११
भगवान श्रेयांसनाथ
[११]
श्रेयहेतु भव्यजीवों को आश्रय लेने योग्य-ऐसे भगवान श्रेयांसनाथ तीर्थंकर का मंगलचरित्र सर्व जीवों को श्रेयरूप हो।
[श्रेयांसनाथ-पूर्वभव : नलिनप्रभ राजा]
तीसरे पुष्कर द्वीप के पूर्वविदेह में क्षेमपुर नगर है। महाराजा नलिनप्रभ वहाँ राज्य करते थे। वे जैनधर्म के प्रेमी तथा आत्मस्वरूप के ज्ञाता थे; संसार में रहकर भी मोक्ष के साधक थे; धर्म, अर्थ, काम इन तीन पुरुषार्थोंके साथ मोक्ष का पुरुषार्थ भी उनके निरन्तर चल रहा था। राजवैभव के मध्य रहने पर भी उनकी कोई प्रवृत्ति धर्म से विरुद्ध नहीं थी। उनका जीवन एक आदर्श श्रावक समान उज्ज्वल था।
उनके राजउद्यान में हजारों आम्रवृक्षों से सुशोभित एक रमणीय उपवन था। एक बार वहाँ अनन्त जिनेन्द्र का आगमन हुआ। मोर नाच उठें, कोयलें कुहुकने लगीं, आम्रवृक्ष हजारों फलों से झुक गये-मानो हाथ में फल लेकर प्रभुजी की पूजा कर रहे हों ! वनपाल ने आकर राजा को बधाई दी कि-हे महाराजा ! अपनी नगरी के उद्यान में भगवान अनन्त जिनका पदार्पण हुआ है।
सर्वोत्कृष्ट बधाई सुनते ही राजा के हर्ष का पार नहीं रहा…तपोवन में पहुँचकर प्रभुके दर्शन एवं उपदेश से उनका आत्मा प्रसन्न हो उठा। आत्मज्ञान तो उन्हें था ही, तदुपरान्त महान वैराग्य जागृत हुआ…और जिनचरणों में दीक्षा लेकर मुनि हो गये। उनको ग्यारह अंग का ज्ञान उदित हुआ और रत्नत्रय की शुद्धि के उपरान्त सोलह प्रकार की विशुद्ध भावनाओं द्वारा बिना इच्छा के तीर्थंकर प्रकृति का आगमन हुआ-मानो केवलज्ञान की दूती उसके आगमन के समाचार लेकर आ पहुँची। वे नलिन मुनिराज विशुद्ध-चारित्र का पालन करते हुए, आयु पूर्ण होने पर समाधिमरण करके सोलहवें स्वर्ग में इन्द्र हुए। वहाँ उनकी आयु बाईस सागर की थी। अनेक दिव्य देवियों तथा देवलोक का आश्चर्यकारी वैभव के बीच असंख्यात वर्ष तक रहने पर भी वे सम्यक्त्व के प्रताप से चैतन्य की महिमा को कभी क्षणमात्र भी भूले नहीं थे। राग होने पर भी उनकी चेतना राग से विरक्त थी। स्वर्गलोक के उत्तम सुखों को भी चैतन्य के वीतरागी सुखके समक्ष वे दुःख ही समझते थे। ‘धन्य वीतराग-मुनिदशा और धन्य परमात्मदशा !-उसे हम कब प्राप्त करेंगे ?’ ऐसी मोक्ष-भावना वे भावी तीर्थंकर स्वर्ग में बैठे-बैठे भाते थे। अन्तमें, स्वर्ग के दिव्यसुखों से संतुष्ट न होकर मोक्षसाधना हेतु वे महात्मा स्वर्ग पुरी छोड़कर मनुष्यलोक में आये।
सिंहपुरी (काशी) में श्रेयांसनाथ-अवतार
भरत क्षेत्र में काशी देश अत्यंत रमणीय है; वहाँ अनेक महापुरुष हुए। अभी तक सातवे और आठवें (सुपार्श्वनाथ और चन्द्रप्रभ) भगवन्तों के कल्याणकों से जो देश पावन हुआ, उस काशी देश में (वर्तमान बनारस से दस किलोमीटर दूर) सिंहपुरी नामक सुन्दर नगरी थी। (वर्तमान मे उसे ‘सारनाथ’ कहते हैं और वहाँ भगवान श्रेयांसनाथ का सुन्दर मन्दिर है।) वहाँ इक्ष्वाकुवंशी राजा विष्णु राज्य करते थे; उनकी महारानी का नाम था सुनन्दा। उन सुनन्दा माता के गर्भ मे सोलह मंगल-स्वप्न के साथ भगवान