८
भगवान चन्द्रप्रभ (भाग १)
(८)
आनन्दरस से भरपूर ज्ञानगंगा प्रवाहित करनेवाले और जगत को शान्ति प्रदान करने वाले अद्वितीय चन्द्र, भगवान चन्द्रप्रभ जिनको नमस्कार हो !
भगवान चन्द्रप्रभने पूर्व श्रीवर्मा के भव मे सम्यक्त्व प्राप्त किया, तबसे लेकर केवलज्ञान प्राप्त करते तीर्थंकर हुए तब तक के सात भवों का वह मंगल पुराण है।
चन्द्रप्रभ का जीव दूसरे पूर्वभव मे ‘पद्मनाभ’ नामक राजा था, तब श्रीधर मुनिराज के निकट धर्मश्रवण करके अपने भूत एवं भविष्य के भव पूछता है। मुनिराज उसे भूतकाल के चार भव, वर्तमान पद्मनाभका भव और भविष्यकाल के दो भव - इस प्रकार कुल सात भव की बात करते है। वे सात भव संक्षेप में इस प्रकार हैं.-१. श्रीवर्मा राजा : सम्यक्त्व की प्राप्ति (पूर्व भव छठवाँ)
२. प्रथम स्वर्ग में देव… (पूर्व भव पाँचवाँ)
३. अजितसेन चक्रवर्ती; मुनिदीक्षा (पूर्वभव चौथा)
४. सोलहवें स्वर्ग मे अच्युत इन्द्र… (पूर्व भव तीसरा)
५. राजा पद्मनाभ; दीक्षा; तीर्थंकर प्रकृति (पूर्व भव दूसरा)
६. वैजयन्त विमान में अहमिन्द्र… (पूर्व भव १)
७. चन्द्रपुरी (काशी) मे चन्द्रप्रभ तीर्थंकर का अवतार और मोक्ष अब उनकी मंगलकथा सुनो।
भगवान चन्द्रप्रभ : पूर्वभव : महाराजा पद्मनाभ
धातकी खण्ड के विदेहक्षेत्रमें रत्नसंचयपुर नामका नगर है। सम्यग्दर्शनादि उत्तम रत्नों से विभूषित ऐसे सज्जन-पुरुषों द्वारा उस नगरी की अद्भुत शोभा है। वहाँ सदाचारी श्रावक उत्तम जैनधर्म का पालन करके स्वर्ग मे या मोक्षमे ही जाते थे। ‘अरे, स्वर्ग मे तो क्या है! वह तो यहाँ जैसा ही है’- ऐसा विचारकर सम्यग्दृष्टि जीव मोक्षहेतु ही धर्मसाधन करते थे, स्वर्ग की इच्छा से नहीं।
उस रत्नसंचयपुर के राजा कनकप्रभ और रानी सुवर्णमाला; उनके पद्मनाभ नामका पुत्र है। वे पद्मनाभ ही अपने चरित्रनायक श्री चन्द्रप्रभका जीव है। (पद्मनाभ वह उनका दूसरा पूर्वभव है।)
एकबार राजा कनकप्रभ राजमहल की छतपर बैठे-बैठे नगर का अवलोकन कर रहे थे। इतनेमें देखा कि एक बूढ़ा बैल गहरे कीचड़ मे धँस गया है और तड़पकर मर रहा है। वह देखकर राजा को वैराग्य जागृत हुआ और विचारने लगे कि-अरे! अभी भी मै इस संसार के मोहरूपी कीचड में धँसा हुआ हूँ। मैने जिनागम जाने है, उत्तम साधुओ की संगति की है और संसार को असार जाना है; तो अब मै इन इन्द्रिय सुखो मे कहाँ तक आसक्त रहूँगा? -ऐसा विचार करने पर वे धर्मात्मा कनक राजा संसारसुखो से अत्यन्त विरक्त हो गये और तत्काल ही उनका चित्त मुनिमार्ग मे प्रविष्ट हुआ, मानो मुक्ति के दूतने आकर गुप्तरूपसे उनके कानमे मुनि होने को कहा हो! उन्होंने तुरन्त अपने पुत्र पद्मनाभ को राज्य सौंपकर, श्रीधर मुनिराज के समीप मुनिदीक्षा ग्रहण कर ली।
अब, वह रत्नसंचयपुर का राज्य अपने चरित्रनायक धर्मात्मा पद्मनाभने सँभाल लिया। एक दिन की बात है-राजा पद्मनाभ राजसभा मे बैठे थे, वहाँ मालीने आकर हर्षपूर्वक बधाई दी कि-हे स्वामी! मनोहर बागमे श्रीधर मुनिराज पधारे है, उनकी मुद्रा अति शांत एव तेजस्वी है, उनके आगमन से सारा वन ऐसे खिल उठा है मानो प्रफुल्लित होकर हँस रहा हो। हिरन और सिंह बाघ और हाथी, सर्प और मोर जैसे पशुपक्षी भी वैरभाव छोडकर शान्तिपूर्वक मुनिराजकी चरणछाया मे हिलमिलकर मित्रता से बैठे है।
इस प्रकार श्रीधर मुनिराज के आगमन के समाचार सुनते ही राजा पद्मनाभ के हृदय मे हर्षका समुद्र उमड पडा, उसने हर्षित होकर अपना रत्नहार माली को पुरस्कार मे दे दिया। 'अहा! मै जिनके दर्शन को जाना चाहता था वे भगवान स्वयं मेरे आँगन मे पधारे है ऐसा कहकर तुरन्त ही मुनिराज के साक्षात दर्शन वन्दन हेतु प्रस्थान किया।
राजा पद्मनाभने मुनिराज के समीप आकर जयजयकारपूर्वक दर्शन-वन्दन किया और उनके चरणो मे बैठ गया। राजा को अत्यन्त प्रसन्नता हो रही थी। मुनिराजने उसे धर्म का आशीर्वाद दिया।
राजाने विनयपूर्वक तत्त्वोपदेश की प्रार्थना की कि-हे स्वामी! वर्तमान मे अनेक जीव नास्तिक बन रहे है, जीव के अस्तित्व को नही जानते, इसलिये आप युक्तिपूर्वक जीवके अस्तित्व की सिद्धि करके समझाइये जिससे जीवोका कल्याण हो, क्योकि जीवका अस्तित्व सिद्ध हो तभी धर्म और मोक्ष की सिद्धि होगी।
