव मनाया। देव, मनुष्य और तिर्यंच प्रभुकी धर्मसभा मे उपदेश श्रवण करने बैठे। प्रभुने दिव्यध्वनि मे शुद्धात्मतत्त्व की अनन्त महिमा बतलायी और उस शुद्धात्मा के परिणमनरूप मोक्षमार्ग का उपदेश दिया। हे जीवो ! आत्मा का शुद्धतारूप परिणमन ही मोक्ष है, वह महान आनन्द रूप है; वह आत्मा से भिन्न नही है और किसी वस्तु का उसमें अवलम्बन नहीं है। उस मोक्षका उपाय भी आत्मा के शुद्धपरिणामरूप ही है; उसमे भी किसी दूसरे का अवलम्बन नही है।

ऐसे स्वावलम्बी मोक्षमार्ग को जानकर अनेक जीवों ने आत्मा के आश्रय से शुद्धपरिणमन किया और मोक्षकी साधना की। उन २१ वे तीर्थंकर प्रभुकी धर्मसभा में सुप्रभदेव आदि १७ गणधरों सहित कुल २० हजार मुनिवर विराजते थे; ४५००० आर्यिकाएँ थीं। एक लाख धर्मात्मा श्रावक तथा तीन लाख श्राविकाएँ थीं। चारो ओर दिव्य धर्मचक्र घूमते थे। अरे, समवसरण में ऊपर दृष्टि तो डालो, अहा ! वहाँ १६०० तो सर्वज्ञ-केवली भगवन्त विराज रहे हैं। एक साथ एक हजार छह सौ अरिहंत परमात्माओं सहित तीर्थंकर प्रभुके दर्शनो से कैसा महान हर्ष होता है ! और मोक्ष की आराधना के प्रति कितना उल्लास जागता है ।। धन्य जिनवैभव ।। धन्य आत्मवैभव ।। ऐसे आश्चर्यकारी आत्मवैभवसहित वे इक्कीसवें तीर्थंकर प्रभु ढाई हजार वर्ष तक इस भरतक्षेत्र में विचरे और वीतरागी धर्मोपदेश द्वारा लाखों जीवों का कल्याण किया।

इस प्रकार धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करते-करते प्रभु नमिनाथ की आयु जब मात्र एक मास शेष रही तब वे सम्मेदशिखर पधारे और अनुक्रम से योगनिरोध करके, वैशाख कृष्णा चतुर्दशीकी रात्रि के अन्तिम प्रहर में सर्वथा निष्कर्म होकर, सिद्धपुरी में जाकर विराजमान हो गये। देवों और मनुष्योंने प्रभुकी मोक्षप्राप्तिका कल्याणक महोत्सव मनाया। उस अवसर पर अशरीरी चैतन्य भावरूप मोक्षका (अर्थात सर्वथा शुध्द आत्माकी अचिंत्य महिमा का) चिन्तन कर करके अनेक जीव संसार से विरक्त हुए; किन्हीं ने सम्यग्दर्शन प्राप्त किया, कोई मुनि हुए तो कितनों ने केवलज्ञान प्रगट किया और कुछ जीव तो प्रभुके साथ ही मुक्ति को प्राप्त हुए। मोक्षकी साधना का वह महामंगल-महोत्सव था। उस मोक्षकी स्मृति में इन्द्रने भी उस मोक्षभूमि ‘मित्रधर’ टूंक पर प्रभुचरणों की स्थापना करके पूजा की।-

! नमिनाथ जिनराज की मित्रधर टूंक है जेह,
मन-वच-तन कर पूज हूँ शिखर सम्मेद यजेह।

अहो, हम जैसे भव्य जीवों के हितकारी मित्र ,हे भगवान नमिनाथ ! आपके धर्मरथ में आरुढ होकर हम शीघ्र मोक्षपुरी में आ रहे हैं. . आपको नमस्कार हो ।

[ २१ वे तीर्थंकर नमिनाथ भगवान का मंगल जीवन चरित्र पूर्ण हुआ]

११वें चक्रवर्ती जयसेन

२१वें नमिनाथ तीर्थंकर के शासन में, कौशाम्बी नगरीमें जयसेन नामक चक्रवर्ती हुए; प्रत्येक तीर्थंकर चौवीसीमें १२ चक्रवर्ती होते है; उनमें यह ११वें चक्रवर्ती था। वे उल्कापात देखकर वैराग्य को प्राप्त हुए और अपने ज्येष्ठ पुत्रको छह खण्डका राज्य देने की इच्छा प्रगट की किन्तु पुत्र भी वैरागी था; उसने राज्य लेनेसे इन्कार किया और पिता के साथ ही दीक्षा लेने को तैयार हो गया। चक्रवर्ती जयसेन ने वरदत्त केवली के निकट जिन दिक्षा ग्रहण की और समाधिमरण करके जयंत नामके अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र हुए।

२२

भगवान नेमिनाथ (भाग १)

[२२]

नेमिनाथ प्रभु परम विरागी सिद्धपुरी में सोहें,
हुए पंचकल्याणक सुराष्ट्र में भविजन का मन मोहें।
किया त्याग राजुल का प्रभुने, मुक्तिलगी अति प्यारी,
हम जीवन आदर्श प्रभुजी, आनन्द-मंगलकारी।

धर्मरथ के चक्र की ‘नेमि’ (धुरी) समान बाईसवें तीर्थंकर श्री नेमिनाथस्वामी हमारे धर्मरथ को मोक्षपुरी मे पहुँचाओ ! पशुओं को बंधन से छुड़ानेवाले प्रभु नेमिनाथ हमें भी भवबंधनसे छुडाओं ! पूर्ण आनन्दधाम में विराजमान प्रभु, हमें भी आनन्दधाम में स्थापित करो ! जिन्होंने विवाह के समय ही वैराग्य धारण किया, राजुलदेवी को संसार से विरक्त करके मोक्षसाधना की प्रेरणा दी, स्वय मोक्षपुरीमें सिधारने पर भी हमारे हृदय में भी विराजमान हैं, वे भगवान नेमिनाथ हमे भी अपने जैसा उत्तम मंगल-जीवन प्रदान करो। अहा, आत्मसाधनामय उनके वीतरागी जीवन का यह पुराण भव्य जीवों को विषयकषायों से छुड़ाकर आत्महित की प्रेरणा देनेवाला है। भव्य जीव भक्तिपूर्वक उसका श्रवण करो, पठन करो ! पुराण द्वारा उन प्रभुके ज्ञान-वैराग्यमय पवित्र जीवन का चिन्तवन ही उनका स्तवन है; उस पवित्र जीवन का चिन्तन अपने भावों को मंगलरूप करता है और मुक्तिकी साधना में लगाता है।

भगवान नेमिनाथ : पूर्वभव : चिन्तागति विद्याधर

वे भगवान नेमिनाथ पूर्व सातवें भवमें पुष्कर द्वीप में चिन्तागति नामके विद्याधर थे; उनके दूसरे दो छोटे भाई थे-एक का नाम मनोगति और दूसरे का चपलगति था। अनेक विद्याओं के साथ आकाशगामी विद्या में भी वे तीनों भाई पारंगत थे।

उस समय प्रीतिमती नामक एक राजकुमारी अति रूपवान और गतिविद्यामें महान कुशल थी;

उसनेअभिमानपूर्वक ऐसी प्रतिज्ञा की थी कि-गतिस्पर्धा में मुझे जो पराजित कर देगा उसीके साथ ही विवाह करूँगी। (उसकी योजनानुसार मेरु के शिखर से एक माला नीचे फेकी जाती, वह माला नीचे गिरने से पूर्व, मेरु की तीन प्रदक्षिणा देकर झेल लेनी थी।) उस स्पर्धा मे कितने ही राजकुमार पराजित हो चुके थे। चिन्तागति विद्याधर के दोनो भाई-मनोगति और चपलगति भी राजकुमारी पर मोहित होकर उससे विवाह करनेकी इच्छा से गये, परन्तु वे भी उस गतियुद्ध में हारकर तथा अपमानित होकर लौट आये।

अपने भाईयों का अपमान देखकर चिन्तागतिने गतियुद्ध में उस राजकुमारी को पराजित कर दिया और राजकुमारी उसे वरमाला पहिनाने को तैयार हुई, तब उसके साथ विवाह करने से इन्कार करते हुए चिन्तागतिने कहा कि-तुम मेरे छोटे भाइयों को माला पहिनाओ, क्योंकि वे तुमसे विवाह करने की इच्छा रखते थे।

राजकुमारीने कहा-गतियुद्ध में आपने ही मुझे जीता है इसलिये मैं आपसे ही विवाह करूँगी, नहीं तो कुँवारी रहकर दीक्षा ग्रहण करूँगी। आपके सिवा समस्त पुरुष मुझे बन्धु समान हैं।

चिन्तागतिने कहा-मेरे छोटे भाइयोंने जिसके साथ विवाह करने की इच्छा की हो, उसके साथ मैं विवाह करूँ वह मेरे लिये शोभास्पद नहीं है।-इस प्रकार चिन्तागति विद्याधरने (नेमिनाथ के जीवने) विवाह का इन्कार करने पर, अन्त मे राजकुमारी प्रीतिमती ने दीक्षा ले ली और आर्यिकाव्रत धारण किये।

[पुराणों में राजकुमारी प्रीतिमती का वर्णन यहीं तक आता है। उसके बाद अगले भवो मे उसका क्या हुआ तत्सम्बन्धी उल्लेख किसी पुराण मे नहीं मिलता। परन्तु अनुमान से ऐसा लगता है कि वह जीव कुछ भव धारण कर राजमती (राजुल) हुई हो, और नेमिनाथ के जीवने चिन्तागति के भवमे जिस प्रकार प्रीतिमती के साथ विवाह करने से इन्कार किया था, उसी प्रकार उन्ही संस्कारो के बलसे, इस भवमे भी राजीमति से विवाह का इन्कार करके स्वयं वैराग्य प्राप्त किया हो और राजीमति को भी वैराग्य की प्रेरणा दी हो। इसके अतिरिक्त बीचके भवों मे वे नेमि-राजुल के जीव एक-दूसरे के साथ होने का कोई उल्लेख पुराणों मे देखने को नहीं मिलता।]

चिन्तागति ने विवाह का इन्कार करने पर राजकुमारीने दीक्षा ग्रहण कर ली। उसका ऐसा पराक्रम देखकर अन्य अनेक जीव भी संसार से विरक्त हो गये। चिन्तागति आदि तीनों राजकुमारों ने भी ससारसे विरक्त होकर जिनदीक्षा धारण की और संयमपूर्वक देहत्याग करके तीनों भाई चौथे स्वर्ग मे देव हुए।

भगवान नेमिनाथ : पाँचवाँ पूर्वभव : अपराजितकुमार

पश्चिम विदेहक्षेत्र मे सीतोदा नदीके किनारे सिद्धपुर नामके सुन्दर नगरमे अर्हत्दास राजा राज्य करते थे। चौथे स्वर्ग से आयु पूर्ण होने पर वह देव (भूतकाल के चिन्तागति विद्याधर और भविष्यकाल के नेमिनाथ तीर्थंकर का जीव) अर्हत्दास राजा के कुँवररूप मे अवतरित हुआ .उसका नाम अपराजित।

उनके महा भाग्योदय से एक बार उस नगरी मे विमलवाहन तीर्थंकर का पदार्पण हुआ। राजा और प्रजा अत्यन्त हर्षपूर्वक प्रभुके दर्शनार्थ गये। प्रभुके उपदेश से धर्म प्राप्त करके महाराजा अर्हत्दास संसार से विरक्त हुए और पुत्र अपराजित कुमारको राज्य का भार सौंपकर स्वयं जिनदीक्षा अंगीकार कर ली। अपराजित कुमारने भी प्रभुके उपदेश से चैतन्यतत्त्व की अपूर्व महिमा समझकर प्रज्ञाछैनी द्वारा मोह को छेदकर अपूर्व सम्यग्दर्शन प्रगट किया। और श्रावक के व्रत भी धारण किये। अहा, एक भावी तीर्थंकरने मोक्षमार्ग मे प्रवेश किया।

महाराजा अपराजित धर्मपालनपूर्वक राज्य का संचालन करते थे। एकबार उन्होंने सुना कि-उनके पिताश्री अर्हत् मुनिराज को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई है। उससे अत्यन्त हर्षित होकर वे अपने पिताश्री अर्हत् केवली तथा विमलवाहन तीर्थंकर के दर्शनार्थ चले…मार्ग में जाते-जाते उन्होंने सुना कि वे दोनों तो मोक्ष पधार गये हैं।

उनके मोक्षगमन की बात सुनकर अपराजित राजा को आघात लगा, और तीव्र भक्तिभाववश बिना विचारे ऐसी प्रतिज्ञा कर ली कि-जब तक मुझे उन भगवन्तों के दर्शन नहीं होंगे तब तक मैं अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा। अरे, एक भावी तीर्थंकरको भूतकालीन तीर्थंकर के प्रत्यक्ष दर्शन की अभिलाषा जागृत हुई। अरे, परन्तु क्या मोक्ष में गये हुए परमात्मा लौटकर आयेंगे ?. हाँ, क्यों नहीं आयेंगे ? क्या ज्ञानके बलसे साधक जीव सिद्ध भगवान को अपने अन्तरमें नहीं उतारते ? तो इन धर्मात्मा भावी तीर्थंकर की भावना पूर्ण क्यों नही होगी ?