श्रेयांस-तीर्थंकर का जीव अवतरित हुआ…(ज्येष्ठ कृष्णा षष्ठी)…तत्पश्चात् सवा नौ मास बीतने पर फाल्गुन कृष्णा एकादशी के दिन भरतक्षेत्र के ग्यारहवें तीर्थंकर का अवतार हुआ। इन ज्ञानके धारी और तीन लोक के नाथ ऐसे तीर्थंकर का अवतार होने से तीनों लोक के जीव हर्षित हो उठे। सर्व ऋतुएँ एक साथ खिल उठीं और जीवों को शान्ति का अनुभव हुआ। पापी जीव भी धर्मात्मा बन गये। इन्द्रों ने आनन्दपूर्वक धामधूमसे दिव्यतासहित प्रभुका जन्मोत्सव मनाया-जो जगत के उत्कृष्ट मंगल-महोत्सव में अद्वितीय था! प्रभु के जन्मोत्सव की महिमा देखकर अनेक जीवों ने आश्चर्यकारी चैतन्य तत्त्व की महिमा का चिन्तन करके सम्यग्दर्शन द्वारा अपना श्रेय प्राप्त किया। अहा ! श्रेयांसनाथ तीर्थंकर का अवतार होते ही जीवों के श्रेय का प्रारम्भ हो गया। उनसे पूर्व भरतक्षेत्र में अनेक वर्षों तक जैनधर्म की धारा विच्छिन्न हो गई थी जो पुनः प्रवाहित हो गई। इन्द्र उन्हें ‘श्रेयांसनाथ’ नाम दे उससे पूर्व ही प्रभुने जीवों का श्रेय प्रारम्भ कर दिया था। उनके चरण में ‘गैंडा’ का चिह्न था-जिस प्रकार गेंडा का शरीर शस्त्रों से नही भिदता, उसी प्रकार श्रेयांसनाथ प्रभुके अभेद्य अनेकान्त शासन को किसी एकान्तवादी कुचक्र से नहीं भेदा जा सकता। इन्द्र ने प्रभु का जन्माभिषेक करने के पश्चात् स्तुति करते हुए कहा कि-हे देवं ! आप इस अवतार में ही सर्वज्ञ परमात्मा होंगे और रत्नत्रयरुप मोक्षमार्ग का उपदेश देकर अनेक जीवों का श्रेय करेंगे। आप जीवों के हितरुप श्रेयमार्ग के रक्षक तथा पोषक हैं, इसलिये सचमुच आप ‘श्रेयांसनाथ’ हैं।
कुमार श्रेयांसनाथ मात्र सिंहपुरी के नहीं परन्तु समस्त काशी देश के गौरवरुप थे और उनके कारण काशी देश सारी दुनिया में प्रसिद्ध था। काशी देश की प्रजा ने सुपार्श्वनाथ और चन्द्रप्रभ के पश्चात् इन तीसरे बालतीर्थंकर को अपनी नगरी में क्रीड़ा करते और किलकिलते देखा। उन्हें देखते ही प्रजाजनों के हृदय आनन्द से बोल उठते थे कि-अहा ! जहाँ ऐसे महात्मा प्रभु विचरते हैं उस देश को धन्य है ! हमारे नेत्र सफल हुए जो हमें ऐसे भगवान के दर्शन हो रहे हैं; हमारा जीवन धन्य है कि ऐसे प्रभु के साथ हम जी रहे हैं !-‘वाह प्रजाजनों ! आपको धन्य है।’
हजारों प्रजाजन प्रतिदिन सुप्रभात में श्रेयांसकुमार के दर्शन करने आते…और परमात्मा के दर्शन जैसा आनन्द प्राप्त करते; क्योंकि श्रेय प्रभु एक मंगल-आत्मा थे…उनका द्रव्य भी परमात्म द्रव्य था..अर्थात् वे स्वयं द्रव्य-परमात्मा थे। उनके साथ दो शब्द बोलने से भी परम आनन्द होता था। एक बार एक श्रेष्ठ नागरिकने प्रभु से पूछा-हे देव ! इस चौबीसी में इस काशी देश में सुपार्श्वनाथ एवं चन्द्रप्रभ-इन दो तीर्थंकरों के पश्चात् आप तीसरे तीर्थंकर अवतरित हुए हैं..