श्री मुनिराजने कहा हे बुध्दिमान राजन्! आपने अच्छा प्रश्न पूछा है। सुनो, मैं जीव की सत्ता सिद्ध करके बतलाता हूँ-★ ‘जीव नहीं है’ यह बात प्रत्यक्षादि प्रमाणों से खण्डित है।
★ ‘जीव नेत्र द्वारा दिखाया नहीं देता इसलिये नहीं है’ ऐसा कहना तो मूर्खता है। ‘इन मकान आदि सबको मैं देखता हूँ’-ऐसा कौन कहता है?-देखनेवाला जो विद्यमान है वही ऐसा कहता है कि ‘मैं देखता हूँ’-इसलिये जीव विद्यमान है।
★ चाहे जैसे अंधकारमें भी जीव कहता है कि ‘मैं यहाँ विद्यमान हूँ’-ऐसा स्वयं स्वसंवेदन के अपने अस्तित्व को प्रसिद्ध करता है, वही जीव है। ‘मैं हूँ’ ऐसा वेदन जीव में होता है, शरीर में नहीं।
★ शरीर के हाथ-पैर आदि अवयव कट जायँ तथापि ज्ञान नहीं कट जाता, कम नहीं हो जाता; इससे सिद्ध होता है कि चेतनसत्ता शरीर से भिन्न है कि जिसके आधार से ज्ञान रहा है। ज्ञान यदि शरीर के आधार से होता तो शरीर के कटने से ज्ञान भी कट जाता।
★ जगतमें जितने प्राणी हैं उन (मनुष्य, हाथी, सिंह, चींटी आदि) सबमें ‘जीव’ का अस्तित्व स्वसंवेदन-प्रत्यक्ष द्वारा सिद्ध है, क्योंकि ‘मै सुखी हूँ, मै दुःखी हूँ’-ऐसा सुख-दुःखका वेदन (ज्ञान) प्रत्येक जन्तु को होता है। जीव के बिना सुख-दुःखका वेदन कौन करेगा ? स्वको तथा परको जाने ऐसा ज्ञान का स्वभाव है, और ऐसा जो ज्ञान स्वभाव है वही जीवसत्ता है।
इस प्रकार मुनिराजने ज्ञानलक्षण द्वारा जीवके अस्तित्व को सिद्ध करके कहा कि-हे राजन् ! जीवके ऐसे अस्तित्व को जो जानता है वह स्वर्ग-नरकादि परभव को भी स्वीकारता है, इसलिये पाप से डरता है और धर्म का सेवन करता है।
शरीर से भिन्न जीवकी सिद्धि करते हुए मुनिराज कहते है कि-अचेतन शरीरसे जीव भिन्न है : शरीर तो ज्यों का त्यों हो, तथापि जीवमे विकार (दुःख, क्रोधादि) होते देखे जाते हैं; तथा शरीर में रोगादि विकार होने पर भी अथवा उनके जलने पर भी जीवके चित्त में शान्ति रह सकती है; इस प्रकार जीव और शरीर के कार्य (धर्म) भिन्न-भिन्न हैं। तथा हे राजन ! शरीर चेष्टाएँ तो आँखो से दिखती है, परन्तु आत्माके भाव आँखो से दिखायी नहीं देते;-इस प्रकार दोनों के धर्म (मूर्तपना तथा अमूर्तपना) भिन्न है।
इस प्रकार श्रीधर मुनिराज ने स्वसंवेदन-प्रत्यक्षसे तथा अनुमान द्वारा चेतनस्वरूप जीवका अनादि-अनन्त अस्तित्व सिद्ध करके समझाया, प्रत्येक जीव ऐसा अनुभव करता है कि पाप-पुण्य, दुःख-सुखादि रुप अपने भाव सदा बदलते रहते हैं, और उस बदलती दशा के द्वारा वह धर्म एवं मोक्ष को साध सकता है। इस प्रकार नित्य-अनित्य (गुण-पर्याय) स्वरूप जीवतत्त्व में ही बंध-मोक्षादि की सिद्धि होती है। जीव सर्वथा अकर्त्ता या अपरिणामी नहीं है। विचारणीय बात है कि-जीव यदि अच्छे-बुरे कार्यों को (शुभ-अशुभ भावोंको) न करे तो उसे पुण्य-पाप क्यों होंगे ? और स्वर्ग-नरक भी क्यों होंगे ? और यदि पुण्य-पाप का बंधन न हो तो उससे छूटनेरूप मोक्ष या मोक्षका उपाय (धर्म) भी किसलिये करे ? जीव दयादि शुभकार्यों द्वारा पुण्यबंध करता है और हिंसादि अशुभ-कार्यों द्वारा पापबंध करता है; वीतराग भावरूप धर्म द्वारा वह बंध को छेदकर मोक्ष करता है। इस प्रकार जीव अपने भावका कर्ता होता है और उसके फलका (सुख-दुःखका) स्वयं ही भोक्ता होता है।
जीवको बंधन या मुक्ति यदि दूसरा कोई करे, तो उसका फल भी आत्मा क्यों भोगे ? जीव स्वयं ही अपने बंध-मोक्ष को करता है और स्वयं ही उसके फलको भोगता है। जब रत्नत्रयरूप शुद्धभाव करता है तब वह रागादि विभावका अकर्त्ता होता है, परन्तु सर्वथा अकर्त्ता नहीं है। ऐसा स्वतंत्र, स्वयंसिद्ध जीवतत्त्व है और वह अपने अंतरंग स्वसंवेदन से अनुभवगोचर होता है।
श्री मुनिराज के उपदेश से राजा पद्मनाभ को तथा सभाजनों को अत्यन्त प्रसन्नता हुई; अनेक जीव जीवतत्त्व को अनुभव गोचर करके सम्यग्दर्शन एव सम्यग्ज्ञान को प्राप्त हुए।
तत्पश्चात् सर्वज्ञता की सिद्धि करते हुए मुनिराज ने कहा कि-सर्वज्ञतारूप मोक्षपद है। आत्मा का ज्ञानस्वभाव है और उस ज्ञान की पराकाष्ठा वह सर्वज्ञता है। उस सर्वज्ञता की सिद्धि अंतरके आत्मानुभवपूर्वक जो युक्ति-अनुमानादि से होती है।
★ जो ‘इन्द्रिय प्रत्यक्ष’ है वह अतीन्द्रिय पदार्थ की सिद्धि में न तो साधक हो सकता है, और
न बाधक।