अपराजित राजा को अडिग होकर उन भगवन्तों के ध्यान में बैठ गये। भगवन्तों के दर्शन बिना आठ दिन निराहार बीत गये। आठ दिनके उपवास होनेपर पुण्ययोग से एक देवने उनकी भक्ति से प्रभावित होकर अपनी विक्रिया द्वारा समवसरण जैसी दिव्यरचना की; उसमें मानो तीर्थंकर विमलवाहन तथा अर्हत् केवली विराजते हों ऐसा दृश्य बनाया। उस दिव्य दृश्यमें भगवन्तों के दर्शन करके राजा अपराजितका चित्त अति प्रसन्न हुआ। अहा, आत्मार्थी जीवों के हृदयकी ऊर्मियाँ भी भिन्न प्रकारकी होती है। [और एक दूसरा महान आश्चर्य यह भी देखो कि जिस भक्ति से स्वर्ग के देव प्रभावित हुए, उससे भी सिद्धभगवन्तो को किंचित प्रसन्नता या राग जागृत नही हुआ; वे तो वीतराग रुपसे अपने स्वरूप में ही स्थिर रहकर मोक्षमें बैठे रहे! धन्य है जैन भगवन्तो की वीतरागता ।।

वे राजा अपराजित धर्म भावना पूर्वक सिंहपुरी का राज्य करते थे। एकबार जिनमन्दिर में दर्शन पूजन करके वे स्वाध्याय में लीन थे कि आकाशमार्गसे दो मुनिवर पधारे। उन्हे देखकर राजा को महान आश्चर्य और अक्षय निधान की प्राप्ति जैसी प्रसन्नता हुई। विनय पूर्वक वन्दना करके उनका उपदेश भी सुना; फिर कहा-हे भगवन्तो ! आपके दर्शन से मैं धन्य होगया ! आपको देखकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही है और अंतरसे भ्रातृ स्नेह उमड़ रहा है! मुझे ऐसा लग रहा है जैसे पहले आपको कहीं देखा हो और आप मेरे पूर्व परिचित भ्राता हो !

तब मुनिराज बोले-हे राजन सुनो ! आपकी बात सत्य है; इस भवमै नही किन्तु पूर्वभवमें आपने हमें देखा है.. किस प्रकार … सो सुनो !

राजा अपराजित उत्सुकता पूर्वक अपने पूर्वभव की बात सुनने लगे और मुनिराज कहने लगे-हे राजा ! पूर्वभवमें आप चिन्तागति नामके विद्याधर थे और हम दोनों मुनि आपके लघुभ्राता (मनोगति तथा चपलगति) थे। प्रीतिमती राजकुमारी के निमित्त से वैराग्य प्राप्त करके हम तीनों भाइयों ने जिनदीक्षा ग्रहण कर ली और स्वर्ग में गये। वहाँ से हम दोनों पूर्वविदेह में विद्याधर राजकुमार के रुप में अवतरित हुए।

एकबार हम दोनों राजकुमार स्वयम्भू तीर्थंकर के समवसरण में गये .यहाँ हमने अपने तीनों के पूर्वभव की बात सुनी और वैराग्य प्राप्त करके जिनदीक्षा लेकर मुनि हो गये। पूर्वभव के स्नेह के कारण हमें यह जानने की इच्छा हुई कि हमारे ज्येष्ठ भ्राता चिन्तागति वर्तमान मे कहाँ है ? भगवान की वाणी से जाना कि-आप पश्चिम विदेह मे अपराजित राजा के रुपमे अवतरित हुए हैं.. यह जानकर हे राजा ! पूर्वभव के स्नेहवश हम यहाँ आये है। आपको जो भ्रातृवत् स्नेह उमड़ रहा है उसका भी यही कारण है। जीव नित्य होने से पूर्वभव के सस्कार भी अपना कार्य करते रहते हैं। हे बन्धु ! पूर्वकर्म के उदय से प्राप्त भोगों को आपने दीर्घकाल तक भोगा है; अब उनसे विरक्त होओ; आपकी आयु मात्र एक मास शेष रही है, इसलिये शीघ्र आत्मकल्याण का विचार करो।

अपने पूर्वभव के भ्राता ऐसे उन दोनों मुनिवरो के श्रीमुख से अपने पूर्वभव की तथा आत्महित की बात सुनकर राजा अपराजित को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने कहा-हे भगवन्त ! आप निर्ग्रन्थ, निर्मोह होनेपर भी पूर्वभव के स्नेहवश आपने मुझ पर महान उपकार किया है, सचमुच आप मेरे सच्चे हितैषी बधु हो।

मुनिराज ने परम वात्सल्यदृष्टि से कहा- हे राजन् ! आप मात्र हमारे पूर्वभव के भ्राता ही नहीं किन्तु भावी तीर्थंकर हो, और पाँचवें भवमें तुम भरतक्षेत्र के बाईसवे तीर्थंकर होकर मोक्ष प्राप्त करोगे। ऐसा उत्तम भविष्य कहकर तथा राजाको आशीर्वाद देकर वे दोनों मुनिवर पूर्व विदेहक्षेत्र की ओर विहार कर गये।

मुनिवरों के श्रीमुख से अपने मोक्षकी बात सुनकर राजा अपराजित को जो आनन्द हुआ उसका क्या कहना ! मोक्षार्थी को मोक्षसे बढ़कर दूसरी वस्तु और क्या होगी ? राजा का चित्त मोक्ष की साधना में तत्पर हुआ; राजपाट छोड़कर उन्होंने जिनदीक्षा ग्रहण की, इतना ही नही, प्रायोपगमन नामक उत्कृष्ट सन्यास धारण करके एक महीने तक उत्तम आराधना की और समाधिमरणपूर्वक देह त्यागकर १६ वें अच्युत स्वर्ग मे इन्द्र हुए।

अच्युत स्वर्ग के दिव्य वैभवों में उन धर्मात्मा इन्द्रने बाईस सागरोपम के. असंख्य वर्ष बिताये, परन्तु वहाँ भी वे बाह्य सुखों मे इतने मुग्ध नहीं हुए थे कि चैतन्यवैभव को भूल जायँ ! चैतन्य के अतीन्द्रिय सुख के समक्ष इन्द्रलोक के सुख भी उन्हें तुच्छ भासित होते थे, और मोक्ष सुख की साधना निरंतर चल रही थी। सच्चा अच्युतपद तो सिध्दपद है, -ऐसा जाननेवाले वे अच्युतेन्द्र आयु पूर्ण होने पर अच्युतस्वर्ग से च्युत होकर मनुष्यलोक मे अवतरित हुए।

भगवान नेमिनाथ : तीसरा पूर्वभव : हस्तिनापुर में सुप्रतिष्ठ राजा

उस समय इस भरतक्षेत्र के हस्तिनापुर में राजा श्रीचन्द्र राज्य करते थे; अच्युतेन्द्र का वह जीव उनके यशस्वी पुत्ररुप में उत्पन्न हुआ, उसका नाम सुप्रतिष्ठ। वह राजकुमार युवावस्था को प्राप्त होने पर उसका राज्याभिषेक करके महाराजा श्रीचन्द्रने जिनदीक्षा धारण की। राजा सुप्रतिष्ठ न्याय-नीतिनिपुण एव आत्मज्ञानी थे। उनकी रानी का नाम सुनन्दा था। वे सदा जिनेन्द्र देवकी पूजा करते और जैनधर्म की प्रतिष्ठा बढ़ाते थे; उनके राज्यमें सर्वत्र धर्मात्माओं एव विद्वानों का सन्मान होता था; वे भक्तिपूर्वक मुनिवरों की सेवा करते थे। एकबार यशोधर मुनिराज को आहारदान दिया, उस समय देवों ने प्रसन्न होकर उनके आँगन में दुंदुभिनाद, रत्नवृष्टि आदि पंचाश्चर्य प्रगट किये थे। इस प्रकार उन्होंने दीर्घकाल तक हस्तिनापुर के राज्य का उपभोग किया।

एक दिन वे राजा सुप्रतिष्ठ चाँदनी रात्रि में महल की छत पर खड़े आकाश की शोभा निहार रहे थे और विचारते थे कि-जिस प्रकार असंख्य तारा मण्डलों से जगमगाता हुआ यह स्वच्छ आकाश शोभायमान है उसी प्रकार असंख्य आत्मगुणों के आनन्दकारी प्रकाश से मेरा यह चैतन्यगगन सुशोभित है…वह शोभा अंतरके स्वानुभूतिरूप अतीन्द्रिय चक्षुओं से दृष्टिगोचर होती है। राजा सुप्रतिष्ठ ऐसा आत्मचिन्तन कर रहे हैं इतने में… [भगवान नेमिनाथ पूर्वभव मे सुप्रतिष्ठ राजा हैं, खिरते हुए तारे को देखकर वैराग्य प्राप्त करते हैं]

अचानक खर्रर्..ध्वनि के साथ प्रकाश की तेज रेखा दिखायी दी। क्या हुआ ? आकाश से उल्कापात हुआ, एक विशाल तारा खिर गया। वह देखते ही राजा की विचारधारा में भी मानों चमक हुई .उनका चित्त संसार की अस्थिरता देखकर विरक्त हुआ और वे विचारने लगे कि-गगन से यह तारा तो खिर गया, परन्तु मेरा चैतन्यगगन इतना ध्रुव है कि उसमें से निजगुण का एक भी तारा कभी खिरता नहीं है; इसलिये अनन्त गुणों के शाश्वत वैभव से भरपूर मेरा आत्मा ही मुझे शरणभूत है, इस संसार में अन्य कोई संयोग स्थिर या शरणभूत नहीं है।-इस प्रकार वैराग्य प्राप्त करने उन राजा सुप्रतिष्ठने सुमंदर जिनराजके समक्ष जिनदीक्षा धारण कर ली।

रत्नत्रयधारी वे सुप्रतिष्ठ मुनिराज आत्मध्यानपूर्वक परिणामविशुद्धि करने लगे; उनको बारह अंग का ज्ञान उदित हुआ और दर्शनविशुद्धि आदि १६ उत्तम भावनाओं द्वारा तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया। अब, एक भव पश्चात् तीर्थंकर होकर मोक्ष प्राप्त करना निश्चित हो गया। अंत समय में एक मास का संल्लेखना व्रत धारण करके उन्होंने समाधिमरण किया और जयन्त नामक अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र हुए।

सिद्धपद के समीपस्थ ऐसी उस अहमिन्द्र पर्याय में अपने चरित्रनायक नेमिनाथ ३३ सागर के असंख्य वर्षों तक रहे। वहाँ वे निराकुल दिव्य सुखका अनुभव करते थे; यद्यपि उनके पास आत्मजनित तथा पुण्यजनित-ऐसे दोनों प्रकारके उत्तम सुख थे, तथापि उनमें आत्मजनित सुखों को ही वे उपादेय मानते थे, पुण्यजनित सुखों को तुच्छ एवं क्षणभंगुर जानते थे, अर्थात् वास्तवमें उन्हें दुःख ही समझते थे। क्योंकि-

‘परयुक्त, बाधारहित, खंडित, बंधकारण विषम छे;
ज इन्द्रियोथी लब्ध ते सुख ए रीते दुःखज खरे।’

वे महात्मा जानते थे कि-स्वर्गलोक के इस पुण्य के बीच मे सदा रहनेवाला नही हूँ, परन्तु अपने आत्मसुखके साथ तो मै सदा तन्मयरूप से रहूँगा। ऐसे भेदविज्ञान के कारण वे महात्मा स्वर्गलोक के बाह्यसुखो मे लीन नही हुए और पूर्व के पुण्यकर्मों की भी निर्जरा करके मोक्ष साधना की ओर आगे बढ़ते रहे।