क्या अब भविष्य में इस काशी देश में और किसी तीर्थंकर का अवतार होगा ? । यह प्रश्न सुनकर प्रभु कुछ मुस्कराये और कहा-हे सुभागी प्रजाजनो ! अभी एक चौथे तीर्थंकर भी इस काशी देश को पावन करेंगे। इस चौबीसी के तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का भी इस काशी देश की वाराणसी नगरी में अवतार होगा; वे कुमारअवस्था में सर्पयुगल को धर्मोपदेश देकर उनका उद्धार करेंगे.. अहा, छोटे-से श्रेयकुमार के श्रीमुख से ऐसी आनन्दकारी बात सुनकर प्रजाजन अति हर्षित हुए और उल्लासपूर्वक ‘श्रेयांस तीर्थंकर की जय हो..पार्श्वनाथ तीर्थंकर की जय हो’..ऐसे आनन्दकारी जय-जयकार से समस्त नगरी गूँज उठी। वह गगनभेदी जयनाद सुनकर महारानी सुनन्दादेवी ने महल के झरोखे से देखा तो उनका लाड़ला पुत्र श्रेयकुमार प्रजाजनों से बातें करके उन्हें आनन्दित कर रहा है ! वह दृश्य, देखकर माताजी प्रसन्न हुईं और उसी क्षण माताजी को झरोखे में देखकर प्रजाजनों ने पुनः आनन्दपूर्वक ‘सुनन्दामाता की जय’…ऐसे जयकार से आकाश गुँजा दिया।
किशोर अवस्थामें उन बाल तीर्थंकर का विनोद भी पुण्यानुबंधी शुभ था। आनन्द-किल्लोलपूर्वक वृद्धिगत होते-होते राजकुमार श्रेयांसनाथ युवावस्था को प्राप्त हुए। पिताने उनका विवाह किया और राज्याभिषेक करके उन्हें सिंहपुरी के राजसिंहासनपर बिठाया पुण्यकर्म उत्तम भोगसामग्री द्वारा उनकी सेवा करते थे। यद्यपि वे धर्मात्मा राजकुमार तो चैतन्यसुख की श्रेष्ठता के समक्ष उन उत्तम भोगों को तुच्छ ही समझते थे। मात्र बाह्य समृद्धि में ही नहीं अपितु अंतरंग श्रेयमार्ग में भी वे वृद्धिगत थे। पुण्य प्रताप से समस्त उत्तम अर्थोंकी प्राप्ति उनको स्वयमेव होती थी, इसलिये उन्हे अर्थ प्राप्ति हेतु कोई पुरुषार्थ करना नहीं था, मात्र मोक्ष हेतु ही पुरुषार्थ करना था,-जो वे राज्य संचालन के साथ भी गुप्त रुपसे करते ही रहते थे। इस प्रकार महाराजा श्रेयांसनाथ ने अपनी गुप्त ज्ञाननिधी की सुरक्षापूर्वक ब्यालीस लाख वर्षोतक सुखसे राज्य किया। चौरासी लाख वर्ष की आयु में से तीन भाग अर्थात् त्रेसठ लाख वर्ष बीत गये।
एक बार महाराजा श्रेयांसनाथ वनक्रीड़ा हेतु उद्यान में गये . माघ का महिना था, वसन्तऋतु का आगमन निकट होने से वृक्षों के पत्ते खिर गये पुष्प-पत्रों से रहित वृक्षों की शोभा लुप्त होगई .. मानो वृक्ष अपना शृंगार और वैभव छोड़कर विरक्त हो गये हो !! ऐसा ऋतु-परिवर्तन देखकर महाराजा श्रेयांसनाथका चित्त भी अचानक संसार से विरक्त हो गया।वे सोचने लगे-यह पुण्यवैभव भी क्षणभंगुर है। पतझड़ आनेपर इन वृक्षों की भाँती मेरे भी यह संयोग छूट जायेंगे। संयोगो से पार ऐसे अपने असंयोगी सिद्धपद की साधना जब तक मैं नहीं करूँगा तब तक इस संसार मे कहीं स्थिरता नही है; आज ही ऐसे अस्थिर संसार को छोड़कर मैं मुनि होऊँगा और अपने सिध्दपद की साधना करूँगा। पत्तों जैसे इस पुण्य के भरोसे मैं बैठा नहीं रहूँगा ! ध्रुवपद तो मेरा सिध्दपद है, उसे साधकर सादि अनन्त काल उसमें बैठूँगा। इस प्रकार महाराजा की वैराग्यधारा वेगवान होती गई; उनकी चेतना सातवें गुणस्थान में आरोहण करने हेतु तत्पर बनी और ‘श्रेयस्कर’ नामक पुत्र को राज्य सौंपकर बारह वैराग्य भावनाओं का चिंतवन करते हुए जिनदीक्षा हेतु उद्यमी हुए. उसी समय ब्रम्हलोक से लौकांतिक देव उतर आये। मानो वैराग्य का शृंगार सजा हो ऐसे श्वेतदिव्यवस्त्रोंसे वे सुसज्ज थे। उन्होंने वैराग्यवन्त महाराज को वंदन किया और वैराग्यवर्धक स्तुति करते हुए कहा : अहो देव ! आपका नाम ‘श्रेयांसनाथ’ है और आप स्वयं श्रेयरुप हैं… तथा इस समय आप रत्नत्रयरूप उत्तम श्रेयोमार्गपर विचर रहे हैं।