★ सर्वज्ञता अतीन्द्रिय है, इसलिये इन्द्रिज्ञान उसके सद्भाव को या अभाव को सिद्ध नहीं कर सकता। जिस ज्ञान का जो विषय हो वही उसमे विधि या निषेध कर सकता है, जिसका जो विषय न हो वह उसमे विधि या निषेध नही कर सकता।
★ जगत मे ऐसा कोई प्रमाण नही है कि जो सर्वज्ञता के अस्तित्व को बाधक हो सके।
कोई कहे कि-पुरुषपना सर्वज्ञता का बाध्य है! तो वह बराबर नही है; पुरुषपना होने पर भी किसीमे ज्ञानके अतिशयरूप सर्वज्ञता हो सकती है। (जैसे कि-अरिहंत देव।)
‘सर्वज्ञ है’ ऐसे वाक्य के बोध द्वारा उत्पन्न हुई बुद्धि वह प्रमाण है, और वह बुद्धि सर्वज्ञके अस्तित्व को स्वीकार करती है। सर्वज्ञ के स्वीकार से आत्मा के ज्ञानस्वभाव का स्वीकार और रागादि विभावो से भेदज्ञान होता है, इसलिये आत्मा निज स्वभाव की सन्मुखता द्वारा सर्वज्ञपद का साधक होता है। यह बात प्रसिद्ध है कि-
जो जानता जिनराज को चेतनमयी शुद्ध भावसे;
वह जानता निज आत्म को सम्यक्त्व ले आनन्द से।
श्री मुनिराजने इस प्रकार सर्वज्ञता की सिद्धि पूर्वक गंभीर उपदेश दिया और मोक्षमार्ग की रीति समझायी।
श्रीधर मुनिराज के मुखारविन्दसे ऐसी अद्भुत धर्मचर्चा सुनकर, चन्द्रप्रभ तीर्थंकर के जीव राजा पद्मनाभने भक्तिपूर्वक कहा-प्रभो ! आपने जैन सिद्धान्त के जो गंभीर तत्त्व-जीव मोक्ष, सर्वज्ञता आदि समझाये वे वैसे ही हैं, उसी प्रकार हमारे श्रद्धा-ज्ञान मे आते हैं और वही मोक्षका मार्ग है। इतना कहकर राजा पद्मनाभने विनय से पूछा-हे प्रभो ! आप दिव्यज्ञान के धारी है, अपने भूत-भविष्यके भव जानने की मुझे उत्कण्ठा है, इसलिये कृपा करके कहिये।
श्री मुनिराजने दिव्यज्ञान द्वारा जानकर कहा कि हे भव्य, सुनो ! अब एक भवके पश्चात् तुम्हारा आत्मा भरतक्षेत्र में आठवें तीर्थंकर चन्द्रप्रभ होगा। तुम्हारे पूर्व के भव भी मैं कहता हूँ… मुनिराजके श्रीमुख से यह बात सुनते ही सभाजनों मे हर्ष छा गया कि-अहा, एक तीर्थंकर का आत्मा यहाँ अपने बीच विराजमान है और उन तीर्थंकर के पूर्व भव की बात मुनिराज हमे सुना रहे हैं। -इस प्रकार सभाजन महान हर्षपूर्वक सावधानी से सुनने के लिये आतुर हो गये…और श्री मुनिराजने पद्मनाभ राजा अर्थात् चन्द्रप्रभ तीर्थंकर के पूर्वभवों की मंगल कथा प्रारम्भ की…तुम भी आनन्द से सुनो।
श्री चन्द्रप्रभ तीर्थंकर का पूर्वभव (छठवाँ)
श्रीवर्मा राजा : सम्यक्त्व-प्राप्ति
मुनिराज कहते हैं-हे राजा पद्मनाभ ! प्रथम तो इस भवमें ही एक हाथी के निमित्तसे तुम मुनि होगे, और दर्शनविशुद्धि आदि १६ उत्तम भावनाओं द्वारा तीर्थंकर प्रकृति नामकर्म बाँधोगे। भरतक्षेत्र की इस चौबीसीमें अभी तक ऋषभादि सात तीर्थंकर हो चुके हैं; वर्तमान में यहाँ कोई तीर्थंकर विचरण नहीं करते। एक भव पश्चात् तुम वहाँ आठवें तीर्थंकर रूप में अवतरित होगे और धर्मचक्रका प्रवर्तन करोगे। अहा, एक तीर्थंकर का जीव अपने भूत-भविष्य के वर्णन की कथा मुनिराज के श्रीमुखसे सुन रहा है:
हे राजन् ! अब से पूर्व पाँचवें भव में तुम पुष्करार्द्ध द्वीप के विदेहक्षेत्र में श्रीषेण राजा के पुत्र श्रीवर्मा थे। वे राजा श्रीषेण श्रीपुर नामके नगरमें राज्य करते थे; उनकी रानी का नाम श्रीकान्ता था। तुम्हारे जन्मसे पूर्व उनके कोई पुत्र न होने से वह रानी चिन्ता में रहती थी। उसे उदास देखकर राजे समझाते कि हे देवी ! “जो वस्तु भाग्य के आधीन है उसके लिये चिन्ता करना उचित नहीं है; इसलिये तुम चिन्ता छोड़ो और धर्म में अपना चित्त लगाओ। जीवने पूर्वभव में जो भले-बुरे कर्म बाँधे हों तदनुसार फल मिलता है, उसमें हर्षशोक करना वह वृथा दुःखका कारण है। और हे देवी ! भाग्य अनुकूल होने पर पुत्रप्राप्ति भी अवश्य होगी।”
इस प्रसंग के पश्चात् एक दिन श्रीषेण राजा फल और पुष्पों से आच्छादित एक उद्यान में क्रीड़ा करने गये थे। महान भाग्योदय से एक ऋद्धिधारी मुनिवर आकाशमार्ग से वहीं उतरे। वे अनंत मुनिराज अवधिज्ञानी थे। उन्हें देखते ही राजा के हर्ष का पार नहीं रहा। उन्हें वन्दन करके राजा ने भक्तिपूर्वक कहा- अहो ! किसी महान पुण्योदय से आपके दर्शन हुए। प्रभो ! आपकी रत्नत्रयविभूति सर्व मंगल का कारण है। हे स्वामी ! जैनधर्म के प्रताप से स्व-पर का भेदज्ञान मैंने किया है; इस राजवैभव में कहीं सुख नहीं है; ऐसा अनुभव होने पर भी मेरा मन संसार से विरक्त क्यों नहीं होता ?