[यहाँ एक विषयकी ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करते है कि-नेमिनाथ प्रभुके इन अहमिन्द्रादि भवों मे राजीमति का जीव उनके साथ नही रहा है; क्योंकि जो अनुत्तरविमान में उत्पन्न हो, वह सम्यग्दृष्टि एव एकावतारी होता है और उसे भविष्य मे कभी स्त्रीपर्याय नहीं होती। राजीमति का जीव यदि स्वर्गमे हो तब भी तत्पश्चात् नेमिनाथ के भव मे साथ रहने के लिये उसे बीच मे अनेक भव धारण करने पड़ेंगे। परन्तु उनका उल्लेख कही देखने को नही मिलता।]

इस प्रकार मोक्षसाधना मे आगे बढ़ते-बढ़ते उन अहमिन्द्र का भरतक्षेत्र मे तीर्थंकररुप में अवतरित होने का समय निकट आ गया था। वे अवतार लें उसके पूर्व जिनके यहाँ वे अवतरित होनेवाले हैं उन महाराजा समुद्रविजय की वंशपरम्परा का परिचय करे ले।

[हरिवंश : नेमिप्रभु की वंशपरम्परा का परिचय]

हरिवंश की परम्परा मे सिंहकेतु, शूरसेन आदि अनेक मोक्षगामी राजा हुए। शूरसेन के पौत्र अधकवृष्टि शौरीपुर (सूर्यपुर) मे राज्य करते थे।

❁ उन अधकवृष्टि राजा के दस पुत्र थे, उनमे सबसे बड़े समुद्रविजय (श्रीनेमिनाथ के पिता), और सबसे छोटे वसुकुमार (श्रीकृष्ण के पिता), इस प्रकार श्रीकृष्ण तथा नेमिकुमार चचेरे भाई हुए।

※ उन दस पुत्रो के अतिरिक्त राजा अधकवृष्टि के कुन्ती और माद्री नाम की दो पुत्रियाँ थीं,-उनके पुत्र पाण्डव। इस प्रकार नेमि-कृष्ण और पाण्डव मामा-बुआ के भाई थे।

※ अधकवृष्टि के छोटे भाई नरवृष्टि, वे मथुरा मे राज्य करते थे, उनका पुत्र ेन, और उन उग्रसेन का पुत्र कस।

इतने सम्बन्धोंका उल्लेख आगे चलकर यह कथा समझने मे उपयोगी होगा।

अधकवृष्टि (श्रीकृष्ण तथा नेमिकुमार के दादा) के पूर्वभव

एक बार शौरीपुर नगरी मे एक मुनिराज पधारे। उन्हे केवलज्ञान हुआ। उनके निकट धर्मोपदेश तथा अपने पूर्वभव सुनकर राजा अधकवृष्टि वैराग्य को प्राप्त हुए।

पूर्वभव मे वे अधकवृष्टि अयोध्या मे रुद्रदत्त ब्राह्मण थे। उनके मित्र सुरेन्द्रसेठ कुबेरसमान सम्पत्तिवान तथा जैनधर्म के परमभक्त थे। जिनपूजादि कार्यों मे वे प्रतिदिन दस स्वर्णमुद्राएँ, अष्टमी को बीस तथा चतुर्दशी को चालीस स्वर्णमुद्राएँ खर्च करते थे। एक बार सुरेन्द्रसेठ को बारह वर्ष तक परदेश जाना पड़ा, तब अपने मित्र रुद्रदत्त पर विश्वास रखकर उन्हें जिन मन्दिर के पूजनादि कार्यों के लिये बहुतसी स्वर्णमुद्राएँ दी। परन्तु रुद्रदत्त ने वह धन पूजादिकार्यों के बदले जुआ आदि पाप कार्यों में खर्च कर दिया। इस प्रकार विश्वासघात करके धर्म का द्रव्य पापकार्यों में व्यय करना आदि महापापोंका सेवन करके वह जीव कितनी ही बार नरक मे गया और तीव्र दुःख सहन किये। (बंधुओ! धर्मकी विराधना के महापाप का फल जानकर स्वप्न में भी कभी धर्म की किंचित् भी विराधना नही करना; तन-मन-धनसे भक्तिपूर्वक धर्मकी सेवा करना।)

पश्चात् संसार में भटकता हुआ वह रुद्रदत्त का (नेमिनाथ के दादा का) जीव हस्तिनापुरी मे अति निर्धन मनुष्य हुआ। वह महारोगिष्ठ, दुर्गन्धयुक्त तथा कुरूप था; घर-घर भटककर भीख माँगनेपर भी उसका पेट नहीं भरता था। मानो नरक कैसा होता है वह पापी जीवो को प्रत्यक्ष दिखाने के लिये ही कर्मों ने उसे मनुष्यलोक में भेजा था। ऐसा होने पर भी, उसकी मोक्षकी काललब्धि निकट आने की तैयारी होने से उसके अनुकूल एक प्रसंग बना।

एक जैन मुनिराज आहार के लिये उस नगरी मे पधारे। दरिद्र रुद्रदत्त भी उनके पीछे-पीछे चलने लगा। श्रावकों ने मुनिराज को भक्तिपूर्वक आहारदान दिया और पश्चात् उनके साथ आये हुए उस दरिद्र ब्राह्मण को भी भरपेट भोजन कराया। ‘अरे, जीवन मे एक क्षणभर मुनिराज के साथ रहने से मुझे इतना अच्छा भोजन प्राप्त हुआ, तो अब क्यों न सदा उनके साथ रहूँ-जिनसे मेरा दरिद्र दूर हो जाय ?’-ऐसा सोचकर वह मुनि के साथ वन मे गया और प्रार्थना की कि-हे स्वामी ! मुझे भी अपने साथ रखिये !

मुनिराज ने उसे निकट भव्य जानकर जैन साधु की दीक्षा दी। अन्य मुनियो के साथ रहकर वह भी संयम, तप एवं शास्त्राभ्यास करने लगा। अहा, जैनधर्म तो उदार है, उसकी उपासना का फल महान है, पूर्वकालीन महापापों को एक क्षण मे धो देता है। ऐसे जिनधर्मकी आराधना करके उस रुद्रदत्तके जीवने पूर्वभवकी विराधना के समस्त पाप धो डाले और समाधिमरण करके वह ग्रैवेयकमें अहमिन्द्र हुआ .वहाँ से आकर इस शौरीपुर मे अंधकवृष्टि राजा हुआ है। इस प्रकार पूर्वभव बतलाकर उन केवली भगवानने कहा- हे राजन् ! मैं ही तुम्हे पूर्वभवमें दीक्षा देनेवाला मुनि था, तुम चरमशरीरी हो और बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ का जीव तुम्हारे पौत्ररूप मे अवतरित होगा।

यह सुनकर नेमिप्रभुके दादाने कहा- हे देव ! पूर्वभवमे आप मुझे धर्म प्राप्त करानेवाले उपकारी गुरु थे और वर्तमान मे भी परमगुरु के रूप मे उपदेश देकर आपने मेरा कल्याण किया है। अरे, कहाँ वे बारम्बार नरक के दुःख ! और कहाँ अहमिन्द्र पद ! दोनो मे मै अकेला था और अब मोक्ष में भी अकेला ही जाऊँगा। -इस प्रकार वैराग्यसहित दीक्षा लेकर उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया।

जन्म-मरण ऐक ज करे, सुख-दुःख वेदे ऐक;
नर्कगमन पण ऐकलो, मोक्ष जाय जीव ऐक।
जो जीव तुं छे ऐकलो, तो तज सी परभाव;
आत्मा ध्यावो ज्ञानमय, शीघ्र मोक्षसुख पाम।

उन राजा अंधकवृष्टि के दस पुत्रो मे से समुद्रविजय आदि नौ पुत्र तो पूर्वभव मे भाई ही थे और दीक्षा लेकर मुनि हुए थे; वे स्वर्गमे जाकर पुनः यहाँ अवतरित हुए है। दसवे पुत्र वसुराज (श्रीकृष्ण के पिता) वह पूर्वभव में नन्दिसेन नामक निर्धन मनुष्य था और दुःखोंसे व्याकुल होकर आत्महत्या का विचार कर रहा था, उस समय शंख और निर्नामक (जो कि श्रीकृष्ण तथा बलभद्रके जीव है) -दो मुनिराजों ने उसे देखा; उस नन्दिसेन को निकटभव्य जानकर तथा अगले भव मे यह हमारे पिता होनेवाले हैं-ऐसा ज्ञान करके उन मुनियों ने उसे आत्महत्या करने से रोका और धर्म का स्वरूप समझाकर जिनदीक्षा दी। वे नन्दिसेनमुनि वैयावृत्य तप में प्रसिद्ध थे; उनको अनेक लब्धियाँ प्रगट हुई थीं, जिनसे वैयावृत्य के लिये उपयोगी औषधादि पदार्थ उन्हें स्वयमेव प्राप्त हो जाते थे। इन्द्रसभा मे भी उनके वैयावृत्य की प्रशंसा होती थी। अहो, जैन शासन में धर्मात्मा के वैयावृत्य की अपार महिमा है। जो मनुष्य समर्थ होनेपर भी आपत्तिकालमे धर्मात्मा की उपेक्षा करता है और वैयावृत्य द्वारा उनका कष्ट दूर करनेका प्रयत्न नहीं करता उसका चित्त कठोर है, उसे धर्म की रुचि नहीं है।

नन्दिसेन मुनिराज को धर्मका परम वात्सल्य था, वे मुनियों की परमसेवा करते थे; परन्तु वे एक भूल कर बैठे-वे दुर्गन्धित शरीर से त्रस्त होकर मुनि हुए थे; उस शल्य के कारण वे ऐसा निदान कर बैठे कि-‘धर्म के प्रताप से भविष्य मे मुझे अति सुन्दर-रुपवान शरीर प्राप्त हो’, -इसलिये स्वर्ग में जाकर फिर वह जीव अंधकवृष्टि का सबसे छोटा पुत्र वसुराज हुआ है; उसका रुप अतिसुन्दर है। श्रीकृष्ण और बलभद्र उसी के पुत्र होंगे।

समुद्रविजय का राज्याभिषेक करके महाराजा अंधकवृष्टि तो मुनि होकर मोक्षगामी हुए। कहाँ सातवे नरक के घोर दु ख और कहाँ मोक्ष का परमसुख ! चैतन्य मे कोई अचिंत्य शक्ति (परमात्मशक्ति) है कि जिसकी उपासना से स्वय परमात्मा हो जाता है। जो कभी सातवे नरक का जीव था वही जैनधर्मके सेवन से चैतन्यकी आराधना के प्रताप से परमात्मा बन जाता है। ऐसे प्रतापवन्त जैन धर्म का हे भव्यजीवो ! तुम भक्तिसहित सेवन करो।

अब, महाराजा समुद्रविजय शौरीपुर के राज्य का संचालन करने लगे। उनका सबसे छोटा (दसवाँ) भाई वसुकुमार अति रुपवान था, वह जब नगर मे घूमने निकलता तब नगर की स्त्रियाँ उसके सुन्दर रुपपर मोहित हो जाती और गृहकार्य भूल जाती थी. अरे, अपने बच्चों को भी निराधार छोडकर वे वसुकुमार को देखने दौड़ती थीं। नगरजनोने यह आपत्ति महाराजा समुद्रविजय के समक्ष प्रगट की, जिससे महाराजा ने उसे युक्तिपूर्वक राजमहलमे ही रोककर नगर मे जाना बन्द करा दिया। एक बार द्वारपालने जब उसे महल से बाहर जाने को रोका तब उसे पता चला कि-अरे, मुझे तो नजरकैद की भाँति राजमहल में बन्द कर दिया गया है ! इससे दुःखी होकर वह नगर छोड़कर चला गया और छल-कपट से ऐसी अफवाह फैलायी कि-वह स्वयं चिता मे जल मरा हो।

इधर वसुकुमार के वियोग से समुद्रविजय आदि अत्यन्त दुःखी हुए, परन्तु निमित्तज्ञानियो ने कहा कि-वह कुमार जीवित है और अमुक वर्ष पश्चात् आपसे उसका मिलाप होगा।