-ऐसी आपकी वीतरागता देखकर हम प्रसन्नता पूर्वक उसका अनुमोदन करने हेतु ब्रह्मलोक से यहाँ आये हैं। [अहा, यह भी एक आश्चर्य की बात है कि तीर्थंकरों के समवसरण में भी कभी नहीं आनेवाले वे विरगी देव मात्र भगवान के वैराग्य प्रसंगपर ही उनके वैराग्य की अनुमोदना करने मनुष्यलोक में गृहस्थ-तीर्थंकरके पास आते हैं।]
वास्तवमें तीर्थंकरोंका वैराग्य वह जगतका कल्याण करनेवाला महान मांगलिक अवसर है। उस अवसर के अनुरूप ‘विमलप्रभा’ नामक पालकी लेकर देवोंसहित इन्द्र वहाँ आ पहुँचे..और स्वानुभूतिसहित तीन ज्ञानकी विमलप्रभा से शोभायमान भगवान श्रेयांसनाथ उस पालकी में आरूढ़ हुए तब उसका ’ विमलप्रभा’ नाम सार्थक हुआ। पालकी में आरूढ़ होते समय,स्वयं इन्द्रने अपने हाथ का सहारा देकर प्रभु का सन्मान किया और इस प्रकार अपना भी सन्मान बढ़ाया। प्रभु को कहीं इन्द्र के आधार की आवश्यकता नही थी, परन्तु वह तो प्रभुकी महिमा बढ़ाने की एक विधि थी-जिसे देखकर वैभवी इन्द्रकी अपेक्षा उन वैराग्यवन्त तीर्थंकर की अपार महिमा को जगत जान सके ! वाह, इन्द्र भी हाथ बढ़ाकर जिनकी सेवा में तत्पर हो उन भगवन्त के गुणोंकी महिमा का क्या कहना !!
वह कल्याणकारी दिन था फाल्गुन कृष्णा एकादशीका मनोहर उद्यान में पहुँचकर महाराजा श्रेयांसनाथने वस्त्राभूषण, मुकुट आदि समस्त राजवैभव का त्याग किया, स्फटिक समान उज्वल शीलापर बैठकर ‘ॐ नमः सिद्धेभ्यः’ ऐसे उच्चार पूर्वक सिद्ध भगवन्तों को नमस्कार करके स्वयगुरु ऐसे उन प्रभु ने अपने दृढ़ हाथ से कोमल केशोंका लुंचन किया। उसी समय एक हजार राजा भी प्रभुका अनुकरण करके सर्वसंगत्यागी दिगम्बर मुनि बन गये। उन एक हजार मुनियों के बीच सूर्य समान तेजस्वी ऐसे वे श्रेयांसनाथ मुनिराज एकत्वभावनामें झूलते-झूलते आत्मचिन्तनमें एकाग्र हुए और उसी क्षण अनंत गुणगम्भीर चिदानन्दतत्त्वमें लीन होकर शुद्धोपयोगरुप परिणमित हुए, साक्षात् श्रमण हुए, सर्वत्र समभावी हुए। अहा, उन परम वीतरागी मुनिराजकी अचिन्त्य शांत मुद्रा देखकर उस समय इन्द्र, देव, मनुष्य और तिर्यंच भी अपने चित्तमें अनुपम शान्तिका अनुभव करने लगे। सिंह और शशक प्रभुचरणोमे एकसाथ एकत्रित हुए थे तथापि किसीके हृदय में क्रूरता अथवा भय नहीं था, दोनों अत्यन्त शान्तिसे प्रभुकी वीतरागी छवि निहार रहे थे…और मन मे विचारते थे कि-'वाह, यह महात्मा कैसा सुन्दर ध्यान लगाये बैठे हैं !! उस समय हजारो प्रजाजनोंने भी वैराग्य भावना पूर्वक श्रावकव्रत अंगीकार किए और अनेक जीव अपूर्व सम्यकदर्शन को प्राप्त हुए। धन्य था उन तीर्थंकर प्रभुका दीक्षा कल्याणक का महोत्सव !