श्री मुनिराज उनके मन की बात जान गये ..और कहा-हे राजन् ! तुम्हारा मन पुत्रप्राप्ति की चिन्ता से घिरा हुआ है। अब कुछ ही काल पश्चात् तुम्हारे यहाँ एक भावी तीर्थंकर का जीव पुत्ररूप में अवतरित होगा; तत्पश्चात् उसे राज्यभार सौंपकर तुम जिनदीक्षा ग्रहण करोगे और अष्ट कर्मों का नाश करके सिद्धपद पाओगे। तुम्हारी रानी श्रीकान्ता ने पूर्वजन्म में एक गर्भवती स्त्री की पीड़ा तथा कुरुपता देखकर ऐसा निदान किया था कि मुझे यौवनावस्था में गर्भधारण न हो। उस अशुभनिदान के कारण ही उनका यौवन पुत्ररहित व्यतीत हुआ। अब उनके अशुभ कर्मका अन्त आया है; वे अल्पकाल में ही पुत्रवती होंगी…भावी तीर्थंकर चन्द्रप्रभ का जीव उनकी कूख से अवतरित होगा और उन्हें आनन्दित करेगा।
मुनिराज के वचन सुनकर राजा का चित्त अति प्रसन्न हुआ; धर्मोपदेश से प्रभावित होकर उन्होंने पाँच अणुव्रत अंगीकार किये। घर आकर रानीसे मुनिराज की बात की, तो रानी भी अति सन्तुष्ट हुई और उल्लासपूर्वक धर्मसाधन करने लगी। अहा ! जिसके उदर में भावी तीर्थंकर का जीव विराजता हो उसके महाभाग्य का क्या कहना !
योग्य समय पर श्रीकान्ता रानी ने एक अद्भुत तेजस्वी पुत्ररत्न को जन्म दिया…जो सातवें भव में भरत क्षेत्र में आठवें तीर्थंकर होनेवाले हैं…उनके जन्म से सर्वत्र आनन्दमंगल होने लगा। राजाने याचकों को यथोचित इच्छानुसार दान दिया। जिनेन्द्र-पूजा आदि मंगलविधिपूर्वक उस पुत्रका ‘श्रीवर्मा’
ऐसा शुभनाम रखा। (यह श्रीवर्मा ही भावी आठवें तीर्थंकर श्री चन्द्रप्रभ हैं।)
चन्द्रप्रभ को श्रीवर्मा के भवमें सम्यक्त्वप्राप्ति
एक बार उस श्रीपुर नगरी मे पद्मजिनराज का आगमन हुआ। राजाश्रीषेण अपने पुत्र श्रीवर्मा सहित उनका धर्मोपदेश सुनने गये। अद्भुत-आश्चर्यकारी-आनन्दमय आत्मतत्त्व का स्वरूप सुनकर वे मुग्ध हो गये। अपने चरित्रनायक चन्द्रप्रभ का जीव (युवराज श्रीवर्मा) तो वह जिनोपदेश झेलकर तुरन्त ही अंतर्मुख हुआ; उसकी ज्ञानचेतना जागृत हो उठी और मिथ्यात्वरूपी महा अंधकार नष्ट हो गया; चैतन्य की स्वानुभूति से अपूर्व सम्यक्त्व प्राप्त करके वह चतुर्थ गुणस्थान में आरूढ हुआ…अंतरात्मा होकर मोक्षमहल का प्रथम सोपान चढ गया, उसने अपने मे ही परमात्मा के दर्शन कर लिये। इस प्रकार अपूर्व निधान पाकर उसका जीवन पलट गया। सम्यक्त्व के सहयोग से जो विशिष्ट पुण्यकर्मों का संचय होता है वह स्वयमेव इच्छित पदार्थों का समागम करता रहता है; इसलिये धर्मात्मा श्रीवर्मा भी बहारमें इच्छित पदार्थों की प्राप्ति करते थे; अतर का सत्य अतीन्द्रिय सुख उनको सम्यक्त्व-परिणति देती थी।
अहो, जिन चरणों मे सम्यक्त्व के प्रताप से आत्मा की अपूर्व आराधना प्रारम्भ हुई वह अब वृद्धिगत होती-होती सातवें भव में परमात्मा पद प्राप्त करायगी। चैतन्यसुख का आस्वादन किया होने से उन राजकुमार श्रीवर्मा का चित्त राज-सुखों से उदासीन रहता था। धन्य था उनका आत्मजीवन !