कुमार वसुदेव मगध देशमें राजगृही गया, वहाँ से एक विद्याधर उसे विजयार्द्ध पर्वत पर ले गया, फिर वह चम्पापुर गया। उसे जगह जगह राजकन्याओंसहित अनेक प्रकार के वैभव की प्राप्ति हुई। अन्त मे वह रोहिणी के स्वयंवर मे गुप्तवेश मे पहुँचा और रोहिणीने उसे वरमाला पहिनायी। .इसलिये वहाँ स्वयंवर में आये हुए राजा अपमानित होकर लड़ने लगे, परन्तु वसुकुमार को कोई जीत नहीं सका। अन्त में राजा समुद्रविजय लड़ने के लिये तैयार हुए; उन्हे देखकर वसुदेवने उनके चरणों मे एक बाण फेंका। उस बाण के साथ एक चिट्ठी थी, जिसमे लिखा था कि- ‘हे पूज्यवर ! आपका छोटा भाई वसुकुमार आपके चरणो मे नमस्कार करता हैं।’

वह चिट्ठी पढ़ते ही, -अहा, मेरा भाई जीवित है और आज मुझे उसका मिलाप हुआ-ऐसे महान हर्षपूर्वक समुद्रमहाराजा शस्त्र डालकर अपने भाई से भेट पड़े। सबने आनन्दपूर्वक शौरीपुर में प्रवेश किया। कुछ समय पश्चात्-पहले जिनका कथनकर चुके हैं-शंखमुनि का जीव स्वर्ग से आकर वसुकुमार की रानी रोहिणी की कुक्षिसे पुत्ररुप में अवतरित हुआ। ज्योतिषियों ने कहा कि-यह पुत्र नौवाँ बलभद्र होगा।

अभी बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ का अवतार नहीं हुआ, उससे पूर्व उनके कुल-वंश का परिचय चल रहा है। जब शौरीपुर में राजा समुद्रविजय राज्य करते थे तब मथुरा में राजा कंस राज्य करता था। वह कंसका जीव पूर्वभवमें वसिष्ठ नामका बावा था; परन्तु जैनमुनियों के उपदेश से धर्म प्राप्त करके वह जैन साधु हो गया था और एक-एक महीने के उपवास करता था। तब मथुरा के राजा उग्रसेन ने अविचारी-भक्तिसे ऐसी आज्ञा की कि इन मुनि को मासोपवास का पारणा मैं ही कराऊँगा, दूसरा कोई न कराये।

परन्तु मुनिराज जब पारणे हेतु नगर में पधारे तब राजमहल मे हस्ती, अग्नि आदि उपद्रव होने से राजा उग्रसेन उन्हें पारणा नहीं करा सके। इस प्रकार मासोपवासी वसिष्ठ मुनि को पारणा किये बिना तीन बार लौटे। जब उन्हें पता चला कि उग्रसेन की आज्ञा कि कारण ही ऐसा हो रहा है, तब उनके मन में राजा के प्रति वैरभाव जागृत हो उठा, और विवेक को चूककर तथा धर्मभ्रष्ट होकर वे ऐसा निदान बंध (बुरा संकल्प) कर बैठे कि-मैं अपने तप के प्रभाव से अगले भव में इस उग्रसेन राजा का पुत्र होकर इसका राज्य छीन लूँ और इसे कारागृह में डालूँ। बस, हो चुका। वैरभाव से वह जीव उत्तम पुण्य को बेच बैठा और मरकर मथुरा नगरी में उग्रसेन राजा का पुत्र हुआ,-उसका नाम कंस। उसके अशुभ लक्षण देखकर राजा उग्रसेन ने उसे मथुरा से निकाल दिया; वह फिरते-फिरते शौरीपुर में आया और राजकुमार वसुदेव का चाकर बनकर रहने लगा।

[उन वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण जो कि अर्धचक्रवर्ती होनेवाले है-उनके जन्म की कथा अब पढ़ोगे। नेमिनाथ तीर्थंकर का अवतार श्रीकृष्ण जन्म के पश्चात् होगा।]

श्रीकृष्ण के जन्म की कथा

जिस समय की यह कथा है उस समय भारत में २१ वे तीर्थंकर का शासन चल रहा था; और राजगृही नगरी में राजा जरासंध राज्य करता था; वह अर्धचक्रवर्ती (प्रतिवासुदेव) था; उसके शस्त्र-भण्डारमें सुदर्शन चक्र उत्पन्न हुआ था। उसने तीनों खण्ड के लगभग सभी राजाओं को जीत लिया था, परन्तु अभी सिंहरथ राजा को जीतना शेष था। कुमार वसुदेवने युक्तिपूर्वक उस सिंहरथ राजा को जीत लिया और बन्दी बनाकर अपने सेवक कंस द्वारा राजा जरासंध को सौंप दिया। इससे प्रसन्न होकर जरासंध ने अपनी पुत्री (जीवयशा) तथा आधा राज्य वसुदेव को देना चाहा; परन्तु वसुदेवने स्वयं वह न लेकर कंस को दिलवाया। राज्य पाकर कंसने जब जाना कि स्वयं मथुरा का राजकुमार है और पिता उग्रसेन ने बचपन से ही उसका परित्याग कर दिया था.-तब उसके पूर्वभव के वैर के सस्कार जाग उठे; उसने क्रोधपूर्वक पिता उग्रसेन को बन्दी बनाकर द्वार के ऊपर कारागृह मे डाल दिया और मथुरा के राज्य पर अधिकार कर लिया। (पूर्व वसिष्ठ मुनि के भव में कंस के जीव ने जो पापानिदान बंध किया था, उसका यह फल आया।)

पश्चात् राजा कंसने अपने उपकारी वसुदेव को मथुरा बुलाकर उनका सन्मान किया और अपनी बहिन देवकी का विवाह उनसे कर दिया। एक बार राजा कंस के महल में (उनके भाई) अतिमुक्तक मुनि आहार लेने आये; तब कंस की रानी जीवयशाने उन मुनि की तथा उनकी बहिन देवकी की हँसी उड़ाकर अनादर किया। इससे क्रोधावेश में वे मुनि वचनगुप्ति भूल गये और उनसे भविष्यवाणी हो गई कि- हे जीवयशा ! तू अभिमान के कारण जिसकी हँसी उड़ा रही है उस देवकी बहिन का पुत्र ही तेरे पति तथा पिता का (कंस और जरासंध का) घात करेगा।

मुनि द्वारा की गई भविष्यवाणी का जब राजा कंस को पता चला तब वह भयभीत हो गया, और ‘देवकी बहिन के पुत्रों को जन्मते ही मार डालना’-ऐसे दुष्ट आशय से उसने बहिन देवकी को अपने घर ही रखने का वचन वसुदेव से ले लिया।

अभी तक देवकी को किसी संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी; उन्हीं दिनों वे अतिमुक्तक मुनि पुनः मथुरानगरी में पधारे। देवकी ने उनसे विनयपूर्वक पूछा-हे स्वामी ! हमें दीक्षा का अवसर कब प्राप्त होगा ? (यह मुनि देवकी के भाई ही थे।)

मुनिराजने कहा- हे बहिन ! तुझे पुत्रप्राप्तिकी इच्छा है, फिर भी तू मायाचार से दीक्षा की बात किसलिये पूछती है ? सुन, तुझे अनेक उत्तम पुत्र होंगे, उनमें से छह पुत्रों का तो अन्य स्थानपर लालन-पालन होगा, और वे बड़े होकर दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त करेंगे। सातवाँ पुत्र चक्रवर्ती-वासुदेव होकर पृथ्वीका राज्य करेगा।-यह सुनकर देवकी का मन बहुत सन्तुष्ट हुआ।

तत्पश्चात् देवकी के तीन बार युगल-पुत्र हुए, पुण्यप्रभावसे उन छहों चरमशरीरी पुत्रों की एक देवने रक्षा की और उनके स्थानपर दूसरे मृतपुत्र रख दिये। कंस समझा कि देवकी के पुत्र मरे हुए ही अवतरित हुए हैं, तथापि दुष्टभाव के कारण उसने उन नवजात शिशुओं को पत्थर पर पछाड़कर उनका मस्तक फोड़ दिया। [रे संसार ! देखो तो सही वैरभाव की पराकाष्ठा ! छोटे-से बालक वे भी अपनी ही बहिन के पुत्र-उन्हे कंस ने कितनी क्रूरता से पत्थर पर पछाड़ा ! परन्तु जिन का पुण्य जीवित हो उन्हें कौन मार सकता है ?]

उन छह पुत्रों के पश्चात् देवकी को सातवे पुत्रका गर्भधारण हुआ। इस बार निर्नामक मुनिका जीव (जो भोगों का पापानिदान करके स्वर्ग मे गया था वह) देवकी के गर्भ मे आया और देवकी ने सातवें महीने मे पुत्र को जन्म दिया-वह थे श्रीकृष्ण। (इस प्रकार पूर्वभवके शंख तथा निर्नामक-दोनों मुनि यहाँ बलदेव एवं वासुदेव के रुप मे अवतरित हुए।)

मथुरा में श्रीकृष्ण का जन्म होते ही उनके पिता वसुदेव तथा ज्येष्ठ भ्राता (रोहिणी के पुत्र) बलभद्र उन्हे गुप्तरुप से गोकुलमें नन्द गोप के घर ले गये। मार्ग के अँधेरे में श्रीकृष्ण के पुण्यप्रभाव से एक देवने दीपक द्वारा मार्गदर्शन किया, नगर के द्वार अपने आप खुल गये और यमुनानदीका प्रवाह भी अपने आप थम गया; नदीने दो भागों में विभाजित होकर उसपार जाने का मार्ग बना दिया। अहा, पुण्यप्रभाव क्या-क्या नहीं करता ? (वह संसार की तो सब सामग्री देता है, परन्तु एक मोक्ष प्राप्त नहीं करा सकता, इसलिये मोक्षार्थी जीव उस पुण्य की शरण नहीं लेते।)

श्रीकृष्ण को लेकर जब वसुदेव और बलभद्र गोकुल जा रहे थे तब नन्द गोप एक मृत पुत्री को लेकर मार्ग मे आते हुए मिले: बलभद्र ने बालकृष्ण को उन्हें सौंप दिया और मृतपुत्री को लेकर ऐसा प्रचारित किया कि देवकी ने मृतपुत्री को जन्म दिया है। इस प्रकार राजा कंस को श्रीकृष्ण के अवतार की खबर नहीं हुई। इधर नन्दगोप की पत्नी यशोदा अत्यन्त स्नेहपूर्वक उनका लालन-पालन करने लगीं। कृष्ण ज्यों-ज्यों बड़े हो रहे थे त्यों-त्यों मथुरा में उपद्रव बढ़ रहे थे। इसी से अनुमान लगाकर ज्योतिषियों ने राजा कंस को कहा कि-आपका महान शत्रु कहीं उत्पन्न हो चुका है।

यह सुनकर कंस चिन्ता में पड़ गया; उसने शत्रुको ढूंढ़ने और मारने के अनेक उपाय किये, पूर्वभव के मित्र हलके देवों की भी सहायता ली, परन्तु श्रीकृष्ण के पुण्ययोग से उन्हें कोई कुछ नहीं कर सका, उलटे, उनका प्रभाव बढ़ने लगा। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि धर्मात्माओं के पुण्य के समक्ष देवों की शक्ति भी निष्क्रिय हो जाती है और देव भी उनके सहायक हो जाते हैं। अन्त में एक मल्लयुद्ध में छोटे-से श्रीकृष्ण ने बड़े विशाल कंस का (जो कि उनका मामा होता था) संहार कर दिया; उसके पिता राजा उग्रसेन को तथा पद्मावती रानी को कारागृह से मुक्त करके उन्हें मथुरा का राज्य सौंप दिया; और श्रीकृष्ण तथा बलभद्र आदि सबने परिवार सहित आनन्दपूर्वक अपनी राजधानी शौरीपुर में प्रवेश किया। उनके आगमन से महाराजा समुद्रविजय आदि सब अति हर्षित हुए।

अब इधर, कंस की मृत्यु के पश्चात् उसकी रानी जीवयशा राजगृही मे अपने पिता जरासध के पास गई और कंस के मरण की बात सुनायी। यह सुनकर राजा जरासध श्रीकृष्ण आदि समस्त यादवों पर बड़ा क्रोधित हुआ और उन्हें जीतने के लिये अपने पुत्रों को भेजा। सैकड़ो बार युद्ध हुआ। अन्त में, महाराजा समुद्रविजय आदि यादवों ने विचार की-‘राजा जरासध महा बलवान है, वह यहाँ शान्ति से नहीं रहने देगा; श्रीकृष्ण अभी छोटे हैं;’-ऐसा सोचकर उन्होंने शौरीपुर-मथुरा को छोड़ दिया और सौराष्ट्र देश में आकर समुद्र तट पर निवास करने लगे।