दीक्षा लेकर आत्मध्यानमें विराजमान उन श्रेयांस
मुनिराजको शुद्धोपयोगके साथ ही सातवाँ गुणस्थान,
चौथा दिव्यज्ञान तथा सात महान ऋद्धियाँ प्रगट हुई,
संज्वलन के अतिरिक्त सर्व कषायों का अभाव होगया, वीतराग रत्नत्रयरूप के तेज से उनका आत्मा दीप्तमान हो उठा। दो दिन उपवास के पश्चात् वे मुनिराज सिद्धार्थनगर मे पधारे .वहीं नन्दराजाने भक्तिसहित विधीपूर्वक प्रथम पारण कराया। राजाके महान पुण्ययोगसे वहाँ देवों ने दुंदुभि वाद्य बजाये और रत्न वृष्टिकी इस प्रकार मोक्षमार्गी मुनिवरोको आहार दान की अलौकिक महिमा जगत में प्रसिद्ध हुई।
महामुनि श्रेयांसनाथने लगभग दो वर्षतक मौनदशापूर्वक विहार किया। तत्पश्चात् पुनः अपनी जन्म-नगरी सिंहपुरीमे पधारे, जिस मनोहर उद्यान में दीक्षा ली थी उसी मे एक वृक्ष के नीचे दो दिन उपवास रखकर विराजमान हुए और आत्मध्यान की उग्र श्रेणी लगायी। शुद्धोपयोग की तलवार को शुक्लध्यान द्वारा सजाकर भयंकर मोहशत्रुपर प्रहार करने लगे। मोहशत्रु काँप उठा, उसकी सेना नष्ट होने लगी। बाह्य मे परमशांत दिखनेवाले वे श्रेयांस मुनिराज अंतरमे मोहशत्रुके साथ कल्पनातीत शूरवीरतासे युध्द कर रहे थे और ध्यानचक्र द्वारा उसे छेद रहे थे। मात्र कुछ ही समय के युध्द मे प्रभुने मोह का सर्वथा नाश कर दिया। अनादि से जो मोह अविजित था उसे सम्पूर्णतया जीतकर भगवान परिपूर्ण विजेता-जिन हुए, वीतराग हुए और दूसरे ही क्षण अपने केवलज्ञान-निधान को प्राप्त करके सर्वज्ञ परमात्मा हुए वह मंगल दिवस एव मंगल घड़ी थी माघ कृष्णा अमावस्याकी संध्या। अमावस्या होनेपर भी प्रभुके आसपास अंधकार नहीं था, वहाँ तो अमावस्याकी रात्रि मे भी किसी दैवी प्रकाश का पूंज फैला हुआ था।
ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांसप्रभुको केवलज्ञान होनेपर उस चौथे कल्याणक का उत्सव करने के लिये काशी देश की सिंहपुरी नगरी मे स्वर्ग से इन्द्रादि भी चौथीबार आ पहुँचे। एक ही नगरी मे प्रभुके चार कल्याणक ! धन्य वह नगरी !! दो घड़ी मे तो समवसरण की रचना हो गई। उसकी शोभा ऐसी अद्भुत थी कि अरे, "यह रचना इन्द्रोने की है या तीर्थंकर के सातिशय पुण्य से हुई है ?-ऐसा निर्णय नही हो सकता था। तीर्थंकर प्रभु के धर्म दरबार मे भव्यजीवो की टोलियाँ आयीं। मात्र देव नही, मनुष्य तथा सिंह और शशक, वाघ और बन्दर, हाथी और सर्प आदि प्राणी आये और शान्तिसे धर्मोपदेश सुनने लगे। वे मात्र सुनकर नहीं बैठे रहे परन्तु उसमे कहे हुए अपने चैतन्यतत्त्व की सुन्दरता को अपने में देख लिया और आत्मज्ञान करके मोक्ष के मार्ग मे चलने लगे, अपने भीतर विद्यमान ‘परमात्मा’ के उन्होने दर्शन कर लिये।
