चौबीस तीर्थंकर महापुराण (हरिलाल जैन) | Chaubis Tirthankar Mahapuran

चौबीस तीर्थंकर महापुराण

लेखक : ब्र. हरिलाल जैन, सोनगढ़ (सौराष्ट्र)
हिन्दी अनुवाद : मगनलाल जैन, ललितपुर
प्रकाशक : श्री कुन्दकुन्द कहान सत्साहित्य प्रकाशन संस्थान, आगरा
तृतीय संस्करण : ३ नवम्बर १९९४ (महावीर निर्वाणोत्सव)
पृष्ठ : ४९३

विषय-सूची

क्र. नाम पृष्ठ
१. भगवान ऋषभदेव (भाग १, २, ३, ४, ५, ६, ७) १
२. भगवान अजितनाथ ७३
३. भगवान संभवनाथ ७९
४. भगवान अभिनन्दन ८५
५. भगवान सुमतिनाथ ९०
६. भगवान पद्मप्रभ ९५
७. भगवान सुपार्श्वनाथ १०१
८. भगवान चन्द्रप्रभ (भाग १, २, ३, ४) १०८
९. भगवान सुविधिनाथ १४९
१०. भगवान शीतलनाथ १५६
११. भगवान श्रेयांसनाथ १६१
१२. भगवान वासुपूज्य १६८
१३. भगवान विमलनाथ १७८
१४. भगवान अनन्तनाथ १९०
१५. भगवान धर्मनाथ (भाग १, २) १९६
१६. भगवान शान्तिनाथ (भाग १, २, ३, ४, ५, ६) २१६
१७. भगवान कुन्थुनाथ २७४
१८. भगवान अरहनाथ २७८
१९. भगवान मल्लिनाथ (भाग १, २) २८२
२०. भगवान मुनिसुव्रत ३०३
२१. भगवान नमिनाथ ३०८
२२. भगवान नेमिनाथ (भाग १, २, ३, ४) ३१४
२३. भगवान पारसनाथ (भाग १, २, ३) ३६०
२४. भगवान महावीर (भाग १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९) ३९२

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१

भगवान ऋषभदेव (भाग १)

पू र्व भ व [१]

महाबल राजा का भव और जैनधर्म के संस्कार

भगवान श्री आदिनाथ तीर्थंकर को नमस्कार करके उनके दस अवतारो का पवित्र जीवनचरित्र प्रारम्भ होता है। अनादि स्वयंसिद्ध ऐसे इस लोक के बीच मध्यलोक है, असंख्यात द्वीप-समुद्रो से शोभायमान इस मध्यलोक के बीच मे जम्बूद्वीप है और जम्बूद्वीप के मध्य मे मेरुपर्वत शोभायमान है।

मेरुपर्वत के पूर्व और पश्चिम में ‘विदेहदेश’ है, वहाँ से मुनिवर कर्मरूपी मलिनता को नष्ट कर के सदा विदेह (देहरहित - सिद्ध) होते रहते हैं, इसलिये उसका ‘विदेह’ नाम सार्थक है। उन विदेहदेशो मे तीर्थंकर देव सदैव विद्यमान होते है, इसलिये वहाँ सदा जैनधर्म वर्तता है।

ऐसे पश्चिम-विदेह की एक अलकापुरी नामक नगरी में अतिबल नाम के विद्याधर राजा थे। एक दिन वैराग्य आने पर, अपने पुत्र महाबल राजा को राज्य सौंपकर उन्होंने जिन दीक्षा धारण कर ली।

यह ‘महाबल’ वही अपने चरित्रनायक ऋषभदेव का जीव राजा महाबल के चार मंत्री थे - महामति, सभिन्नमति, शतमति और स्वयंबुद्ध उनमें स्वयंबुद्ध मंत्री शुद्ध सम्यग्दृष्टि थे और शेष तीनो मंत्री मिथ्यादृष्टि थे।

एक दिन महाबल राजा के जन्मदिन का उत्सव मनाया जा रहा था। उस समय सभामण्डप में राजा को अति प्रसन्न देखकर महाबुद्धिमान स्वयंबुद्ध मंत्रीने उसे जैनधर्म का उपदेश दिया और कहा कि - ‘हे राजन् ! यह गजलक्ष्मी आदि वैभव तो मात्र पूर्व पुण्य का फल है, इह भव और पर भव मे आत्मा के हित हेतु आप जैनधर्म का सेवन करें।’

स्वयंबुद्ध मंत्री की यह बात सुनकर अन्य तीन मिथ्यादृष्टि मंत्रियों में से एकने कहा कि परलोकादिकुछ है ही नहीं; दूसरे ने कहा कि - आत्मा स्वतंत्र तत्त्व ही नहीं है, वह तो संयोगी क्षणिक वस्तु है; और तिसरे ने कहा कि - सारा जगत शून्यरूप है, आत्मा आदि कुछ है ही नहीं।

परन्तु स्वयंबुद्ध मंत्रीने अनेक युक्ति एवं दृष्टान्तों द्वारा आत्मा का अस्तित्व, परलोक का अस्तित्व, आत्मा के अच्छे-बुरे भावों का फल आदि सिद्ध कर दिया; और इस प्रकार जैनधर्म की अतिशय महिमा प्रगट की।

स्वयंबुद्ध के युक्तिपूर्ण वचनोंसे समस्त सभासदों को विश्वास हो गया कि जैनधर्म ही वास्तविक है। इसलिये सभाजनोंने तथा महाबल राजाने भी प्रसन्न होकर स्वयंबुद्ध मंत्री की प्रशंसा की।

एक बार वे स्वयंबुद्ध मंत्री मेरूपर्वत की यात्रा करने गये, वहाँ शाश्वत जिनमन्दिर देखकर उन्हे बडा आनन्द हुआ, और उनमें विराजमान रत्नमय जिनबिम्बो को नमस्कार करके पूजा की; फिर कुछ देर वहाँ बैठकर आत्मगुणों का चिंतन करने लगे। इतने मे दो मुनिवर वहाँ आये। वे युगंधर तीर्थंकर के समवसरणमे से आये थे। मंत्रीने अतिशय भक्ति से प्रणाम करके पूछा “हे भगवन ! आप अवधिज्ञानरूपी नेत्र द्वारा जगत को जाननेवाले हैं इसलिये मै अपने मन की बात आपसे पूछता हूँ। हे स्वामी ! कृपा करके बतलायें कि हमारे राजा महाबल भव्य है या अभव्य ? वे जिनेन्द्र देव द्वारा प्ररूपित सत्यमार्ग का सम्यक् श्रद्धान करेगे या नही ?”

मंत्री के इस प्रकार पूछने पर आदित्यगति नाम के अवधिज्ञानी मुनिराजने कहाँ ‘हे भव्य ! तुम्हारे राजा भव्य ही हैं, वे जैनधर्म का श्रद्धान करेगे, इतना ही नही, दसवे भव में वे तीर्थंकरपद प्राप्त करेंगे; इस जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र की आगामी चौबीसी मे वे ऋषभदेव नामके प्रथम तीर्थंकर होंगे।’

और हे मंत्री ! उनके पूर्वभवकी बात भी सुनो : 'इन राजा महाबल ने पूर्वभव में भोगो की इच्छा के साथ-साथ धर्म के बीज बोये थे। पूर्वभव मे वे विदेह क्षेत्र में जयवर्मा के नाम राजपुत्र थे। श्रीवर्मा उनका छोटा भाई था; वह श्रीवर्मा प्रजा में अत्यन्त प्रिय था, इसलिये राजा ने उसे राजपाट सौंप दिया और जयवर्मा बडा होने पर भी उनकी उपेक्षा की। इससे जयवर्मा एकदम विरक्त हो गया और अपने भाग्य को कोसते हुए स्वयंप्रभगुरु के निकट दीक्षा लेकर तप करने लगा। एकबार विद्याधर की विभूति देखकर उसने ऐसा निदान किया कि मुझे भी आगामी भव में विद्याधरों का ऐसा महान वैभव प्राप्त हो। वह ऐसा विचार कर रहा था इतने में एक भयंकर सर्प ने आकर उसे काट लिया, और भोग की इच्छापूर्वक मर कर यह महाबल विद्याधर हुआ है। पूर्व संस्कार के कारण वह अभी तक भोगों में आसक्त रहा है, परन्तु हे मंत्री ! अब तुम्हारा उपदेश सुनकर वह तुरन्त ही भोगोंसे विरक्त होगा।

‘और हे मंत्री ! सुनो ! आज ही तुम्हारे राजाने दो स्वप्न देखे हैं; पहले स्वप्न में उसने ऐसा देखा है कि तीन दुष्ट मंत्रियों ने उसे बलात्पूर्वक भारी कीचड़ में फँसा दिया है; परन्तु तुम उसे कीचड़ में से बाहर निकालते हो और सिंहासन पर बिठाकर उसका अभिषेक करते हो। दूसरे स्वप्न में राजाने अग्नि की तीव्र ज्योति को क्षण-क्षण क्षीण होते देखी है। यह दोनों स्वप्न देखकर वह राजा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है। कुछ पूछने से पूर्व ही तुम्हारे मुहँ से दोनों स्वप्न और उनका फल सुनकर वह राजा आश्चर्यचकित होगा और वह निस्सन्देह तुम्हारे वचनों को स्वीकार करके जैनधर्म में अतिशय प्रीति करेगा। उसने जो पहला स्वप्न देखा है वह उसके आगामी भवकी स्वर्गकी विभूति का सूचक है और दूसरा स्वप्न ऐसा सूचित करता है कि अब उसकी आयु एक मास की शेष है। इसलिये हे भद्र ! उसके कल्याणार्थ तुम शीघ्र प्रयत्न करो।’-ऐसा कहकर स्वयंबुद्ध मंत्री को आशीर्वाद देकर वे दोनों मुनिवरों आकाश मार्ग से विहार कर गये।

मुनिवरोंके वचन सुनकर स्वयंबुद्ध मंत्री शीघ्र ही महाबल राजा के पास आया। राजा स्वप्नों की ही चिन्ता ही मे था, इतने मे मंत्रीने उसके दोनो स्वप्न तथा उनके फल की बात कह सुनायी और जिनधर्म के सेवन का उपदेश दिया कि - हे राजन् ! जिनेन्द्रदेव द्वारा कहा हुआ धर्म ही समस्त दुःखों की परम्परा का छेदन करने वाला है, इसलिये उसीमें अपनी बुद्धि लगाओ और उसका पालन करो; क्योंकि अब आपकी आयु मात्र एक मास की शेष है।

स्वयंबुद्ध मंत्री की बात सुनकर राजाको आश्चर्य हुआ और अपनी एक मास आयु शेष जानकर उस बुद्धिमान राजाने धर्म भावना मे अपना चित्त लगाया। राज्य छोड़कर वह सिध्दकूट-चैत्यालय में पहुँचा और वहाँ सिध्द प्रतिमा का पूजन करके संन्यास धारण किया, स्वयंबुद्ध मंत्री को निर्यापक - आचार्य बनाकर प्रायोपगमन सन्यास धारण किया और सुखपूर्वक प्राण छोड़कर दूसरे ईशान स्वर्ग मे श्रीप्रभ विमान मे ललितांग नामक देव हुआ।

ऋषभदेव : अवतार दूसरा : ललितांगदेव

ऋषभदेव का जीव, महाबल राजा का भव पूर्ण करके ईशान स्वर्ग मे ललितांग देव हुआ। देवलोक की विभूति देखकर वह आश्चर्यचकित रह गया कि यह क्या ! मै कौन हूँ ! और यह सब कौन हैं जो मुझे नमस्कार कर रहे हैं ! क्षणभर वह विचार मे पड़ गया कि मै यहाँ कहाँ आ गया ? कहाँ से आ गया ? ऐसा चितवन करते ही उसे तत्क्षण अवधिज्ञान प्रगट हुआ और उसके द्वारा उसने अपना पूर्व भव तथा स्वयंबुद्धमंत्री आदि के प्रसंग जान लिये।

स्वर्ग में ललितांगदेव की जब अल्प पल्य की आयु शेष रही तब उसे स्वयंप्रभा नाम की एक देवी प्राप्त हुई; वह उसे अत्यन्त प्रिय थी। उसके साथ ललितांग कभी मेरु पर्वत के नंदनवन में, कभी विजयार्द्ध पर्वत पर, कभी रुचकगिरी-कुण्डलगिरि पर्वतों पर, कभी मानुषोत्तर पर्वत पर, तो कभी नन्दीश्वरद्वीप के रत्नमय जिनबिम्बों के दर्शन करने जाता था। इस प्रकार उसने स्वर्ग में दीर्घकाल व्यतीत किया!

एक बार अचानक ललितांगदेव के आभूषण निस्तेज हो गये, माला कुम्हला गई, उसके विमान के कल्पवृक्ष काँपने लगे। इन चिन्हों से अपना मरणकाल निकट जानकर वह देव भयभीत हो गया और शोक करने लगा; क्योंकि अभी उसे सम्यग्दर्शन नहीं हुआ था। तब स्वर्ग के अन्य देवों ने उसे धैर्य बँधाते हुए कहा कि हे देव ! पुण्य फलसे प्राप्त इस स्वर्ग के अभ्युदय में से जीव का पतन होना निश्चित ही है, इसलिये शोक न करो और धर्म में मन लगाओ; जीवको धर्म ही परम शरण है। देवों के समझाने से ललितांगने धैर्य धारण किया और धर्म में चित्त लगाया; पन्द्रह दिन तक उसने स्वर्ग की जिन प्रतिमाओं का पूजन किया और अंत समय में सावधान चित्तसे णमोकार मंत्र का उच्चारण करते-करते वह अदृश्य हो गया, उसका देह विलय हो गया।

(अब वज्रजंघ और श्रीमती के भव का सुन्दर वर्णन आयगा।)

* * * (३)

वज्रजंघ राजा और श्रीमती रानी

(मुनिवरों को आहारदान का आनन्दकारी प्रसंग)

इस जम्बूद्वीप के पूर्व-विदेह क्षेत्र में पुष्कलावती देश हैं; उसकी उत्पलखेटक नगरी में वज्रबाहु नाम का राजा था। ऋषभ देव का जीव स्वर्ग से ललितांग देव का भव पूर्ण करके राजा वज्रबाहु के घर उत्पन्न हुआ; उसका नाम ‘वज्रजंघ कुमार।’

ललितांगदेव की जो स्वयंप्रभा नाम की देवी थी, उसने भी स्वर्ग की आयु पूर्ण होने पर विदेहक्षेत्र की पुण्डरीकिणी नगरी के राजा वज्रदन्त चक्रवर्ती की पुत्री रूप में जन्म लिया। उसका नाम ‘श्रीमती।’

एक बार श्रीमती के दादा श्री यशोधर मुनिराज को केवलज्ञान हुआ, केवलज्ञान की पूजा हेतु देवों के विमान वहाँ से निकल रहे थे; उन देवविमानो को देखते ही श्रीमती को अपने पूर्व भव का स्मरण हो आया और बारम्बार ललितांगदेव का स्मरण करती हुई वह मूर्च्छित हो गई। पण्डिता नाम की चतुर धायमाताने उसे सचेत करके मूर्च्छा का कारण पूछा। श्रीमतीने उसे पूर्वभव का सब वृत्तांत सुनाया और अपने पूर्वभव सम्बन्धी एक चित्रपट बनाकर उसे देते हुए कहा कि हे सखी! इस चित्र के गूढ विषयको जो पहिचान ले उसे तू मेरे पूर्वभव का पति (ललितांग देव का जीव) समझना। धायमाता वह चित्र लेकर विदा हुई और जिनमन्दिर की चित्रशाला में उसे प्रदर्शित किया।

अब इसी बीच श्रीमती के पिता वज्रदन्त राजा को दो बधाइयाँ एक साथ प्राप्त हुई- एक उनके पिता यशोधर मुनिराज को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई उसकी; और दूसरी आयुधशाला में चक्ररत्न उत्पन्न हुआ वह; धर्मप्रेमी विवेकशील महाराजाने प्रथम केवलज्ञान की पूजा करने का निर्णय किया। जगत्गुरू यशोधर भगवान की महापूजा करके, वज्रदन्त राजाने उनके चरणोंमें नमन किया कि तुरन्त ही उन्हें अवधिज्ञान की प्राप्ति हुई। वह योग्य ही हैं, क्योंकि विशुद्ध परिणामों से की गई भक्ति क्यों फलीभूत नहीं होगी ? और वह क्या-क्या फल नहीं देगी ? उस अवधिज्ञानसे राजाने जान लिया कि पूर्वभवमें मैं अच्युत स्वर्ग का इन्द्र था, और मेरी यह पुत्री ललितांगदेवकी देवी थी।

नगर मे आकर उन चक्रवर्ती ने अपनी शोकमग्न पुत्री श्रीमती से कहा : हे पुत्री ! तु शोक न कर, सुन ! मै अवधिज्ञान द्वारा तेरे पति का सर्व वृत्तान्त कहता हूँ · पूर्वभवके तेरे पति (ललितांगदेव) भी इस विदेहक्षेत्र में ही अवतरित हुए हैं और वे मेरे भानजे होते है, तथा कुछ ही समय मे तेरे पति होंगे। और सुन ! पूर्व भव मे जब मै अच्युतेन्द्र था तब दो इन्द्र मेरे पास आये थे, तब तुम दोनो (ललितांग और स्वयंप्रभा) भी उनके साथ ही थे; उन इन्द्रो ने मुझसे युगधर स्वामी का चरित्र पूछा कि ‘हे देव ! हम दोनो ने युगधर तीर्थंकर के तीर्थ मे सम्यक्दर्शन प्राप्त किया है, इसलिये हमें उनका पूर्ण चरित्र जानने की इच्छा है वह कहो।’ उस समय मैने युगधर तीर्थंकर के पूर्व भवो का चरित्र कहा था · जिसे सुनकर अनेक जीवो को सम्यक्दर्शन प्राप्त हुआ था, तथा तुम दोनो को भी अतिशय धर्मप्रेम जागृत हुआ था। वहाँ हम सब देव स्वयंभूरमण तथा नन्दीश्वर, सुमेरु आदि के दर्शन करने जाते थे। वह सब भी तुझे याद होगा ।

श्रीमती ने कहा हाँ पिताजी, वह सब मेरे अंतर मे प्रत्यक्ष की भाँति प्रतिभासित हो रहा है।

वज्रदन्त राजाने कहा हे पुत्री ! वे ललितांग देव वज्रजंघ नामक राजकुमार हुए है, आज से तीसरे दिन तुझे उनका समागम होगा, और वे ही तेरे पति होगे।

एक ओर श्रीमती को राजाने उपरोक्त समाचार दिये, और दूसरी ओर उनकी सखी पण्डिता भी चित्रपट सम्बन्धी समाचार लेकर आ पहुँची। उसने कहा हे सखी, तेरा यह चित्रपट देखते ही वज्रजंघकुमार को सब परिचित लगा पूर्व भव के स्मरण से क्षणभर वे विचार मे पड गये उनकी आँखो से आँसू झरने लगे और वे मूर्च्छित हो गये। पश्चात अनेक उपाय करने पर उन्हे चेत आया और उन्होंने सारा वृत्तान्त कहा और अपना बनाया हुआ एक चित्रपट भी दिया। इतना कहकर पण्डिताने वज्रजंघ का दिया हुआ पूर्वभव का चित्रपट श्रीमती को दिया, जिस प्रकार भव्य जीव अध्यात्मशास्त्र को देखते ही प्रमुदित होते है, उसी प्रकार श्रीमती वह चित्रपट देखकर प्रमुदित हो उठी।

इतने मे राजा वज्रबाहु अपने पुत्र वज्रजंघसहित वहाँ आ पहुँचे, तब चक्रवर्तिने अपने बहनोई वज्रबाहु से सन्मानपूर्वक कहा कि आज आप पुत्रसहित मेरे घर पधारे इसलिये मेरा मन अति प्रसन्न हुआ है; मेरे घरमे जो वस्तु आपको उत्तम लगती हो उसे स्वीकार कीजिये।

तब वज्रबाहु ने कहा हे चक्रेश ! आपके प्रसाद से मेरे यहाँ सब कुछ हैं, तथापि आपका वात्सल्ययुत आग्रह है तो माँगता हूँ कि अपनी पुत्री-श्रीमती मेरे पुत्र-वज्रजंघ को दे दें। चक्रवर्ती ने प्रसन्नतापूर्वक वह बात स्वीकार कर ली और कहा · उन दोनों का स्नेह भी पूर्वभव से चला आ रहा हैं, इसलिये उनका विवाह सम्बन्ध योग्य ही है।

इस प्रकार उत्सवपूर्वक वज्रजंघ और श्रीमती का विवाह हुआ; पश्चात् अपना धार्मिक उत्साह प्रगट करने के लिये वज्रजंघकुमार श्रीमती सहित महापवित्र जिनमन्दिर गये और वहाँ विराजमान सुवर्णमयी जिन प्रतिमाओं का अभिषेक कर के अष्टद्रव्य से पूजा की तथा मुनिवरों के दर्शन किये। पश्चात् पुण्डरीकिणी नगरी में वापस आकर निवास किया। वहाँ बहुत समय तक चक्रवर्ती के भवन में रहने के बाद विदा लेकर वज्रजंघकुमार श्रीमती सहित अपने उत्पलखेटक नगर में आये। क्रमानुसार उनके ९८ पुत्र हुए।

एक दिन वज्रजंघ के पिता को ससार से वैराग्य उत्पन्न होने पर, अपने पुत्र वज्रजंघ का राज्याभिषेक करके स्वय जिनदीक्षा अंगीकार की, उस समय श्रीमती के ९८ पुत्रोंने भी अपने दादा के साथ दीक्षा ले ली .. इधर पुण्डरीकिणी नगरी मे श्रीमती के पिता वज्रदन्त चक्रवर्ती भी कमल मे मृत भ्रमर को देखकर ससार से विरक्त हो गये, और अमिततेज आदि पुत्रों को राज्य देने लगे, परन्तु उन पुत्रो को भी वैराग्य प्राप्त हो जाने से किसी ने राज्य का स्वीकार नही किया; इसलिये अन्त में पुण्डरीक नामक छोटी उम्र के पौत्र को राज्य भार सौंप कर वज्रदन्तचक्रवर्ती ने साठ हजार रानियों, बीम हजार राजा तथा एक हजार पुत्रों सहित जिन दीक्षा धारण कर ली।

यहाँ राजमाता लक्ष्मीमती को चिन्ता हुई कि पुण्डरीक तो अभी छोटा बालक हैं, वह इतने बड़े राज्य का भार कैसे सम्हाल सकेगा ? इसलिये उन्होने उत्पलखेटकनगर सन्देश भेजकर राजा वज्रजघ को सहायतार्थ बुलवाया। सन्देश मिलते ही राजा वज्रजघ पुण्डरीकिणी नगरी जाने के लिये तैयार हुए। (१) मतिवर मत्री, (२) आनन्द पुरोहित, (३) धनमित्र सेठ और (४) अकपन सेनापति - इन चारोने भी वज्रजंघराजा के माथ प्रस्थान किया। रानी श्रीमती भी साथ ही थी।

चलते - चलते राजा वज्रजघ एक सुन्दर सरोवर के तटपर आये और वहाँ पडाव डाला। भविष्य मे जो तीर्थंकर होने वाले है ऐसे वज्रजघ का डेरा होने से सारा वन भी मानों प्रफुल्लित हुआ हो ऐसा शोभायमान हो उठा। स्नानादि के पश्चात् सब भोजन की तैयारी कर रहे थे।

इतने में एक आनन्दकारी घटना हुई . क्या हुआ ? वह अब पढ़िये।

वज्रजंघ और श्रीमती द्वारा मुनिवरों को आहार दान

राजा वज्रजंघ और श्रीमती भोजन की तैयारी कर ही रहे थे कि इतने में अचानक दो गगनविहारी मुनिवर दमधर और सागरसेन वहाँ पधारे। अहा, मुनिवर पधारे मानों साक्षात् मोक्षमार्ग ही आगया ! आकाश से उतरते हुए मुनिवरों को देखकर ही राजा तथा मंत्री आदि सबको महान आनन्दाश्चर्य हुआ। अरे, वनके सिंह, बन्दर, शूकर और नेवला जैसे पशु भी मुनिराज को देखकर अति हर्षित हो उठे।

उन मुनिवरों की वनमे ही आहार लेने की प्रतिज्ञा थी। वे अत्यन्त तेजस्वी और पवित्रता से शोभायमान थे मानो स्वर्ग और मोक्ष यहीं पृथ्वीपर उतर आये हों ! दोनों मुनिवर डेरे के निकट आते ही राजा-रानीने अति आनंद एवं भक्ति सहित उनका पड़गाहन किया कि - हे स्वामी ! पधारो पधारो पधारो !

मुनिराज के रुकते ही वज्रजंघ और श्रीमती ने भक्तिपूर्वक उनकी प्रदक्षिणा की, नमस्कार करके सन्मान किया और योग्य विधिपूर्वक भोजनशाला में प्रवेश कराके उच्चासनपर बिठाया। उनके चरणों का प्रक्षालन, पूजन एवं नमन किया और पश्चात् मन-वचन-काया की शुद्धिपूर्वक दाता के सात गुण (श्रद्धा, संतोष, भक्ति आदि) सहित विशुद्ध परिणामों से उन उत्तम मुनिवरों को विधिपूर्वक आहारदान दिया (अभी उन्हें खबर नहीं है कि जिन्हे आहारदान दिया वे उनके अपने पुत्र ही थे।) मुनिराज को आहारदान का वह भव्य आनन्दकारी प्रसंग था।

उस उत्तम आहारदान के प्रभाव से तुरन्त ही वहाँ पाँच आश्चर्यजनक वस्तुएँ प्रगट हुई (१) आकाश से रत्नवृष्टि होने लगी; (२) पुष्पवर्षा होने लगी (३) सुगंध बरसने लगी, (४) दुंदुभि बाजे बजने लगे, और (५) आकाश मे देवगण ‘अहो दान महादान’ ऐसे शब्दपूर्वक जयजयकार करने लगे।

आहारदान के पश्चात् दोनो मुनिवरों को वन्दन और पूजन कर के जब वज्रजंघ उन्हे विदा करने लगे तब अंतःपुरकी दासीने कहा राजन् ! यह दोनो मुनिवर आपके सबसे छोटे पुत्र ही हैं। यह सुनकर ही वज्रजंघ और श्रीमती अति प्रेमपूर्वक उनके निकट गये और उनके धर्मश्रवण किया। फिर वज्रजंघने अपने और श्रीमती के पूर्व भव पूछे। मुनिवरा ने दोनो के पूर्वभव (ललितांग देव और स्वयंप्रभादेवी) का वर्णन किया।

तत्पश्चात् वज्रजंघने पुन पूछा - 'हे नाथ ! यह मतिवर मंत्री, आनन्द पुरोहित, धनमित्र सेठ और अकम्पन सेनापति यह चारों जीव मुझे भाई की तरह अत्यन्त प्रिय हैं, इसलिये कृपा करके आप उनके भी पूर्वभव कहे।

मुनिराजने कहा हे राजन् ! इन मतिवर मंत्री का जीव पूर्वभव में सिह था। एकवार प्रीतिवर्धन राजाने वन मे मुनि को आहार दान दिया, उसे देखकर सिह को जाति स्मरण हो गया, जिससे वह बिलकुल शांत हो गया और आहारादि का त्याग करके एक शिलापर जा बैठा। मुनिराजने अवधिज्ञान द्वारा वह जानकर प्रीतिवर्धन राजासे कहा हे राजन् ! यह सिह श्रावक के व्रत धारण करके संन्यास ले रहा है, तुम्हें इसकी सेवा करनी योग्य है; भविष्य में यह भरत क्षेत्र के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का पुत्र होगा और चक्रवर्ती होकर उसी भव में मोक्ष प्राप्त करेगा ! मुनिराज की बात सुनकर राजाने उस सिंह को प्रेम से देखा, और उसके कान में नमस्कार मंत्र सुनाया ! अठारह दिन की संलेखना के पश्चात् शरीर का त्याग करके वह सिंह दूसरे स्वर्ग का देव हुआ और वहाँ से चलकर यह मतिवर-मंत्री हुआ है।

तथा उस सिंह के अतिरिक्त प्रीतिवर्धन राजा के सेनापति, मंत्री और पुरोहित - इन तीनों ने भी आहारदान का अनुमोदन किया था, इसलिये वे भोगभूमि का अवतार करके बाद में दूसरे स्वर्ग के देव हुए। तुम्हारी (वज्रजंघकी) ललितांगदेव की पर्यायमे वे तीनों तुम्हारे ही परिवार के देव थे और वे ही यहाँ तुम्हारे पुरोहित, सेठ और सेनापति हुए हैं ! भविष्य में तुम तीर्थंकर होगे तब वे भी तुम्हारे पुत्र होकर मोक्ष प्राप्त करेंगे। उनमें से अकंपन सेनापति तो बाहुबली होंगे; आनन्द पुरोहित तथा धनमित्र सेठ दोनों वृषभसेन तथा अनंतविजय नामक पुत्र होकर तुम्हारे ही गणधर होंगे।

  • इस प्रकार उन मुनिवरों ने वज्रजंघ को उनके मंत्री, पुरोहित, सेठ और सेनापति के पूर्वभवों का सम्बन्ध सुनाया और मुनिराज के श्रीमुखसे अपना ऐसा महान भविष्य सुनकर उन सबको बड़ा हर्ष हुआ। जब वे मुनिवर यह सब वृत्तान्त कह रहे थे तब नेवला, सिंह, बन्दर और शूकर यह चार जीव वहीं समीप बैठे थे और शान्तिपूर्वक मुनिराज की ओर टकटकी बाँधे देख रहे थे। यह देखकर आश्चर्य से वज्रजंघ ने पूछा : हे स्वामी ! यह नेवला, सिंह, बन्दर और शूकर यह चार जीव यहाँ मनुष्यों के बीच भी निर्भयता से आपके मुखकमल की ओर दृष्टि लगाकर क्यों बैठे है ?

उसके उत्तर में श्रीमुनिराजने कहा : सुनो, हे राजन् ! यह सिंह आदि चारों जीव आहारदान देखकर परम हर्षित हो रहे हैं; वे भी भविष्य में तुम्हारे पुत्र होकर मोक्ष प्राप्त करेंगे।

० यह सिंह पूर्व भव में हस्तिनापुर में एक व्यापारी का पुत्र था, परन्तु तीव्र क्रोध के कारण मरकर सिंह हुआ है;

० यह शूकर पूर्वभव में एक राजपुत्र था, परन्तु तीव्र मानके कारण वह मरकर शूकर हुआ है;

० यह बन्दर पूर्व भव में एक वणिकपुत्र था, परंतु तीव्र माया के कारण मरकर बन्दर हुआ है;

० और यह नेवला पूर्व भव में एक हलवाई (मिष्टान्न-विक्रेता) था, परन्तु तीव्र लोभ के कारण मरकर नेवला हुआ है। कषायों के फल में ऐसी हलकी गतियाँ प्राप्त हुई हैं, इसलिये यह कषाय छोड़ने योग्य है।

इस समय यह सिंहादि चारों जीव आहारदान देखकर अति हर्षित हुए हैं और वे चारों को अपने पूर्वभव का जातिस्मरण हुआ है इसलिये वे संसार से एकदम विरक्त हो गये हैं, और निर्भय होकर धर्मश्रवण की इच्छा से यहाँ बैठे हैं। तुम दोनों ने आहारदान के फल में भोगभूमि की आयु का बंध किया है, और इन सिंहादि चारों जीवो ने भी आहारदान का अनुमोदन कर के तुम्हारे साथ ही भोगभूमि की आयु बाँधी है। हे राजन् ! अब यहाँ से आठवें भव में जब तुम ऋषभनाथ तीर्थंकर होकर मोक्ष प्राप्त करोगे तब यह चारों जीव भी उसी भव मे मोक्ष को प्राप्त होंगे। मोक्ष तक के सातों भव में यह सब जीव तुम्हारे साथ ही साथ रहेंगे। यह श्रीमती का जीव भी तुम्हारे तीर्थ में दानतीर्थ की प्रवृत्ति चलानेवाले श्रेयांसराजा होंगे और उसी भव मे मोक्ष प्राप्त करेंगे।

आकाशगामी चारणऋद्धिधारी मुनिवरों के यह वचन सुनकर राजा वज्रजंघ का शरीर हर्ष से रोमांचित हो गया, तथा श्रीमती रानी, मतिवर मंत्री एवं सिंहादि चारों जीवो को भी हार्दिक प्रसन्नता हुई, उन सब ने मुनिवरों के चरणों मे बारम्बार नमन किया। तत्पश्चात् आकाश ही जिनके वस्त्र है ऐसे वे निस्पृह मुनिवर तो आकाशमार्ग से अन्यत्र विहार कर गये।

[यहाँ जिज्ञासुओं को आगे चलकर इस कथा का सम्बन्ध समझने के लिए एक बात लक्ष में रखने योग्य है वज्रजंघ के साथ मुनियो को विधिपूर्वक आहारदान करने से श्रीमती को अतीव प्रसन्नता हुई, और उस आहारदान-प्रसंग के इतने दृढ़ संस्कार उसके आत्मा मे पड़ गये कि आगामी आठवें भव मे वज्रजंघ जब ऋषभदेव तीर्थंकर होंगे और मुनिदशा में एक वर्ष तक तपश्चर्या करेंगे, तब श्रीमती का जीव जोकि श्रेयांसराजा के रुप में जन्मा होगा, उसे ऋषभदेव भगवान को देखते ही सात भव पूर्व के (अर्थात् असंख्य वर्ष पहले के) इस आहारदान प्रसंग का स्मरण हो आयगा, और उसीपर से आहारदान की विधि जानकर वे विधिपूर्वक ऋषभदेव मुनिराज को सर्व प्रथम आहारदान देकर दान तीर्थ के प्रवर्तक होंगे।]

मुनिवर विहार कर जाने के पश्चात् राजा वज्रजंघ आदि अपने डेरे में लौटे और वह सारा दिन उन मुनिवरो के गुणों का ध्यान तथा उनकी चर्चा करने में सरोवर के किनारे बिताया। पश्चात् क्रमशः प्रयाण करते-करते वे पुण्डरीकिणी नगरी आ पहुँचे और वहाँ कुछ काल रहकर अपने भानजे पुण्डरीक का राज्य सुव्यवस्थित करके उत्पलखेट नगरी लौट आये।

वज्रजंघ और श्रीमतीका दीर्घकाल विविध भोगविलास में व्यतीत हो गया। आयु पूर्ण होने का समय निकट आ चुका है उसका भी उन्हे ध्यान नहीं रहा। एकबार वे शयनगृह में सो रहे थे; अनेक प्रकार के सुगंधित पदार्थ सुलग रहे थे कि अचानक बन्द शयनगार में धुएँ से उनका दम घुटने लगा और कुछ ही देर में मूर्च्छित होकर मृत्यु को प्राप्त हुए; यहाँ शास्त्रकार कहते है कि अरे, जो सुगंधित पदार्थ उनके भोगोपभोगका साधन था उन्हीं से ही उनका मृत्यु हुआ। उत्तम भोगवैभव को प्राप्त वज्रजंघ और श्रीमती की भी ऐसी शोचनीय दशा हुई। हे भव्य जीवो ! भोगों मे आसक्ति से जीवों की ऐसी दशा होती है तो फिर दुःखकारी ऐसे भोगों का क्या प्रयोजन है ? उन्हें छोड़कर जिनेन्द्रदेव के वीतराग-धर्म में ही प्रीती करो।

(वज्रजंघ और श्रीमती मरकर कहाँ उत्पन्न हुए - वह अब कहते हैं।)

ऋषभदेव का भोगभूमिका भव

उसमें सम्यक्त्व की प्राप्ति का अद्भुत आनन्दकारी प्रसंग

प्रिय पाठक ! अब अपनी कथा एक अत्यन्त सुन्दर रमणीक क्षेत्र में जाती है..कि जो क्षेत्र ऋषभदेव भगवान के सम्यक्त्व की जन्मभूमि हैं। ऋषभदेव का जीव वज्रजंघ का अवतार पूर्ण करके जहाँ अवतरित होता है और सम्यग्दर्शन प्राप्त करता है उस क्षेत्र का संक्षिप्त परिचय प्राप्त कर लें·-इस जम्बूद्वीप के बीच मेरुपर्वत है; उसकी उत्तर दिशा मे उत्तरकुरु नामक भोगभूमि है; वह भोगभूमि अपनी अपार शोभा द्वारा मानों स्वर्गशोभा की हँसी उड़ाती है। वहाँ भोजन, वस्त्र, आभूषण, दीपक, वाद्य आदि देनेवाले कल्पवृक्ष हैं, वे रत्नमय कल्पवृक्ष अपनी प्रभा द्वारा चारों ओर प्रकाश फैला रहे हैं। वे अनादिनिधन वृक्ष है, और उपरोक्त प्रकार के फल देना उनका स्वभाव ही है। जिस प्रकार आजकल के सामान्य वृक्ष समय पर अनेक प्रकार के फल देते हैं, उसी प्रकार वे कल्पवृक्ष भी दान के फल मे जीवो को अनेक प्रकार के फल देते हैं। वहाँ की भूमि रत्नों से निर्मित है। पूर्वभव में दान देनेवाले जीव ही वहाँ उत्पन्न होते हैं। वहाँ के जीव चक्रवर्ती की अपेक्षा से अधिक सुखी हैं।

अपने कथानायक वज्रजंघ और श्रीमती दोनों मरकर पात्रदान के प्रभाव से ऐसी पुण्यभूमि में अवतरित हुए; वज्रजंघ के साथ जिन्होंने आहारदान का अनुमोदन किया था वे चारों जीव-नेवला, सिंह, बन्दर और शूकर-भी आहारदान की अनुमोदना के प्रभाव से दिव्य मनुष्य शरीर पाकर, भद्रपरिणामी आर्य बनकर वहीं उत्पन्न हुए। मतिवर मंत्री, आनन्द पुरोहित, धनमित्र सेठ तथा अकंपन सेनापति वे चारों जीव वज्रजघ - श्रीमती की मृत्यु से वैराग्य प्राप्त करके मुनि हुए और रत्नत्रय की आराधना करके देवलोक में प्रथम ग्रैवेयक में अहमिन्द्र हुए।

भगवान ऋषभदेव के दस भवों की यह कथा चल रही है। पहले वह जीव महाबल राजा था; फिर ललितांगदेव हुआ; वहाँ से वज्रजंघ राजा के भव में श्रीमती सहित आहारदान दिया और अन्य चार तिर्यंच जीवों ने उसकी अनुमोदना की। आहारदान के प्रताप से वे छहों जीव भोगभूमि में अवतरित हुए; यहाँ तक अपनी कथा पहुँची है। अब, भोगभूमि में जो अति आनन्दकारी घटना हुई उसका रोमांचक वर्णन पढ़ेंगे।

ऋषभदेव भगवान के जीव को तथा साथ के पाँचों जीवों को भोगभूमि में सम्यक्त्व प्राप्ति का यह मंगल प्रसंग सोनगढ़के जिनमन्दिर में संगमरमर में उत्कीर्ण किया गया है, जो मुमुक्षुओं को सम्यक्त्व की प्रेरणा देता है। लेखक को भी पुराणों में यह प्रसंग अधिक प्रिय है और सम्यक्त्व की आराधना में प्रेरक हुआ है।

भोगभूमि में आर्य-दम्पति के रूप में उत्पन्न हुए वज्रजंघ और श्रीमती एक बार बैठे-बैठे कल्पवृक्षों की शोभा निहार रहे थे; इतने में आकाशमार्ग से जाते हुए सूर्यप्रभदेव का विमान देखकर उन दोनों को जातिस्मरण हो गया। जातिस्मरण द्वारा पूर्वभव जानकर वे वैराग्यपूर्वक संसार का स्वरूप विचारने लगे। उसी समय वज्रजंघ ने आकाश में दो मुनियों को देखा; और वे ऋद्धिधारी मुनिवर भी उसपर अनुग्रह करके आकाश से नीचे उतरे। उन्हें सन्मुख आता देखकर तुरन्त ही वज्रजंघ खड़े होकर विनय से उनका सत्कार करने लगा। सच ही है कि - पूर्व जन्म के संस्कार जीवों को हित कार्य में प्रेरित करते हैं। दोनों मुनिवरों के समक्ष अपनी पत्नी सहित खड़ा वज्रजंघ का जीव ऐसा शोभायमान हो रहा था जैसा सूर्य एवं प्रति सूर्य के समक्ष जैसे कमलिनी सहित प्रभात सुशोभित होता है। वज्रजंघ के जीव ने दोनों मुनिवरों के चरण में भक्तिपूर्वक अर्घ चढ़ाकर उन्हें नमस्कार किया; उस समय उसके नेत्रों से हर्षाश्रु बहकर मुनिराज के चरणों पर गिरने लगे, मानों नेत्रों द्वारा उन मुनिवरों का पादप्रक्षालन ही कर रहा हो! स्त्री सहित प्रणाम करते हुए आर्य वज्रजंघ को आशीर्वाद देकर वे दोनों मुनिवर यथाक्रम से योग्यस्थान पर बैठे।

मुनिवरों के दर्शन से अत्यन्त हर्षपूर्वक जिसका चित्त खिल उठा है ऐसे उन वज्रजंघ आर्य ने विनय से पूछा : हे प्रभो! आप हमारे परम हितैषी हैं; आपको देखते ही मेरे हृदय में सौहार्दभाव उमड़ रहा है, मेरा चित्त अति प्रसन्न हो रहा है, मुझे ऐसा लग रहा है जैसे आप मेरे पूर्वपरिचित बंधु हों! प्रभो! इस सबका क्या कारण है वह कृपा करके मुझे कहें।

श्री मुनिराज ने वज्रजंघ की जिज्ञासा पूर्ण करते हुए कहा - हे आर्य! तुम मुझे उस स्वयंबुद्ध मंत्री का जीव जानो कि जिसके द्वारा तुमने महाबल के भवमें पवित्र जैनधर्म का प्रतिबोध प्राप्त किया था। उस भव में तुम्हारी मृत्यु के बाद मैंने जिनदीक्षा धारण की थी और संन्यासपूर्वक शरीरका त्याग कर के सौधर्मस्वर्ग का देव हुआ था; तत्पश्चात् इस पृथ्वी लोक में विदेहक्षेत्र की पुण्डरीकिणी नगरी में प्रीतिकर नामक राजपुत्र हुआ और यह (दूसरे मुनि) प्रीतिदेव मेरे लघु भ्राता हैं। हम दोनों ने स्वयंप्रभजिनेन्द्र के समीप दीक्षा लेकर पवित्र तपोबल से अवधिज्ञान तथा आकाशगामिनी चारणऋद्धि प्राप्त की है। हे आर्य! हम दोनों ने अवधिज्ञानरूपी नेत्र से देखा कि तुम यहाँ भोगभूमि में उत्पन्न हुए हो; पूर्वभव में तुम हमारे परम मित्र थे इसलिए तुम्हें प्रतिबोधन हेतु हम यहाँ आये हैं।

श्री मुनिराज परम करुणा से कहते हैं - ‘हे भव्य! तुम पवित्र सम्यग्दर्शन के बिना मात्र पात्रदान के प्रभाव से ही यहाँ उत्पन्न हुए हो - यह बात निश्चय जानो। महाबल के भव में तुमने मुझसे तत्त्वज्ञान प्राप्त किया था, परन्तु उस काल भोगों की आकांक्षा के वश तुम दर्शनशुद्धि प्राप्त नहीं कर पाये थे। अब सर्वश्रेष्ठ तथा स्वर्ग-मोक्ष के सुख का मुख्य साधन ऐसा सम्यग्दर्शन देने की इच्छा से हम यहाँ आये हैं; इसलिये हे आर्य! आज ही तुम सम्यग्दर्शन ग्रहण करो!’ अहा, मुनिराज के श्रीमुख से परम अनुग्रह भरे यह वचन सुनकर वज्रजंघ का आत्मा कितना प्रसन्न हुआ होगा!

प्रीतिंकर मुनिराज परम अनुग्रह पूर्वक वज्रजंघ के आत्मा को सम्यग्दर्शन अंगीकार कराते हुए कहते हैं कि हे आर्य ! तुम इसी क्षण ही सम्यग्दर्शन ग्रहण करो. तुम्हारे लिये यह सम्यक्त्व के लाभ का काल है। -‘तद्गृहाणाद्य सम्यक्त्वं तल्लाभे काल एव ते।’

देशनालब्धि आदि बहिरंगकारण और करणलब्धिरूप अंतरंगकारण द्वारा भव्य जीव दर्शनविशुद्धि प्राप्त करते हैं। सर्वज्ञकथित जीवादि सात तत्त्वों का यथार्थ श्रद्धान करना सो सम्यग्दर्शन है। निःशंकता, वात्सल्य आदि आठ अंगरूपी किरणों से-सम्यग्दर्शन रूपी रत्न अत्यन्त सुशोभित होता है। हे भव्य !

(१) तुम इस श्रेष्ठ जैनमार्ग को जानकर, मार्ग सम्बन्धी शंका को छोड़ो। (२) भोगों की आकांक्षा दूर करो; धर्म के फल में भोगों की चाह मत करो। (३) वस्तुधर्म के ओर की ग्लानि छोड़ो; देह की मलिनता देखकर धर्म के प्रति अरुचि न करो। (४) अमूढ़दृष्टि (विवेक दृष्टि) प्रगट करो; सत्य तत्त्वो को परीक्षापूर्वक पहिचानो। (५) धर्मात्मा सम्बन्धी दोष के स्थान छिपाकर सत्य धर्म की वृद्धि करो। (६) मार्ग से विचलित होते आत्मा को उपदेशादि द्वारा धर्म में स्थिर करो। (७) रत्नत्रय धर्म में और धर्मात्माओं में अत्यन्त प्रीतिरूप वात्सल्य करो। (८) ज्ञान की उत्कृष्ट भावना द्वारा जैनशासन की प्रभावना करो।

इस प्रकार आठ अंगों से सुशोभित ऐसे विशुद्ध सम्यक्त्व को तुम धारण करो। हे आर्य ! इस सम्यग्दर्शन को ही तुम धर्म का सर्वस्व जानो। सर्व सुखों का कारण सम्यग्दर्शन है। इस संसार में वही पुरुष श्रेष्ठ है…वही ही कृतार्थ है ..और वही ही मुमुक्षु है…कि जिसके हृदय में निर्दोष सम्यग्दर्शन प्रकाशमान है। हे भव्य ! तुम इस सम्यग्दर्शन को ही सिद्धिप्रासाद का प्रथम सोपान जानो, मोक्षमहल की प्रथम सीढ़ी सम्यग्दर्शन ही है; वह दुर्गति को रोकनेवाला है, वही धर्म के वृक्ष की जड़ है; वही स्वर्ग और मोक्ष का द्वार है, तथा वही ही सारभूत रत्न है। हे भव्य ! ऐसे सम्यग्दर्शन को तुम अपने आत्मा में धारण करो..आज ही धारण करो…हम तुम्हें सम्यक्त्व प्राप्त कराने के लिये ही यहाँ आये हैं। उसका अभी अवसर है।

अहा ! इस सम्यग्दर्शन के सम्बन्ध में अधिक क्या कहें ? उसकी तो इतनी ही प्रशंसा बस है कि जीव को सम्यग्दर्शन प्राप्त होने पर अनंतकाल के संसार का भी अंत आ जाता है, और वह मोक्षसुख को प्राप्त होता है। इसलिये हे आर्य ! लोकमूढ़ता, गुरुमूढ़ता और देवमूढ़ता का परित्याग करके तुम सम्यग्दर्शन की उज्ज्वलता को धारण करो। सम्यग्दर्शन रूपी तलवार द्वारा संसाररूपी बेल को काट दो। तुम निकट भव्य हो और भविष्यकाल में तीर्थंकर होनेवाले हो; हे भव्य ! अरिहंतदेव के वचनानुसार हमने यह सम्यग्दर्शन की देशना दी है, वह श्रेय की प्राप्ति हेतु तुम्हें अवश्य ग्रहण करने योग्य है। इस प्रकार आर्य वज्रजंघको प्रतिबोध देने के पश्चात वे मुनिराज आर्या श्रीमती को सम्बोधित करके इस प्रकार कहने लगे :

हे अम्बा ! हे माता ! तुम भी संसार समुद्र से पार होने के लिये नौका समान ऐसे यह सम्यग्दर्शन को अतिशीघ्रता से ग्रहण करो। इस स्त्रीपर्याय में भी तुम अविलम्ब सम्यग्दर्शन को धारण करो। सम्यग्दर्शन होने के पश्चात् जीव का स्त्रीपर्याय में अवतार नहीं होता, तथा निचले छह नरकों में, वैमानिक से हलके देवों में अथवा अन्य किसी नीच पर्याय में वह उत्पन्न नहीं होता। हे माता ! अब तुम निर्दोष सम्यग्दर्शन की आराधना करो और उसकी आराधना द्वारा इस स्त्रीपर्याय का छेदन करके अनुक्रम से मोक्ष तक के परमस्थानों को प्राप्त करो। तुम दोनों छह उत्तम भवों को धारण करके ध्यानरूपी अग्नि द्वारा समस्त कर्मों को भस्म करके परम सिद्धपद प्राप्त करोगे।

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भगवान ऋषभदेव (भाग २)

इस प्रकार प्रीतिकर आचार्य के वचनो को प्रमाण करके आर्य वज्रजंघ ने अपनी पत्नी के साथ प्रसन्न चित्त से सम्यग्दर्शन धारण किया; उसने अंतर्मुख होकर अपने परमात्मतत्त्व का अवलोकन किया; राग से पार शांतरसमय ज्ञानधारा का वेदन किया; क्षणभर उसका उपयोग सर्व विकल्पों से रहित होकर आत्मा में ही स्थिर हो गया। परमानन्दमय आत्मानुभूति हुई। इस प्रकार वह वज्रजंघ का जीव अपनी प्रिया के साथ सम्यग्दर्शन प्राप्त करके अत्यन्त तृप्त हुआ; ठीक ही है, - अपूर्व वस्तु का लाभ प्राणियों को महान सन्तोष का कारण होता ही है। वह वज्रजंघ का जीव जैन सिद्धान्तरूपी सूत्र में पिरोयी हुई मनोहर सम्यग्दर्शनरूपी माला पहिनकर मोक्षरूपी राजसम्पदा के युवराज पद पर विराजमान हुआ; तथा विशुद्ध पुरुष पर्याय पाकर मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा करती हुई सती आर्या भी सम्यक्त्व की प्राप्ति से अति संतुष्ट हुई। पहले कभी जिनकी प्राप्ति नहीं हुई थी ऐसे सम्यग्दर्शनरूपी रसायन का आस्वादन करके (चैतन्य के अतीन्द्रिय आनन्द का अनुभव करके) वह दम्पति कर्म-विनाशक ऐसे जैनधर्म में अति दृढ़ता को प्राप्त हुआ।

इस प्रकार ऋषभदेव के आत्माने पूर्व सातवे भव में भोगभूमि में सम्यक्त्व प्राप्त किया . भविष्य में भरतक्षेत्र के आदि तीर्थंकर होकर जो धर्मतीर्थ का प्रारम्भ करनेवाले हैं ऐसे आदिनाथ प्रभुके आत्मा मे धर्म का आदि हुआ। उन धर्म का प्रारम्भ करनेवाले धर्मात्मा को नमस्कार हो।

वज्रजंघ और श्रीमती के साथ-साथ सिह, बन्दर, नेवला और शूकर यह चारों जीव (जिनका वर्णन पहले आ चुका है) आहारदान का अनुमोदन करके उनके साथ ही भोगभूमि में उत्पन्न हुए थे वे भी गुरुदेव प्रीतिकर मुनिराज के चरणकमल का आश्रय लेकर सम्यग्दर्शन रुपी अमृत को प्राप्त हुए। आनन्दसूचक चिन्हों द्वारा जिसने अपने मनोरथ की सिद्धि प्रगट की है ऐसे उस दम्पति को वे दोनों मुनिवर बड़ी देर तक धर्मस्नेह से बारम्बार देख रहे थे - कृपादृष्टि कर रहे थे, और वह वज्रजंघ का जीव पूर्वभव के प्रेम के कारण टकटकी बांधकर श्री प्रीतिकर मुनिराज की मुखमुद्रा को निहार रहा था और उनके क्षणभर के स्पर्श से अत्यन्त प्रसन्न हो रहा था।

इस प्रकार उन दोनों मुनि भगवन्तों ने परम अनुग्रहपूर्वक वज्रजंघ आदि जीवों को प्रतिबोधकर अपूर्व सम्यग्दर्शन प्राप्त कराया। तत्पश्चात् वे दोनों मुनिवर अपने योग्य देश में जाने के लिए तैयार हुए तब वज्रजंघ ने उन्हें प्रणाम किया और परम भक्तिपूर्वक कुछ दूर तक उनके पीछे-पीछे गया.. जाते-जाते दोनों मुनिवरों ने उसे आशीर्वाद देकर कहा कि हे आर्य ! धर्म की वृद्धि हो…तुम इस सम्यग्दर्शनरूपी सत्यधर्म का सदा अखण्ड पालन करना। इतना कहकर दोनों गगनविहारी मुनिवर आकाशमार्ग में अन्तर्हित हो गये।

आर्य वज्रजंघ उन मुनिवरों को जाता देखकर क्षणभर तो अति उत्कंठित हो गया। उसका मन आर्द्र हो उठा और वह विचार करने लगा कि - अहा ! कैसा आश्चर्य है कि साधुपुरुषों का क्षणभर का समागम हृदय के सन्ताप को दूर कर देता है, परमानन्द की वृद्धि करता है और मन की वृत्ति सन्तुष्ट हो जाती है। उन साधु पुरुषों ने मोक्षमार्ग की साधना में ही सदा अपनी बुद्धि को लगाया है; लोगों को प्रसन्न करने का कोई प्रयोजन उनको नहीं रहा। महापुरुषों का यह स्वभाव ही है कि मात्र अनुग्रह बुद्धि से भव्य जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं। अहा ! मेरा धन्य भाग्य कि मुनि भगवन्त मुझ पर अनुग्रह करके यहाँ पधारे और मुझे सम्यक्त्व दिया। कहाँ वे अत्यन्त निस्पृह साधु ! और कहाँ हम ! कहाँ उनका विदेहधाम ! और कहाँ हमारी यह भोगभूमि ! उन निःस्पृह मुनिवरों ने यहाँ पधारकर हम पर महान उपकार किया है।

जिस प्रकार इन चारणऋद्धिधारी मुनिवरों ने दूर देश से आकर हमें धर्म का प्राप्ति करायी और महान उपकार किया, उसी प्रकार महापुरुष धर्मप्राप्ति द्वारा दूसरों का उपकार करने में सदा तत्पर रहते हैं। तप से जिनका शरीर कृश हो गया है ऐसे वे दोनों तेजस्वी मुनि भगवन्त अब भी मेरी दृष्टि के समक्ष तैर रहे हैं, मानों अब भी वे मेरे सम्मुख खड़े हैं…मैं उनके चरणकमल मे नमन कर रहा हूँ और वे दोनों मुनिवर अपना कोमल हाथ मेरे मस्तक पर रखकर मुझे स्नेहसिक्त कर रहे हैं। अहा ! उन मुनिवरों ने मुझ धर्मपिपासु को सम्यग्दर्शनरूपी अमृत का पान कराया है; जिससे मेरा मन अत्यन्त ही संतापरहित एवं प्रसन्न हो रहा है।

भगवान ऋषभदेव का जीव आर्य वज्रजंघ उन प्रीतिंकर मुनिराज के महान उपकार का पुनः पुनः चिंतवन करता है कि - अहा, वे प्रीतिंकर नामक बड़े मुनिराज वास्तव में ‘प्रीतिंकर’ ही हैं; इसीलिये तो दूर देशान्तर से आकर तथा सम्यग्दर्शन का उपदेश देकर हमारे ऊपर अपार स्नेह बरसाया है। वे महाबल के भव में भी मेरे स्वयंबुद्ध नाम के गुरु थे और आज इस भव में भी मुझे सम्यग्दर्शन देकर वे मेरे विशेष गुरु हुए हैं…संसार में ऐसे गुरुओं की संगति न हो तो गुणों की प्राप्ति भी नहीं हो सकती, और सम्यग्दर्शनादि गुणों की प्राप्ति के बिना जीव का जन्म भी सफल नहीं होता। धन्य हैं जगत में ऐसे गुरुओं को कि जिनकी संगति से भव्य जीवों को सम्यग्दर्शनादि गुणों की प्राप्ति होती है। जिस प्रकार जहाज के बिना समुद्र को पार नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार गुरु के उपदेश बिना संसार समुद्र से पार नहीं हो सकते। इस संसार में भाई और गुरु यह दो पदार्थ मनुष्यों को प्रीति का कारण हैं; परन्तु उनमें भाई तो मात्र इस लोक में ही प्रीति उत्पन्न कराता है जब कि गुरु तो इहलोक तथा परलोक दोनों में प्रीति उत्पन्न कराते हैं। जब गुरु के उपदेश से ही हमें यह सम्यग्दर्शनादि की विशुद्धि प्राप्त हुई है, इसलिये हमारी भावना है कि जन्मांतरों में भी गुरुदेव के चरणों में हमारी भक्ति बनी रहे। - इस प्रकार गुरु के उपकार का चिंतन करते - करते वज्रजंघ की सम्यक्त्व-भावना अत्यन्त दृढ़ हो गई। यही भावना भविष्य में उसे कल्पतरु समान समस्त इष्टफल प्राप्त करायेगी। वज्रजंघकी भाँति श्रीमती के जीवने भी सम्यक्त्व भावना को दृढ़ किया। उन पति-पत्नी का स्वभाव एक-सा था; प्रीतिंकर मुनिराज के उपदेश से सम्यक्त्व पाकर उन दोनों ने भोगभूमि की शेष आयु सुखपूर्वक समाप्त की और आयु पूर्ण होने पर प्राण त्याग कर दोनों ईशान स्वर्ग में उत्पन्न हुए।

(५)

दूसरे स्वर्ग में श्रीधर देव

भोगभूमि की आयु पूर्ण होने पर हमारे चरित्र नायक ऋषभदेव का जीव (वह आर्य) ईशान स्वर्ग के श्रीप्रभविमान में श्रीधर नामक देव हुआ; और आर्या श्रीमती (भावी श्रेय ंसकुमार) का जीव भी सम्यग्दर्शन के प्रभाव से स्त्रीपर्याय का छेद करके उसी ईशान स्वर्ग के स्वयंप्रभ विमान में स्वयंप्रभ नामक देव हुआ। सिंह, नेवला, बन्दर और शूकर यह चारों जीव भी भोगभूमि की आयु पूर्ण करके उसी ईशान स्वर्ग में महान ऋद्धिधारक देव हुए। उनके नाम - चित्रंगद, मणिकुण्डल, मनोहर और मनोरथ। (यह चारों जीव अगले भवों में भी ऋषभदेव के साथ ही रहेंगे और उनके पुत्र होकर मोक्ष प्राप्त करेंगे। बन्दर का जीव उनका गणधर होगा।) महान ऋद्धिधारी श्रीधरदेव अपने विमान मे जिनपूजा, तीर्थंकरों के कल्याणक आदि अनेक उत्सव मनाता हुआ प्रसन्न चित्त से सम्यग्दर्शनसहित धर्मसाधना करता था।

एक दिन अवधिज्ञान से श्रीधर देव को ज्ञात हुआ कि हमारे गुरु श्री प्रीतिंकर मुनिराज इस समय विदेह क्षेत्रमें विराजमान है और उन्हें केवलज्ञान प्रगट हुआ है। अहो ! भोगभूमि मे आकर हमे सम्यक्त्व की प्राप्ति करानेवाले वे प्रीतिंकर मुनिराज हमारे महान उपकारी है, आज वे केवलज्ञान प्राप्त करके सर्वज्ञ हो गये, अरिहंत बन गये, धन्य उनका अवतार ! हम भी आत्मसाधना पूर्ण करके कब केवलज्ञान प्राप्त करेंगे !! इस प्रकार श्रीधर देवने अत्यन्त भक्तिपूर्वक प्रीतिंकर केवली को नमस्कार किया, और स्वर्ग की दैवी सामग्रीसहित विदेह मे जाकर उनकी पूजा की, तथा उनकी दिव्यध्वनि मे धर्मका स्वरुप सुनकर अपने मन की बात पूछी :-हे प्रभो ! महाबल राजा के भव में मेरे चार मंत्री थे; उनमें एक आप (स्वयंबुद्ध मंत्री) सम्यग्दृष्टि थे और आपने मुझे जैनधर्म का बोध दिया था; अन्य तीनो मंत्री मिथ्यादृष्टि थे, वे इस समय कहाँ है ?

सर्वज्ञदेव की वाणी मे आया - हे भव्य ! जब तुम महाबल का शरीर छोड़कर स्वर्ग में चले गये तब मैंने (स्वयबुद्ध मंत्री ने) तो वैराग्य से रत्नत्रय प्रगट करके जिनदीक्षा धारण कर ली, और वे तीनों दुर्मति मंत्री कुमरण करके दुर्गति को प्राप्त हुए। उनमें से महामति और संभिन्नमति - यह दोनों तो अत्यन्त हीन ऐसी निगोद दशा को प्राप्त हुए हैं, वे अति गाढ़ अज्ञान अंधकार से घिरे हुए हैं और अत्यन्त तप्त उबलते हुए पानी में उठते बुलबुलों की तरह अनेक बार जन्म-मरण करते रहते हैं। तीसरा शतमति मंत्री अपने मिथ्यात्व के कारण इस समय नरक में है, और वहाँ महान दुःख भोग रहा है।

नरक गति के घोर दुःखों का वर्णन

नरक के घोर दुःखों का वर्णन करते हुए श्री प्रीतिकर प्रभु कहते हैं कि - हे भव्य ! तुम्हारे शतबुद्धि मंत्री का जीव धर्म की तीव्र विराधना के कारण दूसरे नरक में अत्यन्त भयंकर दुःख भोग रहा है। उसने स्वयं किये अनर्थों का यह फल है। यह निर्विवादरूप से प्रसिद्ध है कि धर्म से सुख की प्राप्ति होती है और अधर्म से दुःख मिलता है; इसलिये बुद्धिमान जीव अनर्थों को छोड़कर धर्म में तत्पर होते हैं। प्राणीदया, सत्य, क्षमा, निर्लोभता, तृष्णाह्रासपना तथा ज्ञान-वैराग्य वह धर्म है; उससे विपरीत अधर्म है। पापकर्म का फल अत्यन्त कटु है। नरक में पड़ा हुआ जीव वहाँ क्षणभर भी दुःखसे छुटकारा नहीं पाता, उसे एक पल भी शांति नहीं मिलती।

जो जीव हिंसा, झूठ, चोरी, परस्त्रीरमण और परिग्रह आदि पापकार्यों में तत्पर हैं, जो शराब पीता है, जो मिथ्यामार्ग का सेवन करता है, जो क्रूर है, रौद्रध्यान में तत्पर है, प्राणियों के प्रति निर्दय है, अति आरम्भ-परिग्रह रखता है, धर्म के प्रति जिसकी द्वेषबुद्धि है और अधर्म में प्रीति रखता है, देव-गुरु की निन्दा करता है, धर्म सेवन करनेवाले जीवों के प्रति अकारण ही क्रोध करता है, जो अत्यन्त पापी है और मधुमास - अण्डे खाने में तत्पर है - ऐसे जीव तीव्र पाप के भार से नरक में गिरते हैं। नरक सात हैं - पहला रत्नप्रभा फिर शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, पंकप्रभा, धूमप्रभा, तमःप्रभा और सातवीं महातमःप्रभा। - यह सात नरकभूमियाँ नीचे-नीचे हैं। असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीव प्रथम नरक तक जाते हैं; सरकनेवाले जीव (गोह आदि) दूसरे नरक तक, पक्षी तीसरे तक, सर्प चौथे तक, सिंह पाँचवें तक, स्त्री छठवें तक और तीव्र पापी मनुष्य तथा मच्छ सातवें नरक तक जाते हैं। उन नरकों में पापी जीव मधु के छत्ते की भाँति ऊपर लटकते हुए निकृष्ट स्थान में औंधे मुँह उत्पन्न होते हैं; - पापी जीवों का ऊर्ध्वमुख कहाँ से होगा ? पाप के उदय से वह जीव अन्तर्मुहूर्त में दुर्गन्धित, घृणित, कुरूप और बेडौल आकार का शरीर रचता है और फिर वृक्ष से टूटे हुए पत्ते की भाँति वह नारकी जीव अत्यन्त कर्कश एवं धधकती हुई नरक भूमिपर उलटे मुँह गिरता है। गिरते ही उसका शरीर छिन्नभिन्न हो जाता है - कहीं हाथ, कहीं पैर, कहीं मुँह, इस प्रकार सब बिखर जाते हैं, इसलिये महान पीडासे दुःखी होकर वह जीव चीत्कार करता है। वहाँ की भूमि की अपार उष्णता से तप्त हुआ वह जीव व्याकुलता से गिरते ही खौलती हुई कड़ाही में भरे हुए तेल की भाँति उछलता है और फिर नीचे गिरता है। गिरते ही महान क्रोधी अन्य नारकी जीव उसे खूब मारते-पीटते हैं और उसके शरीर के टुकड़े - टुकड़े कर देते हैं। उस नारकी का शरीर शस्त्रों के प्रहार से छिन्नभिन्न होकर बिखर जाता है और क्षणभर में फिर जुड़ जाता है।

शतमुख मंत्री का जीव धर्म की निन्दा के फल में जो दुःख भोग रहा है उन नारकी के दुःखों का वर्णन करते हुए श्री प्रीतिंकर भगवान कहते हैं कि - वे नारकी पूर्व बैर का स्मरण कर - करके परस्पर लड़ते हैं; तीसरे नरक तक असुर कुमार जाति के क्रूर देव उन नारकियों को पूर्व वैर का स्मरण करवाते हैं और परस्पर लड़ने-झगड़ने के लिये उकसाते हैं। कुछ नारकियों को उबलते हुए ताँबे का रस पिलाते हैं, कुछ नारकियों के टुकड़े करके उन्हें कोल्हू में तिल्ली की भाँति पेल देते हैं और कितनों को कड़ाही में उबालकर उनका रस बना देते हैं; पहले जो जीव मांसभक्षी थे उनके शरीर में से टुकड़े काट-काट कर उन्हें जबरन् खिलाते हैं तथा साँडसी द्वारा उनका मुँह फाड़कर जबरन् उन्हें लोहे के धधकते हुए गोले खिलाते हैं। पूर्व में जो परस्त्री में रत थे उन नारकियों को धधकती हुई लोहे की पुतली के साथ आलिंगन कराते हैं, जिसका स्पर्श होते ही वे सुलग उठते हैं, उनकी आँखे फट जाती हैं और मूर्च्छित होकर वे धरती पर लुढ़क जाते हैं। तुरन्त दूसरे नारकी धधकते हुए लोहे के चाबुकसे उन्हें मारते हैं। अरे ! जीव नरक में ऐसी घोरातिघोर पीड़ा अधर्म के सेवन से भोगते हैं।

वहाँ काँटों से भरे हुए धधकते लोहे के वृक्ष (सेमलवृक्ष) पर नारकियों को जबरन् चढ़ाते हैं; फिर उन्हें ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर घसीटते हैं, जिससे उनका सारा शरीर छिल जाता है; किन्हीं नारकियों को दुर्गन्धित रससे भरी हुई नदी में फेंकते हैं, उसमें उनका शरीर गल जाता है। किन्हीं नारकियों को अग्निशैया पर सुलाते हैं। वहाँ की गरमी से तप्त दुःखी नारकी जहाँ असिपत्र के वनमें आश्रय लेने जाता है वहाँ अग्नि बरसती हुई गर्म हवा चलती है और तलवार की तीक्ष्ण धार जैसे पत्ते उसके ऊपर गिरते हैं जो उसके शरीर को चीर डालते हैं। वह बेचारा दीन नारकी दुःखी होकर चीत्कार करता है, परन्तु वहाँ कौन उसकी पुकार सुने ?