(हरिवंश पुराण में नेमिनाथ का जन्म शौरीपुर मे होने के पश्चात् यादव सौराष्ट्र मे आये-ऐसा उल्लेख है परन्तु तीर्थंकरका जन्म होने के पश्चात् किसी के भय से राज्य छोड़कर भागना पड़े यह बात ठीक नही लगती। तीर्थंकर के प्रभाव से तो शत्रु भी आश्रित हो जाते हैं, इसलिये नेमिनाथ तीर्थंकर का जन्म द्वारिका नगरी मे होना ही उचित प्रतीत होता है।]

द्वारिकानगरी की रचना और नेमिनाथ का अवतार

यादव जब सौराष्ट्र में समुद्र किनारे रहने आये, तब श्रीकृष्ण एवं भावी तीर्थंकर नेमिनाथ के पुण्यप्रताप से कुबेरदेवने समुद्र के बीचोंबीच बारह योजन की अतिसुन्दर द्वारामती नगरी की रचना की। जहाँ तीर्थंकर का अवतार होना है और जिसकी रचना देवोंने की है उस नगरी की शोभा का क्या कहना ? महाराजा समुद्रविजय, वसुदेव, बलभद्र तथा श्रीकृष्ण सहित समस्त यादवों ने उस नगरी में मंगल प्रवेश किया और सुखपूर्वक रहने लगे। उस द्वारिका पुरी के बीच रत्नजड़ित एक हजार शिखरों से शोभायमान भव्य जिन मन्दिर था; उसमे सर्व नगरजन अरिहंतदेव के दर्शन-पूजन एवं धर्मसाधन करते थे। वह नगरी इन्द्रपुरी के समान सुशोभित थी। इतने में एक आश्चर्यकारी घटना हुई।

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भगवान नेमिनाथ (भाग २)

राजमहल के प्रांगण मे प्रतिदिन करोडों रत्नों की वृष्टि होने लगी और स्वर्गलोक की कुमारिका देवियाँ द्वारिका में आकर शिवादेवी की सेवा करने लगीं। हे पाठक ! इन सब उत्तम चिन्हों से तुझे जानकर आनन्द होगा, कि-अपने सौराष्ट्र देश में एक तीर्थंकर के आगमन की तैयारी हो रही है। अपने चरित्रनायक भगवान नेमिनाथ की-जो कि अहमिन्द्र पर्याय मे विराजते हैं-आयु जब छह मास शेष रही तब यह मांगलिक घटनाएँ प्रारम्भ हुईं। महारानी शिवादेवी के आनन्द का पार नहीं है, उन्हें जैन धर्म की प्रभावना करने तथा सर्व जीवों की दया पालने के उत्तम भाव जाग रहे हैं और विशुद्धि बढ़ती जा रही है। छह मास पश्चात् कार्तिक शुक्ला षष्ठी के मंगल दिवस की पिछली रात्रि में माता शिवादेवीने सिंह, गज, सूर्य, चन्द्र रंगीन रत्नों की राशि आदि १६ उत्तम स्वप्न देखे। ठीक उसी समय स्वर्गलोक से बाईसवें तीर्थंकर का जीव उनकी कुक्षि में अवतरित हुआ। शिवादेवी माता ‘रत्नकुक्षिधारिणी’ बनी। धन्य हुई शिवादेवी और धन्य हुआ सौराष्ट्र ! माताजी ने राजसभा में जाकर महाराजा समुद्रविजय से स्वप्नों की बात कही; तब महाराजा बोले-हे देवी ! यह मंगलस्वप्न ऐसा सूचित करते हैं कि-बाईसवे तीर्थंकर का जीव तुम्हारी कोख में अवतरित हो चुका है। 'अहा,मैं तीर्थंकर की माता . ’ ऐसा जानकर शिवादेवी को ऐसा हर्ष हुआ मानों तीर्थंकर उसी समय उनकी गोद मे खेल रहे हो । उसी समय स्वर्गसे द्वारिका आकर इन्द्र-इन्द्रानीने तीर्थंकर के माता-पिता का सन्मान किया…और इसप्रकार गर्भकल्याणक का मंगल-महोत्सव करके तीर्थंकर-आत्मा की अपार महिमा जगत में प्रसिद्ध की।

इन्द्रकी आज्ञासे भवनवासी देवियाँ जिनमाताकी सेवा करती थीं; विविध प्रकार की चर्चा द्वारा उन्हें प्रसन्न रखती थीं और बाल तीर्थंकर के जन्म की प्रतीक्षा करती थीं। नौ मास आनन्दपूर्वक बीत गये। श्रावण शुक्ला षष्ठी के दिन द्वारिका पुरी में बावीस वें तीर्थंकर का जन्म हुआ। अहा, द्वारिका आनन्दमय प्रकाश से जगमगा उठी। प्रभुके प्रताप से स्वर्गलोक के बाजे अपने आप बज उठे, इन्द्रों के आसन भी डोल उठे; समस्त देव लोक में खबर फैल गई कि द्वारिका नगरी में भरतक्षेत्र के बाइसवें तीर्थंकर का अवतार हुआ है। इन्द्र तुरन्त प्रभुका जन्मोत्सव मनाने हेतु देवों सहित द्वारिका में आ पहुँचे। समुद्र के बीच मानो नूतन इन्द्रलोक की रचना हो गई। अद्भुत ऐरावत हाथीपर उस से भी अद्भुत बाल-तीर्थंकर को विराजमान करके प्रभु की शोभायात्रा को इन्द्र विदेह के बीच स्थित मेरु पर्वतपर ले गये। वहाँ करोड़ों दैवी वाद्यों के स्वर मे इन्द्रने प्रभुका अभिषेक किया। प्रभु के दिव्य रुप को एक हजार नेत्रों से निहारने पर भी इन्द्र को मानो तृप्ति नहीं हो रही थी. हजार हाथ उछाल-उछालकर वह इन्द्राणी सहित भक्ति से नाच रहा था।

१००८ कलशोंसे अभिषेक के पश्चात् इन्द्रने १००८ नामों द्वारा बालतीर्थंकर की स्तुति की और यह प्रभु धर्मरुपी रथ के चक्री ‘नेमि’ (धुरी) समान हैं-ऐसा समझकर उनका नाम ‘नेमिनाथ’ रखा। उन दिगम्बर बालप्रभु को इन्द्राणी ने दिव्य वस्त्रोंसे सजाया तिलक किया और सम्यक्त्व से स्वयं अलंकृत प्रभु का दिव्य अलंकारों से शृंगार किया; साथ ही अतिशय पुण्यों द्वारा उसने अपने आत्मा को भी अलंकृत किया। उन बालतीर्थंकर को गोद में लेते हुए उसे कोई अद्भुत रोमांच हुआ। स्वर्गलोक की देवियों को पुत्र नहीं होता-यह बात इन्द्राणी हर्षातिरेक में भूल गई और मानों अपना ही पुत्र इस प्रकार प्रभु से स्नेहालिंगन करने लगी। प्रभु को अपनी गोद में उठा-उठाकर वह परमतृप्ति का अनुभव करने लगी-‘अहा, तीर्थंकर परमात्मा तो मेरी गोद में विराजते हैं तो अब मुझे मोक्ष प्राप्त करने मे कितनी देर ?’

मेरु पर जन्माभिषेक कर के इन्द्र बालतीर्थंकर की शोभायात्रा के साथ द्वारिकापुरी आये और पिता समुद्रविजय तथा माता शिवादेवी और बलभद्र-श्रीकृष्ण के सन्मुख आनन्दमय नृत्य एवं नाटक करके पुन. प्रभु के जन्म का उत्सव किया। अपने कुल में तीर्थंकर का अवतार होने से श्रीकृष्ण के हर्षका भी पार नहीं था, वे भी इन्द्र के साथ नृत्य करके अपना आनन्द व्यक्त करने लगे… ‘अहा, मैं तीर्थंकर का भाई, तीर्थंकर मेरे भाई; वे इसी भव में मोक्ष जायेंगे और मैं भी भविष्य में उन्हीं जैसा तीर्थंकर होकर मोक्ष प्राप्त करूँगा।’ वाह, अपने परिवार मे तीर्थंकर को देखकर भव्यात्माओं को जो आनन्द होता है उसका क्या कहना ! ‘अहा, हम तीर्थंकर के परिवार के हुए; हम मोक्षगामी हुए; सिद्धों के साधर्मी हुए।’

एक ओर स्वर्गका इन्द्र ‘हरि’ तथा दूसरी ओर द्वारकाधीश ‘हरि’-दोनों हरि हर्षसे नाच रहे थे। द्वारिका नगरी में सर्वत्र आनन्द-मंगल छा गया था; मात्र द्वारिका में ही नहीं, सारे सौराष्ट्र में और भारतभर में किसी अनुपम शान्ति एवं हर्षोल्लासका वातावरण था। अरे, प्रभुजन्म के प्रताप से नारकी जीवों ने भी क्षणभर दुःख से छुटकारा पाकर शान्तिका अनुभव किया। तीर्थंकर के अवतार का क्या कहना !..वह तो तीन लोक के जीवों को कल्याणकारी है।

२१वें नमिनाथ तीर्थंकर का शासन पाँच लाख वर्ष चला। तत्पश्चात् २२ वें नेमिनाथ तीर्थंकर का अवतार हुआ। उनकी आयु १००० वर्ष तथा शरीर की ऊँचाई १० धनुष (३०मीटर) थी। बालतीर्थंकर नेमिकुमार आत्मिक सुख के साथ-साथ दैवी सुख का उपभोग करते हुए बढ़ रहे थे। बचपन से ही उनका अलौकिक जीवन देखकर लोग कह उठते कि-इन बालमहात्मा का जीवन जगत से भिन्न प्रकार का है;

ज्ञानचेतना से सुशोभित उनका अंतर्मुखी जीवन धर्मसाधना की अचिन्त्य महिमा को प्रगट करता था।

‘तारुं जीवन खरुं…तारुं जीवन, जीवी जाण्युं नेमनाथे जीवन।’ सूता के जागता, बेसता-उठता, हैये रहे प्रभु ! तारुं रटन… वाह धन्य प्रभुका जीवन ! धन्य अवतार ! अहो, ज्ञानचेतना से सुशोभित प्रभुका जीवन शांत एवं गंभीर है, -जो अन्य जीवों को भी चैतन्यभावों की ऊर्मियाँ जागृत करता है।

माता शिवादेवी अपने लाड़ले पुत्र को लाड़ करती थीं उसकी तो बात ही क्या ! छोटे नेमिकुँवर को पालने में झुलाते हुए जो अद्भुत लोरी वे गाती थीं वह सुनो:-तुम्हीं शुद्ध हो, तुम्हीं बुद्ध, तुम निर्विकल्प उदासी… -नेमिकुँवर ! झूले रे चैतन्य पालने… -चेतनराजा, झूलो रे चैतन्य पालने… तुम हो चेतन साधक, निज मुक्ति के आराधक… झूलो-झूलो तुमतो आनंद पालने… नेमिकुँवर ! झूलो रे चैतन्यपालने… तुम स्वानुभूति प्रकाशी, अरु आतमगुण-विलासी, वीर मेरे अद्भुत तुम्हारा ज्ञान है, नेमिकुँवर ! झूलो रे चैतन्य पालने… मेरा पुत्र बड़ा जब होगा, तब मुनि बनकर विचरेगा, भव्यजीवोंका होगा बेड़ा पार… नेमिकुँवर ! झूलो रे चैतन्यपालने… तुमतीर्थंकर पद पाकर, जिन शासन की शोभा कर, सिद्धि पामी…परम पद में झूलना, नेमिकुँवर ! माता झुलावे पालने… ‘अहा, यह तो मेरा छोटा भाई…और वह भी भगवान !’ -ऐसा कहते हुए बलभद्र तो अत्यन्त स्नेह से नेमिकुँवर को गोद में लिये फिरते और खेलाते थे ! भरतक्षेत्र के वर्तमान तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ और भावी तीर्थंकर महात्मा श्रीकृष्ण-ऐसे दो पुराणपुरुषों के पुण्यप्रताप से देवो द्वारा निर्मित द्वारिका नगरी की शोभा अद्भुत थी ! मोक्षगामी चरमशरीरी अनेक धर्मात्मा जीव वहाँ निवास करते थे। सौराष्ट्र देश का विशाल समुद्र देखकर प्रभु नेमिकुमार अपने अंतर में महान चैतन्य-रत्नाकर का ध्यान धरते थे। उस समय समुद्र की अपेक्षा अधिक गंभीर उनकी मुद्रापर शातरसका समुद्र उल्लसित होता था।

एक और नेमि तीर्थंकर के प्रताप से सम्यक्त्वादि रत्नो की उत्पत्ति होती थी, तो दूसरी ओर वहाँ के समुद्र से भी मोती और रत्न निकलते थे। नव निर्मित द्वारिकानगरी का दिव्यवैभव देखकर तथा वहाँ विराजमान नेमितीर्थंकर के दर्शन करके देश-देशान्तर से आनेवाले यात्रीगण आश्चर्यमुग्ध होते और अपने को धन्य मानते थे। सच ही है कि प्रत्यक्ष तीर्थंकर के दर्शन से महान सुभाग्य जगत में और क्या होगा !