श्रेयांसनाथ तीर्थंकर की दिव्य धर्मसभा मे कुन्थुराज आदि सत्तर धर्म-मंत्री (गणधर) थे, वे सब बारह अग के धारी श्रुत केवली थे तथा महान लब्धियोंके धारक थे। करोडो श्लोक मात्र दो घड़ी मे शुध्द उच्चारण पूर्वक बोल सके -ऐसी उनकी वचन शक्ति थी, हजारो लोग एकसाथ बोलकर कोलाहल कर रहे, है तथापि उन सब मे से प्रत्येक की भिन्न-भिन्न बात एकसाथ सुन सके ऐसी उनकी श्रवणशक्ति थी; उन प्रभुके समवसरण मे मुनिवरोंकी सभा के श्रीमण्डप के ऊपर (पाच हजार धनुष ऊँचे निरालम्बी आकाश मे) साढ़े छह हजार केवलज्ञानी भगवन्त, प्रभुसमान ही अर्हतपदपर विराजते थे। अहा, ऊपर दृष्टि करते ही जहाँ एकसाथ ६५०१ परमात्मोओं के साक्षात दर्शन हों, उस धर्मसभा की शोभा का क्या कहना !! तथा वहाँ तेरह सौ श्रुतकेवली भगवन्त थे, उन सबका सम्यक्त्व अप्रतिहत था, तथा उनमे से अनेक तो क्षायिक सम्यकदृष्टि और चरमशरीरी थे,. हजार अवधिज्ञानी, छह हजार मनःपर्यय ज्ञानी थे; ११ हजार मुनिवर विक्रियाऋध्दिधारी थे। ४८ हजार दो सौ उपाध्याय-शिक्षक थे; पाँच हजार मुनि वाद-विवाद में कुशल थे-जो अनेकान्त विद्याके द्वारा किसी भी कुतर्कका खण्डन करके जिनधर्म की सत्यता सिद्ध कर सकते थे।-इस प्रकार उन तीर्थंकर प्रभुके परिवार में ८४००० मुनिवर सुशोभित थे। वे त्रिरूप शुद्धरत्नत्रय सहित थे। एक लाख बीस हजार आर्यिकाएँ पंचम गुणस्थान में उत्तम आत्म साधना करती थीं; तथा देव देवियों की संख्या का तो कोई पार नहीं था। धर्मप्रेमी तिर्यंच भी वहाँ हजारों-लाखों की संख्या में एकत्रित हुए थे और प्रभुकी धर्मदेशना श्रवण करने में लीन थे। दिव्य ध्वनि द्वारा श्रेयमार्ग का अर्थात रत्नत्रयरूप मोक्षमार्ग का उपदेश देते हुए श्रेयांसनाथ तीर्थंकरने कहा कि-हे भव्य जीवों जैसा चेतनस्वभाव हमारे आत्मा का है वैसा ही तुम्हारे आत्मा का है; सुख के निधान उसी में भरे हैं, सुख की अनुभूति हेतु स्वयं अपने आत्मा में देखो।
‘अहा, हम आत्मा ही स्वयं परमात्मा हैं’ ऐसा प्रभु कह रहे है; वह सुनते ही भव्यजीव अपूर्व आश्चर्यसे चौंक उठते और दूसरे ही क्षण अपने परमात्मस्वरूपका अवलोकन कर लेते थे। कोई सम्यकदर्शन प्राप्त करते, तो किन्हीं को एक साथ सम्यकदर्शन-ज्ञान चारित्र तीनो की प्राप्ति हो जाती और इसप्रकार वे श्रेयमार्गमे लग जाते।
श्रेयांस प्रभुने भरत क्षेत्र के अनेक देशोंमें इक्कीसलाख वर्ष तक विहार किया; धर्मदेशना द्वारा अनेक जीवोंको श्रेय मार्ग की प्राप्ति करायी और अपने तीर्थंकर प्रकृति आदि कर्मोंकी निर्जरा की। अन्त मे एक मास आयु शेष रहने पर प्रभु सम्मेद शिखर की ‘संकुल टूंक’ पर पधारे और वहाँ स्थिर हुए। विहार और वाणी का उदय रुक गया. .. योग भी कम होने लगे…श्रावण शुक्ला पूर्णिमा के दिन अन्तिम दो शुक्ल ध्यानों द्वारा शेष कर्मोंका