उस नारकी को दूसरे नारकी लोहे की सलाखों से बाँधकर अग्नि में सेंक डालते हैं; पहाड़ के ऊपर से औंधे मुँह पछाड़ते हैं; धारदार आरे से उसके शरीर को चीरते हैं; शरीर में भाले भोंकते हैं, नोक में पिरोकर उसे गोल चक्कर घुमाते हैं; मुद्गर द्वारा उसे इतना पीटते हैं कि उसकी आँखें बाहर निकल जाती हैं। पूर्व में जिसने अभिमान किया था ऐसे उस नारकी को धधकते हुए लोहे के आसन पर जबरन् बैठाते हैं और काँटों के बिस्तर पर सुलाते हैं।

इस प्रकार नरक की अत्यन्त असह्य और भयंकर वेदना पाकर भयभीत हुए उस नारकी के मन में ऐसे विचार आते हैं कि अरे रे ! मैंने पूर्वभव में जो पाप किये थे वही मुझे ऐसे भयंकर दुःख दे रहे हैं। यहाँ की वेदना इतनी तीव्र है कि किसी से सहन न हो; आयु पूर्ण हुए बिना इस शरीर का अन्त भी नहीं होता; और दुःख देने वाले इन नारकियों को कोई रोक भी नहीं सकता। अरे, ऐसी परिस्थिति में हम कहाँ जायें ? क्या करें ? कहाँ खड़े रहें ? कहाँ बैठें ? कहाँ विश्राम लें ? हम शरण की आशा में जहाँ-जहाँ जाते हैं वहाँ-वहाँ उलटा अधिकाधिक दुःख मिलता है। अरे, इन अपार दुःखों से कब हमारा छुटकारा होगा ? कब इनका अन्त आयगा ? हमारी आयु भी सागर जितनी लम्बी है। ऐसे बारम्बार चिंतवन से उस नारकी को अत्यन्त मानसिक सन्ताप एवं मरण तुल्य वेदना होती रहती है। इस सम्बन्ध में अधिक कहने से क्या लाभ है ? संक्षेप में इतना ही बस है कि जगत में जितने भीषण दुःख हैं उन सबको दुष्कर्मों ने नरक में इकट्ठा कर दिया है। आँख की एक पलक झपकने जितना सुख भी उन नारकियों को नहीं है; दिनरात उन्हें दुःख ही भोगना पड़ता है। सुख की प्राप्ति तो दूर रही परन्तु उसका स्मरण होना भी उन्हें दुर्लभ है। इस प्रकार पूर्व भव के पापकर्मों से जीव अत्यन्त दुःखी हैं।

इस प्रकार नरक के दुःखों का वर्णन करके प्रीतिंकर स्वामी श्रीधर देव से कहते है कि हे भव्य ! जो जीव नरक के ऐसे दुःखों से बचना चाहते हों उन बुद्धिमानों को जिनेन्द्रप्रणीत धर्म की उपासना करना चाहिये। यह जैनधर्म ही दुःखों से रक्षा करता है और महान सुख की प्राप्ति कराता है; यह धर्म ही कर्मों के क्षय से उत्पन्न होनेवाला मोक्षसुख प्रदान करता है। इन्द्र चक्रवर्ती तथा गणधर पद भी इस जैनधर्म के प्रसाद से ही प्राप्त होते हैं। और तीर्थंकरपद तथा सर्वोत्कृष्ट सिद्धपद भी इस धर्म से ही प्राप्त होते है। यह जैन धर्म ही जीवों का बंधु, मित्र और गुरु है। हे श्रीधर देव ! तुम भावी तीर्थंकर हो; और नरक में पड़ा हुआ शतमंत्री का जीव तुम्हारे उपदेश से धर्म प्राप्त करेगा।

श्री प्रीतिंकर केवली के श्रीमुख से जैनधर्म की ऐसी महिमा सुनकर पवित्र बुद्धिधारक श्रीधरदेव अतीव धर्मप्रेम को प्राप्त हुए और प्रसन्नचित्त से कहने लगे - हे प्रभो ! आप महान उपकारी हैं। महाबल के भव में आपने ही जैनधर्म का उपदेश देकर मेरा हित किया था, पश्चात् भोगभूमि में मुनिरूप में पधार कर आपने ही परम करुणापूर्वक मुझे सम्यग्दर्शन प्राप्त कराया और इस समय भी अरिहंत दशा में आपने

धर्म का उपदेश देकर महान उपकार किया है। अहो, प्रभो ! आप जैसे गुरुओं का संग जीवों को परम
हितकर है।

इस प्रकार भक्ति से बारम्बार प्रीतिकर केवली के दर्शन करने के पश्चात् पूर्वभव के स्नेहवश शतबुद्धि के जीव को प्रतिबोध देने हेतु श्रीधर देव दूसरे नरक में उसके पास गये और करुणापूर्वक कहने लगे - हे शतबुद्धि ! क्या तू राजा महाबल को जानता है ? मैं वही महाबल का जीव हूँ और इस समय तुझे प्रतिबोध देने हेतु स्वर्ग से यहाँ आया हूँ। शतबुद्धि के भव में तूने प्रबल मिथ्यात्व का सेवन किया था। देख, उस मिथ्यात्व का यह घोर दुःखदायी फल तेरे सामने ही है। ऐसे घोर दुःखों से बचने के लिये हे भव्य ! अब तू मिथ्यात्व को छोड़ और सम्यग्दर्शन को अंगीकार कर। अपने अंतर में चैतन्यमय आत्मतत्व को देख।

श्रीधर देव इस प्रकार श्रीधर देव के उपदेश से उस शतबुद्धि के जीव ने अंतर्मुख दृष्टि द्वारा शुद्ध सम्यग्दर्शन धारण किया और मिथ्यात्वरुपी मल नष्ट होने से उत्तमशुद्धि प्रगट की। ‘अहो, नरक में आकर भी आपने मुझे धर्म प्राप्त कराया, आपने महान उपकार किया है’- इस प्रकार उसने पुनः पुनः श्रीधर देव का उपकार माना। तत्पश्चात् नरकायु पूर्ण होने पर शतबुद्धि का जीव भयंकर नरक से निकलकर पूर्व पुष्कर द्वीप के पूर्वविदेह में मंगलावती देश की रत्नसंचय नगरी में महीधर चक्रवर्ती का जयसेन नामक पुत्र हुआ।

एक बार उसके विवाह का उत्सव हो रहा था; उस समय श्रीधर देव ने आकर सम्बोधन किया और नरक के भयंकर दुःखों का स्मरण कराया, जिससे संसार से विरक्त होकर उसने यमधर मुनिराज के समीप दीक्षा धारण कर ली। नरक में भोगे हुए दुःखों का स्मरण होने से वह विषयों से विरक्त होकर कठिन तपश्चर्या करने लगा और आयु पूर्ण होने पर समाधिमरणपूर्वक देह त्याग कर वह ब्रह्म स्वर्ग का इन्द्र हुआ।

देखो, कहाँ तो नारकी और कहाँ इन्द्र पद ! जीव अपने परिणामों के अनुसार विचित्र फल प्राप्त करता है। हिंसादि अधर्म कार्यों से जीव नरकादि नीच गतियाँ पाता है, और अहिंसादि धर्म कार्यों से वह स्वर्गादि उच्चगति को प्राप्त होता है। इसलिये उच्चपद के अभिलाषी जीवों को सदा धर्म की आराधना में तत्पर रहना चाहिये।

ब्रह्मस्वर्ग में उत्पन्न हुए उस ब्रह्मेन्द्र ने (शतबुद्धि के जीवने) अवधिज्ञान द्वारा श्रीधर देव के महान उपकार को जान लिया और उन्हीं के प्रताप से नरक दुःखों से छूट कर यह इन्द्रपद प्राप्त किया है - ऐसा समझकर पाँचवें ब्रह्मस्वर्ग से दूसरे स्वर्ग में आकर अपने कल्याणकारी मित्र श्रीधर देव का भक्तिपूर्वक बहुमान किया।

(अपने चरितनायक के अब पाँच भव शेष रहे हैं। अब वह श्रीधर देव की आयु पूर्ण होने पर अगले भव में वे विदेहक्षेत्र में जन्म लेंगे और मुनि होंगे; फिर स्वर्ग में जायेंगे; फिर विदेहक्षेत्र की पुण्डरीगिणीनगरी में तीर्थंकर के पुत्ररूप में उत्पन्न होंगे और वहाँ चक्रवर्ती होकर दीक्षा लेकर तीर्थंकर प्रकृति बाँधेंगे; वहाँ से सर्वार्थसिद्धि में जायेंगे और पश्चात् अन्तिम ऋषभ अवतार होगा। श्री जिनसेन आचार्य रचित महापुराण के आधार से इन प्रसंगों का वर्णन आप पढ़ रहे हैं।) (६)

ऋषभदेव : सुविधि राजा (श्रावकधर्म का पालन)

श्रीधर देव की (ईशान स्वर्ग की) आयु पूर्ण करके अपने चरित्रनायक जम्बूद्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र स्थित महावत्सदेश की सुसीमा नगरी में अवतरित हुए। उनका नाम सुविधिकुमार था। उनके पिता सुदृष्टि राजा और माता सुन्दरनन्दा थीं। अनेक कलाओं के भण्डार वे सुविधिकुमार बाल्यावस्था से ही सबको आनन्दित करते थे और उनमें समीचीन धर्म के संस्कार प्रगट हुए थे। उन आत्मज्ञानी का चित्त निरन्तर ही आत्मकथा में अनुरक्त रहता था। सुशोभित मुकुटसे अलंकृत ऐसे उन्नत मस्तक से लेकर स्वाभाविक लाक्षारसयुक्त चरणकमल तक सर्वांगसुंदरता को प्राप्त करनेवाले वह राजकुमार उत्तम सामुद्रिक लक्षणों द्वारा सबका मन मोह लेते थे। यौवनावस्था में उद्रेक करनेवाले काम-क्रोधादि शत्रुओं को उन जितेन्द्रिय राजकुमार ने यौवन के प्रारम्भ में ही परास्त कर दिया था; इसलिये युवा होने पर भी वे वृद्धसमान गम्भीर लगते थे। सच ही है, धर्माराधक जीवके लिये कामक्रोधादि शत्रुओं को जीत लेनेका कार्य सहज है।

अभयघोष चक्रवर्ती की पुत्री मनोरमा के साथ सुविधिकुमार का विवाह हुआ; ईशान स्वर्ग में से स्वयंप्रभ नामक देव (श्रीमती का जीव, जो कि भविष्य में श्रेयांसकुमार होगा वह) यहाँ सुविधिकुमार के घर केशव नाम का पुत्र हुआ। वज्रजंघ की पर्याय में जो उसकी स्त्री थी वहीं यहाँ उसका पुत्र हुआ। अरे ! क्या कहा जाय ? संसार की स्थिति ही ऐसी है । उस पर सुविधिराजा को अत्यन्त प्रेम था। जीवों को पुत्र पर सहज ही प्रेम होता है तो फिर पूर्व भव की प्रिय पत्नी का जीव ही जहाँ पुत्ररुप मे उत्पन्न हुआ हो वहाँ उसके ऊपर प्रेम का तो कहना ही क्या ?

सिंह, नेवला, बन्दर और शूकर-यह चारों जीव भोगभूमि मे साथ उत्पन्न होकर सम्यक्त्व को प्राप्त हुए थे और पश्चात् ईशान स्वर्ग में भी साथ ही थे, वे वहाँ से चयकर इस वत्सकावती देश में ही सुविधिकुमार के समान विभूति के धारक राजपुत्र थे। वरदत्त, वरसेन, चित्रांगद और प्रशान्तदमन नाम के उन चारों राजपुत्रों ने दीर्घकाल तक राजवैभव का उपभोग किया। राजवैभव के बीच रहने पर भी वे चैतन्यवैभव को नहीं भूले थे; आत्मा की प्रतीति उनको सदा वर्तती थी। एकबार वे चारों राजपुत्र चक्रवर्ती के साथ विमलवाहन जिनेन्द्रदेव की वन्दना करने गये। वहाँ सबने भक्तिपूर्वक वन्दना करके प्रभु का दिव्य उपदेश श्रवण किया। अहा ! उस दिव्यध्वनि की क्या बात ! क्या उसकी गंभीरता ! उसे सुनते ही सब चैतन्यरस में निमग्न हो गये और संसार से विरक्त होकर जिनदीक्षा धारण कर ली। चक्रवर्ती के साथ अन्य अठारह हजार राजा तथा पाँच हजार पुत्रों ने भी दीक्षा ले ली। वे सब मुनिवर संवेग और निर्वेदरूप परिणामों द्वारा मोक्षमार्ग की साधना करते थे। रत्नत्रय धर्म में तथा उसके फल में उत्कृष्ट प्रीति करके उत्साह पूर्वक उसकी आराधना करना सो संवेग है, और शरीर, भोग तथा संसार के प्रति अतिशय विरक्त परिणाम सो निर्वेद है। ऐसे संवेग-निर्वेद पूर्वक वे मुनिवर मोक्षमार्ग को साधने लगे।

अपने चरित्रनायक भगवान ऋषभदेव जो कि सुविधिराजा हुए हैं, उनके पूर्वभव के साथी तो इस प्रकार मुनि हो गये; परन्तु राजा सुविधि अपने पुत्रप्रेम के कारण दीक्षा धारण नहीं कर सके थे, क्योंकि केशव के प्रति उन्हें अति स्नेह था; इसलिये वे मुनिपने की भावना रखकर श्रावक के उत्कृष्ट धर्मों का पालन करने लगे।

सुविधिराज श्रावक श्री जिनेन्द्र भगवान ने गृहस्थधर्म में सम्यक्त्व के अतिरिक्त ग्यारह स्थान (ग्यारह प्रतिमाएँ) कहे हैं : (१) दर्शनप्रतिमा, (२) व्रतप्रतिमा, (३) सामायिक प्रतिमा, (४) प्रोषध, (५) सचित्तत्याग, (६) दिन में मैथुनत्याग अथवा रात्रिभोजनत्याग, (७) ब्रह्मचर्य, (८) आरम्भत्याग, (९) परिग्रहत्याग, (१०) अनुमतित्याग और (११) उद्दिष्टत्याग।

सुविधिराजा श्रावक धर्म के इन ग्यारह स्थानों का अनुक्रम से पालन करते थे। अहिंसादि पाँच अणुव्रतों का भी पालन करते थे। आचार्य महाराज कहते हैं कि यदि यह पाँच अणुव्रत उस प्रत्येक व्रत की पाँच-पाँच भावनाओं के साथ तथा सम्यग्दर्शन की विशुद्धि से संयुक्त धारण किये जायें तो उससे गृहस्थ को महान-महान फल की प्राप्ति होती है। गृहस्थों के लिये बारह व्रतों का पालन वह स्वर्गरूपी राजमहल की सीढ़ी है और वह नरकादि दुःखों को दूर करनेवाला है। सम्यग्दर्शन द्वारा व्रतों की शुद्धता को प्राप्त वे राजर्षि सुविधि दीर्घकाल तक श्रावकरूप में रहकर श्रेष्ठ मोक्षमार्ग की आराधना करते थे। जीवन के अन्तिम समय उन्होंने सर्व परिग्रह का त्याग करके दिगम्बर जिनदीक्षा धारण की, विधिपूर्वक उत्कृष्ट मोक्षमार्ग की आराधना करके समाधिमरण पूर्वक देहत्याग किया और अच्युतस्वर्ग में इन्द्ररूप मे अवतरित हुए। उनका पुत्र केशव भी निर्ग्रन्थ मुनि होकर समाधिमरण करके उस अच्युतस्वर्ग में प्रतीन्द्र हुआ। वरदत्त आदि चारों राजपुत्र (सिंहादि चारों जीव) भी अपने अपने पुण्योदय से उस अच्युत स्वर्ग में ही इन्द्रसमान ऋद्धि के धारक देव हुए। सच ही है, पूर्वभव के संस्कारों से जीव एक ही स्थान मे एकत्रित हो जाते हैं।

(७)

ऋषभदेव : सोलहवें अच्युत स्वर्ग में

अच्युत स्वर्ग के इन्द्ररूप में उत्पन्न हुए अपने कथानायक दिव्यवैभव सहित थे; दिव्यप्रभावान उनका शरीर स्वभाव से ही सुन्दर था। विष या शस्त्रादि से उन्हें कोई बाधा नहीं हो सकती थी। मस्तक पर धारण किये हुए कल्पवृक्ष के मनोहर पुष्पों से वे ऐसे लगते थे मानों पूर्वभव की तपश्चर्या के महान फल को शिरोधारण करके सबको दिखला रहे हों। साथ ही उत्पन्न हुए आभूषणों द्वारा उनका शरीर ऐसे शोभायमान होता था मानों उनके प्रत्येक अंगपर दयारूपी बेल के फल झूल रहे हों। वे इन्द्र कल्पवृक्ष की भाँति शोभायमान होते थे। उनके उपभोग में आनेवाले देवविमानों की संख्या भगवान ने १५९ कही है। उत्तम जाति के ३३ देव स्नेहपूर्ण बुद्धि से उन्हें पुत्रसमान मानते थे। उनके परिवार में अन्य दस हजार सामानिक देव थे; उनका वैभव भी यद्यपि इन्द्रसमान था, परन्तु इन्द्र की भाँति उनकी आज्ञा नहीं चलती थी। उनके अंगरक्षक समान चालीस हजार देव थे। स्वर्ग में यद्यपि किसी प्रकार का भय नहीं होता, परन्तु वे अंगरक्षक देव इन्द्र की विभूति के सूचक हैं। इन्द्र को तीन प्रकार की परिषद (सभा) होती है। उस अच्युतस्वर्ग की सीमा की रक्षा करनेवाले चार दिशाओं में चार लोकपाल थे और प्रत्येक लोकपाल की ३२ देवियाँ थीं। अच्युतेन्द्र की आठ महादेवियाँ थीं, तदुपरान्त ६३ वल्लभिका देवियाँ थीं; एक-एक महादेवी के ढाई-ढाई सौ अन्य देवियों का परिवार था। इस प्रकार उस अच्युतेन्द्र की कुल दो हजार इकहत्तर देवियाँ थी। उसका चित्त उन देवियों के स्मरणमात्र से सन्तुष्ट हो जाता था।

उसकी प्रत्येक देवी में ऐसी विक्रियाशक्ति थी कि वह सुन्दर स्त्री के दस लाख चौबीस हजार रुप बना सकती थी। उस इन्द्र के हाथी, घोड़ा, रथ आदि सात प्रकार की सेना थी - जो देवों की ही विक्रिया द्वारा निर्मित थी। अच्युतेन्द्र बाईस हजार वर्ष में एक बार अमृत का आहार करते थे तथा ग्यारह महीने में एकबार श्वास लेते थे। उनका अति सुन्दर शरीर तीन हाथ ऊँचा था। शास्त्रकार कहते हैं कि भगवान ऋषभदेव के जीव ने धर्म के प्रताप से अच्युतेन्द्र की पर्याय में ऐसी उत्तम विभूति प्राप्त की थी, इसलिये भव्य जीवों को जिनेन्द्रदेव द्वारा कहे गये धर्म में अपनी बुद्धि लगाना चाहिये और भक्तिपूर्वक उसका आराधन करना चाहिये। उस जीव को ऐसी बाह्य विभूति प्राप्त होने पर भी अंतर में उससे भिन्न चैतन्य की प्रतीति थी। अंतर चैतन्यवैभव के समक्ष उस समस्त इन्द्र वैभव को वे तुच्छ समझते थे। उस वैभव में रहकर भी चैतन्यवैभव की महत्ता को एक क्षण भी भूलते नहीं थे। आत्मज्ञान की अखण्ड धारा को प्रवाहित रखकर स्वर्ग के दिव्य भोगों का अनुभव करते थे। कभी किसी देवने विक्रिया द्वारा हाथी का रुप धारण किया हो तो उस हाथी पर चढ़कर गमन करते थे; कभी जिनेन्द्र भगवान की महापूजा करते थे, कभी मध्यलोक मे आकर तीर्थंकर देव की वन्दना करते थे। इस प्रकार स्वर्गलोक का दीर्घकाल आनन्दपूर्वक व्यतीत करते थे।

ऐसा करते - करते अच्युत स्वर्ग की आयु के मात्र छह महीने शेष रहे और उसे छोड़कर मध्यलोक मे आने की तैयारी होने लगी; तब शरीर पर धारण की हुई कल्पवृक्ष के फूलों की माला मुरझाने लगी। इससे पूर्व कभी वह माला मुरझायी नहीं थी। पुष्पमाला मुरझाने से उन्हे पता चल गया कि अब अल्पकाल में ही मै इस अच्युत स्वर्ग से च्युत होऊँगा; - तथापि वे इन्द्र किंचित् दुःखी नहीं हुए, क्योंकि महापुरुष धैर्यवान होते हैं। पवित्र बुद्धिवान उन अच्युतेन्द्र ने भगवान अरिहन्त देव की पूजा प्रारम्भ की, पंच परमेष्ठी में चित्त लगाया, और स्वर्गलोक में भोगते हुए जो पुण्य शेष रहा था उसे साथ लेकर अपने यह चरित्रनायक स्वर्ग से च्यवकर इस मनुष्य लोक में अवतरित हुए।

यहाँ आचार्य देव कहते हैं कि - स्वर्ग के इन्द्रादि देव यद्यपि सदा सुखसम्पन्न, महा धैर्यवान एवं बड़ी-बड़ी ऋद्धियों के धारक होते हैं, तथा उनकी आयु असंख्य वर्ष की होती है, तथापि अंत में तो वे स्वर्ग से च्युत हो जाते हैं; इसलिये संसार की और संयोग की ऐसी क्षणभंगुरता जानकर सम्पूर्ण सुख से भरपूर एवं पुनरागमन रहित ऐसे अविनाशी मोक्षपद में ही मुमुक्षु को अपनी बुद्धि लगाना योग्य है।

(८)

ऋषभदेव : विदेह में तीर्थंकर के पुत्र, वज्रनाभि चक्रवर्ती

(मुनिधर्म का पालन और तीर्थंकर प्रकृति)

भगवान ऋषभदेव का आत्मा अच्युतेन्द्र स्वर्ग से च्यवकर, अत्यन्त शोभायमान ऐसे जम्बूद्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी में अवतरित हुआ; वज्रनाभि उनका नाम; राजा वज्रसेन तीर्थंकर उनके पिता और श्रीकान्तारानी उनकी माता। पूर्वभव के सम्बन्धी सिंह, बन्दर, नेवला और शूकर - वे जीव भी वहीं उन वज्रनाभि के सहोदर भ्राता के रूप में उत्पन्न हुए। उनका नाम विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित। तदुपरान्त पूर्व वज्रजंघ के भव में आहारदान के समय जो साथ थे वे मतिवर मंत्री आदि चार जीव भी (जो ग्रैवेयक में थे ते, वहाँ से च्यवकर) यहाँ वज्रनाभि के भ्रातारूप में अवतरित हुए। उनमें मतिवर मंत्री का जीव सुबाहु, आनन्द पुरोहित का जीव महाबाहु, अकम्पन सेनापति का जीव पीठकुमार, और धनमित्र सेठ का जीव महापीठ हुआ। इस प्रकार पूर्वभव के संस्कार के कारण सब जीव एक स्थान पर एकत्रित हो गये। श्रीमती का जीव जोकि अच्युतेन्द्र स्वर्ग में प्रतीन्द्र हुआ था वह वहाँ से च्यवकर इसी नगरी में कुबेरदत्त वणिक के यहाँ अनन्तमती का पुत्र धनदेव हुआ।

अपने कथानयक इस भव में विदेहक्षेत्र में वज्रसेन तीर्थंकर के पुत्र तथा चक्रवर्ती हैं, और अपने पिताश्री के पादमूल में सोलहकारण भावना द्वारा तीर्थंकर प्रकृति बाँधकर, एक भव पश्चात् भरतक्षेत्र में आद्य तीर्थंकर होनेवाले हैं। ऐसे वे पवित्रात्मा वज्रनाभि युवावस्था आने पर एकदम सुशोभित हो उठे। उन वज्रनाभि की नाभि के मध्य में वज्र का एक स्पष्ट चिन्ह शोभता था - जो यह प्रगट कर रहा था कि यह जीव चक्रवर्ती होगा। उन्होंने शास्त्राभ्यास किया होने से यौवनजन्य मद नहीं हुआ था; अनेक प्रकार की राजविद्या में भी वे पारंगत थे; लक्ष्मी एवं सरस्वती दोनों का वहाँ संगम था और उनकी कीर्ति दसों दिशाओं में फैल गई थी। अपने गुणों द्वारा वे सबको वशीभूत कर लेते थे। सच ही है - गुणों द्वारा कौन वश नहीं होता ?

योग्य समय पर महाराजा वज्रसेन तीर्थंकर ने वज्रनाभि पुत्र को राजतिलक करके ‘तुम महान चक्रवर्ती होओ !’ - ऐसा आशीर्वाद दिया और स्वयं संसार से विरक्त हुए। लौकान्तिक देवों ने स्तुतिपूर्वक उनके वैराग्य की अनुमोदना की। भगवान वज्रसेन के साथ-साथ एक हजार राजाओं ने भी दीक्षा ग्रहण की।

एक ओर राजा वज्रनाभि महान राज्य का पालन करने लगे, तो दूसरी ओर मुनिराज वज्रसेन तपोलक्ष्मी का पालन कर रहे थे। कुछ समय पश्चात वज्रनाभि राजा के शस्त्रभण्डार में जगमगाता हुआ चक्ररत्न प्रगट हुआ, तो उधर उनके पिता वज्रसेन मुनिराज के ज्ञानभण्डार में शुक्लध्यानरूपी अत्यन्त तेजस्वी ध्यानचक्र प्रगटा। पुत्र तो चक्रवर्ती राजा हुआ और पिता केवलज्ञान प्रगट करके धर्मचक्री हुए। पिता तीर्थंकर होकर धर्मोपदेश द्वारा जीवोंका हित करने लगे और भावि तीर्थंकर ऐसा पुत्र चक्रवर्ती होकर प्रजा का पालन करने लगा। राजा वज्रनाभि ने चक्ररत्न द्वारा समस्त पृथ्वी को जीत लिया तो भगवान वज्रसेन ने ध्यानचक्र द्वारा कर्मों पर विजय प्राप्त करके तीनों लोक को जीत लिया था। इस प्रकार विजय प्राप्त करने मे श्रेष्ठ वे दोनो पिता-पुत्र ऐसे लगते थे मानो एक दूसरे की स्पर्धा कर रहे हों। एक की विजय अतिअल्प-छहखण्ड तक मर्यादित थी, दूसरे की विजय समस्त लोक को लाँघकर अलोक में भी पहुँच गई-ऐसी सबसे महान थी।

अपने चरित्रनायक ऋषभदेव का जीव तो इस प्रकार चक्रवर्ती हुआ और सात भव का साथी (स्वयंप्रभा देवी अथवा केशव का जीव) धनदेव वह चक्रवर्ती के चौदह रत्नो मे से गृहपति नामक तेजस्वी रत्न हुआ। इस प्रकार महान अभ्युदय सहित बुद्धिमान वज्रनाभि चक्रवर्ती ने दीर्घकाल तक राज्य का उपभोग किया।

एक बार वे अपने पिता वज्रसेन तीर्थंकर के समवसरण मे गये और परमभक्तिसहित उन जिननाथ के दर्शन-वदन करके दिव्यध्वनि का श्रवण किया। भगवान के श्रीमुख से अत्यन्त दुर्लभ ऐसे रत्नत्रयधर्म का स्वरूप सुनकर उनको भी रत्नत्रयकी भावना जागृत हुई। “जो बुद्धिमान जीव अमृत समान ऐसे सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र तीनो का सेवन करता है वह अचिन्त्य एव अविनाशी ऐसे मोक्षपद को प्राप्त करता है।” ऐसा हृदयमे विचारकर उन चक्रवर्ती ने समस्त साम्राज्य को तृणतुल्य जानकर त्याग दिया और रत्नत्रयधर्म मे तथा तप मे अपनी बुद्धि लगायी। पुत्र को राज्य सौंपकर उन्होने सोलहहजार मुकुटधारी राजा, एक हजार पुत्र, पूर्वभव के स्नेही ऐसे आठ भाई तथा धनदेवके साथ, मोक्षप्राप्ति के उद्देश से, पिता वज्रसेन तीर्थंकर के समीप भव्य जीवो को परम आदरणीय ऐसी जिनदीक्षा धारण कर ली।

१

भगवान ऋषभदेव (भाग ३)

महाराजा वज्रनाभि ने मुनि होकर अहिंसादि पाँच महाव्रत धारण किये। ईर्या, भाषा, एषणा, आदान-निक्षेपण तथा प्रतिष्ठापन-ऐसी पाँच समिति तथा मनगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति यह तीन गुप्ति - इन आठ को ‘अष्ट प्रवचनमाता’ कहा जाता है, उनका पालन प्रत्येक मुनि को अवश्य होता है - ऐसा इन्द्रसभा के रक्षक (-समवसरण के नायक) ऐसे गणधरदेव ने कहा है। वज्रनाभि मुनिराजने ऐसी समिति - गुप्ति का पालन किया, वे उत्कृष्ट तपस्वी, धीर, वीर, पापरहित, धर्म का चिंतन करते हुए विचरने लगे। एकबार उन मुनिराज ने अपने पिता वज्रसेन तीर्थंकर के चरणसमीप दर्शन-विशुद्धि आदि सोलह भावनाओ का चिंतन किया.-

१ अष्ट मूलगुणसहित शुद्ध सम्यग्दर्शनरुप दर्शनशुद्धि धारण की।
२ ज्ञान-दर्शन-चारित्रादि की विनय धारण की।
३ शील एवं व्रतो का निरतिचार पालन किया।
४ उपयोग को बारम्बार ज्ञान मे लगाया।
५ संसार से भयभीत और मोक्षमार्ग में उत्साहित हुए।

६. अपनी शक्ति छिपाये बिना सामर्थ्यानुसार तपश्चरण किया। ७. ज्ञान तथा संयम के साधनरूप त्याग में चित्त लगाया। ८. साधुओं को व्रत, शील आदि में विघ्न आने पर उन्हें दूर करने में बारम्बार सावधान रहते थे; क्योंकि उत्तम पुरुषों की सर्व चेष्टा अपनी समाधि हेतु अथवा अन्य धर्मात्माओं के विघ्न दूर करने के लिये होती है। ९. व्रती पुरुषों को अपने से अभिन्न जानकर उन्हें रोगादि होने पर उनकी वैयावृत्य (सेवा) करते थे; यह वैयावृत्य तप का मुख्य अंग है। १०. पूज्य अरिहंत भगवान में उनको निश्चल भक्ति थी। ११ विनयपूर्वक आचार्यों की भक्ति करते थे। १२ विशेष ज्ञानवान मुनियों की सेवा करते थे। १३. जिनवाणीरूप प्रवचन तथा मुनिसंघ के प्रति भी उन्हे उत्कृष्ट भक्ति थी, क्योंकि उनके प्रति तीव्र भक्ति के बिना रागादि को जीता नही जा सकता। १४. वे ‘अवश’ होने पर भी ‘वशी’ थे, (अर्थात् अन्य के वश न होने रूप ‘अवश’ होने पर भी इन्द्रियो को वश करनेवाले होने से ‘वशी’ थे।) द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव की अपेक्षापूर्वक (योग्य रीति से) सामयिक, वदना, स्तुति, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय तथा कायोत्सर्ग-इन छह आवश्यकों का पूर्ण रीति से पालन करते थे। १५ तप, ज्ञानादि किरणों द्वारा भव्य जीवरूपी कमल को विकसित करनेवाले ऐसे सूर्यसमान वे मुनिराज जैनमार्ग को सदा प्रकाशित एवं प्रभावित करते थे। १६ जिनमार्ग पर चलनेवाले शिष्यो को धर्म मे स्थिर करनेवाले, तथा धर्म में प्रीति रखनेवाले ऐसे वे वज्रनाभि मुनिराज सर्व धर्मात्मा जीवों पर अतिशय प्रेम-वात्सल्य रखते थे।

-इस प्रकार महान धीर-वीर उन वज्रनाभि मुनिराजने तीर्थंकरत्व की प्राप्ति के कारणरूप इन १६ भावनाओं का दीर्घकाल तक चिंतन किया, और उत्तम प्रकार से इन भावनाओं के चिंतन द्वारा उन श्रेष्ठ मुनिराज ने तीन लोक मे आनन्दमय क्षोभ उत्पन्न करनेवाली तीर्थंकर नामकी महा पुण्य प्रकृति का बंध किया। ऐसे उन भावी तीर्थंकर को नमस्कार हो !

तीर्थंकर प्रकृति बांधने के साथ-साथ उन मुनिराज ने ज्ञान की अनेक प्रकार की ऋद्धि भी प्राप्त की थी और उस ऋद्धि द्वारा उन्होंने अपने परभवों को जान लिया था। दूसरी भी अनेक महान ऋद्धि उनको प्रगट हुई थीं। परन्तु उत्तम बुद्धिमान उन मुनिराज को तो गौरवपूर्ण ऐसे एक सिद्धपद की ही वांछा थी। लौकिक ऋद्धियो की उन्हे किंचित् भी वांछा नही होने पर भी अणिमा, महिमा आदि अनेक ऋद्धियाँ उनको प्रगट हुई थी। बिना इच्छा से जगत का हित करनेवाली ऐसी विविध औषधिऋद्धि भी उनको प्रगट हुई थी; - सच ही है, कल्पवृक्ष पर लगे हुए फल किसका उपकार नहीं करते ? उन मुनिराज को यद्यपि घी-दूध आदि रसों का त्याग था तथापि घी - दूध को झराने वाली विविध रसऋद्धि उनको प्रगट हुई थी; - वह योग्य ही है, इष्ट पदार्थों का त्याग करने से उनकी अपेक्षा अधिक महान फल की प्राप्ति होती है। बलऋद्धि के प्रभाव से चाहे जैसे कठिन शीत - उष्ण परिषहों को वे सह लेते थे। उन्हें ऐसी अक्षीण ऋद्धि प्रगट हुई थी कि जिस दिन जिस घर में उन्होंने आहार ग्रहण किया हो, उस घर में आहार अक्षय हो जाता था, अर्थात् चक्रवर्ती की सेना को भोजन कराने पर भी वह भोजन कम नहीं पड़ता था। इसमें क्या आश्चर्य है ! - मुनियों का महान तप तो अक्षय ऐसा मोक्षफल भी प्रदान करता है।

इस प्रकार विशुद्ध भावनाओं को धारण करनेवाले वे वज्रनाभि मुनिराज अपने विशुद्ध परिणामों से उत्तरोत्तर विशुद्ध होते - होते उपशमश्रेणी पर आरूढ़ हुए। अधःकरण के पश्चात् वे आठवें गुणस्थान में अपूर्वकरण करके नववें अनिवृत्तिकरण गुणस्थान को प्राप्त हुए; तत्पश्चात् जहाँ अत्यन्त सूक्ष्म राग शेष रहा है ऐसे सूक्ष्म सांपराय नामक दसवें गुणस्थान में आये और पश्चात् उपशान्तमोह नामक वीतरागी गुणस्थान में पहुँच गये। यहाँ ग्यारहवें गुणस्थान में मोहकर्म सम्पूर्ण उपशान्त हुआ था और अतिशय विशुद्ध ऐसा औपशमिक चारित्र प्रगट हुआ था। अंतर्मुहूर्त पश्चात् वे मुनिराज पुनः स्वस्थानरूप सातवें अप्रमत्त - गुणस्थान में आये; उसका विशेष कारण यह है कि ग्यारहवें गुणस्थान में आत्मा की स्वाभाविक स्थिति अंतर्मुहूर्त से अधिक होती ही नहीं।

उन वज्रनाभि मुनिराज ने आयु के अंतभाग में श्रीप्रभपर्वत के ऊपर प्रायोपवेशन (अर्थात् प्रायोपगमन संन्यास) धारण करके शरीर एवं आहार का ममत्व छोड़ दिया था। इस संन्यास में तपस्वी साधु रत्नत्रयरूपी शय्या पर उपवेश करता है इसलिये उसे ‘प्रायोपवेशन’ कहते हैं, इस संन्यास द्वारा रत्नत्रय की उत्कृष्ट शुद्धता होती है तथा कर्मरूपी शत्रु का अत्यंत नाश होता है; इस संन्यास के धारक मुनिराज नगर-ग्राम आदि संसारी प्राणियों के निवासस्थान से दूर एकान्त में वास करते हैं। ऐसा प्रायोपगमन संन्यास धारण करने वाले वे वज्रनाभि मुनिराज स्वयं अपने शरीर का कोई उपचार नहीं करते थे, तथा दूसरों के पास भी कोई उपचार या सेवा कराने की इच्छा नहीं रखते थे। जिस प्रकार शत्रु के मृतक कलेवर को देखकर कोई मनुष्य निराकुल निश्चिन्त हो जाता है, उसी प्रकार उन्होंने अपने शरीर को मृतक कलेवर जानकर उसका ममत्व छोड़ दिया था और अत्यन्त निराकुल हो गये थे।

यद्यपि उनका शरीर अत्यन्त कृश हो गया था तथापि स्वाभाविक धैर्य के अवलम्बन द्वारा कई दिनों तक निश्चल चित्त से बैठे रहे। मार्ग से च्युत न हों तथा कर्मों की अतिशय निर्जरा हो इस हेतु से वे क्षुधा, तृषादि बाईस परीषहों को सहते थे। उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य एवं ब्रह्मचर्य - इन दस धर्मों का वे महा विद्वान मुनिराज पालन करते थे; वे धर्म गणधरों को भी अति इष्ट हैं। वे बारह वैराग्य-भावनाओं का निरन्तर चिन्तन करते थे। पवित्र भावनाओं को धारण करनेवाले वे वज्रनाभि मुनिराज अत्यन्त विशुद्धि को प्राप्त हुए और उपशम श्रेणी में दूसरी बार आरूढ़ हुए। पृथक्त्व वितर्क नाम के शुक्ल ध्यान को पूर्ण करके वे उत्कृष्ट समाधिरूप वीतरागभाव को प्राप्त हुए और उपशान्त मोह नामक ११ वें गुणस्थान में प्राण त्यागकर सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र पद प्राप्त किया।

(९)

ऋषभदेव : सर्वार्थसिद्धि देवलोक में

(विघ्नों से रहित सुख की सिद्धि)

(१. महाबल राजा; २. ललितांग देव; ३. वज्रजंघ राजा; ४. भोगभूमि में सम्यक्त्व प्राप्ति; ५. श्रीधर देव; ६. सुविधि राजा; ७. अच्युतेन्द्र; ८. वज्रनाभि चक्रवर्ती; इन आठ भवों के पश्चात् अपने चरित्रनायक ऋषभदेव वर्तमान में सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्ररूप में विराज रहे हैं।)

लोक के अग्रभागरूप जो सिद्धों का धाम उससे यह सर्वार्थसिद्धि विमान मात्र बारह योजन नीचे है। वहाँ तेतीस सागरोपम के असंख्यात वर्षों तक इन्द्रिय विषयरहित जो सुख उन्होंने भोगा उसका अब वर्णन करके, उसके उदाहरण से आत्मा के अतीन्द्रिय सुख का स्वरूप समझायेंगे और बाह्य विषय सुख का कारण नहीं है ऐसा बतलायेंगे।

सर्वार्थसिद्धि विमान में उत्पन्न होकर अपने चरित्रनायक क्षणमात्र में यौवन अवस्थाको प्राप्त हुए। उनका शरीर ऐसा सुन्दर था कि मानो अमृत से बना हो! वे अहमिन्द्र सर्वार्थसिद्धि में जिनेन्द्र देव की अकृत्रिम प्रतिमाओं की पूजा करते थे और अपने क्षेत्र में ही विचरते थे। पुण्यात्मा जीवों में सबसे प्रधान ऐसे वे अहमिन्द्र उस सर्वार्थसिद्धि विमान में ही स्थित रहकर समस्त लोक में विराजमान जिन प्रतिमाओं की पूजा करते थे; उन पुण्यात्मा अहमिन्द्र ने अपने वचन की प्रवृत्ति जिनदेव की पूजा - स्तुति करने में तथा धर्मचर्चा में लगायी थी, मन भगवान गुणों का तथा आत्मा का चिन्तन करने में लगाया था। और शरीर भगवान के नमस्कार करने में लगाया। अपने जैसी ही ऋद्धि को धारण करनेवाले तथा आत्मज्ञानी ऐसे अन्य अहमिन्द्रों के साथ वे अत्यन्त आदरपूर्वक धर्मगोष्ठी करते थे। (वे अहमिन्द्र कैसी अद्भुत धर्मचर्चा करते थे, उसका रसास्वादन आप शान्तिनाथ प्रभु के जीवनचरित्र में तथा मल्लिनाथ भगवान के पूर्वभव में करेंगे।)

शुक्ल लेश्या के प्रभाव से अपने ही वैभव में सन्तुष्ट रहनेवाले उन अहमिन्द्र को अपने निष्प्रपञ्च सुखमय स्थान में जैसी उत्तम प्रीति होती है वैसी अन्यत्र कहीं नहीं होती, इसलिये परक्षेत्र में जाने की इच्छा ही उनको नहीं होती। उन अहमिन्द्र देवों में छोटा - बड़ापन नहीं है, एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या नहीं है, द्वेष नहीं है; दूसरों की निन्दा और अपनी प्रशंसा नहीं है। वे सुखमय एवं हर्षसहित वर्तते हुए सदा कल्लोल करते हैं और आत्मसाधना में लीन रहते हैं।

ऐसे सर्वार्थसिद्धि विमान में अवतरित अपने चरित्रनायक अहमिन्द्र अपने आत्मा से उत्पन्न हुए स्वाधीन परम आनन्द का उपभोग कर रहे थे। उनकी आयु तेतीस सागर की थी; एक हाथ ऊँचा और हंस जैसा श्वेत अत्यन्त सुन्दर उनका शरीर था। उस शरीर की शुद्ध एवं तेजस्वी किरणों का प्रकाश दसों दिशाओं में फैलता था। इस प्रकार इन्द्रादि देवों को भी अगोचर तथा परमआनन्ददायक ऐसे श्रेष्ठ सर्वार्थसिद्धि पद को वे प्राप्त हुए।

सर्वार्थ सिद्धिमां सर्वार्थसिद्धि में वे अहमिन्द्र तेतीस हजार वर्ष में मानसिक दिव्य आहार ग्रहण करते थे; साढ़े सोलह महीने में एकबार श्वासोच्छ्वास लेते थे। अपने अवधिज्ञानरूपी दीपक द्वारा वे त्रसनाड़ी में स्थित जानने योग्य मूर्तिक द्रव्यों कोउनकी पर्यायोंसहित प्रकाशित करते थे। उस अहमिन्द्र को अपने अवधिज्ञान के क्षेत्र जितनी विक्रिया करने का सामर्थ्य था। परन्तु रागरहित होने के कारण वे कभी अपने विमान से बाहर नहीं आते थे। मानो जगत का समस्त सौन्दर्य एक ही स्थान पर एकत्रित हुआ हो - ऐसी सुन्दर उनकी मुद्रा थी। जिनेन्द्रदेव ने जो एकान्त और शान्तरूप सुख का निरूपण किया है वह सर्व सुख मानो इन अहमिन्द्र के पास एकत्रित हुआ था।

वज्रनाभि के आठों भाई (विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित, बाहु, सुबाहु, पीठ और महापीठ) तथा श्रीमती का जीव धनदेव, - यह नवों जीव भी पुण्यप्रभाव से वज्रनाभि के साथ ही सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हुए। वे अहमिन्द्र मोक्षसुख जैसे सुख का अनुभव करते थे, विषय -भोगोंरहित (प्रवीचार रहित) ही दीर्घकाल तक प्रसन्न रहते थे। उनका पुण्यजनित सुख भी विषय-भोगों के सुखसे अनन्तगुना था।

प्रश्न : ससार मे जीवों को स्त्री-पुत्रादि विषय-भोगों से सुख की प्राप्ति होती है, तो उनके अभाव मे सर्वार्थसिद्धि के अहमिन्द्रो को सुख कैसे होता होगा ?

उत्तर : सुख बाह्य विषयों में नहीं है; भगवान जिनेन्द्रदेवने आकुलता रहित वृत्ति को सुख कहा है; इसलिये जिनका चित्त अनेक प्रकार के विषयों की आकुलता से व्याकुल है ऐसे सरागी जीवों को वह सुख कहाँ से होगा ? सुख तो आत्मा मे है, विषयों मे नही, आत्मा अपने अनाकुल भाव से स्वयं जहाँ सुखरूप हुआ वहाँ बाह्य विषयों के बिना ही उसे सुख है; क्योकि विषयों को भोगने से पूर्व, भोगते समय, तथा भोगने के पश्चात् भी दाहजनक (आकुलतारुप) हैं। विद्वान पुरुष उसी सुखको चाहते है कि जिसमे मन विषयो से निवृत्त हो जाता है, चित्त सतुष्ट होता है, बाह्य विषयों मे सुख खोजनेवालों की आकुलता कभी मिटती नहीं है और सुख कभी प्राप्त होता नहीं है। वे दुखी ही हैं। “करते विषयों में प्रीति जो, है दुःख स्वाभाविक उन्हें।”

विषयों के अनुभव से प्राणियो को जो सुख लगता है वह पराधीन है, बाधाओं से युक्त है, व्यवधान (अंतराय) सहित है और कर्मबन्ध का कारण है, इसलिये दुःख ही है। सर्वार्थसिद्धि के देवो ने आत्मा के अतीन्द्रिय सुख का आस्वादन किया है और विषयों की चाह उनके मनमें से निकल गई है इसलिये बाह्य विषयों के बिना ही वे वास्तव में सुखी हैं। जगत मे प्रिय स्त्री के संसर्ग से ही जीवों को सुख होता हो तब तो गन्दे कुत्ते, कौए, हिरन और सूअर आदि तिर्यंचों को भी सुखी होना चाहिए, यदि ऐसे जीवोंकों भी सुखी कहोगे तो संसार में दुःखी किसे कहोगे ? मूर्ख जीव ही विषय सेवन मे सुख की कल्पना करते हैं। सम्यग्दर्शन - ज्ञान - चारित्र द्वारा कर्मों के क्षय से अथवा उपशम से जो आत्मा का स्वाभाविक अहलाद उत्पन्न होता है वही सुख है। वह सुख अन्य वस्तुओं के आश्रय से कभी उत्पन्न नहीं होता।

जिस प्रकार वन मे विचरनेवाला हाथी स्पर्श के मोहसे दुःखी होता है, सरोवर मे केली करनेवाला मत्स्य मांस रसके मोहसे दुःखी होता है, फूलो पर गुजन करनेवाला भंवरा सुगन्ध के मोहसे दुःखी होता है, रंगीन पतंगा दीपक के प्रकाश रुप में मोहित होकर जल जाता है और जंगल में चरने वाला हिरन शिकारी के मधुर संगीत के स्वर में मोहित होकर प्राण गँवाता है। इस प्रकार एक - एक इन्द्रिय के विषय का सेवन भी जहाँ दुःख से भरपूर है वहाँ पाँचों इन्द्रियों के विषयों का क्या कहना ?

जैसे नदी के प्रवाह में बहता हुआ पदार्थ किसी गहरे गड्ढे में गिरकर घुमरी खाता है वैसे ही इन्द्रिय-विषयों के प्रवाह में बहता हुआ जीव नरकरुपी दुःख के समुद्र में थपेड़े खाता है। इसलिये विषयों की प्रीति छोड़ देना चाहिये और आत्माधीन अतीन्द्रिय सुख की श्रद्धा करके उत्साहपूर्वक उसमें प्रतिवंत बनना चाहिये।

अत्यन्त आत्मोत्पन्न, विषयातीत अनुप, अनंत अरु,
विच्छेदहीन है सुख अहो ! शुद्धोपयोग - प्रसिद्ध को।
सुन ‘घातिकर्मविहीन का सुख सब सुखों में श्रेष्ठ है’,
श्रद्धा नहीं करता अभव्य है, भव्य वह संमत करे।

अहो ! सिद्ध भगवन्तों का आत्मिक सुख विषयों से रहित है, अमाप है, अनंत है, मात्र आत्मा से ही उत्पन्न है एवं अनुपम है। स्वर्गों के तथा मनुष्यों के त्रैकालिक इन्द्रियसुखों को एकत्रित किया जाय तब भी, सिद्ध परमात्मा के एक क्षणमात्र के सुख की बराबरी नहीं कर सकते। उन सिद्ध भगवन्तों का सुख अपने आत्मा से ही उत्पन्न हैं, बाधारहित है, कर्मों के क्षय से हुआ है, परम आह्लादरुप है, उपमारहित है और सर्वश्रेष्ठ है। सर्व परिग्रह से रहित, शान्त एवं उत्कंठा से रहित ऐसे सिद्ध भगवन्त पूर्ण सुखी हैं, इसलिये सुख वह आत्मा का स्वभाव है, अन्य किसी की अपेक्षा बिना अकेला आत्मा स्वयं स्वभाव से ही सुखरुप परिणमता है।

अपने चरित्रनायक भगवान ऋषभदेव के जीव वज्रनाभि चक्रवर्ती को, स्वर्ग से भी ऊपर ऐसे सर्वार्थसिद्धि मे सुकृत के फल से जो विषयरहित उदार सुख प्राप्त हुआ, वह ऐसा लगता था मानो मोक्ष का सुख ही उनके सन्मुख आया हो ! इस संसार में जीव को जो सुख या दुःख होता है वह अपने किये हुए पुण्य या पापरुप कर्मबन्ध के अनुसार होता है। पुण्य का उत्कृष्ट फल सर्वार्थसिद्धि में होता है और पापका उतकृष्ट फल सातवें नरक के नारकी को होता है। शान्त परिणाम, इन्द्रियदमन, संयमादि द्वारा पुण्यात्मा जीव उत्कृष्ट पुण्यफल को प्राप्त करता है और शम-दम-यम से रहित मिथ्यादृष्टि पापी जीव पाप के फल को प्राप्त करता है।

इस अधिकार के अत में श्री जिनसेनस्वामी कहते है कि अति ही निकट काल मे जिन्हें तीर्थंकरपद रुपी जिनेन्द्रलक्ष्मी प्राप्त होना है, ऐसे वज्रनाभि ने जिस प्रकार विशुद्धिपूर्वक आलस्य रहित होकर जिनेन्द्रदेव की कल्याणकारी आज्ञा का आराधन किया और महानसुख को प्राप्त हुए, उसी प्रकार जो अनुपम सुख के अभिलाषी हों और दुःखों के भार से छूटना चाहते हों उन बुद्धिमान जीवों को भी आलस्यरहित होकर श्री जिनेन्द्रदेव की आज्ञा का (दर्शनविशुद्धि आदि का) पालन करना चाहिये।

बन्धुओं ! अपने चरित्रनायक भगवान ऋषभदेव सर्वार्थसिद्धि मे अतिशय सुखरुप विराज रहे हैं, अखण्ड सम्यक्तत्त्व द्वारा आत्मा की आराधना कर रहे हैं। अब, यहाँ से अन्तिम अवतार में वे अयोध्यानगरी में भरत क्षेत्र के प्रथम तीर्थंकररूप में अवतरित होंगे। वे अवतरित हों उससे पहले चलो, हम उस नगरी में पहुँच जायें, और वहाँ कैसी अद्भुत शोभा है वह देखें। भगवान के जन्म से पूर्व वहीं क्या क्या हो रहा है और कैसा आनन्द छा रहा है उसे देखकर, अयोध्या के नगरजनों के साथ हम भी उस आनन्द के भागीदार हों।

અયોધ્યાપુરીમાં અનંત તીર્થંકરો જન્મ્યા; તેમાં આ ચોવીસીમાં પાંચ अयोध्यापुरी में अनंत तीर्थंकर जन्मे; उनमें से इस चौवीसी के पाँच तीर्थंकरों ने अयोध्या में जन्म लिया - श्री ऋषभदेव, अजितनाथ, अभिनन्दन, सुमतिनाथ एवं अनन्तनाथ; उन्हें नमस्कार हो ! (१०)

卐 अयोध्या में ऋषभ अवतार 卐

इस भरतक्षेत्र में तीसरे आरे के पिछले भाग में, जब भोगभूमि मिटकर कर्मभूमि की व्यवस्था होने लगी तब, जीवननिर्वाह की योग्यविधि बतलाकर प्रजा का पालन करनेवाले एक के पश्चात् एक ऐसे १४ कुलकर हुए। वे सब एक-दूसरे के पुत्र ही थे और पूर्व विदेहक्षेत्र में मनुष्य-आयु बाँधकर पश्चात् क्षायिक सम्यक्त्व प्राप्त करके यहीं भोगभूमि में अवतरित हुए थे। उन्हें पूर्वभव का जातिस्मरण था। उनमें अन्तिम कुलकर नाभिराजा हुए। उनकी मरुदेवी नामक रानी थी जो रूप और गुणों में इन्द्राणी समान थी, जगत की उत्तम एवं मंगल स्त्रियों में श्रेष्ठ थी, गुणरत्नों की खान थी, पवित्र सरस्वतीदेवी थी, और बिना पढ़े पण्डिता थी। इन्द्र द्वारा प्रेरित उत्तम देवों ने महान विभूतिसहित उन मरुदेवी का विवाहोत्सव किया था। नाभिराजा और मरुदेवी इन्द्र-इन्द्राणी समान सुशोभित होते थे। संसार में वे सर्वाधिक पुण्यवान थे, क्योंकि स्वयंभू भगवान ऋषभदेव जिनके पुत्र होंगे उनके समान दूसरा कौन हो सकता है !

ऐसे मरुदेवी और नाभिराजा जिस भूमिमें रहते थे उस भूमि में जब कल्पवृक्षों का अभाव हुआ तब उनके पुण्यप्रताप से इन्द्र ने वहाँ एक सुन्दर नगरी की रचना की। देवों द्वारा रचित उस नगरी की शोभा का क्या कहना ! उस नगरी का नाम अयोध्या। कोई शत्रु उसके सामने युद्ध नहीं कर सकता था इसलिये वह वास्तव में ‘अयोध्या’ थी। -[अरिभिः योद्धुं न शक्या - अयोध्या] उस नगरी के अन्य नाम - साकेतपुरी, सुकौशला तथा विनीता थे। उस अयोध्या नगरी के बीच देवों ने ‘सर्वतो भद्र’ नामक सुन्दर राजमहल बनाया और शुभमुहूर्त में उस नगरीकी वास्तुपूजा करके उसमें नाभिराजा - मरुदेवी आदि को आनन्दपूर्वक निवास कराया; ‘उन दोनों के यहाँ तीर्थंकर ऋषभदेव पुत्र रुप में अवतार लेंगे’ ऐसा विचारकर इन्द्रने उनका राज्याभिषेक करके सन्मान किया।

ऋषभदेव - गर्भ कल्याणक

अब छह मास पश्चात् भगवान ऋषभदेव सर्वार्थसिद्धि में से च्यवकर इस अयोध्यापुरी में अवतार लेंगे, ऐसा जानकर देवों ने अत्यन्त आदरपूर्वक आकाश से रत्नवृष्टि प्रारम्भ की। मानो ऋषभदेव के आगमन से पूर्व ही उनकी सम्पदा आ गयी हो - ऐसी सुशोभित करोड़ों रत्नों की तथा सुवर्ण की वृष्टि प्रतिदिन होती थी। तीर्थंकरों का ऐसा ही कोई आश्चर्यकारी महान प्रभाव है। पन्द्रह मास तक वह रत्नवृष्टि होती रही। उस गर्भावतरण उत्सव के समय समस्त लोक में हर्षकारी क्षोभ फैल गया था। माता मरुदेवी रजस्वला हुए बिना ही पुत्रवती हुई थीं।

एक मंगल दिवस को रात्रि के पिछले प्रहर में मरुदेवी माताने तीर्थंकरदेव के जन्म को सूचित करनेवाले तथा उत्तम फल देनेवाले १६ मंगल स्वप्न देखे तथा सुवर्णसमान एक उत्तम वृषभ (बैल) अपने मुख में प्रविष्ट होते देखा।

प्रभात हुआ; राजमहल में मंगल वाद्य बजने लगे और दासियाँ मंगल - गीत गाने लगी कि - "हे माता ! जागो; आपके जागरण की बेला हुई है; पंचपरमेष्ठी के ध्यान का यह समय है; पंचपरमेष्ठी के ध्यान द्वारा आपका प्रभात सदा मंगलमय हो, आप शताधिक कल्याणों को प्राप्त होओ, और जिस प्रकार पूर्व दिशा जगमगाते हुए सूर्य को जन्म देती है उसी प्रकार आप जगत के प्रकाशक ऐसे त्रिलोक-दीपक तीर्थंकर-पुत्र को जन्म दो।’

ऐसे मंगल-शब्दोच्चार से मरुदेवीमाता जागीं; उत्तम स्वप्न देखने से उन्हें अत्यन्त आनन्द हो रहा था और सारा जगत अतिशय प्रमोद भरा लग रहा था। पश्चात् राजभवन में जाकर महाराजा नाभि से अपने मंगल स्वप्नों की बात कहीं कि - हे देव ! मैंने आज रात्रि के पिछले प्रहर में आश्चर्यकारी १६ स्वप्न देखे हैं; उनका क्या फल है ? वह आपके श्रीमुख से सुनना चाहती हूँ।

तब नाभिराय महाराजने अवधिज्ञान द्वारा उन स्वप्नों का उत्तम फल जान लिया और कहने लगे कि 'हे देवी, सुनो ! इस भरतक्षेत्र के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का आत्मा तुम्हारी कोख में आया हैं, इसलिये तुम ‘रत्नकोख धारिणी’ बनी हो। तुम्हारे देखे हुए मंगलस्वप्न ऐसा सूचित करते हैं कि अपना पुत्र महान गुणसंपन्न होगा। उनका अलग-अलग विवरण इस प्रकार है:-

(१६ स्वप्नों का फल)

(१) गज देखने से देवी तेरे पुत्र उत्तम होयगा,
(२) वर वृषभ का है फल यही वह जगतगुरु भी होयगा
(३) वह सिहदर्शन से अपूरव शक्तिधारी होयगा,
(४) पुष्प उत्तम माल से वह तीर्थकर्ता होयगा.
(५) कमलान्हवन का फल यहा सुरगिरिन्हवन सुरपति करे,
(६) अरु पूर्णशशि के देखने से जगतजन सब सुख भरे.
(७) वर सूर्य से वह हो प्रतापी, (८) कुम्भ-युगल से निधिपति,
(९) सर देखने से सुभग लक्षण धार होवे जिनपति,
(१०) युगमीन खेलत देखने से हे प्रिये चित्त धर सुनो,
卐 होवे महाआनन्दमय वह पुत्र अनुपम गुण घनो
(११) सागर निरखते जगत का गुरु सर्वज्ञानी होयगा,
(१२) वर सिह-आसन देखने से राज्यस्वामी होयगा
(१३) अरु सुर-विमान सुफल यही वह स्वर्ग से चय होयगा,
(१४) नागेन्द्र-भवन विलास से वह अवधिज्ञानी होयगा
(१५) बहु रत्नराशि दिखाव से वह गुण खज़ाना होयगा,
(१६) वर धूमरहित जु अग्नि से वह कर्मध्वंसक होयगा
卐 वर वृषभ मुखप्रवेश फल श्री वृषभ तुझ उर अवतरे,
हे देवी ! तू पुण्यात्मा आनन्द-मंगल नित भरे.

नाभिराजा के श्रीमुख से ऐसा स्वप्नफल सुनकर मरुदेवी को अत्यन्त हर्ष हुआ। इस प्रकार इस चौबीसी के तीसरे आरे मे (सुखम-दुःखमकाल में) जब चौरासी लाख पूर्व तीन वर्ष आठ मास और एक पक्ष शेष थे तब, अषाढ कृष्णा द्वितिया के शुभ दिन, उत्तराषाढ नक्षत्र में, वज्रनाभि अहमिन्द्र की देवलोक की आयु पूर्ण होने पर सर्वार्थसिद्धि विमान में से च्यवकर ऋषभतीर्थंकर मरुदेवी माता के गर्भ में आये।

भगवान का गर्भावतरण होते ही इन्द्रलोक मे घण्टनाद आदि अनेक मंगलचिह्न प्रगट हुए; उन परसे भगवान के गर्भकल्याणक का प्रसंग जानकर इन्द्रादि देव वहाँ आये और अयोध्यानगरी की प्रदक्षिणा करके भगवान के माता-पिता को नमस्कार किया। कही बाजे बज रहे थे, कहीं गीत गाये जा रहे थे, कहीं नृत्य हो रहे थे; इस प्रकार मंगल-उत्सव हुआ। दिक्कुमारी देवियाँ अनेक प्रकार से मरुदेवी माता की सेवा करती थी तथा विविध गोष्ठी द्वारा उन्हें प्रसन्न रखती थीं और कहती थीं कि हे माता ! गर्भस्थ पुत्र द्वारा आपने जगत का संताप नष्ट किया है इसलिये आप जगत को पावन करनेवाली जगत् माता हैं। हे माता ! आपका वह पुत्र जयवंत हो जो कि जगत्-विजेता है, सर्वज्ञ है, तीर्थंकर है, सज्जनों का आधार है और कृतकृत्य है। हे कल्याणी माता ! आपका वह पुत्र सैकड़ों कल्याण दर्शाकर, पुनरागमन रहित ऐसे मोक्षस्थान को प्राप्त करेगा।

वे देवियाँ अनेक प्रकार से आनन्द-प्रमोदसहित मरुदेवी माता के साथ प्रश्न-चर्चा भी करती थीं। मरुदेवी माता सहज बुद्धि से ऐसे सुन्दर उत्तर देतीं - मानो उनके उदर में विद्यमान तीर्थंकर ही बोल रहे हों ! कैसे सुन्दर थे वे प्रश्नोत्तर वह सब हम भी पढ़े:-

देवी - हे माता ! जगत में उत्तम रत्न कौन सा है ?
माता - सम्यग्दर्शन रत्न जगत मे सर्वश्रेष्ठ है।
देवी - जगत में किसका अवतार सफल है ?
माता - जो आत्मा की साधना करे उसका अवतार सफल है।
देवी - हे माता ! जगत में कौन स्त्री उत्तम है ?
माता - जो तीर्थंकर समान पुत्र को जन्म दे वह, और जो सम्यग्दर्शन प्राप्त करके स्त्रीपर्याय का
छेद करे वह।
देवी - हे माता जगत में बहरा कौन है !
माता - जो जिन वचन को नही सुनता। ’
देवी - माता ! शीघ्र करने योग्य कार्य कौनसा है ?
माता - मोह का त्याग और मोक्ष की साधना।
देवी - हे माता ! किसे जीतने से तीनों जगत वश में होते हैं।
माता - मोह को जीतने से तीनों जगत वश मे होते हैं।
देवी - जगत में किसकी उपासना की जाय ?
माता - पंचपरमेष्ठी भगवान की और उनके जैसे अपने शुद्धात्मा की।

(तत्त्वचर्चा मे मरुदेवी माता के आनन्दकारी उत्तर सुनकर अति प्रसन्नता हाने से देवियाँ पुनः नये-नये प्रश्न पूछती हैं-)

देवी - देवेन्द्र जिसे पूजें ऐसा उत्तम पुरुष कौन ?
माता - ‘मेरा पुत्र’ अर्थात् तीर्थंकर भगवान।
देवी - संसार के जीव क्यों दुःख पाते हैं ?
माता - सुख से भरपूर आत्मा का अनुभव नही करते इसलिये।
देवी - हे माता ! पुरुष नाम की सफलता कब है ?
माता - मोक्ष का पुरुषार्थ करे तब।
देवी - नर काहे के बिना पशुसमान है ?
माता - भेदज्ञानरूप विद्यारहित नर पशुसमान है।
देवी - हे माता ! जगत में कौन-सा कार्य उत्तम है ?
माता - आत्मध्यान वह जगत में कौन-सा कार्य उत्तम कार्य है।
देवी - हे माता ! आपके अंतर में कौन विराजमान है ?
माता - जगत्गुरु भगवान ऋषभदेव !