राजा जरासंध से युद्ध; श्रीकृष्ण की विजय और चक्रवर्तीपना

एक बार मगध देश के कुछ व्यापारी समुद्रमार्ग से व्यापार करने निकले वे ‘पुण्योदय से मार्ग भूलकर’ नवनिर्मित द्वारमती नगरी मे आ पहुँचे। ‘मार्ग भूले हुए. तथापि पुण्योदय !’-जी हाँ क्योकि मार्ग भूलने से उन्हे बाईसवे तीर्थंकर की जन्मभूमि द्वारिका तीर्थ यात्रा हुई तथा बालतीर्थंकर नेमिकुमार के दर्शन हुए। द्वारिकानगरी की दिव्य शोभा देखकर तथा नेमिप्रभु के दर्शन करके वे व्यापारी आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने समुद्रके बीच कभी ऐसी नगरी नही देखी थी, और व्यापार मे भी उन्हे खूब लाभ हुआ। इस प्रकार धर्म और धन दोनों का लाभ प्राप्त हुआ यहाँ से उत्तम रत्न लेकर वे राजगृही पहुँचे।

राजगृही आकर उन्होने अर्धचक्रवर्ती महाराजा जरासघ को वे उत्तम रत्न भेट दिये। ऐसे उत्तमरत्न देखकर राजा आनन्दित हुए और पूछा-हे महाजनो ! तुम इतने सुन्दर रत्न कहाँ से लाये ? यह रत्न तो मानो नेत्र खोल-मीचकर कुछ कह रहे हों-ऐसे जगमगा रहे हैं !

महाजनो ने कहा-हे महाराजा हमने एक अद्भुत कौतुक देखा है; ऐसा आश्चर्य पहले हमने कभी नही देखा था। सौराष्ट्र देशके समीप समुद्रमे हमने द्वारामती नामकी नगरी देखी ..मानो पाताल लोकसे निकली हो ! सुवर्ण के गढयुक्त उस नगरी की शोभा अद्भुत थी. .और उससे भी महान आनन्द की बात यह है कि भरतक्षेत्र के बाईसवे तीर्थंकर नेमिकुमार उस नगरीमे विराजते है, हमने उनके भी दर्शन किये। अहा, धन्य है ..उन बालतीर्थंकर की गभीरता ! कैसा वैराग्य ! और कितनी प्रसन्न शात मुद्रा ! उन तीर्थंकर प्रभुके साक्षात् दर्शन मे हमारा जन्म कृतार्थ हुआ ! उस द्वारमती मे प्रभु नेमिकुमार के जन्म से पूर्व देवो ने करोड़ों रत्नों की वर्षा की थी वहाँ जगह-जगह विभिन्न प्रकारके उत्तम रत्न दिखायी देते हैं, उन्ही मे से कुछ रत्न हम लाये है और आपको भेट दिये हैं। श्रीकृष्ण-बलभद्र आदि यादव वहाँ राज्य करते है।

यादवो का नाम और उनके वैभव की बात सुनते ही राजा जरासंध क्रोधसे आगबबूला हो गया, उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई। ‘अरे, वे यादव तो मेरे भयसे अग्निमें जल मरे हैं-ऐसा मैं मानता था, उसके बदले वे तो जीवित है और महान विभूतिसहित द्वारिका मे राज्य कर रहे हैं !. .अब, मैं उनका विनाश करके द्वारिका को जीत लूंगा।’-ऐसा विचार करके उस अन्धबुद्धिने विशाल सेना एव सुदर्शनचक्रसहित युद्धके लिये द्वारिका की ओर प्रयाण किया। अरेरे ! तीर्थंकर के जन्म का आनन्द मनाने के बदले वह दुर्बुद्धि अपने सर्वनाश के मार्गपर चल दिया।

इधर नारदजीने 'श्रीकृष्ण को समाचार दिये कि शत्रुराजा जरासंध लड़ने के लिये आ रहा है। समाचार मिलनेपर शूरवीर श्रीकृष्ण को किंचित् भी भय या आकुलता नहीं हुई, वे नेमिकुमार के पास आये और विनयपूर्वक कहा-हे देव ! राजा जरासंघ युद्ध के लिये आ रहा है; आपके प्रताप से मैं उसे शीघ्र ही जीत लूंगा। मैं उसे जीतकर आऊँ तब तक आप इस नगरी का राज्य सँभालकर इसकी रक्षा करना।

श्रीकृष्ण की बात सुनकर कुमार नेमिनाथ कुछ मुस्कराये; वे जानते थे इस युद्ध में विजय श्रीकृष्ण की ही होना है; इसलिये उन्होंने ‘ओम्’.. ऐसा शब्द कहकर श्रीकृष्ण की बात का स्वीकार किया। जिस प्रकार वाद-विवाद में अनेकान्त वचनसे जैनवादी अपनी विजय का निश्चय कर लेता है उसी प्रकार नेमिकुमार की मन्द मुस्कराहट से तथा ‘ओम्’-ऐसे मंगलवचन से श्रीकृष्ण ने अपनी विजयका निश्चय कर लिया।

राजा जरासघ राजगृही से निकलकर विशाल सेनासहित कुरुक्षेत्र आया और दूसरी ओरसे श्रीकृष्ण भी विशाल सेनासहित द्वारिका से चलकर कुरुक्षेत्र में आ पहुँचे। [यहाँ एक बात ध्यान रखने योग्य है-तीर्थंकर के समीप युद्धादि महान हिंसा नहीं होती, इसलिये शास्त्रकार युक्तिपूर्वक रणभूमि को द्वारिका से सैकड़ों योजन दूर कुरुक्षेत्र में ले गये हैं और तीर्थंकर नेमिकुमार को युद्धभूमि से दूर रखा है।] कुरुक्षेत्र में महायुद्ध हुआ; उसमें भीष्म, कर्ण, द्रोण, जयद्रथ, अश्वत्थामा, दुर्योधन, दुःशासन आदि योद्धा जरासंघ के पक्षमें थे, तो श्रीकृष्ण के पक्षमे पाँच पाण्डव, राजा उग्रसेन, राजा द्रुपद आदि शूरवीर योद्धा थे। महा भयंकर युद्धमें कितने ही मनुष्य मरे, कितने ही हाथी-घोड़े कट गये; जरासंघ की सेना श्रीकृष्ण की सेनापर इस प्रकार टूट पड़ी कि सेनामें भगदड़ मच गई। यह देखकर श्रीकृष्ण स्वयं जरासघ की सेनापर ऐसे टूट पड़े कि जरासंघ की सेना पीछे हटकर भागने लगी। तब जरासंघने अत्यन्त क्रोधित होकर कृष्ण को मारने के लिये अपना सुदर्शन चक्र फेंका। क्षणभर तो युद्धभूमि में हाहाकार मच गया, क्योंकि चक्रका कोई प्रतिकार नहीं था। परन्तु महाप्रतापी श्रीकृष्ण के निकट आते ही उनके पुण्यप्रताप से वह चक्र शांत हो गया और श्रीकृष्ण की तीन प्रदक्षिणा करके उनके हाथमें आ गया। दूसरे ही क्षण उसी चक्र द्वारा श्रीकृष्णने जरासघ का शिरच्छेद कर दिया। इस प्रकार प्रतिवासुदेव का नाश करके श्रीकृष्ण-वासुदेव त्रिखण्डाधिपति चक्रवर्ती के रूप मे प्रसिद्ध हुए। देवोंने भी उनके पुण्यकी प्रशंसा की और हजारों देव उनकी सेवा करने लगे। त्रिखण्ड की दिग्विजय करके श्रीकृष्णने चक्रसहित द्वारिका में प्रवेश किया तब देवोंने बलभद्रसहित उनका राज्याभिषेक किया। १६००० राजा उनके आज्ञाकारी थे।

महाराजा श्रीकृष्ण की राजसभा में प्रभुनेमिकुमार का बड़ा सन्मान था। एक बार भव्य राजसभा में प्रभु नेमिकुमार पधारे। समस्त सभाजनोंने खड़े होकर आदरपूर्वक नमस्कार किया, महाराजा श्रीकृष्णने भी आगे बढ़कर प्रभु नेमिकुमार का हाथ पकड़कर उन्हें अपने साथ सिंहासन पर बिठाया। एक राजचक्री और दूसरे धर्मचक्री-उनसे राजसभा सुशोभित हो उठी। अहा, जहाँ एक वर्तमान तीर्थंकर और दूसरे भावी तीर्थंकर,-ऐसे दो तीर्थंकर महात्मा एक साथ विराजते हों उस सभा की अद्भुत शोभा का क्या कहना !

राजसभा में अनेक प्रकारकी चर्चा होती थी; उसमें अचानक ऐसी चर्चा निकली कि-इस समय इस सभा में सर्वाधिक बलवान कौन ? किसीने कहा-भीम सबसे बलवान है, किसीने कहा-अर्जुन, किसीने युधिष्ठिर का नाम लिया; कई लोगोंने श्रीकृष्ण के बल की प्रशंसा की उनमें एक हजार सिंहोंका बल है; कई लोगोंने बलभद्र के बलकी प्रशंसा की। अन्तमें, बलभद्रने हँसते-हँसते नेमिनाथ की ओर दृष्टि करके कहा-सभाजनो ! इस समय तीर्थंकर नेमिकुमार यहाँ विराज रहे हैं, वे ही सब से बलवान हैं; उनके अचिन्त्य बलकी तुलना किसी से नहीं हो सकती; वे इन्द्र से भी अधिक बलवान हैं। वे चाहे तो अपनी अँगुली से बात ही बात में मेरुपर्वत को तथा सारी दुनिया को उलट-पुलटकर सकते हैं।

श्रीकृष्णको अपने बल का गौरव था, उनसे यह बात सहन नहीं हुई; उन्होंने शक्तिपरीक्षण हेतु नेमिकुमार को मल्लयुद्ध का निमंत्रण दिया। परन्तु ‘आप तो मेरे ज्येष्ठ भ्राता हैं, आपके साथ मल्लयुद्ध शोभा नहीं देता’-ऐसा कहकर नेमिकुमारने इन्कार किया। अन्तमें, अन्य प्रकारसे नेमि-कृष्ण दोनों के बल की परीक्षा हुई और नेमिकुमार के बलकी सर्वोत्कृष्टता सिद्ध हुई। श्रीकृष्णसहित सारी सभाने भगवान नेमिकुमार की प्रशंसा करके अभिनन्दन किया। अरे, उस समय स्वयं इन्द्रने आकर नेमिप्रभु की स्तुति की। नेमिकुमार को यद्यपि मान का किंचित् विकल्प आ गया, परन्तु शरीरसे भिन्न चैतन्य के अनन्तबल की प्रतीति होने से वे प्रभु अपनी आत्मचेतनामे मानकषाय को प्रविष्ट नही होने देते थे, भेदज्ञान के बलसे उसे चेतना से बाहर ही रखते थे। शरीरबल का मद उनको नहीं था। अशरीरी एवं निर्माण ऐसे परमात्मतत्त्व की साधना उनको निरंतर चलती ही रहती थी। वास्तव में वे एक ‘राजयोगी’ थे और उन्हें अल्पकाल मे ‘योगिराज’ बनना था। उनका जीवन जगत के सामान्य जीवों की अपेक्षा विशिष्ट था। श्रीकृष्ण भी उनका आदर-सत्कार करते थे; इस भरतक्षेत्र के एक भावी तीर्थंकर वर्तमान तीर्थंकर की सेवा करते थे।

राजसभा की उपरोक्त घटना के पश्चात् श्रीकृष्ण के मनमें गहरे-गहरे चिन्ता रहने लगी कि-नेमिकुमार कदाचित् मेरा राज्य ले लेंगे !..अरेरे ! वैरागी नेमिकुमार को ऐसे तुच्छ राज्य का कहाँ मोह था ? उन्होंने तो जन्मसे ही तीन लोकका राज्य प्राप्त था; मेरु पर अभिषेक करके इन्द्र भी उनसे सेवक बन गये थे; वे श्रीकृष्ण के इस छोटे-से राज्य को क्यों ले लेते ? परन्तु तीव्र राज्यलिप्सा के कारण श्रीकृष्ण को ऐसा भय हुआ कि कदाचित् नेमिकुमार मेरा राज्य ले लेंगे ! . इससे वे ऐसा कोई उपाय विचारने लगे कि-नेमिकुमार दीक्षा ले ले।…अरेरे मोह !..और ऐसी एक घटना हुई।