भी क्षय किया। प्रथम शुक्ल ध्यान द्वारा मनयोग, वचनयोग तथा स्थूल काययोगका भी निरोध करके ७२ कर्मप्रकृतियोंका क्षय किया, पश्चात् समुद्र घातकी एक अलौकिक-अचिन्त्य विधीद्वारा चारों अघातिकर्मों की स्थिती एकसमान कर दी और अंत में चौदहवें गुणस्थान के अंतभाग में अन्तिम शुक्लध्यान द्वारा शेष १३ कर्म प्रकृतियोंका भी सम्पूर्ण क्षय करके द्रव्य कर्म-भाव कर्म-नोकर्म से रहित हुए वे प्रभु, अपने केवलज्ञानादि अनन्त चैतन्य वैभव को साथ लेकर मुक्ति पुरी में पधारे। देवोंने उनके मोक्षका महोत्सव मनाया। आज भी प्रभु मुक्तिपुरी में सिद्धस्वरूपमें विराज रहे है; उन्हे नमस्कार हो !
श्रेयांसनाथ जिनराजकी, संकुल कूट है जेह,
मन-वच-तन कर पूज हूँ शिखरसम्मेद यजेह।
पूर्वभव में जो विदेहक्षेत्र में नलिनप्रभ राजा थे, वहाँ से सोलहवें स्वर्गमें अहमिन्द्र हुए; पश्चात् ग्यारहवें तीर्थंकर रूपसे सिंहपुरीमें अवतार लेकर जीवोंका श्रेय किया और अन्त में सम्मेद शिखर से सिध्दालय में सिधारे. उन भगवान श्रेयासनाथ तीर्थंकर का मगल पुराण यहाँ पूरा हुआ।
चैतन्य वैभव और पुण्यवैभव
भगवान आदिनाथ तो तीसरे युग के अत भाग में अवतरित हुए और मोक्ष भी तीसरे युगमें ही , प्राप्त किया। तत्पश्चात् शेष २३ तीर्थंकर चौथे युगमें हुए। चौथे युग के प्रारम्भ से श्रेयांस भगवान तक अभी तो १० तीर्थंकर हुए, उतने मे तो जीवोकी आयु, शरीर प्रमाण आदि वैभव तो कितनी शीघ्रता से कम होने लगे ! -वह परिवर्तन देखो-भगवान ऋषभदेव की आयु ८४ लाख पूर्व की (अर्थात ८४ लाख x ८४ लाख x ८४ लाख = ५९२७०४०००,०००,०००० इतने वर्ष की) थी, जब कि ११ वें श्रेयांसनाथ तीर्थंकर की आयु मात्र ८४ लाख वर्ष की ही थी। कितना विशाल गुणाकार घट गया ! प्रथम तीर्थंकर का शरीर प्रमाण ५०० धनुष था जब की ११वे तीर्थंकर का शरीर प्रमाण ८० धनुष था। इस प्रकार अन्य भी अनेक बाह्य प्रकारों में क्रमशः हानि होती गई; परन्तु भगवन्तोंके रत्नत्रयमार्ग में या केवलज्ञानादि आत्मवैभव में कोई हानि नहीं हुई; सर्व भगवन्तोंका वीतरागी आत्मवैभव तो एकसमान ही था। उसीसे प्रगट होता है कि आत्मवैभव ही जीवोंका सच्चा वैभव है; देह वैभव अथवा आयु वह जीव का वैभव नहीं है। इसलिये हे भव्य जीवों ! तुम भी तीर्थंकरोंके बाह्य वैभव में मोहित मत होना, उनकी सर्वज्ञता-वीतरागता आदि गुणवैभव द्वारा उनकी महानता को पहिचानना; तो तुम्हे भी वैसे गुणों की प्राप्ति होगी। चैतन्य वैभव के समक्ष पुण्यवैभव सेवकरूप से हो तो भले हो, उसका हम तिरस्कार न करें, परन्तु उसमें मोहित होकर सन्तुष्ट भी न हो जायें और चैतन्यवैभव को न भूल जाये; अर्थात् उस पुण्यवैभवको अपने चैतन्य वैभव से बाह्य जानकर, उसमें मूर्च्छित हुए बिना अपने चैतन्यवैभव में ही लीन रहे और अन्त में उस बाह्य वैभव को छोड़कर सिद्ध-परमात्मपद मे स्थिर रहें। वही अपना इष्ट, ध्येय और साध्य है;-ऐसा तीर्थंकर भगवन्तोंका जीवन हमे शिक्षा देता है।