ज्ञानमय एवं उत्कृष्ट ज्योतिस्वरूप ऐसे तीर्थंकर पुत्र को मैं अपने उदर में धारण किये हूँ -ऐसा जानकर वे माता आनन्दित और सन्तुष्ट रहती थीं। जैसे रत्नों से भरी भूमि अति शोभायमान होती है, वैसे ही जिनके गर्भ में तीर्थंकर समान रत्न भरे हैं वे माताजी अत्यन्त शोभा देती थीं; उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता था। भगवान का कोई ऐसा प्रभाव था कि गर्भ वृद्धि होने पर भी माता के शरीर में कोई विकृति नहीं हुई थी। जिस प्रकार स्फटिकमणि के गृह में दीपक शोभता है, उसी प्रकार मरुदेवी माता के निर्मल गर्भगृह में मति-श्रुत-अवधि ऐसे तीन ज्ञानरूपी दीपक से विशुद्ध भगवान शोभा देते थे। इन्द्रानी भी गुप्त रुप से मरुदेवी माता की सेवा करती थी और जगत के लोग भी उन्हें नमन करते थे। अधिक क्या कहे ? त्रिलोक में वे प्रशंसनीय थीं, और जगत के नाथ ऐसे ऋषभ-तीर्थंकर की जननी होने से वे समस्त लोक की जननी थी और जगत को आनन्द देनेवाली थीं।

‘माता ! तेरे दर्शन भी जगत को आनन्दकारी हैं…’

इस प्रकार प्रगट रूप से अनेक मंगलयुक्त तथा देवियो द्वारा पूज्य ऐसी मरुदेवीमाता परम सुखकारी तथा तीन लोक में आश्चर्यकारी ऐसे भगवान ऋषभदेवरूपी तेजस्वी पुत्रको धारण कर रही थीं।

(इस प्रकार ऋषभदेव प्रभु के गर्भकल्याणक का वर्णन समाप्त हुआ।)

卐 अयोध्या नगरी में ऋषभदेव जन्मकल्याणक 卐

मंगल वधाई 卐 सवानौ मास पश्चात् चैत्रकृष्णा नवमीं के सुप्रभात मे, जिस प्रकार पूर्व दिशा मे सूर्योदय होता है उसी प्रकार मरुदेवी माता ने भगवान ऋषभदेव को जन्म दिया।

तीन ज्ञान से सुशोभित भगवान का जन्म होते ही तीनो लोक मे आनन्द छा गया पृथ्वी आनन्द से झूम उठी और समुद्र आनन्दसे उमड़ने लगा; आकाश निर्मल हो गया, दसो दिशाएँ प्रकाशित हो उठी, प्रजाजन हर्षित हो उठे और देवों को भी आश्चर्य हुआ। कल्पवृक्षों से पुष्पवर्षा होने लगी, सुगन्धित वायु बहने लगी, इन्द्र का आसन डोलने लगा ! स्वर्ग के बाजे, घट एवं शंख अपने आप बजने लगे। भगवान ऋषभदेव के अवतार से सर्वत्र आनन्द-आनन्द छा गया।

सिंहासन कम्पायमान होने से इन्द्र ने अवधिज्ञान द्वारा जान लिया कि अयोध्यानगरी में भव्य जीवों को विकसित करनेवाले तीर्थंकर देव का अवतार हो चुका है; तुरन्त ही इन्द्र ने सिंहासन से नीचे उतरकर तीर्थंकर को नमस्कार किया और उनका जन्मोत्सव मनाने के लिये ऐरावत हाथी पर बैठकर ठाटबाट से अयोध्यापुरी में आये। माताजी के महल में जाकर इन्द्राणी ने अत्यन्त प्रेम से ऋषभकुमार के तथा जिनमाता मरुदेवी के दर्शन किये और प्रदक्षिणा देकर स्तुति करने लगी; हे माता ! आप मंगलरूप हैं पुण्यवान हैं, महान देवी हैं, और तीन लोक कल्याण करनेवाली हैं।

पश्चात् इन्द्रजाल द्वारा माताजी को निद्राधीन कर दिया और विक्रिया द्वारा दूसरा मायामयी शिशु उनके पास रखकर जिनकुमार को उठा लिया। अहो ! चूड़ामणि रत्नसमान उन जगद्गुरु जिन बालकको अपने दो हाथों में उठाते हुए इन्द्राणीको परम हर्ष हुआ; उत्कृष्ट प्रीतिपूर्वक वह बारम्बार बालकका मुख देख रही थी। बारम्बार उसके शरीर का स्पर्श कर रही थी और उसे बारम्बार सूँघती थी। अत्यन्त दुर्लभ ऐसे भगवान का स्पर्श प्राप्त होने से मानो तीन लोक का वैभव प्राप्त हुआ हो - ऐसी प्रसन्नता का अनुभव कर रही थी। इस प्रकार आनन्दपूर्वक भगवान को लेकर इन्द्राणी जा रही थी तब तीन लोक में मंगलकारी उन जिनभगवान के आगे-आगे दिक्कुमारी देवियाँ अष्टमंगलसहित चल रही थीं। ऐरावत हाथी के निकट आकर इन्द्राणीनें जिनबालक को इन्द्र के हाथ में दिया और इन्द्र अत्यन्त हर्षोल्लासपूर्वक पुलकित नयनों से उनका मनोहारी रूप देखने लगा तथा स्तुति करने लगा कि हे देव ! आप केवलज्ञान सूर्य को उदित करनेवाले उदयाचल हो, अज्ञानांधकार में डूबा हुआ यह जगत आपके द्वारा ही ज्ञानप्रकाश प्राप्त करेगा। आप गुरुओं के भी गुरु हो; गुणों के समुद्र हो, इसलिये आपको नमन करता हूँ। भगवान ! आप त्रिजगत के ज्ञाता हो, इसलिये आपके द्वारा ज्ञानप्राप्ति की इच्छा से हम आपके चरणारविन्द को अति आदरपूर्वक अपने मस्तकपर धारण करते हैं। ऐसी अनेक प्रकार की स्तुति के पश्चात् ऐरावत हाथी पर प्रभु को विराजमान करके देवगण जयजयकारपूर्वक मेरुपर्वत की ओर चले। उस समय देवों के साढ़े बारह करोड़ मंगल वाद्य बज रहे थे और करोड़ों अप्सरा देवियाँ भक्ति से नृत्य कर रहीं थीं।

ऐरावत हाथी पर बैठे सौधर्म इन्द्रने भगवान को गोद में लिया था, ईशान इन्द्रने भक्ति से छत्र लगाया हुआ था और सनत्कुमार तथा माहेन्द्र यह दोनों इन्द्र भगवान को चँवर ढोल रहे थे। इन्द्रों की ऐसी भक्ति तथा ऐसी जिनविभूति देखकर अनेक मिथ्यादृष्टि देव भी सम्यक् जैनमार्ग के श्रद्धानी हो गये थे।

इस प्रकार भगवान के जन्माभिषेक की शोभायात्रा सूर्यचन्द्र से भी बहुत ऊपर ९९००० योजन ऊँचे मेरु पर्वत पर आ पहुँची। जम्बूद्वीपके मुकुट समान यह मेरु पर्वत सोने का है और तीर्थंकर भगवान के अभिषेक के कारण पवित्र तीर्थरुप है, इसलिये सूर्य-चन्द्र आदि ज्योतिषी देवों के विमान सदा उसकी परिक्रमा करते है। ऋद्धिधारी मुनिवर वहाँ जाकर ध्यान धरते है। उसके उपर पहले भद्रशाल वन है, फिर नन्दन वन है, फिर सोमनस वन है, और फिर पाण्डुक वन है। चारों बनो मे चारों दिशाओं में मणिरत्नों से शोभित एक-एक जिनमन्दिर है; पाण्डुकवनमे चारों दिशाओमे स्फटिकमणि की पाण्डुक शिला है, उसपर तीर्थंकरो का जन्माभिषेक होता है, इसलिये वह शिला अति पवित्र एव सिद्धशिला समान शोभायमान है। देव सदा उसकी पूजा करते है। उस पर श्रेष्ठ सिहासन है। सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा करके इन्द्र ने हर्षपूर्वक बालतीर्थंकर को पाण्डुकशिला पर विराजमान किया; तब मानो जिनेन्द्रदेव की जननी हो इस प्रकार वह पाण्डुकशिला सुशोभित हो उठी। जिनेन्द्र भगवान के जन्म कल्याणक का वैभव देखने के लिये देव चारों ओर बैठ गये। मानो सब देव स्वर्गलोक छोडकर उस मेरुपर्वत पर आ गये हों इस प्रकार वह पर्वत स्वर्गसमान सुशोभित हो रहा था। वहाँ इन्द्रों ने ऐसे दिव्यमण्डप की रचना की थी जिसमे तीनों लोक के समस्त जीव बैठ जायँ तब भी स्थान सँकरा न पडे ! चारों ओर देवों के दुंदुभि बाजे बज रहे थे।

ऐसे आनन्दकारी वातावरण मे इन्द्रोंने विशाल स्वर्णकलशों द्वारा ऋषभतीर्थंकर का जन्माभिषेक प्रारम्भ किया। क्षीर समुद्र से कलश भर-भरकर देव एक-दूसरे के हाथ मे देते थे, और एक साथ अनेक कलश लेने के लिये इन्द्र ने विक्रियाबल से अपने एक हजार हाथ बना लिये थे। हजार-हजार हाथवाले सौधर्म इन्द्र ने जयजयकार सहित जब जिनेन्द्र भगवान के मस्तक पर प्रथम जलधारा छोडी तब अन्य करोड़ों देव भी हर्षविभोर होकर जयजयकारपूर्वक महान कोलाहल करने लगे। अहा ! उस जिन अभिषेक की महिमा का क्या वर्णन किया जाये । यद्यपि गगा और सिन्धु नदियों जैसी जलधारा मस्तक पर गिर रही थी तथापि वे बालतीर्थंकर मेरुसमान निश्चल थे और अपने अद्भुत माहात्म्य द्वारा लीलामात्र में वह जलधारा झेल रहे थे। भगवान तो स्वय पवित्र ही थे, और अपने पावन अग के स्पर्श के द्वारा उन्होने उस पानी को भी पवित्र बना दिया था। तथा उन पानीने समस्त दिशा मे फैलकर सारे जगत को पवित्र कर दिया था ! उस पानी की फुहार उपर उड़ने से उसके स्पर्श से प्रसन्न होकर आकाश भी मानो हँस रहा हो ऐसा शोभायमान लग रहा था। उस काल मेरुपर्वत की शोभा देवों को भी ऐसी अभूतपूर्व लग रही थी -मानो पहले कभी देखी न हो ! कलकल करता हुआ अभिषेक जल का प्रवाह अमृतसमान शोभा दे रहा था और ऐसा लग रहा था मानो भगवान का यशोगान कर रहा हो। भगवान के जन्माभिषेक से सारी पृथ्वी तृप्त हो गइ थी, समस्त देश में कोई उपद्रव नहीं था, समस्त प्रजा कल्याणरुप थी। अहा !

उन तीर्थंकर के अभिषेक ने जगत के प्राणियों का कोई कल्याण बाकी नहीं रखा था। अनेक चारणऋद्धिधारी मुनिवर आदरपूर्वक एकाग्र चित्त से वह जिनेन्द्र-जन्मोत्सव निहार रहे थे; विद्याधर आश्चर्य से देख रहे थे। देव आनन्दित होकर जन्मकल्याणक सम्बन्धी अनेक नाटक कर रहे थे ..दुंदुभि वाद्यो का स्वर गूंज रहा था; सुगन्धयुक्त गन्धोदक को देवगण भक्तिसहित अपने मस्तक पर चढ़ा रहे थे और सर्वत्र जिन महिमा का गान हो रहा था।

१

भगवान ऋषभदेव (भाग ४)

अभिषेक के पश्चात् इन्द्रों ने जिनभगवान की पूजा की और जन्माभिषेक की विधि समाप्त हुई। भगवान मेरुपर्वत पर चूड़ामणि रत्न के समान सुशोभित हो रहे थे। इन्द्र जिनका अभिषेक कर रहा था, मेरुपर्वत समान जिनके स्नान का उच्चासन था, इन्द्रानी जहाँ आनन्दपूर्वक नृत्य कर रही थी, देव जहाँ दास थे और क्षीरसागर जिनके स्नान जल का घट था, - ऐसे अति प्रशंसनीय पवित्र आत्मा भगवान ऋषभदेव समस्त जगत को पवित्र करें ..सदा जयवंत हों !

(इस प्रकार ऋषभदेव तीर्थंकर के जन्माभिषेक का वर्णन समाप्त हुआ।)

अभिषेक के पश्चात् इन्द्रानीने भगवान के शरीर को उत्तम वस्त्र द्वारा पोंछा और हर्ष पूर्वक स्वर्ग से लाये हुए वस्त्राभूषण जगत्गुरु भगवान ऋषभदेव को पहिनाये। फिर अत्यन्त आदरसहित भगवान के ललाट पर तिलक लगाया। परन्तु जगत के तिलकस्वरुप ऐसे भगवान की शोभा क्या उस तिलक से थी ? - नहीं, उलटा वह तिलक भगवान के कारण सुशोभित हो रहा था। जगत् के मुकुट स्वरूप ऐसे भगवान को इन्द्रानीने अनेक दैवी आभूषण पहिनाये। भगवान के कर्ण बिना बींधे ही छिद्रयुक्त थे, उनमे इन्द्रानी ने उत्तम मणिमय कुण्डल पहिनाये।

इस प्रकार वस्त्राभूषणोंसे शोभित भगवान के अद्भुत रूप को देखकर स्वय इन्द्रानी को भी महान आश्चर्य हुआ। इन्द्र भी आश्चर्यपूर्वक भगवान का रूप देखने लगा। परन्तु दो नेत्रो द्वारा देखनेसे उसे तृप्ति नहीं हुई इसलिए एक हजार नेत्र बनाकर भगवान का रूप देखने लगा। पश्चात् भक्तिपूर्वक तीर्थंकर भगवान की स्तुति करने लगा कि - हे देव ! हमे परम-आनन्द देने के लिये आपका अवतार है। आपकी वचनकिरणों द्वारा हमारे अंतर का अज्ञानाधकार नष्ट होता है। प्रभो ! आप देवों मे आदिदेव हो, आप त्रिजगत के आदिगुरू हो, आप आदि विधाता (मोक्ष की विधि समझाने वाले) हो, तथा आप धर्म के आदिनायक हो। आप ही जगत के पिता हो। प्रभो ! आप तो पवित्र ही हो, परन्तु पापसे मलिन ऐसा यह जगत आपके जन्माभिषेक द्वारा पवित्र हुआ है, तथा यह मेरुपर्वत और क्षीरसमुद्र भी पावन हुए हैं। हे नाथ ! परब्रह्म परमात्मा दिखायी नहीं देते ऐसा कोई कहते हैं वह असत्य है,क्योकि परम ज्योतिस्वरूप परमात्मा ऐसे आप आज हमें प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रहे हो !

हे भगवान ! आपका आत्मा पवित्र है इसलिये आपको नमस्कार हो ! आपके गुण सर्वत्र प्रसिद्ध हैं इसलिये नमस्कार हो ! आप जन्म-मरण का नाश करनेवाले हो इसलिये आपको नमस्कार हो ! आप त्रिजगत के परमेश्वर हो इसलिये आपको नमस्कार हो !

प्रभो ! आप पृथ्वीसमान क्षमावन्त हो, जलसमान सबको आहलादित करनेवाले हो, वायुसमान निष्परिग्रही हो; अग्निसमान आपका ध्यानतेज सदा प्रदीप्त है, तथा आकाश के समान आप सदा निर्विकारी हो। (मेरु पर इन्द्र ऋषभदेव भगवान की स्तुति कर रहा है :slight_smile:

हे प्रभो ! पूर्व दसवें भव मे महाबल राजाकी पर्याय में आपने आत्मा में जैनधर्म के संस्कारों का बीजारोपण किया था; पश्चात् उनका सिंचन करते-करते चौथे भव में आपने भोगभूमि में सम्यग्दर्शन प्राप्त किया, और पश्चात् उसमे वृध्दि होते-होते दसवें भव में आपने परमात्मपद प्राप्त किया। उन दस अवतारोंका स्मरण करते हुए आत्मसाधना के भाव जागृत होते हैं।

(उन दसों अवतार के नामों को वर्तमान में प्रयुक्त करके इन्द्र स्तुति करता है–)

१ महान बलके धारक होने से आप ‘महाबल’ हो।
२ ललित-अंग के धारक होने से आप ‘ललितांग’ हो।
३. धर्मतीर्थ प्रवर्तन कराने मे आप शक्तिवान ‘वज्रजंघ’ हो।
४ आप सुविशुध्द-पूज्य होने से ‘आर्य’ हो।
५ दिव्य श्री अर्थात् शोभाके धारक आप ‘श्रीधर’ हो।
६ उत्तम भाग्यवान होनेसे आप ‘सुविधि’ हो।
७ अविनाशी पदके स्वामी होनेसे आप ‘अच्युतेन्द्र’ हो।
८. वज्रसमान नाभि के धारक आप ‘वज्रनाभि’ हो।
९ सर्व प्रयोजनसिध्द होनेसे आप ‘सर्वार्थसिध्द’ हो।
१०. दस अवतारोंमें अन्तिम अवतार प्राप्त आप ‘ऋषभदेव’ हो।

इस प्रकार भगवानकी स्तुति करते-करते उनके दस भव भी बतला दिये। स्तुति करने के पश्चात् भगवानको ऐरावत हाथीपर विराजमान करके इन्द्र आनन्दपूर्वक अयोध्यानगरी में आये।

अयोध्या में उत्सवकीनो, घर-घर मंगलाचार जी…

भगवान की जन्म-कल्याणक शोभायात्रा को लेकर इन्द्र अयोध्या में आया और बालप्रभु को नाभिराजा के महल में सिंहासन पर विराजमान किया। उन प्रियदर्शन भगवान को देखकर नाभिराजा का शरीर हर्ष से रोमांचित हो गया और मायामयी निद्रा दूर होने पर माता मरुदेवी भी हर्षपूर्वक भगवानको देखने लगीं। पश्चात् माता-पिताने प्रसन्नचित्त से इन्द्र-इन्द्राणी की ओर देखा। इन्द्रइन्द्राणीने महामूल्यवान आभूषण अर्पित करके माता-पिता का सन्मान किया और गुणगान किया कि आप महान धन्य हैं, लोक में सर्वश्रेष्ठ पुत्र गुणगान किया कि आप महान धन्य हैं, लोक में सर्वश्रेष्ठ पुत्र आपके घर अवतरित हुआ है। आप जगत के गुरु के भी गुरु (माता-पिता) हैं, आप अनेक कल्याण को प्राप्त करनेवाले हैं, आप का यह महल आज जिनालय समान पूज्य हैं। क्योंकि उसमें साक्षात् जिनवर विराजमान हैं।

गुणगान करने के पश्चात् इन्द्र ने मेरू पर किये हुए जन्माभिषेक-उत्सव का उत्तम वर्णन किया, जिसे सुनकर माता-पिता को परम हर्ष एवं आश्चर्य हुआ। उन्होंने नगरजनों के साथ महान विभूतिसहित अयोध्यापुरी में पुनः भगवान का जन्मोत्सव किया। उस समय अयोध्यानगरी स्वर्गपुरी के समान सुशोभित हो रही थी। सारे जगत को आनन्दित करनेवाला उत्सव अयोध्यापुरी में हुआ। नगरजनों का हर्षोल्लास देखकर इन्द्रने भी आनन्द नाम के नाटक द्वारा अपना आनन्द व्यक्त करते हुए पश्चात् अद्भुत ताण्डव नृत्य किया। नाटक द्वारा भगवान के महाबल आदि दस भव तथा गर्भ एवं जन्मकल्याणक के दृश्य प्रदर्शित किये। उस समय गम्भीर नाद पूर्वक एक साथ करोड़ों बाजे बज रहे थे ..और इन्द्र हजार हाथ तथा हजार नेत्र बनाकर आनन्द-नृत्य कर रहा था; उसकी उँगली पर देवियाँ नाचती थी। इन्द्रका आश्चर्यकारी नृत्य देखकर महाराजा और महादेवी चकित हो गये। इन्द्रोंने जगतमें श्रेष्ठ ऐसे भगवान का ‘वृषभदेव’ नाम रखा। वृष अर्थात् उत्तम धर्म, उसके द्वारा (भाति) शोभायमान होने से तीर्थंकर भगवान को इन्द्र ने वृषभस्वामी कहा, अथवा भगवान को ‘पुरुदेव’ नाम से भी सम्बोधन किया। पश्चात् अनेक देवकुमारों तथा देवियों को भगवान की सेवा में नियुक्त करके इन्द्र अपने-अपने स्वर्ग मे चले गये। प्रभुके चरण मे 'वृषभ चिह्न था।

भगवान ऋषभकुमार की बालचेष्टा

भगवान ऋषभकुमार की बालचेष्टाएँ आश्चर्यजनक थीं। वे मन्द-मन्द हास्य द्वारा माता-पिता के आनन्द मे वृद्धि करते थे। चन्द्रमा के समान वृद्धिंगत उनकी उज्ज्वल बाल्यावस्था जगत को आनन्द देनेवाली थी। क्रमानुकूल भगवान को वाणी प्रगट हुई, फिर धीरे-धीरे ठुमक-ठुमक कर चलने लगे. और सबका आनन्द बढाने लगे। छोटे से भगवान देवबालकों के साथ रत्नो की धूल मे खेलने और माता-पिता एवं प्रजाजनों को आह्लादित करते थे।

धीरे - धीरे बचपन वीता और भगवान किशोर अवस्था को प्राप्त हुए। महाप्रतापी भगवान का शरीर किशोरावस्था में अत्यन्त सौन्दर्य से खिल उठा। और गुणों में भी वृद्धि होने लगी। उस काल उनका मनोहर शरीर, मधुरवाणी, मीठी दृष्टि और मुस्कराहट पूर्ण मुखाकृति - वे सब संसार की प्रीति को भुलाकर भगवान के प्रति प्रीति उत्पन्न करते थे।

मति - श्रुत - अवधि इन तीन ज्ञानसहित तो भगवान अवतरित हुए थे। पूर्व भव के संस्कारों में किसीके सिखाये बिना ही वे सर्व विद्याओं में पारंगत थे। क्षायिक सम्यग्दर्शन द्वारा उनका चित्त निर्मल था और स्वभाव से ही उन्हे शास्त्रज्ञान था, जिसके कारण उनके परिणाम अति शांत रहते थे और उनकी चेष्टाएँ जगत का हित करनेवाली थीं। ज्यो - ज्यों उनका शरीर और गुणों में वृद्धि होती गई त्यों त्यों लोगों का हर्ष भी बढ़ता जा रहा था। इस प्रकार जगत को आनन्द में वृद्धि करते हुए वे स्वयं वृद्धि को प्राप्त हो रहे थे। पूर्व सस्कारो से प्राप्त अनेक प्रकार की विद्याएं (लिपिविद्या, गणित विद्या आदि) तथा कलाएँ (सगीत, चित्रकला आदि) वे दूसरों को सिखाते थे। कभी मोर, तोता, हंस, मुर्गा या हाथी के बच्चे का रूप धारण करनेवाले देवकुमारो के साथ आनन्द से क्रीडा करते, तो कभी देवियों द्वारा पूरी गई रत्नो की रंगोली प्रसन्नता से देखते थे; कभी स्वयको देखने आये प्रजाजनों के साथ मधुर हास्य सहित सभाषण करके उन्हे प्रमुदित करते थे, - इस प्रकार ऋषभकुँवर सुखपूर्वक रहते और प्रतिदिन इन्द्र के भेजे हुए श्रेष्ठ वस्त्राभूषणादि भोगो का उपयोग करते थे।

ऋषभकुमार का विवाह और भरत आदि १०१ पुत्र

ऋषभकुमार युवावस्था को प्राप्त हुए, उनका रूप-लावण्य अद्भुत शोभायमान हो उठा। उनका रक्त दूध के समान श्वेत था, शरीर में किसी प्रकारका मैल या प्रस्वेद नहीं था; विष या शस्त्र से अभेद्य परमऔदारिक था और मोक्ष का कारण था। भगवान के शरीर पर स्वस्तिक, कमल, समुद्र, हाथी, सिंह, सूर्य, चन्द्र, रत्नद्वीप, वृषभ, जम्बूद्वीप, आठ प्रतिहार्य, अष्टमंगल द्रव्य आदि १००८ सुलक्षण शोभायमान थे। राग-द्वेष रहित भगवान के चित्त मे चंचल लक्ष्मी के प्रति अत्यल्प प्रेम था।

भगवान की युवावस्था देखकर नाभिराजा एक दिन सोचने लगे कि - इन ऋषभदेव के चित्त को हर ले ऐसी सुन्दर कन्या कहाँ होगी ? और कदाचित ऐसी कन्या मिल भी जाय तो विषयराग अति मन्द होने से इनका विवाह करना कठिन है। तथा दूसरी बात यह है कि - धर्मतीर्थ की प्रवृत्ति हेतु उनका महान उद्यम है इसलिये वे अवश्य ही ससार बधन तोड़कर मस्त हाथी का भाँति वन मे चले जायेंगे और दीक्षा धारण करेगे। तथापि, दीक्षाकाल आने से पूर्व इनके लिये योग्य कन्या का विचार करना चाहिये।

-ऐसा विचार कर, नाभिराजा भगवान के पास गये और बोले हे देव ! आप तो जगत के अधिपति एव स्वयभू हो, आपकी उत्पत्ति मे हम माता-पिता है यह तो मात्र लोकव्यवहार है। मेरी अभ्यर्थना है कि आप संसारसृष्टि मे भी अपना चित्त लगाओ और किसी श्रेष्ठ कन्या के साथ विवाह की समति दो। यदि आप मुझे किसी भी प्रकार गुरु (बड़ा) मानते हों तो मेरे वचनका उल्लंघन नहीं करना चाहिये।

इतना कहकर नाभिराजा चुप रहे, तब भगवानने सहज हँसते हँसते ‘ओम्’ कहकर उस बात का स्वीकार किया। नाभिराजाने अत्यन्त हर्षपूर्वक इन्द्र की सलाह लेकर कच्छ और महाकच्छ राजा की दो बहिने यशस्वती एव सुनन्दा के साथ ऋषभकुमार का विवाहोत्सव रचाया। देवों ने भी प्रसन्नता से उस उत्सव मे भाग लिया। पुत्रवधुओं को देखकर नाभिराजा और मरुदेवी अति प्रसन्न हुए। भगवान ऋषभदेव मे कामदेव यद्यपि अतिशय भग्न हो गया था तथापि गुप्त रूप से वह अपना संचार करता था; इसलिये दोनो रानियो के साथ भोगोपभोग में दीर्घकाल व्यतीत हो गया।

एक रात्रि को यशस्वती महादेवी ने स्वप्न मे ग्रास हो गई पृथ्वी, मेरुपर्वत, सूर्य, चन्द्र, हंसयुक्त सरोवर तथा तरगायमान समुद्र देखे। भगवानने अवधिज्ञानरूपी दिव्यचक्षु द्वारा उन उत्तम स्वप्नों का फल जानकर कहा कि - हे देवी ! तेरे महाप्रतापी चक्रवर्ती पुत्र होगा; और तरंगयुक्त समुद्र यह सूचित करता है कि वह पुत्र चरमशरीरी होकर संसारसमुद्र को पार करेगा। तथा इक्ष्वाकुवंश को आनन्द देने वाले तेरे सौ पुत्रों में वह सबसे बड़ा होगा। पति के मुख से स्वप्न का उत्तम फल जानकर यशस्वती देवी को महान हर्ष हुआ।

पूर्वभव में जो अति गृद्ध राजा था; पश्चात् सिंह होकर संल्लेखना धारण कर स्वर्ग में गया था; फिर वृषभदेव की वज्रजंघ पर्यायमें उनका मतिवर नामक मंत्री हुआ था, - जोकि आहारदान के समय उनके साथ था; पश्चात् देव हुआ, फिर सुबाहु हुआ, फिर सर्वार्थसिद्धि में गया; वह जीव वहाँ से च्यवकर यशस्वती देवी की कोख से ऋषभदेव के पुत्ररूप में उत्पन्न हुआ; भरत चक्रवर्ती जैसे उस वीर पुत्र को धारण करनेवाली माता चमचमाती तलवाररूपी दर्पण में अपने मुख की कान्ति देख रही थी और रत्नों से भरी हुई भूमि समान शोभती थी। जिस दिन भगवान ऋषभदेव का जन्म हुआ था ठीक उसी दिन (चैत्र कृष्णा नौवीं के दिन) यशस्वतीदेवी ने भरत चक्रवर्ती को जन्म दिया। जन्मते ही उन्होंने दोनों हाथों से पृथ्वी का आलिंगन किया, जिससे निमित्त ज्ञानियोंने कहा कि वे समस्त पृथ्वी के अधिपति होंगे। ऐसे पुत्र के जन्म से उनके दादा नाभिराय तथा दादीमाँ मरुदेवी परम हर्षित हुए; सौभाग्यवती स्त्रियाँ देवी यशस्वती को शुभाशीष देने लगीं कि - ‘तुम ऐसे सौ पुत्रों की माता होओ-!’ उस समय आनन्द के करोड़ों नगाड़े मेघगर्जन की भाँति गरज रहे थे, अनेक प्रकार के वाद्य बज रहे थे; आकाश में देव-देवियों द्वारा ‘जय हो…जय हो ! चिरंजीव हो !’ ऐसे शब्द गूंज रहे थे। राजमहल में रत्नों की रंगोली और स्वर्णकलश जगह-जगह शोभा दे रहे थे। सारी अयोध्यानगरी में उत्सव हो रहा था। ऋषभदेव ने खूब दान दिया था और भरतक्षेत्र का अधिपति होनेवाले उस पुत्र का ‘भरत’ नामसे नाम संस्करण किया था। इतिहासकार कहते हैं कि हिमवन् पर्वत से लेकर समुद्रतक का क्षेत्र वह ‘भरत’ चक्रवर्ती के नाम से ‘भारतवर्ष’ कहलाया। विधि के जानकर महाराज ऋषभदेव ने उस पुत्र के वस्त्र परिधान एवं मुण्डनादि संस्कार किये थे। भरत की चेष्टाएँ उनके पिता ऋषभदेव जैसी ही थीं। उनकी हथेली चक्रादि शुभचिह्नों से शोभायमान थीं। उनके पाँव में भी चक्र, छत्र, तलवार आदि १४ रत्नों के चिह्न थे, मानो अभी से यह १४ रत्न उनकी सेवा कर रहे हों ! वे चरमशरीरी थे। चक्रवर्ती के क्षेत्र में (छह खण्ड में) रहनेवाले सब मनुष्यों और देवों का जितना बल हो उसकी अपेक्षा अनेक गुना अधिक बल उन चक्रवर्ती की भुजाओं में था। उनकी आकृति एवं स्वभाव दोनों सुन्दर थे। वे एक दिव्य पुरुष थे और उनकी चेष्टाएँ अद्भुत थीं। विशिष्ट पुण्य के कारण उन्हें ऐसी लोकोत्तर सम्पदा प्राप्त हुई थी। जिन्हें अरिहंत पद की लक्ष्मी प्राप्त होनेवाली है ऐसे भगवान ऋषभदेव भरत के आनन्ददायी मुख को देखते थे और जब मधुरवचन सहित प्रणाम करके वे बैठते थे तब बारम्बार आलिंगन करके उन्हें अपनी गोद में बिठाते थे।

पूर्वभव के अन्य साथी भी सर्वार्थसिद्धि में भगवान ऋषभदेव के पुत्ररूप में यशस्वती के कोख से पैदा हुए।

भगवान की वज्रजंघ पर्याय में जो अकम्पन सेनापति था (और वज्रनाभि पर्याय में पीठ नाम का भाई था) वह वृषभसेन नामक पुत्र हुआ। जो धनमित्रसेठ (महापीठ नामका भाई) था वह अनन्तविजय नामक पुत्र हुआ। सिंह का जीव (विजय नाम का भाई) था वह अनन्तवीर्य नामक पुत्र हुआ। शूकर का जीव (वैजयन्त नाम का भाई) था वह अच्युत नामक पुत्र हुआ।

बन्दर का जीव (जयन्त नाम का भाई) था वह वीर नामक पुत्र हुआ। नेवले का जीव (अपराजित नाम का भाई) था वह वरवीर नामक पुत्र हुआ। तदुपरान्त ब्राह्मी नाम की एक पुत्री हुई।

आनन्द पुरोहित का जीव, जो पूर्वभव मे महाबाहु नाम का भाई था, वह सर्वार्थसिद्धि से च्यवकर सुनन्दा रानी की कोख से बाहुबलि नामक पुत्र हुआ; तथा वज्रजंघ पर्याय में जो अनुंधरी नामक बहिन थी वह यहाँ सुन्दरी नाम की सुन्दर पुत्री हुई।

-इस प्रकार भगवान ऋषभदेव के कुल १०१ पुत्र हुए। सभी महाप्रतापी एवं चरमशरीरी थे। भगवान ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर थे, तो उनके प्रतापी पुत्रों में भरत प्रथम चक्रवर्ती, बाहुबलि प्रथम कामदेव और वृषभसेन प्रथम गणधर थे। अहा ! कैसा महान परिवार !

ऐसे उत्तम पुत्र-पुत्रियों के परिवार मे सुशोभित महाराज ऋषभदेव एक बार सिंहासन पर विराजमान थे। वहाँ ब्राह्मी और सुन्दरी दोनों पुत्रियों ने आकर विनयपूर्वक पिताजी को प्रणाम किया। भगवान ने उन्हें गोद में बिठाकर उनके मस्तक पर हाथ फेरा और उन पुत्रियों के साथ विनोद किया, उनके शील एवं विनय की प्रशंसा की। फिर कहा कि - तुम्हारा दोनों के ऐसे अनुपम सौन्दर्य और शील को यदि विद्या द्वारा विभूषित किया जाय तो तुम्हारा जन्म सफल हो जाय ! इस लोक में विद्वान मनुष्य पण्डितों द्वारा सम्मान प्राप्त करते हैं, विद्या ही सच्चा भाई और सच्चा मित्र है, विद्या ही सदा साथ रहने वाला धन है; सच्ची विद्या द्वारा सर्व मनोरथ सिद्ध होते हैं। इसलिये हे पुत्रियो ! तुम विद्या ग्रहण करो।

-ऐसा कहकर भगवान ने उन दोनों को बारम्बार आशीर्वाद दिया, और अपने चित्त में स्थित श्रुतदेवता का स्मरण करके दोनों हाथों से अ आ आदि अक्षरमाला तथा १ २ ३ आदि अंक सिखाये। भगवान के श्रीमुख से निकली हुई और ‘सिद्धमातृका’ जिसका नाम है, तथा ‘सिद्धं नमः’ ऐसा अत्यन्त प्रसिद्ध जिसका मंगलाचरण है - ऐसी शुद्ध अक्षरावलि तथा गणित, व्याकरण काव्यादि समस्त विद्याएँ ब्राह्मी और सुन्दरीने धारण की। पिता ही जिनके गुरु है ऐसी वे दोनो पुत्रियाँ विद्या द्वारा सुशोभित हो गई। भगवान ने भरत - बाहुबलि आदि सर्व पुत्रों को भी चित्रकला, नाट्यकला आदि अनेक प्रकार की विद्याएँ पढाई और साथ ही साथ अध्यात्मविद्या के भी उत्तम संस्कार दिये।

प्रजाजनों को मार्गदर्शन; और राज्याभिषेक

भगवान ऋषभदेव की आयु चौराशी लाख पूर्व की थी; उसमें से कुमारावस्था के बीस लाख पूर्व पूर्ण हुए और काल के प्रभाव से (तीसरा आरा समाप्त होकर चौथा आरा निकट आ रहा था इसलिये) कल्पवृक्ष सूखने लगे, उनकी फल देने की शक्ति कम हो गई; बिना बोये जो अनाज उगते थे वे भी दुर्लभ हो गये और प्रजा में रोगादि फैलने लगे; जिससे भयभीत होकर जीने की आशा से प्रजाजन नाभिराजा के पास आये और नाभिराजाने उन्हें युवराज ऋषभदेव के पास भेजा।

सनातन भगवान की शरण मे आकर प्रजाजन कहने लगे कि हे देव ! पिता समान हमारा पालन करने वाले कल्पवृक्ष अब नष्ट हो गये हैं, भूख-प्यास तथा शीत-उष्णता के अनेक उपद्रव होने लगे हैं, तो इन उपद्रवों से हमारी रक्षा हो और आजीविका चलती रहे ऐसा उपाय बतलायें, हम पर प्रसन्न होकर हमें उपदेश देवे।

प्रजा के दीनबचन सुनकर भगवान के हृदय में दया जागृत हुई। उन्होंने भयभीत प्रजा को आश्वासन दिया और मनमें विचारने लगे कि - कल्पवृक्ष नष्ट होने का कारण यह है कि अब यहाँ भोगभूमि का काल पूर्ण होकर कर्मभूमि का प्रारम्भ हुआ है; इसलिये असि-मसि-कृषि (अर्थात् रक्षा - व्यापार - खेती - लेखन) आदि कार्यों की तथा भिन्न-भिन्न ग्राम, गृह पत्तन आदि की जैसी रचना पूर्व और पश्चिम विदेह क्षेत्र में वर्त रही है वैसी यहाँ प्रवर्तित करना योग्य है, जिससे लोगों की रक्षा एवं आजीविका सुखपूर्वक हो।

ऐसा विचार कर भगवान ने इन्द्र का स्मरण किया कि तुरन्त ही इन्द्र और देव आ पहुँचे और भगवान की आज्ञानुसार शुभमुहूर्त में सर्वप्रथम मांगलिक कार्य करके अयोध्यापुरी के बीचोंबीच विशाल जिनमन्दिर की रचना की और चारों दिशाओं में भी एक-एक जिनमन्दिर का निर्माण किया। पश्चात् सुकौशल, अवन्ति, वत्स, पांचाल, मालव, रम्यक, कुरु, काशी, कलिंग, अंग, बंग, काश्मीर, कच्छ, सुराष्ट्र, महाराष्ट्र, विदर्भ, कुरु जांगल, कोंकण, वनवास, आंध्र, कर्णाट, कौशल, केरल, शूरसेन, विदेह, सिन्धु, गांधार, कम्बोज, केकय आदि अनेक देशों की तथा ग्राम नगरों की रचना की। विजयार्ध - पर्वत से लेकर दक्षिण छोर में लवणसमुद्र तक के उन देशों में प्रजाजनों को बसाकर राजव्यवस्था की। इन्द्र ने पुर-नगर की रचना की इसलिये उसका ‘पुरन्दर’ नाम सार्थक हुआ।

महाराजा ऋषभदेव ने प्रजाजनों को शस्त्र, लेखनी, विद्या, व्यापार, खेती एवं शिल्प - इन छह कार्यों द्वारा आजीविका का उपदेश दिया, क्योंकि वे अभी सरागी थे, वीतराग नहीं थे। इस प्रकार भगवानने छह कर्म के उपदेश द्वारा कर्मयुग का प्रारम्भ किया इसलिये वे ‘कृतयुग’ अथवा ‘युगकर्त्ता’ और वे ही सृष्टि के ब्रह्मा कहलाये। इसके अतिरिक्त कोई ब्रह्मा या सृष्टिकर्त्ता नहीं है। यह सब रचना श्रावण कृष्णा प्रतिपदा के दिन हुई। इस रचना द्वारा प्रजा का पालन किया इसलिये भगवान ‘प्रजापति’ कहलाये। प्रजा सुखपूर्वक रहने लगी।

कुछ समय पश्चात् इन्द्रादि देवों ने आकर भगवान को सम्राट पद पर स्थापित करके महान राज्याभिषेक किया; उस समय असंख्य योजन दूर स्वयंभूरमणसमुद्र से देव दिव्य स्वर्ण कलशों में जल भर-भरकर लाये थे और भगवान का अभिषेक किया था। अभिषेक के पश्चात् स्वर्गलोक से लाये हुए वस्त्राभूषण पहिनाये, और नाभिराजाने अपने मस्तक का राजमुकुट उतारकर भगवान के मस्तक पर पहिनाया; उस समय इन्द्र ने ‘आनन्द’ नामक नाटक द्वारा अपना आनन्द व्यक्त किया।

भगवान ऋषभ राजाने प्रजा का भली भाँति पालन किया और प्रत्येक वर्ग अपने-अपने योग्य कार्यों द्वारा आजीविका उपार्जन करे ऐसे नियम बनाये, तथा प्रजा के योग एवं क्षेम की (अर्थात् नवीन वस्तु की प्राप्ति तथा प्राप्त वस्तु की रक्षा की) व्यवस्था की; और ‘हा, मां ! तथा धिक्’ ऐसे दण्ड की व्यवस्था की। तथा हरि (हरिवंश), अकम्पन (नाथवंश), काश्यप (उग्रवंश) और सोमप्रभ (कुरुवंश) - इन चार क्षत्रियों को माण्डलिक बनाया। उन प्रत्येक के अन्तर्गत अन्य चार हजार राजा थे। भगवानने अपने पुत्रों को भी यथायोग्य महल वाहन आदि सम्पत्ति दी। उस समय भगवानने लोगों को गन्ने के रस का (इक्षुरस का) उपयोग करना बतलाया इसलिये वे इक्ष्वाकु कहलाये।

महाराजा ऋषभदेव का राज्यकाल ६३ लाख पूर्व का था। पुत्र-पौत्रों के साथ इतना दीर्घकाल देखते ही देखते व्यतीत हो गया। इन्द्र उनके लिये स्वर्ग से पुण्यसामग्री भेजता था। इस संसार में पुण्य से क्या प्राप्त नहीं होता ? दान, संयम, क्षमा, सन्तोष आदि शुभ चेष्टा द्वारा पुण्य की प्राप्ति होती है।

संसार मे तीर्थंकरपद तक के उत्तमपद की प्राप्ति पुण्य द्वारा ही होती है। हे पण्डितजन ! श्रेष्ठसुख की प्राप्ति हेतु तुम धर्म का सेवन करो। वास्तविक सुख की प्राप्ति होना वह धर्म का ही फल है। हे सुबुद्धिमान ! तुम सुख चाहते हो तो श्रेष्ठ मुनियों को भक्ति से दान दो, तीर्थंकरों को नमस्कार करके उनकी पूजा करो, शीलव्रतों का पालन करो और पर्व के दिनों में उपवासादि करों; स्वाध्याय करो; साधर्मी का सन्मान करो।

इस प्रकार पूर्व के आराधक पुण्य के प्रताप से, उत्तम देव-देवेन्द्र भी जिनकी आज्ञा शिरोधार्य करते थे, परन्तु जिनके ऊपर किसीकी आज्ञा नहीं चलती थी ऐसे उन महात्मा ऋषभदेव ने अयोध्या के राजसिंहासनपर आरूढ़ होकर समुद्रपर्यन्त समस्त पृथ्वी का राज्य किया।

महाराजा-ऋषभदेव को वैराग्य और दीक्षा

(अयोध्यानगरी और चैत्र कृष्णा नवमीं…)

आज भगवान ऋषभदेव का जन्मदिन आनन्दपूर्वक मनाया जा रहा है। उस उत्सव में सम्मिलित होने के लिये इन्द्र भी अप्सराओं को लेकर आ पहुँचा और भगवान को प्रसन्न करने के लिये नृत्य प्रारम्भ किया भगवान अप्सराओं का अद्भुत नृत्य देख रहे थे।

उस समय इन्द्र को विचार आया कि भगवान ऋषभदेव का अवतार तीर्थंकर होने के लिये हुआ है और वे धर्मचक्र का प्रवर्तन करनेवाले हैं। इस राजवैभव मे उनके ८३ लाख पूर्व तो बीत गये हैं; अब इस राज्य और भोगो मे भगवान कब विरक्त होंगे ! ऐसा विचार कर उसने नीलांजना नाम की एक ऐसी देवी को नृत्य मे लगाया कि जिसकी आयु कुछ ही क्षणों में पूरी होनेवाली थी।

વિદ્યુત-લક્ષ્મી પ્રભુતા પતંગ,
આયુષ તે તો જળના તરંગ,
પુરંદરી-ચાપ અનંગ-રંગ,
શું રાચિયે જ્યાં ક્ષણનો પ્રસંગ !.

वह नीलांजना देवी हावभावसहित घूम-घूमकर नृत्य कर रही थी; नृत्य करते-करते ही उसकी आयु पूर्ण होने से क्षणभर में वह विलुप्त हो गई। बिजली की चमक की भाँति वह देवी अदृश्य होते ही इन्द्रने उसी जैसी दूसरी देवी नृत्य में उतार दी ताकि रंग में भंग न हो; परन्तु दिव्य ज्ञानवंत भगवान वह जान गये और संसार की ऐसी क्षणभंगुरता देखकर तत्क्षण ही भव-तन-भोग से अत्यन्त विरक्त होकर वैराग्य की बारह भावनाओं का चिन्तवन करने लगे।

अरे, उस मनोहर देवी का स्वरूप निमिषमात्र में दृष्टि से ओझल हो गया - अदृश्य हो गया। ऐसा जो माया-नाटक इन्द्र ने किया। वह वास्तव में तो उस बुद्धिमानने मुझे प्रतिबोध देने की युक्ति की है। उस नीलांजनादेवी के दिव्य शरीर की भाँति जगत के सब संयोग क्षणभंगुर हैं, अब मुझे उनसे क्या प्रयोजन? भोगोपभोग तो भाररूप हैं। ऐसे असार संसार से तथा क्षणिक राजभोगों से अब बस होओ! मेरा अवतार इन राजभोगों के हेतु नहीं है, परन्तु आत्मा की पूर्णता साधकर तीर्थंकर होने के लिये मेरा यह अवतार है…यह अवतार मोक्ष साधने के लिये है।

इस प्रकार वैराग्यचिन्तनपूर्वक भगवान इस असार संस. से विरक्त हुए और शीघ्र मुक्तिसाधना के उद्यम में लग गये। उस समय उन्हें ऐसी विशुद्धि प्रगट हुई - मानो मुक्ति की सहेली ही आ पहुँची हो। मोक्ष में ही जिनका चित्त लगा है, से उन भगवान को सारा जगत् शून्य समान असार लग रहा था। भगवान के अंतःकरण की समस्त चेष्टाओं से इन्द्र ने अवधिज्ञान द्वारा जान लिया कि भगवान अब संसार से विरक्त हो गये हैं और मुनिदीक्षा हेतु तत्पर हुए हैं।

तुरन्त ही ब्रह्मस्वर्ग से लौकान्तिक देव भगवान के तपकल्याणक की पूजा करने उतरे और स्तुतिपूर्वक वैराग्य का अनुमोदन किया। आठ प्रकार के वे लोकान्तिक देव पूर्वभव में सम्पूर्ण श्रुतज्ञान के अभ्यासी (श्रुतकेवली) होते है; वे अत्यन्त शान्त और सर्व देवों में उत्तम तथा एकावतारी होते है, लोक का अन्त प्राप्त किया होने से अथवा ब्रह्मलोक के अंत में रहने के कारण उन्हे लोकान्तिक कहा जाता है। मुक्तिसरोवर के किनारे रहे हुए वे देव स्वर्ग के हंस समान हैं। उन्होंने आकर कल्पवृक्ष के फूलों द्वारा भगवान के चरणों में पुष्पांजलि अर्पित की और स्तुति करने लगे कि - हे भगवान! मोह शत्रु को जीतने के लिये आप उद्यमी हुए हैं, उससे ऐसा सूचित होता है कि आपने भव्य जीवो के प्रति भ्रातृत्व का कार्य करने का विचार किया है अर्थात् भ्राता की भाँति भव्य जीवों की सहायता का आपने विचार किया है। हे ज्योतिस्वरूप देव! हम आपको समस्त उत्तम कार्यों का कारण मानते हैं। प्रभो! केवलज्ञान के प्रकाश द्वारा आप अज्ञान में डूबे हुए संसार का उद्धार करेंगे। आप के द्वारा दरशाये गये धर्मतीर्थ को प्राप्त करके भव्य जीव इस दुस्तर संसार समुद्र को लीला मात्रमें पार कर लेंगे। आपकी वाणी भव्य जीवों के मनको प्रफुल्लित करेगी। प्रभो! आप धर्मतीर्थ के नायक हो। मोहरूपी कर्दम में फँसे हुए इस जगत को धर्मरूपी हाथ का अवलम्बन देकर आप शीघ्र उद्धार करेंगे। प्रभो! आप स्वयंभू हो। मोक्ष का मार्ग आपने स्वयं जान लिया है। और हम सबको आप वह मुक्तिमार्ग का उपदेश देंगे। प्रभो! हम आपको प्रेरणावाले कोण? यह तो मात्र हमारा शिष्टाचार है। भव्य-चातक मेघ बरसने की भाँति आपका धर्मामृत की राह देख रहे है। प्रभो! आपका यह काल धर्मरूपी अमृत को उत्पन्न करने के लिये योग्य है, इसलिये हे विधाता! धर्म की सृष्टि करो। प्रभो! अनेक बार भोगे जाचुके भोगों को अब आप छोड़ो। पुनः पुनः चाहे जितनी बार भोगने पर भी उन भोगों के स्वाद में कोई नवीनता नहीं आ जाती; इसलिये उन भोगों को छोड़कर मोक्ष के लिये तत्पर होओ और उद्यम द्वारा मोहशत्रु को जीतो!

इस प्रकार ब्रह्मर्षि देवों द्वारा स्तुति किये जाने पर भगवान ऋषभदेव ने दीक्षा धारण करने की अपनी बुद्धि को दृढ किया। कृतार्थ हुए लोकान्तिक देव हंसों की भाँति आकाशमार्ग को प्रकाशित करते-करते अपने स्वर्ग में चले गये। उसी समय आसन डोलने से इन्द्रादि देवों ने भगवान के तपकल्याणक का अवसर जान लिया और सब उत्सव करने हेतु अयोध्यानगरी में आ पहुँचे। क्षीरसमुद्र के जल से भगवान का महाअभिषेक किया। भगवान ऋषभदेव ने भारतवर्ष के साम्राज्य पर भरत का अभिषेक किया और बाहुबलि को युवराज पद दिया।

एक ओर भगवान की दीक्षा महोत्सव और दूसरी ओर भरत के राज्याभिषेक का उत्सव; - एक साथ ऐसे दो महान उत्सवों से पृथ्वीलोक एवं स्वर्गलोक दोनों आनन्दविभोर हो गये थे। एक ओर भगवान दृढ़ संकल्पसहित राजपाट त्याग कर तप साम्राज्य के लिये कटिबद्ध हुए थे तथा दूसरी ओर राजकुमारों को पृथ्वी का राज्य सौंपा जा रहा था। दिक्कुमारी देवियाँ मंगल द्रव्य लेकर खड़ी थी…चारों ओर मंगल नौबत बाजे बज रहे थे। अयोध्या पुरी में चारों ओर आनन्द-आनन्द छाया हुआ था। करोड़ो देव और करोड़ो मनुष्य एक साथ उत्सव मना रहे थे। दो पुत्रों को राज्यभार सौंपकर तथा शेष ९९ पुत्रों को भी राज्य का भिन्न - भिन्न भाग देकर भगवान दीक्षा हेतु एकदम निराकुल हो गये थे; संसार सम्बन्धी कोई चिन्ता उन्हे नही रही थी।

माता-पिता आदि परिवार की विदा लेकर, इन्द्र द्वारा सजाई गई सुदर्शन नामकी सुन्दर शिविका पर जब भगवान आरूढ़ हुए तब इन्द्र ने अति आदरपूर्वक उन्हें अपने हाथ का सहारा दिया था। भगवान ऋषभदेव पहले तो परमविशुद्धता पर आरूढ़ हुए थे और पश्चात् शिविका पर; इसलिये उस समय भगवान ऐसे लग रहे थे मानो गुणस्थानों की श्रेणी चढ़ने का अभ्यास कर रहे हों। (हरिवंश पुराण में ऐसा आता है कि प्रारम्भ में ३२ डग भगवान स्वयं पैदल चले और फिर इन्द्र की प्रार्थना से पालकी में बैठे।) भक्ति पूर्वक भगवान की पालकी लेकर प्रथम तो भूमिगोचरी राजा सात डग चले, फिर विद्याधर राजा आकाशमार्ग से सात डग चले, और पश्चात् इन्द्र अति हर्षपूर्वक कन्धेपर पालकी लेकर आकाश में चले। अहा ! भगवान की महिमा की क्या बात ! कि देवो के अधिपति इन्द्रोंने स्वयं भी भगवान की पालकी कन्धेपर उठाई थी। भगवान पालकी मे आरूढ़ हुए उस समय करोड़ों दुंदुभि वाद्य बज रहे थे। अद्भुत वैराग्यवैभव से सुशोभित भगवान ऋषभदेव समस्त जगत को आनन्दित करते हुए अयोध्यापुरी से बाहर निकले. उस समय वैराग्यपूरित उनके नेत्रों की चेष्टा अति प्रशान्त थी; असंग वैराग्य दशा को शोभा दे ऐसी उनके अंगोपांग की चेष्टा थी।

भगवान यह क्या कर रहे हैं ? दीक्षा का अर्थ क्या ? उससे अनभिज्ञ प्रजाजन भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि - हे देव ! आप अपना कार्य पूर्ण करके शीघ्र ही हमें दर्शन देने पधारना। प्रभो ! आप महान उपकारी हो, अब हमें छोड़कर और किसका उपकार करने के लिये आप जा रहे हो ?

नगरजन एक-दूसरे के साथ बात करते थे कि यह देवगण भगवान को पालकी में कहीं दूर-दूर लिये जा रहे है, परन्तु क्यों लिये जा रहे हैं वह हमें मालूम नहीं, सम्भवतः भगवान की ऐसी ही कोई क्रीडा हो ! अथवा पहले उनका जन्मोत्सव मनाने के लिये इन्द्र उन्हें मेरु पर्वत पर ले गये थे और फिर वापिस ले आये थे; -ऐसा ही कोई प्रसंग अपने महाभाग्य से बन रहा हो ! तो वह कोई दुःख की बात नहीं है। अहा, भगवान का पुण्य कोई महान है, वचनातीत है। ऐसे आश्चर्यजनक दृश्य तो हमने कभी नहीं देखे। जब से भगवान इस पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं तब से समय-समय पर देवों का आगमन होता ही रहता है।

भगवान अब राजवैभव से अत्यन्त विरक्त होकर, मस्त हाथी की भाँति स्वतंत्रता का सुख प्राप्त करने हेतु वनमें प्रवेश कर रहे हैं; भगवान की यह यात्रा उनके लिये सुख देनेवाली है। वे वनमें रहेंगे तब भी सुख उनके आधीन है। भगवान की जय हो…भगवान विजय को प्राप्त हों.. और पुनः शीघ्र पधारकर हमारी रक्षा करें। इस प्रकार दीक्षा प्रसंग के जानकर तथा अनजान सर्व जन भगवान की स्तुति कर रहे थे और महात्मा भरत जिसे जो चाहिये उस वस्तु का दान कर रहे थे। यशस्वती, सुनन्दा आदि रानियाँ तथा मंत्रीगण भगवान के पीछे-पीछे चल रहे थे और उनके नेत्रों से आँसू बह रहे थे। महाराज नाभि तथा माता मरुदेवी भी हजारों राजाओं के साथ भगवान के तपकल्याणक का उत्सव देखने के लिये पीछे-पीछे जा रहे थे। सम्राट भरत और बाहुबलि आदि कुमार भी भगवान के पीछे चल रहे थे। भगवान की पालकी आकाश में इतनी ऊँचाई पर थी कि जहाँ लोग उन्हें बराबर देख सकें।

अयोध्या से थोड़ी दूर सिद्धार्थ नामक वन में आकर एक पवित्र शिलापर प्रभु विराजे। चन्द्रकान्त मणि की वह शिला ऐसी शोभायमान हो रही थी मानो सिद्ध शिला ही दीक्षा कल्याणक देखने के लिये नीचे उतर आयी हो ! उस पर अद्भुत मण्डप तथा रत्नों की रंगोली सजी हुई थी। वह शिला देखने पर जन्माभिषेक की पाण्डुक शिला का स्मरण होता था। भगवान जगत के बन्धु होने पर भी स्नेहबंधन से रहित थे । दीक्षा से पूर्व भगवानने देवों तथा मनुष्योंकी सभाको योग्य उपदेश द्वारा एवं प्रशान्त दृष्टी से प्रसन्न किया ।

कोलाहल दूर हुआ और नीरव शान्ति छा गई, तब गंभीर मंगल नाद के बीच भगवानने अन्तरंग एवं बहिरंग परिग्रह छोड़ दिया । आत्माकी, देवोंकी एवं सिद्धोंकी साक्षीपूर्वक समस्त परिग्रह छोड़कर भगवान मुनि हो गये; पूर्व दिशा सन्मुख पद्मासन लगाकर, सिद्ध परमेष्ठीको नमस्कार करके पंचमुष्टिसे केशलुंच किया । दिगम्बर दीक्षाधारी भगवान जिनदीक्षा लेकर समस्त पापोंसे विरक्त हुऐ और समभाव रूप चारित्र (सामायिक) धारण किया। जिस तिथिको जन्म थे उसी तिथी को, चैत्र कृष्णा नौंवी के सायंकाल भगवानने मुनिदशा धारण की ।

भरत क्षेत्र के आद्य मुनिराज ऐसे श्री ऋषभमुनिराज को नमस्कार हो !

भगवान के पवित्र केशोंको रत्नमंजूषामें भरकर इन्द्रने विचार किया की ‘यह केश धन्य हैं जो भगवान के मस्तकके स्पर्शसे पवित्र हुऐ हैं, और क्षीर समुद्र भी धन्य है कि जिसे इन के की भेंट मिलेगी ।’ - ऐसा विचारकर स्वभाव से ही पवित्र ऐसे क्षीर समुद्र में अति आदरपूर्व उनके केशों का क्षेपण किया। मलिन माने जानेवाले केश भी भगवान के आश्रय से पूज्य बने, तो फिर महापुरुषों का आश्रय पाकर मलिन जीव भी पवित्र होकर पूज्य बन जायें उसमें क्या आश्चर्य !

भगवान के साथ दूसरे चार हजार राजाओं ने भी दिगम्बर दशा धारण की; यद्यपि भगवान के अंतरंग अभिप्राय को वे जानते नहीं थे परन्तु ‘हमारे स्वामी को जो अच्छा लग रहा वह हमें भी अच्छा लगा।’ -इस प्रकार स्वामी भक्ति से प्रेरित होकर वे द्रव्यलिंगी साधु हुए। स्वामी का अनुसरण करना वह सेवकों का कार्य है - ऐसा विचार कर, उन राजाओं ने मूढ़ता सहित मात्र द्रव्य अपेक्षा से निर्ग्रन्थपना धारण किया था, भावअपेक्षा से नहीं। ऐसा करके बड़े-बड़े वंशों में उत्पन्न हुए उन राजाओं ने भगवान के प्रति अपनी उत्कृष्ट भक्ति प्रगट की थी। जिनको संयम प्रगट नहीं हुआ है ऐसे उन ४००० द्रव्यलिंगी मुनियों के परिकर में भावलिंगी भगवान ऐसे शोभायमान होते थे, जैसे छोटे-छोटे वृक्षों के बीच विशाल कल्पवृक्ष शोभता है। भगवान के प्रति भक्ति के कारण वे द्रव्यलिंगी साधु भी अन्त में कल्याण को प्राप्त होंगे।

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भगवान ऋषभदेव (भाग ५)

उस काल तप के अतिशय से ऋषभ मुनिराज का अनुपम रूप ऐसा शोभता था कि हजार-हजार नेत्रों से निरखने पर भी इन्द्र को तृप्ति नहीं होती थी। देवों ने अत्यन्त भक्तिपूर्वक भगवान की पूजा-स्तुति की : हे प्रभो ! हम अल्पज्ञ, आपके अगणित गुणों की स्तुति किस प्रकार कर सकते हैं ? आपकी स्तुति के बहाने हम तो अपने आत्मा की उन्नति करते है। प्रभो ! जिनवाणी समान एवं गंगा नदी की भाँति पवित्र आपकी यह पारमेश्वरी जिनदीक्षा तीनों लोक का हित करनेवाली तथा सम्यक्त्व भाव देनेवाली है, वह हमे सदा पवित्र करो। आपकी यह दीक्षा सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप रत्नों से अलंकृत है। प्रभो ! भव-तन-भोगरूप संसार को स्वप्नसमान जानकर आपने उसे छोड़ा और अविनाशी मोक्षमार्ग में गमन किया है; प्रभो ! आपमे राग न होने पर भी आप मोक्ष में आसक्त हुए - यह आश्चर्य की बात है ! तथा हे प्रभो ! हेय और उपादेय वस्तुओं को जानकर आपने त्यागने योग्य वस्तुओं को त्याग दिया और उपादेय वस्तुओ को ग्रहण करने में उद्यमी हुए; - और फिर भी समदर्शी कहे जाते हो - यह भी आश्चर्य की बात है ! आप पराधीन सुख को छोड़कर स्वाधीन सुख प्राप्त करना चाहते हो, तथा अल्प विभूति को छोड़कर महानविभूति प्राप्त करना चाहते हो, - तो फिर आप विरक्त और त्यागी किस प्रकार हुए ! हे भगवान ! आप निर्ग्रन्थ होने पर भी कुशल पुरुष आपको सुखी कहते हैं; ज्ञानदीपक लेकर आप मोक्षमार्ग मे चल रहे हो; आपकी ध्यानरूपी महान अग्नि मे आठो कर्म भस्मीभूत हो रहे हैं; आठ कर्मरूपी वन को काट देने के लिये आपने रत्नत्रयरूपी कुठार लिया है। प्रभो ! अन्यत्र कही न हो ऐसी अद्भुत यह आपकी ज्ञान-वैराग्यरूपी सम्पत्ति ही आपको मोक्ष प्राप्त कराने के लिये समर्थ साधन है तथा आपकी शरण में आये हुए भक्त जीवों के संसार को भी वह नष्ट करती है; - ऐसी उत्कृष्ट ज्ञान सम्पत्ति को धारण करनेवाले हे वीतराग ! आपको नमस्कार हो।

महाराजा भरतने भी अपने छोटे भाइयों तथा पुत्रोंसहित भक्ति के भार से अतिशय नम्रीभूत होकर अपने पिता की अनेक प्रकार से स्तुति तथा पूजा की। आत्मध्यान में लीन और मोक्षप्राप्तिरूप कार्य को साधने में तत्पर, मोह विजेता भगवान ऋषभमुनिराज के चरणों की अत्यन्त भावपूर्वक पूजा की। इस प्रकार जिन्होंने भगवान की पूजा की है तथा जिनके घुटने धरती पर टिके हैं (अर्थात् जो घुटने टेककर वन्दना करते हैं), और जिनके नेत्रों में हर्षाश्रु हैं; - ऐसे उन भरतने अपने मुकुट के उत्कृष्ट मणि की किरणों द्वारा भगवान के चरणों का प्रक्षालन करते हुए, उत्कृष्ट भक्तिपूर्वक नमन करके अपना मस्तक भगवान के चरणों में झुकाया और ऐसी मुनिदशा की भावना भाकर महान गुरुभक्ति प्रगट की।

इस प्रकार भगवान का दीक्षा कल्याणक मनाकर सब अयोध्या की ओर लौटे।

दीक्षा के पश्चात् ऋषभमुनिराज आत्मध्यान में लीन हुए…तुरन्त ही उनको शुद्धोपयोग में सातवाँ गुणस्थान प्रगट हुआ, तथा उनके साथ मनःपर्ययज्ञान तथा अनेक लब्धियाँ प्रगट हुईं; उनका आत्मा साक्षात् मोक्षमार्गरूप परिणमित हुआ।

भगवान की तपस्या

भगवान ऋषभ मुनिराज शरीर का ममत्व छोड़कर मोक्ष को साधने के लिये छह महीने के उपवास की प्रतिज्ञा लेकर मौनपूर्वक स्थिर हुए। वे ध्यान की सिद्धि के लिये प्रशमगुण की उत्कृष्ट मूर्तिसमान शोभते थे। तप की महिमा के कारण किसी अदृश्य छत्र द्वारा उनके उपर छाया हो गई थी, चार ज्ञान द्वारा भगवानने गति -आगतिको सम्पूर्णतः जान लिया था।

भगवान तो मुनि होकर अडिगरूप से आत्मध्यान में स्थिर हो गये, परन्तु दूसरे राजाओं का धैर्य दो-तीन महीने में टूटनेने लगा। भगवान के मार्ग पर चलने में असमर्थ ऐसे वे कल्पित मुनि विचार करने लगे कि - अरे! अब हमसे भूख-प्यास सहन नही होते; भगवान तो न जाने किस उद्देश से इस प्रकार खड़े है? अपनी रक्षा का विचार किये बिना वे ऐसे भयकर वनमें खड़े हैं तो क्या ‘अपनी रक्षा प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये’ - इस नीति को भगवान नही जानते होगे? भगवान तो प्राणों से विरक्त होकर ऐसी तप चेष्टा कर रहे है, परन्तु हम तो खेदखिन्न हो रहे है। इसलिये भगवान अपना ध्यान पूर्ण करें तब तक हम इस वनके फल और कन्दमूल खाकर जीवन टिकाऐंगे। - इस प्रकार वे दीन हो गये, क्या करना चाहिये वह उन्हे नही सूझ रहा था। ‘भगवान हमसे जरुर कुछ कहेगे’ ऐसी आशा मे वे भगवान को घेरकर खडे हो गये; भगवान की ओर दृष्टि डालने से उन्हे कुछ धैर्य होता था। कुछ तो माता-पिता-स्त्री - पुत्र तथा राजपाट आदि का स्मरण करके घर जाने की आतुरता से भगवान के चरणों मे नमन कर रहे थे, परन्तु उन्हे डर लग रहा था कि यदि हम अभी भगवान का साथ छोडकर घर चले गये तो भगवान यह कार्य पूर्ण कर के जब पुनः राजपाट सँभालेंगे तब हमें अपमान करके हटा देंगे, अथवा तो भरत महाराजा हमें कष्ट देंगे; इसलिये यहाँ रहकर सहन करना ही ठीक है। अब तो जल्दी आज-कल मे ही भगवान का योग सिद्ध होगा और हम सब कष्ट सहनेवालों को खूब धन-सम्पत्ति देकर संतुष्ट करेंगे। निर्बल हुए वे मुनि धरती पर पड़े-पड़े भी भगवान के चरणों का स्पर्श करते थे। कुछ लोग भगवान से पूछकर और कुछ बिना पूछे मात्र प्रदक्षिणा देकर प्राण रक्षा के लिये वन मे अन्यत्र चले गये थे और व्रत छोडकर शिथिलाचार पूर्वक वर्तने लगे थे। अकेले ऋषभ मुनिराज अपनी आत्मसाधना में लीन थे।

अरे, खेद है कि सामान्य मनुष्य जिसका स्पर्श नही कर सकते ऐसे भगवान के मार्ग पर चलने में असमर्थ वे सब झूठे ऋषि मुनिमार्ग से भ्रष्ट होकर इधर - उधर भटकने लगे। क्या विशाल हाथी के बोझ को उसका बच्चा कभी उठा सकता है? भूख-प्यास से विह्वल वे नग्नराजा अपने आप वनमें फल तोड़कर खाने लगे और तालाब का पानी पीने लगे। दिगम्बर मुनिवेष में ऐसी अयोग्य प्रवृत्ति देखकर वनदेवताने उन्हें रोका और कहा कि - ऐसे वेष में रहकर यह मत करो। अरे, मूर्खों! ऐसा दिगम्बर रूप तो तीर्थंकरादि महापुरुष मोक्ष की साधना के लिये धारण करते है; उसे लेकर तुम ऐसी कायर प्रवृत्ति मत करो। दिगम्बर वेश में रहकर फल मत तोड़ो और तलाव का अप्रासुक जल मत पियो। दिगम्बर साधुओं के बाह्य आचार भी उत्तम प्रकार के होते हैं।

वनदेवता के ऐसे वचन सुनकर वे राजा भयभीत हुए और नग्नवेश छोड़कर, वल्कल आदि अनेक प्रकार के कुवेश धारण करके स्वच्छन्दपूर्वक वर्तने लगे। भरत के भय के कारण वे लोग नगरमें नही गये। और वनमें झूँपडी बनाकर रहने लगे। उनके द्वारा अनेक पाखण्ड मतों का प्रवर्तन हुआ। तथापि वे जल और फल के उपहार द्वारा भगवान के चरण पूजते थे; क्योकि स्वयंभू भगवान ऋषभदेव के सिवा अन्य कोई देव उनके नही थे।

भगवान का पौत्र मरीचिकुमार भी साधु बन गया था और मिथ्याउपदेश देकर उसने झूठे पंथ का प्रवर्त्तन किया था। जब वे द्रव्य लिंगी मुनि भ्रष्ट होकर उपरोक्त प्रवृत्ति कर रहे थे उस समय भी भगवान ऋषभदेव तो अडोल रूप से आत्मध्यान में ही लीन थे। तीन गुप्ति उनकी रक्षक थी, संयम उनका कवच था और सम्यग्दर्शनादि गुण उनके सैनिक थे। बारह प्रकार के तपमें से ध्यान में वे विशेष तत्पर रहते थे। पाँच महाव्रत, पाँच समिति पाँच इन्द्रियनिरोध, छह आवश्यक, केशलुंच, भूमिशयन, अदन्तधोवन, नम्रता, अस्नान, खड़े-खड़े आहार और दिन में एक बार आहार - ऐसे अट्ठाईस मूल गुण भगवान के पैदल सिपाही थे। यद्यपि छह महीने से भगवान ने कोई आहार नहीं लिया था, तथापि उनके शरीर में किंचित् निर्बलता नहीं थी, वह ज्यों का त्यों देदीप्यमान था; उनका ऐसा ही कोई दिव्य अतिशय था। उनके बाल जटासमान हो गये थे और हवा में उड़ने पर ऐसे लगते थे मानो ध्यानाग्नि द्वारा तपाये हुए जीवरुपी सोने में से कालिमा बाहर उड़ रही हो !

भगवान के तपरुपी तेज के प्रभाव से उस तपोवन में दिन,को तथा रात्रि को सूर्योदय समान उत्तम प्रकाश रहता था। सिंह और हिरन वहाँ शान्तिपूर्वक रहते थे। अहा ! यह कैसा आश्चर्य है कि झाड़ी में फँसी हुई अपनी पूँछ को छुड़ाने के लिये सुरागाय प्रयत्न कर रही है और शेर अपने नाखूनों द्वारा उसकी सहायता कर रहा है ! गाय का बछड़ा शेरनी को अपनी माता समझकर उसका दूध पी रहा है, और शेर का बच्चा गाय को अपनी माता समझकर उसका दूध पी रहा है ! साँप और नेवला एकसाथ बैठे हैं; वन के हाथी अपनी सूँढ़ मे खिले हुए कमल लाकर प्रभु के चरणों मे चढाते हैं ! भगवान के आश्चर्यकारी तपसे इन्द्रासन भी डोल उठा था।

भगवान ऐसे तप मे लीन थे उस बीच कच्छ- महाकच्छ राजा के (अर्थात् भरत के मामा के) पुत्र नमि और विनमि राजकुमार आकर भगवान की सेवा मे लग गये और प्रार्थना करने लगे कि - हे भगवान ! आपने सबको राज्य बाँट दिया परन्तु हमें तो कुछ नहीं दिया, हमें आप भूल ही गये; इसलिये हमे कुछ भोगसामग्री प्रदान करो.. हम पर प्रसन्न होओ। - इस प्रकार बारम्बार भगवान के चरण पकड़कर प्रार्थना करने लगे और उनके ध्यान में विघ्न डालने लगे।

तब अपना आसन कम्पायमान होने से धरणेन्द्रने अवधिज्ञान द्वारा वह बात जान ली और तुरन्त भगवान के पास आकर प्रथम भक्तिपूर्वक पूजा की। पश्चात् वेश बदलकर नमि - विनमि कुमारों को समझाया कि हे कुमारों ! यह भगवान तो भोगों से अत्यन्त नि स्पृह है, और तुम उनसे भोगों की याचना करते हो ? तुम्हें भोगसामग्री चाहिये तो राजा भरत के पास जाकर माँगो ना ? भगवान तो सब छोड़कर मोक्ष की साधना कर रहे हैं, वे तुम्हें भोगसामग्री कहाँ से देंगे ? इसलिये तुम भरत के पास जाओं।

यह सुनकर दोनो कुमार बोले कि - हे महानुभाव ! आप यहाँ से चुपचाप चले जाओं; हमें आपकी सलाह नहीं चाहिये। यद्यपि आप शान्त- सौम्य - तेजस्वी एवं बुद्धिमान हैं, आप कोई भद्रपरिणामी महापुरुष लगते हैं; परन्तु हमारे बीच क्यो पड़ते हो। वह हमारी समझ में नहीं आता। हम तो भगवान को ही प्रसन्न करना चाहते है। भगवान भले ही वनमें हैं, उससे क्या उनकी प्रभुता मिट गई ? भगवान को छोड़कर आप भरत के पास जाने को कहते हो यह ठीक नहीं है। विशाल समुद्र को छोड़कर कुएँ के पास कौन जाय ? भरत में और भगवान में बड़ा अन्तर है वह क्या आप नहीं जानते ?