एक बार महाराजा श्रीकृष्ण अपनी रानियोंसहित सरोवर किनारे क्रीड़ा करने गये थे। श्रीकृष्ण के साथ नेमिकुमार भी वहाँ गये और अपनी भाभियों सत्यभामा, रुक्मिणी, जाम्बुवती आदि के साथ हास्य-विनोद कर रहे थे। जलक्रीड़ा के पश्चात् नेमिकुमारने सत्यभामा से कहा-‘भाभी, मेरा यह वस्त्र भी धो देना !’ तब सत्यभामा तुनककर बोली-कुँवरजी, तुम मुझ से वस्त्र धोने का आदेश देनेवाले कौन ? मैं क्या तुम्हारी दासी हूँ ? मेरे पति (श्रीकृष्ण) त्रिखण्डाधिपति, नागशय्या में शयन करनेवाले, दैवी शंख फूँकने वाले तथा सुदर्शनचक्र चलानेवाले हैं,-उनके जैसा एक भी पराक्रम क्या तुमने कभी किया है ?..वस्त्र धुलवाना हो तो विवाह कर लो न ! इस प्रकार कटाक्षपूर्वक ताना दिया। सदा गंभीर और शांत रहनेवाले नेमिकुमार को भाभी के कटाक्ष वचनों से किंचित् मानका भाव जागृत हो उठा। वे कुछ भी बोले बिना मंद मुस्कराहट के साथ सीधे राजभण्डार में गये और वहाँ कृष्णकी नागशय्यापर चढ़कर क्रीड़ा करने लगे। (नागशय्या वह कोई नागों (सर्पों) की नहीं होती किन्तु देवों द्वारा निर्मित सुन्दर सेज है; उसपर वासुदेव जैसे पुण्यवंत ही सो सकते हैं। नेमिकुँवर के पुण्य प्रताप से उस नागशय्या के देव शांत रहे और उनका सन्मान किया।) फिर एक हाथ की अँगुली पर उन्होंने सुदर्शनचक्र घुमाया और दूसरे हाथमें दैवी शंख लेकर उसे नासिका द्वारा जोर से फूँक दिया।

उस शंखध्वनि से द्वारिका में चारों ओर हाहाकार मच गया। हाथी-घोड़े आदि भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे; नगर में कोलाहल मच गया कि यह क्या हुआ ? समुद्रमें लहरें उछलने लगीं। महाराजा श्रीकृष्ण विचार में पड़ गये कि-अरे, मेरे सिवा दूसरा कौन शूरवीर है जो यह शंख फूँक रहा है ?

यह सब पराक्रम अपने लघु भ्राता नेमिकुमार का है-ऐसा जब उन्हें ज्ञात हुआ तब वे मन ही मन प्रसन्न हो उठे कि-अब नेमिकुमार के मनमें कुछ गर्व जागृत हुआ है, इसलिये अब वे विवाह के लिये अवश्य संमति देंगे। (नेमिकुमार की आयु एक हजार वर्ष थी, उसमें से अभी ३०० वर्ष हुए थे तथापि अभी तक वे विवाह के लिए संमत नहीं हुए थे। श्रीकृष्ण तुरन्त नेमिकुमार के पास गये और उन्हें समझाकर शांत किया कि-हे देव ! आप तो महान हैं, मुझसे भी अधिक शूरवीर हैं; आपकी वीरता को कौन नहीं जानता ? सत्यभामा ने आपको नहीं पहिचाना, इसलिये उसने आपका अनादर किया। प्रभो ! उसके अपराध को क्षमा करो और प्रसन्न होओ।

नेमिकुमार तो मानो कुछ हुआ ही न हो-इस प्रकार मन्द-मन्द मुस्कराहट के साथ श्रीकृष्ण के साथ विनोद करते-करते राजमहल में चले गये। वहाँ जाकर वे आत्मध्यान में बैठ गये और शांत चैतन्यतत्त्व में उपयोग लगाकर उसकी भावना करने लगे-

हूँ क्रोध नहि, नहि मान,
तेम ज लोभ-माया छुं नहीं;
कर्ता नकारयिता न;
अनुमंता हूँ कर्तानो नहीं।
निर्ग्रंथ छे, निष्काम छे,
निःक्रोध जीव निर्मान छे,
निःशल्य तेम नीराग,
निर्मद सर्वदोष-विमुक्त छे।
सौ जीवमां समता मने,
को साथ वेर मने नहि;
आशा खरेखर छोडीने,
प्राप्ति करूँ छुं समाधिनी।

और सचमुच ऐसी आत्माभावना से उस समय निर्विकल्प होकर प्रभु नेमिकुमारने क्षणमात्र में सर्व विभाव झरा दिये। वाह, धर्मात्मा की ज्ञानचेतना की शूरवीरता कोई अद्भुत है !

उपरोक्त घटना से बलभद्र तथा श्रीकृष्ण को ऐसा लगा कि अब दीर्घकाल के पश्चात् नेमिकुमार के चित्त में किंचित् राग जागृत हुआ है; इसलिये महाराजा समुद्रविजय की संमति पूर्वक उन्होंने नेमिकुमार के विवाह का विचार किया और श्रीकृष्ण स्वयं राजकुमारी राजुल की मंगनी करने जूनागढ़ गये। राजा उग्रसेनने श्रीकृष्ण का भारी स्वागत किया-'हे स्वामी ! मेरे आँगन में पधारकर आपने मुझे उपकृत किया। कहिये, आपकी क्या आज्ञा है ?

श्रीकृष्णने कहा, हमारे नेमिकुँवर जोकि तीर्थंकर एवं सर्वगुणसम्पन्न हैं, उनके लिये आपकी राजकुमारी राजुल सर्व प्रकार से योग्य है; इसलिये नेमिकुमार के साथ राजीमति के विवाह सम्बन्ध की स्वीकृति देवें।

अहा, राजुलकुमारी को नेमिकुमार जैसा पति मिले इससे अधिक सौभाग्य की बात और क्या हो सकती है ? हमारा अहोभाग्य कि आपने सामने चलकर ऐसी माँग की है !'-ऐसा कहकर महाराजा उग्रसेन ने श्रीकृष्ण की बात का सहर्ष स्वीकार किया। राजमतीने जब जाना कि श्री नेमिकुमार मेरे पति होंगे तब उनके हृदय मे कोई दिव्य हर्ष की अनुभूति हुई-‘अहा, एक तीर्थंकर-महात्मा मेरे जीवनसाथी बनेंगे ..उन धर्मात्मा के सहवास से मै धन्य हो जाऊँगी !’ आश्चर्य है कि इधर द्वारिका मे नेमिकुमार भी राजीमती के साथ विवाह के लिये समत हो गये। नेमिकुमार राजीमती के साथ विवाह करेगे यह बात जानकर सारी नगरी मे कुतूहल के साथ हर्ष छा गया ! राजमाता शिवादेवी भी अत्यन्त हर्षित होकर पुत्रवधू का सुख देखने को आतुर हो गई। (परन्तु, ‘जो-जो देखी वीतरागने, सो सो होसी वीग रे, अनहोनी कबहुँ नहीं होनी’ )

एक ओर ता नेमि-राजुल के विवाह का अवसर निकट आ रहा था; द्वारिका और जूनागढ़ के प्रजाजन वह आनन्दोत्सव देखने को आतुर थे, जबकि दूसरी ओर श्रीकृष्ण के चित्त मे शान्ति नही थी, उनका अतर एक अत्यन्त भयसे अशात था, सत्यभामा और राजसभावाली घटना के पश्चात् उन्हे चिन्ता थी कि-कुमार नेमिनाथ मेरी अपेक्षा अधिक बलवान एव पराक्रमी है, वे बातकी बातमे मुझे जीत सकते हैं, इसलिये विवाह के पश्चात कदाचित वे मुझसे यह राज्य छीन लेगे तो ?

एक बार अपने मनकी यह चिन्ता उन्होने ज्येष्ठ भ्राता बलदेव के निकट प्रगट की, तब गभीर बलभद्रने कहा-हे भाई कृष्ण ! हम जानते है कि श्री नेमिकुमार तीर्थंकर होनेवाले है, जन्मते ही इन्द्रोने उनकी सेवा की वह भी हम सबने प्रत्यक्ष देखा है, और वश-परम्परा से तो महाराजा समुद्रविजय के पश्चात् राज्यके अधिकारी वे ही है; परन्तु वे अति वैराग्यवान हैं; उन्हे तो पहले से ही राज्यकी या भोगों की कोई आकाक्षा नही है, इसलिये वे यह राज्य ले लेगे ऐसा भय रखने का कोई कारण नहीं है। उनके आगमन से तो अपने राज दरबार की शोभा बढ जाती है। उनका चित्त ससार से इतना उदास है कि वैराग्य का कोई प्रसग आनेपर वे ससार छोड देगे और दीक्षा लेकर मुनि हो जायेंगे।

बलभद्र की उस बातसे श्रीकृष्ण के चित्त मे किंचित् शान्ति हुई, और वे ऐसा कोई प्रसग उपस्थित करने की युक्ति सोचने लगे कि जिसे देखकर नेमिकुमार को वैराग्य हो जाय और वे राज्य छोड़-कर वनमे चले जायें ! वैराग्य का कौनसा प्रसग उपस्थित हुआ ? वह आगे पढ़ेंगे।

दूल्हा नेमिकुमार की बारात राजीमती के वरने द्वारिका से जूनागढ की ओर प्रस्थान किया। विभिन्न प्रकारके मंगल वाद्यों एवं शहनाई के स्वरों से सारा वातावरण गूँज उठा। बारात की शोभा अद्भुत थी। श्रीकृष्ण और बलभद्र जैसे जिसका संचालन कर रहे हो; हजारों राजा महाराज जिसके बराती बने हों, रथमें विराजमान दूल्हा नेमिकुमार की शोभा का तो कहना ही क्या था ! दिव्य अलंकारों से तथा प्रसन्नकारी मुद्रा से सुशोभित नयनाभिराम प्रभु राजुल के नेत्रों एवं चित्तको आकर्षित कर रहे थे-नेमिकुँवर की बारात चली राजमतीको वरने… नेमिराजा बने दुल्हा राजमती को वरने… श्रीकृष्ण-बलभद्र आयें, युधिष्ठिर और भीम आयें…; बड़े-बड़े राजा आयें, नेमिराजाके साथमें… नेमिकुँवरकी बारात चली राजमतीको वरने।

    बडीबडी बरात आई, राजुल तो प्रेमसे देख रही, 'मेरा प्रीतम...सुंदर प्रीतम', हृदय में वे हर्ष रही; नेमि राजा बने दुल्हा...राजमतीको वरने।

    नेम राजाने राजुल देखी, मुखडुं तब तो मुस्कराहट गयुं रुपसुंदरी के नजरे देखतें, हैयुं तो बस ! हरख गयुं; नेमिकुँवर की बारात चली राजमतीको वरने... बरात आनन्दपूर्वक जूनागढ मे पहुँच रही है; राजमहल के झरोंखे मे सहेलियोंके साथ विनोद करती हुई राजकुमारी राजुल अपने हृदय सम्राट को एकटक निहार रही है. इतने में अचानक ही खरगोश हिरन आदि पशुओं का करुण चित्कार नेमिकुमार के कानोंमें पड़ा। एक बाड़े मे बन्द भुखे-प्यासे पशु नेमिकुमार की ओर देखकर करुण क्रन्दन कर रहे थे। मानो वे अपनी रक्षा के लिये पुकार रहे थे कि- 'प्रभो हमे बचाओ बचाओ !'

उन पशुओं की करुण पुकार सुनकर दूल्हा नेमिकुमार चौंक उठे ! रथको वही रोककर पूछा- 'अरे, आनन्दके वातावरण में यह करुण क्रन्दन कैसा ? यहाँ इन पशुओंको क्यों बन्दकर रखा है ?

बाड़े के रखवालोंने हाथ जोड़कर कहा-प्रभो ! महाराजा श्रीकृष्ण की आज्ञासे यहाँ इन पशुओ को बन्द किया गया है।

नेमिकुमार अधिक चौंके और पूछा- अरे, श्रीकृष्णकी आज्ञासे इन पशुओं को बन्द किया है ? लेकिन किसलिये ? ऐसी आज्ञा उन्होंने क्यों दी ?