भगवान श्रेयांसनाथ का मोक्षगमन होने के पश्चात-
प्रथम बलदेव-वासुदेव-प्रतिवासुदेव (विजय, त्रिपृष्ठ और अश्वग्रीव) हुए, प्रत्येक चौबीसी में २४ तीर्थंकर, १२ चक्रवर्ती, ९ बलदेव, ९ वासुदेव तथा ९ प्रतिवासुदेव होते हैं, इन कुल ६३ महापुरुषोंको ६३ शलाका पुरुष कहते हैं। वे सब यद्यपि मोक्षगामी तो होते है परन्तु उनमे से २४ तीर्थंकर नियमसे उसी भव में मोक्ष प्राप्त करते हैं; १२ चक्रवर्तियोंमे से अनेक तो उसी भव में मोक्ष प्राप्त करते है; कोई स्वर्ग में जाते हैं तो कोई नरक में भी जाते है बलदेव या तो उस भव मे मोक्ष प्राप्त करते हैं अथवा स्वर्ग में जाते हैं, नरक में नहीं जाते; ९ वासुदेव तथा प्रतिवासुदेव (पूर्व काल मे किये हुए भोग निदान के कारण) नरकमें जाते है और पश्चात अल्पभवमें मोक्ष प्राप्त करते हैं। महापुराण में ऐसे ६३ शलाका पुरुषों के जीवन चरित्र का तथा उनके पूर्व भवोंका वर्णन है, उनमें से अभी तक ११ तीर्थंकरोंका वर्णन पूरा हुआ। प्रथम दो चक्रवर्ती (भरत और सगर) का भी संक्षिप्त वर्णन हुआ। अभी तक एक भी बलदेव, वासुदेव तथा प्रतिवासुदेव नहीं हुए थे। (वे तीनों एक साथही होते हैं।) ११ वें श्रेयांसनाथ तीर्थंकर के मोक्षगमन के पश्चात् उनके तीर्थ में कितने ही वर्षों बाद, इस चौबीसी के प्रथम बलदेव-वासुदेव तथा प्रतिवासुदेव हुए। वासुदेव वे तीन खण्डके स्वामी अर्धचक्रवर्ती होते हैं। प्रथम वासुदेव का नाम ‘त्रिपृष्ठ’; वह अन्तिम तीर्थंकर महावीर का जीव और वही भगवान ऋषभदेवका पौत्र मरीचि। इस प्रकार ऋषभदेव, उनका पुत्र भरत और पौत्र मरीचि-यही जीव अनुक्रम से इस चौबीसी के प्रथम तीर्थंकर, प्रथम चक्रवर्ती और प्रथम अर्ध चक्री (तथा अन्तिम तीर्थंकर) हुए। उन त्रिपृष्ठ वासुदेव आदिका चरित्र इस पुस्तक में महावीर भगवान के पूर्वभवों मे तथा शान्तिनाथ प्रभुके पूर्वभवके वर्णन में पढ़ना।
(भगवान श्रेयांसनाथ तीर्थंकर के मोक्षगमन के पश्चात ५४ सागरोपम तक उनका शासन चला; परन्तु अन्तिम पल्य के तीसरे भाग जितने काल तक धर्म-परम्पराका विच्छेद हो गया। यह तिसरी बार धर्म विच्छेद हुआ। यह विच्छेद विजयार्द्ध-श्रेणीयों में लागू नही होता।
एक मजे की बात-श्रीमती इन्दिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री होनेपर भी दादी माँ के रूप में अपने पौत्रों को आनन्द से कहानियाँ सुनाती थी; तो हे मम्मी ! और हे दादी ! तुम भी अपने पुत्र पौत्रों को प्रतिदिन धर्म की कहानियाँ सुनाना… तुम्हें और बच्चोंको खूब आनन्द आयगा।