भगवान के प्रति अत्यन्त भक्ति भरे उनके वचन सुनकर धरणेन्द्र प्रसन्न हुआ और प्रगट होकर कहने लगा कि हे कुमारो ! मैं धरणेन्द्र हूँ और भगवान का सेवक हूँ। भगवानने मुझे आज्ञा दी है कि - ‘यह नमि - विनमि कुमार महान भक्त हैं; जब वे राजवैभव माँगने आये तब उनकी इच्छानुसार उन्हें राजसामग्री देना।’ इसलिये हे कुमारो ! चलो, मैं तुम्हें भगवान की बतलायी हुई राजसम्पदा दे दूँ।

धरणेन्द्र की बात सुनकर दोनों कुमार प्रसन्न हुए; उन्हे लगा कि सचमुच भगवान हमारे ऊपर प्रसन्न हो गये हैं। भगवान को नमस्कार करके वे धरणेन्द्र के साथ चल दिये। धरणेन्द्र उन्हे अपने विमान में बैठाकर विजयार्द्धपर्वत पर ले गये। यह विजयार्द्धपर्वत भरतक्षेत्र के मध्य स्थित है और उसके पूर्व-पश्चिम छोर लवण समुद्र को स्पर्शते हैं। उस शाश्वत पर्वत की शोभा अद्भुत है; हिमवन पर्वत के पद्मसरोवर से निकली हुई गंगा और सिन्धु नदियाँ इस पर्वत की गुफा में होकर बहती हैं। पर्वत के नौ शिखर जिनमन्दिरों से शोभायमान हैं। यहाँ रोग या दुर्भिक्ष आदि बाधाएँ नहीं होती। इस महान भरत क्षेत्र में मनुष्योंकी स्थिति चतुर्थ काल जैसी होती है; (आर्यखण्ड की भाँति छह प्रकार से कालपरिवर्तन यहाँ नहीं होता।) जघन्य आयु १०० वर्ष होती है। यहाँके विद्याधर मनुष्योंको महाविद्याओं द्वारा इच्छित फल प्राप्त होता है। अनाज बिना बोये उगता है; नदियोंकी रेत रत्नमय है। उत्तर श्रेणीमे ६० नगर हैं और दक्षिण श्रेणीमें ५० नगर हैं। विद्युत्प्रभ, श्रीहर्म्य, शत्रुंजय, गगननन्दन, अशोका, अलका, कुन्दनगर, गंधर्वपुर, गिरिशिखर, महेन्द्रपुर आदि उत्तरश्रेणीकी ६० नगरियाँ हैं; तथा पुण्डरीक, श्रीप्रभ, श्रीधर, रथनूपुर-चक्रवाल, संजयन्ती, विजया, क्षेमंकर, सूर्यभ आदि दक्षिणश्रेणीकी ५० नगरियाँ हैं; उनमें रथनूपुर राजधानी है। प्रत्येक नगरीमे एकहजार बड़े चौक और बारह हजार गलियाँ हैं, रत्नोंके तोरण से सुशोभित एकहजार द्वार हैं। प्रत्येक नगरीके अन्तर्गत एक-एक करोड गाम हैं। वहाँ रहनेवाले विद्याधर मनुष्य देवों जैसे सुखी हैं। चारणऋद्धिधारी मुनि भी यहाँ विचरते हैं।

ऐसे विजयार्धपर्वत को देखकर नमि और विनमि दोनों राजकुमार आनंदित हुए। रथनूपुर-चक्रवाल नगरीमें प्रवेश करके धरणेन्द्रने उन दोनोंका राज्याभिषेक किया; नमिको दक्षिणश्रेणीका और विनमिको उत्तरश्रेणीका राज्य सौंपा; तथा वहाँ के विद्याधरोंको सूचना दी कि भगवान ऋषभदेवने इन दोनोंको यहाँ भेजा है, वे तुम्हारे स्वामी हैं, इसलिये उनकी आज्ञा का पालन करना। पश्चात दोनों राजकुमारोंको विद्या देकर धरणेन्द्र अपने स्थानपर चले गये।

यद्यपि वे दोनों कुमार जन्मसे विद्याधर नहीं थे, परन्तु पुण्ययोग से विद्याधरोंके देशमें जाकर उन्होंने अनेक विद्याएँ सिद्ध कीं; और विद्याधर उनकी सेवा करने लगे। वास्तवमे तो मनुष्यका पुण्यही उसे सुखसामग्री प्राप्त करवाता है। जगत्गुरू भगवान ऋषभदेव के चरणोंकी सेवासे दोनो विद्याधरोंको सुख-समृध्दि की प्राप्ति हुई----इसलिये जो भव्यजीव मोक्षरूपी अविनाशी सुखको तथा जिनगुणोंको प्राप्त करना चाहते हों वे आदिगुरू भगवान ऋषभदेवके चरणोमे मस्तक झुकाकर उन्हे नमस्कार करो तथा भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करो ।

卐 ऋषभमुनिका वर्षीतपके पश्चात् हस्तिनापुरीमें प्रथम पारणा 卐

अचिन्त्य महिमावत भगवान ऋषभदेवका छह मासका ध्यानयोग समाप्त हुआ, तब उन्होंने विचार किया कि बड़े-बड़े वंशोमे उत्पन्न हुए इन नवदीक्षित साधुओको मुनिमार्गकी आहारादि विधियोंका ज्ञान न होने से क्षुधा के कारण वे मार्गभ्रष्ट हो गये। इसलिये, मोक्षमार्ग क्या है, सुखपूर्वक मोक्षकी सिध्दि कैसे होती है, और संयमकी स्थिति हेतु निर्दोष आहार लेनेकी विधि क्या है वह प्रगट करनेकी आवश्यकता है - ऐसा विचारकर निर्दोष आहारकी प्रवृत्ति हेतु भगवान विहार करने लगे।

भगवान जहाँ - जहाँ पधारते वहाँ के लोग प्रसन्नता से आश्चर्यचकित होकर नमन करते और पूछते कि - हे देव ! कहिये, क्या आज्ञा है ? आप जिस कार्य हेतु यहाँ पधारे है वह हमे बतलाइये - आज्ञा दीजिये ! अनेक लोग तो हाथी, रथ, वस्त्राभूषण, रत्न तथा भोजनादि सामग्री भगवान को अर्पण करनें के लिये लाते थे, तो कोई अपनी युवा कन्या भगवानसे विवाहने की इच्छा प्रगट करते ! अरेरे ! कैसा अज्ञान और कैसी मूर्खता ! भगवान चुपचाप चले जाते थे। वे किस लिये पधारे है और क्या करना चाहिये वह नही समझ पाने से लोग दिग्मूढ बन गये थे। कुछ तो अश्रुपूरित नेत्रोंसे भगवानके चरणोंमे लिपट जाते थे। -इस प्रकार अनेक नगरों तथा गामो मे विहार करते-करते दूसरे छह महीने से अधिक समय निराहार बीत गया।

एक दिन विहार करते हुए भगवान कुरूदेशके हस्तिनापुर नगर मे आ पहुँचे। उस समय वहाँके राजा सोमप्रभ और उनके लघुभ्राता श्रेयांसकुमार थे। पूर्वके आठवे भवमे आहारदानके समय जो ‘श्रीमती’ थी, वही यह श्रेयांसकुमार हैं। भगवान जिस दिन हस्तिनापुर पधारनेवाले थे उसी दिन रात्रिके पिछले प्रहरमे श्रेयांसकुमारने पूर्वसंस्कार के बलसे, मंगल पूर्वसूचनारूप सात उत्तम स्वप्न देखे - 'ऊँचा सुमेरू पर्वत, सुशोभित कल्पवृक्ष, केसरी सिंह, वृषभ, सूर्य-चन्द्र, रत्नोंसे भरा समुद्र और अष्टमंगलसहित देव।

अपने आँगनमें भगवानका पदार्पण जिनका मुख्य फल है - ऐसे वे सात मंगलस्वप्न देखकर श्रेयांसकुमार का चित्त अति प्रसन्न हुआ।

प्रभात होते ही दोनों भाई उस स्वप्नकी बात और भगवान ऋषभदेवका गुणगान कर रहे थे कि - इतने में योगीराज भगवानने हस्तिनापुरमे प्रवेश किया। भगवानके आगमनसे आनन्दित होकर चारों ओरसे नगरजनोंके समूह भगवान के दर्शन करने उमड़ पड़े। भोलेभाले लोग कहते थे कि भगवान फिर अपनी रक्षा करने पधारे हैं, ‘ऋषभदेव जगत के पितामह हैं’ ऐसा सुना था, उन जगत्पिता को आज प्रत्यक्ष देखा। भगवानके आगमन की बात सुनकर नगरजन भोजनादि कार्य छोड़कर शीघ्रातिशीघ्र दर्शन करने के लिये निकल पड़े। जब सारे नगरमें ऐसा हर्षमय कोलाहल हो रहा था तब भी भगवान तो अपने संवेग और वैराग्य की सिद्धिके लिये वैराग्य भावनाओंका चिन्तन करते-करते अपने आत्मकी लगन में लीन होकर चले आ रहे थे। आचार्यदेव कहते हैं कि, अहो, ऐसी राग-द्वेषरहित समतावृत्तिको धारण करना ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है।

भगवान ऋषभमुनिराज राजमहलके सामने पधार रहे हैं यह जानकर ‘सिद्धार्थ’ नामक द्वारपालने तुरन्त ही राजा सोमप्रभ तथा श्रेयांसकुमारको बधाई दी कि भगवान ऋषभदेव अपने आँगनमें पदार्पण कर रहे हैं… सुनते ही दोनों भाई मंत्री आदि सहित खड़े हुए और अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक राजमहलके प्रांगणमें आकर दूरसे ही भगवानके चरणोंमें भक्तिभावपूर्वक नमस्कार किया। भगवानके पधारते ही सन्मानसहित पादप्रक्षालन करके अर्घ चढ़ाकर पूजा की और प्रदक्षिणा दी। अहा, अपने आँगन ऐसे निधान देखकर उन्हें अति सन्तोष हुआ, भगवानके दर्शनसे दोनों भाई हर्षोल्लाससे रोमांचित हो गये। आनन्द एवं भक्तिसे नम्रीभूत वे दोनों भाई इन्द्र समान सुशोभित हो रहे थे। जिसप्रकार निषध और नीलपर्वतोंके बीच उन्नत मेरूपर्वत शोभता है, उसीप्रकार श्रेयांस और सोमप्रभ के बीच भगवान ऋषभदेव शोभायमान हो रहे थे।

भगवानका रूप देखते ही श्रेयांसकुमार को जातिस्मरण हुआ और पूर्वभवके संस्कारके कारण भगवानको आहारदान देनेकी बुद्धि प्रगट हुई। पूर्वके वज्रजंघ एवं श्रीमतीके भवका सारा वृत्तान्त उन्हें स्मरण हो आया। उस भवमें सरोवर के किनारे दो मुनिवरोंको आहारदान दिया था वह याद आया। प्रभातका यह समय मुनियोंको आहारदान देनेका उत्तम समय है - ऐसा निश्चय करके उन पवित्र बुद्धिमान श्रेयांसकुमारने ऋषभ मुनिराजने इक्षुरस द्वारा आहारदान किया।

इस प्रकार ऋषभमुनिराजको सर्व प्रथम आहारदान देकर उन्होंने इस चौबीसी में दानतीर्थका प्रारम्भ किया। उन्होंने नवधाभक्ति और श्रद्धादि सात गुणोंसहित दान दिया। मोक्षके साधक धर्मात्माके गुणोंके प्रति आदरपूर्वक, श्रद्धासहित जो दाता उत्तम दान देता है वह मोक्षप्राप्तिके लिये तत्पर होता है। अतिशय इष्ट एवं सर्वोत्तम पात्र ऐसे भगवानको श्रेयांसकुमारने पूर्वभवके संस्कारसे प्रेरित होकर नवधाभक्तिसे प्रासुक आहारका दान दिया। भगवान ऋषभमुनिराज खड़े-खड़े अपने हाथमें (करपात्रमे) ही भोजन ले रहे थे। मोक्षमार्गके साधक भगवानको दो हाथोंकी अंजलिमें श्रेयांसकुमार आदिने इक्षुरसका (गन्ने के प्रासुक रसका) आहार दिया। वह दिन था - वैशाख शुक्ला तृतीया (अक्षयतृतिया)

उस समय देवगण आकाश से रत्नवृष्टि तथा पुष्पवृष्टि करने लगे। देवों के बाजे गम्भीर नाद से बजने लगे, सुगन्धित वायु बहने लगी और देवगण हर्षित होकर “धन्य दान धन्य पात्र..धन्य दाता” ऐसी आकाशवाणी करने लगे। अहा, दान की अनुमोदना करके भी लोग महापुण्य को प्राप्त हुए।

यहाँ कोई आशंका करे कि मात्र अनुमोदना करने से पुण्य की प्राप्ति किस प्रकार होगी ? उसका समाधान यह ह कि पुण्य और पाप का बंध होने में मात्र जीव के परिणाम ही कारण हैं; बाह्य कारणों को तो जिनेन्द्रदेवने ‘कारण का कारण’ (अर्थात् निमित्त) कहा है। जब पुण्य के साधनरूप में जीवों के शुभ परिणाम ही प्रधान कारण है, तब शुभकार्य की अनुमोदना करनेवाले जीवों को भी उस शुभफल की प्राप्ति अवश्य होती है।

रत्नत्रयधारी भगवान अपने गृहमे पधारे और उन्हे आहारदान दिया उससे दोनो भाई परम हर्षित हुए और अपने को कृतकृत्य मानने लगे। इस प्रकार मुनियों को आहारदान की विधि प्रसिद्ध करके, तथा दोनो भाइयो को प्रसन्न करके भगवान पुन: वनकी ओर चल दिये। कुछ दूर तक दोनों भाई भक्ति भीग चित्तसे भगवान के पीछे-पीछे गये और फिर रुकते रुकते लोटने लगे। दोनों भाई बारम्बार मुड़-मुड़कर निरपेक्ष रूपसे वन की ओर जाते हुए भगवान को पुनः पुनः देख रहे थे। दूर-दूर जाते हुए भगवान की ओर लगी हुई अपनी दृष्टि को तथा चित्तवृत्ति को मोड़ नहीं पाये। वे बारम्बार भगवान की कथा एव उनके गुणो की स्तुति कर रहे थे और धरती पर पड़े हुए भगवान के चरण चिह्नों को बारम्बार प्रेम से निहारकर नमस्कार करते थे। नगरजन इन दोनों भाइयों को देखकर कहते कि राजा सोमप्रभ महाभाग्यवान है कि उन्हे ऐसा श्रेष्ठ भाई मिला है। रत्नवृष्टि से चारो ओर बिखरे पड़े रत्नों को नगरजन इकट्ठे कर रहे थे। रत्नरूपी पाषाणों से भरे हुए आँगन को कठिनाई से पार करते हुए दोनो भाई राजमहल मे आये।

भगवान ऋषभदेव को प्रथम आहारदान (पारणा) कराने से श्रेयांसकुमार का यश सारे जगत मे फैल गया। मुनि को दान देने की विधि सर्वप्रथम श्रेयांस कुमार जानी थी और तभी से दानमार्गका प्रारम्भ हुआ। आहारदान की यह बात जानकर राजा भरत आदिको भी महान आश्चर्य हुआ; वे आश्चर्य से सोचने लगे कि मौन धारण किये हुए भगवान का अभिप्राय उन्होने कैसे जान लिया ? देवो को भी बड़ा आश्चर्य हुआ और आनन्दित होकर उन्होने श्रेयांसकुमार का सन्मान किया। महाराज भरतने भी स्वयं अयोध्यासे हस्तिनापुर आकर श्रेयांस कुमार का सन्मान किया और अतिशय हर्ष व्यक्त करते हुए पूछा कि हे महादानपति ! यह तो बतलाइये कि भगवानके मनकी बात आपने कैसे जान ली ? इस भरत क्षेत्र में पहले कभी नहीं देखी गई ऐसी यह दान की विधि आपने न बतलायी होती तो कौन जान पाता ? हे कुरुराज ! आज आप हमारे लिए भगवान समान पूज्य बने है, आप दानतीर्थ के प्रर्वतक है, महापुण्यवान है; इस दान की पूरी बात हमे बतलाइये ।

श्रेयांसकुमार कहने लगे, हे राजन् ! यह सब मैने उस पूर्वभवके स्मरण के जाना जब मै भगवान के साथ था। जिस प्रकार रोग दूर करनेवाली उत्तम औषधि प्राप्त करके मनुष्य प्रसन्न होता है, और तृषातुर व्यक्ति पानीसे भरा हुआ सरोवर देखकर आनन्दित होता है, उसप्रकार भगवान का उत्कृष्ट रूप देखकर मैं अत्यन्त हर्षविभोर हो गया था, और उसी समय मुझे जातिस्मरण होने से मैने भगवान का अभिप्राय जान लिया। * १ के आठवें भव में जब भगवान विदेहक्षेत्र की पुण्डरीकिणी नगरी में वज्रजंघ राजा थे तब मै उनकी श्रीमती नामक रानी थी, और तब भगवान के साथ मैंने दो चारण ऋद्धिधारी मुनियोको आहारदान दिया था; उन संस्कारोका स्मरण होने से मैंने उसी विधिसे भगवान को आहार दान दिया । विशुद्धता सहित मुनिवरोंको आहारदान देने का अवसर महान भाग्य से प्राप्त होता है।

दान का स्वरूप समझाते हुए श्रेयांस कुमार महाराजा भरत से कहते हैं कि-स्व-पर के उपकार हेतु मन-वचन-काय-की शुद्धिपूर्वक अपनी वस्तु योग्य पात्र को सन्मानपूर्वक देना उसे दान कहते हैं। श्रध्दादि गुणोंसहित वह दाता है; आहार, औषध, शास्त्र तथा अभय यह चार वस्तुएँ देय (दानमे देने योग्य) हैं। रागादि दोषोंसे दूर तथा सम्यक्त्वादि गुणोंसहित वह पुरुष पात्र हैं। उसमें जो मिथ्यादृष्टी है किन्तु व्रत-शीलयुक्त है वह जघन्य पात्र है; अव्रती सम्यग्दृष्टि मध्यम पात्र है और व्रतशील सहित सम्यग्दृष्टि वह उत्तम पात्र है।व्रत-शील से रहित मिथ्यादृष्टि वे पात्र नहीं किन्तु अपात्र हैं। मोक्ष के साधक ऐसे उत्तम गुणवान मुनिराज को दिया गया आहारदान अपुनर्भवका (मोक्षका) कारण होता है। यहाँ जो दिव्य पंचाश्चर्य-(रत्नवृष्टि आदि) हुए वे दान की ही महिमा को प्रगट करते हैं। अब भगवान ऋषभदेवके तीर्थ में मुनि आदि पात्र सर्वत्र फैल जायेंगे-जहाँ तहाँ मुनि विचरेंगे, इसलिये हे राजर्षि भरत ! दान की विधि जानकर आप सबको भक्तिपूर्वक उत्तम दान देना चाहिये।

इस प्रकार दान का उपदेश देकर श्रेयांसकुमार ने दानतीर्थका प्रवर्त्तन किया। श्रेयास के श्रेयकारी वचन सुनकर भरत राजाको अत्यन्त प्रीति उत्पन्न हुई और अति हर्षपूर्वक राजा सोमप्रभ तथा श्रेयांसकुमार का सन्मान किया। पश्चात परमगुरू ऋषभदेवके गुणोंका चिन्तन करते-करते वे अयोध्यापुरी लौटे।

भगवान ऋषभमुनिराजका निरतिचार उत्कृष्ट चारित्र

आहार ग्रहण करने के पश्चात भगवान वनमे पहुँचे और निजगुणचिन्तनमे लीन हो गये। भगवान को देय एवं उपादेय तत्त्वोंका बराबर ज्ञान था, गुण-दोष की भिन्नता को वे जानते थे, इसलिये दोषोंको सर्वथा छोड़कर मात्र गुणोंमें ही वे आसक्त रहते थे, पापयोगोसे वे पूर्ण विरक्त थे; अहिंसादि व्रतोंका निरचार पालन करते थे, ब्रह्मचर्यमे वे अद्वितीय थे। उनको धैर्य, क्षमा, ध्यान मे निरन्तर तत्परता थी और परिष आयें त० पि मार्गसे अच्युतपना था। भगवान जिनकल्पी थे। जो साधु एकाकी रहे, आत्मचिन्तन में लीन हो, उपदेशादि प्रवृत्ति न करे उसे जिनकल्पी कहा जाता है, और जो साधू संघके साथ रहे, उपदेश दे, दीक्षा दे उसे स्थविरकल्पी कहते हैं। तीर्थंकर भगवन्त जिनकल्पी होते है। भगवान सामायिक चारित्रमें वर्तते थे; उनके चारित्र में कोई दोष नही लगने से प्रतिक्रमण की अथवा छेदोपस्थापन की आवश्यकता नहीं थी। यद्यपि भगवान गर्भ मे आये तभी से तीन ज्ञान सहित थे, चौथा ज्ञान दीक्षा के समय प्रगट हुआ था और सिध्दपद तो उन्हें इस भवमें अवश्य प्राप्त होना ही था, तथापि ज्ञानलोचनवन्त उन भगवान ने एकहजार वर्ष तक उत्तम तप किया था और कर्मोंकी असंख्यात गुणश्रेणी निर्जरा की थी। सदा जागृत रहनेवाले वे योगिराज कभी शयन नहीं करते थे। भगवान का निरतिचार चारित्र स्वयमेव प्रायश्चित्तरूप था, अर्थात् उसमें उत्कृष्ट चित्तविशुद्धि थी और कोई अतिचार लगते ही नहीं थे, इसलिये अन्य प्रायश्चित्तकी आवश्यकता ही नहीं रही थी,-जिसप्रकार सूर्य स्वयं प्रकाशस्वरूप है, उसमें अंधकार है ही नहीं; फिर उसे अपनेमें से अंधकार दूर करना कहाँ रहा ? उन परमेष्ठी भगवानने दीक्षा के समय सिध्दोंको नमस्काररूप विनय की थी, तथा ज्ञान-दर्शन-चारित्र-तप-वीर्य, - इन गुणोंकी विनय की थी, इसके; अतिरिक्त बाह्यमें विनय करने योग्य उनके कोई नहीं था; जो स्वयं ही प्रधानपुरूष होनेसे सबको नम्रीभूत करनेवाले थे, वे भला किसकी विनय करते ? तथा रत्नत्रयरूप मार्गमें व्यापार ही उनकी ‘वैयावृत्य’ थी, वे रत्नत्रयके सिवा और किसकी वैयावृत्य करेंगे ? (दीन-दुःखी जीवोंकी वैयावृत्य तो शुभकषाय के तीव्र उदय मे ही सम्भव है; भगवान के तो शुभकषाय भी ऐसा अतिशय मन्द हो गया था कि उनकी प्रवृत्ति बाह्यव्यापार से हटकर रत्नत्रय मार्ग मे ही रहती थी।)

इस जगत में जो भी धर्म सृष्टि (धर्म की रचना) है वह सब सनातन भगवान ऋषभदेव ने स्वयं धारण करके युगके आदि मे प्रकाशित की थी; इसप्रकार भगवान धर्म सृष्टि के सर्जन कर्ता थे। यद्यपि शास्त्र उनके आधीन थे अर्थात बारह अंग के वे स्वामी थे तथापि ज्ञान की वृध्दि हेतु भगवान सदा स्वाध्याय करते थे, और इसलिये आज भी संयमीजन स्वाध्याय करते है। बारह तपों मे स्वाध्याय समान तप दूसरा नहीं है और होगा नहीं; विनयपूर्वक स्वाध्यायमे तल्लीन हुए बुध्दिमान मुनिको मनके संकल्प-विकल्प दूर हो जाने से चित्त की एकाग्रता होती है, इसलिये स्वाध्याय व्दारा मुनिको सुगमता से ध्यान की सिध्दि होती है और इन्द्रियाँ वशीभूत हो जाती है।भगवान तो शरीर से भिन्न आत्माको देखते थे, तीन गुप्तिका पालन करते थे और शरीर से निस्पृह होकर, उसका ममत्व को छोडकर आत्माको ध्याते थ। ध्यानरुपी उत्तम सम्पदाके स्वामी भगवान ध्यानाभ्यासरुप तप द्वारा ही कृतकृत्य होगये थे; क्यों कि ध्यान ही उत्तम तप है, दुसरे सब तप तो उसके परिकर हैं। ध्यानकी सिद्धि के लिये अनुकूल ऐसे द्रव्य -क्षेत्र- काल भाव का ही वे सेवन करते थे। आध्यात्म तत्त्व को जाननेवाले भगवान अध्यात्मकी शुद्धि के लिये गिरीगुफा आदि में ध्यान करते थे।

क्षपक श्रेणी और केवलज्ञान की उत्पति

मौनी, ध्यानी, निर्मान तथा अतिशय बुध्दिमान ऐसे उन भगवान ऋषभमुनिराज ने एक हजार वर्ष तक अनेक देशोमे विहार किया, पश्चात एक दिन पुरिमताल नगरके शकट नामक उद्यान मे पधारे। (जो वर्तमानमे प्रयाग-तीर्थ कहलाता है।) शुध्द बुध्दिमान वे भगवान ध्यान की सिध्दि हेतु वहाँ एक वटवृक्ष के नीचे शिलापर विराज गये, और पूर्वाभिमुख बैठकर लेश्याकी उत्कृष्ट शुद्धि पूर्वक चित्तको एकाग्र करके ध्यान लगाया।

भगवान ने सर्वश्रेष्ठ ऐसे परम पदमें अपना चित्त लगाया और सिद्ध के अष्ट गुणों का चिन्तन किया। सम्यकत्व, अनन्तदर्शन, ज्ञान, अद्भुत वीर्य, सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व, अव्याबाधत्व तथा अगुरुलघुत्व; -इन सिद्धिप्रभु के आठ गुणोका सिद्धपदके अभिलाषी जीवोंको ध्यान करना चाहिये, तथा शुध्द द्रव्य-क्षेत्र - काल- और भाव -इन चारकी अपेक्षा से भी उन समान अपने स्वास्थ्य का चिन्तन करना चाहिये। इस प्रकार बारह गुणयुक्त, मुक्त, सूक्ष्म, निरंजन, रागादि से रहित, व्यक्त , नित्य और शुध्द ऐसा सिध्दस्वरुप मुमुक्षु योगियोको ध्यान करने योग्य है। ध्यान के परिवार समान बारह अनुप्रेक्षाओंका भी भगवान ने चिन्तवन किया। धर्मध्यान मे तत्पर ऐसे उन विरागी भगवान को ज्ञानादि की शक्ति के कारण किंचित भी प्रमाद नही रहा था। उन अप्रमत्त भगवान को ज्ञानदि परिणामों में परम विशुध्दि प्रगट हुई। अशुभ लेश्या रंचमात्र नहीं; शुक्ल लेश्या प्रगट हुई उसकाल दीप्तिमान भगवान को मोहका नाश करने हेतु ध्यान की ऐसी शक्ति स्फुरित हुई, मानो कोई बिजली कौंध गई हो भयरहित भगवानने संकल्प-विकल्प हटाकर, मोहशत्रुकी सेना का नाश करने के लिए अपने विशुध्द परिणामों की समस्त सेनाको सुसज्ज कर दिया। मोहशत्रु को जीतने के लिये तत्पर हुए भगवान ने संयमरुपी कवच बनाया, उत्तम ध्यान रूप विजय-अस्त्र धारण किया, ज्ञानको मंत्री बनाया और विशुध्द परिणामो को सेनापति-पद प्रदान किया; दुर्भेद्य एवं ध्रुवयोद्धा ऐसे अनंत गुणों को सैनिक बनाया और रागादि प्रतिपक्षी को हन्तव्य ऐसे शत्रुपक्षमें रखा।

इस प्रकार सैन्य तैयार करके जगत्गुरु भगवान ज्यों ही विजय के लिये उद्यमी हुए कि तुरन्त कर्मसैन्यमें खलबली मच गई; उसकी स्थिति टूटने लगी, और रस शक्ति नष्ट होने लगी, प्रकृतियाँ एक दूसरेमें संक्रमित होकर बिखरने लगी। कर्म सैन्य प्रतिसमय असंख्यात गुनानिर्जीर्ण होने लगा। जिसप्रकार विजयाभिलाषी राजा शत्रुसैन्यमे खलबली मचाकर फिर उसे नष्ट कर देता है, उसी प्रकार उन योगिराजने अपने योग बलसे पहले तो कर्म प्रकृतिरूप मोहसैन्य में खलबली मचा दी और फिर उसे नष्टभ्रष्ट कर देने का उद्यम प्रारम्भ किया।

उत्कृष्ट विशुद्धि की भावना करते हुए अप्रमत्त होकर भगवानने मोक्षमहल की सीढ़ी समान क्षपक श्रेणी पर आरोहण किया। सातवें गुणस्थान में अधःकरण करके, अपूर्वकरण नामक आठवे गुणस्थानमे आये और पश्चात् अनिवृत्तिकरण नामक नौवें गुणस्थान पर चढ़ गये। वहाँ पृथक्त्ववितर्क नामके शुक्लध्यानरूपी चक्रको धारण करके उसके प्रभाव से अत्यन्त शुद्धि प्राप्त करके, निर्भयरूपसे मोहराजा के समस्त बल को तोड़ दिया और उसकी सारी सेना को धराशायी कर दिया। पहली ही मार में उन्होंने मोह के अंगरक्षक समान कषाय तथा नौ नोकषाय रूपी योद्धाओं को मार दिया; फिर जो बाकी रहे थे उनमें से सज्वलन क्रोध का अन्त कर दिया, पश्चात् मान को मारा और अन्त में माया को तथा बादरलोभ को भी समाप्त कर दिया।

इस प्रकार मोहशत्रु को जीतकर, महाध्यानरूपी रणभूमि में सत्य चरित्रध्वज फहराते हुए तथा तीक्ष्ण ज्ञानशस्त्र को धारण करके वैराग्य का कवच धारण करके वे महान वीर 'वीजेता, जहाँ से पराङ्मुख न होना पड़े ऐसी अनिवृत्ति नामक विजयभूमि मे आये। यहाँ योगिराज भगवान ऋषभदेवने नरकतिर्यंचगति सम्बन्धी तेरह तथा दर्शनावरणीय की तीन-इन सोलह प्रकृतियो को एक ही झटके में उड़ा दिया। पश्चात् आठ कषाय प्रकृतियों को, नौ नोकषाय को तथा संज्वलन क्रोध-मान-माया को - कुल बीस प्रकृतियों को भी जड़ से उखाड़ दिया; तथा अश्वकर्णकरण, कृष्टिकरण आदि विधि द्वारा कर्मों का जोर तोड़कर भगवान दसवें गुणस्थान में आये। उस सूक्ष्मसापराय गुणस्थान में रहे हुए अतिसूक्ष्म लोभ को भी जीतकर मोह के ऊपर सम्पूर्ण विजय प्राप्त कर ली। वे निर्मोही विजेता भगवान ऋषभदेव रणभूमि से मोहशत्रु का विनाश करके तेजस्वी रूप से अत्यन्त शोभायमान हो रहे थे। जिस प्रकार कुश्ती के मैदान में प्रतिस्पर्धी मल्ल के भाग जाने पर विजेता मल्ल शोभा देता है, उसी प्रकार मोहरहित भगवान एकत्व भावना मे सुशोभित हो रहे थे।

तत्पश्चात्, अविनाशी गुणों का संग्रह करनेवाले भगवान क्षीणकषाय नामक बारहवें गुणस्थान में आये। वहाँ मोहकर्म को समूल नष्ट करके ‘स्नातक’ हुए। पश्चात् ज्ञानदर्शन और वीर्य में विघ्नकर्त्ता उद्धतप्रकृतियों को एकत्व वितर्क नामक दूसरे शुक्लध्यान द्वारा नष्ट कर दिया।

इस प्रकार अत्यन्त दुःखदायी ऐसे चारों घातिकर्मोंको ध्यानाग्नि द्वारा भस्म करके भगवान ऋषभ मुनिराज केवलज्ञानी एवं विश्वदर्शी हुए। अहो ! भगवान सर्वज्ञ हुए ! अनन्त ज्ञान, दर्शन, चारित्र, शुद्ध सम्यक्त्व, दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य - ऐसी नव क्षायिक’लब्धिरूप किरणों द्वारा प्रकाशमान, ऋषभजिनेन्द्ररूपी सूर्य फाल्गुन कृष्णा एकादशी के दिन् जगत को प्रकाशित एवं भव्यजीवोंरूपी कमलों को विकसित करता हुआ उदित हुआ। अहा ! तीन लोक को आनन्दकारी ऐसे सर्वज्ञतारूपी सूर्य के प्रकाश से भगवान का आत्मा जगमगा उठा ।

केवलज्ञान प्राप्त भगवान ऋषभजिनेन्द्र को नमस्कार हो !

केवलज्ञान का उत्सव और समवसरण की रचना

अपने चरित्र नायक भगवान ऋषभदेव को केवलज्ञान हुआ वे सर्वज्ञ हुए अरिहंत हुए, तीर्थंकर हुए। जिस समय प्रभु को केवलज्ञान हुआ उसी समय भरतराजा के शस्त्रागार में चक्ररत्न उत्पन्न हुआ, और उसी समय उन्हे पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। एक साथ तीन-तीन बधाइयाँ महाराज भरत के यहाँ आयी। परन्तु चक्रवर्ती का राज्य और पुत्र - इन दोनों की अपेक्षा धर्म को महान माननेवाले महाराजा भरत ने सर्वप्रथम भगवान ऋषभदेव के केवलज्ञान का उत्सव मनाने की तैयारी की, और अतिशय आनन्दपूर्वक धामधूम से केवली प्रभु की पूजा करने समवसरण की ओर चले। उन्हें अपार आनन्द है तो अपने को कहाँ कम आनन्द है ?-उनकी सवारी के भगवान के पास पहुँचे उससे पूर्व ही हम समवसरण में पहुँच जाय और वहाँ की शोभा कैसी अद्भुत है वह देखें।

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भगवान ऋषभदेव (भाग ६)

भगवान को केवलज्ञान होते ही पुनः इन्द्रासन डोल उठा; सारे जगतका संताप नष्ट हो गया और शान्ति छा गई, हर्ष से तीनों लोक क्षोभित हुए; स्वर्ग के वाद्य मानों भगवान के दर्शन का सुख प्राप्त करने के लिये देवों को निमंत्रण दे रहे हों - इस प्रकार स्वयमेव बज उठे ! इन्द्रने अवधिज्ञान द्वारा भगवान को केवलज्ञान होना जानते ही अत्यन्त आनन्दित होकर नमस्कार किया और केवलज्ञानका उत्सव मनाने के लिये आ पहुँचे। देवोंरूपी कारीगरों द्वारा अत्यन्त भक्तिपूर्वक निर्मित उत्तम समवसरण की दिव्य शोभा देखते ही इन्द्र को भी आश्चर्य हुआ। अहा ! मानों तीनों लोक का मंगलदर्पण हो। - ऐसे समवसरण का वर्णन सुनकर भी भव्य जीवों का मन प्रसन्न हो जाता है, तब उसके साक्षात् दर्शन की तो बात ही क्या ! रत्नो की रज से बना हुआ धूलिशाल कोट स्वर्ण-स्तम्भों एवं मणिरत्न के तोरणों से सुशोभित हो रहा था। भीतर चार मार्गों के बीच सोने से बने हुए अति उच्च और अद्भुत चार मानस्तम्भ थे, जिन्हे दूरसे देखते ही मिथ्यादृष्टि जीवों का मान गल जाता था। भगवान की स्वर्णप्रतिमाएँ विराजमान थीं। इन्द्र द्वारा निर्मित होने से मानस्तम्भ को इन्द्रध्वज भी कहा जाता है। उसके पार्श्व में पवित्र वापिका थी और थोड़े दूर समवसरण को घेरती हुई पानी की परिखा (खाई) थी; उसके बाद लतावन था, और लतावनमें इन्द्रो के विश्राम हेतु चन्द्रकान्त मणि की बैठक थीं।

पश्चात् भीतर प्रवेश करते ही सोने का पहला कोट था जिसके चारों ओर चार द्वार १०८ मंगलद्रव्यों से सुशोभित थे और उसके पार्श्व में नवनिधियाँ थीं - मानों भगवानने उन निधियों का तिरस्कार(त्याग) कर देने से वे द्वारों के बाहर खड़ी-खड़ी सेवा कर रही हों ! पश्चात् नाट्यशाला तथा धूपघट को पार करके आगे बढ़ने पर सुन्दर वन आता था; - मानो वृक्ष के पुष्पो द्वारा वह वन प्रभुजी की पूजा कर रहा हो ! - ऐसा सुशोभित था। उस वन के वृक्ष इतने प्रकाशमान थे कि वहाँ दिन और रात्रिका भेद नहीं लगता था। अशोकवन के बीच अशोक नामका एक विशाल ‘चैत्यवृक्ष’ था - जो अष्टमंगल तथा जिनप्रतिमासे सुशोभित था। यह देखकर इन्द्र को भी ऐसा लगता था कि अहो ! जिनके समवसरण के वैभव का ऐसा अद्भुत माहात्म्य है, उन भगवान ऋषभदेव के अनुपम केवलज्ञान-वैभव का तो क्या कहना ! सुन्दर वनवेदिका के पश्चात् स्वर्णस्तम्भ पर चार हजार तीन सौ बीस ध्वजाओं की पंक्ति फहरा रही थी, जो मोह कर्म पर भगवान की विजय का प्रतीक थी। (उन ध्वजस्तम्भ, मानस्तम्भ, चैत्यवृक्ष आदि की ऊँचाई तीर्थंकरो के शरीर की ऊँचाई से बारह गुनी होती है; इसलिये यहाँ उसे साठ हजार फुट यानी हिमालय पर्वत की ऊँचाई से दुगुनी समझना।)

ध्वजाओं की भूमि के पश्चात् दूसरा चाँदी का गढ़ था जो चार द्वारो से अत्यन्त सुशोभित था। उसके भीतर दीप्तिमान कल्पवृक्षों का उत्तम वन था, और उसके मध्यमे सिद्ध प्रभु की प्रतिमा सहित सिद्धार्थ वृक्ष शोभा देता था। ऊँचे-ऊँचे नौ स्तूप-मन्दिर सिद्ध एव अरिहन्त प्रतिमाओ द्वारा अति आनन्दकारी लगते थे।

उससे कुछ दूरी पर तीसरा स्फटिकमणि का विशुद्ध कोट ऐसा सूचित करता था कि इन जिनेन्द्र भगवान के समीप आकर भव्य जीव के परिणाम स्फटिक समान विशुद्ध हो जाते है। स्फटिक के गढ़ के चारों और पद्मरागमणि के द्वार थे। फिर चार मार्गों के मध्यभाग मे स्फटिक की चार-चार दीवारे थी बारह सभाओं के विभाग करती थी।

अद्भुत वैभववाली उन दीवारों पर रत्न के स्तम्भों द्वारा रचा गया आकाश स्फटिकमणि से निर्मित अति विशाल तथा अतिशय शोभायुक्त ‘श्रीमण्डप’ था। वह श्री मण्डप तो मानो श्रीमण्डप ही था.. भगवानने उस मण्डप के मध्य तीन लोककी श्री-(शोभा) को धारण किया था। तीन लोक के समस्त जीवों को स्थान दे सके ऐसे सामर्थ्यवान श्रीमण्डप का वैभव अद्भुत था; भगवान के चरणों की शीतलता के प्रभाव से उस मण्डप की पुष्पमाला कभी कुम्हलाती नहीं थी ! अहो ! जिनेन्द्रदेव का यह कोई अद्भुत माहात्म्य था कि मात्र एक योजन के श्रीमण्डपमे समस्त सुर-असुर, तिर्यंच एवं मनुष्य एक-दुसरे को बाधा पहुँचाए बिना सुखपूर्वक बैठ सकते थे।

तत्पश्चात् प्रभु की प्रथम पीठिका वैडूर्यरत्न से निर्मित थी जिस पर अष्टमंगल तथा धर्मचक्र शोभा देते थे, दुसरी पीठिका सुवर्ण से निर्मित थी, जिसपर सिद्धों के गुण जैसी आठ महा ध्वजाएँ शोभा देती थी; और तीसरी पीठिका विविध रत्नो से निर्मित थी। ऐसी तीन पीठिकाओं पर विराजमान जिनेन्द्र भगवान ऐसे सुशोभित होते थे जैसे त्रिलोक के शिखर पर विराजमान सिद्ध प्रभु शोभायमान होते हैं।

प्रभु के समवसरण की ऐसी दिव्यविभूति जयवन्त हो कि जिसकी शोभा देखकर इन्द्र भी अतिशय प्रसन्न हुआ और देव भी आश्चर्यमुग्ध होकर देखने लगे कि - अहो ! जिनेन्द्र भगवान का अद्भुत प्रभाव है ।

सिंहासनादि अष्ट-प्रातिहार्य

तीन पीठिकाओं पर कुबेरने गंधकुटी की रचना की थी। अति देदीप्यमान उस गधकुटी के रत्नजड़ित शिखरपर करोड़ों विजयपताकाएँ फहरा रही थी। छह सौ धनुष (अठारहसौ मीटर) लम्बी-चौड़ी गंधकुटी पर सोने का ‘सिंहासन’ था। तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव उसे सुशोभित कर रहे थे; अपने निरालम्बी माहात्म्य से भगवान उस सिंहासन पर चार अगुल ऊपर अद्धर विराजते थे; उन्होंने सिंहासन का स्पर्श नहीं किया था। अहो ! निरालम्बी तत्त्व !!

समवसरण में देवों द्वारा ‘पुष्पवृष्टि’ होती थी। भगवान के निकट एक ‘अशोक वृक्ष’ था, जिसमें मरकतमणि के पत्र और विविधरत्नों के पुष्प थे। एक योजन का वह अशोकवृक्ष शोक को नष्ट करता था और खिले हुए पुष्पो से प्रभुकी पूजा करता था। ऊपर रत्नजड़ित तीन श्वेत ‘छत्र’ शोभायमान थे जो तीन लोक को आनन्दकारी थे। चारों ओर देव चौंसठ ‘चँवर’ ढोर रहे थे। अतिशय गम्भीर एवं मधुर ‘देवदुंदुभि’ बाजे बजते थे। जिनेन्द्र भगवान के शरीर से उत्पन्न होती दिव्य प्रभा अर्थात् ‘भा-मण्डल’ के तेज द्वारा समवसरण की सारी भूमि शोभा देती थी भगवान की आश्चर्यकारी प्रभा करोड़ों देवों के तथा सूर्य के तेजको आच्छादित कर देती थी और भगवान का महान प्रभाव प्रगट करती थी। अहा ! अमृत के समुद्रसमान तथा जगत का मंगल करनेवाले दर्पण समान, भगवान के शरीर की उस मंगलप्रभा में मनुष्य और देव प्रसन्नता पूर्वक अपने सात-सात भव देखते थे। भगवान के सर्वांग से ‘महादिव्यध्वनि’ खिरती थी। मधुर मेघगर्जना समान तथा अतिशययुक्त वह दिव्यध्वनि भगवान के माहात्म्य से सर्वभाषारूप होकर भव्यजीवों के अज्ञानांधकार को नष्ट करती थी और तत्त्व का बोध कराती थी। सर्वज्ञ भगवान की वह दिव्यध्वनि एक होने पर भी श्रोताजनों की पात्रतानुसार अनेक प्रकार की वाणीरूप हो जाती थी। - अहा ! उस जिनवाणी की मधुरता का क्या कहना !

इस प्रकार सिंहासन, पुष्पवृष्टि, अशोकवृक्ष, छत्र, चँवर, देवदुंदुभि, भामण्डल और दिव्यध्वनि - ऐसे आठ प्रातिहार्ययुक्त समवसरण अनन्त चतुष्टय के स्वामी सर्वज्ञदेव द्वारा सुशोभित हो रहा था।

इन्द्रों का आगमन और भगवान की स्तुति

सातिशय पुण्य के नन्दनवन जैसी वह समवसरण की शोभा देखकर इन्द्रादिदेव अति प्रसन्न हुए और भक्तिपूर्वक भगवान की सेवा के लिये समवसरण को तीन प्रदक्षिणा देकर सभामंडप में प्रविष्ट हुए। भगवान का श्रीमुख चारों ओर से दिखता था, अर्थात् वे चतुर्मुख थे। भगवान को अन्न-पानी का आहार नहीं था, वस्त्राभूषण भी नहीं थे, इन्द्रियजन्य ज्ञान भी नहीं था, ज्ञानावरणादि कर्मों का नाश होने से सर्वज्ञ थे; वे मोक्षसृष्टि के सर्जक तथा पापसृष्टि के संहारक थे। ऐसे भगवान को देखते ही अतिशय भक्ति से नम्रीभूत इन्द्रोंने घुटने टेककर प्रणाम किया, उनके नेत्र और मुख हर्ष से प्रफुल्लित हो गये। नमस्कार करते हुए इन्द्र-इन्द्रानी के मस्तक पर अपने नख की किरणो द्वारा भगवान मानो आशीर्वाद की वर्षा कर रहे थे। अष्टप्रकार की उत्कृष्ट पूजन सामग्री द्वारा इन्द्रोंने श्रद्धापूर्वक भगवान की पूजा की, इन्द्रानीने प्रभुचरणों के समीप रंगबिरंगे रत्नों के मण्डल पूरे; परन्तु कृतकृत्य ऐसे भगवान को सब से क्या प्रयोजन था ? वे तो वीतराग थे, वे किसी पर न तो प्रसन्न होते और न ही किसी से द्वेष करते; तथापि भक्तों को इष्ट फल की प्राप्ति हो जाती थी यह एक आश्चर्यजनक बात है ! (भगवान में परका अकर्तृत्व, साक्षीपना और वीतरागता होने पर भी भक्त अपने उत्तमभाव का इष्ट फल प्राप्त करते थे - ऐसी स्वतंत्रता वह एक आश्चर्यजनक बात है, जोकि जैनधर्म में सम्भव है ही।

पश्चात् इन्द्र अत्यन्त भक्तिपूर्वक स्तुति करने लगे : हे जिननाथ ! आप गुणरत्नों के भण्डार हो, आपकीभक्ति इष्ट फल देनेवाली है। हम जड़बुद्धि होनेपर भी आपके गुणों की भक्ति हमें वाचाल करती है। प्रभो ! आपका अत्यंत निर्विकार शरीर ही आपके शान्ति-सुखको प्रगट दरशा रहा है। वस्त्ररहित होने पर भी आपका शरीर सर्वोत्कृष्ट सुंदरता को धारण कर रहा है। प्रभो ! आपके कल्याणको में देव भी दास बनकर आपकी सेवा करते हैं; आप मोक्षमार्गरुपी सृष्टि के विधाता हो; आप ही जगत मे मित्र हो, आप ही गुरु हो, आप ही जगत के पितामह हो; आपका ध्यान करने वाले जीव अमर ऐसे मोक्षपद को प्राप्त करते हैं। प्रभो ! आप दिव्यध्वनि द्वारा जगत को मोक्ष के अनंत सुखका मार्ग दरशाने वाले हो। आपके बतलाये हुए मोक्षमार्ग में चलनेवाले जीव परम आनन्द को प्राप्त करते हैं। प्रभो ! जगत् के समस्त पदार्थ जिसमें भरे हैं ऐसी आपकी दिव्यवाणी विद्वानों को तुरन्त ही तत्त्वज्ञान कराती है और स्याद्वादरुपी नीति द्वारा यह अन्ध-मति का अज्ञान दूर करती है। आपकी वाणी पवित्र तीर्थ है आपके द्वारा प्ररूपित धर्मतीर्थ भव्य जीवों को संसार से पार होने का मार्ग है; प्रभो ! सर्व पदार्थों को जाननेवाले आप सर्वज्ञ हो; मोह के विजेता हो; धर्मतीर्थ के कर्ता तीर्थंकर हो; मुनिजन आपको ही पुराणपुरुष मानते हैं; केवलज्ञानरूपी निर्मल नेत्र आपको प्रगट हुआ है। हे प्रभो ! आप हमपर प्रसन्न होओ और हमारी पवित्र स्तुति स्वीकार करो। इस प्रकार भक्तिपूर्वक भिन्न-भिन्न प्रकार की स्तुति करके इन्द्रो ने प्रभुचरणों में मस्तक झुकाया और भगवान के श्रीमुख की ओर एकटक देखते हुए सभा-मण्डप मे बैठे। शास्त्रकार कहते हैं कि - अहो ! जिनेन्द्र भगवान के बाह्य वैभवरूप इस दिव्य समवसरण की तथा मानस्तंभ आदि की भी मै प्रसन्नता पूर्वक स्तुति करता हूँ, वन्दना करता हूँ तथा उनके अन्तरग वैभव का स्मरण करता हूँ - चिन्तन करता हूँ।

स्वयंभू भगवान ऋषभदेव की धर्मसभा मे क्रमश· बारह प्रकोष्ठ मे (१) गणधरादि मुनिवर, (२) कल्पवासी देवियाँ, (३) आर्यिका तथा श्राविकाएँ, (४) ज्योतिषी देवियाँ, (५) व्यतर देवियाँ, (६) भवनवासी देवियाँ, (७) भवनवासी देव (८) व्यन्तर देव, (९) ज्योतिषी देव, (१०) कल्पवासी देव, (११) मनुष्य तथा (१२) तिर्यंच - इस प्रकार बारह सभाएँ होती है। समवसरण के दिव्य वैभव के बीज भी निर्लिप्तरुप से विराजमान, धर्मचक्र के अधिपति ऐसे श्री जिनेन्द्रभगवान के आत्मवैभव का जो भव्य जीव भक्तिपूर्वक स्तवन तथा चिन्तन करते हैं वे समस्त गुणों से भरपूर ऐसी सम्यक्त्वादि जिनविभूति को प्राप्त होते हैं।

समवसरण में भरत चक्रवर्ती का आगमन, वंदन-पूजन स्तुति

इधर भगवान ऋषभदेव के केवलज्ञान का उत्सव मनाने के लिये भरत महाराजा की सवारी ठाटबाट से पुरिमताल नगरी मे समवसरण के समीप आ पहुँची। सब कार्यों मे सर्वप्रथम धर्मकार्य करना चाहिये - ऐसी बुद्धिवाले भरतने, चक्ररत्न तथा पुत्रजन्म के उत्सव से पूर्व भगवान के केवलज्ञान की पूजा करने का निश्चय किया था। बाहुबलि आदि लघु भ्राता और पुत्रपरिवार सहित धर्मदरबार मे आकर भरतराजने अति भक्तिपूर्वक भगवान जिनेन्द्रदेव के दर्शन-वन्दन किये और फिर महाआनन्दपूर्वक उनकी पूजा की। हम भी उनके साथ ही सम्यक् भाव से जिन पूजा करें :-

[जिनेन्द्र दरबार में मंगल-प्रवेश]

नमों जिनेश्वर देव मैं परम सुखी भगवान
आराधन कर पंथ का पाऊँ पद निर्वाण।
हे धर्मपिता सर्वज्ञ जिनेश्वर चेतनमूरत आपहि हैं;
निज चेतनके अवलोकन को दर्पणसम प्रभु आपहि हैं।
सम्यक् दर्शन-ज्ञान-चरण से, अनुपम सुखका स्वाद लिया,
मुक्ति का वह मार्ग बताकर, भव्यों को कृत्यकृत्य किया।
मोक्षमार्ग का पथिक मैं आया तुझ दरबार
तुझसम आतमभावना, वह पूजन का सार।

[१. स्वानुभूति के जलसे जिनपूजा]

चेतनयमय यह सुख-सरोवर, श्रद्धासुमनों से शोभित है,
आनन्द के मोती चरते हैं, हंस जहाँ क्रीड़ा मे रत रहते हैं।
स्वानुभूति के कनक कलशों से प्रभु को स्नान कराते हैं;
निर्मल जल से वे धरमी, निज मोहमैल को धोते हैं।
अथाह सरोवर आत्म, ज्ञानन्द तरंग,
करूँ शान्तिरस पान से, जन्म-मरण का अंत।

[२. शमरस चन्दन से जिनपूजा]

प्रभुवर, चेतन सागर में करते हो न्हवन शांति-जलसे,
भवातापसे रहित हुए हो, हुए पवित्र मोहमळ से।
प्रभो, तप्त मै मोहताप से, सम्यकरसमें स्नान करूँ,
पावन हो तेरे चरणोकी शमरस जल से पूज करूँ;
चेतनरस को घोलकर, धारित सुगंध मिलाय,
भावों से प्रभु पूजते, शीतल शान्ति लहाय।

[ ૩. અક્ષતીત ભાવે જિનપૂજા ]

[ ३. अक्षातीत भाव से जिनपूजा]

प्रभो ! अगोचर हो अक्षोंसे, मैं अक्षत से पूज करूँ;

अक्षातीत हो ज्ञान हमारा, अक्षयपद को शीघ्र वरूँ।

अन्तर्मुख निजज्ञानभावसे, करूँ तुम्हारा अभिनंदन;

परमभावसे करके पूजा, निज सुखका हो आस्वादन।

अक्षत सुखका स्वाद जो है इन्द्रिय से पार;

ऐसे अक्षय सुख सहित तुम -तुम प्रभु आप

[ ४. श्रध्दा सुमन द्वारा जिनपूजा ]

श्रध्दा के सुमनोंसे आतमदेव; मै करता हूँ पूजा तेरी;

बस यही कामना है, मनमे, प्रभु, आतमसाधना हो मेरी।

सुरभित पुष्प अनंत गुणों के खिले हुए जो अंतर मे;

मुरझाएँगे नही कभी वे आशा है तेरे मग में।

श्रद्धा क सुन्दर सुमन खिले आत्मउद्यान;

उन पुष्पों से पूजने, आया मैं भगवान।

[ ५. चेतनरस के स्वादसे जिनपूजा]

नैवेद्य नहीं कुछ लेते हो प्रभु ! कैसे नैवेद्य चढाऊँ मैं,

चेतनरस का नैवेद्य सच्चा तुज पाससे लहु मैं।

हे देव जिनेश्वर ! चेतनरसका आनंदसे मैं स्वाद लहुं;

सादि - अनंतका स्वाद ज सच्चा सिद्धालयमे आकर रहूं

जगके जूठे स्वाद तो चखे अनंतीबार;

आतमरस का स्वाद ले, हो जाऊँ भवपार।

[ ६. ज्ञान-दीपक से जिन पूजा]

लाखों दीपक जलें भले पर दूर नहीं होता अज्ञान;

क्षणमें उस अज्ञाननिशाका, करती ज्ञानकिरण अवसान।

अहा ! ज्ञान की है यह महिमा कर सकता नहीं मोह प्रवेश;

साधक ऐसे ज्ञानदीप से प्रभु की पूजा करें विशेष।

स्वानुभूति के दीप से दीपित आत्मस्वरुप;

राग-पवन लगती नहीं, केवलज्योति अनूप।

[७. ध्यानाग्नि द्वारा जिनपूजा]

राग-द्वेष का ध्वंस हुआ अरु अष्ट कर्म विनशे तत्काल, हुई ध्यान की अग्नि प्रज्वलित सौरभसे प्रगटी गुणमाल अहा, आत्मशुद्धि है अद्भुत, सुख-सुवास फैली चहुँ ओर; ध्यान-अग्नि के चमत्कार से साधी है ज्ञायक की डोर।

शांति-सुगन्ध का पुंज मैं, ज्ञानानन्द का धाम,
सिद्ध सदृश निज ध्यायकर पहुँचूँगा शिवग्राम।

[८. मोक्षसुख के स्वाद द्वारा जिन पूजा]

सम्यक् वृक्ष के अमृतफल से मुक्तिसुख का लेकर स्वाद, चेतनरस के अद्भुत स्वाद से राग-द्वेष का हुआ विनाश। करता मोक्ष सुफल की आशा ज्ञान वृक्ष का बोकर बीज, सिंचन कर चारित्रिक जलसे, प्राप्त करूँगा उसको शीघ्र।

मैं ही बीज, मैं वृक्ष हूँ, मैं फल चाखनहार,
पूज्य-पूजककी एकता, फलपूजा का सार।

[सम्यक् भाव से सच्ची जिन सेवा]

अज्ञानदशा मे प्रभुजी आपको नहि सत्स्वरूप को पूज सका, पूजन के मिस कर राग प्रभो, मै वीतरागता चूक गया। अब ज्ञानरुप होकर मैने, प्रभु रुप तुम्हारा जान लिया, जागृत कर सम्यक् भाव स्वय उस सत्स्वरूपको नमन किया।

सत्स्वरूपकी अर्चना, यही प्रभु की सेव,
जिनसेवा व्यवहार से, निश्चय आतम सेव।

सच्चे जिन-उपासक ऐसे सम्यग्दृष्टि भरत को सम्यक्भाव से जिनपूजा करते हुए रोमांचकारी चैतन्य-उर्मियाँ जागृत होती थी। पूजा के पश्चात् साष्टांग नमस्कार पूर्वक भरत राजाने धर्मचक्रवर्ती ऐसे तीर्थंकर प्रभुकी स्तुति की : हे प्रभो ! आप धर्म के नायक हो, आप मोक्ष मार्ग के नेता हो,आत्मस्वरूप के ज्ञाताओं के आप ध्येय हो; इन्द्रियाँ विद्यमान होनेपर भी आप अतीन्द्रिय हो; विषय-कषायरहित सम्पूर्ण आत्मिक सुख आपको प्रगट हुआ है। प्रभो ! आप तो अनन्त गुण-सम्पन्न हो, हम अल्पबुद्धिजीव आपके पवित्र गुणोंका स्तवन किस प्रकार कर सकते है ? आपके गुणों की स्तुति तो दूर रही, आपका नाम भी हमें पवित्र कर देता है। हे प्रभो ! आपको ही इष्टदेव मानकर हम आपकी ही उपासना करते है और आपके द्वारा प्ररूपित मोक्षमार्ग की उपासना करके मोक्षप्राप्त करना चाहते हैं।

इस प्रकार वन्दन-पूजन-स्तवन करके, देव भी जिन्हें आश्चर्य से देख रहे हैं ऐसे वे भरत चक्रवर्ती श्रीमण्डपमें जाकर मनुष्यों की सभामें अग्रस्थान पर बैठ गये। सारी सभा तत्त्व का स्वरूप जानने की इच्छा से भगवान की दिव्य ध्वनि श्रवण करने हेतु हस्तांजलि जोड़कर शांत हो गई। तब महाराज भरतने विनयपूर्वक भगवान से प्रार्थना की कि - हे भगवान ! तत्त्व कितने है ? उनमे शुद्ध आत्मतत्त्व कैसा है ? मोक्ष का मार्ग क्या है ? और उस मार्ग का फल क्या है ? वह हम आपसे सुनना चाहते हैं…कृपा करके धर्मकी वृष्टि करो।

भगवान के दिव्य उपदेश द्वारा भरत क्षेत्र में धर्मयुग का प्रारम्भ

भरतराज द्वारा प्रार्थना किये जाने पर तीर्थंकर भगवान ऋषभदेवने अत्यन्त गम्भीर दिव्यध्वनि द्वारा तत्त्वों का विवेचन किया दिव्यध्वनि खिरते समय भी भगवान के मुखमण्डलमें कोई परिवर्तन (होठों का हलनचलन आदि) नहीं होता था। - क्या पदार्थों को प्रकाशित करते समय दर्पण मे कोई विकार होता है ? नहीं होता। बिना प्रयत्न के, इच्छा बिना सर्वांग से उस वीतरागवाणी की धारा बह रही थी। जिस प्रकार पर्वत की किसी गहरी गुफा में से आवाज आ रही हो तदनुसार भगवान की दिव्यवाणी अतिगम्भीर थी। अहो ! तीर्थंकर महापुरुषों का योगबल तथा उनकी प्रभुता कोई अचिन्त्य होते है ।

समवसरण मे दिव्य ध्वनि द्वारा भगवानने जीवादि छह द्रव्यो का यथार्थ स्वरूप कहा। जगत में जीव और अजीव ऐसे दो प्रकार के द्रव्य हैं; जीव भी ससारी और मुक्त ऐसे दो प्रकार के हैं। जिसमें चेतना अर्थात् जानने-देखने की शक्ति है वह जीव है; वह अनादि-अनन्त है, उत्पाद-व्यय-ध्रुवता सहित है, उपयोगस्वरूप है, शुभ-अशुभ या शुद्ध भावरुप स्वकर्मकाकर्ता है, उसके फल का भोक्ता है, वह लोकप्रदेशप्रमाण असख्यप्रदेशी अरुपी है और शरीराकार स्थित है, अत्यन्त गुणसपन्न है, लोकाग्रतक ऊर्ध्वगमनस्वभावी है, ससारदशा मे सकोच-विस्ताररुप परिणमता है; द्रव्यकर्म-भावकर्म नोकर्मरहित उसका शुद्ध चिदानन्दस्वरुप है वह मोक्ष दशामे प्रगट होता है, और धर्मात्मा जीव उसे अपनेमे स्वानुभवसे जानते है। जीव का संशोधन करने हेतु गति आदि १४ मार्गणाएँ भी भगवानने विस्तारसे बतलायी, जीवकी पर्याय के १४ गुणस्थान बतलाये, औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, औदयिक तथा पारिणामिक यह पाँच भाव जीवके निजतत्त्व है, उनका स्वरूप बतलाया जीवका लक्षण उपयोग है। ऐसे उपयोगलक्षणरुप जीवको जानकर उसका यथार्थ श्रद्धान करना चाहिये। ‘जीव’ के उपरान्त प्राणी, जन्तु, क्षेत्रज्ञ, पुरूष, पुमान, आत्मा, अंतरात्मा, ज्ञ तथा ज्ञानी भी जीव के ही नाम है। द्रव्यसे वह नित्य है और पर्यासे विनाशसहित अनित्य है। आत्मा सत वस्तु है वह सर्वथा अभावरूप नही है, तथा सर्वथा नित्य या सर्वथा अनित्य भी नही है; वह सर्वथा अकर्ता या अभोक्ता भी नहीं है, उसे संसार है और वह संसार से छूटकर मोक्ष भी प्राप्त करता है। उस मोक्ष का उपाय रत्नत्रय है जो कि राग रहित है। कुमार्ग छोड़कर ऐसे जीवतत्त्व का तथा मोक्षके उपाय का निश्चय करना चाहिये; और पश्चात अणुव्रतरुप श्रावकपना या महाव्रतरूप मुनिपना अंगीकारकरना चाहिये । ऐसा श्रावकधर्म तथा मुनिधर्म का उपदेश भगवानने दिया।

तथा भगवानकी दिव्यदेशनामे ऐसा आया कि जीवकी नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव- यह चारों गतियाँ ससार अवस्था है; और रत्नत्रय द्वारा समस्त कर्मोंका अत्यंत क्षय होनेपर जो अनंत सुखस्वरूप सिद्धगति प्रगट होती है वह मोक्षदशा है। सम्यग्दर्शन- सम्यग्ज्ञान-सम्यक चरित्र ऐसे रत्नत्रयरुप साधन द्वारा उसकी प्राप्ति होती है। ऐसे जीवादि तत्वोंका तथा सच्चे देव- शास्त्र- गुरु का अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक श्रद्धान करना सो सम्यग्दर्शन है; यह सम्यग्दर्शन मोक्ष प्राप्ति का प्रथम सोपान है। जीवादि पदार्थों के यथार्थ स्वरुप को प्रकाशित करनेवाला तथा अज्ञानांधकार का विनाशक जो ज्ञान है वह सम्यक चारित्र है। इष्ट-अनिष्ट पदार्थोंमें समताभाव धारण करके निज स्वरुप मे विचरना ऐसे मध्यस्थ लक्षण रुप सम्यक चारित्र है। यह सम्यक चारित्र यथार्थरुप से तृष्णारहित, मोक्षार्थी, वस्त्ररहित एवं अहिंसक ऐसे मुनिको ही होता है। इन सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररुप रत्नत्रयकी पूर्णता वह मोक्षका कारण है; उनमे सें एक भी कम हो तो वह अपने कार्यको (मोक्षको) नहीं साध सकता। सम्यग्दर्शन हो तभी ज्ञान और चारित्र सफल हैं। सम्यग्दर्शन रहित बाह्य चारित्र कुछ भी कार्यकारी नही है, परन्तु वहतो अन्ध पुरुष की दौड समान है। उसी प्रकार चारित्र के बिना अकेले दर्शन-ज्ञान द्वारा भी मोक्ष नहीं सधता। इसप्रकार भगवान ने रत्नत्रयरूप मोक्षमार्ग बतलाया।

जैन धर्म में आप्त,आगम और पदार्थों का जो स्वरूप कहा है उससे अधिक या कम तीन कालमें नही होता। ऐसी श्रद्धाकी दृढता द्वारा सम्यग्दर्शनमे विशुद्धता होती है। जो अनन्त ज्ञानादि गुणोंसहित सर्वज्ञ है, जिन्होने मोहादि कर्मकलंक को धो डाला है, जो निर्मलताके भण्डार है और निर्मल जिनका आशय है, सबके हितोपदेष्टा है- ऐसे वीतराग जिनदेव वे ‘आप्त’ है, वे ही इष्ट हैं। ऐसे आप्तपुरुषकी वाणी जो कि शुद्धात्मस्वरूप के पुरुषार्थ की उपदेश है और नव-प्रमाणोंसे गंभीर है वह ‘आगम’ है। उसमे कहे गये अनेकान्तस्वरूप जीवादि पदार्थ वे तत्त्व है । ऐसे आप्त आगम तत्व को बराबर जानना चाहिये। जीव-अजीवादि पदार्थ अपने अपने गुण -पर्याय रूप से परिणमन करते है, समस्त पदार्थों में स्वयमेव परिणमन होता है और कालद्रव्य उसमे सहकारी कारण है। -ऐसे पदार्थ स्वरुप को जो जानता है वह परमब्रह्मपद को प्राप्त करता है।

इस प्रकार भरत क्षेत्र के आद्यतीर्थंकर भगवान ऋषभदेवने दिव्यध्वनि द्वारा जीवादि छह द्रव्योंका, मोक्षादि मार्गरुप रत्नत्रय का बध और उसके कारणो का नरक और द्वीप-समुद्रादिका, तीर्थंकरों का, गुणस्थान मार्गणास्थान का, गति-आगतिका तथा मुनियोंकी ऋद्धि आदिका निरुपण किया। सर्व के ज्ञाता एवं सर्व के कल्याण कर्ता भगवान ऋषभदेवने भूत- भविष्य- वर्तमान त्रिकालसम्बन्धी समस्त द्रव्यों का सम्पूर्ण स्वरूप बतलाया।

अहा,इस भरत क्षेत्र में असंख्यात वर्षों बाद तीर्थंकर भगवान की दिव्यध्वनि सर्वप्रथम पुरिमतालनगरी में खिरी.. उस दिव्य ध्वनि की क्या बात !! और उस अमृत झरने को झेलनेवाले श्रोताओं के आन्द का क्या कहना !! भगवान द्वारा दर्शाये गये तत्त्वस्वरूप का श्रवण करके भरतराजा और बारह सभाओं के जीव परम आनन्दित हुए। दिव्यध्वनि द्वारा धर्मरूपी अमृत का पान करके सर्व जीव परमहर्षित एवं सन्तुष्ट हुए। परम आनन्दित होकर भक्तिनिर्भर ऐसे महाराज भरत भगवान के चरणों में क्षायिक सम्यक्त्व, अवधिज्ञान तथा अणुव्रतों की परमविशुद्धि को प्राप्त हुए।

卐 चार तीर्थरूप चतुर्विध संघ की स्थापना 卐

उसी समय महाराज भरत के लघु भ्राता वृषभसेन - जो कि पुरिमतालनगरी के राजा थे तथा प्राज्ञ, शूरवीर, पवित्र, धीर-गम्भीर एवं अतिशय बुद्धिमान थे, उन्होंने भगवान के प्रथम उपदेश से सम्बोधित होकर उनके चरणों में मुनिदीक्षा धारण कर ली और वे भगवान के प्रथम गणधर हुए; भगवान के जो पुत्र थे वे ही उनके धर्मपुत्र (गणधर) हुए; और सात ऋद्धि एवं चार ज्ञान से सुशोभित हो उठे। तदुपरान्त आहार दान देने वाले राजा सोमप्रभ, श्रेयांसकुमार तथा अन्य राजा भी दीक्षा धारण करके भगवान के गणधर हुए। भगवान की पुत्री और भरत महाराज की बहिन ब्राह्मीदेवी भी भगवान के निकट दीक्षित होकर आर्यिकाओं के संघ की गणिनी बनी; देवों ने भी उनकी पूजा की। भगवान की दूसरी पुत्री एवं बाहुबलि की सहोदरी सुन्दरी देवीने भी प्रभुचरणों में वैराग्यपूर्वक दीक्षा धारण की; अन्य कितने ही राजा, राजकुमार तथा राजपुत्रियों ने संसार से भयभीत होकर दीक्षा ले ली। श्रुतिकीर्ति नामक अति बुद्धिमान पुरुष ने श्रावकव्रत ग्रहण किये, और लाखों देशव्रती श्रावकों में वे श्रेष्ठ हुए; उसी प्रकार पवित्र अंतःकरणवाली सती प्रियव्रताने श्राविका के व्रत धारण किया और लाखों श्राविकाओं में वह श्रेष्ठ हुई।¹ इस प्रकार भगवान ऋषभदेव के शासन में इस भरतक्षेत्र में मुनि - आर्यिका, श्रावक और श्राविकारूप चतुर्विध संघ की स्थापना हुई।

मोक्ष के द्वार खुले

भगवान के साथ दीक्षा लेनेवाले जो ४००० राजा भ्रष्ट हो गये थे, उनमें से एक मरीचिको छोड़कर अन्य सब तपस्वी राजा भगवान ऋषभदेव के उपदेश से तत्त्व का यथार्थ स्वरूप समझकर पुनः दीक्षित हुए और भावलिंगी मुनि हुए। अन्य अनेक श्रेष्ठ राजाओं ने भी दीक्षा ली; उसमे भगवान के पुत्र अनन्तवीर्य (भरत के भाई) श्री भगवान के पास दीक्षा लेकर अल्पकाल मे केवलज्ञान प्रगट करके इस अवसर्पिणी युगमें (तीसरा आरामें) सर्व प्रथम मोक्ष प्राप्त किया। देवों ने भी उनकी पूजा की। इस प्रकार प्रथम तीर्थंकर भगवान की दिव्यध्वनि प्रारम्भ होने पर भरतक्षेत्र में मोक्ष के द्वार खुले।

सौधर्म इन्द्र द्वारा भगवान की स्तुति

महाराजा भरत परमभक्तिपूर्वक भगवान ऋषभदेव के केवलज्ञान का उत्सव मनाकर तथा दिव्यध्वनि का श्रवण करके, चक्ररत्न का एवं पुत्रजन्म का उत्सव मनाने के लिये अयोध्यानगरी लौटे। राजर्षि भरत के विदा होते ही दिव्यध्वनि बन्द हो गई, तब धर्मसभा में विराजमान भगवान ऋषभदेव को देखकर हर्षसे जिनके हजार नेत्र खुले हैं और मन प्रसन्न हो रहा है ऐसे सौधर्म इन्द्रने स्थिर चित्त से भगवान की स्तुति प्रारम्भ की : हे प्रभो ! बुद्धि की मन्दता होनेपर भी मात्र भक्ति से प्रेरित होकर मैं गुणरत्नों के भण्डार ऐसे आपकी स्तुति करता हूँ; आपकी स्तुति से उत्तम फल स्वयं प्राप्त होता है। पवित्र गुणों का कीर्तन करना सो स्तुति है, प्रसन्न-बुद्धिवाला भव्य जीव स्तुति करनेवाला (स्तोता) है, सर्वगुणसम्पन्न ऐसे आप सर्वज्ञदेव स्तुत्य हो, और मोक्षसुख की प्राप्ति वह स्तुति का फल है। हे भगवान ! इस प्रकार आपकी स्तुति करनेवाले ऐसे मुझे आप अपनी प्रसन्न दृष्टि द्वारा पवित्र करो। प्रभो ! आपकी भक्ति मुझे आनन्दित कर रही है इसलिये मैं संसार से उदासीन होकर आपकी स्तुति में लीन हुआ हूँ। हे देव ! राग-द्वेषरहित ऐसे आप वस्त्राभूषण के बिना ही सर्वोत्कृष्टरूप से सुशोभित हो रहे हो; इससे सिद्ध होता है कि शोभा बाह्य श्रृंगार से नहीं है किन्तु वीतरागभाव से ही है। आपने क्रोध किया बिना ही मोहशत्रु का नाश कर दिया है, आपकी प्रभुत्वशक्ति महान आश्चर्यकारी है। प्रभो ! आपकी वीतराग दृष्टि हमें पवित्र कर रही है। जिसमे से दिव्यध्वनिरूपी अमृत झरता है और भव्य जीवों को जीवन देता है ऐसा आपका श्रीमुख, मानो धर्मका आगार हो ऐसे शोभायमान हो रहा है, और यह भी एक आश्चर्य की बात है कि आपकी वाणी मे एकसाथ अनेक प्रकार की भाषाएँ उत्पन्न होती हैं; यह आपके तीर्थंकरत्व की ही अचिन्त्य महिमा है। आपके आत्मा का तो क्या कहना, आपका शरीर और वाणी भी ऐसे असाधारण हैं कि जगत् को आनन्दित करते हैं। प्रभो ! आपका यह समवसरणरूपी विमान पृथ्वीका स्पर्श नहीं करता हुआ सदा आकाश मे ही विद्यमान रहता है, आपके आसपास १०० योजन मे कही दुर्भिक्ष या रोगादि उपद्रव नही होते, शेर, चिते जैसे हिंसक प्राणी भी आपका धर्मोपदेश सुनकर अहिंसक बन जाते है, प्रभो ! घातिकर्मों का नष्ट किया होने से असाता वेदनीय आपको फल नहीं दे सकता; इसलिये न तो आपको क्षुधा है और न आहार। आप तो अनन्त अतीन्द्रिय सुखके भोक्ता हो। प्रभो ! आपको देखकर देवों को इतना आनन्द होता है कि उनके नेत्र पलक भी नहीं मारते। प्रभो ! आप अपने आत्मा में से आत्मा द्वारा ही स्वयभू सर्वज्ञरूप से प्रगट हुए हो और आपकी महिमा अचिन्त्य है; इसलिये आपको नमस्कार हो !