महाराज श्रीषेण का चित्त भी केवलीप्रभु का उपदेश सुनने के बाद संसार-भोगों से उदासीन एव भव से भयभीत रहता था। एक दिन आकाश से नक्षत्र को खिरते देखकर वे महाराजा श्रीषेण ससार-भोगो से विरक्त हुए और वैराग्यपूर्वक चितवन करने लगे कि-‘अरे, इस अस्थिर संसार-परिवार या राजलक्ष्मी का मोह कैसा ? एक मोक्षलक्ष्मी और दूसरी यह जड़लक्ष्मी-उन दोमे से अज्ञानी लोग मोक्षलक्ष्मी की साधना छोड़कर जड़लक्ष्मी का मोह करते है। अरे, उनकी बुद्धि की बलिहारी है कि चैतन्य का अमृतपान छोड़कर वे विषयों का विष पीने जाते है। सच्ची लक्ष्मी तो मोक्षलक्ष्मी ही है। विषयरहित निग्रन्थ वीतराग दशामें ही परमसुख है।’
ऐसा विचारकर उन्होंने राजकुमार श्रीवर्मा को बुलाया और विरक्तभाव से कहा-हे वत्स ! घास की झोंपड़ी समान इस शरीर को वृद्धावस्थारुपी पवन बिखेर न दे, धर्मश्रवण के लिये कानों की शक्ति तथा नेत्रों की ज्योति मन्द न हो जाये, तथा स्मरणशक्ति नष्ट न हो जाय, उसके पूर्व मै निर्ग्रन्थ दीक्षा लेकर अपने आत्मा को भवचक्र से छुड़ाना चाहता हूँ। अभी तक तो ससार का स्वरुप जानने पर भी मैं परिवार के मोहवश जंजाल मे फँसा रहा; अब मैंने शीघ्र आत्मकल्याण साध लेने का निश्चय किया है। हे पुत्र ! इस धर्मकार्य में तुम मेरा अनुमोदन करना। अब यह राज्यभार तुम सँभालो। सदा प्रशांत भावसे रहना; धर्मात्मा-सज्जन-विद्वानों का आदर करना; प्रजाजनों को पुत्रवत् समझकर उन्हे कोई कष्ट हो तो तुरन्त उसका निवारण करना। धर्म की रक्षापूर्वक राज्य करना।
इस प्रकार हितोपदेश सहित श्रीवर्मा का राज्याभिषेक करके श्रीषेण महाराजाने मुनिदीक्षा अंगीकार की। शुद्धभाव से रत्नत्रय की साधना करके अल्पकाल में केवलज्ञान प्रगट किया और सर्वकर्मों का क्षय करके मोक्ष पधारे।
❖ ❖ ❖ इधर श्रीपुरनगरी में राजा श्रीवर्मा (जो कि चन्द्रप्रभ तीर्थंकर का जीव हैं) आत्मसाधना को भूले बिना, न्याय-नीतिपूर्वक कुशलता से राज्य करने लगे। जो तीसरे भवमें चक्रवर्ती होनेवाले हैं, पाँचवे भवमें तीर्थंकर प्रकृति बाँधनेवाले हैं और सातवें भवमें तीर्थंकर होनेवाले हैं-ऐसे वे श्रीवर्मा राजा जब दिग्विजय के लिये निकले तब अनेक राजा तो भयभीत होकर शरण में आ गये; कितने ही राजा युद्ध की हिंसासे डरकर संसार से विरक्त हुए और राजपाट छोड़कर जिनेश्वर भगवान की शरण में चले गये। इस प्रकार विजय करते-करते राजा श्रीवर्मा समुद्रकिनारे पहुँचे तब उनके पुण्यप्रभाव से समुद्र की लहरों के साथ चमचमाते मोती-रत्न भी खिंचकर किनारे आने लगे…मानो समुद्रभी उनकी आधिनता स्वीकार करके, मोती-रत्नों की भेंट रखकर भावी तीर्थंकर का सन्मान कर रहा हो।
दिग्विजय करके वे राजा श्रीवर्मा पुनः नगरी में आये और सुखविलासपूर्वक राज्य करने लगे। एक मोक्ष पुरुषार्थ के अतिरिक्त धर्म, अर्थ और काम यह तीनों पुरुषार्थ उनको सिद्ध हो चुके थे और चौथे मोक्षपुरुषार्थ का उद्यम कर रहे थे।
एक बार शरदऋतु के क्षणभंगुर बादलों को देखकर संसार की क्षणभंगुरता का चिन्तवन करके वे संसार से विरक्त हो गये और श्रीप्रभ मुनिराज के निकट जिनदीक्षा अंगीकार कर ली; रत्नत्रय की आराधनापूर्वक समाधिमरण करके वे राजा श्रीवर्मा सौधर्मस्वर्ग में श्रीधर नामक देव हुए।
❖ ❖ ❖
श्री चन्द्रप्रभ तीर्थंकर का पूर्वभव : चौथा
धातकी खण्ड में अजितसेन चक्रवर्ती
श्री मुनिराज कहते हैं-हे राजा पद्मनाभ ! पहले जो श्रीवर्मा राजा था; वर्तमान में जो पद्मनाभ है और,एक भव बाद जो चन्द्रप्रभ तीर्थंकर होनेवाला है-ऐसा तुम्हारा आत्मा पाँचवे पूर्वभव मे सौधर्म स्वर्ग मे था; वहाँ से चयकर चौथे पूर्व भव में धातकी खण्ड की कौशल नगरी में राजकुमार अजितसेन के रुप मे अवतरित हुआ। उनके पिता का नाम महाराज अजितंजय और माता अजितसेना। गुणवान तेजस्वी पुत्रको देख कर वे अति प्रसन्न हुए। अहा, भावी तीर्थंकर को अपने घरमें देखकर कौन प्रसन्नता का अनुभव नहीं करेगा ?।
अपने चरित्रनायक राजकुमार अजितसेन एकबार राज सभा में बैठे थे . आनन्दमय चर्चा चल रही थी; इतने में उनके पूर्वभव का शत्रु कोई दुष्ट देव वहाँ आया और सभाजनों को मूर्च्छित करके उन राजकुमार का अपहरण कर ले गया।
मूर्च्छा दूर होने पर राजाने घबराकर सभा में देखा तो वहाँ राजकुमार को न देखकर उन्हें चित्तभ्रम हो गया कि अरे, यह क्या हुआ ? राजकुमार कहाँ गया ? उनकी महारानी भी पुत्रके वियोगमें हाहाकार करके रोने लगीं; पुत्र के वियोग से दोनों का संसार नीरस हो गया। अरे, हमारा पुत्र कहाँ चला गया. .अब हम उसे कब देखेंगे ! ऐसी चिन्ता में क्षणभर तो दोनों मूर्च्छित हो गये।
थोड़ी देर में मूर्च्छा दूर होने पर राजाने आँखें खोल कर ऊपर दृष्टि की…तो. .अहा हा ! -उसके आश्चर्य का पार नहीं रहा। उसने देखा कि आकाश में से,एक महान तपस्वी ऋद्धिधारी मुनिराज उनकी ओर आ रहे हैं.. पूर्णिमा के चन्द्र समान उन मुनिराज को देखते ही राजा सब दुःख भूल गयें। मुनिराज ज्यों-ज्यों निकट आते गये त्यों-त्यों राजा के हृदय में आनन्द का सागर उमड़ने लगा.. सच ही है-मुमुक्षु आत्मा, धर्मात्मा का संग होने से दुनिया के दुःख भूल जाता है। उन राजा को अपने प्राणप्रिय पुत्र के वियोग का उतना शोक नही हुआ था जितना मुनिराज के पधारने से सन्तोष और हर्ष हुआ। वास्तव में इतने सन्तोष का अनुभव उसे जीवन मे प्रथम बार हुआ था।
श्री मुनिराज ने राजा को मगल आशीर्वाद दिया और कहा कि-‘हे भव्य ! तुम चरमशरीरी हो।’ अहा, उनके वात्सल्य की क्या बात ! वह वात्सल्यपूर्ण आशीर्वाद लेकर राजा का हृदयकमल आनन्द से खिल उठा। अहा ! मुनि के श्रीमुख से अपने मोक्ष की बात सुनकर किसे आनन्द नही होगा ? । राजाने आनन्दित होकर कहा : प्रभो ! मुझे कल्पना भी नहीं थी कि अभी किन्हीं मुनिभगवन्त के दर्शन होंगे ! जब मै पुत्रवियोगरुपी दुःखसमुद्र मे डूब रहा था और मेरा मन मूढ़ हा गया था उस ठीक समयपर आपके आगमन से तथा दर्शन से मुझे नवजीवन मिला है; आपने मुझे दुःख के सागर से बाहर निकाला है, आप मेरे परम हितैषी बन्धु हो !