रखवालोने कहा- हे देव श्रीकृष्ण महाराजाने हमे आदेश दिया है कि इन पशुओंको देखकर नेमिकुँवर पूछे तो कह देना कि आपकी बारात मे आये हुए मासाहारी राजाओके लिये यह पशु यहाँ रखे गये है।

‘अरे, क्या बारात मे मांसाहारी राजा ? और उनके आहार के लिये यह निर्दोष पशु ?’ . नेमिकुमार को आश्चर्य हुआ-नही, मेरी बारात में मासाहारी राजा नही हो सकते… और श्रीकृष्ण तो जानते हैं कि मैं तीर्थंकर हूँ मेरे आसपास किसी प्रकार की हिंसा या मांसाहार नहीं हो सकता। अवश्य ही इसमें श्रीकृष्ण का कोई मायाचार है। तुरन्त ही उन अवधिज्ञानी भगवान ने श्रीकृष्ण के मनकी बात जान ली-अरे, मैं उनका राज्य छीन लूँगा ऐसे भय के कारण मेरे हृदय में वैराग्य जागृत करने के लिये उन्होने यह प्रपंचपूर्ण युक्ति बनायी है। अरे, धिक्कार है इस संसार को ! धिक्कार है ऐसी राज्य लिप्सा को !.. वाह श्रीकृष्ण !..धन्य है तुम्हें कि इस मायाचार व्दारा तुमने मुझे वैराग्य का निमित्त प्राप्त कराया। तुम्हीं इस राज्य का उपभोग सहर्ष करो, मैं तो अपने मोक्ष साम्राज्य की साधना करूँगा। बस होओ इस संसार से …मुझे नहीं चाहिये राज्य और नही करना है विवाह।

प्रभु ऐसा विचार कर रहे थे कि उसी समय मतिज्ञान की निर्मलता में उन्हे पूर्वभवों का जातिस्मरण हुआ; उसमे चिन्तागति विद्याधर सुप्रतिष्ठ राजा तथा अहमिन्द्र के भव उन्हें स्पष्ट दृष्टिगोचर हुए। उनकी विशुद्धि एकदम बढ़ने लगी और उन्होने निश्चय किया कि-यह असार संसार त्यागकर आज ही मैं जिनदीक्षा ग्रहण करूँगा और अपने परमात्मपद को साधूँगा। उन्होने उसी समय सारथी को आज्ञा दी-सारथी, रथ को मोडो मुझे न तो विवाह करना है, और न ससार में रहना हैं।

मुझे लागे संसार असार, ऐ रे संसारमे नहीं जाऊँ…नहीं जाऊँ, नहीं जाऊँ रे मेरा ज्ञायक पद ऐक सार ऐ रे ज्ञायकमां मैं लीन थाऊं…लीन थाऊं…लीन थाऊं रे मुझे लागे विभाव असार ऐ रे विभाव से दूर जाऊँ…दूर जाऊँ…दूर जाऊँ रे मुझे लागे ऐक सिध्दपद सार, ऐ रे सिध्दपदमें शीघ्र जाऊँ ..शीघ्र जाऊँ…शीघ्र जाऊँ रे दूल्हा नेमिकुमार ससार से विरक्त होकर रथको मोड़कर वनकी ओर जा रहे हैं; उन्हे विवाह नही करना है; -यह समाचार सुनते ही चारो ओर हाहाकार मच गया। महाराजा समुद्रविजय तथा बलभद्रजी आदिने उन्हे विवाह करने के लिये तरह-तरह से समझाया किन्तु वे अपने निर्णय मे अडिग थे। श्रीकृष्ण को भी अपने कृत्य के लिये पश्चाताप हुआ; परन्तु संसार के पिंजरे से छुटा हुआ सिंह वैराग्य से वन की और चलने को तत्पर हुआ वह फिरसे ससार के पिंजरे में बन्द होने के लिये क्यो आता ! श्रीकृष्ण ने तुरन्त उन पशुओं को बंधन मुक्त कर दिया; परन्तु आश्चर्य हुआ कि वे जीव दौडकर वनकी और भागने के बदले; नेमिकुमार के निकट आकर निर्भयता से उनके चरणों में बैठ गये और उनकी वैराग्य पूर्ण शांत मुद्रा देखने लगे… मानो उनको भी वैराग्य हुआ हो और मृत्युसे छुड़ाने के लिये प्रभुका उपकार मान रहे हों कि-‘हे प्रभो ! जिस प्रकार हमें इस समय मरण से छुड़ा या उसी प्रकार सदा के लिये जन्म मरण के बंधन से छुड़ाकर हमारा उद्धार करो !’

अद्भुत था वह दृश्य ! चारों ओर आश्चर्य का कोलाहल और वैराग्य का वातावरण था। माता शिवा देवीने जब यह जाना कि-पुत्रवधू का सुख देखने की उनकी आशा टूट गई है और पुत्र विवाह के बदले वैराग्य प्राप्त करके वनकी ओर प्रयाण कर रहा है तब उन शूरवीर माताने धैर्यपूर्वक उस वैराग्य प्रसंग को सह लिया। वे कोई साधारण स्त्री तो थी नहीं, तीर्थंकर की माता थीं और ३०० वर्ष तक साथ रहकर अपने पुत्र नेमिकुमार के वैराग्यमय जीवन को प्रत्यक्ष देखा था। ‘मेरा पुत्र संसारिक बंधन में न पड़कर परमात्मपद की साधना हेतु जा रहा है यह तो श्रेष्ठ प्रसंग है…आनन्द की बात है-ऐसा विचारकर उन शूरवीर शिवामाताने मनमें प्रभुके वैराग्य का अनुमोदन किया। अपने लाड़ले पुत्रको मैं कुछ ही समय पश्चात् परमात्मारूप में देखूँगी और उसकी छाया में अपना कल्याण करूँगी-ऐसे समाधानपूर्वक उन्होंने अपने मनको मनाया।’

दूल्हा नेमिकुमार संसार से विरक्त होकर जिनदीक्षा हेतु तैयार हुए। प्रभुके वैराग्य से स्वर्गलोक में इन्द्रों के सिंहासन भी डोलने लगे,-मानो चारित्र के वीतरागी वैभवके समक्ष रागका वैभव काँप उठा। इन्द्र-इन्द्राणी ने नेमिकुमार की दीक्षा का प्रसंग जाना कि तुरन्त दीक्षा कल्याणक मनाने हेतु देवों सहित सौराष्ट्र देश में आ पहुँचे। प्रथम ब्रह्मस्वर्ग से ब्रह्मचारी लौकान्तिक देव आये और स्तुति करके कहने लगे-हे प्रभो ! विवाह के अवसरपर वैराग्य का आपका यह प्रसंग जगत के जीवों को वैराग्य की महान प्रेरणा देगा; सुख संसार के विषयों में नहीं है किन्तु आत्मा की वीतरागता में ही है-ऐसा धर्मसन्देश , आपके जीवन में से जगत को प्राप्त होता रहेगा…और दीक्षा के पश्चात् केवलज्ञान प्राप्त करके दिव्यध्वनि द्वारा आप अनेक जीवों का कल्याण करेंगे।

इन्द्रगण ‘देवकुरु’ नामक सुन्दर शिविका लेकर आये। उसमें विराजमान होते समय इन्द्रने सहारा देने हेतु अपना हाथ बढ़ाया, वह हाथ पकड़कर प्रभु पालकी में विराजमान हुए। अहा, प्रभुने जिसका हाथ पकड़ा उसके महाभाग्य का क्या कहना !

बारात में आये हुए हजारों राजा प्रभु का यह वैराग्य-प्रसंग देखकर क्षणभर तो विचार में पड़ गये कि-अब क्या करना ?..दूल्हा बने प्रभु नेमिकुमार तो दीक्षा लेने वनमें जा रहे हैं; उन्हे छोड़कर अब क्या हमे राजभोगों में फँसना उचित हैं ?-नहीं, कदापि नहीं। राजा विवेकवान थे; उन्होंने निर्णय किया कि-जब राजुल को ब्याहने के लिये प्रभुके साथ सांसारिक बारात में आये थे, तो अब प्रभुकी मोक्षपुरी की बारात में भी बाराती बनकर साथ रहेंगे। हम भी प्रभुके साथ दीक्षा लेंगे।-ऐसा निश्चय करके एक हजार राजा भी प्रभुके साथ वनगमनहेतु तैयार हो गये। वाह, नेमिप्रभुकी बारात मुक्तिसुन्दरी को ब्याहने चली-

नेमप्रभुकी बारात चली…मोक्षसुंदरीको वरने…
नेमि बने वैरागी राजा…मोक्षसुंदरीको वरने…
पशुओंका जब क्रंदन देखा प्रभुजी पाछा लीटे
संसार का सब मायाचार प्रभुने देख लिया।
रथडो पाछो लीटाकर चले मुक्तिसुंदरी वरने,
संयम केरा मींढोल बांधे, मुक्तिसुंदरी वरने।
राजीमति को त्यागकर चले…मोक्षसुंदरीके वरने…
साथ साथ हजार राजा…मोक्षसुंदरी को वरने…
नेमकुंवरकी बारात चली वनजंगलकी वाटे;
मुक्तिसुंदरी वरने चलें सहेसावन की घाटे;
समकितकेरा साज सजावी नेमि बने दुल्हा,
रत्नत्रय का मंडप बीचमें चारित्र केरा वाजां;

रत्नमणिका भूषण छोड़ी रत्नत्रय को लिया,
राग और रमणीको त्यागी मुक्तिको प्यार किया।
नेमिप्रभुकी बारात चली मुक्तिसुंदरी वरने
नेमि बने वैरागी राजा…मुक्तिसुंदरी वरने।

नेमिप्रभु की मोक्षपुरी की बारात गिरनार पर्वत के सहस्राम्रवन में पहुँची। उस तपोवन के फलाच्छादित हजारों आम्रवृक्षों ने मानों झुक-झुककर प्रभु का स्वागत किया। अहा, कैसी सुरम्य एवं अद्भुत थी उस वनकी शोभा ! मानो मुक्तिसुन्दरी को ब्याहने का स्वयवरमण्डप ! [गिरनार के सहस्राम्रवनमें, प्रभुके तपोवनमे बैठे-बैठे ही नेमिप्रभु के दीक्षाकल्याणक का यह प्रसंग लिखा जा रहा है और वैसी ही दीक्षा का भावना जागृत हो रही है।]

श्रावण शुक्ला षष्ठी-जो प्रभु नेमिनाथ का जन्मदिन है वही उनकी दीक्षा का दिवस ! प्रभुने बारह वैराग्य भावनाओ के चिन्तनपूर्वक सर्व परिग्रह का परित्याग किया-मुकुट एवं हार उतार दिये; हाथका कंकण छोड़कर वस्त्राभूषण भी त्याग दिय और अपरिग्रही-दिगम्बर हुए। दीक्षावन की एक उज्जवल शिलापर बैठकर ‘ॐ नम सिद्धेभ्य.’ ऐसे मंगलोच्चार पूर्वक हाथ जोड़कर सिद्ध भगवन्तों को वन्दन किया और आत्मचिन्तन मे शुद्धोपयोगी होकर साक्षात् श्रमण बन गये। दूल्हाराजा के वेशकी अपेक्षा इस जिनराजा के वीतरागी वेशमें प्रभु अधिक शोभायमान होते थे। अहा, आत्मध्यान मे लीन उन नेमिमुनिराज के अचिन्त्य रत्नत्रय-वैभवको देखकर मोक्षसुन्दरी भी उनपर मुग्ध हो गई और तुरन्त ही मनःपर्ययज्ञान को प्रभुके पास भेजकर सन्देशा कहलाया कि-स्वामी ! मैं मोक्षसुन्दरी आपका वरण करने हेतु शीघ्र ही आ रही हूँ। प्रभुके साथ हजारों राजाओंने भी मुनिदीक्षा धारण की। बीचमें तीर्थंकर मुनिराज और आसपास-चारो और एक हजार मुनिवर जहाँ विराज रहे हों उस तपोवन की शान्ति एवं शोभा का क्या कहना ! वनके उस शांत वातावरण से आकर्षित होकर गिरिवन के वनराज भी वहाँ आकर शान्ति से बैठ गये और मुग्ध होकर मुनिवरों के सन्मुख देखकर स्वय भी आँखें मूँदकर शान्ति से ऐसा प्रयोग करने लगे। अहा, मोक्षको साधने में शार्दूल-सिंह समान शूरवीर मुनिवरों के चरणो मे वनके सिह भी नमन करे इसमे क्या आश्चर्य !

[राजीमती-वैराग्य]