अभी भगवान की स्तुति करते हुए सौधर्म इन्द कहते हैं कि हे नाथ ! आपके गुण अनन्त हैं, उन अनन्त गुणो का स्तवन तो मै अपनी हजार जिह्वाओं द्वारा भी नही कर सकता, परन्तु आपके १००८ लक्षण अति प्रसिद्ध हैं, इसलिये मै एक हजार आठ मंगल नामों द्वारा आपकी स्तुति करता हूँ। - ऐसा कहकर इन्द्र ने ‘श्रीमान’ से प्रारम्भ करके ‘धर्म साम्राज्य नायक’ तक के १००८ नामों से भगवान का स्तवन किया।

१. हे प्रभो ! जगत के अद्वितीय प्रकाशक होने से आप एक हो। २. एकसाथ ज्ञान-दर्शनरूप दो उपयोग के धारक होने से दो रूप हो। ३. सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ऐसे त्रिविध मोक्षमार्गमय होने से त्रिरूप हो। ४. आत्मा में उत्पन्न ऐसे अनन्त चतुष्टय स्वरूप होने से आप चाररूप हों। ५ पंचपरमेष्ठी स्वरूप होने से तथा पंचकल्याणक के नायक होने से पाँच रूप हो। ६. हे देव ! जीवादि छह द्रव्यों के प्रत्यक्ष ज्ञाता होने आप छह रूप हो। ७. नैगमादि सात नयों के संग्रहरूप होने से आप सातरुप हों। ८. सम्यक्त्वादि आठ अलौकिक गुणस्वरूप होने से आप आठ रूप हो। ९. प्रभो ! केवलज्ञानादि नव क्षायिकलब्धिसहित होने से आप नवरूप हों। १०. महाबल आदि दस अवतारों द्वारा आपका निर्धार होने से आप दस रूप हों।

  • ऐसे हे ऋषभजिनेश्वर ! इन भवदुःखों से मेरी रक्षा करो !

इस प्रकार स्तुति करने के पश्चात् इन्द्रने भगवान से तीर्थविहार हेतु प्रार्थना की कि - हे प्रभो ! भव्य जीवों पर धर्मरुपी अमृत का सिंचन करने के लिये आप मेघरुप बनो। मोह की सेना को नष्ट करके केवलज्ञान प्राप्ति के पश्चात् अब मोक्षमार्ग का उपदेश देने का समय आ चुका है, और आपके श्रीविहार हेतु यह धर्मचक्र भी तैयार है। इसलिये हे जिनेश्वर ! मंगलविहार द्वारा इस भरतभूमि को पावन करें और मोक्षमार्ग का उपदेश देकर धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करें।

तब, तीर्थंकर नामकी पुण्यप्रकृति जिनकी सारथी है ऐसे श्री भगवान का विहार हुआ। भगवान को किंचित् भी इच्छा नहीं थी, परन्तु भव्यजीवों के महा भाग्योदय से उनका सहज विहार हुआ। इन्द्रादि देवों ने भगवान के विहार का महान महोत्सव किया। आकाशगामी भगवान के आसपास करोड़ों देव जयजयकार करते हुए आकाश में चलने लगे। जहाँ-जहाँ भगवान का पदार्पण हुआ वहाँ सर्वत्र आनन्द छा गया; आकाश और पृथ्वी भी प्रसन्न होकर दैवी वातावरण द्वारा भगवान के आगमन की सूचना देते थे। हजार आरोंवाला तेजस्वी धर्मचक्र सबसे आगे चलता था। अष्टमंगल, धर्मध्वज और देवों के बाजे भी साथ साथ चल रहे थे। लोक कहते हैं कि आकाश में फूल नहीं होते, परन्तु आश्चर्य है कि गगनविहारी भगवान के चरणों तले आकाश में दो सौ पच्चीस सुवर्णकमलों की रचना हो जाती थी, इस प्रकार आकाशरुपी सरोवर भी कमलों से खिल उठता था। एक लाख पूर्व तक गुजरात-सौराष्ट्र सहित भरतभूमि में विहार करके भगवान ऋषभदेवने धर्मामृत की वर्षा की और भव्य जीवों को तृप्त किया; पश्चात् कैलास पर्वत पर पधारे और वहीं स्थिर हुए।

कैलासधाम में विराजमान ऋषभ तीर्थंकर को नमस्कार हो !

[प्रिय पाठक ! हमारे कथानायक महात्माने महाबल राजा के भव से लेकर भगवान ऋषभदेव के तकके दस भवों मे जो धर्म साधना की और तीर्थंकर होकर धर्मतीर्थ का प्रवर्तन किया उसका सुन्दर वर्णन भगवत् जिनसेन स्वामी रचित महापुराण के २५ अध्यायों में है तो आप अब तक पढ़ चुके हैं; तत्पश्चात् २६ वे अध्याय से ४७ वें अध्याय तक भरत चक्रवर्ती की दिग्विजय आदिका तथा बाहुबलि, जयकुमार आदि महापुरुषों का जीवन वृन्तात है और पश्चात् उत्तर पुराण में (गुणभद्र स्वामी रचित अध्याय ४८ से ७६ में) शेष २३ तीर्थंकर भगवन्तो, चक्रवर्तियों, बलदेव-वासुदेव, हनुमानजी आदि महापुरुषों की जीवन गाथा है। यदि हम इस पुस्तक में सब लेने जायें तो पुस्तक बहुत बढ़ जायगी इसलिये, भगवान ऋषभदेव के शासनकाल में हुए अन्य भरतादि महापुरुषों के जीवन का विस्तृत वर्णन तो उन उन पुरुषों के जीवन चरित्र में करेगें, यहाँ तो उनके मंगल स्मरणार्थ संक्षिप्त उल्लेख ही करेंगे; पश्चात् कैलास धाम के ऊपर पहुचकर भगवान ऋषभदेव का मोक्षकल्याणक देखेंगे। तत्पश्चात् अनेक पुराणो के आधार से लिखे गये अन्य तेईस तीर्थंकर भगवन्तों के उत्तम जीवन का रसास्वादन करेंगे।)

भरत चक्रवर्ती और बाहुबलि

भगवान ऋषभदेव के जेष्ठ पुत्र और अनेक भव तक साथ रहनेवाले भरत, पुरिमताल नगरी में भगवान ऋषभदेव की वन्दना करके अयोध्या लौटे; वहाँ पुत्र जन्म का तथा चक्ररत्न की उत्पत्ति का उत्सव किया; और पश्चात् छह खण्ड की दिग्विजय करने चले। जब सौराष्ट्र देशमें पहुँचे वहाँ बीच में गिरनार का मनोहर प्रदेश आया : ‘यहाँ भविष्यमें नेमिनाथ तीर्थंकर होगें’ -ऐसा स्मरण होने पर भरत चक्रवर्तनि ऊँचे गिरनार पर्वत की प्रदक्षिणा की छह खण्ड की दिग्विजय करके लौटते हुए कैलास पर्वत पर भगवान आदिनाथ के पुनः दर्शन किये। भरतने भगवान की वन्दना करके दिग्विजय का प्रारम्भ किया था, और आज ६०००० वर्ष पश्चात् दीग्विजय की पूर्णता के अवसर पर पुनः भगवान ऋषभदेव के दर्शन हुए। उनके साथ १२०० पुत्र थे, उन्होने तो अपने दादाजी भगवान आदिनाथ को पहली बार देखा और देखकर परम आश्चर्य को प्राप्त हुए ! वे अपनी माताके पास जाकर अत्यंत हर्षपूर्वक समवसरण का वर्णन करने लगे। अहा साक्षात् परमात्मा (और फिर अपने दादा) -उनके दर्शन से उन राजकुमारों को जो आत्मतृप्ति एवं प्रसन्नता हुई, उसकी क्या बात !

१

भगवान ऋषभदेव (भाग ७)

कैलास की यात्रा करके अयोध्या के निकट आने पर भरत का चक्र थम गया, क्योंकि ९९ भाई अभी अविजित थे, उन्होंने भगवान आदिनाथ के अतिरिक्त किसी दूसरे को नमन नही करने का निर्णय किया था; महाराजा भरत के दूत द्वारा सन्देश सुनकर ९८ भाई तो संसारसे विरक्त हो गये, और ‘दीक्षा ही रक्षा है’ ऐसा विचारकर भगवान आदिनाथ की शरण मे जाकर मुनि हो गये, और पश्चात् केवलज्ञान प्रगट करके मोक्ष प्राप्त किया।

अब शेष रहे बाहुबलि ! उन्होने न तो दीक्षा ली, और न ही भरत को नमन किया। अन्त मे भरत-बाहुबलि के बीच त्रिविध युद्ध हुआ, उसमे भरत हारे और क्रोधित होकर बाहुबलि पर चक्र छोड़ा; परन्तु चरमशरीर भाई बाहुबलि पर उसका कोई प्रभाव नही हुआ। उसी समय विजेता बाहुबलि संसार से विरक्त हो गये और दीक्षा लेकर एक वर्ष तक प्रतिमायोग धारण करके ध्यानमें लवलीन होकर अद्भुत-आश्चर्यकारी तप किया। इस भव के और पूर्वभव के भी भ्राता ऐसे भरत चक्रवर्ती उनकी पूजा करने आये, उसी समय नि शल्य होकर वे केवलज्ञान को प्राप्त हुए और भरतने रत्नों के अर्घ्य द्वारा अत्यन्त भक्तिसहित बाहुबलि-केवली की महान पूजा की। केवलज्ञानप्राप्त बाहुबलि जिनदेवने अनेक देशों मे विहार करके दिव्यध्वनि द्वारा सर्व जीवों को संतुष्ट किया और पश्चात् कैलास पर्वतपर आ पहुँचे।

एक बार भरत चक्रवर्ती ने १६ स्वप्न देखे और उनका फल जानने के लिये भगवान के समवसरण मे गये। वे १६ स्वप्न आगामी पंचमकाल के सूचक थे।

जयकुमार

भगवान को प्रथम आहारदान देनेवाले हस्तिनापुर के राजा सोमप्रभ और श्रेयांसकुमार; श्रेयांसकुमार तो भगवान के नौ भव के साथी थे और अन्त में गणधर हुए; सोमप्रभ राजा के पुत्र जयकुमार; सोमप्रभराजा द्वारा दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात् जयकुमार हस्तिनापुर के राजा हुए, वे भरत चक्रवर्ती के सेनापति भी थे। सुलोचनादेवी के साथ उनका विवाह हुआ; दोनों को जातिस्मरण होने पर अनेक भवों के सम्बन्ध का ज्ञान हुआ। इन्द्रने दोनों के उत्तम शील की प्रशंसा की, इसलिये देवीने आकर उनके शील की परीक्षा की। एक दिन भगवान का उपदेश सुनकर जयकुमारने दीक्षा ग्रहण कर ली; उनके साथ उनके लघुभ्राता जयन्त, विजय, सजयन्त तथा चक्रवर्ती के पुत्र रविकीर्ति आदि अनेक पुत्रोंने भी दीक्षा ले ली। जयकुमार ऋषभदेव भगवान के ७१ वें गणधर हुए और मोक्ष प्राप्त किया; सती सुलोचनाने भी दीक्षा धारण की और एकावतारी हुई।

अब हम भगवान के समवसरण मे जाकर वहाँ के धर्मवैभव का अवलोकन करें:-

भगवान ऋषभदेव का धर्मवैभव

मोक्षमार्ग के नायक एवं धर्मतीर्थ के प्रवर्तक भगवान ऋषभदेव समवसरण में ८४ गणधरों के मध्य सुशोभित हो रहे हैं। उनके समवसरण में २०००० केवलज्ञानी गगन मे विराजमान है; ४७५० श्रुतकेवली है; ४१५० शिक्षक मुनिवर है, ९००० अवधिज्ञानी मुनिवर हैं, २०६०० विक्रियाऋद्धिधारी मुनिवर हैं; १२७५० मन पर्ययज्ञानी मुनिवर है। - इस प्रकार कुल ८४०८४ (चौरासी हजार चौरासी) मुनिवरों का संघ विराजमान है, - उन्हे नमस्कार हो ! ब्राह्मी आदि तीन लाख पचास हजार आर्यिका माताएँ भगवान के गुणों की उपासना कर रही है, दृढ़व्रतादि तीन लाख श्रावक और सुव्रतादि पाँच लाख श्राविकाएँ भगवान के कहे हुए मोक्षमार्ग मे गमन कर रही है और तिर्यंचों का भी पार नही है। ऐसी उत्तम धर्मसभा मे दिव्यध्वनि प्रवाहित हो रही है और कितने ही जीव सम्यक्त्वादि धर्म प्राप्त करके आत्मकल्याण साध रहे हैं। जैनधर्म की धारा अखण्डरुप से बह रही है।

-इस प्रकार सज्जनों को उत्तम मोक्षफल की प्राप्ति कराने हेतु भगवान एक लाख पूर्व (-उसमें एक हजार वर्ष तथा १४ दिन कम) तक इस भरतभूमि मे तीर्थंकर रूप से विचरे। जब उनके मोक्षगमन मे १४ दिन शेष रहे तब पौष शुक्ला पूर्णिमा के दिन कैलास पर्वत पर योगनिरोध प्रारम्भ हुआ, दिव्यध्वनि रुक गई।

ठीक उसी दिन अयोध्यानगरी मे महाराजा भरत ने स्वप्न देखा कि मेरु पर्वत उच्च होकर ठेठ सिद्धालय तक पहुँच रहा है; युवराज अर्ककीर्तिने ऐसा स्वप्न देखा कि महाऔषधि का वृक्ष मनुष्यों के जन्मरोग को मिटाकर स्वर्ग में जा रहा है; गृहपति ने देखा कि कल्पवृक्ष इच्छित फल देकर स्वर्ग में जा रहा है, प्रधानमन्त्री ने देखा कि एक रत्नद्वीप लोगो को रत्नराशि देकर आकाश में जाने की तैयारी कर रहा है; इसी प्रकार सेनापति आदिने भी भगवान ऋषभदेव के मोक्षगमन सूचक स्वप्न देखे और उसी प्रात-काल ‘आनन्द’ नामक दूत समाचार लाया कि भगवान मोक्ष जाने की तैयारी कर रहे हैं।

तुरन्त ही समस्त परिवार सहित भरत चक्रवर्ती भगवान के समवसरण मे आ पहुँचे, और १४ दिन की महामह नामकी महा पूजा प्रारम्भ की।

भगवान का मोक्षगमन

माघ कृष्णा चतुर्दशी के दिन सूर्योदय के समय भगवान ऋषभदेव पूर्वमुख से अनेक मुनियों सहित पर्यकासन विराजमान हुए; सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति नामक तीसरे शुक्लध्यान द्वारा तीनों योग का निरोध करके अयोगी हुए; अन्तिम गुणस्थान में पाँच लघुस्वर के उच्चारण जितने समय में चौथे व्युपरतक्रियानिवर्ति नामक शुक्लध्यान द्वारा चार अघातिकर्मों का अत्यन्त अभाव करके कैलासगिरि से अशरीरी सिद्धपद प्राप्त किया और अष्टमहागुणसहित उर्ध्वगमन करके तनुवातवलय में लोकाग्र में विराजमान हुए। आत्मसुख में तल्लीनरूप से वर्तमान में भी वे वहीं विराज रहे हैं। उन सिद्धप्रभु को नमस्कार हो।

इन्द्रों ने तथा चक्रवर्ती आदि ने भगवान के मोक्ष कल्याणक का महोत्सव किया।

कैलासगिरि पर ऋषभदेव भये सिद्धभगवान;
साधो प्रभुके पंथको नमन करो गुणवान।

[अपने २४ तीर्थंकर भगवन्तों के महापुराण में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का दस पूर्वभवों सहित मंगल-जीवनचरित्र पूर्ण हुआ।]

※ ※ ※ ※ भगवान ऋषभदेव का महान जीवन चरित्र आपने पढ़ा। आपको सचमुच आनन्द हुआ !! जिनभक्ति एवं मोक्षसाधना की मंगल-ऊर्मियाँ आपके अन्तर में जागृत हुई !! -हाँ, तो अब ऐसे ही अन्य २३ तीर्थंकर भगवन्तों का अति भव्य मंगल जीवन चरित्र आप पढ़ेंगे…और साथ ही साथ उत्तम प्रसंगों के चित्र देखेंगे, जिससे आपको आनन्द होगा।

इस प्रकार एक साथ अपने २४ तीर्थंकर भगवन्तों का महापुराण पढ़कर आप वाह…वाह ! कर उठेंगे। उन भगवन्तों के दिव्य गुण आपके चित्त में बस जायेंगे और जैनधर्म के मूल रहस्यों को आप जान लेंगे।

परन्तु हे भाई ! आप अकेले ही इस महापुराण का लाभ मत लेना; अपने समस्त परिवार को तथा जैन समाज के घर-घर में सभी को इस पुराण का लाभ प्राप्त हो सके ऐसी प्रभावना करना। जिस प्रकार आप बचपन में अपनी दादीमाँ से कहानियाँ सुनते थे, उसी प्रकार आप भी अपने परिवार को तीर्थंकर भगवन्तों की कहानियाँ सुनाना…आपके घरमें अवश्य ही धर्म का चमत्कार होगा।

भगवान ऋषभदेव आदि दस जीवों के पूर्व भवों का दिग्दर्शन

| | (१) ऋषभदेव | (२) श्रेयांस | (३) भरत | (४) बाहुबलि | (५) वृषभसेन | (६) अनंत-विजय | (७) महासेन | (८) श्रीषेण | (९) गुणसेन | (१०) जयसेन |

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| * | जयवर्मा | धनश्री | अतिगृद्ध राजा और नरक | प्रीतिवर्धन के सेनापति | प्रीतिराजा के मंत्री | प्रीतिराज के पुरोहित | - | - | - | - |

| १ | महाबल | निमीचिका | शार्दूल सिंह | भोगभूमि | भोगभूमि | भोगभूमि | - | - | - | - |

| २ | ललितांगदेव | स्वयंप्रभा | दिवाकर देव | प्रभाकर देव | कनकप्रभ देव | प्रभंजन देव | क्रोधी वैश्य | मानी राजा | मायावी वणिक् | लोभी इल्वल |

| ३ | वज्रजंघराजा | श्रीमती रानी | मतिवर मंत्री | सेनापति | पुरोहित | नगसेठ | सिंह | सूकर | बन्दर | नेवला |

| ४ | भोगभूमि आर्य | भोगभूमि आर्या | अहमिन्द्र | अहमिन्द्र | अहमिन्द्र | अहमिन्द्र | भोगभूमि | भोगभूमि | भोगभूमि | भोगभूमि |

| ५ | श्रीधर देव | स्वयंप्रभ देव | अहमिन्द्र | अहमिन्द्र | अहमिन्द्र | अहमिन्द्र | विश्रानन्द देव | मणिकुण्डल | मनोरम देव | मनोरम देव |

| ६ | सुविधि राजा | केवल पुत्र | अहमिन्द्र | अहमिन्द्र | अहमिन्द्र | अहमिन्द्र | वज्रदत्त राजा | वारेन राजा | विश्रानन्द राजा | शान्त दमन राजा |

| ७ | अच्युतेंद्र | अच्युतेंद्र | अहमिन्द्र | अहमिन्द्र | अहमिन्द्र | अहमिन्द्र | अच्युतदेव | अच्युतदेव | अच्युतदेव | अच्युतदेव |

| ८ | वज्रनाभि चक्री | धनदत्त | सुबाहु (भाई) | महाबाहु (भाई) | पीठ (भाई) | महापीठ (भाई) | जय (भाई) | विजय (भाई) | जयन्त (भाई) | अपराजित (भाई) |

| ९. | (नौवें भवमें यह दसों जीव सर्वार्थसिद्धि में देव थे।) | | | | | | | | | |

| १० | ऋषभदेव तीर्थंकर | श्रेयांस गणधर | भरत चक्री | बाहुबलि | वृषभसेन (पुत्र) गणधर | अनंत विजय (पुत्र) गणधर | महासेन (पुत्र) | श्रीषेण (पुत्र) | गुणसेन (पुत्र) गणधर | पुत्र जयसेन |

[यह दसों जीव उस भवमें मोक्ष को प्राप्त हुए।]

यह दसों जीव पूर्व भव में एकसाथ मुनिराज का धर्मोपदेश सुन रहे हैं, उनका भाववाही दर्शन करने के लिये देखिये पृष्ठ ६ तथा ८

२

भगवान अजितनाथ

अपने अनत चतुष्टय चक्र द्वारा जिन्होने राग-द्वेष-मोहरूप समस्त शत्रुओ को जीत लिया है परन्तु जो स्वय क्रोधादि किसी शत्रु द्वारा विजित नही होते - ऐसे भगवान अजितनाथ तीर्थंकर को नमस्कार हो ।

तीर्थंकर भगवन्तो का आत्मसाधनामय जीवनचरित्र पढते-सुनते हुए मुमुक्षु जीव को आत्मसाधना का उत्साह जागृत होता है और संसार-भोगो के प्रति वैराग्य-उदासीनता होती है। इस प्रकार पुराणपुरुषो की कथा मंगलरूप है। यह दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ का जीवन चरित्र है, उसमे प्रथम उनके पूर्वभव की कथा सुनो - इस जम्बूद्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र मे सीतानदी के किनारे पुण्डरीकिणी नगरी मे वर्तमान सीमंधर तीर्थंकर विराज रहे है। उसी नदी के दूसर किनारे सुसीमानगरी नामकी सुन्दर नगरी है। पूर्वकाल मे वहाँ विमलवाहन राजा राज्य करते थे। वे राजा महान प्रभावशाली, गुणवान धर्मात्मा थे। वे जैनधर्म के महान उपासक थे। व विमलवाहन ही अपने अजितनाथ तीर्थंकर का जीव है।

राजा विमलवाहन जानते थे कि संसार मे जीवो को धर्म की साधनापूर्वक सत्पुण्य का बंध होता है, पुण्य द्वारा अर्थप्राप्ति होती है और अर्थ द्वारा भोगसामग्री मिलती है। इस प्रकार अर्थ और भोगों का मूल कारण पुण्य है। - ऐसा समझकर वे धर्म की साधनापूर्वक शुभभाव मे वर्तते थे, लक्ष्मी में या भोगों मे आसक्त नही होते थे। वे जानते थे कि भोगासक्ति मे सुख नही है, सुख तो वीतराग धर्म द्वारा ही होता है। वे न्यायपूर्वक प्रजा का पालन करते थे। उनके राज्य में मांस-मदिरा का सेवनादि पाप प्रवृत्तियाँ नही थीं। ‘यथा राजा तथा प्रजा’ इस न्याय से प्रजाजन भी सदाचारी थे, जैनधर्म का पालन करते थे और सर्व प्रकार से सुखी थे, एक भावी तीर्थंकर जिनके राजा हों वे क्यों सुखी नहीं होंगे ?

भावी तीर्थंकर एवं आत्मज्ञानी ऐसे उन महाराजा विमलवाहन को श्रुतकेवली मुनिराज के दर्शन हुए; उनके उपदेश से वैराग्य जागृत होने पर विचार आया; और, इस संसार में मैं कब तक रहूँगा ? इन राजभोगों - में आत्मा का सुख कहाँ है ? मैंने जिसका अपूर्व रसास्वादन किया है ऐसे अपने चैतन्यसुख को मैं पूर्ण कब प्राप्त करूँगा ? उसकी प्राप्ति हेतु मुझे इन अव्रत के कषायों को छोड़कर पूर्णरत्नत्रय प्रगट करना योग्य है। इस शरीर में रहना तो आयुकर्म के आधीन है। आयु प्रतिक्षण घट ही रही है, उसकी समाप्ति से पूर्व यह राजमोह छोड़कर मुझे आत्मसाधना कर लेना योग्य है ऐसा विचार कर वैराग्यभावना पूर्वक वे महाराजा जिनदीक्षा लेकर रत्नत्रयधारी मुनि हुए, चारमे से तीन प्रकार के कषायों को नष्ट किया और बारम्बार आत्मध्यान में उपयोग लगाकर शुद्धोपयोग द्वारा उत्साहपूर्वक मोक्षमार्ग में प्रवर्तने लगे। यद्यपि वे स्वाधीन थे, विषयों से विरक्त थे, तथापि मोक्षलक्ष्मी की शोभा मे आसक्त होकर उसके आधीन हो गये, मोक्षलक्ष्मी मे चित्त लगाकर वे तीव्र तपस्या द्वारा विशुद्ध परिणामी होते गये और कर्मबंधन को तोड़ने लगे, उन्होंने चैतन्यभावना द्वारा बारह अंग का ज्ञान प्रगट किया और क्षायिक सम्यक्त्वसहित दर्शनविशुद्धि आदि सोलह भावनाओं द्वारा तीर्थंकर-नाम कर्म बाँधा। उनकी आत्मसाधना ऐसी उग्र कि अब बीच मे मात्र एक भव करके दूसरे भवमें परमात्मा बनना निश्चित् हो गया। उन इन्द्रिय विजयी विमलवाहन मुनिराजने उत्तम आराधनापूर्वक समाधिमरण किया और स्वर्गलोक मे सबसे उपर जो पाँच अनुत्तर विमान - जोकि सिद्धपुरी के एकदम निकट है - उनमे से विजय नामक विमान मे उत्पन्न हुए।

उस देवलोक मे उनकी आयु तेतीस सागर की थी; उनका शरीर भी शुक्ल लेश्यावान था और आत्मा भी शुक्ल लेश्यावान था, इसलिये द्रव्य से और भाव से दोनों प्रकार से वे उज्ज्वल थे। उनका शरीर अति रुपवान था, वे साढ़े सोलह मास मे एक बार श्वास लेते थे और तेतीस हजार वर्ष मे एक बार मात्र मानसिक अमृत का आहार ग्रहण करते थे, देवों को बाह्य भोजन या पानी रूप कोई आहार नही लेना पड़ता। लोकनाड़ी (असंख्यात योजन की त्रसनाड़ी) में स्थित समस्त रुपी पदार्थों को वे अवधिज्ञान द्वारा जान सकते थे, परन्तु उपयोग को बारम्बार जहाँ-तहाँ घुमाते नही थे, इसलिये बारम्बार अवधिज्ञान का प्रयोग नहीं करते थे…आत्मिक भावना में ही विशेषरूप से रहते थे, और अपने जैसे अन्य देवों के साथ धर्मचर्चा करते थे। उस विजय विमान में निवास करनेवाले समस्त देव आत्मज्ञानी एव सम्यग्दृष्टि थे; तथा पूर्वभव में मुनि होकर शुद्ध चारित्र का पालन करके आये थे, इसलिये उनको अत्यन्त वीतरागता थी। उस देवविमान में कोई भी देव अज्ञानी या मिथ्यादृष्टि नहीं थे, सब मोक्षगामी थे। विशाल मेरुपर्वत को भी खेल-खेल में उखाड़कर अन्यत्र रख दे ऐसी अद्भुत शक्ति उनमें थी, यद्यपि वे कभी ऐसा करते नहीं थे। पाँच इन्द्रियसम्बन्धी विषयभोगों का जो सुख है, उसकी अपेक्षा अनन्तगुना सुख वे विषयभोगों के बिना ही पुण्यप्रभाव से भोगते थे, और उन्हे चैतन्य के अनुभव का जो सुख था उसकी तो बात ही क्या ! वह तो सिद्धों की जाति का था।

अजितनाथ तीर्थंकर का जीव ऐसे सुखपूर्वक असंख्य वर्षों तक उस विजयविमान मे रहा…वहाँ भी वह जीव आराधना युक्त था और उसे निरन्तर तीर्थंकर-प्रकृति बँधती ती। उस महाभाग्यवान जीवकी आयु उस देवलोक में जब छह मास शेष रह गई और मनुष्यलोक में अवतरित होने की तैयारी हुई…तब क्या हुआ ? वह अब पढ़ेंगे।

[इति अजितनाथ तीर्थंकर पूर्वभव वर्णन]

अयोध्या नगरी - जिसका दूसरा नाम विनितानगरी और तीसरा नाम साकेत पुरी - यह बड़ी पवित्र नगरी है जहाँ पचास लाख-करोड़ सागरोपम पूर्व में भगवान ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर के रूप में अवतरित हुए थे; पश्चात् उन प्रभु के इक्ष्वाकुवंश में ही महाराजा जितशत्रु हुए; उनकी महारानी विजयसेना; उनकी कुक्षि में (ज्येष्ठ कृष्णा अमाबस्या को) द्वितीय तीर्थंकर अजितनाथ का आगमन हुआ। उस अवसर पर राजमहल के प्रांगण में पन्द्रह मास तक करोड़ो रत्नों की वर्षा हुई। विजया रानीने हाथी आदि मंगलस्वप्न देखे और महाराजा से बात करके उनका फल पूछा। आत्मज्ञानी महाराज जितशत्रु को अवधिज्ञान था; उसके द्वारा जानकर उन्होंने कहा कि - हे देवी ! इन सर्वोत्तम स्वप्नों का मंगल फल यह है कि सर्वोत्तम ऐसे तीर्थंकर का आत्मा तुम्हारे उदर में आया है; वह पुत्र मति-श्रुत-अवधि तीन ज्ञान साथ लाया है। यह बात जानते ही महारानी ने तथा समस्त नगर जनो को अपार हर्ष हुआ। देवलोक के देव-देवेन्द्र भी हर्षित होकर अयोध्या आये और प्रभुके माता-पिता को दैवी वस्त्राभूषणों की भेंट देकर सन्मान किया।

माघ शुक्ला दसवी के शुभदिन महारानी विजयामाता की कुक्षि से भरतक्षेत्र के दूसरे तीर्थंकर का अवतार हुआ। इन्द्र ने उनका जन्माभिषेक करके, ‘अजितनाथ’ ऐसे नाम द्वारा उनकी स्तुति की। उनकी आयु बहत्तर लाख पूर्व थी और शरीर ४०० धनुष ऊँचा था (१ धनुष बराबर ३ मीटर), लगभग ७१ लाख पूर्व तक उन्होंने राजभोग किया; परन्तु उन राजभोगो में सुख कहाँ था ? वे जानते ही थे कि यह इन्द्रिय-विषय मुझे कभी सुखी नहीं करेंगे अन्त मे तो इन्हें छोड़कर मोक्षपद की साधना करूँगा तभी मुझे पूर्ण सुख होगा।

वैराग्यवन्त महाराजा अजितनाथ एक बार राजमहल की छत पर बैठे-बैठे खिली हुई चाँदनी में प्रकृति की शोभा निहार रहे थे। इतने में आकाश से एक तेजस्वी तारा खर्रर्.. करता हुआ खिर गया…उसे देखकर वे संसार की क्षणभंगुरता का विचार करने लगे कि - अरे, इस संसार के भोगसंयोग और पुण्य सब अस्थिर है ! - ऐसा चिन्तवन करने से उनका चित्त संसार-भोगों से विरक्त हो गया। अहा, जिसका निकट में ही - शीघ्र मोक्ष होने वाला है ऐसे भव्यात्मा को संसार छोड़ने का कोई न कोई निमित्त बन ही जाता है। भगवान अजितनाथ महाराजा का चित्त संसार से विरक्त होते ही सारस्वत आदि अष्ट जाति के देवऋषि (ब्रह्मर्षि देव अर्थात् ब्रह्मलोकवासी लौकान्तिक देव) प्रभु के पास अयोध्यापुरी में आये और वन्दन करके कहने लगे - हे देव ! संसार छोड़कर चारित्रदशा अंगीकार करने के आपके विचार अति उत्तम हैं; आपके वैराग्य का हम अनुमोदन करते हैं। - इस प्रकार उन देवों ने स्वयंबुद्ध भगवान अजितनाथ के वैराग्य की महान प्रशंसा की।

वैरागी प्रभुने पूर्व में भोगे हुए राजभोगों को जूठन की भाँति छोड़ दिया, राग को आग समान जानकर उसे भी दूर किया और अपने आप दीक्षा धारण करके रत्नत्रयरूप मोक्षरथ में आरूढ़ हो गये। माघ शुक्ला नौंवी के दिन देवों ने प्रभु के दीक्षाकल्याणक का महोत्सव मनाया। दीक्षावन में गमन हेतु देव ‘सुप्रभा’ नामकी पालकी लेकर आ पहुँचे; यद्यपि उस ‘सुप्रभा’ की प्रभा दिव्य थी परन्तु प्रभु अजितनाथ उसमें आरूढ़ होते ही, उनकी अचिन्त्य ज्ञानप्रभा के समक्ष वह दिव्य प्रभावान सुप्रभा भी अप्रभा बन गई…चैतन्य प्रभा के समक्ष वह जड़ की प्रभा निष्प्रभ हो गई; तब पालकी लाने वाले देव भी लज्जित हो गये कि अरे, प्रभु की वीतरागी शोभा के समक्ष हमारे देवलोक के दिव्य वैभव भी निष्प्रभ हो आते हैं। प्रभु के साथ एक हजार राजाओं ने दीक्षा ले ली। स्वयं परमगुरु-परमात्मा होने के लिये अवतरित उन महात्मा को दूसरे किसी गुरु की आवश्यकता नहीं थी। सिद्धों को वन्दन करके प्रभु स्वयं दीक्षित हुए और शुद्धोपयोग में एकाग्र हो गये। उसी समय उन्हें सातवाँ गुणस्थान तथा मनःपर्यय ज्ञान प्रगट हुआ। तीन ज्ञान तो पूर्वभव से ही साथ लाये थे और चारित्र दशा में चौथा ज्ञान प्रगट हुआ साथ में अनेक महान लब्धियाँ भी प्रगट हुईं; परन्तु चैतन्य की ऋद्धि में निमग्न प्रभु को बाह्यऋद्धि का कोई लक्ष नहीं था। दूसरे दिन अजित मुनिराज ने वनसे विहार करके साकेतपुरी - अयोध्या में प्रवेश किया। प्रभु के प्रवेश से नगरजनों में आनन्द फैल गया, और धर्मात्मा - दानी पुरुषों का तो मानों ऐसे सुपात्र के योग से महाभाग्योदय हुआ। तीर्थंकर - मुनिराज को सर्वप्रथम आहारदान ब्रह्मा नामक धर्मात्मा महीपाल ने दिया…उसके सातिशय पुण्ययोग से तत्क्षण वहाँ देवों ने रत्नवृष्टि आदि पंचाश्चर्य प्रगट किये।

मुनिदशा मे रहकर प्रभुने बारह वर्ष तक आत्मसाधना की, शुद्धोपयोग द्वारा बारम्बार आत्मध्यान किया और पौष शुक्ला ११ के सायंकाल केवलज्ञान प्रगट करके वे सर्वज्ञ-अरिहंत परमात्मा हो गये। उसी समय तीर्थंकर प्रकृति के उदय का प्रारम्भ हुआ। इन्द्रों ने समवसरण की रचना की और दिव्यध्वनि द्वारा दूसरे तीर्थंकर का धर्मशासन स्थापित हुआ.. धर्मचक्र का प्रवर्तन हुआ। भगवान अजितनाथ तीर्थंकर की धर्मसभा में सिंहसेन आदि ९० गणधर थे, जो चार ज्ञानधारी-एव श्रुतकेवली थे। तदुपरान्त बीस हजार तो केवलज्ञानी अरिहंत भगवन्त समवसरण में प्रभु के साथ आकाश मे विराजते थे; एक लाख मुनि तथा तीन लाख बीस हजार आर्यिकाएँ थी। तीन लाख धर्मात्मा श्रावक एव पाँच लाख श्राविकाएँ थीं। सिंह, हाथी आदि लाखों तिर्यंच भी प्रभुकी वाणी सुनकर आत्मज्ञान को प्राप्त हुए थे और असंख्य देव प्रभु की सेवा करते थे। धर्मसभा में भगवान बंध-मोक्ष का स्वरूप समझाते थे। मिथ्यात्वादि मोहभाव जीव को बंध के कारण होने से दुःखरूप हैं, और सम्यक्त्वादि शुद्ध वीतराग भाव जीवको सुखरूप तथा मोक्ष के कारण हैं। इस प्रकार भगवान के उपदेश से बंध-मोक्ष सम्बन्धी सर्व भावों का स्पष्ट स्वरूप समझकर अनेक भव्य जीवों ने भेदज्ञान प्रगट किया और बंधरूप भावों को छोड़कर मोक्षके कारणरूप भाव प्रगट किये। चारों ओर वीतरागधर्म का वैभव छा गया। यद्यपि तीर्थंकर प्रकृति के महत् पुण्ययोग से समवसरण लक्ष्मी की शोभा अद्भुत-आश्चर्यजनक थी, परन्तु मोक्षलक्ष्मी के समक्ष वह भी लज्जित होकर निस्तेज हो जाती थी। सच ही है, चैतन्यलक्ष्मी के समक्ष जड़ लक्ष्मी की शोभा कहाँ तक टिकेगी ?

अनादिकाल से केवलज्ञानादि निजगुणों के घातक ऐसे मोहादि शत्रुओं का भी भगवान अजितनाथने नाश कर दिया था और निजगुण वैभव प्राप्त कर लिया था। यद्यपि अभी तीर्थंकर प्रकृति आदि अघातिकर्म विद्यमान थे, परन्तु उनमें अजित प्रभु को जीतने का सामर्थ्य नहीं था, अपितु वे प्रभुके आधीन वर्तते थे . वीतरागी प्रभु अजितनाथ सचमुच अद्वितीय विजेता थे। वे किन्हीं पापों द्वारा अथवा किसी मिथ्यावादी द्वारा नही जीते जा सके अरे, प्रभु की तो क्या बात ! - भक्तजन भी उन अजितप्रभु के अवलम्बन मात्र से पापों पर तथा मिथ्यात्व पर विजय प्राप्त करने लगे। प्रभुने लाखों - करोड़ों वर्ष तक भरतभूमि मे विहार करके दिव्यध्वनि का अमृत बरसाया और सर्वत्र धर्म का सुकाल प्रवर्तित किया। एक मास आयु शेष रही तब प्रभु सम्मेदाचल पर पधारे ..दिव्यध्वनिरूप वचनयोग थम गया और प्रभुने अघातिकर्मों की भी विशेष निर्जरा प्रारम्भ की।

अब प्रभु का आयुकर्म तो अन्तर्मुहूर्त मात्र ही शेष था, परन्तु दूसरे तीन कर्मों की स्थिति अधिक थी, इसलिये उन कर्मों की स्थिति को तोड़कर आयु जितनी ही कर देने के लिये, इच्छा के बिना भी प्रभुके आत्मप्रदेश विस्तरित होकर समस्त लोक मे फैल गये और निमेषमात्र से भी अल्पसमय में अतिरिक्त कर्मों को आत्मा मे से खिरा दिया। पश्चात् थोड़ी ही देर में सिद्धवर टूंक पर तीसरे और चौथे शुक्लध्यान द्वारा चैत्र शुक्ला पंचमी को सर्व कर्मों के क्षयपूर्वक सम्पूर्ण आत्मशुद्धि प्रगट करके सिद्धालय मे सिधारे। उन्हे नमस्कार हो।

अजितनाथ जिनराज की सिद्धवरकूट है जेह;
मन-वच-तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह।

पहले भव में जो विदेहक्षेत्र मे विमलवाहन राजा थे, पश्चात् मुनि होकर विजयविमान में अहमिन्द्र हुए और फिर भरतक्षेत्र मे दूसरे तीर्थंकर रूप से अवतार लेकर मोक्ष प्राप्त किया, उन भगवान अजितनाथ का जीवन-चरित्र यहाँ समाप्त हुआ।

द्वितीय चक्रवर्ती : सगर महाराज

इस भरतक्षेत्र मे प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव हुए; उनके पुत्र भरत प्रथम चक्रवर्ती हुए, तत्पश्चात् दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ हुए और उनके तीर्थ में ‘सगर’ नामक दूसरे चक्रवर्ती हुए। उनकी कथा “जैनधर्म की कहानियाँ” के तीसरे भाग मे छपी है, वह सक्षेप में इस प्रकार है:-वे सगर चक्रवर्ती पूर्वभव मे विदेहक्षेत्र मे जयसेन राजा थे। उन्होंने तथा उनके मित्रने दीक्षा ली और स्वर्ग मे गये। वहाँ भी दोनो देव मित्र थे और उन्होंने ऐसी प्रतिज्ञा ली कि जो पहले मनुष्य होगा उसे दूसरा देव प्रतिबाध प्राप्त करायेगा।

अब, पहले जयसेन का जीव स्वर्ग से अवतरित होकर अयोध्या में सगर चक्रवर्ती हुआ। उसके साठ हजार सुन्दर पुत्र थे और उनपर अतिस्नेह था।

एक बार उनके पुत्र कैलासगिरि गये थे; तब चक्रवर्ती को प्रतिबोध देने के लिये उनके मित्र-देवने एक युक्ति की; कैलासगिरि गये हुए उनके सब पुत्र साँप के काटने से मृत्यु को प्राप्त हुए हैं - ऐसा दृश्य बनाया। फिर राजा सगर के पास ब्राह्मण का रूप लेकर आया और अपने मृत पुत्र को जीवित करने की याचना करने लगा।

तब चक्रवर्ती ने कहा: हे भाई! जिसकी आयु पूर्ण हो गई हो उसे किसी प्रकार जीवित नहीं किया जा सकता; इसलिये तुम वैराग्य प्रगट करके आत्महित करो।

ब्राह्मण ने कहा : ठीक है महाराज ! आपकी बात सत्य है। अब मैं आपको एक गम्भीर समाचार सुनाता हूँ, उसे सुनकर आप भी वैराग्य प्रगट करके आत्महित की साधना में तत्पर होना। - ऐसा कहकर साठ हजार पुत्रों की मृत्यु के समाचार कहे।

उसे सुनते ही पहले तो सगर चक्रवर्ती मूर्च्छित हो गये; परन्तु मूर्च्छा टूटते ही उनका आत्मा एकदम जागृत हो उठा और वैराग्य भावना पूर्वक उन्होंने दीक्षा ले ली।

मित्र को प्रतिबोधने का कार्य पूर्ण होते ही वह देव अपने यथार्थ रुप में प्रगट हुआ और चक्रवर्ती को नमस्कार करके कहने लगा कि - हे महाराज ! आपके पुत्र वास्तव में मरे नहीं है; मात्र आपको वैराग्य प्राप्त कराने के लिये मैंने यह युक्ति की है। ऐसा कहकर उन पुत्रों को जीवित कर दिया।

यह बात जानकर वे सब राजपुत्र भी वैराग्य को प्राप्त हुए और जिनदीक्षा ग्रहण कर ली।

अन्त म, सगर चक्रवर्ती और उनके साठ हजार पुत्रों ने केवलज्ञान प्रगट करके मोक्ष प्राप्त किया . उन्हे नमस्कार हो ।

‘मित्र हों तो ऐसे हों…कि…जो धर्म की प्रेरणा दें।’ (संस्कृत-महापुराण सर्ग ४८ के आधार से)

३

भगवान संभवनाथ

[३]

जो भव-रहित होने पर भी ‘सं-भव’ हैं - ऐसे
तीसरे तीर्थंकर देव की सेवा हमें रत्नत्रय प्रदान करो !

अपने चरित्रनायक तीसरे तीर्थंकर संभवनाथ भी पूर्वभव मे भगवान अजितनाथ की भाँति विदेहक्षेत्र मे क्षेमपुरी नामक सुन्दर नगरी के राजा थे, उनका नाम भी विमलवाहन था। वे महाराजा विमलवाहन एक ही भव के पश्चात् मोक्ष प्राप्त करने वाले थे. .जिन्हें अति निकटकाल मे मोक्षदशा की प्राप्ति होना हो वह भव्य जीव विषय-कषायों मे क्यो आसक्त रहेगा ? राजा विमलवाहन को एक बार ससार से वैराग्य होने पर वे विचारने लगे कि - ★ अरे, ससार के प्राणी मृत्यु के मुख मे पड़े होने पर भी जीने की आशा रखते हैं। अनन्तकाल से जन्ममरण कर रहे है तथापि मोह के कारण उससे छूटने का उपाय नही करते।

★ आयु तो असख्य समय की ही है, तथापि जीव उसे शरणभूत मानता है.. आश्चर्य की बात तो यह है कि आयु भी प्रतिक्षण क्षीण होकर उसे मृत्यु की ओर धकेल रहा है।

★ कषायो की आकुलता से सतप्त वह जीव तिनको की छाया जैसे विषयभोगो के आश्रय से शान्ति लेने की चेष्टाएँ करता है जिस प्रकार तेज धूप मे खड़ा हुआ कोई मूर्ख मनुष्य आकाश मे उड़ते हुए पक्षी की छाया का आश्रय लेने की चेष्टा करता है.. तो उस जीव को कैसे आश्रय मिलेगा ? उसी प्रकार अज्ञानी जीव विषय भोगो के आश्रय से शान्ति लेने का प्रयत्न करते है, उन्हे कैसे शान्ति प्राप्त होगी ? भोगवृत्तिका त्याग करके अपने अतीन्द्रिय चैतन्यतत्त्व की शरण लेना ही शान्ति का उपाय है। वही अनन्त सुखका धाम है और सन्त पुरुष दिनरात उसीको ध्याकर परम पदकी साधना करते है।

-ऐसे वैराग्य चितनपूर्वक महाराजा विमलवाहन संसार को त्यागकर मुनिदीक्षा ग्रहण करने
को तत्पर हुए।

ठीक उसी समय उसनगरी में स्वयंप्रभ तीर्थंकर का आगमन हुआ। राजा विमल वाहन अति हर्षपूर्वक भगवान की वन्दना करने गये और वहीं दीक्षा लेकर उनके शिष्य बन गये। एक भावी तीर्थंकर वर्तमान तीर्थंकर के शिष्य हुए। श्री तीर्थंकरदेव के चरणों में रहकर उन्होंने बारह अंग का ज्ञान किया और क्षायिक सम्यक्त्व सहित दर्शनविशुद्धि आदि १६ उत्तम भावनाएँ भायीं; जिससे उन्हे तीनों लोकमें हर्षमय क्षोभ उत्पन्न करनेवाली ऐसी तीर्थंकर प्रकृति का बंध हुआ। परन्तु मुनिराज विमलवाहन तो उस कर्मचेतना से अलिप्त ज्ञानचेतना में ही तत्पर थे; ज्ञानचेतना द्वारा आत्मतत्व के आनन्दका उपभोग करते थे और कर्म को तथा राग को अपनी अनुभूतिसे बाहर रखते थे। इस प्रकार शुद्ध आराधनापूर्वक समाधिमरण करके वे स्वर्ग लोक में समस्त स्वर्गोंसे ऊपर प्रथम ग्रैवेयक में, दर्शन सहित सुदर्शन विमान मे उत्पन्न हुए। पुण्यप्रतापसे उनको अनेक आश्चर्यजनक महान ऋद्धियाँ प्राप्त थीं; परन्तु अपने आत्माकी अनन्त चैतन्यऋद्धि के समक्ष उस पुण्य ऋद्धि को वे तुच्छ मानते थे, इसलिये उसमें कहीं उनका चित्त नहीं लगता था…और चैतन्य की आराधना को वे क्षणमात्र भी भूलते नहीं थे।

इस प्रकार उन्होने आराधनापूर्वक असंख्य वर्ष (२३ सागरोपम) स्वर्गलोक में बिताये। स्वर्ग लोक का उनका सुख देवियों से रहित था…उसके द्वारा वे जगत से कहते थे कि -अरे जीवो ! विषयों में सुख नहीं है, विषयों से रहित सुख ही महान सुख है, वही सच्चा सुख है। स्वर्गलोक में १६ स्वर्गसे ऊपर के देवों को इन्द्राणी आदि देवियों का योग नहीं होता, तथापि वे अधिक सुखी हैं; विषयों से पार चैतन्य सुखका राजा विमलवाहन को अनुभव था…स्वर्ग लोक में ग्रैवेयक से लेकर सातवें नरक तक के असंख्य योजन क्षेत्र में आ- जा सकें ऐसी उनको विक्रियाऋद्धि थी, परन्तु आकुलता न होने से वे गमनागमन नहीं करते थे। उनका अवधिज्ञान भी बहुत विशाल था, परन्तु उसका भी प्रयोग वे कदाचित् ही करते थे। उनकी लेश्या शुक्ल थी, परिणाम उज्जवल थे। स्वर्गलोक के दूसरे अहमिन्द्र भी उन्हें देखकर प्रसन्न होते थे कि अहा, एक भावी तीर्थंकर यहाँ विराज रहे हैं - जोकि यहाँ से सीधे तीर्थंकर रुप में अवतार लेंगे। ऐसे अनेक तीर्थंकर एक साथ वहाँ विराजमान थे. .क्योंकि स्वर्गलोक में ऐसे असंख्य निकट-भव्य जीव हैं कि जो वहाँ से निकलकर सीधे तीर्थंकररुपसे अवतरित होंगे।

इस प्रकार अपने चरित्रनायक संभवनाथ-तीर्थंकर के जीवने स्वर्गलोक में दिव्य पुण्योदय के बीच असंख्य वर्ष बिताये…जब वहाँ की आयु के मात्र छह मास शेष रहे तब…

संभवनाथ : गर्भ-जन्म कल्याणक

भरतक्षेत्र की श्रावस्ती नगरी के राजमहल में अचानक दिव्य रत्नोंकी वर्षा होने लगी… नगर में आनन्दाश्चर्य छा गया। उस नगरी के महाराजा दृढराज और महारानी सुषेणा थीं। छह मास पश्चात् स्वर्ग की आयु पूर्ण होने पर उन अहमिन्द्र का जीव सुषेणा देवी की कुक्षि में अवतरित हुआ। उस समय महारानी ने उत्तम स्वप्न देखे और ऐरावत हाथी को मुखमें प्रवेश करते देखा। इन्द्रोंने आकर तीसरे तीर्थंकर के माता पिता का सन्मान किया, प्रशंसा की और देवलोक की दिव्य वस्तुएँ भेंट कीं। छप्पन कुमारिका देवियाँ आकर माता की सेवा करने लगीं। सवानौ महिने आनन्दपूर्वक बीत गये।

कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को तीर्थंकर संभवनाथ का जन्म हुआ और तीन लोक हर्ष विभोर हो गये। नरक के जीवों ने भी क्षणभर साताका अनुभव किया… और उससे आश्चर्य चकित होकर कितने ही जीवोंने तीर्थंकर-महिमा के चिंतन द्वारा सम्यग्दर्शन प्राप्त किया। समस्त स्वर्गलोक मंगलवाद्योंके आनन्दमय कोलाहल से गुंजायमान हो उठा और देवगण भरतक्षेत्र में तीसरे तीर्थंकर का जन्मोत्सव मनाने हेतु हर्षसहित श्रावस्ती नगरी में आये। मेरुपर्वतपर जन्माभिषेक के पश्चात् इन्द्रने स्तुति करते हुए कहा : हे सभवनाथ ! आपको अभी तीर्थंकर नामकर्मका उदय तो नहीं आया है, उससे पूर्व भी आपके जन्म से जीवों को इतना सुख मिल रहा है, तो फिर केवलज्ञान प्राप्त करके जब आप तीर्थंकर होगे और जगत् को मोक्ष का मार्ग बतलायेंगे- उस समय जीवों को जो महान सुख होगा उसकी तो बात ही क्या !! अहा, जिस प्रकार केवलज्ञान होनेसे पूर्व सम्यक्त्वका सुख भी अचिन्त्य होता है उसी प्रकार भाव-तीर्थंकर होनेसे पूर्व ‘बाल-तीर्थंकर’ रुपमे भी आप जगत को अचिंत्य सुखके कारण हो । प्रभो ! आपके गुणोंरुप आम्रवृक्ष से आकर्षित होकर हम देवलोक के देव भी आपकी सेवा करने यहाँ आये हैं। समस्त स्वर्गलोक आप के चरणों में नम्रीभूत होकर जगत को सूचित कर रहा है कि आप देवों के भी देव हैं, और देव सुखकी अपेक्षा मोक्षसुख महान है। प्रभो ! जिसप्रकार स्याद्वाद के दिव्य प्रतापके समक्ष एकान्तरुप मिथ्यामत टिक नहीं पाते, उसी- प्रकार आपके दिव्य प्रताप के समक्ष देवों का तेज भी निस्तेज हो जाता है ! जिस प्रकार चन्दन अपने साथ सुगन्ध लेकर उत्पन्न होता है, उसी प्रकार आप भी तीन ज्ञान सहित अवतरित हुए है। हे देव ! आप बिना कारण ही जीवों के हितैषी हैं। जगत् के जीवों के लिये आप महान भण्डार के समान सुखकारी है, आपका जन्म तीन लोक के जीवों को सुखका कारण है।

-इस प्रकार भक्तिपूर्वक स्तुति करके इन्द्रने प्रभुके सन्मुख आनन्द नाटक करके अपना परमहर्ष प्रगट किया। जन्मोत्सव मनाने के पश्चात् देवगण पुनः देवलोक मे चले गये. परन्तु कुछ देव रुक गये भगवान के निकट वे इतने प्रसन्न थे कि स्वर्ग लोक को भूलकर यहीं रह गये और बालकों का रुप धारण करके बालप्रभु के साथ खेलने लगे। अहा ! तीर्थंकर के साथ मिलना-जुलना-खेलना किसे अच्छा नहीं लगेगा ? और स्वर्ग के देव जिन के साथ खेलने के लिये आये उनके महापुण्य का क्या कहना ! अरे, पुण्य तो उन देवो के पास भी था, परन्तु प्रभु के सान्निध्य में सम्यक्त्व प्राप्ति हेतु वे प्रभु की सेवा मे रहने लगे थे।

दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ के मोक्षगमन पश्चात जब उनकी तीर्थंकर परम्परा में ३० लाख करोड़ सागर बीत गये तब तीसरे तीर्थंकर संभवनाथ हुए। (इस अतर मे उनकी आयुके ६० लाख पूर्व भी सम्मिलित समझना।) उनका चरणचिन्ह अश्व (घोडा) था।

बालतीर्थंकर धीरे-धीरे बडे होने लगे। मनुष्यलोक में रहनेपर भी उन्हे देवजनित सुख-वैभव प्राप्त थे। परन्तु उनका चैतन्य जनित सुख कही देवलोक से नहीं आता था, वह तो उनमे स्वयमेव था, अन्य किसी की अपेक्षा उसमे नही थी।

संभवनाथ : वैराग्य और दीक्षा

इस प्रकार महाराजा सभवनाथ को राज भोग मे आत्मज्ञान सहित ४४ लाख पूर्व बीत गये। एक दिन मार्गशीर्ष शुक्ला पूर्णिमा को वे राजमहल मे शान्तिपूर्वक बैठे प्रकृतिकी शोभाका अवलोकन करते हुए आत्म-महिमा का चिन्तन करते थे कि- इस विश्वकी शोभा को देखनेवाला-ज्ञाता मैं हूँ, मेरी चैतन्य शोभा अदभुत से भी अद्भुत है इतने में अचानक ही आकाशमें अद्भुत शोभायमान मेघरचना हुई जैसे किसी सुन्दर देवनगरी का निर्माण हुआ हो ! और देखते ही देखते वह दृश्य विलीन हो गया, मेघरचना बिखर गई ! उसे देखते ही महाराजा सभवनाथ को वैराग्य जागृत हुआ कि- अरे, इस ससार के भव -तन- भोग भी मेघरचना की भाँति क्षणभंगुर है!..और उससे उनका चित्त एकदम विरक्त हो गया। भव रहित संभवनाथ वैराग्य पूर्वक संसारके स्वरूप का विचार -चिंतन करने लगे-★ अरे इस जगत में दूसरा कोई यमराज नहीं है, इस शरीर में विद्यमान आयु ही यमराज है शरीर के भीतर रहकर वह प्रतिक्षण शरीर को ही नष्ट कर रहा है और जीव को देहरूपी पिंजरे में बन्द कर रखा है; तथापि मूर्ख जीव शरीर को अपना घर समझकर उसमे निवास कर रहे हैं।

★ अरे, मोही जीव जिन्हे सरस मानकर मित्र की भाँति जिनका सेवन करते है, वे इन्द्रविषय तो नीरस तथा जीवको भवदुःख देनेवाले शत्रु हैं!

★ आयु हो, इन्द्रियाँ हो और इष्ट पदार्थ हो, वहाँ भी यदि आत्मा विद्यमान हो तभी सुख की कल्पना होती है इन्द्रियादि समस्त पदार्थ होने पर भी यदि आत्मा विद्यमान न हो तो उसमें सुख की कल्पना भी नही होती। जब कि आत्मा का सुखतो सदा विद्यमान है,- उसे जानकर जीव क्यों उसका सेवन नहीं करते? यदि उसे जानकर उसका सेवन करें तो इन्द्रियविषयों से रहित सहज आत्मिक सुख उनके अनुभव में आ सकता है; वही सच्चा सुख है। लक्ष्मी, शरीरादिके सम्बन्ध से माना हुआ सुख वह सच्चा सुख नही है, वह तो कल्पना मात्र है और वह कल्पना भी क्षणभंगुर है, स्थायी नही रहती।

★ जो जीव आत्माको सम्यग्ज्ञान द्वारा ध्याते है, चैतन्यलक्ष्मी को जानते है तथा बाह्य क्षणभगुर लक्ष्मी का मोह छोडते हैं वे ही मोक्षसुख प्राप्त करते हैं।

-इस प्रकार सारभूत तत्त्वों के चिंतनपूर्वक महाराजा संभवनाथ राजभोगों से विरक्त हुए और पुत्रको राज्य सौंपकर जिनदीक्षा ग्रहण करने के लिये उद्यत हुए . उसी समय लौकांतिक देवों ने आकर उनकी स्तुति की और वैराग्य का अनुमोदन किया। अहा, स्वर्गलोक के ऋषिसमान महान देव जिनके वैराग्य की प्रशंसा करने मध्यलोक मे आये, उन तीर्थंकरों के परम वैराग्यमय दीक्षा-प्रसंग का क्या कहना!! उनके वैराग्य को देखकर श्रावस्ती नगरी के दूसरे हजारों नगरवासी भी चैतन्यसुखकी प्रतीति करके विषयों से विरक्त हुए और प्रभुके साथ वनगमन हेतु तत्पर हुए।

इन्द्र प्रभुके दीक्षाकल्याणक का उत्सव मनाने आये। ‘सिद्धार्थ’ नामक देव-शिविका मे आरूढ़ होकर सिद्धपदरुप अर्थ की सिद्धि हेतु वनगमन किया। एक हजार राजाओं सहित प्रभुने मार्गशीर्ष शुक्ला पूर्णिमा को जिन दीक्षा धारण की। उसी क्षण ध्यान में शुद्धोपयोग द्वारा सातवाँ गुणस्थान एवं चौथा ज्ञान प्रकट किया। दीक्षा के पश्चात् उन संभव-मुनिराज को सुरेन्द्रदत्त नामक धर्मात्मा श्रावक ने प्रथम आहारदान दिया। भगवान तीर्थंकर को प्रथम आहारदान देनेवाला भव्यात्मा अवश्य मोक्षगामी होता है; - ऐसे उत्तम सुपात्र तथा उत्तम दाता का सुयोग देखकर देवों ने भी रत्नवृष्टि आदि द्वारा अपना आनन्द व्यक्त किया। आकाश मे चारों ओर ‘अहो दान .अहो दान’ - ऐसे दैवी नाद सहित देवदुंदुभि बजने लगे।

भगवान संभवनाथ : केवलज्ञान

शुद्धरत्नत्रय के धारी भगवान संभवनाथ चौदह वर्ष तक मुनिदशा में मौनपूर्वक रहे। आत्मसाधना में पूर्ण लीनता ही उनका लक्ष्य था। इस प्रकार विहार करते-करते वे श्रावस्ती नगरी में अपने दीक्षावन में आये, और सर्व शक्ति को अंतर्मुख योग मे रोककर, शुक्लध्यान द्वारा ‘कार्तिक कृष्णा चतुर्थी’ के दिन केवलज्ञान प्रगट किया; पापरूप घातिकर्म सर्वथा नष्ट हुए, अनन्त चैतन्यवीर्य तथा स्वयंभू परम आनन्दरूप पूर्णसुख प्रगट हुआ। लोकालोक के समस्त पदार्थों को एकसाथ जाननेपर भी उनके अचिन्त्य ज्ञान में कोई थकावट या खेद नहीं था। देह में आँखें होने पर भी भगवान उन आँखों से नहीं देखते थे, वे तो केवलज्ञानरूप अनन्त चैतन्यचक्षु द्वारा समस्त लोकालोकको एकसाथ देखते थे…यही उनका इन्द्रियातीतपना था…और ऐसे महान अतीन्द्रियज्ञानसहित उनका सुख भी ऐसा ही अतीन्द्रिय था। समस्त मुनिवर भी उस अतीन्द्रिय ज्ञान एवं सुखकी भावना भाते थे और उसका अभिनन्दन करते थे।

प्रक्षीण घातिकर्म जो, अनन्त, उत्तमवीर्य, अति तेजमय। अतीन्द्रिय हुआ है सो ज्ञान-सौख्य रूप परिणमता।।

अहो, जिनदेव के उस ज्ञान की तथा सुखकी कोई अचिन्त्य महिमा है ! ‘अहो हि णाणस्स माहप्प’ सर्वोत्कृष्ट महिमा का वह स्थान है…मुनिवरों का वह मनोरथ है… अहा ! जिसका आदरपूर्वक स्वीकार करने पर भी सम्यग्दर्शन होकर भवका अंत आ जाता है-ऐसा केवलज्ञान प्रभुको प्रगट हुआ, और उनके तीर्थंकरत्व के महान प्रभाव से तीनो लोक प्रकाशित हो उठे…जगत को ज्ञात हुआ कि त्रिलोक-प्रकाशक चैतन्यसूर्य उदित हुआ है…! इन्द्रने आकर भगवान के केवलज्ञान की पूजा की…प्रभु अरिहंत हुए…परमात्मा हुए। साथ ही साथ दिव्य ध्वनि द्वारा रत्नत्रय-तीर्थका प्रवर्तन करके भरतक्षेत्र के तीसरे तीर्थंकर हुए। उन धर्मराजा की समवसरण रुपी धर्मसभा में चारुषेण आदि १०५ गणधर देव अचिन्त्य आत्मविभूति सहित शोभा देते थे। ऊपर गगन मे निरालम्बरुप से प्रभु के समकक्ष एकसाथ पन्द्रह हजार (१५०००) सर्वज्ञ भगवन्त अरिहंत पद पर विराजते थे। दो लाख मुनिवर तथा तीन लाख आर्यिकाएँ थीं। अद्भुत था वह धर्म मेला..और धन्य थे वे दर्शक ! वहीं लाखों की संख्या में सम्यग्दृष्टि श्रावक-श्राविकाएँ थीं। देवों का तो कोई पार नहीं था; तिर्यंचों के समूह भी वहाँ आकर धर्मश्रवण करते थे, सम्यक्त्व प्राप्त करते थे और व्रत भी धारण करते थे।

इस प्रकार धर्मामृत की वृष्टि करते हुए सभवनाथ तीर्थंकर भरतक्षेत्र के आर्य देशों में करोड़ों-अरबों वर्ष तक विचरे। जब मोक्ष पधारने में एक मास शेष रहा तब एक हजार मुनियोंसहित सम्मेदाचल पर पहुँचे और प्रतिमायोग धारण करके स्थिर हुए…विहार एवं वाणी थम गये, और चैत्र शुक्ल षष्ठी के सायंकाल सम्पूर्ण योगनिरोध करके धवलटंक से चार गति रहित तथा पंचमज्ञानसहित पंचमगति को प्राप्त हुए…सिद्धपद प्राप्त किया। अष्टकर्मरहित, अष्ट महागुणसहित अष्टमभूमि में (सिद्धशिला पर) शाश्वतरूप से विराजमान हुए .