श्री मुनिराज ने कहा-हे भव्य ! मै आकाशमार्ग से जा रहा था, तब मैने देखा कि तुम पुत्रवियोग से दुःखी हो रहे हो तुम्हारे गुणो के अनुराग से प्रेरित होकर मै यहाँ आया हूँ। हे राजन् ! तुम तत्त्वज्ञानी हो, तुम्हे स्व-पर का भेदज्ञान है और ससार का स्वरुप जानते हो। तुम्हें इस असार ससार की स्थिति बतलाना वह तो ‘इन्द्र के निकट स्वर्ग का वर्णन’ करने समान है। तथा तुम इसी भव में मोक्षगामी चरम शरीरी हो, इसलिये तुमसे अधिक क्या कहना ? चित्तमे से इष्टवियोग का विषाद दूर करो। हे राजन् ! इस प्रसगपर कायरता छोडकर धैर्य धारण करो और वीरपुरुष की भाँति धर्म मे सावधान होओ।
तथा हे राजन् ! (मुनि कहते हैं -) अवधिज्ञान से जानकर मैं कहता हूँ कि तुम्हारा पुत्र कुशल है, उसका कुछ भी अमगल नही होगा। वह भावी तीर्थंकर है और कुछ ही दिनों में अनेक प्रकार की समृद्धिसहित आकर तुमसे मिलेगा।
इतना कहकर आशीर्वाद देकर मुनिराज आकाश मार्ग से विहार कर गये। मुनिराज के वचनो से राजा का चित्त शांत हुआ और धर्मध्यान मे विशेषरुप से उद्यमी हुआ।
❖ ❖ ❖ दूसरी ओर, जो दुष्ट देव अजितसेन राजकुमार का अपहरण कर ले गया था, उसने उन राजकुमार को मगरमच्छ से भरे हुए एक सरोवर मे फेंक दिया। परन्तु पुण्यप्रताप से राजकुमार किनारे आ गये। चारों ओर घोर जगल था। सिह, बाघ और हाथियोसे भरे हुए उस वनमे चलते-चलते वे एक सुन्दर पर्वत पर पहुँचे। वहाँ हिरण्य नामका एक देव रहता था, वह उनकी शूरवीरता देखकर प्रसन्न हुआ और बोला-हे पुण्यात्मा ! मै आपका सेवक हूँ, इसलिये आपसे कुछ माँगने के लिये तो कैसे कह सकता हूँ ? परन्तु जब आप याद करोगे तब मै आपकी सेवा मे उपस्थित होऊँगा. क्योकि पूर्वजन्म में आपने मुझ पर उपकार किया है।
‘किस प्रकार ?’ ऐसा राजकुमारके पूछने पर उस देवने कहा पूर्वभवमे मै सूर्य नामका किसान था, तब चन्द्र नामके किसानने मेरा धन चुरा लिया था, वह धन आपने मुझे वापिस दिलाया था और चन्द्र को मृत्युदण्ड दिया था। वह चन्द्र मरकर भवमे भटकते भटकते चण्डरुचि नामका असुर देव हुआ है, और वही पूर्व भव के बैर से आपका अपहरण करके आपको यहाँ लाया है। मै जो सूर्य नाम का किसान था वह अब हिरण्यदेव हुआ हूँ और अपने पर किये गये आपके उपकार का बदला देने आया हूँ। ऐसा कहकर, राजकुमार को उस वन के बाहर रखकर वह देव अदृश्य हो गया।
राजकुमारने आश्चर्यपूर्वक एक नगरी में प्रवेश किया; उसका नाम था विपुलनगरी; वहाँ के नगरजन धन-धान्यादि से सुखी थे, परन्तु एक शत्रु राजा के भयसे अत्यन्त भयभीत थे। अजितसेन राजकुमार ने उस राजा को पराजित करके उनके भयको निर्मूल कर दिया और वहाँ की राजकुमारी से विवाह करके अपनी कौशलनगरी लौट आये। प्रतापी पुत्र के पुनरागमन से माता-पिता को अपार हर्ष हुआ। स्नेहपूर्ण स्वागत करके भावी तीर्थराज उन राजकुमार का राज्याभिषेक भी कर दिया। उनके महान पुण्यप्रताप से कुछ काल पश्चात् उनके राजभण्डार में सुदर्शनचक्र तथा तलवार आदि सात अजीव रत्न प्रगट हुए, तथा सेनापति आदि सात जीवरत्न भी उन्हें प्राप्त हुए; इस प्रकार १४ रत्नधारी चक्रवर्ती पद प्राप्त हुआ; और धर्मकी आराधना के प्रताप से अब तीन भव के पश्चात् वे धर्मचक्री होंगे।
१४ रत्नों के उपरान्त नवनिधियाँ भी प्राप्त हुई थीं-जो उन्हें इच्छित सामग्री प्रदान करती थीं। इस प्रकार नवनिधि और १४ रत्न प्राप्त होने पर भी वे धर्मात्मा अपने चैतन्यनिधान में से प्राप्त सम्यक्त्वादि रत्नों के समक्ष उस बाह्यवैभवको तुच्छ समझते थे। वे चक्रवर्ती अजितसेन अपने बंधुजनों सहित प्रतिदिन धामधूमसे अरिहंत देव की पूजा करते और धातकी खण्ड द्वीप के भरतक्षेत्र का छह खंड का राज्य भी सँभालते थे। आश्चर्यजनक भी उनकी परिणति !