संभवनाथ भगवान की धवलकूट वर जेह
मन-वच-तनकर पूजहूँ शिखरसम्मेद यजेह।

-इस प्रकार पूजनसहित इन्द्रों ने भगवान के मोक्षका महोत्सव मनाकर मोक्षपद की सर्वोत्कृष्टता जगत में प्रसिद्ध की। उन मोक्षपद प्राप्त भगवान संभव जिनको नमस्कार हो।

जो पूर्वभव में विदेहक्षेत्र में विमलवाहन राजा थे, पश्चात् अहमिन्द्र हुए और उस पदको भी छोड़कर भरतक्षेत्र में तीसरे तीर्थंकर हुए और अन्त में तीर्थंकर पद छोड़कर सिद्ध परमात्मा हुए। ऐसे भगवान संभवनाथ का मंगल चरित्र यहाँ पूर्ण हुआ…वह भव्य जीवों को भवसे छुड़ाकर मोक्षपद की प्राप्ति कराओं !

श्री जिनेन्द्र भगवान का धर्मचक्र आज भी चल रहा है।
अपने महाभाग्य से हम तीर्थंकर भगवन्तों के मार्ग में
आये हैं। अपने उन भगवन्तों का जीवनचरित्र पढ़कर हम
भी उनके मार्गपर चलेंगे और उन जैसे बनेंगे।

४

भगवान अभिनन्दन

जिन परमात्मा का सत्यउपदेश भव्य जीवों को उपकारी है,
उन चौथे तीर्थंकर श्री अभिनन्दननाथ को अभिनन्दन करके मैं
उनका मंगल-जीवन चरित्र कहता हूँ।

प्रथम तीन तीर्थंकरो की भाँति भगवान अभिनन्दन स्वामी भी पूर्वभव में, विदेहक्षेत्र में रत्नसंचयपुर नगर के महाराजा थे। उनका नाम महाबल।

राजा महाबल पुण्यवान एवं न्यायवान धर्मात्मा थे। संसार के अनेक भोगों तथा राजलक्ष्मी के बीच दीर्घकाल व्यतीत हो गया, तब उन निकट भव्य महात्मा को एक दिन सहजरूप से वैराग्य जागृत हुआ…उनका चित्त भोगोपभोग से विरक्त हो गया। अब इन संसार-भोगों से बस होओ…अब मैं मुनि होकर मोक्ष की साधना करूँगा। - ऐसी भावना से वन मे जाकर विमलवाहन भगवान के पास उन्होंने संयमदशा धारण की। मुनि होकर उन्होंने बारह अंग का ज्ञान किया, तथा दर्शनविशुद्धि आदि सोलह उत्तम भावनाएँ भायी; जिनके प्रताप से उन्हें पंचकल्याणक रूप फल देनेवाली तीर्थंकरप्रकृति का बंध हुआ। तीर्थंकर प्रकृति मानो शीघ्र केवलज्ञान प्राप्ति और मोक्षगमन का सन्देश देने आयी हो कि बस, अब यह महात्मा एक भव के पश्चात् तीर्थंकर परमात्मा होंगे और मोक्ष प्राप्त करेंगे।

मुनिराज महाबल उत्तम आराधनपूर्वक समाधिमरण करके विजय नामके अनुत्तर विमान में तेतीस सागर की आयु वाले अहमिन्द्र हुए। वहाँ उनको देवियों का सम्पर्क नही था तथापि वे दिव्य सुखका अनुभव करते थे। - इससे सिद्ध होता है कि बाह्यविषयों के बिना भी उत्तम सुख होता है, क्योंकि सुख जीव का अपना सहज स्वभाव है.. उस सुख के वेदन में बाह्य पदार्थों की अपेक्षा नहीं होती। वे अहमिन्द्र वैराग्यसम्पत्तिसहित थे, उनका चित्त शांत था और वे आत्मगुणों का चिंतन, सर्वज्ञपद का ध्यान तथा उसकी अद्भुत महिमा की चर्चा करते थे। कोई पापप्रवृत्ति उनके नहीं थी। देवलोक में अन्य अनेक अहमिन्द्र थे, वे सब पूर्वभव में मुनिदशा में शुद्धरत्नत्रय का रसास्वादन करके आये थे, इसलिये यहाँ भी उनका जीवन निर्दोष आराधनायुक्त था। वे अहमिन्द्र वहीं से सीधे तीर्थंकर पद के लिये अवतरित होनेवाले थे।

अभिनन्दन-अवतार

असंख्य वर्ष बीतने के पश्चात् उन अहमिन्द्र ने अयोध्यानगरी में महाराजा स्वयंवर के यहाँ महारानी सिद्धार्था की कुक्षि से तीर्थंकर रूप में अवतार लिया। वैशाख शुक्ला षष्ठी को उनका गर्भकल्याणक हुआ और माघ शुक्ला द्वादशी को जन्मकल्याणक मनाया गया। अयोध्यानगरीने तीसरी बार तीर्थंकर का जन्मोत्सव देखा। अयोध्यानगरी के अद्भुत वैभव का क्या कहना ! तीर्थंकर का अवतार होने से वह तीर्थंकर की जननी जैसे गौरव का अनुभव करती थी…धन्य अयोध्या…तू तो तीर्थंकरों को जन्म देनेवाली शाश्वत नगरी ! प्रभु के साथ तू भी पूज्य है।

इन्द्रोंने आकर अयोध्यानगरी में अभिनन्दन तीर्थंकर के जन्म का महान उत्सव किया। असंख्य देवों का राजा इन्द्र…महागंभीर, बालतीर्थंकर भगवान को देखकर उसकी भक्ति चरमसीमापर पहुँच गई…उससे रहा नहीं गया, एक हजार हाथ बनाकर वह भगवान के सम्मुख नृत्य करने लगा…उसके साथ शची इन्द्राणी तथा अन्य लाखों देव भी आनन्दविभोर होकर नाच उठे। बाल तीर्थंकर के प्रति इन्द्रकी ऐसी अद्भुत भक्ति देखकर, अपार जिनेन्द्र-महिमा के चिन्तन से अनेक जीव उसी समय सम्यक्त्वादि धर्म को प्राप्त हुए। सचमुच अचिन्त्य था प्रभुके कल्याणक का वह मंगल महोत्सव !! वह उत्सव, मात्र देवों या मनुष्यों को ही नहीं तिर्यंचों तथा नरक में भी अनेक नारकियों को कल्याण का कारण बना। अहो ! तीर्थंकरों का आश्चर्यजनक प्रभाव !!

संभवनाथ तीर्थंकर के मोक्षगमन के पश्चात् ९०,००००,०००००००० (दस लाख-करोड़) सागरोपम के पश्चात् अभिनन्दन तीर्थंकर हुए। जन्मसे ही वे सम्यग्दृष्टि एवं तीन ज्ञानयुक्त थे। ५० लाख पूर्व उनकी आयु थी। ३५० धनुष (३५०० फुट, लगभग ११०० मीटर) ऊँचा उनका शरीर था। ‘बन्दर’ उनका चरणचिह्न था। वे वैभव में तथा गुणों में वृद्धिंगत होने लगे। जब उनकी आयु का चौथा भाग - साढ़े बारह लाख पूर्व बीत गये तब महाराजा स्वयंवरने अयोध्या का राजसिंहासन सौंपकर जिनदीक्षा ग्रहण कर ली।

महाराजा अभिनन्दन की शोभा ऐसी लोकोत्तर थी कि चन्द्र उनकी कान्ति लेना चाहता था, सूर्य उनके तेज की तथा इन्द्र उनके वैभव की इच्छा रखता था। मुक्ति तो उनके साथ ही रहना चाहती थी। विशुद्ध परिणामों द्वारा शुभ अनुभागबन्ध की अनंतगुनी वृद्धि होने से समस्त पुण्यपरमाणु उन्हें फल देने के लिये मानो एक-दूसरे की स्पर्धा कर रहे थे। अहा, जन्म होते ही इन्द्र भी स्वर्गसे आकर जिनके चरणों की पूजा करे उन महात्मा के पुण्य का क्या कहना ! राज्यक्ष्मी की तो बात ही क्या, मोक्षलक्ष्मी भी सिद्धालय में उनका स्वागत करने को उत्सुक हो रही थी। अहा, जिनके पास क्षायिक सम्यग्दर्शन और तीर्थंकर प्रकृति जैसी सम्पत्ति हो वे महात्मा तीन लोक पर विजय प्राप्त करें उसमें क्या आश्चर्य है !! कुमारावस्था, राज्यावस्था अथवा संयमदशा सर्व अवस्थाओं में वे एकसमान धीर-गम्भीर और शूरवीर थे। उनका जीवन अति प्रशांत था। उनके राज्य में यद्यपि महान सेना थी, परन्तु वह मात्र शोभा के लिये ही थी, क्योंकि कोई शत्रु ही नहीं होने से युद्ध का प्रसंग ही नहीं आता था। शास्त्र तो उनकी जिह्वा में ही निवास करते थे, उनकी वाणी ही जिनवाणी थी। उनके गर्भ में आते ही इन्द्र का आसन काँपने लगा और देव उनकी सेवा करने आये वह ऐसा सूचित करता है कि रत्नत्रय का अधिकांश वे अपने साथ ही लाये थे। मोहशत्रु का सर्वथा नाश करने के लिये उनका चित्त सदा उत्साहित था। इस प्रकार संसार के एक श्रेष्ठ राजा के रूप में अयोध्यानगरी में महाराजा अभिनन्दन स्वामी ने लगभग ३७ लाख पूर्व तक भलीभाँति राज्य किया। उनके राज्य में सर्व प्रजाजन सन्तुष्ट थे और सुखपूर्वक धर्मसाधना में तत्पर थे।

एक बार माघ शुक्ला द्वादशी को अभिनन्दन महाराजा का जन्मदिन था; महाराजा राजमहल मे खड़े-खड़े प्रकृति की शोभा निहारते हुए आत्मा की सुन्दरता का विचार कर रहे थे। इतने में अचानक आकाश में रंगे-बिरंगे बादलों की अद्भुत रचना हुई अहा, यह कोई गन्धर्व देवों की नगरी है या इन्द्रपुरी !! आकाशमें उस आश्चर्यकारी सुन्दर नगरी की शोभा देखते ही भगवान-को पूर्व के अहमिन्द्र भव का जातिस्मरण ज्ञान हुआ कि- अरे, मै तो इससे भी महान दिव्य विभूतिका उपभोग पूर्व भव में कर चुका है अभी ऐसा सोच ही रहे थे कि आकाश की वह अद्भुत नगरी अदृश्य हो गई .बादलों के बिखर जानेसे उस नगरी की रचना भी छिन्नभिन्न हो गई . अरे, कहाँ गई वह अद्भुत् नगरी ! क्षणभर में वह दिव्यनगरी का दृश्य कहीं अदृश्य हो गया !-ऐसी क्षणभंगुरता देखते ही भगवान का चित्त ससार से विरक्त हो गया…क्षणभंगुर राजभोगों मे से उनकी आसक्ति उड़ गई। वे संसारकी अनित्यता के स्वरूप का चितवन करने लगे कि-इस देह के अनुकूल समस्त इष्ट विषय मुझे प्राप्त है, किन्तु वे सब क्षणभंगुर है; यह मनुष्य जीवन आयु के आधीन है। मृत्यु होनेपर यह सब सयोग छूट जायेंगे। आयु हो वहीं मरण है, आयु नहीं है वहाँ मरण भी नहीं है। आत्मा तो बिना आयुके शाश्वत जीवित रहनेवाला है और आत्मामें से आनेवाला सुख ही सच्चा सुख है। आकाश में निर्मित इन्द्रनगरी सदृश यह भोग-सामग्री अस्थिर है। जिस प्रकार बादलों से निर्मित सुन्दर नगरी कहीं रहने के काम नही आती, सी प्रकार सुन्दर दिखायी देनेवाले यह पचरंगी विषय जीव को सुखके लिये किसी कामके नही है; सुख तो वीतरागता मे ही है। राजभोगमें मेरी बहुत आयु बीत गई, उसे छोडकर अब मैं मुनिदीक्षा लूँगा और केवलज्ञान साधूँगा।

इस प्रकार प्रभुने वैराग्य आनेपर दीक्षा का निश्चय किया कि तुरन्त लौकान्तिक देव तथा इन्द्रादि देव वहाँ आये और तीर्थंकर प्रभुके दीक्षा कल्याणक का भव्य महोत्सव किया। ‘हस्तचित्रा’ नामकी देव शिबिका में बैठकर अपनी जन्म तिथि- माघ शुक्ला द्वादशी- को प्रभुने वन में सचरण किया और स्वयं दीक्षा धारण करके दिगम्बर मुनि हो गये। स्वयबुध्द होने से स्वयं ही अपने गुरु थे।

मुनि होते ही शुद्धोपयोगपूर्वक आत्मध्यान में एकाग्र हुए-अहा, मानो सिध्द भगवान ही बैठे हों ! ऐसी अद्भुत शान्ति थी। इतने मे एक खरगोश आया और प्रभुके चरणों में शान्ति से बैठ गया।एक सिंह आया वह भी प्रभुके चरणो में शान्ति से बैठ गया। खरगोश को सिंहका भय नहीं लगा, और न ही सिंह को खरगोश की हिंसाका भाव आया। सिंह और खरगोश दोनों अभिनन्दन मुनिराज की शान्त मुद्रा देखने में तल्लीन थे और उनकी सामीप्यसे उनमें भी शान्त भाव जागृत हो गये थे। धन्य तीर्थंकर योगिराज का आश्चर्यजनक प्रभाव !

महाराज अभिनन्दन के साथ दूसरे एक हजार राजाओंने दीक्षा ले ली। तीर्थंकर सहित हजारों मुनियों को एकसाथ देखकर अयोध्यानगरी धन्य हो गई ! उस काल धर्मयुग प्रवर्त रहा था; कितने ही अरिहंत भगवन्त इस भरतभूमि में विचरते थे। मुनिराज अभिनन्दन स्वामी को प्रथम आहारदान अयोध्या नगरी-के इन्द्रदत्त श्रावक ने दिया और परम मुनिभक्ति से उसने अपने भवबन्धन का उच्छेदन कर दिया।

केवलज्ञान और धर्मोपदेश

भगवान ने मुनिदशामें १८ वर्ष तक मौनपूर्वक विचरण किया; पश्चात् अयोध्याके जिस वनमें दीक्षा ली थी उसी दीक्षावनमें पधारे और ध्यानारुढ़ हो गये। पौष शुक्लाचतुर्दशी के सायंकाल प्रभुको केवलज्ञान प्रगट हुआ। चौथे तीर्थंकर के चौथे कल्याणकका भव्य महोत्सव मनाने हेतु चतुर्विध देव आ पहुँचे। समवसरण की दिव्य रचना हुई, बारह सभाओ मे लाखो जीव प्रभुकी वाणी सुनने को उत्सुक थे…और दिव्यध्वनि सुनते ही धर्मप्राप्ति द्वारा कृतकृत्य हुए।

भगवान ने धर्मोपदेश में कहा कि-हे जीवो ! सुख आत्माका स्वभाव है; जिस प्रकार ज्ञान आत्मा का स्वभाव है उसी प्रकार सुख भी आत्मा का स्वभाव है। जिस प्रकार ज्ञान बाहरसे नही आता। उसी प्रकार सुख भी बाहर से नही आता। तथा जिसप्रकार क्रोधादि कषाय आत्माका स्वभाव नही है, उनमे शान्ति नही है, उसी प्रकार दुःख भी आत्मा का स्वभाव नही है। कषाये अथवा इन्द्रियविषय आत्माको कदापि सुख नही दे सकते, वे तो जीव को संसार परिभ्रमण कराके दुःखी करते है। इसलिये इन्द्रियों तथा कषायों से भिन्न ज्ञान-आनन्दमय आत्माके वैभव को जानो.. हमारे जैसा ही परमात्मवैभव तुममें विद्यमान है, उसमें अन्तर्मुखता करके उसमे अनुभव द्वारा परमात्मपना प्रगट करो।

परमात्मपना दरशानेवाली ऐसी परमात्मवाणी सुनकर अनेक जीवों ने तत्क्षण अन्तर्मुख होकर अपना आत्मवैभव अपने में देख लिया; कोई सम्यग्दृष्टि हुए, कोई श्रावक हुए, कोई मुनि हुए, कोई गणधर हुए और अनेक जीवों ने केवलज्ञान प्राप्त किया। अपार धर्म वैभव से समवसरण शोभायमान हो उठा।

अभिनन्दन तीर्थंकर की धर्मसभा में वज्रनाभि आदि १०३ गणधर विराजते थे…लाखों मुनि-आर्यिकाएँ थीं; अहा ! एकसाथ १६००० (सोलह हजार) तो केवली भगवन्त वहाँ आकाश में विराजते थे…मानो मोक्षपुरी ही वहाँ उतर आयी थी ! अद्भुत था वह मोक्ष दरबार ! उसमें ससार का प्रवेश नहीं था, वहाँ तो मोक्ष की साधना का ही महोत्सव था…और मुमुक्षुओंके वृन्द आ-आकर मोक्षमार्ग में प्रवेश करते थे। चतुर्विध सघ मोक्षपुरी में जा रहा था।

उस मोक्षपुरी संघके नायक भगवान अभिनन्दन स्वामीने धर्मकी वर्षा करते करते लाखों-करोड़ों वर्ष तक, अनिच्छा से भी भरत क्षेत्र में विहार किया। उन्हें भले ही विहार की इच्छा न हो परन्तु भव्य जीवों के परम भाग्योदयसे अरिहंत प्रभुके श्री विहार का तथा दिव्य ध्वनिरुप उपदेश-महान लाभ जगत को प्राप्त होता है। भरतक्षेत्र के भव्यजीवों को धर्म प्राप्त कराने के पश्चात् अभिनन्दन परमात्मा सम्मेदाचल पर पधारे। वहाँ एक मास तक स्थिर रहे, वाणी का योग रुक गया, और अन्त मे शुक्लध्यान द्वारा सर्व प्रकार से योगनिरोध करके, चौदहवें गुणस्थान में शेष अघाति कर्मोंका भी क्षय करके आनन्द-टोंक से वैशाख शुक्ला षष्ठी के प्रातःकाल प्रभु सिद्धालय में सिधारे..

अभिनन्दन जिनराज का आनन्दकूट है जेह,
मन-वच-तन- कर पूज हूँ शिखर सम्मेद यजेह,

प्रभुके मोक्षगमन से आनन्दित होकर इन्द्रादि देवोंने तथा मनुष्योंने मोक्षकल्याणक का उत्सव किया…सिद्ध भगवन्तों की परमभक्तिपूर्वक उन्होंने ऐसा सूचित किया कि हमें भी ऐसा मोक्षपद इष्ट है। धर्मात्माओंके हृदयमें सिद्धपदकी महिमा उत्कीर्ण हो गई है… अहो, वह सिद्धपद कि जिसमें शरीर तथा इन्द्रियों के बिना ही महान सुख है, वह इन्द्रियगम्य नहीं है; आत्माके अतीन्द्रिय स्वसंवेदन पूर्वक ही वह सिद्धपद प्रतीतिमें आता है, और इस प्रकार प्रतीति करके धर्मी जीव सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र द्वारा उस सिद्धपदकी साधना करते हैं।

उन भगवान अभिनन्दन परमात्माको नमस्कार हो, जो कि सिद्धालयमें विराजमान हैं, तथा हम जैसे साधक जीवों के अंतर में भी विराजते हैं।

जो पहले विदेहक्षेत्रमें रत्नसंचयपुर नगर के महाराजा महाबल थे, पश्चात् रत्नत्रयके संचयपूर्वक मुनि होकर अहमिन्द्र हुए और पश्चात् ऋषभदेवके वंश में अयोध्या नगरी में अभिनन्दन तीर्थंकर के रूपमें अवतार लेकर तीन लोक द्वारा अभिनन्दनीय ऐसे सर्वज्ञ परमात्मा हुए, उन भगवन्त अभिनन्दन स्वामी का आनन्दकारी जीवन चरित्र यहाँ समाप्त हुआ-- वह भव्य जीवों को आनन्ददायक हो।

हे तीर्थंकर भगवन्तो ! हम आपकी इतनी अधिक स्तुतिभक्ति तथा आदर-बहुमान करते हैं, तो क्या आप हमें कुछ नहीं देंगे ?

हे भव्यो ! हमसे कुछ लेने की आशा रखकर दीन रहनेकी अपेक्षा तुम स्वयं हम जैसे बन जाओ न ! हमारे जितनी ही आत्मविभूति तुम्हारे पास है - ऐसा हम कहते हैं, उसे स्वीकार करके हमारे परिवार में सम्मिलित हो जाओ…और हमें जैसे बन जाओ !

'आह प्रभो ! हम आपके परिवार के ?..तीर्थंकरों के परिवार में आकर हम धन्य हो गये। पारसमणि तो लोहे को मात्र सोना बनाता है, पारस नहीं बनाता; जबकि हे देव ! आपने तो हमें अपने समान परमात्मा बना लिया।

५

भगवान सुमतिनाथ

[५]

जन्म अयोध्यापुरी 卐 मोक्ष सम्मेद शिखर 卐

भगवान सुमतिनाथ

अब भगवान सुमतिनाथ का जीवन चरित्र सम्यक् मतिपूर्वक सुनो। जो भगवान सुमतिनाथ के अनेकान्तमय सम्यक्-मत को ही सच्चा मत मानते हैं वे भव्य जीव सुमति पाकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। ऐसे भगवान सुमतिनाथ का मंगल जीवन चरित्र अब कहते हैं।

इस जम्बूद्वीप के पश्चात् दूसरा धातकी खण्ड द्वीप है; उसमें दो मेरुपर्वत हैं - एक पूर्व में और दूसरा पश्चिम में; उन दोनों मेरु पर्वतों के दोनों ओर विदेहक्षेत्र हैं। उनमें पूर्व मेरु के पूर्वविदेह में सीतानदी के किनारे पुष्कलावती देश और पुण्डरीकिणी नगरी है। इस जम्बूद्वीप में जैसी सीमंधरस्वामी की पुण्डरीकिणी नगरी अद्भुत शोभायमान है वैसी ही अद्भुत वह पुण्डरीकिणी नगरी धातकी खण्ड में सुशोभित है। भरतक्षेत्र के अनेक तीर्थंकर जिस प्रकार पूर्वभव में जम्बूद्वीप के विदेहक्षेत्र से आये हैं, उसी प्रकार धातकी खण्ड के विदेह से भी आये हैं। जिस प्रकार जम्बूद्वीप की पुण्डरीकिणी नगरी में सीमंधर महाराजा राज्य करते थे, उसी प्रकार धातकी खण्ड की पुण्डरीकिणी नगरी में महाराजा रतिषेण राज्य करते थे। यह महाराजा रतिषेण ही अपने सुमतिनाथ तीर्थंकर का जीव।

महाराजा रतिषेण न्यायवान्, सदाचारी और धर्मात्मा थे, अरिहंतदेव के परमभक्त थे और आत्मतत्त्व के ज्ञाता थे। प्रजा भी सदाचारी होने से क्लेशरहित थी, और सुखपूर्वक जैनधर्म की उपासना करती थी। उनके राज्य में किसी को मृत्युदण्ड आदि दण्ड नहीं देना पड़ते थे, क्योंकि दण्ड देना पड़े ऐसे पापकार्यों में कोई प्रवर्त्तता नहीं था। भगवान अरिहंतदेवकी ही वे देव मानते थे, इसलिये समग्र देशमें अरिहंत परमात्मा के सिवा और किसी के मन्दिर नहीं थे; अनेकान्तमय एक जैनमार्ग ही वहां चलता था। वहाँ के पुण्यवान जीव धन का उपार्जन करना, उसकी रक्षा करना, उसमें वृद्धि करना और योग्य कार्यों में लगाना - यह सब अच्छी तरह जानते थे, इसलिये अनीति रीति (चोरी आदि) से धनोपार्जन नहीं करता था। मांस-मदिरा या पाप के व्यसन किसी को नहीं थे, व्यसन था तो शास्त्रस्वाध्याय का और धर्मात्मा के सत्संग का ही व्यसन था, उसके बिना वे रह नहीं सकते थे। अनेक केवली भगवन्त तथा लाखो वीतरागी मुनिवर उस देश में विचरते थे और धर्मोपदेश द्वारा जीवों का कल्याण करते थे। आत्मज्ञानी राजारतिषेण वीतरागी देव-गुरु की सेवा में सदा तत्पर रहते थे और शास्त्रके अभ्यासी थे, योग्य संयमपूर्वक वैराग्यमय जीवन जीते थे। श्रावक-मुनियों का आदर-भक्ति पूर्वक आहारादि दान देते थे। इस प्रकार धर्मात्मा श्रावक को शोभा दे ऐसा उत्तम उनका जीवन था…एक भव पश्चात् जो तीर्थंकर होकर मोक्ष जानेवाले हैं उनके उत्तम जीवन का क्या कहना !!

ऐसे महाराजा रतिषेणने अनेक वर्षों तक पुण्डरीकिणी नगरी में राज्य किया। एक दिन उनकी नगरी में अर्हतनन्दन जिनेन्द्र का आगमन हुआ। परमभक्ति से राजा रतिषेणने वंदन-पूजन करके उनका धर्मोपदेश सुना और उनका चित्त संसार से विरक्त हो गया। मोक्षमार्ग में वेगपूर्वक चलने के लिये वे विचारने लगे - कि अरे, अनेक दुर्जन्म तथा दुर्मरणरूपी सर्पों से भरे हुए इस संसार में रहकर जीव सुख कैसे प्राप्त कर सकता है ? इन्द्रियविषयरूप अर्थ या कामभोग से सुख नहीं मिलता, उससे तो संसार-दुःख की वृद्धि होती है। गृहस्थधर्म में यद्यपि पुण्य है, परन्तु वह भी अनेक प्रकार के आरम्भ समारम्भ से भरा है, इसलिये उससे भी जीवको उत्तम सुख प्राप्त नहीं होता, पापरहित ऐसा मुनिधर्म ही मात्र इस जीवको उत्तम सुखकी प्राप्ति कराता है; इसलिये अब मुझे मुनिधर्म की उपासना करना ही योग्य है।

इस प्रकार उत्तम फल देनेवाले वैराग्यचिन्तनपूर्वक धर्मात्मा रतिषेण राजाने राजपाट आदि समस्त परिग्रह का भार उतारकर अर्हतनन्दन-जिनेन्द्र के चरणों में दीक्षा अंगीकार की। देह का भी ममत्व छोड़कर उन्होंने अपना उपयोग आत्मध्यान में एकाग्र किया; उन्हें बारह अंग का ज्ञान प्रगट हुआ और क्षायिक सम्यक्त्वसहित दर्शनविशुद्धयादि सोलह उत्तम भावनाओं द्वारा तीर्थंकर-प्रकृति का बंध किया। वह कर्म बाँधने की उन्हें कोई इच्छा नहीं थी, परन्तु राग के योगसे वह कर्मबंधन हुआ। तीर्थंकर होनेवाले महात्मा को ऐसा योग सहज ही बन जाता है। सम्यक्त्वसहित उत्तम चारित्र का वे निर्दोष पालन करते थे। उनमें विद्यमान शुद्धरत्नत्रयके अतिरिक्त विनयसम्पन्नता, सिद्धभक्ति, बारम्बार आत्मसन्मुख उपयोग-आदि महान पवित्र गुणों द्वारा आकर्षित होकर मोक्षलक्ष्मी भी उनके पास आने को आतुर हो रही थी; …और वे भी मोक्षलक्ष्मी को प्राप्त करने के लिये आतुर थे। इससे अखण्ड आराधनापूर्वक समाधिमरण द्वारा एक भव अल्प करके वे वैजयन्त-विमान में अहमिन्द्र हुए - यद्यपि वहाँ उन अहमिन्द्र को दिव्य सुख थे, तथापि प्रभुका चित्त तो मोक्षसुख में ही लगा था, इसलिये अहमिन्द्र पर्याय के असंख्यात वर्षों को शीघ्रता से पूर्ण करके वे अपनी आत्मसाधना पूर्ण करने के लिये अन्तिम मनुष्यपर्याय में आने को तैयार हुए।

उनके मनुष्य अवतार की तैयारी होने से पुण्य भी उनसे पहले मनुष्य लोकमें पहुँच गये। प्रभु हमें छोड़कर चले जायेंगे तो ? - ऐसे भयसे वे पुण्यकर्म रत्नवृष्टि आदि रूप में प्रभुके आने से पहले ही मनुष्यलोक में आ गये ..अहा ! जड़ को भी प्रभुके साथ रहना अच्छा लगता है; तब चेतनवन्त जीवों की तो बात ही क्या !!

अयोध्या में सुमतिनाथ अवतार

उस काल अयोध्यानगरी में भगवान ऋषभदेव के वंशज महाराजा मेघरथ राज्य करते थे। उनकी महारानी का नाम मंगलावती। उनके आँगन में छह मास से प्रतिदिन दिव्य रत्नों की वृष्टि होती थी।

महान आनन्द की सूचक वह रत्नवृष्टि देखकर लोग आश्चर्यचकित होते थे। छहमास पश्चात् श्रावण शुक्ला दूज को महादेवी मंगलाने सोलह उत्तम स्वप्न देखे; उसी समय तीर्थंकर सुमतिनाथ का जीव देवलोक से उनकी कुक्षि में अवतरित हुआ। त्रिकाल मंगल ऐसे तीर्थंकर आत्मा के स्पर्श से माता मंगला सचमुच मंगल हो गई; उनका मोक्षगामीपना निश्चित हो गया, वे धन्य हुई। इन्द्रानीने भी उनकी स्तुति करके सन्मान किया।

‘माता दरशन तेरा रे जगत को आनंद देनारा’

चैत्र शुक्ला एकादशी को अयोध्यापुरी में तीर्थंकर का अवतार हुआ। मात्र अयोध्या ही नहीं तीनों लोक आनन्द से क्षोभित हो उठे। इन्द्रोंने आकर प्रभुका जन्मकल्याणक महोत्सव मनाया। इन्द्रने तो कितने ही तीर्थंकरों के जन्मोत्सव मनाये थे तथापि हर बार उसे नवीनता लगती थी और भक्ति के अद्भुत भाव उल्लसित होते थे। इस प्रकार इन्द्रने अद्भुत उल्लाससे भगवान सुमतिनाथ तीर्थंकर का जन्मोत्सव मनाया जिसे देखकर जिनेन्द्र की अचिन्त्य महिमा द्वारा अनेक जीव सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए।

चौथे तीर्थंकर के पश्चात् नौ लाख-करोड़ सागरोपम के अंतर से पाँचवें सुमतिनाथ तीर्थंकर हुए। चालीस लाख पूर्व उनकी आयु थी। चकवा (पक्षी) उनका चिह्न था। बाल्यकाल में उनके लिये सर्व सामग्री स्वर्गलोक से आती थी। इन्द्र द्वारा अभिषेक किया जाने से तीन लोक में उनकी श्रेष्ठता सिद्ध हुई। सुमतिकुमार पाँच-छह वर्ष के हुए तब उन्हें एकना-बाराखड़ी सीखने के लिये किसी का शिष्य नहीं बनना पड़ा था, तीन ज्ञान के धारी वे स्वयं तीन जगत के गुरु थे; उन स्वयंबुद्ध महात्मा का दूसरा कोई गुरु नहीं था। (तीर्थंकर बचपन में भी किसी दूसरे शिक्षक से शिक्षण नहीं लेते, स्वयंबुद्ध हैं।) उनकी प्रसन्न मुद्रा तथा प्रशान्त दृष्टि ही दर्शकों को ऐसा संतुष्ट कर देती थी कि उनके पास आये हुए याचक अन्य कुछ माँगना भूल जाते थे…जिस प्रकार समवसरण में पहुँचकर रत्नत्रयमुग्ध हुआ जीव संसार की किसी वस्तु की आकांक्षा नहीं करता, उसी प्रकार प्रभुसन्मुख आये हुए जीव प्रभुकी शांत मुद्रा देखते ही संसार को भूल जाते थे। भगवान को समस्त इष्ट विषय प्राप्त थे - बाह्य में पुण्यजनित समस्त इष्टविषय थे, और अन्तर में परमेष्ट ऐसा निज-परमात्मवैभव प्राप्त था। ‘अहा, हमारे भीतर एक तीर्थंकर का आत्मा विराजमान है’ ऐसे अद्भुत गौरव से उनके सर्वांग सुशोभित हो रहे थे। तथा त्रिलोक को प्रकाशित करनेवाली दिव्यध्वनि जिस मुखसे खिरनेवाली है उस मुखकी शोभा का क्या कहना ! स्वर्ग से सारभूत उत्तम वस्तुएँ इन्द्र उन बालतीर्थंकर को पहुँचाता था - अरे, संसार में उत्तम कही जानेवाली उन वस्तुओं की, प्रभु की महिमा के आगे क्या बिसात !! उनका स्थान तो प्रभु के चरणों में ही है। -ऐसा मानकर इन्द्र वे वस्तुएँ बालतीर्थंकर के चरणों में रख देता था। उनकी जिह्वामें सरस्वती का वास था। उन छोटे से प्रभुके मुखसे निकलती वाणी सुनकर सब मुग्ध हो जाते थे; क्योंकि उसमें परमात्मा के नाद की ध्वनि थी। मोक्षलक्ष्मी और पुण्यलक्ष्मी यह दोनों महाविभूतियाँ एक साथ उन सुमतिकुमार में विद्यमान थीं। जगत में जितने सुन्दर परमाणु थे उन सबको रहने के लिये जगत में कोई उत्तम स्थान नहीं मिलने से वे परमाणु श्रेष्ठ ऐसे प्रभुके शरीर में आकार बस गये थे, और उत्तम गुण उनके आत्मा में आकर निवास करने लगे थे। ‘तीन लोक हमारी सेवा करते हैं’ -ऐसे गौरव से प्रभु के चरण अत्यन्त चमकदार होकर शोभा दे रहे थे। उनके उत्तम हाथों की दसों उँगलियाँ अपनी शोभा द्वारा मानो उत्तम क्षमादि दस धर्मों को प्रगट कर रही थीं। प्रभु की शोभा का कितना वर्णन करें ! बाल्यावस्था में ही उनके रुप-गुण अद्भुत थे, तो फिर युवावस्था के रुप का क्या कहना !! उनके जीवन में कभी हिंसा, झूठ, चोरी आदि पाप नहीं थे…फिर उनकी आर्त या रौद्र कोई अशुभ ध्यान तो कहाँ से होंगे ? उनका जीवन प्रशस्त भावनाओं से भरपूर था। हाँ, उनके रूप पर मुग्ध होकर यौवन दशा के साथ कामदेव भी चोर की भांति उनके अंतर में प्रविष्ट हो गया था, उसके कारण राजकुमार सुमतिनाथ अनेक रानियों के साथ भोग-विलास करते थे। उनको कभी अनिष्ट-संयोग या इष्ट-वियोग नहीं होता था; कभी वेदना या चिन्ता नहीं होती थी, लौकिक तथा आत्मिक सर्वसुख उन्हें प्राप्त थे। इस प्रकार महाराजा सुमतिनाथ ने आयु का अधिकांश सुखपूर्वक राजभोग में व्यतीत किया।

एक बार चैत्र शुक्ला एकादशी को महाराजा सुमतिनाथ के जन्मोत्सव का दिवस था; चारों ओर हर्ष छा रहा था; अद्भुत श्रृंगार से सुसज्जित अयोध्यापुरी की शोभा को प्रभु देख रहे थे; उस काल ज्ञान विचारदशा में स्थिर होने से उन्हें अपने पूर्वभव का ज्ञान हुआ। जातिस्मरण में उन्होंने देखा कि अरे, पूर्वभव में मैं अनुत्तर विमान में देव था, वहाँ का वैभव तो इसकी अपेक्षा अद्भुत एवं आश्चर्यकारी था; किन्तु उसका भी अन्तमें तो वियोग ही हुआ, तो इस क्षणभंगुर वैभव की क्या बिसात ! -इस प्रकार जातिस्मरण होने से प्रभु का चित्त संसार से एकदम विरक्त हो गया.. यद्यपि उनका आत्मा संसार से विरक्त तो था ही, परन्तु अब शीघ्र चारित्रदशा प्रगट करके सम्पूर्ण वीतरागता और केवलज्ञान प्राप्त करने को वे उद्यमी हुए। जो बुद्धिरहित हों वे भले ही अहितकारी विषयों में मग्न रहें, किन्तु मैं तो तीन ज्ञानका धारी तथा इसी भव में ही मोक्षगामी मैं उन अहितकारी विषयों में क्यों लीन रहूँ ? आज ही मैं उन्हें छोड़कर जिनदीक्षा धारण करूँगा और आत्मा में स्थिर होऊँगा।

‘प्राप्ति करूँगा साध्य की, जिससे कि शिवप्राप्ति बने।’

इस प्रकार मनमें चारित्रदशा अंगीकार करने का निश्चय करके प्रभु वैराग्य भावना भाते थे; इतने में लौकान्तिक देवों ने आकर उनकी स्तुति की : अहो देव ! मुक्तिसुन्दरी आपकी प्रतीक्षा कर रही है, वह आपसे मिलने को उत्सुक है इसलिये इस जिनदीक्षारूप दूती को आपके पास भेजा है। प्रभो ! आपका वैराग्यचिन्तन उत्तम है ..प्रशंसनीय है। इस प्रकार प्रभुके वैराग्य का अनुमोदन करके वे देव गये कि तुरन्त ही इन्द्रादि देव प्रभुके दीक्षाकल्याणक का महोत्सव मनाने हेतु आ पहुँचे और ‘अभया’ नामक देव-शिविका में विराजमान करके प्रभुको दीक्षावन में ले गये। वहाँ एक हजार राजाओं सहित प्रभुने स्वयं मुनिदीक्षा धारण की; उसी समय सिद्धों को वंदन करके आत्मध्यान में स्थिर होने पर शुद्धोपयोग, मनःपर्यय ज्ञान तथा आकाशगामित्व आदि अनेक महान ऋद्धियाँ प्रगट हुई। मुनिराज सुमतिनाथ का संयम ऐसा उत्कृष्ट था कि उन्हें कोई अतिचार नहीं लगते थे, इसलिये प्रायश्चित की भी आवश्यकता नहीं रहती थी। उनकी ध्यान-तप की प्रधानता थी, उनके सर्व पाप शान्त हो गये थे और वे मौनरूप से आत्मसाधना करते थे। मुनिदशा में उन्हें सर्व प्रथम आहारदान सौमनसनगरी के पद्मराजाने दिया; उस समय देवोंने भी रत्नवृष्टि द्वारा अपना हर्ष व्यक्त करके उनका सन्मान किया।

मुनिराज सुमतिनाथने बीस वर्षतक आत्मध्यान का प्रयोग किया। अन्त में, अयोध्याके जिस वनमें और जिस दिन दीक्षा ली थी उसी वनमें और उसी दिन (चैत्र शुक्ला एकादशी को) ध्यानमें अप्रतिहत शुद्धोपयोग द्वारा केवलज्ञान प्रगट किया , जो उनके अवतार का दिन था और जो दीक्षा का दिवस था उसी दिन केवलज्ञान अवतरित हुआ; प्रभु छद्मस्थ मिटकर सर्वज्ञ हुए। अंतरात्मा से परमात्मा बने, साधु परमेष्ठी से अरिहंत परमेष्ठी हो गये। उसी समय तीर्थंकर प्रकृति के उदय से दिव्य समवसरण की रचना हुई और देव-देवेन्द्रोंने उनके केवलज्ञान की- अर्हन्तपदकी पूजा की। उनकी धर्मसभा में अमर आदि ११६ गणधर विराजते थे। सर्व तीर्थंकरों में उनकी गणधर संख्या सर्वाधिक थी। तथा उनके जैसे ही केवलज्ञान के धारी तेरह हजार (१३०००) अरिहंत भगवान एक साथ समवशरण में विराजते थे और उनकी अद्भुत शोभा में अभिवृद्धि करते थे। अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी द्वादशांगधारी तथा ऋद्धिधारी मुनिवर कुल तीन लाख और बीस हजार थे। तथा तीन लाख तीस हजार आर्यिकाएं और तीन लाख श्रावक एवं पाँच लाख श्राविकाएं संयमपूर्वक धर्म साधना करते थे। ऐसे महान धर्मवैभव सहित उन पंचम तीर्थंकर भगवान ने भरत क्षेत्रमें प्रत्येक देशमें मंगल विहार किया और जीवों में सुमति का सिंचन करके ‘सुमति-नाथ’ बने…स्वयं तो पहलेसे सुमतिनाथ थे ही, दिव्यध्वनि द्वारा सम्यक्मति प्राप्त कराके अनेक सुमतिवंत जीवों के भी नाथ बने। भरत क्षेत्र के भव्य जीवों ने उनकी सेवा से सुमति प्राप्त करके भव का अन्त किया। सर्व भाषाओंका जिसमें समावेश है ऐसी दिव्यध्वनी द्वारा भव्यजीवोंके अंतर में उन्होंने धर्म के जो बीज बोये वे तत्काल वृद्धिगत होकर रत्नत्रयरूपी महान फल देने लगे। लाखों-करोड़ों वर्ष तक भगवान सुमतिनाथने अनेकान्तमय सुमति का उपदेश देकर अनेक जीवोंका कल्याण किया… अनेक जीव सम्यग्ज्ञानरूप सुमति को पाकर मोक्ष मार्ग में लग गये।

जब एक मास आयु शेष रही तब प्रभुकी वाणी तथा विहार रुक गये। सम्मेद शिखर की अविचल टोंक पर आकर वे स्थिर हुए… और चैत्र शुक्ला एकादशी के दिन योगनिरोध करके प्रभुने निर्वाणपद प्राप्त किया। प्रभुके जन्म, दीक्षा, ज्ञान और मोक्ष यह चारों कल्याणक एकही तिथी को हुए। इन्द्रों ने प्रभुके मोक्ष का मंगल महोत्सव मनाया।

सुमतिनाथ जिनराज का अविचल कूट है जेह
मन-वच-तन कर पूज हूँ, शिखर सम्मेद अजेह।

पूर्वभव में जो विदेह की पुण्डरगिणी नगरी के राजा रतिषेण थे, पश्चात् मुनि होकर अहमिन्द्र हुए और अन्त में अनन्तलक्ष्मी के धारक तीर्थंकर होकर मोक्ष प्राप्त किया उन भगवान सुमतिनाथ को जो ध्यायेगा, वह भव्यजीव सम्यक् मति को प्राप्त करके मोक्ष को साधेगा।

[इति पंचमतीर्थंकर सुमतिनाथ चरित्र समाप्त]

६

भगवान पद्मप्रभ

[६]

जन्म कौशाम्बी नगरी 卐 मोक्ष सम्मेद शिखर 卐 पद्म में रहनेवाली लक्ष्मी तो चंचल और नाशवान है, जबकि पद्म-चिह्न वाले भगवान पद्मप्रभजिनके आश्रय में रहनेवाली कैवल्यलक्ष्मी तो स्थिर-शाश्वत है; ऐसी शाश्वत लक्ष्मी को प्राप्त करने हेतु हे भव्य जीवो ! तुम पद्मप्रभदेव का आश्रय करो।

धातकी खण्ड के पूर्व विदेह मे सीतानदी के दक्षिण किनारे वत्स देश में सुन्दर सुसीमानगरी है; वहाँ सदा तीर्थंकर प्रभु विचरते है और वह अनेक तीर्थंकरो को उत्पन्न करनेवाली है। अपने चरित्रनायक भगवान पद्मप्रभ-तीर्थंकर भी पूर्वभव मे उस सुसीमा नगरी के महाराजा थे; उनका नाम था अपराजित। वे वास्तव मे अ-पराजित थे, क्योंकि न तो बाह्य में किसी शत्रु द्वारा पराजित होते थे और न ही अतर में मोह द्वारा पराजित होते थे। महान आत्म पराक्रम द्वारा मोह शत्रु पर भी वे विजय प्राप्त कर रहे थे। वे राजा इतने सदाचारी एव सत्यनिष्ठ थे कि उनके प्रताप से वर्षा भी कृषकों की इच्छानुसार होती थी; इच्छित मेह बरसने से कभी अकाल नही पड़ता था। वर्ष के प्रारम्भ में, मध्य में और अन्त मे - तीनों मौसम की फसले बराबर होती थीं। उनकी दानमे उदारता के कारण प्रजा में कोई दरिद्र नही मिलता था। सब वैभवसम्पन्न थे। वैभवसम्पन्न होने पर भी राजा या प्रजा कोई कुमार्गगमन नहीं करते थे और न किसी को कोई दुर्व्यसन था। वैभव की वृद्धि के साथ उनको सदाचार की भी वृद्धि होती थी। वे अनेक भवों के उपार्जित पुण्यकर्म के फल को भोग रहे थे, तथापि उनके मात्र कर्मफल चेतना नहीं थी, साथ ही कर्मरहित ज्ञानचेतना भी थी - जोकि मोक्षको साध रही थी और कर्म से अलिप्त रहती थी।

वह ज्ञानचेतना अनन्त चैतन्यवैभव को ही अपना सच्चा वैभव मानती थी और उसमे से प्राप्त होने वाले अतीन्द्रिय आनन्द को भोगती थी। ज्ञानचेतनावंत वे महाराजा अपराजित सदा विचारते थे कि -इन्द्रियसुख तो शरीर द्वारा भोगे जाते हैं और क्षणभंगुर हैं। शरीर के वियोग से इन्द्रियविषयों का भी वियोग हो जाता है - तो ऐसे इन्द्रियविषयों के भरोसे क्यों रहना ? - इस प्रकार उनका चित्त विषयों से सदा विरक्त और अतीन्द्रिय आत्मसाधना में तत्पर रहता था।

महाराजा अपराजित एकबार विशेष वैराग्यचिंतन करते थे, ठीक उसी समय उनकी नगरी में पिहितास्रव जिनराज का आगमन हुआ। जिन्होंने आस्रवों को सर्वथा पेल डाला है - ऐसे उन जिनेन्द्र भगवान के चरणकमल में जाकर अपराजित महाराजा ने सकल संसार का संग छोड़ा और मुनिदीक्षा अंगीकार की। मुनि होकर वे रत्नत्रयसहित तीव्र आत्मसाधना करने लगे; उन्हें द्वादशांग ज्ञान प्रगट हुआ, इतना ही नहीं, दर्शनविशुद्धयादि भावनाओं द्वारा तीर्थंकर प्रकृति का बंध भी हुआ…निश्चित् हो गया कि अब एक भवके पश्चात् वे तीर्थंकर होंगे और मोक्ष प्राप्त करेंगे।

मुनिराज अपराजित चतुर्विध आराधनापूर्वक संल्लेखन धारण करके उत्तम ग्रैवेयक के प्रीतिंकर विमान में अहमिन्द्ररूप से अवतरित हुए। उस विमान की रमणीयता अद्भुत होने के साथ ही उसमे एक भावी तीर्थंकर का आगमन होने से उसकी शोभा और बढ़ गई। उस विमान में निवास करनेवाले अनेक जीव मोक्षगामी थे और उनमें भी अनेक एकावतारी जीव तो भावी तीर्थंकर थे…जो वहाँ से सीधे तीर्थंकर के रूपमें अवतरित होनेवाले थे। ऐसी सुन्दर उस देवनगरी में अपने चरित्रनायक पद्मप्रभतीर्थंकर का आत्मा असंख्य वर्षों तक रहा; उनकी आयु इकतीस सागर थी। वे ४६५ दिन में एक बार श्वास लेते थे, आहार तो बिलकुल करते ही नहीं थे, क्योंकि तीव्र पुण्योदय के कारण उनको क्षुधा या तृषा की कोई वेदना ही नहीं थी; मात्र मानसिक अमृत के आहार से ही वे तृप्त हो जाते थे। उनके अवधिज्ञान का तथा विक्रिया का विस्तार सातवें नरक तक था। ऐसे दिव्य देवलोक मे जब उनकी आयु छहमास शेष रह गई और मध्य लोक में तीर्थंकर रुप से अवतार लेने की तैयारी हुई तब जहाँ वे अवतरित होनेवाले थे उस नगरी में रत्नों की वर्षा होने लगी…कौन थी वह धन्य नगरी !! चलो, उसे देखने चलें।

कौशाम्बी नगरी में तीर्थंकर का अवतार

यह है अपने भरतक्षेत्र की कौशाम्बी नगरी, जहाँ महावीर मुनिराज पधारे थे और राजकुमारी चन्दनबाला ने उन्हें आहारदान दिया था। उस कौशाम्बी नगरी में असंख्य वर्षों पूर्व इक्ष्वाकुवंशी धरण-महाराजा राज्य करते थे, उनकी महारानी थीं, सुसीमादेवी; वे रूप-गुण में तो महान थीं, तदुपरान्त एक तीर्थंकर की माता बनने का महान सौभाग्य उन्हें प्राप्त हुआ। भगवान पद्मप्रभ का जीव अहमिन्द्र पर्याय छोड़कर माघ कृष्णा षष्ठी के दिन उनके उदर में अवतरित हुआ. .रत्नकुक्षिधारिणी माताने उनके गर्भागमनसूचक सोलह मंगलस्वप्न देखे…एकसाथ ऐसे सोलह मंगलस्वप्न मात्र तीर्थंकर की माता ही देखती है। तत्पश्चात् सवानौ मास बीत गये और कार्तिकी शुक्ला त्रयोदशी के शुभदिन माता सुसीमा देवी ने जगत्पूज्य तीर्थंकर को पुत्र रुप में जन्म दिया और स्वयं जगत्पूज्य माता बनीं। इन्द्र-इन्द्राणी ने ठाटबाट से आकर प्रभुके जन्म कल्याणक का महान उत्सव 'किया, उनके सन्मुख आनन्दपूर्वक नृत्य किया और साथ ही भगवान के माता-पिता का भी सन्मान किया - तथा बालतीर्थंकर को ‘पद्मप्रभ’ नाम से सम्बोधन करके स्तुति की। पाँचवें तीर्थंकर सुमतिनाथ के मोक्षगमन के नव्वे हजार-करोड़ सागरोपम के अंतर से छठवें तीर्थंकर पद्मप्रभ हुए। (यह अंतर हर जगह दोनों तीर्थंकरों के मोक्षगमन के बीच का समझना।) उनकी आयु तीस लाख पूर्व थी, उनका चरणचिह्न ‘कमल’ था।

पुत्रजन्म तो कौशाम्बी राजमहल में हुआ, परन्तु उसका हर्ष तीनों लोक में छा गया। बालतीर्थंकर की सेवा में रही दिक्कुमारि देवियाँ प्रभुके साथ चर्चा-विनोद भी करती थीं और बालप्रभु के मधुरवचनों से निकलती तत्त्वज्ञान द्वारा आत्मज्ञान भी प्राप्त कर लेती थीं। माता सुसीमा तो बालक पद्मकुमार की चेष्टायें देख-देखकर अनुपम तृप्ति का अनुभव करती थीं। अहा, एक बालतीर्थंकर जिसकी गोदमें लोटते हों उनके परमहर्षका क्या कहना! माता कहती बेटा, तू भले जगत का नाथ है, परन्तु मेरा लाड़ला पुत्र है। तेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देने का मुझे अधिकार है! बेटा! तू छोटा है परन्तु तेरी चेष्टायें स्वानुभूति से भरी हुई महागम्भीर हैं! देवियाँ कहती थीं - अहो, माता! आप तो मोक्षगामी तीर्थंकर की माता हो…आप भी अवश्य मोक्षगामी हो। - इस प्रकार बालक पद्मप्रभ सबको आनन्दित करते हुए वृद्धिंगत हो रहे थे।

कुमार पद्मप्रभने युवावस्था में प्रवेश किया…उनका रूप कामदेवसे भी सुन्दर था, इसलिये कामदेव अपना शरीर छोड़कर उनके शरीर में आकर रहने लगा था। संसार में तो सामान्यतः स्त्री पुरुष का रूप देखना चाहती है, और पुरुष स्त्री का रूप देखने की इच्छा रखती है, परन्तु कुमार पद्मप्रभ कारूप ऐसा अद्भुत मनोहर था कि स्त्री-पुरुष सब उसे देखने की इच्छा करते थे… उसे देखकर तृप्ति का अनुभव करते थे। जिन्हें संसार में कहीं सन्तोष न मिला हो ऐसे जीव भी बालतीर्थंकर के दर्शन से परमसन्तोष का अनुभव करते थे। संसार के समस्त पुण्य उन प्रभुको प्राप्त थे। उनके युवा होते ही, बिना इच्छा के वंशपरम्परा से उन्हें कौशाम्बी का राज्य प्राप्त हुआ। साढ़े सात लाख पूर्व की आयु में कुमार पद्मप्रभ का राज्याभिषेक हुआ तब समस्त प्रजाजनों को इतना हर्ष हुआ मानो उन्हें स्वयं को राज्य मिल गया हो! उनके राज्य में धन तथा धर्म दोनों की वृद्धि होती थी; कोई नया दानी नगर में आकर पूछे कि किसे किस वस्तु की इच्छा या आवश्यकता है? तो सब लोग उत्तर देते कि यहाँ किसी को किसी वस्तु की इच्छा नहीं है। हाँ, इच्छा एक ही है - मात्र मोक्ष साधने की! - परन्तु वह मोक्ष कहीं दान में थोड़े ही मिलता है! वह तो ‘स्वयंभू’ भीतर से - आत्मा में से ही प्रगट होता है. वह किसी अन्य से माँगा नहीं जाता।

महाराजा पद्मप्रभ के राज्य में एकदम जागृति आ गई। गृहस्थ दशा में रहे हुए उस ‘तीर्थंकर-द्रव्य’ के दर्शन से भी भव्य जीवों में अनुपम धर्म जागृति आती थी; कौशाम्बी नगरी एक तीर्थरूप थी, क्योंकि वहाँ साक्षात् तीर्थंकररूप आत्मा विराज रहे थे। प्रतिदिन देश-विदेश से कितने ही मुमुक्षु जीव वहाँ उस जीवन्त-तीर्थ के दर्शन करने आते थे ..और प्रभु के दर्शन करके महान तीर्थयात्रा का आनन्द प्राप्त करते थे।

भगवान पद्मप्रभ - वैराग्य और दीक्षा

इस प्रकार महाराज पद्मप्रभ को राज्य करते हुए दीर्घ काल बीत गया। जब एक लाख पूर्व जितनी आयु शेष रही तब एक वैराग्यप्रेरक घटना हुई।

पद्मप्रभ महाराज एक बार राजमहल में बैठे थे…महल के प्रांगण में एक भव्य विशालकाय अतिसुन्दर हाथी था .हजारों हाथियों में वह पट्टहस्ती था, महाराज उस पर सवारी करते थे और उन्हें वह अत्यन्त प्रिय था। अचानक उस हाथी को कुछ हो गया…उसका शरीर शिथिल हो गया, उसने खाना-पिना छोड़ दिया…आँखें बन्द करके लेट गया और उसका प्राणान्त हो गया। हाथी की अचानक मृत्यु हो जाने से महाराज को आश्चर्य हुआ, जीवन की क्षणभंगुरता देखकर वे वैराग्यचिंतन में डूब गये; उन्होंने अवधिज्ञान से हाथी के पूर्वभवों को जाना, और जातिस्मरण से अपने पूर्वभवों का भी ज्ञान हुआ। तुरन्त ही उनका चित्त संसार से विरक्त हो गया। महा पुरुषों के जीवन में कोई छोटी सी घटना भी महान वैराग्य का निमित्त बन जाती है। महाराज पद्मप्रभ तत्त्वज्ञानी तो थे ही, वे सुखमय आत्मा का तथा दुःखमय संसार का स्वरूप जानते थे इसलिये-

अशुचिता विपरीतता को आस्रवों का जानकर,
अरु जानकर कारण दुःखों का, प्रभुने छोड़ा उन्हें।

भेदज्ञानी भगवान संसार से विरक्त होकर विचारने लगे कि - अरे, इस ससार में इन्द्रियविषयरूप ऐसा कोई पदार्थ नहीं जिसे मैंने पूर्वकाल में देखा न हो…जिसका मैंने स्पर्श नहीं किया हो…जिसे सूँघा न हो, जिसे सुना न हो और जिसे खाया न हो ! समस्त इन्द्रियविषयों को जीव पूर्वकाल मे अनन्तबार भोग चुका है…इसलिये भोगे हुए-उच्छिष्ट पदार्थों को ही वह पुनः पुनः भोग रहा है। अरेरे ! इच्छा के समुद्र में पड़े हुए इस जीव का उद्धार कैसे हो ?-जब रत्नत्रय-नौका में बैठकर वह केवलज्ञान प्राप्त करे और उसके उपयोग में विश्व के समस्त पदार्थों का एकसाथ ग्रहण हो-तभी उसकी इच्छाएँ शांत होंगी…और तभी वह दूषित इन्द्रिय-विषयों से छूटकर पूर्ण वीतराग सुखको प्राप्त करेगा। इसलिये अब शीघ्र ही केवलज्ञान का उद्यम मेरा कर्तव्य है।

वैरागी प्रभु विचारते है कि-यह शरीर तो रोग और मृत्यु का घर है; जीव प्रत्यक्ष देखता है कि रोगरूपी सर्प द्वारा इष्ट जन मरण को प्राप्त होते हैं; तथापि वह अविनाशी आत्मा विनाशीक शरीरमें क्यो मोहित हो रहा है ? वह एक आश्चर्य है। क्या आज तक किसी जीवने शरीर के साथ सदा सहवास किया है ?-नहीं, तो फिर शरीर का मोह तोड़कर अशरीरी सिद्धपद मे शाश्वत निवास करना ही कर्तव्य है।

जो हिंसादि पापों मे धर्म मानते है और पाप के हेतुरूप ऐसे इन्द्रियविषयों मे जो सुखकी कल्पना करते है-ऐसे विपरीतदर्शी मूर्ख जीवों को ही यह ससार रुचिकर प्रतीत होता है; सुदृष्टिवन्त बुद्धिमान जीव तो उसे. असार जानकर चैतन्यसुख को ही साधते हैं। जिस कार्य से (जिन शुद्ध भावों से) पाप और पुण्य दोनों प्रकार के कर्मलेप का नाश हो उसीकी धर्मात्मा जीव निरतर उपासना करते हैं।

इस प्रकार भवरूप ससार, शरीर और विषयभोग (भव-तन-भोग) तीनों का अनित्य-अशरण-असाररूप चिन्तवन करके प्रभु उनसे सर्वथा विरक्त हो गये और जिनदीक्षा हेतु तत्पर हुए। उसी समय लौकान्तिक देवों ने आकर स्तुतिपूर्वक प्रभुके वैराग्य का अनुमोदन किया-

भव-भोग-तन वैराग्य धार निहार शिव तप तपत हैं,
तिहुं जगतनाथ अराध साधु सु पूजनीक गुण जपत हैं।

इन्द्रादि देव भी प्रभुके दीक्षा-कल्याणक का उत्सव करने आ पहुँचे। ससार से निवृत्त हुए प्रभु ‘निवृत्ति’ नामक देव-शिविका मे आरूढ़ होकर ‘मनोहर’ दीक्षावन मे पहुँचे। जिस तिथि को जन्म हुआ था, उसी तिथि (कार्तिक शुक्ला त्रयोदशी) को दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा लेकर प्रभु आत्मध्यान मे लीन हो गये।

परिवर्जता हूँ ममत को, निर्ममत मैं स्थिति करूँ,
अवलम्ब ले निज आत्म का, अवशेष सबको परिहरूँ।

प्रभु का वैराग्य देखकर भव्य जीव मुग्ध हुए और अनेक जीवों ने प्रभु के साथ महाव्रत या अणुव्रत धारण किये। वन के तिर्यंच भी प्रभुकी शांत-वीतराग मुद्रा देखकर मुग्ध हो गये। सिंह और खरगोश, सर्प और मोर-सब प्राणी शातिसे चित्त लगाकर प्रभुकी शरण मे बैठकर आत्महित करने लगे।

मुनियो मे श्रेष्ठ ऐसे पद्मप्रभ स्वामी को तुरन्त ही मनःपर्ययज्ञान तथा अनेक लब्धियाँ प्रगट हुई; शुद्धरत्नत्रयधारी उन तीर्थंकर - मुनिराज - को सर्व. प्रथम आहारदान वर्धमान नगरी के सोमदत्त राजाने दिया और उस उत्तमदान के प्रभाव से पंचाश्चर्यरूप महान सन्मान प्राप्त किया। भगवान को मुनिदशा मे यद्यपि शुभ-आस्रवरूप पुण्यसचय होता था, परन्तु उत्तम गुप्ति-समिति - क्षमादि धर्म - वैराग्य चितन-परिषहजय तथा आत्मध्यानादि तपके द्वारा उन्हे अति विशेष कर्मों की निर्जरा होती थी, - कर्मों का व्यय अत्याधिक था और आय अत्यल्प थी .इसलिये वह अतिशीघ्रता से मोक्षको साध रहे थे।

ऐसी उग्र आत्मसाधना सहित वे मुनिदशा में छद्मस्थरूप से मात्र छह मास तक रहे; छह महीने के पश्चात् क्षपक श्रेणी द्वारा चारों घाति कर्मों का सर्वथा क्षय करके, चैत्रशुक्ला पूर्णिमा के दिन पूर्ण ज्ञान प्रगट करके प्रभु सर्वज्ञ परमात्मा हुए .अरिहत हुए, तीर्थंकर हुए। इन्द्रों तथा नरेन्द्रोंने प्रभुके केवलज्ञान की पूजा की। प्रभुके समवसरण में चामरसेन आदि एक सौ दस गणधर थे; एक साथ बारह हजार सर्वज्ञ परमात्माओं का मंगल मेला वहाँ लगा था। लाखो मुनि-आर्यिकाएँ तथा लाखों श्रावक-श्राविकाएँ वहाँ मोक्ष की साधना कर रहे थे। ओर, लाखो की सख्या मे तिर्यंच जीव भी वहाँ धर्मसाधनों द्वारा जीवन को धन्य बनाकर मोक्षमार्ग में चल रहे थे। इस प्रकार तीर्थंकर पद्मप्रभ भगवान ने धर्मोपदेश द्वारा अनेक भव्य जीवों को मोक्षमार्ग में लगाया। करोड़ों-अरबों वर्ष तक भरतक्षेत्र में मंगलविहार करके सर्वत्र धर्मचक्र प्रवर्तन किया। अन्त में सम्मेदशिखर की मोहन टोंकपर पधारकर, मोहरहित वे भगवान फाल्गुन कृष्णा चतुर्थी के दिन सर्व कर्मों से मुक्त होकर सिद्धपद को प्राप्त हुए और तत्क्षण ही लोकाग्र में विराज गये।

निर्वाण है वह सिद्ध है, अरु सिद्ध वह निर्वाण है, सब कर्म से प्रविमुक्त आत्मा, लोक-अग्र सु जाय है।

पद्मप्रभ जिनराज की मोहनकूट है जेह,
मन-वच-तन- कर पूज हूँ शिखर सम्मेद यजेह।

प्रभुके मोक्षकल्याणक द्वारा इन्द्रोंने भी सिद्धपद का बहुमान किया…और हमें भी उस परमपद की प्राप्ति हो ऐसी भावना भायी। जिनमार्ग की उपासना ही परमपद की प्राप्ति का उपाय है -ऐसे समझकर हे भव्य जीवो ! तुम परमभक्तिपूर्वक जिनमार्ग की उपासना करो।

[छठवें पद्मप्रभ तीर्थंकर का मंगल जीवन-चरित्र यहाँ समाप्त हुआ।]

* * * * [छठवे तथा सातवें तीर्थंकरों के बीच कोई शलाका पुरुष नही हुए हैं।]

मेरी माँ मुझे रोज मजेदार कहानी सुनाती है। भगवान की कहानियाँ सुनने में मुझे मजा आता है। और मुझे भी भगवान जैसे बनने का मन होता है।

७

भगवान सुपार्श्वनाथ

[७]

अब, भगवान सुपार्श्वनाथ का मंगल चरित्र प्रारम्भ होता है। उसमे मंगलरुपसे स्तुति करते हुए आचार्य समन्तभद्रस्वामी कहते हैं कि-‘पदार्थ एकान्त सत् है अथवा असत् है-ऐसे किसी एकान्तरूप से जीवादि तत्त्वों का निर्णय जिन्होने नही किया है, परन्तु जो सर्व तत्त्वो के स्वरूप के ज्ञाता है, अर्थात् एकसाथ सत् तथा असत् ऐसे दोनो स्वरूपसे अनेकान्त मय समस्त तत्त्वो को जाना है, -ऐसे भगवान सुपार्श्वनाथ हमारे परम गुरु है।’ जीवादि प्रत्येक तत्त्व अपने गुण-पर्यायरूप निजधर्मों से परिपूर्ण सतरूप है और अन्य पदार्थों से वह भिन्न होने के कारण परधर्मरूप नहीं है -असत् है; इस प्रकार समस्त पदार्थ अस्ति-नास्ति, द्रव्य-पर्याय इत्यादि अनेकान्त स्वरूप है, -ऐसे जिनोपदेश को स्वीकार करनेवाला जीव जिनमार्ग का उपासक होकर निजपद को अर्थात् जिनपद को प्राप्त करता है।

इस प्रकार जगप्रसिद्ध अनेकान्त तत्त्वों का उपदेश करनेवाले भगवान सुपार्श्वनाथ पूर्वभव में धातकीखण्ड द्वीप में क्षेमपुरी नगरी के राजा नन्दिषेण थे। वह नगरी और राजा दोनों महान थे और जैनधर्म से सुशोभित थे। धर्मप्रताप से दैव सदा उनके अनुकूल था। राजा नन्दिषेण के शरीर की रक्षा कोई वैद्यजन और उनके राज्य की रक्षा कोई सेना नही करती थी; उनके शरीर और राज्य दोनों की रक्षा तो उनका पुण्योदय ही करता था; वैद्य और सेना तो मात्र उनकी शोभा के लिये थे। जिसने अपने आत्मा को जाना है और शत्रुओ को जीता है ऐसे उन नन्दिषेण महाराजा को मात्रा इसी लोक की विजय की इच्छा हो ऐसा नहीं, परलोक को भी वे जीतना चाहते थे, इसलिये वे धर्म-उपासना मे सदा तत्पर रहते थे, धर्म की उपासना भूलकर वे कभी राजवैभव मे मोहित नही होते थे, इसलिये उनका अंतर संसार से विरक्त रहता था। उन्होंने दर्शन मोहरूपी महाशत्रु का नाश तो कर दिया था, किन्तु अभी चारित्रमोह को जीतना बाकी था उसकी चिन्ता के कारण उनका चित्त राजभोगों में नही लगता था। वे जानते थे कि सम्यक्त्व द्वारा मैंने मोक्षमार्ग तो प्राप्त कर लिया है, परन्तु अभी चारित्रमोह मुझे धन, स्त्री आदि में आसक्ति के कारण अनेक पापक्रीडाएँ कराता है। अरे, ऐसी मोहदशा को धिक्कार हो ! इस मोह से छुटकर मोक्षप्राप्ति हेतु रत्नत्रय धर्म की आराधना मेरा कर्त्तव्य है।

ऐसे वैराग्य के विचारपूर्वक महाराजा नन्दिषेण राजभोगों से अत्यन्त विरक्त हुए और अर्हत्‌नन्दन-जिनेश्वर के शिष्य बन गये। ज्ञान-ध्यान में तत्पर उन योगिराज को बारह अंग का ज्ञान प्रगट हुआ तथा दर्शनविशुद्धि आदि उत्तम भावनाओं द्वारा उनको बिना इच्छा के भी तीर्थंकर प्रकृति बँधने लगी। उनके जीवन में धर्म की महान क्रान्ति हुई…वीतरागता का विकास हुआ।

अनेक वर्षों तक मुनिराज नन्दिषेण ने शुद्ध चारित्र का पालन किया। परन्तु कषाय का किंचित् कण शेष रह जाने से आयु के अन्त में उन्हें मध्यम ग्रैवेयक में अहमिन्द्र का भव मिला। वहाँ उन्होंने असंख्य वर्षों तक महान पुण्योदय के बीच रहकर भी भेदज्ञान के बल से आत्मा को उस पुण्योदय से विभक्त रखा। दूसरे अहमिन्द्रों के साथ धर्मचर्चा करके वे महान आनन्द प्राप्त करते थे। अमृत के स्वाद की अपेक्षा उन्हें धर्मचर्चा विशेष रसप्रद लगती थी, इसलिये वे धर्मरसका पान तो प्रतिदिन करते थे; परन्तु अमृतरस का स्मरण तो सत्ताईस हजार वर्ष में मात्र एक बार करते थे। कहावत है, कि-‘सुख में समय कहाँ बीत जाता है उसकी खबर भी नहीं पड़ती’ तदनुसार अहमिन्द्र पर्याय में दिव्यसुख के बीच असंख्य वर्षों का दीर्घकाल कब बीत गया, उसकी खबर भी नहीं पड़ी ! जब मात्र छह मास आयु शेष रह गई तब ध्यान आया कि अब यहाँ से मनुष्यलोक में तीर्थंकर रुप से मेरा अवतार होगा। प्रभुका अवतार कहाँ होते है ! वह हम देखे।

वाराणसी (काशी) नगरी में तीर्थंकर-अवतार

यह बात आज-कल की या हजारों लाखों वर्ष पहले की नही, परन्तु असंख्यात वर्ष पहले की है। उस समय काशी देश में गंगा नदीके किनारे अति रमणीय वाराणसी (बनारस) नगरी थी। उस नगरी में सुप्रतिष्ठ महाराजा राज्य करते थे। उनकी महारानी पृथिवीसेना के महान रूप-गुण-सौभाग्य की महिमा किस प्रकार की जाय ! इतना ही कहना बस होगा कि वे एक जगत्पूज्य तीर्थंकर की जननी है। भाद्रपद शुक्ला षष्ठी को उन्होंने सुखनिद्रा में १६ मंगल स्वप्न देखे और एक श्वेत हस्ती को मुखमें प्रवेश करते देखा…कितना महान स्वप्न ! उसी समय अहमिन्द्र का जीव सुपार्श्व तीर्थंकर का अवतार लेकर उनकी कुक्षि में आया। किसी महान अपूर्व हर्ष से वे रोमांचित हो उठीं। तीर्थंकर आत्मा के समागम से वे किसी अनुपम सुख का अनुभव कर रही थीं। उनके आत्मभाव उज्ज्वल हुए और मिथ्यात्वादि दूर हो गये। अहा, जहाँ तीर्थंकर का निवास हो वहाँ मिथ्यात्वादि कैसे रह सकते हैं ? वहाँ तो सम्यक्त्वादि अचिन्त्य आत्मविभूति प्रगट होती है। ऐसा ही मंगल फल माता पृथिवीसेना को प्राप्त हुआ। गर्भावस्था होने पर भी उन्हें किसी प्रकार का कष्ट या कुरुपता नहीं हुई। उनके आँगन में प्रतिदिन करोड़ों रत्नों की वर्षा होती थी; इन्द्र-इन्द्राणी ने भी दैवी वस्त्रों की भेंट देकर उनका सन्मान किया; भवनवासी देवियाँ वाराणसी में रहकर माताजी की सेवा करती थीं; अनेक प्रकार की चर्चा एव विनोद द्वारा उन्हें प्रमुदित करतीं और उनके गर्भस्थ पुत्र की अपार महिमा एवं गुणगान करके हर्ष व्यक्त करती थी। गर्भस्थ शिशु को गर्भावस्थाजनित कोई असाता नहीं थी; तीर्थंकरत्व और ज्ञानचेतना के प्रताप से उन्होंने गर्भावस्था के सवा नौ महीने भी सुखपूर्वक व्यतीत किये।

तत्पश्चात् ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशी के सुप्रभात में तीनों लोक खलबला उठें ऐसी मंगल बधाई आयी -वाराणसी में पृथिवी माताने सातवे तीर्थंकर को जन्म दिया। छठवें तीर्थंकर पद्मप्रभ के मोक्षगमन के नौ हजार करोड़ सागरोपम के अंतराल के पश्चात् सुपार्श्व तीर्थंकर हुए। इन्द्रोंने काशी-वाराणसी नगरी में आकर प्रभु के जन्म का भव्य महोत्सव मनाया। सुपार्श्वकुमार की आयु बीस लाख पूर्व थी, शरीर की ऊँचाई २०० धनुष (दो हजार फुट० थी। उनका चिह्न ‘स्वस्तिक’ था।

उन बाल तीर्थंकर की चेष्टाएँ अद्भुत थी, परिवार एव प्रजाजन उन्हे देखकर तृप्ति का अनुभव करते थे। उनका सहवास इतना आह्लादक था कि स्वर्गलोक से कितने ही देव उनके पास आते और बालकों का रुप धारण करके उनके साथ खेलते, उन्हें आनन्दित करते और स्वयं भी आनन्द प्राप्त करते थे। बलिहारी है सत्पुरुष के सत्संग की ! इन्द्र भी अनेको बार प्रभु के पास आकर स्वर्ग लोकके श्रेष्ठ संगीत एव नृत्य नाटकादिका प्रदर्शन करने के बहाने प्रभुकी भक्ति-स्तुति करके अपने पुण्य की वृद्धि करते थे। स्वर्ग के उत्तमोत्तम पदार्थ वे बाल तीर्थंकर की सेवा में रख जाते थे, परन्तु अरे ! स्वयं सुखी भगवान को उन इन्द्रभोगों की कहाँ आवश्यकता थी ? श्रेष्ठ पुण्योदय के कारण स्वर्गलोक के उत्तम पदार्थ उनके पास आते थे, परन्तु भगवान तो पुण्य से भी पार आत्मा के साधक थे, उस आत्मसाधना के समक्ष श्रेष्ठ पुण्य भी बेचारे तुच्छता को (हेयपने को) प्राप्त होते थे। और मानो तीर्थंकर के भी शुभकर्म का विषैलापन बताने के लिये उसके साथ किंचित् अशुभ कर्म का अनुभाग भी साथ रहता था।

वाराणसी मे महाराज सुप्रतिष्ठ का राजमहल गगा नदी के किनारे था। वहाँ की शोभा अति सुन्दर थी; बालतीर्थंकर के सान्निध्य से वह गगा का प्रवाह भी पवित्र हो जाता था। राजकुमार सुपार्श्वनाथ अनेक प्रकार की बालक्रीडाएँ करते थे. कभी कभी विशाल गंगा नदी में जलविहार करते थे। एकबार जब वे राजकुमार गगानदी मे नौकाविहार कर रहे थे, उस समय एक अद्भुत घटना हुई - एक बड़ा मगरमच्छ शीघ्रता से उनकी नौका के पीछे-पीछे आ रहा था नौका तक पहुँचने के लिये वह उछलता था। लोगों ने उसे देखा और भयभीत हुए कि यह मगरमच्छ प्रभु की नौका को उलट देगा क्या ! प्रभुने भी उसे देखा, परन्तु वे तो निर्भयता से विहारका आनन्द ले रहे थे…मानों मगरमच्छ के अंतरका रहस्य जान गये हों। थोड़ी देर मे नौका के निकट पहुँचकर उस मगरमच्छ ने एक डुबकी लगायी और दूसरे ही क्षण नौका से आगे निकलकर वह नौका के सामने आने लगा…सब आश्चर्य से देख रहे थे कि इतने में उस मगरमच्छने सिर ऊँचा करके अपने अगले दो पैर पानी से बाहर निकाले और मानो हाथ जोड़ रहा हो ऐसी मुद्रा में प्रभु को भावसे नमस्कार करने लगा . उसकी चेष्टा शांत एवं भक्तिपूर्ण थी। उसने नौका को कोई हानि नहीं पहुँचायी…वह तो तीर्थंकर प्रभुके दर्शन हेतु नौका के पीछे दौड़ रहा था…प्रभु की अपार तेजस्वी शांत सुन्दर मुद्रा देखकर उसे लगा कि अहा, इस गंगानदी के बीच ऐसे तीर्थंकर प्रभु के दर्शन का सद्भाग्य मुझे कहाँ से ? नदी मे प्रभुदर्शन का ऐसा सुयोग कब होगा ! ऐसे अति उल्लासपूर्वक, प्रभुके सन्मुख आकर वह दर्शन कर रहा था। मगर जैसे तिर्यंच पर भी प्रभुका ऐसा प्रभाव देखकर सब लोग प्रसन्न हुए। प्रभुने भी प्यार भरी मीठी नजरसे मगरमच्छ के सामने देखा। इतनेमें तो वहाँ मगरमच्छ के बदले एक देव दिखायी दिया जो अति प्रसन्न हो रहा था। वास्तव में वह कोई मगरमच्छ नही किन्तु एक देव था जो प्रभुके साथ जलक्रीड़ा एवं भक्ति करने हेतु मगरमच्छ का रूप धारण करके आया था। उसीकी यह सब लीला थी। उस समय गंगानदी मे उस मगरमच्छ के साथ अन्य हजारों जलचर प्राणी भी प्रभुदर्शन के लिये नौका के आसपास एकत्रित हुए थे…मानो गंगानदी के बीच समवसरण मे तिर्यंचोंकी की सभा भरी हो ! इस प्रकार सब आनन्दपूर्वक किल्लोल कर रहे थे और प्रभुके दर्शन के कोई अद्भुत तृप्ति का अनुभव करते थे। अहो देव ! तिर्यंच जीवभी आपके दर्शन से आनन्द प्राप्त करते है तो फिर हम जैसे मनुष्य आपके दर्शन से अतीन्द्रिय आनन्द प्राप्त कर लें - उसमे क्या आश्चर्य है !

राजकुमार सुपार्श्व जब आठ वर्ष के हुए तब उन्होंने देशसंयम धारण किया. यद्यपि उनका जीवन पापरहित संयमरूप ही था, तथापि आठ वर्ष में उन्होंने अप्रत्याख्यानरूप चार कषायों का नाश करके पंचम गुणस्थान प्रगट किया। सर्व तीर्थंकर आठ वर्ष की आयु मे देशसंयमी हो जाते हैं। मात्र प्रत्याख्यान तथा संज्वलनरूप कषाय शेष रहे, परन्तु वे भी अति मन्दरूप थे। उन बालतीर्थंकर को पुण्यजनित भोगोपभोग की सामग्री तो अपार थी, परन्तु उनके कषाय अतिअल्प थे, आठ कषाय तो थे ही नहीं और शेष आठ भी अत्यतमन्द थे, इसलिये अमर्यादित भोग सामग्री के बीच रहकर भी अपने आत्मा को संयमित रखते थे; उनकी बाह्य वृत्तियाँ अति मर्यादित थी और परिणाम विशुद्धिद्वारा उनको कर्मोंकी निर्जरा होती रहती थी। उनके श्रम-खेद-शोक-प्रस्वेद या मल-मूत्रादि अशुचि नही थी; आत्मा की भाँति उनका शरीर भी स्वभावतः पवित्र था। उनके सान्निध्य मे सदा प्रसन्नता छायी रहती, उनके मधुर वचन सबको प्रिय लगते थे। उनका शारीरिक बल अतुल्य था, परन्तु वे कभी उनका प्रयोग नही करते थे। उन्हें किसी प्रकारका भय नहीं था। हाँ, पहले वे जन्म-मरण से भयभीत थे परन्तु अब तो जन्म-मरण का भी नाश करके वे निर्भय हो गये थे। उनको पहले से ही आत्मज्ञानसहित अतीन्द्रिय ज्ञान तो था ही, साथ ही लौकिक विद्याओं में भी वे ऐसे पारंगत थे कि विद्या पढ़ने के लिये किसी गुरुके पास जाने की आवश्यकता ही नही थी… वे स्वयं ही जगत के गुरु थे और स्वयं सम्बुध्द थे। मोक्ष विद्या का निवास तो उनके हृदय में ही था; जब वे बोलते तब उनके मुख से मोक्षमार्ग के पुष्प झरते थे।

राजकुमार सुपार्श्व धीरे-धीरे युवावस्था को प्राप्त हुए। जब वे पाँच लाख पूर्व के हुए तब काशी देश के राज सिंहासनपर उनका राज्याभिषेक हुआ; इन्द्रने भी उस उत्सव मे भाग लिया। भगवान को कहीं साम्राज्य का वैभव बढ़ाने की इच्छा नही थी, उनका पुण्यप्रताप ही उन्हें सर्व सुयोग प्राप्त करा देता, परन्तु वे तो उदारता पूर्वक दानादि में उनका त्याग कर देते थे। उनका राज्य कल्याण राज्य था। इस प्रकार सुखपूर्वक राज्य करते-करते १९ लाख पूर्व व्यतीत हो गये।

एक बार सुपार्श्व महाराजा का जन्मदिवस होने से वे हाथी पर बैठकर वनविहार करने गये; तब उन्होंने एक वृक्ष देखा, - जो कुछ समय पहले हराभरा फल-फूल युक्त था, और पतझड़ ऋतु आने पर उसके मब पत्ते झर जाने से ऐसा सूखा हुआ - उदास लगने लगा जैसे किसी साधुने केश लुंच कर लिया हो। ऐसा ऋतु-परिवर्तन तथा वृक्षकी ऐसी दशा देखकर महाराजा सुपार्श्वनाथ समस्त पदार्थों की क्षणभंगुरता का चितवन करने लग कि - अरे, ऋतु की भाँति इस समाग मे कोई संयोग स्थिर नहीं है, इस वृक्ष की भाँति यह राजभोग एवं शरीरादि भी विनश्वर - क्षणभंगुर है, जीवन मे पुण्य के कारण हरे-भरे लगनेवाले विषयरूपी वृक्ष भी पुण्यरूपी पत्ते झर जाने पर क्षणभर में सूख जाते हैं। अरे, मेरी आयु का दीर्घकाल इनमे बीत गया अब अपनी आत्मसाधना पूर्ण करके परमात्मापद प्राप्त करने के लिये रत्नत्रयरूपी बोधि प्राप्त करने का समय आ गया है। मैं आजही इन राजभोगो को छोड़कर मुनिदशा धारण करूँगा और शुद्धोपयोग द्वारा चिदानन्द स्वरूप में लीन होऊँगा।

इस प्रकार प्रभुके अंतर में वैराग्य का समुद्र उमड़ पड़ा उसकी लहरे ठेठ लौकांतिक स्वर्ग तक पहुँची और वैराग्य मे सराबोर वे देव भी तुरन्त वाराणसी नगरी में आकर प्रभुके वैराग्य का अनुमोदन करने लगे कि - धन्य आपका वैराग्य ! दीक्षा ग्रहण करनेका आपका निश्चय अति उत्तम है ! उसी समय इन्द्र भी दीक्षा कल्याणक के लिये स्वर्गलोक से ‘मनोगति’ नामक दिव्य शिबिका लेकर आ पहुँचे और भगवान उसमे विराजमान हुए। पहले मनुष्य और फिर देव उस पालकी को लेकर दीक्षावन की ओर चलने लगे, परन्तु प्रभुकी मनोगति तो अति शीघ्रता से मोक्ष तक पहुँच गई थी वे वैराग्य भावना पूर्वक मोक्षसुख का चिंतन कर रहे थे।

दीक्षावन मे पहुँचकर प्रभुने वस्त्राभूषनादि सर्व परिग्रह उतार दिया और ‘सिद्धेभ्यो नमः’ का मंगलोच्चार करके वे सुपार्श्व मुनिराज शुद्धात्मध्यानमें लीन हो गये। तत्क्षण शुद्धोपयोग के परम आनन्द की अनुभूति सहित सातवाँ गुणस्थान एवं मन पर्ययज्ञान प्रगट हुआ। मुनिदशा में उनको प्रथम आहार दान सोमखेटनगर मे महेन्द्रदत्त राजाने दिया। अहा, तीर्थंकर मुनि के हाथ में अपने हाथ से आहारदान देते हुए उनके हर्षानन्द का पार नहीं रहा. उन्होंने मात्र दिया ही नहीं साथ-साथ प्रभुसे स्वयं भी मोक्षका दान लिया।

सुपार्श्व प्रभु नौ वर्ष तक मुनिदशा में आत्मसाधनापूर्वक विचरे। तलवार आदि किसी भी प्रकार के हिंसक शस्त्र द्वारा अथवा मुँह से एक भी शब्द बोले बिना, नौ वर्षतक वे मोह शत्रु से युद्ध करते रहे…और अंत में शांत आत्मध्यान में बारम्बार शुद्धोपयोग के प्रहारों द्वारा उन्होंने मोहको सर्वथा नष्ट करके अनंत-चतुष्ट्य सम्पदा को प्राप्त कर लिया। इस प्रकार वे महान विजेता, अरिहंत सर्वज्ञ परमात्मा हो गये। वाराणसी के जिस वनमे उन्होंने दीक्षा ली थी उसी दीक्षा वनमें फाल्गुन कृष्णा षष्ठी के दिन वे सर्वज्ञपद को प्राप्त हुए…और नौ वर्षका मौन तोड़कर दिव्यध्वनि द्वारा धर्म तीर्थके प्रवर्तक तीर्थंकर हुए उनकी धर्मसभा मे ११००० केवली भगवंत उनके सहगामी थे; बलदेव आदि ९५ गणधर थे; लाखों मुनि-आर्यिकाओं, श्रावक-श्राविकाओ का चतुर्विध संघ वहाँ आनन्दपूर्वक मोक्षसाधना कर रहा था। इस प्रकार चतुर्विध संघके नायक तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ भगवान भरत क्षेत्र मे धर्मामृत की वर्षा करते करते करोड़ों-अरबों वर्ष तक अर्हतरूप से विचरे। जब एक मास आयु शेष रही तब वे सम्मेदशिखर शाश्वत मोक्षधामकी प्रभास टूकपर पधारे और फाल्गुन कृष्णा सप्तमी के दिन योगनिरोध करके शाश्वत निर्वाणपुरी में जाकर अनत सिद्ध भगवन्तो के साथ विराजमान हो गये। उनको नमस्कार हो ! इन्द्रने मोक्ष का महोत्सव मनाया और ‘अहो, यह प्रभुके निर्वाण का क्षेत्र है’ ऐसे कहकर सम्मेदशिखर निर्वाण धाम का भी सन्मान किया।

सुपार्श्वनाथ जिनराजकी प्रभास कूट है जेह,
मन-वच-तन कर पूज हूँ शिखर सम्मेद यजेह।

आज भी अनेको भव्य जीव उस निर्वाण धाम मे जाकर मोक्ष की भावना भाते हैं।

पूर्व भव में जो क्षेमपुरी नगरी में नन्दिषेण नामके राजा थे; पश्चात् मुनि होकर ग्रैवेयक मे अहमिन्द्र हुए; वहाँ से काशी देश की वाराणसी नगरी मे अवतरित होकर, भवका अन्त करके, सुपार्श्वनाथ तीर्थंकर हुए और मोक्ष पधारे, उन सातवे भगवन्तका मगल चरित्र यहाँ पूर्ण हुआ।

[काशी-वाराणसी (बनारस) मे गगानदी के भदैनीघाट पर जिनमन्दिर में सुपार्श्वनाथ भगवान के चरणचिह्न हैं; वहाँ भगवान का जन्म स्थान माना जाता है। उनके असंख्य वर्ष पश्चात् पार्श्वनाथ भगवान (तेईसवें तीर्थंकर) भी इसी नगरी में अवतरित हुए, उनका जन्मस्थान भी आज एक मन्दिर में माना जाता है। पार्श्वप्रभुने इसी नगरी में कमठ तापसके अविवेकी (हिंसायुक्त) पंचाग्नि तपको असार बतलाकर लकड़ियो में सुलगते सर्प-युगल को धर्मश्रवण कराया था; तथा इसी नगरी में प्रभुका धर्मोपदेश सुनकर उनके माता-पिताने जैनदीक्षा धारण की थी। आठवें तथा ग्यारहवे तीर्थंकर-चन्द्रप्रभ एवं श्रेयांसनाथ भी इसी काशी राज्य की चन्द्रपुरी और श्रेयपुरी (सिंहपुरी-सारनाथ) नगरी में अवतरित हुए थे। चार तीर्थंकरों के गर्भ-जन्म-तप कल्याणकों से पावन इस काशीतीर्थ की यात्रा आज भी लाखों जैनयात्री प्रतिवर्ष करते हैं।

समन्तभद्रस्वामी ने शिवपिण्डी के समक्ष जिनबिम्ब का ध्यान करके अद्भुत स्तुति करते थे; शिवपिण्डी फटने पर चन्द्रप्रभप्रभुकी प्रतिमा प्रगट हुई, यह घटना भी इसी नगरी में हुई थी-ऐसा कुछ इतिहासकार मानते हैं। (कुछ लोग वह घटना भुवनेश्वर में होना मानते हैं।) काशी में ‘फटे महादेव का मन्दिर’ आज भी वद्यमान है, वह अभी तक ‘समन्तभद्रेश्वर-मन्दिर’ कहलाता था। आजकल वाराणसी जाएँ तब ‘काशी के ठग’ से सावधान रहना जरुरी है।]

गजराज…वनराज और कपिराज

गजराज जैनधर्म की कथा पढ़ रहे हैं।
कपिराज और वनराज शांति से सुन रहे हैं।
● गजराज बने पार्श्वनाथ;
● वनराज बने महावीर;
● कपिराज बने गणधर।
यह तीनो जीव वर्तमान मोक्षपुरीमें
विराज रहे है।

तीनों की कथा आप इस महापुराण में पढ़ना, और जैनधर्म के सस्कारों द्वारा अपना तथा अपने परिवार का कल्याण करना।

८

भगवान चन्द्रप्रभ (भाग १)

(८)

आनन्दरस से भरपूर ज्ञानगंगा प्रवाहित करनेवाले और जगत को शान्ति प्रदान करने वाले अद्वितीय चन्द्र, भगवान चन्द्रप्रभ जिनको नमस्कार हो !

भगवान चन्द्रप्रभने पूर्व श्रीवर्मा के भव मे सम्यक्त्व प्राप्त किया, तबसे लेकर केवलज्ञान प्राप्त करते तीर्थंकर हुए तब तक के सात भवों का वह मंगल पुराण है।

चन्द्रप्रभ का जीव दूसरे पूर्वभव मे ‘पद्मनाभ’ नामक राजा था, तब श्रीधर मुनिराज के निकट धर्मश्रवण करके अपने भूत एवं भविष्य के भव पूछता है। मुनिराज उसे भूतकाल के चार भव, वर्तमान पद्मनाभका भव और भविष्यकाल के दो भव - इस प्रकार कुल सात भव की बात करते है। वे सात भव संक्षेप में इस प्रकार हैं.-१. श्रीवर्मा राजा : सम्यक्त्व की प्राप्ति (पूर्व भव छठवाँ)

२. प्रथम स्वर्ग में देव… (पूर्व भव पाँचवाँ)

३. अजितसेन चक्रवर्ती; मुनिदीक्षा (पूर्वभव चौथा)

४. सोलहवें स्वर्ग मे अच्युत इन्द्र… (पूर्व भव तीसरा)

५. राजा पद्मनाभ; दीक्षा; तीर्थंकर प्रकृति (पूर्व भव दूसरा)

६. वैजयन्त विमान में अहमिन्द्र… (पूर्व भव १)

७. चन्द्रपुरी (काशी) मे चन्द्रप्रभ तीर्थंकर का अवतार और मोक्ष अब उनकी मंगलकथा सुनो।

भगवान चन्द्रप्रभ : पूर्वभव : महाराजा पद्मनाभ

धातकी खण्ड के विदेहक्षेत्रमें रत्नसंचयपुर नामका नगर है। सम्यग्दर्शनादि उत्तम रत्नों से विभूषित ऐसे सज्जन-पुरुषों द्वारा उस नगरी की अद्भुत शोभा है। वहाँ सदाचारी श्रावक उत्तम जैनधर्म का पालन करके स्वर्ग मे या मोक्षमे ही जाते थे। ‘अरे, स्वर्ग मे तो क्या है! वह तो यहाँ जैसा ही है’- ऐसा विचारकर सम्यग्दृष्टि जीव मोक्षहेतु ही धर्मसाधन करते थे, स्वर्ग की इच्छा से नहीं।

उस रत्नसंचयपुर के राजा कनकप्रभ और रानी सुवर्णमाला; उनके पद्मनाभ नामका पुत्र है। वे पद्मनाभ ही अपने चरित्रनायक श्री चन्द्रप्रभका जीव है। (पद्मनाभ वह उनका दूसरा पूर्वभव है।)

एकबार राजा कनकप्रभ राजमहल की छतपर बैठे-बैठे नगर का अवलोकन कर रहे थे। इतनेमें देखा कि एक बूढ़ा बैल गहरे कीचड़ मे धँस गया है और तड़पकर मर रहा है। वह देखकर राजा को वैराग्य जागृत हुआ और विचारने लगे कि-अरे! अभी भी मै इस संसार के मोहरूपी कीचड में धँसा हुआ हूँ। मैने जिनागम जाने है, उत्तम साधुओ की संगति की है और संसार को असार जाना है; तो अब मै इन इन्द्रिय सुखो मे कहाँ तक आसक्त रहूँगा? -ऐसा विचार करने पर वे धर्मात्मा कनक राजा संसारसुखो से अत्यन्त विरक्त हो गये और तत्काल ही उनका चित्त मुनिमार्ग मे प्रविष्ट हुआ, मानो मुक्ति के दूतने आकर गुप्तरूपसे उनके कानमे मुनि होने को कहा हो! उन्होंने तुरन्त अपने पुत्र पद्मनाभ को राज्य सौंपकर, श्रीधर मुनिराज के समीप मुनिदीक्षा ग्रहण कर ली।

अब, वह रत्नसंचयपुर का राज्य अपने चरित्रनायक धर्मात्मा पद्मनाभने सँभाल लिया। एक दिन की बात है-राजा पद्मनाभ राजसभा मे बैठे थे, वहाँ मालीने आकर हर्षपूर्वक बधाई दी कि-हे स्वामी! मनोहर बागमे श्रीधर मुनिराज पधारे है, उनकी मुद्रा अति शांत एव तेजस्वी है, उनके आगमन से सारा वन ऐसे खिल उठा है मानो प्रफुल्लित होकर हँस रहा हो। हिरन और सिंह बाघ और हाथी, सर्प और मोर जैसे पशुपक्षी भी वैरभाव छोडकर शान्तिपूर्वक मुनिराजकी चरणछाया मे हिलमिलकर मित्रता से बैठे है।

इस प्रकार श्रीधर मुनिराज के आगमन के समाचार सुनते ही राजा पद्मनाभ के हृदय मे हर्षका समुद्र उमड पडा, उसने हर्षित होकर अपना रत्नहार माली को पुरस्कार मे दे दिया। 'अहा! मै जिनके दर्शन को जाना चाहता था वे भगवान स्वयं मेरे आँगन मे पधारे है ऐसा कहकर तुरन्त ही मुनिराज के साक्षात दर्शन वन्दन हेतु प्रस्थान किया।

राजा पद्मनाभने मुनिराज के समीप आकर जयजयकारपूर्वक दर्शन-वन्दन किया और उनके चरणो मे बैठ गया। राजा को अत्यन्त प्रसन्नता हो रही थी। मुनिराजने उसे धर्म का आशीर्वाद दिया।

राजाने विनयपूर्वक तत्त्वोपदेश की प्रार्थना की कि-हे स्वामी! वर्तमान मे अनेक जीव नास्तिक बन रहे है, जीव के अस्तित्व को नही जानते, इसलिये आप युक्तिपूर्वक जीवके अस्तित्व की सिद्धि करके समझाइये जिससे जीवोका कल्याण हो, क्योकि जीवका अस्तित्व सिद्ध हो तभी धर्म और मोक्ष की सिद्धि होगी।

श्री मुनिराजने कहा हे बुध्दिमान राजन्! आपने अच्छा प्रश्न पूछा है। सुनो, मैं जीव की सत्ता सिद्ध करके बतलाता हूँ-★ ‘जीव नहीं है’ यह बात प्रत्यक्षादि प्रमाणों से खण्डित है।

★ ‘जीव नेत्र द्वारा दिखाया नहीं देता इसलिये नहीं है’ ऐसा कहना तो मूर्खता है। ‘इन मकान आदि सबको मैं देखता हूँ’-ऐसा कौन कहता है?-देखनेवाला जो विद्यमान है वही ऐसा कहता है कि ‘मैं देखता हूँ’-इसलिये जीव विद्यमान है।

★ चाहे जैसे अंधकारमें भी जीव कहता है कि ‘मैं यहाँ विद्यमान हूँ’-ऐसा स्वयं स्वसंवेदन के अपने अस्तित्व को प्रसिद्ध करता है, वही जीव है। ‘मैं हूँ’ ऐसा वेदन जीव में होता है, शरीर में नहीं।

★ शरीर के हाथ-पैर आदि अवयव कट जायँ तथापि ज्ञान नहीं कट जाता, कम नहीं हो जाता; इससे सिद्ध होता है कि चेतनसत्ता शरीर से भिन्न है कि जिसके आधार से ज्ञान रहा है। ज्ञान यदि शरीर के आधार से होता तो शरीर के कटने से ज्ञान भी कट जाता।

★ जगतमें जितने प्राणी हैं उन (मनुष्य, हाथी, सिंह, चींटी आदि) सबमें ‘जीव’ का अस्तित्व स्वसंवेदन-प्रत्यक्ष द्वारा सिद्ध है, क्योंकि ‘मै सुखी हूँ, मै दुःखी हूँ’-ऐसा सुख-दुःखका वेदन (ज्ञान) प्रत्येक जन्तु को होता है। जीव के बिना सुख-दुःखका वेदन कौन करेगा ? स्वको तथा परको जाने ऐसा ज्ञान का स्वभाव है, और ऐसा जो ज्ञान स्वभाव है वही जीवसत्ता है।

इस प्रकार मुनिराजने ज्ञानलक्षण द्वारा जीवके अस्तित्व को सिद्ध करके कहा कि-हे राजन् ! जीवके ऐसे अस्तित्व को जो जानता है वह स्वर्ग-नरकादि परभव को भी स्वीकारता है, इसलिये पाप से डरता है और धर्म का सेवन करता है।

शरीर से भिन्न जीवकी सिद्धि करते हुए मुनिराज कहते है कि-अचेतन शरीरसे जीव भिन्न है : शरीर तो ज्यों का त्यों हो, तथापि जीवमे विकार (दुःख, क्रोधादि) होते देखे जाते हैं; तथा शरीर में रोगादि विकार होने पर भी अथवा उनके जलने पर भी जीवके चित्त में शान्ति रह सकती है; इस प्रकार जीव और शरीर के कार्य (धर्म) भिन्न-भिन्न हैं। तथा हे राजन ! शरीर चेष्टाएँ तो आँखो से दिखती है, परन्तु आत्माके भाव आँखो से दिखायी नहीं देते;-इस प्रकार दोनों के धर्म (मूर्तपना तथा अमूर्तपना) भिन्न है।

इस प्रकार श्रीधर मुनिराज ने स्वसंवेदन-प्रत्यक्षसे तथा अनुमान द्वारा चेतनस्वरूप जीवका अनादि-अनन्त अस्तित्व सिद्ध करके समझाया, प्रत्येक जीव ऐसा अनुभव करता है कि पाप-पुण्य, दुःख-सुखादि रुप अपने भाव सदा बदलते रहते हैं, और उस बदलती दशा के द्वारा वह धर्म एवं मोक्ष को साध सकता है। इस प्रकार नित्य-अनित्य (गुण-पर्याय) स्वरूप जीवतत्त्व में ही बंध-मोक्षादि की सिद्धि होती है। जीव सर्वथा अकर्त्ता या अपरिणामी नहीं है। विचारणीय बात है कि-जीव यदि अच्छे-बुरे कार्यों को (शुभ-अशुभ भावोंको) न करे तो उसे पुण्य-पाप क्यों होंगे ? और स्वर्ग-नरक भी क्यों होंगे ? और यदि पुण्य-पाप का बंधन न हो तो उससे छूटनेरूप मोक्ष या मोक्षका उपाय (धर्म) भी किसलिये करे ? जीव दयादि शुभकार्यों द्वारा पुण्यबंध करता है और हिंसादि अशुभ-कार्यों द्वारा पापबंध करता है; वीतराग भावरूप धर्म द्वारा वह बंध को छेदकर मोक्ष करता है। इस प्रकार जीव अपने भावका कर्ता होता है और उसके फलका (सुख-दुःखका) स्वयं ही भोक्ता होता है।

जीवको बंधन या मुक्ति यदि दूसरा कोई करे, तो उसका फल भी आत्मा क्यों भोगे ? जीव स्वयं ही अपने बंध-मोक्ष को करता है और स्वयं ही उसके फलको भोगता है। जब रत्नत्रयरूप शुद्धभाव करता है तब वह रागादि विभावका अकर्त्ता होता है, परन्तु सर्वथा अकर्त्ता नहीं है। ऐसा स्वतंत्र, स्वयंसिद्ध जीवतत्त्व है और वह अपने अंतरंग स्वसंवेदन से अनुभवगोचर होता है।

श्री मुनिराज के उपदेश से राजा पद्मनाभ को तथा सभाजनों को अत्यन्त प्रसन्नता हुई; अनेक जीव जीवतत्त्व को अनुभव गोचर करके सम्यग्दर्शन एव सम्यग्ज्ञान को प्राप्त हुए।

तत्पश्चात् सर्वज्ञता की सिद्धि करते हुए मुनिराज ने कहा कि-सर्वज्ञतारूप मोक्षपद है। आत्मा का ज्ञानस्वभाव है और उस ज्ञान की पराकाष्ठा वह सर्वज्ञता है। उस सर्वज्ञता की सिद्धि अंतरके आत्मानुभवपूर्वक जो युक्ति-अनुमानादि से होती है।

★ जो ‘इन्द्रिय प्रत्यक्ष’ है वह अतीन्द्रिय पदार्थ की सिद्धि में न तो साधक हो सकता है, और
न बाधक।

★ सर्वज्ञता अतीन्द्रिय है, इसलिये इन्द्रिज्ञान उसके सद्भाव को या अभाव को सिद्ध नहीं कर सकता। जिस ज्ञान का जो विषय हो वही उसमे विधि या निषेध कर सकता है, जिसका जो विषय न हो वह उसमे विधि या निषेध नही कर सकता।

★ जगत मे ऐसा कोई प्रमाण नही है कि जो सर्वज्ञता के अस्तित्व को बाधक हो सके।

कोई कहे कि-पुरुषपना सर्वज्ञता का बाध्य है! तो वह बराबर नही है; पुरुषपना होने पर भी किसीमे ज्ञानके अतिशयरूप सर्वज्ञता हो सकती है। (जैसे कि-अरिहंत देव।)

‘सर्वज्ञ है’ ऐसे वाक्य के बोध द्वारा उत्पन्न हुई बुद्धि वह प्रमाण है, और वह बुद्धि सर्वज्ञके अस्तित्व को स्वीकार करती है। सर्वज्ञ के स्वीकार से आत्मा के ज्ञानस्वभाव का स्वीकार और रागादि विभावो से भेदज्ञान होता है, इसलिये आत्मा निज स्वभाव की सन्मुखता द्वारा सर्वज्ञपद का साधक होता है। यह बात प्रसिद्ध है कि-

जो जानता जिनराज को चेतनमयी शुद्ध भावसे;
वह जानता निज आत्म को सम्यक्त्व ले आनन्द से।

श्री मुनिराजने इस प्रकार सर्वज्ञता की सिद्धि पूर्वक गंभीर उपदेश दिया और मोक्षमार्ग की रीति समझायी।

श्रीधर मुनिराज के मुखारविन्दसे ऐसी अद्भुत धर्मचर्चा सुनकर, चन्द्रप्रभ तीर्थंकर के जीव राजा पद्मनाभने भक्तिपूर्वक कहा-प्रभो ! आपने जैन सिद्धान्त के जो गंभीर तत्त्व-जीव मोक्ष, सर्वज्ञता आदि समझाये वे वैसे ही हैं, उसी प्रकार हमारे श्रद्धा-ज्ञान मे आते हैं और वही मोक्षका मार्ग है। इतना कहकर राजा पद्मनाभने विनय से पूछा-हे प्रभो ! आप दिव्यज्ञान के धारी है, अपने भूत-भविष्यके भव जानने की मुझे उत्कण्ठा है, इसलिये कृपा करके कहिये।

श्री मुनिराजने दिव्यज्ञान द्वारा जानकर कहा कि हे भव्य, सुनो ! अब एक भवके पश्चात् तुम्हारा आत्मा भरतक्षेत्र में आठवें तीर्थंकर चन्द्रप्रभ होगा। तुम्हारे पूर्व के भव भी मैं कहता हूँ… मुनिराजके श्रीमुख से यह बात सुनते ही सभाजनों मे हर्ष छा गया कि-अहा, एक तीर्थंकर का आत्मा यहाँ अपने बीच विराजमान है और उन तीर्थंकर के पूर्व भव की बात मुनिराज हमे सुना रहे हैं। -इस प्रकार सभाजन महान हर्षपूर्वक सावधानी से सुनने के लिये आतुर हो गये…और श्री मुनिराजने पद्मनाभ राजा अर्थात् चन्द्रप्रभ तीर्थंकर के पूर्वभवों की मंगल कथा प्रारम्भ की…तुम भी आनन्द से सुनो।

श्री चन्द्रप्रभ तीर्थंकर का पूर्वभव (छठवाँ)

श्रीवर्मा राजा : सम्यक्त्व-प्राप्ति

मुनिराज कहते हैं-हे राजा पद्मनाभ ! प्रथम तो इस भवमें ही एक हाथी के निमित्तसे तुम मुनि होगे, और दर्शनविशुद्धि आदि १६ उत्तम भावनाओं द्वारा तीर्थंकर प्रकृति नामकर्म बाँधोगे। भरतक्षेत्र की इस चौबीसीमें अभी तक ऋषभादि सात तीर्थंकर हो चुके हैं; वर्तमान में यहाँ कोई तीर्थंकर विचरण नहीं करते। एक भव पश्चात् तुम वहाँ आठवें तीर्थंकर रूप में अवतरित होगे और धर्मचक्रका प्रवर्तन करोगे। अहा, एक तीर्थंकर का जीव अपने भूत-भविष्य के वर्णन की कथा मुनिराज के श्रीमुखसे सुन रहा है:

हे राजन् ! अब से पूर्व पाँचवें भव में तुम पुष्करार्द्ध द्वीप के विदेहक्षेत्र में श्रीषेण राजा के पुत्र श्रीवर्मा थे। वे राजा श्रीषेण श्रीपुर नामके नगरमें राज्य करते थे; उनकी रानी का नाम श्रीकान्ता था। तुम्हारे जन्मसे पूर्व उनके कोई पुत्र न होने से वह रानी चिन्ता में रहती थी। उसे उदास देखकर राजे समझाते कि हे देवी ! “जो वस्तु भाग्य के आधीन है उसके लिये चिन्ता करना उचित नहीं है; इसलिये तुम चिन्ता छोड़ो और धर्म में अपना चित्त लगाओ। जीवने पूर्वभव में जो भले-बुरे कर्म बाँधे हों तदनुसार फल मिलता है, उसमें हर्षशोक करना वह वृथा दुःखका कारण है। और हे देवी ! भाग्य अनुकूल होने पर पुत्रप्राप्ति भी अवश्य होगी।”

इस प्रसंग के पश्चात् एक दिन श्रीषेण राजा फल और पुष्पों से आच्छादित एक उद्यान में क्रीड़ा करने गये थे। महान भाग्योदय से एक ऋद्धिधारी मुनिवर आकाशमार्ग से वहीं उतरे। वे अनंत मुनिराज अवधिज्ञानी थे। उन्हें देखते ही राजा के हर्ष का पार नहीं रहा। उन्हें वन्दन करके राजा ने भक्तिपूर्वक कहा- अहो ! किसी महान पुण्योदय से आपके दर्शन हुए। प्रभो ! आपकी रत्नत्रयविभूति सर्व मंगल का कारण है। हे स्वामी ! जैनधर्म के प्रताप से स्व-पर का भेदज्ञान मैंने किया है; इस राजवैभव में कहीं सुख नहीं है; ऐसा अनुभव होने पर भी मेरा मन संसार से विरक्त क्यों नहीं होता ?

श्री मुनिराज उनके मन की बात जान गये ..और कहा-हे राजन् ! तुम्हारा मन पुत्रप्राप्ति की चिन्ता से घिरा हुआ है। अब कुछ ही काल पश्चात् तुम्हारे यहाँ एक भावी तीर्थंकर का जीव पुत्ररूप में अवतरित होगा; तत्पश्चात् उसे राज्यभार सौंपकर तुम जिनदीक्षा ग्रहण करोगे और अष्ट कर्मों का नाश करके सिद्धपद पाओगे। तुम्हारी रानी श्रीकान्ता ने पूर्वजन्म में एक गर्भवती स्त्री की पीड़ा तथा कुरुपता देखकर ऐसा निदान किया था कि मुझे यौवनावस्था में गर्भधारण न हो। उस अशुभनिदान के कारण ही उनका यौवन पुत्ररहित व्यतीत हुआ। अब उनके अशुभ कर्मका अन्त आया है; वे अल्पकाल में ही पुत्रवती होंगी…भावी तीर्थंकर चन्द्रप्रभ का जीव उनकी कूख से अवतरित होगा और उन्हें आनन्दित करेगा।

मुनिराज के वचन सुनकर राजा का चित्त अति प्रसन्न हुआ; धर्मोपदेश से प्रभावित होकर उन्होंने पाँच अणुव्रत अंगीकार किये। घर आकर रानीसे मुनिराज की बात की, तो रानी भी अति सन्तुष्ट हुई और उल्लासपूर्वक धर्मसाधन करने लगी। अहा ! जिसके उदर में भावी तीर्थंकर का जीव विराजता हो उसके महाभाग्य का क्या कहना !

योग्य समय पर श्रीकान्ता रानी ने एक अद्भुत तेजस्वी पुत्ररत्न को जन्म दिया…जो सातवें भव में भरत क्षेत्र में आठवें तीर्थंकर होनेवाले हैं…उनके जन्म से सर्वत्र आनन्दमंगल होने लगा। राजाने याचकों को यथोचित इच्छानुसार दान दिया। जिनेन्द्र-पूजा आदि मंगलविधिपूर्वक उस पुत्रका ‘श्रीवर्मा’

ऐसा शुभनाम रखा। (यह श्रीवर्मा ही भावी आठवें तीर्थंकर श्री चन्द्रप्रभ हैं।)

चन्द्रप्रभ को श्रीवर्मा के भवमें सम्यक्त्वप्राप्ति

एक बार उस श्रीपुर नगरी मे पद्मजिनराज का आगमन हुआ। राजाश्रीषेण अपने पुत्र श्रीवर्मा सहित उनका धर्मोपदेश सुनने गये। अद्भुत-आश्चर्यकारी-आनन्दमय आत्मतत्त्व का स्वरूप सुनकर वे मुग्ध हो गये। अपने चरित्रनायक चन्द्रप्रभ का जीव (युवराज श्रीवर्मा) तो वह जिनोपदेश झेलकर तुरन्त ही अंतर्मुख हुआ; उसकी ज्ञानचेतना जागृत हो उठी और मिथ्यात्वरूपी महा अंधकार नष्ट हो गया; चैतन्य की स्वानुभूति से अपूर्व सम्यक्त्व प्राप्त करके वह चतुर्थ गुणस्थान में आरूढ हुआ…अंतरात्मा होकर मोक्षमहल का प्रथम सोपान चढ गया, उसने अपने मे ही परमात्मा के दर्शन कर लिये। इस प्रकार अपूर्व निधान पाकर उसका जीवन पलट गया। सम्यक्त्व के सहयोग से जो विशिष्ट पुण्यकर्मों का संचय होता है वह स्वयमेव इच्छित पदार्थों का समागम करता रहता है; इसलिये धर्मात्मा श्रीवर्मा भी बहारमें इच्छित पदार्थों की प्राप्ति करते थे; अतर का सत्य अतीन्द्रिय सुख उनको सम्यक्त्व-परिणति देती थी।

अहो, जिन चरणों मे सम्यक्त्व के प्रताप से आत्मा की अपूर्व आराधना प्रारम्भ हुई वह अब वृद्धिगत होती-होती सातवें भव में परमात्मा पद प्राप्त करायगी। चैतन्यसुख का आस्वादन किया होने से उन राजकुमार श्रीवर्मा का चित्त राज-सुखों से उदासीन रहता था। धन्य था उनका आत्मजीवन !

महाराज श्रीषेण का चित्त भी केवलीप्रभु का उपदेश सुनने के बाद संसार-भोगों से उदासीन एव भव से भयभीत रहता था। एक दिन आकाश से नक्षत्र को खिरते देखकर वे महाराजा श्रीषेण ससार-भोगो से विरक्त हुए और वैराग्यपूर्वक चितवन करने लगे कि-‘अरे, इस अस्थिर संसार-परिवार या राजलक्ष्मी का मोह कैसा ? एक मोक्षलक्ष्मी और दूसरी यह जड़लक्ष्मी-उन दोमे से अज्ञानी लोग मोक्षलक्ष्मी की साधना छोड़कर जड़लक्ष्मी का मोह करते है। अरे, उनकी बुद्धि की बलिहारी है कि चैतन्य का अमृतपान छोड़कर वे विषयों का विष पीने जाते है। सच्ची लक्ष्मी तो मोक्षलक्ष्मी ही है। विषयरहित निग्रन्थ वीतराग दशामें ही परमसुख है।’

ऐसा विचारकर उन्होंने राजकुमार श्रीवर्मा को बुलाया और विरक्तभाव से कहा-हे वत्स ! घास की झोंपड़ी समान इस शरीर को वृद्धावस्थारुपी पवन बिखेर न दे, धर्मश्रवण के लिये कानों की शक्ति तथा नेत्रों की ज्योति मन्द न हो जाये, तथा स्मरणशक्ति नष्ट न हो जाय, उसके पूर्व मै निर्ग्रन्थ दीक्षा लेकर अपने आत्मा को भवचक्र से छुड़ाना चाहता हूँ। अभी तक तो ससार का स्वरुप जानने पर भी मैं परिवार के मोहवश जंजाल मे फँसा रहा; अब मैंने शीघ्र आत्मकल्याण साध लेने का निश्चय किया है। हे पुत्र ! इस धर्मकार्य में तुम मेरा अनुमोदन करना। अब यह राज्यभार तुम सँभालो। सदा प्रशांत भावसे रहना; धर्मात्मा-सज्जन-विद्वानों का आदर करना; प्रजाजनों को पुत्रवत् समझकर उन्हे कोई कष्ट हो तो तुरन्त उसका निवारण करना। धर्म की रक्षापूर्वक राज्य करना।

इस प्रकार हितोपदेश सहित श्रीवर्मा का राज्याभिषेक करके श्रीषेण महाराजाने मुनिदीक्षा अंगीकार की। शुद्धभाव से रत्नत्रय की साधना करके अल्पकाल में केवलज्ञान प्रगट किया और सर्वकर्मों का क्षय करके मोक्ष पधारे।

❖ ❖ ❖ इधर श्रीपुरनगरी में राजा श्रीवर्मा (जो कि चन्द्रप्रभ तीर्थंकर का जीव हैं) आत्मसाधना को भूले बिना, न्याय-नीतिपूर्वक कुशलता से राज्य करने लगे। जो तीसरे भवमें चक्रवर्ती होनेवाले हैं, पाँचवे भवमें तीर्थंकर प्रकृति बाँधनेवाले हैं और सातवें भवमें तीर्थंकर होनेवाले हैं-ऐसे वे श्रीवर्मा राजा जब दिग्विजय के लिये निकले तब अनेक राजा तो भयभीत होकर शरण में आ गये; कितने ही राजा युद्ध की हिंसासे डरकर संसार से विरक्त हुए और राजपाट छोड़कर जिनेश्वर भगवान की शरण में चले गये। इस प्रकार विजय करते-करते राजा श्रीवर्मा समुद्रकिनारे पहुँचे तब उनके पुण्यप्रभाव से समुद्र की लहरों के साथ चमचमाते मोती-रत्न भी खिंचकर किनारे आने लगे…मानो समुद्रभी उनकी आधिनता स्वीकार करके, मोती-रत्नों की भेंट रखकर भावी तीर्थंकर का सन्मान कर रहा हो।

दिग्विजय करके वे राजा श्रीवर्मा पुनः नगरी में आये और सुखविलासपूर्वक राज्य करने लगे। एक मोक्ष पुरुषार्थ के अतिरिक्त धर्म, अर्थ और काम यह तीनों पुरुषार्थ उनको सिद्ध हो चुके थे और चौथे मोक्षपुरुषार्थ का उद्यम कर रहे थे।

एक बार शरदऋतु के क्षणभंगुर बादलों को देखकर संसार की क्षणभंगुरता का चिन्तवन करके वे संसार से विरक्त हो गये और श्रीप्रभ मुनिराज के निकट जिनदीक्षा अंगीकार कर ली; रत्नत्रय की आराधनापूर्वक समाधिमरण करके वे राजा श्रीवर्मा सौधर्मस्वर्ग में श्रीधर नामक देव हुए।

❖ ❖ ❖

श्री चन्द्रप्रभ तीर्थंकर का पूर्वभव : चौथा

धातकी खण्ड में अजितसेन चक्रवर्ती

श्री मुनिराज कहते हैं-हे राजा पद्मनाभ ! पहले जो श्रीवर्मा राजा था; वर्तमान में जो पद्मनाभ है और,एक भव बाद जो चन्द्रप्रभ तीर्थंकर होनेवाला है-ऐसा तुम्हारा आत्मा पाँचवे पूर्वभव मे सौधर्म स्वर्ग मे था; वहाँ से चयकर चौथे पूर्व भव में धातकी खण्ड की कौशल नगरी में राजकुमार अजितसेन के रुप मे अवतरित हुआ। उनके पिता का नाम महाराज अजितंजय और माता अजितसेना। गुणवान तेजस्वी पुत्रको देख कर वे अति प्रसन्न हुए। अहा, भावी तीर्थंकर को अपने घरमें देखकर कौन प्रसन्नता का अनुभव नहीं करेगा ?।

अपने चरित्रनायक राजकुमार अजितसेन एकबार राज सभा में बैठे थे . आनन्दमय चर्चा चल रही थी; इतने में उनके पूर्वभव का शत्रु कोई दुष्ट देव वहाँ आया और सभाजनों को मूर्च्छित करके उन राजकुमार का अपहरण कर ले गया।

मूर्च्छा दूर होने पर राजाने घबराकर सभा में देखा तो वहाँ राजकुमार को न देखकर उन्हें चित्तभ्रम हो गया कि अरे, यह क्या हुआ ? राजकुमार कहाँ गया ? उनकी महारानी भी पुत्रके वियोगमें हाहाकार करके रोने लगीं; पुत्र के वियोग से दोनों का संसार नीरस हो गया। अरे, हमारा पुत्र कहाँ चला गया. .अब हम उसे कब देखेंगे ! ऐसी चिन्ता में क्षणभर तो दोनों मूर्च्छित हो गये।

थोड़ी देर में मूर्च्छा दूर होने पर राजाने आँखें खोल कर ऊपर दृष्टि की…तो. .अहा हा ! -उसके आश्चर्य का पार नहीं रहा। उसने देखा कि आकाश में से,एक महान तपस्वी ऋद्धिधारी मुनिराज उनकी ओर आ रहे हैं.. पूर्णिमा के चन्द्र समान उन मुनिराज को देखते ही राजा सब दुःख भूल गयें। मुनिराज ज्यों-ज्यों निकट आते गये त्यों-त्यों राजा के हृदय में आनन्द का सागर उमड़ने लगा.. सच ही है-मुमुक्षु आत्मा, धर्मात्मा का संग होने से दुनिया के दुःख भूल जाता है। उन राजा को अपने प्राणप्रिय पुत्र के वियोग का उतना शोक नही हुआ था जितना मुनिराज के पधारने से सन्तोष और हर्ष हुआ। वास्तव में इतने सन्तोष का अनुभव उसे जीवन मे प्रथम बार हुआ था।

श्री मुनिराज ने राजा को मगल आशीर्वाद दिया और कहा कि-‘हे भव्य ! तुम चरमशरीरी हो।’ अहा, उनके वात्सल्य की क्या बात ! वह वात्सल्यपूर्ण आशीर्वाद लेकर राजा का हृदयकमल आनन्द से खिल उठा। अहा ! मुनि के श्रीमुख से अपने मोक्ष की बात सुनकर किसे आनन्द नही होगा ? । राजाने आनन्दित होकर कहा : प्रभो ! मुझे कल्पना भी नहीं थी कि अभी किन्हीं मुनिभगवन्त के दर्शन होंगे ! जब मै पुत्रवियोगरुपी दुःखसमुद्र मे डूब रहा था और मेरा मन मूढ़ हा गया था उस ठीक समयपर आपके आगमन से तथा दर्शन से मुझे नवजीवन मिला है; आपने मुझे दुःख के सागर से बाहर निकाला है, आप मेरे परम हितैषी बन्धु हो !

श्री मुनिराज ने कहा-हे भव्य ! मै आकाशमार्ग से जा रहा था, तब मैने देखा कि तुम पुत्रवियोग से दुःखी हो रहे हो तुम्हारे गुणो के अनुराग से प्रेरित होकर मै यहाँ आया हूँ। हे राजन् ! तुम तत्त्वज्ञानी हो, तुम्हे स्व-पर का भेदज्ञान है और ससार का स्वरुप जानते हो। तुम्हें इस असार ससार की स्थिति बतलाना वह तो ‘इन्द्र के निकट स्वर्ग का वर्णन’ करने समान है। तथा तुम इसी भव में मोक्षगामी चरम शरीरी हो, इसलिये तुमसे अधिक क्या कहना ? चित्तमे से इष्टवियोग का विषाद दूर करो। हे राजन् ! इस प्रसगपर कायरता छोडकर धैर्य धारण करो और वीरपुरुष की भाँति धर्म मे सावधान होओ।

तथा हे राजन् ! (मुनि कहते हैं -) अवधिज्ञान से जानकर मैं कहता हूँ कि तुम्हारा पुत्र कुशल है, उसका कुछ भी अमगल नही होगा। वह भावी तीर्थंकर है और कुछ ही दिनों में अनेक प्रकार की समृद्धिसहित आकर तुमसे मिलेगा।

इतना कहकर आशीर्वाद देकर मुनिराज आकाश मार्ग से विहार कर गये। मुनिराज के वचनो से राजा का चित्त शांत हुआ और धर्मध्यान मे विशेषरुप से उद्यमी हुआ।

❖ ❖ ❖ दूसरी ओर, जो दुष्ट देव अजितसेन राजकुमार का अपहरण कर ले गया था, उसने उन राजकुमार को मगरमच्छ से भरे हुए एक सरोवर मे फेंक दिया। परन्तु पुण्यप्रताप से राजकुमार किनारे आ गये। चारों ओर घोर जगल था। सिह, बाघ और हाथियोसे भरे हुए उस वनमे चलते-चलते वे एक सुन्दर पर्वत पर पहुँचे। वहाँ हिरण्य नामका एक देव रहता था, वह उनकी शूरवीरता देखकर प्रसन्न हुआ और बोला-हे पुण्यात्मा ! मै आपका सेवक हूँ, इसलिये आपसे कुछ माँगने के लिये तो कैसे कह सकता हूँ ? परन्तु जब आप याद करोगे तब मै आपकी सेवा मे उपस्थित होऊँगा. क्योकि पूर्वजन्म में आपने मुझ पर उपकार किया है।

‘किस प्रकार ?’ ऐसा राजकुमारके पूछने पर उस देवने कहा पूर्वभवमे मै सूर्य नामका किसान था, तब चन्द्र नामके किसानने मेरा धन चुरा लिया था, वह धन आपने मुझे वापिस दिलाया था और चन्द्र को मृत्युदण्ड दिया था। वह चन्द्र मरकर भवमे भटकते भटकते चण्डरुचि नामका असुर देव हुआ है, और वही पूर्व भव के बैर से आपका अपहरण करके आपको यहाँ लाया है। मै जो सूर्य नाम का किसान था वह अब हिरण्यदेव हुआ हूँ और अपने पर किये गये आपके उपकार का बदला देने आया हूँ। ऐसा कहकर, राजकुमार को उस वन के बाहर रखकर वह देव अदृश्य हो गया।

राजकुमारने आश्चर्यपूर्वक एक नगरी में प्रवेश किया; उसका नाम था विपुलनगरी; वहाँ के नगरजन धन-धान्यादि से सुखी थे, परन्तु एक शत्रु राजा के भयसे अत्यन्त भयभीत थे। अजितसेन राजकुमार ने उस राजा को पराजित करके उनके भयको निर्मूल कर दिया और वहाँ की राजकुमारी से विवाह करके अपनी कौशलनगरी लौट आये। प्रतापी पुत्र के पुनरागमन से माता-पिता को अपार हर्ष हुआ। स्नेहपूर्ण स्वागत करके भावी तीर्थराज उन राजकुमार का राज्याभिषेक भी कर दिया। उनके महान पुण्यप्रताप से कुछ काल पश्चात् उनके राजभण्डार में सुदर्शनचक्र तथा तलवार आदि सात अजीव रत्न प्रगट हुए, तथा सेनापति आदि सात जीवरत्न भी उन्हें प्राप्त हुए; इस प्रकार १४ रत्नधारी चक्रवर्ती पद प्राप्त हुआ; और धर्मकी आराधना के प्रताप से अब तीन भव के पश्चात् वे धर्मचक्री होंगे।

१४ रत्नों के उपरान्त नवनिधियाँ भी प्राप्त हुई थीं-जो उन्हें इच्छित सामग्री प्रदान करती थीं। इस प्रकार नवनिधि और १४ रत्न प्राप्त होने पर भी वे धर्मात्मा अपने चैतन्यनिधान में से प्राप्त सम्यक्त्वादि रत्नों के समक्ष उस बाह्यवैभवको तुच्छ समझते थे। वे चक्रवर्ती अजितसेन अपने बंधुजनों सहित प्रतिदिन धामधूमसे अरिहंत देव की पूजा करते और धातकी खण्ड द्वीप के भरतक्षेत्र का छह खंड का राज्य भी सँभालते थे। आश्चर्यजनक भी उनकी परिणति !

एक बार उन अजितसेन चक्रवर्ती की राजधानी कौशल (अयोध्या) नगरी में धर्मचक्री स्वयंप्रभतीर्थंकर का पदार्पण हुआ। ‘प्रभुजी पधारे हैं’ यह सुनते ही चक्रवर्ती को महान हर्षोल्लास हुआ और तुरन्त ही धामधूम से प्रभुदर्शन के लिये चल दिये। साक्षात् तीर्थंकर के दर्शन से भावी तीर्थंकर को कैसा आनन्द हुआ ? कि जैसा आनन्द स्वानुभूति में परमात्मा को देखने से धर्मात्मा को होता है। वैसा यद्यपि दो तीर्थंकरों का मिलन नहीं होता तथापि यहाँ तो, एक ‘भाव-तीर्थंकर’ और दूसरे ‘भावी तीर्थंकर’ (एक वर्तमान भावनिक्षेपरूप और दूसरे द्रव्यनिक्षेपरूप)-ऐसे दो तीर्थंकरों का मिलन हुआ। द्रव्यतीर्थंकर ने भावतीर्थंकर को वन्दन किया।

अहा, उन तीर्थंकररूप सर्वज्ञ परमात्मा की आराधना गणधर और इन्द्र भी करते थे; मनुष्यों के इन्द्र ऐसे चक्रवर्ती भी प्रभुके आराधक थे। वह देखकर लोग समझ जाते थे कि इन्द्रपद या चक्रवर्ती पद के वैभव की अपेक्षा से आत्मा के इस सर्वज्ञ पद का वैभव महान है। उस आत्मवैभव के समक्ष संसार के समस्त वैभव तुच्छ हैं।

अपने चरित्रनायक चक्रवर्ती अजितसेन तथा उनके पिता अजितंजय महाराज भी स्वयंप्रभ तीर्थंकर के दरबार मे प्रभुदर्शन करके जिनवाणी का श्रवण करने बैठे। तीन काल तीन लोक के समस्त पदार्थ जिनके ज्ञान में स्पष्ट झलक रहे हैं ऐसे उन परमात्मा की वाणी में तत्त्वों का अद्भुत स्वरूप आया; और सर्वतत्त्वों मे श्रेष्ठ शुद्धात्मा की अनुभूति ही जीव को मोक्षका कारण है-ऐसा उपदेश प्रभुने दिया।

पश्चात् राजा अजितंजयने हाथ जोड़कर पुछाः हे देव ! इस संसार मे जीव शुभाशुभकार्यों से क्यों बँधता है ? और उनसे कैसे छुटकारा होगा ?

भगवान ने आश्चर्यकारी दिव्यध्वनि द्वारा उसका उत्तर दिया; परन्तु विशेषता यह थी कि भगवान की दिव्य वाणी खिरने पर भी उनके ओष्ठ नहीं हिलते थे; सम्पूर्ण शरीर मे से कोई अद्भुत ध्वनि उठती थी। उसमें भगवान ने कहा-हे भव्य ! जीव का स्वभाव उपयोगमय है; उस उपयोग में क्रोध नहीं है, क्रोधकरनेका उसका स्वभाव नहीं है; तथापि जीव जो क्रोधादि कषायभाव करता है उसके कारण वह पुण्य-पापरूप कर्मोंसे बँधता है; फिर चाहे वह कषाय अशुभ हो या शुभ हो; उन कर्मों के द्वारा संसार भ्रमण करके जीव दुःखी होता है। और जब जैनधर्म पाकर वह उपयोग और क्रोध का भेदज्ञान करता है तब, क्रोध से भिन्न ऐसा शुद्ध उपयोग ही वह करता है; उस शुद्ध उपयोग द्वारा नवीन कर्मों का बंध नहीं होता और पुराने बँधे हुए कर्मों की निर्जरा हो जाती है इसलिये जीव मोक्षसुख प्राप्त करता है। इस प्रकार कषायों द्वारा जीव बँधता है और वीतरागी शुद्धोपयोग द्वारा वह मोक्ष प्राप्त करता है:-

जीव रागी बांधे कर्म को, वैराग्यगत मुक्ति लहे।
ये जिनप्रभु उपदेश है नहिं रक्त हो तू कर्म से।

कषाय और उपयोग की भिन्नता के भेदज्ञान द्वारा जीव को आत्मा के सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र होते हैं। भेदज्ञान होने के पश्चात् भी जब तक जीव स्त्री-पुत्र-परिवारादि के मोह मे फँसकर अव्रती रूप से रहता है तब तक वह सर्व कर्मों से छुटकर मोक्ष प्राप्त नहीं करता। इसलिये संसार-दुःख से भयभीत होने वाले मोक्षार्थी जीव को रत्नत्रयधर्म की पूर्ण आराधना कर्त्तव्य है। चारित्र रहित सम्यग्दर्शन, अथवा सम्यग्दर्शन रहित चारित्र, वह मोक्ष को नही साध सकता। सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र तीनों की सम्पूर्णता ही मोक्षको साधती है। इसलिये वह मुमुक्षु जीव का कर्त्तव्य है।

इस प्रकार जिनेन्द्र देव की वाणी में बँध का तथा मोक्ष का स्वरुप सुनकर, उन राजा अजितंजय का चित्त संसार से विरक्त हो गया; राजपाट छोड़कर उन्होंने साक्षात् मोक्षमार्गरुप श्रामण्य अंगीकार किया और शुद्धोपयोग मे लीन हो गये।

अपने चरित्रनायक चक्रवर्तीको सम्यग्दर्शन तो पहलेसे था; उनके परिणामों मे विशुद्धि हुई, उनका ज्ञानोद्यान खिल उठा; परन्तु चक्रवर्ती पद को छोड़कर वे मुनि नही हो सके। मुनिपद की भावना पूर्वक जिनदेव की वन्दना करके तथा अभी मुनि हुए अपने पिताश्री के चरणों की पूजा करके, भावि तीर्थंकर ऐसे उन चक्रवर्ती ने अपनी कौशलनगरी मे पुनः प्रवेश किया और राज्य का संचालन करने लगे। देश के समस्त राजा-महाराजा उनकी आज्ञाको शिरोधार्य करते थे; मात्र राजा ही नही, किन्तु छह खण्ड में रहनेवाले व्यंतर देवों को भी उन्होंने वश कर लिया था। यद्यपि हजारो देव उनकी सेवा करते थे परन्तु वे स्वयं तो “दास भगवन्तके उदास रहें जगत सो” ऐसा जीवन जीते थे। उन्हे चौदह रत्नोंकी नहीं, चौदह गुणस्थानोंकी इच्छा थी; नवनिधानों में उनका चित्त नहीं लगता था, उन्हे तो नव क्षायिकलब्धि की आकांक्षा थी।

[हम पढ़ रहे हैं चन्द्रप्रभ तीर्थंकर की कथा-और उसमें उनके चौथे भव के यह वर्णन चल रहा है-जिसमें वे अजितसेन नामके चक्रवर्ती हैं।]

भावी भगवान ऐसे वे अजितसेन चक्रवर्ती छह खण्ड की दिग्विजय करने पर भी अंतर में अपने अखण्ड चैतन्यतत्त्वको नहीं भूले थे। छह खण्ड की प्रजा के हृदय में बसने पर भी उनके हृदय में तो पंचपरमेष्ठीका ही निवास था… बाह्य में पंचेन्द्रिय-विषयोंकी पूर्णता होनेपर भी उनसे उनका चित्त विरक्त था, वह तो पंच परमपद की पूर्णता को साधने में अनुरक्त था। गृह-स्थ होने पर भी उनकी चेतना तो चैतन्यस्थ थी, इसलिये गृही होनेपर भी वे मोक्षमार्गी थे। अब मात्र तीन भव के पश्चात तो वे तीर्थंकर होकर सिद्धालय में पहुँचने वाले थे।

उन आत्म साधक धर्मात्माको चक्रवर्तीपद का अभिमान नहीं था; देव गुरु के प्रतिपरम विनय बहुमान उनके चित्तमें सदैव जागृत रहते थे। भोजन के समय महल से बाहर आकर प्रतिदिन मुनिवरोंकी प्रतीक्षा करते थे। एक बार अरिन्दम मुनिराज के पधारनेसे उन्हे भक्तिपूर्वक आहारदान दिया… वहाँ देवोंने रत्नवृष्टि आदि पंचाश्चर्य प्रगट किया।

राजसभा में चक्रवर्तीकी वैराग्य भावना

एक दिन चक्रवर्ती अजितसेन राजसभा में बैठे हैं; हजारो राजा मुकुट झुकाकर उनका अभिवादन कर रहे हैं; नगरजन भी उनके दर्शनों से प्रसन्न हो रहे हैं; तथापि चक्रवर्ती की दृष्टी इस राज्य से पार किसी अमूल्य निधान पर लगी है… उनके अंतर की गहराई में वैराग्य का चिन्तन चल रहा है की कब इससब उपाधिसे छूटकर निरुपाधि चैतन्य ध्यान में स्थिर होऊँ ! कब वनवासी मुनि होकर वीतराग भाव में विचरूँ !!