एक बार उन अजितसेन चक्रवर्ती की राजधानी कौशल (अयोध्या) नगरी में धर्मचक्री स्वयंप्रभतीर्थंकर का पदार्पण हुआ। ‘प्रभुजी पधारे हैं’ यह सुनते ही चक्रवर्ती को महान हर्षोल्लास हुआ और तुरन्त ही धामधूम से प्रभुदर्शन के लिये चल दिये। साक्षात् तीर्थंकर के दर्शन से भावी तीर्थंकर को कैसा आनन्द हुआ ? कि जैसा आनन्द स्वानुभूति में परमात्मा को देखने से धर्मात्मा को होता है। वैसा यद्यपि दो तीर्थंकरों का मिलन नहीं होता तथापि यहाँ तो, एक ‘भाव-तीर्थंकर’ और दूसरे ‘भावी तीर्थंकर’ (एक वर्तमान भावनिक्षेपरूप और दूसरे द्रव्यनिक्षेपरूप)-ऐसे दो तीर्थंकरों का मिलन हुआ। द्रव्यतीर्थंकर ने भावतीर्थंकर को वन्दन किया।
अहा, उन तीर्थंकररूप सर्वज्ञ परमात्मा की आराधना गणधर और इन्द्र भी करते थे; मनुष्यों के इन्द्र ऐसे चक्रवर्ती भी प्रभुके आराधक थे। वह देखकर लोग समझ जाते थे कि इन्द्रपद या चक्रवर्ती पद के वैभव की अपेक्षा से आत्मा के इस सर्वज्ञ पद का वैभव महान है। उस आत्मवैभव के समक्ष संसार के समस्त वैभव तुच्छ हैं।
अपने चरित्रनायक चक्रवर्ती अजितसेन तथा उनके पिता अजितंजय महाराज भी स्वयंप्रभ तीर्थंकर के दरबार मे प्रभुदर्शन करके जिनवाणी का श्रवण करने बैठे। तीन काल तीन लोक के समस्त पदार्थ जिनके ज्ञान में स्पष्ट झलक रहे हैं ऐसे उन परमात्मा की वाणी में तत्त्वों का अद्भुत स्वरूप आया; और सर्वतत्त्वों मे श्रेष्ठ शुद्धात्मा की अनुभूति ही जीव को मोक्षका कारण है-ऐसा उपदेश प्रभुने दिया।
पश्चात् राजा अजितंजयने हाथ जोड़कर पुछाः हे देव ! इस संसार मे जीव शुभाशुभकार्यों से क्यों बँधता है ? और उनसे कैसे छुटकारा होगा ?
भगवान ने आश्चर्यकारी दिव्यध्वनि द्वारा उसका उत्तर दिया; परन्तु विशेषता यह थी कि भगवान की दिव्य वाणी खिरने पर भी उनके ओष्ठ नहीं हिलते थे; सम्पूर्ण शरीर मे से कोई अद्भुत ध्वनि उठती थी। उसमें भगवान ने कहा-हे भव्य ! जीव का स्वभाव उपयोगमय है; उस उपयोग में क्रोध नहीं है, क्रोधकरनेका उसका स्वभाव नहीं है; तथापि जीव जो क्रोधादि कषायभाव करता है उसके कारण वह पुण्य-पापरूप कर्मोंसे बँधता है; फिर चाहे वह कषाय अशुभ हो या शुभ हो; उन कर्मों के द्वारा संसार भ्रमण करके जीव दुःखी होता है। और जब जैनधर्म पाकर वह उपयोग और क्रोध का भेदज्ञान करता है तब, क्रोध से भिन्न ऐसा शुद्ध उपयोग ही वह करता है; उस शुद्ध उपयोग द्वारा नवीन कर्मों का बंध नहीं होता और पुराने बँधे हुए कर्मों की निर्जरा हो जाती है इसलिये जीव मोक्षसुख प्राप्त करता है। इस प्रकार कषायों द्वारा जीव बँधता है और वीतरागी शुद्धोपयोग द्वारा वह मोक्ष प्राप्त करता है:-
जीव रागी बांधे कर्म को, वैराग्यगत मुक्ति लहे।
ये जिनप्रभु उपदेश है नहिं रक्त हो तू कर्म से।
कषाय और उपयोग की भिन्नता के भेदज्ञान द्वारा जीव को आत्मा के सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र होते हैं। भेदज्ञान होने के पश्चात् भी जब तक जीव स्त्री-पुत्र-परिवारादि के मोह मे फँसकर अव्रती रूप से रहता है तब तक वह सर्व कर्मों से छुटकर मोक्ष प्राप्त नहीं करता। इसलिये संसार-दुःख से भयभीत होने वाले मोक्षार्थी जीव को रत्नत्रयधर्म की पूर्ण आराधना कर्त्तव्य है। चारित्र रहित सम्यग्दर्शन, अथवा सम्यग्दर्शन रहित चारित्र, वह मोक्ष को नही साध सकता। सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र तीनों की सम्पूर्णता ही मोक्षको साधती है। इसलिये वह मुमुक्षु जीव का कर्त्तव्य है।
इस प्रकार जिनेन्द्र देव की वाणी में बँध का तथा मोक्ष का स्वरुप सुनकर, उन राजा अजितंजय का चित्त संसार से विरक्त हो गया; राजपाट छोड़कर उन्होंने साक्षात् मोक्षमार्गरुप श्रामण्य अंगीकार किया और शुद्धोपयोग मे लीन हो गये।
अपने चरित्रनायक चक्रवर्तीको सम्यग्दर्शन तो पहलेसे था; उनके परिणामों मे विशुद्धि हुई, उनका ज्ञानोद्यान खिल उठा; परन्तु चक्रवर्ती पद को छोड़कर वे मुनि नही हो सके। मुनिपद की भावना पूर्वक जिनदेव की वन्दना करके तथा अभी मुनि हुए अपने पिताश्री के चरणों की पूजा करके, भावि तीर्थंकर ऐसे उन चक्रवर्ती ने अपनी कौशलनगरी मे पुनः प्रवेश किया और राज्य का संचालन करने लगे। देश के समस्त राजा-महाराजा उनकी आज्ञाको शिरोधार्य करते थे; मात्र राजा ही नही, किन्तु छह खण्ड में रहनेवाले व्यंतर देवों को भी उन्होंने वश कर लिया था। यद्यपि हजारो देव उनकी सेवा करते थे परन्तु वे स्वयं तो “दास भगवन्तके उदास रहें जगत सो” ऐसा जीवन जीते थे। उन्हे चौदह रत्नोंकी नहीं, चौदह गुणस्थानोंकी इच्छा थी; नवनिधानों में उनका चित्त नहीं लगता था, उन्हे तो नव क्षायिकलब्धि की आकांक्षा थी।
[हम पढ़ रहे हैं चन्द्रप्रभ तीर्थंकर की कथा-और उसमें उनके चौथे भव के यह वर्णन चल रहा है-जिसमें वे अजितसेन नामके चक्रवर्ती हैं।]
भावी भगवान ऐसे वे अजितसेन चक्रवर्ती छह खण्ड की दिग्विजय करने पर भी अंतर में अपने अखण्ड चैतन्यतत्त्वको नहीं भूले थे। छह खण्ड की प्रजा के हृदय में बसने पर भी उनके हृदय में तो पंचपरमेष्ठीका ही निवास था… बाह्य में पंचेन्द्रिय-विषयोंकी पूर्णता होनेपर भी उनसे उनका चित्त विरक्त था, वह तो पंच परमपद की पूर्णता को साधने में अनुरक्त था। गृह-स्थ होने पर भी उनकी चेतना तो चैतन्यस्थ थी, इसलिये गृही होनेपर भी वे मोक्षमार्गी थे। अब मात्र तीन भव के पश्चात तो वे तीर्थंकर होकर सिद्धालय में पहुँचने वाले थे।
उन आत्म साधक धर्मात्माको चक्रवर्तीपद का अभिमान नहीं था; देव गुरु के प्रतिपरम विनय बहुमान उनके चित्तमें सदैव जागृत रहते थे। भोजन के समय महल से बाहर आकर प्रतिदिन मुनिवरोंकी प्रतीक्षा करते थे। एक बार अरिन्दम मुनिराज के पधारनेसे उन्हे भक्तिपूर्वक आहारदान दिया… वहाँ देवोंने रत्नवृष्टि आदि पंचाश्चर्य प्रगट किया।
राजसभा में चक्रवर्तीकी वैराग्य भावना
एक दिन चक्रवर्ती अजितसेन राजसभा में बैठे हैं; हजारो राजा मुकुट झुकाकर उनका अभिवादन कर रहे हैं; नगरजन भी उनके दर्शनों से प्रसन्न हो रहे हैं; तथापि चक्रवर्ती की दृष्टी इस राज्य से पार किसी अमूल्य निधान पर लगी है… उनके अंतर की गहराई में वैराग्य का चिन्तन चल रहा है की कब इससब उपाधिसे छूटकर निरुपाधि चैतन्य ध्यान में स्थिर होऊँ ! कब वनवासी मुनि होकर वीतराग भाव में विचरूँ !!
राजसभा व्यस्थित चल रही थी; इतने में राजाकी दृष्टी प्रांगण में एक भव्य हाथी पर पड़ी; उस विशालकाय हाथी को कुछ योद्धा अनेक प्रकारसे ताड़ना देकर युध्द की शिक्षा दे रहे थे। चारो ओर शस्त्रप्रहार की प्रतिकुलता के बीच किस प्रकार बहादुरीसे लड़ना वह सिखा रहे थे। वह देखकर राजा को लगा कि- अरे, इस दुःखमय संसार में चारो ओर की प्रतिकुलता में भी शूरवीरतापूर्वक आत्मसाधनमें किस प्रकार विजय प्राप्त करना - उसकी शिक्षा परमगुरु भव्य मुमुक्षुओंको देते हैं… और उसमें मुमुक्षुको आनन्द होता है। यह युध्द की शिक्षा हाथी को ताड़ना है। हाथी की वह ताड़ना देखकर राजा का चित्त संसार से अत्यन्त उदास हुआ। इतने में उस हाथी ने एक सिपाही को सूँढ़ में जकड़ लिया और पछाड़ पछाड़कर उसका चूरा कर दिया .. बस, जीवन की ऐसी क्षण भंगुरता देखकर और हाथी की ताड़ना देखकर महाराजा अजितसेन का चित्त अत्यन्त विरक्त हो उठा और वैराग्य से वे चिन्तवन करने लगे कि - अरे, यह संसार तो घोर दुःखोंसे भरे हुए गहरे कुएँ जैसा है; उसमें यह मनुष्य जीवन बिजली की चमक जैसा अस्थिर है। यह शरीर, धन, यौवन, परिवार या राज्य कोई जीव के साथ रहने वाले नहीं हैं; वे जीव के है ही नहीं, तथापि उनमें मोह कर-करके जीव संसार में फँसा रहता है। ’ आज यह करना है, कल वह करूँगा, फिर वह करना है. ’ इस प्रकार परायी चिन्ता में ने चिन्ता में वह मृत्यु को भुल जाता है कि मैं आज मरूँगा या कल मरूँगा !-
करिष्यामि करिष्यामि करिष्यामि इति चिन्तया !
मरिष्यामि मरिष्यामि मरिष्यामि इति विस्मृतम् !!
‘करूँगा .. करूँगा… करूँगा…’ ऐसी चिन्ता में लीन हुआ मूढ़ जीव 'मरूँगा… मरूँगा… मरूँगा… ’ यह बात तो भूल ही जाता है ! मानो मृत्यु कभी आना ही न हो - इस प्रकार निश्चिन्ततासे मुर्ख जीव बाह्य विषयों में लगा हुआ है और मनुष्य जीवन गवाँ रहा है।