राजसभा व्यस्थित चल रही थी; इतने में राजाकी दृष्टी प्रांगण में एक भव्य हाथी पर पड़ी; उस विशालकाय हाथी को कुछ योद्धा अनेक प्रकारसे ताड़ना देकर युध्द की शिक्षा दे रहे थे। चारो ओर शस्त्रप्रहार की प्रतिकुलता के बीच किस प्रकार बहादुरीसे लड़ना वह सिखा रहे थे। वह देखकर राजा को लगा कि- अरे, इस दुःखमय संसार में चारो ओर की प्रतिकुलता में भी शूरवीरतापूर्वक आत्मसाधनमें किस प्रकार विजय प्राप्त करना - उसकी शिक्षा परमगुरु भव्य मुमुक्षुओंको देते हैं… और उसमें मुमुक्षुको आनन्द होता है। यह युध्द की शिक्षा हाथी को ताड़ना है। हाथी की वह ताड़ना देखकर राजा का चित्त संसार से अत्यन्त उदास हुआ। इतने में उस हाथी ने एक सिपाही को सूँढ़ में जकड़ लिया और पछाड़ पछाड़कर उसका चूरा कर दिया .. बस, जीवन की ऐसी क्षण भंगुरता देखकर और हाथी की ताड़ना देखकर महाराजा अजितसेन का चित्त अत्यन्त विरक्त हो उठा और वैराग्य से वे चिन्तवन करने लगे कि - अरे, यह संसार तो घोर दुःखोंसे भरे हुए गहरे कुएँ जैसा है; उसमें यह मनुष्य जीवन बिजली की चमक जैसा अस्थिर है। यह शरीर, धन, यौवन, परिवार या राज्य कोई जीव के साथ रहने वाले नहीं हैं; वे जीव के है ही नहीं, तथापि उनमें मोह कर-करके जीव संसार में फँसा रहता है। ’ आज यह करना है, कल वह करूँगा, फिर वह करना है. ’ इस प्रकार परायी चिन्ता में ने चिन्ता में वह मृत्यु को भुल जाता है कि मैं आज मरूँगा या कल मरूँगा !-

करिष्यामि करिष्यामि करिष्यामि इति चिन्तया !
मरिष्यामि मरिष्यामि मरिष्यामि इति विस्मृतम् !!

‘करूँगा .. करूँगा… करूँगा…’ ऐसी चिन्ता में लीन हुआ मूढ़ जीव 'मरूँगा… मरूँगा… मरूँगा… ’ यह बात तो भूल ही जाता है ! मानो मृत्यु कभी आना ही न हो - इस प्रकार निश्चिन्ततासे मुर्ख जीव बाह्य विषयों में लगा हुआ है और मनुष्य जीवन गवाँ रहा है।

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भगवान चन्द्रप्रभ (भाग २)

विरागी चक्रवर्ती चिन्तवन करते है कि- अरे रे ! सत्पुरुषोंने जिनका निषेध किया है ऐसे पापोंसे मूढ़ जीव डरता ही नहीं है; नरकादि के घोर दुखोंका भी उसे भय नही है और इन्द्रियविषयों तथा क्रोधादि कषायों में वह फँस रहा है। संसार में बन्धु-बाँधव सब धन के साथी हैं, धर्म में साथ देने वाले धर्मात्मा तो कोई विरल ही होते हैं।

अरे, इस छह खण्ड के परिग्रह में सुख कहाँ है ? वह तो सब कर्म का फल है। क्रोधादि कषायों से सुलगते हुए इस संसार-दावानल में जीव जल रहा है; शांत वीतरागी ज्ञानजल से सींचने पर ही उसे शान्ति होगी।

इस प्रकार निजस्वभाव के वीतरागी चिन्तन द्वारा चक्रवर्ती कहते हैं - हे सभाजनो ! मेरा चित्त अब इस संसार से विरक्त हुआ है। संसार में ऐसे कोई इन्द्रियविषय शेष नहीं रहे जिन्हें यह जीव न भोग चुका हो। परन्तु उन विषयो से कदापि तृप्ति नही होती; वीतराग भाव द्वारा ही जीवको सच्चा अतीन्द्रिय सुख - शान्ति एवं तृप्ति का अनुभव होता है। उस सुख के लिये वीतरागी सत मुझे पुकार-पुकार कर मोक्ष मे बुला रहे है। जिन मार्ग के प्रताप से मैंने अपने चैतन्य सुख की प्रतीति कर ली है और विषय-भोगो के चित्त को विमुख कर लिया है। मेरी वृत्ति अब अन्तरोन्मुख हो रही है। संसाररूपी लता को छेदने के लिये अब मै शुद्धोपयोग रूपी तलवार धारण करता हूँ। चक्रवर्ती का चन्द्रहास खड्ग बाहरी शत्रुओं पर भले विजय प्राप्त कर ले परन्तु अंतर के क्रोधरूपी शत्रुको वह कहाँ जीत सकता है ? समताभाव रूपी वीतरागी खड्ग द्वारा अब मै क्रोध शत्रुपर विजय प्राप्त करके अपना मोक्ष साम्राज्य प्राप्त करूँगा। बड़ी कठिनाई से प्राप्त हुआ यह मनुष्यभव, उसमे जो आत्महित नही साधते वे मूर्ख अज्ञानी जीव पुन ससार समुद्रमे डूबते है। पुण्य के फलरूप इन सासारिक सुखो की प्रशसा मूर्ख लोक ही करते है, वास्तव मे तो वे विषाक्त मिष्टान्न जैसे है। जिस प्रकार मै यहाँ शत्रुओ को जीतकर चक्रवर्ती हुआ हूँ उसी प्रकार अब मुनिदशा मे समस्त पर भावरूप शत्रुओ को परास्त करके धर्म चक्रवर्ती बनूँगा और अखण्ड मोक्षसाम्राज्य को प्राप्त करके सदा आत्मा के शुद्ध स्वरूप मे निवास करूँगा।

वाह ! चक्रवर्ती की उस भावना को सभाजन मुग्ध होकर सुन रहे है और वैराग्यरस मे निमग्न हो रहे है मानो महान धर्मसभा चल रही हो। वैराग्य परायण भावी तीर्थंकर महात्मा अजितसेन कहते है - इस पुत्र परिवार एव छह खण्ड के वैभव की अपेक्षा मुझे वन-जगल मे चारित्रवैभव से अधिक सुख मिलेगा। मै हेय-उपादेय का ज्ञाता, जन्म-मरण से भयभीत मुक्त जीवो की रत्नत्रय सम्पत्ति का हृदय से अभिलाषी, - मै भी यदि विषयो मे आसक्त रहा और इन्द्रिय विषयो की सेनाको जीतकर मोक्ष को नही साधा तब तो मुक्तिकन्या कुँवारी ही रह जायगी ! (यदि मुमुक्षु जीव मुक्ति सुन्दरी का वरण नही करेगे और विषय-भोगो मे ही आसक्त रहेगे तो फिर कौन मुक्ति का वरण करेगा ?) बस, आज ही मै इस राजलक्ष्मी का मोह छोड़कर, मुक्तिरमा का वरण करने हेतु तपोवन मे प्रयाण करूँगा और अपने आत्मा को मोक्ष की साधना मे लगाऊँगा। बुद्धिमान पुरुष अपने हितके अवसर मे आलस्य नही करते।

राजसभा मे चक्रवर्ती अपने वैराग्य की घोषणा कर ही रहे थे इतने मे क्या हुआ ? वह अगले प्रकरण में पढिये।

श्री मुनिराज का आगमन और चक्रवर्ती की दीक्षा

अपने चरित्रनायक भगवान चन्द्रप्रभ का जीव पूर्वके चौथे भवमे अजितसेन चक्रवर्ती है; वह वैराग्य प्राप्त करके राजसभा मे तपोवन मे जाने के अपने निश्चय की घोषणा करता है…इतने मे… उद्यान का माली हर्षपूर्वक राजसभा मे आकर सूचित करता है कि - हे महाराज ! गुणप्रभ नामके महा गुणवान आचार्य संघसहित अपने नगर के उद्यान मे पधारे है, उनके आगमन से सारा उद्यान फलफूलों से खिल उठा है। चारों ओर मानो कोई अद्भुत चमत्कार हो रहा है !

वाह ! राजा जो चाहते थे वही सामने आ गया ! यह शुभ समाचार सुनकर वे अत्यन्त हर्षित हुए…अहा, मानो वे मुनि भगवन्त उन्हे मोक्ष मे ले जाने के लिये ही पधारे हों। - ऐसी प्रसन्नतापूर्वक अपना रत्नहार उतारकर उन्होंने माली को दे दिया और आचार्य महाराज को परोक्ष नमस्कार किया - अहो प्रभो ! आज आपके मंगल आगमन से मैं कृतार्थ हुआ ..मैं जिसका चिन्तवन करता था वह परमश्रेष्ठीपद सामने चलकर मेरे आँगन में आ गया . मुझे चिन्तामणि प्राप्त हुआ ! - इस प्रकार अति प्रमोदसहित वे चक्रवर्ती महाराजा नगरजनों के साथ मुनिराज के दर्शन हेतु तपोवन की ओर चले। विदेह में भटकता हुआ व्यक्ति स्वदेश मे आकर प्रसन्न हो जाता है, उसी प्रकार विभावों मे से स्वभाव के साधक साधुजनों के सत्संग में आने पर उन चक्रवर्ती को अति प्रसन्नता हो रही थी।

वाह ! महात्मा का सद्भाग्य तो देखो ! पहले चक्रवर्ती पद में इच्छित सामग्री प्राप्त होती थी, अब मोक्षसाधन हेतु चिंतित साधन स्वयमेव प्राप्त हो रहे हैं। वास्तव में, मोक्ष के साधक को सारा विश्व अनुकूल ही परिणमित हो रहा है, उसे जगत में कोई प्रतिकूलता है ही नहीं।

महाराजा अजितसेन तपोवन में पहुँचे…दृष्टि डालते ही मुग्ध हो गये। अहाहा ! जहाँ देखो वहाँ मुनि…मुनि ! कोई ध्यान में लीन हैं, कोई स्वाध्याय में मग्न हैं…कोई धर्मचर्चा करके भव्य जीवों को अपूर्व चैतन्यतत्त्व बतला रहे हैं। चारों ओर मानो रत्नत्रय मोक्षमार्ग का वातावरण छा गया है। कषायों का या विषयों का तो नामनिशान भी वहाँ नहीं है। अहा, यह तो पंचपरमेष्टि की वीतराग नगरी बस गई है…और मैं भी अब संसारनगरी से छूटकर इस वीतराग नगरी में पंचपरमेष्ठी भगवंतों के साथ रहने आ गया हूँ ! अहा, कैसी अपूर्व शान्ति है इस नगरी में ! इस प्रकार राजा को अपूर्व आह्लाद हुआ।

एक ओर आचार्य श्री गुणप्रभस्वामी ध्यान में स्थिर थे। अहा, कैसी शांत मुद्रा ! मोक्षमार्ग में कैसी शान्ति होती है वह उनकी मुद्रा दरशा रही थी; वचन के बिना भी उनकी मुद्रा वचनातीत शान्ति की प्रतीति कराती थी। चक्रवर्ती उनके सन्मुख बैठकर चैतन्य की अपार महिमापूर्वक मुनिजीवन की भावना करने लगे कि - ‘बस, अब मैं भी ऐसा मुनि बनूँगा और मुनिवरो के साथ रहकर आत्मसाधना करूँगा।’

मुनिवरों का आश्रम परम शांत है। चारों ओर वीतरागता छा रही है। वृक्ष भी हर्षसे प्रफुल्लित हो रहे हैं। पशुपक्षी शांत होकर मुनिचरणों में बैठ गये है .और उत्सुकता से उनकी मुद्रा को देख रहे हैं। जीव-जन्तुओं का कोई उपद्रव नही है। गाय का बछड़ा सिंहनी का दूध पी रहा है और सिंहन का बच्चा गाय को माता समझकर उसका स्तनपान कर रहा है; किसी को किसी का भय नही है. सर्प और नेवला, शेर और खरगोश - सब वैरभाव छोड़कर हिलमिलकर बैठे है। शांत-शीतल वन की अद्भुत शोभा खिल रही है। मानो समवसरण ही हो - इस प्रकार जीवों में सर्वत्र रत्नत्रय धर्म का विस्तार हो रहा है। सब जिनमार्ग में गमन हेतु तत्पर है…मोक्ष की साधनामें लीन हैं। संसार तो मानों कहीं दूर दूर चला गया है!

कुछ काल पश्चात् निर्मोही आचार्य महाराज का ध्यान समाप्त हुआ .उन्होने नेत्र खोले.. राजाने वन्दना की। मुनिराज ने प्रसन्नदृष्टि से धर्मवृद्धि का आशीर्वाद दिया। राजाने स्तुति करते हुए कहा :-हे प्रभो ! जो बुद्धिमान पुरुष आपके स्वरुप का क्षणभर चिन्तन करता है उसके भी परिणाम विशुद्ध हो जाते हैं, तब फिर आपके साक्षात् दर्शन की तो बात ही क्या ! जिस प्रकार चैतन्य-परमतत्व का स्मरण भी मोह का नाश करके शान्ति प्रदान करता है तब उस चैतन्य के साक्षात् अनुभव के आनन्द का तो क्या कहना ! प्रभो, आज आपके दर्शनों से मैं कृतार्थ हो गया। मै मुनिदशा की भावना भा रहा था, इतने में आपकी साक्षात् प्राप्ति हुई .मानो मुझे साक्षात् रत्नत्रय मिल गये ! मिथ्यात्व-अंधकार मे डूबा हुआ यह जगत आपकी ज्ञानकिरणों द्वारा ही सम्यक मार्ग पाता है। अधोगति में गिरे हुए जीवों को आप ही शरण हैं और मोक्षमहल में जाने के लिये आप ही सोपान हैं। अरे, ऐसा कौन अभागा जीव होगा जो आपको पाकर भी धर्म को अंगीकार नहीं करेगा ?

इस प्रकार हर्षोल्लाससे मुनिराज की स्तुति करते हुए चक्रवर्ती कहते हैं कि - प्रभो ! आपके मार्ग को अंगीकार करते ही भव-भव के पाप क्षणभर मे दूर हो जाते हैं। अन्य कुमार्गों का दीर्घकाल तक सेवन करके भी जीव जिस मुक्ति को नहीं देख पाते, वह मुक्ति आपके दर्शन से क्षणभरमें निकट आती है और जीवको आनन्दित करती है। मोक्षलक्ष्मी की प्राप्ति में शत्रु ऐसे क्रोध-मान-माया-लोभ को आपने जीत लिया है, इसलिये आप जिन हो। इस प्रकार विनयपूर्वक स्तुति करके वे वैराग्यवान राजा मुनिराज के समीप धर्मश्रवण करने बैठे।

गुणप्रभ मुनिराज और अजितसेन चक्रवर्ती दो महात्माओं के मिलन से तपोवन मे धर्म का गम्भीर वातावरण छा रहा था। हजारों सभाजन उन दोनों की धर्मचर्चा सुनने को आतुर हो रहे थे। श्री मुनिराज ने कहा - देखो, जगत में, राजपद तो अनेकों को मदका कारण बनता है परन्तु आश्चर्य है कि इन भव्यात्मा के पास चक्रवर्ती का राजवैभव होने पर भी इन्हें राज का मद नहीं है और धर्म के प्रति इनकी नम्रता प्रशंसनीय है। तथा शुद्ध सम्यक्तवादि गुणों से सुशोभित हैं। इन्हें छह खण्ड प्राप्त करने की इतनी चिन्ता नही थी जितनी मोक्ष साधने की है। इन्हे संसारसुख की चाह नही है, इन्हे तो मोक्षसुख की ही आकाक्षा है,-इतना ही नही, यह महात्मा एक भावी तीर्थंकर हैं और चौथे भवमें भरतक्षेत्र में चन्द्रप्रभ तीर्थंकर होंगे।

मुनिराज की अद्भुत बात सुनकर सबको हार्दिक प्रसन्नता हुई; सब जन आश्चर्य से उन भावी तीर्थंकर के दर्शन करने लगे। तब अत्यन्त नम्रीभूत होकर उन अजितसेन चक्रवर्ती ने कहा : हे स्वामी ! आपकी महान कृपा पाकर मैं धन्य हो गया। प्रभो ! मुनि होने का मेरा मनोरथ है; प्रसन्न होकर मुझे जिनदीक्षा दें और मेरा मनोरथ पूर्ण करें। इस भरतक्षेत्र का छोटा राज्य छोड़कर अब मैं तीन लोक के ज्ञान से भरपूर सर्वज्ञता का साम्राज्य प्राप्त करने के लिये रत्नत्रय से शोभायमान शुद्धोपयोग रूप धर्मचक्र को धारण करूँगा।

अजितसेन चक्रवर्ती के उत्तम वैराग्य भाव जानकर श्री आचार्य महाराजने उन्हें जिनदीक्षा दी। चक्रवर्ती पद छोड़कर उन्होंने दिगम्बर दशा धारण की और आत्मध्यान द्वारा शुद्धोपयोगी होकर आत्मा को रत्नत्रयरूप परिणमित किया। धन्य वे मुनिराज ! लोग आश्चर्य से उन्हें निहार रहे थे। छह खण्ड के परिग्रह को क्षणभर में छोड़कर अपरिग्रही हुए उन मुनिराज के चरणों में देव भी नमस्कार करने लगे। जो हजारों देव पहले चक्रवर्ती राजा के रुपमें उनकी सेवा करते थे, वे देव अब परमेष्ठी के रुप में पूजने लगे।

जिनमुनि होकर उन महात्मा ने उग्र आत्मसाधना प्रारम्भ कर दी। ध्यान चक्र का मोह पर प्रहार करके पहली ही बार में शेष बचे बारह में से आठ कषायों को नष्ट किया और अन्तिम चार को भी मरणासन्न स्थिती में ला दिया। वे सहज तप करते, स्वाध्याय में रत रहते, उपसर्गों को धैर्य से सहन करते, परीषह में भी आत्मसाधना से च्युत हुए बिना मोक्षमार्ग में निश्चल रहते: उनको मरणादि सम्बंधी कोई भय नहीं था। घोर ग्रीष्म हो, शीत हो, या वर्षा हो, क्षुधा हो या तृषा हो,-उनका शुद्धोपयोग एकसमान रहता था। उनका चित्त स्वकार्य मे ही लीन था। अनित्य, अशरणादि बारह वैराग्य भावनाओं के चिन्तन में उनका चित्त सदा तत्पर रहता। इस प्रकार छह खण्ड छोड़कर अखण्ड चैतन्य की साधना पूर्वक समाधिमरण करके वे (चन्द्रप्रभ तीर्थंकर के आत्मा, अजितसेन चक्रवर्ती की पर्याय छोड़कर) अच्युत स्वर्ग में इन्द्ररुप से ‘शांतकार’ विमान में उत्पन्न हुए। वे शांतिमूर्ति जीव अपूर्व आत्मशान्तिसहित जिस विमान मे उत्पन्न हुए उसका नाम भी शांत-कार था। प्रकृति का कैसा सुयोग ! स्वर्गलोक के दिव्यवैभवों में आसक्त हुए बिना उन महात्माने अपनी आत्मसाधना को असंख्य वर्षों तक अखण्ड रखा। तत्पश्चात् वे आराधनासहित कहां अवतरित हुए ? वह अब सुनो।

चन्द्रप्रभ तीर्थंकर का पूर्वभव (दुसरा) पद्मनाभ राजा

श्रीधर मुनिराज पद्मनाभ राजा को उनके पूर्वभवों की यह कथा सुनाते हुए कहते हैं कि-हे भव्य ! उस अच्युत स्वर्ग से चयकर तुम्हारा आत्मा यहाँ रत्नसंचयपुर में पद्मनाभरूप में उत्पन्न हुआ है; अब इस भव में तीर्थंकर प्रकृति बाँधकर एक भव पश्चात् तुम भरत क्षेत्र में चन्द्रप्रभ तीर्थंकर होगे।

मुनिराज ने विशेष कहा-हे राजन् ! आजसे दसवें दिन तुम्हारी नगरी में एक विशाल उन्मत्त हाथी आकर उपद्रव करेगा; वह उपद्रव तुम्हारे निमित्त से शांत होगा और उस घटना से तुम्हें इन सब बातों का विश्वास दृढ़ होगा।

अहा, मुनिराज के श्रीमुख से अपने पूर्वभवों की आत्मसाधना की ऐसी सुन्दर बात सुनकर तथा अब एक ही भव के पश्चात् तीर्थंकर होकर मोक्ष जाने की मधुर बात सुनकर उन पद्मनाभ राजा का चित्त हर्ष से रोमांचित हो गया; हजारो श्रोताओं में आनन्दोल्लास का वातावरण छा गया और सर्वत्र हर्षमय उत्सव होने लगा। पद्मनाभ राजाने मुनिराज के समक्ष श्रावक के व्रत अंगीकार किये; और भक्तिपूर्वक पुनः पुनः प्रणाम करके वे अपनी राजधानी में लौट आये। अब वे अपनी आत्मसाधना में किस प्रकार आगे बढते हैं वह हम देखे।

वे धर्मात्मा और पुण्यवान राजा पद्मनाभ किसी के सिखाये बिना ही पंचपरमेष्ठी के प्रति स्वाभाविक विनयवान थे; उनका ज्ञान इन्द्रियो को जीतकर मात्र अतीन्द्रिय आत्मा के साथ ही प्रेम करता था; आत्मा के अतिरिक्त अन्य कोई विषय उनको प्रिय नहीं थे। वे व्रतपूर्वक विद्याभ्यास करते और अध्यात्मविद्यासहित सर्व विद्याओ मे अत्यन्त कुशल थे। जिनेन्द्र उपासना के साथ ही अनेकान्तरूप जिनविद्या की भी सम्यक् रूप से उपासना करते थे, मुनिजनों को भक्तिपूर्वक आहारदान देते और उनका सत्संग करते थे विद्वानो का सन्मान करते थे, वे बारम्बार आत्मध्यान करते और निरंतर परमात्म तत्त्व की भावना मे रहते थे।

अभी-अभी श्रीधर मुनिराज के श्रीमुख से अपने सात भवो की उत्तम कथा सुनकर राजा पद्मनाभ को अति प्रसन्नता हो रही थी अहा ! अपने मोक्ष की बात सुनकर किसे हर्ष नही होगा ? राजा पद्मनाभ आनन्दपूर्वक धर्माराधनसहित जीवन बिताते हैं, मुनिराज की कही हुई बात पुन पुन स्मरण करते है। चक्रवर्तीपद या इन्द्रपद की विभूति भी यह जीव पूर्वभव में प्राप्त कर चुका है, तो इन राजभागों की क्या बिसात ?-ऐसे वैराग्य परिणाम करते है।

इस बात को नौ दिन बीत गये; दसवे दिन नगरी मे अचानक कोलाहल मच गया और 'बचाओ बचाओ ’ की पुकारे आने लगी; हाथी-घोड़े भी भयसे चिल्ला-चिल्ला कर भागने लगे। क्या हुआ क्या हुआ ? इस प्रकार चारो ओर से टेरें आने लगी।

इतने मे राजाने देखा कि एक विशाल अति सुन्दर गजराज नगर की ओर दौड़ता आ रहा है, वह मदोन्मत्त होकर भाग रहा है और जो चपेट मे आये उसे सूँड मे कसकर फेक रहा है या पैरो से कुचल रहा है। लोग भयभीत होकर कोलाहल कर रहे हैं। उस हाथी को देखकर राजा को मुनिराज की बात का स्मरण हुआ, उनके कहे अनुसार ही हो रहा था। मन में मुनिराज को नमन किया और हाथी को वश में करने के लिये कटिबद्ध हुए। उन्होंने युक्तिपूर्वक हाथी को वश में कर लिया। हाथी भी मानो पुण्यवन्त राजा को पहिचान गया हो इस प्रकार शांत होकर उनकी आज्ञा मानने लगा। उस पर बैठकर राजा पद्मनाभ नगरी मे आये और नगरजनों ने विजयोत्सव के रूप मे उनका भव्य स्वागत किया। हाथी भी सूँढ़ उठा-उठा कर सबको प्रणाम कर रहा था मानो नगरजनों से क्षमायाचना कर रहा हो। उस हाथी का नाम ‘वनकेलि’ था। राजा को पुण्ययोग से ऐसे गजराज की प्राप्ति हुई। अब वह हाथी ही उनको महा वैराग्य का निमित्त होगा।

एक बार महाराज पद्मनाभ राजसभा मे बैठे थे, इतने मे पृथ्वीपाल राजा की ओर से एक राजदूत आया और नमस्कार करके कहने लगा कि-हे महाराज ! हमारा प्रिय गजराज ‘बनकेलि’ आपके राज्य की सीमामें आया है और आपने उसे पकड़ कर अपनी सवारी के लिये रख लिया है। हम तो मानते थे कि आप हमारे हाथी को सम्मान पूर्वक हमें लौटा देंगे; उसके बदले आपने हमारे हाथी को अपना समझकर रख लिया है, ऐसा करके आपने हमारे राजा का अपमान किया है; अब आप उस हाथी को वापिस दे जाइये।

दूत के कथन में गर्भित रूप से धमकी थी। राजा पद्मनाभ समझ गये कि राजा पृथ्वीपाल युद्ध के लिये ललकार रहा है; परन्तु उन धीर-गम्भीर पुरुष का चित्त किंचित् व्याकुल नही हुआ। दूत को उत्तर देने के लिये उन्होंने युवराज की ओर आँख का संकेत किया।

कुशल युवराज सुवर्णनाभ पिता के भाव को समझ गया; उसने दूतको सम्बोधन कर कहा-हे दूत ! ऐसे वचन तू ही कह सकता है, क्योकि तू दूत है; दूसरों के द्वारा मुँह में भरे गये शब्द ही तू बोल सकता है। सुन, तेरे राजा चाहे जितने शक्तिशाली हों, परन्तु उनका अभिमान ही उनका विनाश करेगा। क्या तेरे राजा के पास दूसरे हाथी नहीं हैं कि इस हाथी की भीख माँगने के लिये तुझे भेजा है ? जब तुम्हारा हाथी पागल होकर हमारे प्रजाजनो को कुचल रहा था तब कहाँ गया था तेरा राजा ? उस समय हमारे महाराजा ने महान पराक्रम से उस हाथी को जीतकर वशमें किया है। हमारे पुण्ययोग से ही वह हाथी हमारे नगर मे आ पहुँचा है। पुण्ययोग से प्राप्त हुई हमारी वस्तु को छीन लेने का तुम्हे क्या अधिकार है ?-इस प्रकार उलाहना देकर दूत को लौटा दिया।

हाथी नहीं लौटने से दोनों राजाओं में युद्ध की तैयारी होने लगी। युद्ध के लिये प्रस्थान करते समय भी धर्मात्मा पद्मनाभ अपनी आत्मसाधना को नहीं भूले थे। प्रतिदिन प्रातः राग द्वेषरहित चिदानन्दतत्त्व की अंतर मे आराधना करते थे। पचपरमेष्ठी भगवंतों को अंतर में विराजमान करके उनके वीतरागी स्वरूप का चितन एव बहुमान करते थे। मार्ग में कही वन-पर्वत में किन्हीं मुनिराज के दर्शन प्राप्त हों तो उन्हे परम हर्ष होता था और भक्तिपूर्वक आहारदान देते थे। किंचित् मानकषाय के कारण युद्ध करने जा रहे थे, तथापि कषायरहित आत्मशान्ति भी साथ थी। सचमुच उन महात्मा का जीवन अनोखा था। रात्रि को सेना के वीर पुरुषो से मात्र युद्ध नही, धर्म की चर्चा भी करते थे। उनकी चेष्टा सेना को भी मुग्ध करती थी। सायकाल जब सामायिकयोग मे निश्चल होकर बैठे हो तब ऐसा लगता था कि यह तो राजा है या योगी ? कभी सेना के पड़ाव मे घूमकर और लोगो मे हिलमिलकर वे सेना को प्रसन्न करते थे, इतना ही नहीं, उन्हे देखकर सेना के हाथी-घोडा आदि भी आनन्दित होकर हर्षनाद करते थे।

इस प्रकार वन की प्राकृतिक शोभा देखते-देखते सेना आगे बढ़ रही थी। एक बार एक मनोहर पर्वत की तलहटी मे पड़ाव डाला। उस पर्वत से अनेक मुनिवरों ने निर्वाण प्राप्त किया था। ऐसा शांत-निर्वाण धाम देखकर राजा को हर्ष हुआ और कुछ दिन वहाँ शांतिपूर्वक रहने का विचार किया। इस बीच राजा पृथ्वीपाल के गुप्तचरों ने राजा को मूचना दी कि राजा पद्मनाभ युद्ध के लिये आ रहे हैं और उनके साथ विशाल सेना है।

यह सुनते ही राजा पृथ्वीपाल क्रोध से आगबबूला हो गया और तुरन्त अपनी सेना लेकर पद्मनाभ से युद्ध करने चल पड़ा। जिस प्रकार जिनेन्द्रदेव की दिव्यध्वनि के नाद से मुमुक्षु की वीरता जाग उठती है उसी प्रकार रणभेरी के नाद से योद्धाओं की वीरता जाग उठी; घोड़े हिनहिनाने लगे और हाथी पृथ्वीपर सूँड़ पछाड़ते हुए चिंघाड़ने लगे। आत्मसाधना के अवसर पर वीर मुमुक्षु हर्ष से रोमाचित हो जाता है उसी प्रकार युद्ध की तैयारी देखकर वीर योद्धा शौर्य से रोमांचित हो रहे थे। युद्ध तो मात्र एक हाथी के लिये हो रहा था ! -हाथी तो मात्र निमित्त था, वास्तव में तो दोनों राजाओ के मानकषाय का युद्ध था। उस समय भी राजा पद्मनाभ की ज्ञानचेतना मानकषाय से अलिप्त रहकर मोक्षको साध रही थी। धर्मात्माओं की यही विशेषता है कि किसी भी प्रसंग में उनकी ज्ञानचेतना मोक्षसाधना का कार्य नहीं छोड़ती और संसार को बढ़ने नहीं देती। (पाठको ! तुम्हे याद होगा ही कि राजा पद्मनाभ ही अपने चन्द्रप्रभ तीर्थंकर का आत्मा हैं।)

दोनों राजाओं की सेना युद्ध के लिये आमने-सामने आ गयी। जिस प्रकार मुमुक्षु मोक्ष के लिये शरीर तथा संसार का मोह छोड़ देता है, उसी प्रकार युद्ध के लिये तत्पर उन योद्धाओं ने शरीर का तथा स्त्री का मोह छोड़ दिया था। कितने ही योद्धाओं ने बख्तर-कवच पहने, तो कितने ही योद्धाओंने ऐसा मानकर वे नहीं पहिने कि पुण्यरूपी कवच ही हमारी रक्षा करेगा, फिर दूसरे कवच की क्या आवश्यकता ?

राजा पद्मनाभ के सेवकों ने ‘वनकेलि’ गजराज को खूब सजाया था। सबकी दृष्टि उसी पर लगी थी जिसके लिये यह युद्ध हो रहा था। गजराज ‘वनकेलि’ भी मानो अपने सन्मान से प्रसन्न हो रहा था।…और जब राजा पद्मनाभ (एक भावी तीर्थंकर) उसपर आरूढ़ हुए हों, तब उसकी शोभा का क्या कहना ? वह गजराज पहले तो रणमैदान में अपने पूर्वपरिचित राजा पृथ्वीपाल को तथा अन्य हाथियों को देखकर, अर्जुन की भाँति चौंका; परन्तु राजा पद्मनाभ ने उसके मस्तक-पर प्रेमपूर्वक हाथ फेरकर उसे थपथपाया और शांत किया, तब वह उनकी आज्ञानुसार वर्तने लगा।

दोनों सेनाओं मे युद्ध प्रारम्भ हो गया। यद्यपि राजा पृथ्वीपाल शूरवीर था, बुद्धिमान था, परन्तु उस समय क्रोध ने उसकी चेतना पर प्रभुत्व जमा लिया था; उसे युद्ध के सिवा कुछ भी सूझता नहीं था। युद्ध में कितने ही मरे, कितने ही घायल हुए; घोर संग्राम चला; परन्तु विशेषता यह थी घायल होकर गिरे हुए योद्धा पर कोई पुन. प्रहार नहीं करता था; इतना ही नहीं; कभी कभी तो मृत्युशय्या पर पड़े हुए योद्धा को उसे मारनेवाला योद्धा ही धर्म ( नमस्कार मंत्र ) सुनाता था और पानी पिलाता था। इसप्रकार दोनो योद्धा शत्रुता के सस्कार को भूल जाते थे।

अचानक पृथ्वीपालके सेनापति चन्द्रशेखरने पद्मनाभके सेनापति भीमरथ को मस्तक मे बाण मारकर मूर्च्छित कर दिया। जब तक वह मूर्च्छित रहा तब तक सामने वाले सेनापति ने युद्ध रोक दिया। थोड़ी देर बाद उसकी मूर्च्छा दूर हुई और जिस प्रकार अचेत मुमुक्षुवीर की चेतना सद्गुरु के वचन से जागृत हो उठती है और मोक्षका पराक्रम करके वह मोह को जीत लेता है, उसी प्रकार भीमरथ की चेतना जाग उठी और घोर पराक्रम द्वारा उसने सेनापति चन्द्रशेखर को बाण से बेध डाला। उसकी तत्काल मृत्यु हो गई।

पृथ्वीपाल का सेनापति मरते ही उसकी सेनामे हाहाकार मच गया…तुरन्त ही उसका युवराज युद्ध करने आ गया। परन्तु वीर युवराज सुवर्णनाभने उसे युक्तिपूर्वक जीवित ही बन्दी बना लिया।

सेनापति चन्द्रशेखर के मरने और युवराज सुवर्णनाभ के बन्दी होने से पृथ्वापाल क्रोधित होकर स्वयं युद्ध करने को तैयार हुआ। वह अपने हाथी को राजा पद्मनाभ के पास ले गया और शस्त्रप्रहार किया। राजा पद्मनाभ तो तैयार थे ही, उन्होने बड़ी सावधानी से पृथ्वीपाल के शस्त्र का वार चुका दिया और अपने हाथी वनकेलि को पृथ्वीपाल के हाथी से टकराकर ऐसा शस्त्र प्रहार किया कि पृथ्वीपाल का मस्तक पृथ्वी पर लौटने लगा।

बस, राजा पृथ्वी पाल के मरते ही उसकी सेना परास्त होकर भागने लगी। राजा पद्मनाभने तुरन्त ही युद्ध रोक देने का आदेश देकर सबको अभयवचन दिया। कुछ ही देर में युद्धभूमि में सर्वत्र शान्ति और स्तब्धता छा गई। इतने मे एक सैनिक राजा पृथ्वीपाल का मस्तक भाले में पिरोकर पद्मनाभ के पास लाया. .वह करुण दृश्य देखते ही राजा पद्मनाभ चौंक उठे, उनका चित्त संसार से एकदम विरक्त हो गया और वे विचारने लगे-रणभूमि में राजा पद्मनाभ का वैराग्य और मुनिराज का आगमन।

अरे, इस एक हाथी के लिये इतनी हिंसा ! थोड़े से मान के लिये इस राजा ने प्राण गँवा दिये ! ऐसा कषाययुक्त गृहस्थ जीवन मुझे शोभा नहीं देता। परम शांत अकषाय मुनि जीवन ही श्रेष्ठ है।

अरे, पूर्वभव मे मैं चक्रवर्ती था तब मैंने चौरासी लाख श्रेष्ठ हाथियों को एक क्षण में त्याग कर दीक्षा ले ली थी, और आज इस एक हाथी के मोह में क्यों फँस गया ? मोक्ष के साधक को यह मोहबंधन शोभा नहीं देता। ऐसी भावना मे पश्चातापपूर्वक क्षमाभाव धारण करके उन्होंने पृथ्वीपाल के पुत्र धर्मपाल को (जो युद्ध में जीवित बन्दी बना लिया गया था) मुक्त कर दिया और प्रेम से उसके सिर पर हाथ फेरकर बोले : बेटा, अपने पिता की राजगद्दी तू सँभाल। मेरे युवराज सुवर्णनाभ का मित्र बनकर रहना और धर्म का पालन करना। इस प्रकार महाराजा पद्मनाभ ने बैरभाव को छोड़कर प्रेमसहित उसका राज्य वापिस लौटा दिया। युवराज सुवर्णनाभ का राज्याभिषेक करके स्वयं मुनिदीक्षा हेतु तत्पर हुए। अरे !-जीवको प्रेम जैसा कोई बंधन नहीं और विषयों जैसा कोई विष नहीं है; क्रोध जैसा कोई शत्रु नहीं और जन्म जैसा कोई दुःख नहीं है।

इसलिये चारों का नाश करके मैं मोक्ष के परमसुख को साधूँगा। क्योंकि-वीतरागता जैसा कोई मोक्षमार्ग नहीं और ज्ञान जैसा कोई अमृत नहीं है; शान्ति जैसा कोई मित्र नहीं और मोक्ष जैसा कोई सुख नहीं है।

आकाशमार्ग से मुनिराज का आगमन

राजा ऐसी वैराग्य भावना मे तत्पर हैं. इतने मे प्रकृति के उत्तम योग से वहाँ आकाश मार्ग से श्रीधर मुनिराज उतरे। अहा ! उपादान निमित्त का सुयोग बना। मानो गुरु अपने शिष्य को बुलाने आ पहुँचे। ये वही श्रीधर मुनिराज है कि जिनमे कुछ काल पूर्व राजा पद्मनाभने अपने पूर्वभवो की तथा भविष्य में तीर्थंकर होने की कथा सुनी थी, अभी ठीक समयपर उन्ही गुरुके पुन दर्शन होने से राजा कृतकृत्य हो गये। परम भक्तिसहित हर्षपूर्वक उनके चरणो मे वन्दन किया और उनके निकट जिनदीक्षा अगीकार करके मुनि हो गये। मुनि होकर ध्यान मे बैठते ही शुद्धोपयोगसहित सातवाँ गुणस्थान प्रगट हुआ, रत्नत्रय प्रगटे। राजपद मे जैसा सुख नही था वैसा मुनिपद मे प्रगट हुआ, इतना ही नही, बारह अग का ज्ञान भी उसी समय उनके अतर मे प्रस्फुटित हो गया . इस भव मे श्रुतकेवली हुए और तीसरे भवमे केवली-परमात्मा होगे। अब, दूसरी ओर वनकेलि गजराज की बात सुनो।

वनकेलि गजराज का वैराग्य

पूर्व के स्वामी राजा पृथ्वीपाल की मृत्यु और वर्तमान के स्वामी राजा पद्मनाभ की दीक्षा, +यह दोनो दृश्य देखकर बुद्धिमान गजराज वनकेलि भी वैराग्य को प्राप्त हुआ उसका चित्त सर्वत्र से बिलकुल उदास हो गया। मुनिराज के दर्शन से तथा धर्मोपदेश से उसकी चेतना जागृत हो उठी ‘मै पशु नही हूँ, यह क्रोधादि भी मै नही हूँ, मै तो मुनि भगवन्त समान शान्त स्वरुप आत्मा हूँ’-ऐसा वेदन उसे होने लगा और सम्यग्दर्शन से अलकृत होकर वह भी अपने स्वामी (भावी तीर्थंकर चन्द्रप्रभ) के चरणचिह्नो पर मुक्तिमार्ग की ओर चलने लगा। अहा, जिसे भावी तीर्थंकर की सेवा का सुयोग प्राप्त हुआ हो उसका कल्याण क्यो नही होगा ? होगा ही।

श्री मुनिराज पद्मनाभ जहाँ-जहाँ विहार करते, वहाँ गजराज वनकेलि भी शिष्य की भाँति उनके साथ जाता, जब मुनिराज ध्यान मे लीन होते तब वह उनके समीप चुपचाप बैठकर आत्मचिन्तन करता;

मुनिराज के सान्निध्य मे रहकर वह अद्भुत वैराग्यमय जीवन बिताता। मुनिराज के दर्शनोंको आनेवाले मुमुक्षु श्रावक उस हाथी की चर्या को देखकर आश्चर्यमुग्ध हो जाते और उनके अंतर में धर्म की अपार महिमा जागृत होती कि अहा, यह हाथी भी मुनिराज के उपदेश से जैनधर्म प्राप्त करके ऐसा वैराग्यमय जीवन जीता है, वह तो अपने लिये अनुकरणीय है। इसप्रकार अनेक जीव हाथी को देखकर वैराग्य प्राप्त करते थे। हाथी जब अपनी सूँढ झुकाकर मुनिराज को नमस्कार करता और मुनिराज की दृष्टि उसपर पडती तब हाथ उठाकर वे उसे आशीर्वाद देते . और वह हाथी अपने को धन्य मानता था।

दर्शनविशुध्द आदि १६ भावनाएँ और तीर्थंकर प्रकृति

मुनिराज श्री पद्मनाभ को सम्यक्दर्शन सहित निम्नोक्त १६ उत्तम भावनाएँ निरंतर वर्तती थी-(१) सम्यक्दर्शन सहित अष्ट मूलगुण के निरतिचार पालन रूप दर्शन विशुद्धि थी, (२) देव-गुरू-धर्म-जिनागम के प्रति आदररूप विनयसम्पन्नता थी, (३) शीलव्रतो का निरतिचार पालन, करते थे, (४) निरंतर नियमपूर्वक ज्ञानाभ्यास में उपयोग लगाना, उसमे प्रमाद नही करता था, (५) ससार दुखो से भयभीत एव मोक्ष की साधना के प्रति उत्साहित रहते थे, (६-७) त्याग और तप मे अपनी शक्ति लगा रहे थे, (८-९) साधुजनो की आराधना मे विघ्न न हो, समाधि हो, इस प्रकार उनकी सेवा तथा वैयावृत्य करते थे, (१०-१३) अरिहंतो के प्रति, आचार्यों के प्रति, बहुश्रुतधारी साधुओं के प्रति तथा रत्नत्रयवत साधर्मी जनों एव जिन प्रवचन के प्रति परम आदररूप भक्ति थी, (१४) सामायिकादि आवश्यक क्रियाएँ नियमित सावधानीपूर्वक करते थे, उनमे आलस्य नही करते थे, (१५) विशेष ज्ञान-तप द्वारा रत्नत्रय मार्ग की प्रभावना तथा उपदेश देकर जिनधर्म का विस्तार करते थे; और (१६) साधर्मी जनों के प्रति वात्सल्यभाव रखते थे।

इस प्रकार मोक्षसुख की भावना सहित ऐसी १६ भावना के विशुद्ध परिणाम उनको सहजरूप से वर्तता था और इससे उन आसन्नभव्य महात्मा की सेवा करने हेतु तीर्थंकर प्रकृतिरूप श्रेष्ठ नामकर्म आ रहा था। यद्यपि उन्हें तो आत्मविकास में उस तीर्थंकर प्रकृति की कोई आवश्यकता नही थी; परन्तु उस बेचारी श्रेष्ठ प्रकृति को ऐसे भव्य महात्मा की शरण के अतिरिक्त कोइ स्थान ही कहाँ था ? वे भगवन्त निष्पाप थे, धीर थे, गंभीर थे, रत्नत्रय के धारक एवं चारो आराधना में तत्पर थे; अब उनको भवसमुद्र का किनारा आ चुका था; वे बारम्बार निर्विकल्प ध्यान में लीन हो जाते थे। वर्षों तक अखण्ड आराधना करते हुए आयु का अंत निकट जानकर उन्होंने सल्लेखना धारण की और आत्मचिन्तन में उपयोग लगाकर देह त्याग किया। भावी चन्द्रप्रभ तीर्थंकर ऐसे वे पद्मनाभ मुनिराज १६ स्वर्ग, के ९ग्रैवेयक तथा नौ अनुदिश विमानोंसे या उपर एवं मोक्ष नगरी बिलकुल निकट ऐसे पाँच अनुत्तर विमानों में से वैजयन्त विमान में उत्पन्न हुए।

चन्द्रप्रभ भगवान : वैजयन्त विमान में

अपने चरित्र नायक चन्द्रप्रभ की आयु वैजयन्त विमान मे तेतीस सागर थी; स्वर्गलोक का यह अन्तिम भव था; अब मात्र एक मनुष्य भव शेष रहा था। वैजयन्त विमान में वे अहमिन्द्ररूप से निर्दोष जीवन जीते थे और आत्मसाधना करते थे। उनके गमनशक्ति तो बहुत थी परन्तु व्याकुलता नहीं थी इसलिये स्वस्थान को छोड़कर वे इधर-उधर भ्रमण नही करते थे। चित्त में अपार जिनेन्द्रभक्ति होने पर भी वे मनुष्य लोक में तीर्थंकरों के पंचकल्याणक में भी नही आते थे। उनके अवधिज्ञान में जानने की शक्ति तो बहुत थी, परन्तु बारम्बार इधर-उधर उपयोग नही भ्रमाते थे.. कभी-कभी तीर्थंकर भगवान को देख लेते थे। अमृत को उनके कण्ठ मे ही भरा था, तथापि हजारों वर्ष तक उन्हें अमृतपान की भी इच्छा नही होती थी। अहा, चैतन्यरसमय वीतरागी अमृत से उनका जीवन ऐसा तृप्त था कि देवलोक का दिव्यअमृत भी उन्हे ललचा नही सकता था। उनके देवविमान में करोड़ों देव रहते होने पर भी उनमें कोई बड़े-छोटे नहीं थे;-सभी समान थे, स्वयं ही अपने इन्द्र (अहमिन्द्र) थे; सभी सम्यग्दृष्टि, आत्मज्ञानी एवं स्वानुभूतिवान थे, और साथ मिल-बैठकर उसीकी चर्चा करते थे।-इस प्रकार अपने चरित्रनायक आत्मिक शान्ति की प्रधानता सहित उस देवलोक में, सिद्ध भगवन्तों के पड़ौस में असख्य वर्षों तक रहे।

पश्चात्, इस भवचक्र के अन्तिम भव में, वे महात्मा कहाँ अवतरित हुए और किस प्रकार अपनी आत्मसाधना पूर्ण करके सर्वज्ञ परमात्मा (चन्द्रप्रभ तीर्थंकर) हुए-वह अब हम देखेंगे।

[इति श्री चन्द्रप्रभ-चरित्र में, पूर्वभव में पद्मनाभ राजा, वैराग्यपूर्वक मुनिदीक्षा, सोलह भावना, तीर्थंकर प्रकृति और देवलोकागमन उनका वर्णन समाप्त हुआ।]

एक हैं वनराज, एक हैं गजराज; दोनों आत्मज्ञान करके किस प्रकार जिनराज बन गये,-उनकी आनन्दकारी कथा आप इस महापुराण में पढ़ेंगे-कथा २३ और २४ वीं।

चन्द्रपुरी में चन्द्रप्रभ तीर्थंकर का अवतार

जिस प्रकार चन्द्र-किरणों के संसर्ग से चन्द्रकान्त मणि से अमृत झरता है, उसी प्रकार हे चन्द्रस्वामी ! आपके वचन-किरणों के संसर्ग से हम जैसे भव्यात्माओं के अंतर में वीतराग धर्मरूपी अमृत झरता है…शांत रस का समुद्र आपके दर्शन से उल्लासित होता है। अहा, दूरसे भी आप हमें शान्ति देते हो, तब हे प्रभो ! आप स्वयं कितने शान्तिमय हो !-और हमारे अंतर में आकर वास करने से हमें जो शान्ति प्राप्त होती है-अहो ! वह तो वचन अगोचर एवं कल्पनातीत है। ऐसे हे चन्द्रप्रभ ! आपकी इस मंगल जीवनकथा का आलेखन करते हुए हमारा चित्त परम हर्षित होता है।

यह है काशी देश की चन्द्रपुरी नगरी इक्षु वंश के महा प्रतापी राजा महासेन वहाँ राज्य करते हैं। वे उदार एवं गंभीर हैं, पराक्रमी एवं क्षमावान हैं, विद्वत्ता के साथ विनयवान हैं और धनवान होने के साथ दानी भी हैं। उनके कितने गुणों का वर्णन किया जाय ? संक्षेप में इतना ही बस होगा कि वे भव्य जीवों को मोक्षमार्ग बतलाकर भव से पार करनेवाले ऐसे जगद्गुरु अष्टम तीर्थंकर के पिता होनेवाले हैं और उनकी महारानी लक्ष्मणादेवी जगन्माता के रूपमें पूजनीय होंगी। अहा, जिनके उदर में महा पवित्र तीर्थंकर देव का मंगल आत्मा आनेवाला है उनके गुणों का क्या कहना ?

चन्द्रप्रभ-गर्भकल्याणक

अपने चरित्रनायक जो पहले पद्मनाभ राजा थे और अब चन्द्रप्रभ तीर्थंकर होंगे, उन्हें वैजयन्त विमान में असंख्य वर्ष बीत गये; पश्चात् जब उनकी छहमास आयु शेष रही तब, चन्द्रपुरी नगरी में प्रतिदिन करोड़ों रत्नों की वृष्टि होने लगी; तथा इन्द्र ने दिक्कुमारी देवियों को लक्ष्मणा माता की सेवा के लिये भेजी। उन्होंने माताजी का शरीर अशुचिरहित शुद्ध कर दिया…अहा ! जहाँ तीर्थंकर जैसे पवित्रात्मा सवानौ महीने तक रहनेवाले हैं वह स्थान अपवित्र क्यों होगा !

देवियों का आगमन, रत्नों की वर्षा आदि आश्चर्यकारी घटनाओं के साथ छह मास बीत गये। एक रात्रि (चैत्र कृष्णा पंचमी) को महारानी लक्ष्मणादेवी सुखनिद्रा में शयन कर रही थीं तब-रात्रि के पिछले प्रहरमें तीर्थंकर के आगमन सूचक अतिमंगल १६ स्वप्न देखे-(१) ऐरावत हाथी, (२) वृषभ-बैल, (३) सिंह, (४) लक्ष्मी, (५) दो मंगल मालाएँ, (६) चन्द्र, (७) सूर्य (८) मीन युगल, (९) दो मंगल कलश, (१०) सरोवर, (११) समुद्र, (१२) सिंहासन, (१३) देव विमान, (१४) नागेन्द्र भवन, (१५) रत्नराशि, (१६) निर्धूम अग्नि। अहा, तीर्थंकर का आत्मा उनके उदर में प्रविष्ट हुआ उस समय दिखायी दिये इन १६ महादिव्य स्वप्नों से महारानी महान हर्षपूर्वक पुलकित हो गई।

८

भगवान चन्द्रप्रभ (भाग ३)

प्रात काल महाराजा महासेन से मंगल स्वप्नो की बात कही। उनका फल पूछने पर महाराजा ने कहा-हे देवी ! तुम्हारी कुक्षि मे अष्टम तीर्थंकर का अवतरण हुआ है, उसकी सूचना रूप यह मंगल स्वप्न है। हे देवी ! तुम कल्याणकारिणी हो अपना परम सौभाग्य है कि जगत्पूज्य आत्मा अपने यहाँ अवतरित होगा। अहा, मोक्षगामी आत्मा हमारा पुत्र होगा तो हम भी अवश्य मोक्षगामी ही हैं। इस प्रकार वे अत्यन्त हर्षानन्द व्यक्त करने लगे।

उस अवसर पर इन्द्र ने आकर तीर्थंकर के माता-पिता रूपसे उनका सन्मान किया, स्तुति की। अपनी नगरी में तीर्थंकर प्रभु का जन्म होगा-ऐसा जानकर चन्द्रपुरी के समस्त प्रजाजन खूब आनन्दोत्सव करने लगे। सर्वत्र तीर्थंकर की महिमा एव उनका गुणगान होने लगा कि-'अरे, अभी तो गर्भ मे है, उनका मुख भी हमने नही देखा, तथापि इतना आनन्द दे रहे है, तो फिर उनका मुख देखने पर अपने को जो आनन्द होगा उसका तो कहना ही क्या '‘वाह रे वाह ! एक बालतीर्थंकर के जब हम अपनी नगरी में चलते-फिरते-बोलते देखेगे धन्य हो जायगा हमारा जीवन !’ आकाश से प्रतिदिन करोड़ो रत्नों की वर्षा हो रही थी परन्तु प्रजा अब उन रत्नो से तृप्त हो गई थी अब तो वह तीर्थंकर के पास से सम्यग्दर्शन ज्ञान-चारित्ररूप मोक्षमार्ग के रत्न लेने को आतुर थी, इसलिये उसे रत्नवृष्टि का आश्चर्य नही होता था।

वैजयन्त विमान से प्रभु यहाँ पधारने पर उस विमान की शोभा घट गई और इस चन्द्रपुरी की शोभा बढ़ गई। पुद्गल के पिण्ड मे कहाँ शोभा है ? वह शोभा तो चिदानन्द प्रभु की समीपता के कारण ही है। इस विश्व की शोभा चैतन्यतत्त्व के कारण ही है। विश्व मे जो भी शोभा या सुन्दरता है वह जिनधर्म की आराधना के कारण ही है। जिनधर्म के बिना क्या स्वर्ग का देवपद भी शोभता है ?-नही रे नही, वह तो मुरदे जैसा अथवा नरक समान है।

सामान्यत स्त्रीपर्याय निद्य मानी जाती है, तथापि लक्ष्मणादेवी तीर्थंकर के आत्मा के स्पर्श से स्त्रीपर्याय मे सुशोभित हो उठी और जगत मे पूज्य हुई इन्द्र ने भी उनका सन्मान किया। वाह ! ‘द्रव्य-तीर्थंकर’ का ऐसा प्रताप ! तो केवलज्ञान प्राप्त करके साक्षात् भावतीर्थंकर होंगे उस समय की महिमा का तो क्या कहना !-ऐसी महिमा के चिंतन द्वारा आत्मा के अगाधस्वरूप को लक्षगत करके अनेक जीव सम्यक्त्व प्राप्त करने लगे। इस प्रकार भगवान चन्द्रप्रभ का गर्भकल्याणक प्रसंग अनेक जीवों को कल्याण का कारण हुआ और सर्वत्र आनन्द मगल का वातावरण फैल गया।

८. भगवान चन्द्रप्रभ-जन्मकल्याणक

चन्द्रपुरी में आनन्दपूर्वक दूसरे नौ मास बीत गये। पौष कृष्णा एकादशी आयी…सर्व उत्तम ग्रहों का सर्वोत्कृष्ट सुयोग था। अभी मध्यरात्रि व्यतीत हुई थी, अँधेरी रात थी; परन्तु अचानक ही चन्द्रपुरी किसी दिव्य प्रकाश से जगमगा उठी। समस्त प्रजाजन आश्चर्यचकित हो गये कि-अरे, यह क्या ! अँधेरी रात्रि में यह दिव्य प्रकाश कैसा !..इतने में तो देवों का आगमन होने लगा और ज्ञान हुआ कि अहा ! इस भरतक्षेत्र के आठवें तीर्थंकरने यहीं चन्द्रपुरी में लक्ष्मणादेवी की कुख से अवतार लिया है…प्रभु का जन्म कल्याणक हुआ है उसीका यह प्रकाश है। प्रभु के प्रताप से जगत का मिथ्यात्व-अंधकार भी दूर होगा। इस प्रकार प्रजाजनों में आनन्द का कोलाहल छा गया।

दूसरी ओर स्वर्ग में देवों के दरबार में रत्नमय मंगलघंट अपने आप बज उठे, शंखनाद एवं सिंहनाद होने लगे, तथा देवों की दुंदुभि बजने लगी;-इस प्रकार समस्त स्वर्गलोक में प्रभुजन्म की मंगल बधाई पहुँच गई। देवों के आसन डोल उठे। अरे, तीर्थंकर-विभूति के समक्ष इन्द्र-विभूति काँप उठी; क्योंकि तीर्थंकर भगवान जगत को जो चैतन्य विभूति बतलाएँगे, उसके सामने अब जगत के जीव हमें (इन्द्र की विभूति को भी) तुच्छ मानेंगे;-ऐसी चिन्ता के कारण वह इन्द्रासन भी काँप उठा, तब इन्द्र ने अवधिज्ञान से जाना कि-अहा ! यह तो हमसे विशेष महिमावान ऐसा त्रिलोकपूज्य तीर्थंकर का भरतक्षेत्र में अवतार ! चलो उनका जन्मोत्सव मनाने हेतु मध्यलोक में चलें।’

इस प्रकार इन्द्र की आज्ञा से स्वर्गपुरी के देव चन्द्रपुरी में जन्मोत्सव मनाने के लिये धामधूम से चल पड़े। देवों की इतनी अधिक भीड़ से आकाश छा गया और सूर्य-चन्द्र भी छिप गये..कदाचित् चन्द्रप्रभ के आत्मतेज के समक्ष निस्तेज होकर वे सूर्य-चन्द्र छिप गये होंगे। देवों के मुकुटों की जगमगाहट से वहाँ दिन-रात्रिका भेद नहीं रहा। असंख्य द्वीप-समुद्रयुक्त इस मध्यलोक के ऊपर सर्वत्र सौधर्म-ईशान स्वर्ग फैले हुए हैं; सौधर्म स्वर्ग में एक लाख विमानों की ३२ श्रेणियाँ हैं; उनमें दक्षिण दिशा की अन्तिम श्रेणी के १८ वें कल्पविमान में सौधर्म इन्द्र का निवासस्थान है; वह यद्यपि यहाँ से असंख्य योजन दूर है, परन्तु उल्लास के कारण इन्द्र इतनी शीघ्रता से आया कि एक क्षण में असंख्य योजन का अंतर पार करके चन्द्रपुरी में आ पहुँचा।

इन्द्र की दिव्यसेना के एक देवने देव के बदले तिर्यंच का (ऐरावत हाथी का) रूप धारण किया, तथापि उसे खेद नहीं हुआ, किन्तु उल्लास हुआ कि-'अहा, बाल तीर्थंकर प्रभु मेरी पीठ पर आरूढ़ होंगे…उन मोक्षगामी महात्मा के निकट स्पर्श से मैं धन्य बनूँगा और मैं भी अवश्य मोक्षगामी होऊँगा…अहा, तीर्थंकर की सेवा का ऐसा भाग्य इस देवपर्याय में मुझे कहाँ से ? पहले तो महान गौरव से उस देखने एक लाख योजन विशाल हाथी का रूप बनाया…परन्तु ज्यों-ज्यों चन्द्रपुरी के निकट आता गया त्यों-त्यों भगवान की भव्यता के समक्ष अपनी तुच्छता का भास हुआ इसलिये अपने आकार को लघु-लघु करता गया और चन्द्रपुरी के ऊपर आकाश में आकर रुक गया। इन्द्र उस पर से नीचे उतरा और इन्द्राणी को माताजी के पास जिन-बाल (द्रव्य तीर्थंकर) को ले आने के लिये भेजा।

भीतर जाकर इन्द्राणी ने जब प्रभु का रूप देखा तब वह आश्चर्य चकित हो गई। यद्यपि वह स्वर्गलोक में इन्द्र के दिव्य रूप को प्रतिदिन देखती थीं, तथापि तीर्थंकर के रूप के समक्ष तो वह भी निस्तेज लगा। सच ही है, चैतन्य के अतीन्द्रिय सुख के समक्ष इन्द्रियसुख निस्तेज ही लगेंगे न ! अब, इन्द्राणी विचार में पड़ गई कि इन बालभगवान को मैं यहाँ से ले जाऊँगी तो माता-लक्ष्मणा पुत्र को न देखकर व्याकुल हो जायेंगी; इसलिये उन बुद्धिमती इन्द्राणी ने अपनी उत्तम विक्रिया से बाल-भगवान जैसी ही प्रतिकृति का मायामयी बालक बनाकर माताजी की गोद में सुला दिया और बाल-भगवान को लेकर इन्द्र के पास चलीं।

अहा, उन बाल तीर्थंकर को गोद में लेते ही इंद्राणी का आत्मा इस प्रकार आनंद से आह्लादित हो उठा मानों मोक्षसुख की अनुभूति कर रही हो ! उन्हें चैतन्यसुखकी प्रतीति हो गई और एक भवमें मोक्ष प्राप्त करने का आज्ञा-पत्र मिल गया। बाल-तीर्थंकर की माता उन्हें गोद में उठायें उससे पूर्व ही इन्द्राणी को गोद में लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।…धन्य है !

अद्भुत आनन्द से प्रभु के रूप का अवलोकन करते और खेलाते हुए इन्द्राणीने प्रभु को इन्द्र के हाथ में दे दिया.. और इन्द्र भी प्रभुका रूप देखकर आनन्दविभोर होकर नाच उठा…प्रभुका दिव्य-आश्चर्यजनक रूप देखने के लिये उन्होंने अपने एक हजार नेत्रों की शक्ति का एकसाथ उपयोग किया…प्रभु का रूप देखकर वह तृप्त-तृप्त हो गया ! वह विचारने लगा कि-अंतरमें अतीन्द्रिय ज्ञानचक्षु से दिखनेवाला चैतन्यरूप सर्वश्रेष्ठ है तो बाह्य में सहस्र नेत्रों से देखते हुए यह जिन रूप सर्वश्रेष्ठ लग रहा है ! इन्द्र स्वयं तो उन दोनों रूप को निहारनेवाले हैं ! भक्ति द्वारा उन्होंने घोषित किया कि जगत में जिनपद श्रेष्ठ है, इन्द्रपद नहीं।

इन्द्र उन बाल-जिनप्रभु को गोदमें लेकर ऐरावत हाथी पर बैठे। करोड़ों देव-देवियाँ आनन्द से नाच उठे। आकाशमार्ग से प्रभुकी जन्माभिषेक-यात्रा मेरुपर्वतकी ओर चली। प्रभु के जन्मोत्सव की धुन में आनन्दविभोर यह यात्रा पचास हजार योजन (तीस करोड़ किलोमीटर) की दूरी पार करके और ६० करोड़ कि. मि. ऊंचे मेरु पर्वत पर कब आ पहुँची उसकी खबर तक नहीं पड़ी..क्षणभर में मेरुपर्वत पर पहुँच गये। अनेक आकाशगामी मुनिवर तथा विद्याधर मेरुवन्दना हेतु वहाँ आये थे, वे सब प्रभुका जन्माभिषेक देखने के लिये रुक गये अद्भुत जिनमहिमा देखकर चैतन्य महिमा के चिंतनसे अनेकों देव तथा विद्याधर सम्यक्त्व को प्राप्त हुए। ‘धन्य अवतार !’

अब, देवगण प्रभुका जन्माभिषेक करने को उत्सुक थे; इस लिये मेरुपर्वत से लेकर करोड़ों योजन दूर ऐसे क्षीरोदधि नामके पंचम-समुद्र तक देवगण पंक्तिबद्ध खड़े हो गये…और १००८ स्वर्ण एवं रत्नों से निर्मित कलश भर-भरकर एक-दूसरे को हाथोहाथ देने लगे। इन्द्रने तो अपने १००८ हाथ बनाकर उन १००८ कलशों से एकसाथ बाल-तीर्थंकर का अभिषेक किया। चारों ओर दैवी वाद्य बज उठे…अभिषेक के पश्चात् इन्द्राणीने प्रभु का देवलोक के दिव्य वस्त्रालंकारों से प्रभुका शृंगार किया; साथही साथ अपने आत्मा को दिव्य पुण्य से अलंकृत किया। यहाँ कटाक्षयुक्त अलंकारसे पुराणकार कवि कहते हैं कि अरे, इन्द्राणी की जड़ता तो देखो कि वस्त्ररहित निर्ग्रन्थ-दिगम्बर बाल तीर्थंकर को उन्होंने सग्रन्थ लिखा : अहा, तीर्थंकर की महिमा तो देखो ! देव जिनके स्नान हेतु पानी भरते हैं, इन्द्र जिन्हें स्नान कराते हैं और उसके लिये ढाई करोड़ योजन (१५० अरब किलोमीटर) दूरसे क्षीरसमुद्र का जल भरकर लाते हैं; क्षीर समुद्र जिनकी नाँद है, पाण्डुक शिला जिनका पाटा है, स्नान का दैवी रत्नकलश तो आश्चर्य उत्पन्न करे इतना बड़ा (आठ योजन का) है। स्नान के पश्चात् स्वर्ग के आभूषणों से इन्द्राणी जिनका श्रृंगार करती हैं;-ऐसा अलौकिक जिनका पुण्य है, उनके अंतर की आत्मसाधना का क्या कहना !!

आनन्दमय जन्माभिषेक के पश्चात् इन्द्र ने मेरुपर्वत पर ताण्डवनृत्य किया और उन बालतीर्थंकर को ‘चन्द्रप्रभ’ नाम से सम्बोधन करके स्तुति की :-‘चन्द्र की प्रभा समान शोभायमान हे देव ! आप इस भरतक्षेत्र के आठवें तीर्थंकर हो…भव्य जीवों के अंतर में सुखसमुद्र को तरंगायमान करने में आप चन्द्ररूप हो…आपके रत्नत्रयधर्म का आश्रय करके अनेक जीव भवसमुद्र से पार हो जायेंगे। भवसागर में डूबते हुए जीवों को आप नौका समान हैं। प्रभो ! आपके दर्शन तथा आपके मार्ग का सेवन जीवों को विषयकषाय के पापों से छुड़ाता है और वैराग्यमय सुखमें लगाता है। प्रभो ! आपकी सेवासे जीवों को बिना इच्छाके भी सुख की प्राप्ति होती है। जिसके हृदय में आप विराजते हो उस भव्यात्मा को मोक्ष की साधना में कोई विघ्न नहीं आता; जगत की सम्पदा बिना बुलाये आकर उसकी सेवा करती है। अहा, देवों और मनुष्यों की तो क्या बात ! परन्तु पशु भी आपकी सेवा से अपना कल्याण करेंगे। जिन्हें आपके प्रति भक्ति नहीं है उनका जीवन पशुओं की अपेक्षा से भी तुच्छ है ।’

इन्द्र कहते हैं-'हे चन्द्रप्रभ देव ! अब आपके भवका अभाव हो गया है…आप जन्मरहित हो गये; अब आप मोक्षको ही धारण करोगे, भवको नहीं (स्वानुभूतिगम्य आपकी महिमा वास्तव में अद्भुत एवं अचिन्त्य है।) इस प्रकार सहस्र जिह्वासे स्तुति करते-करते थककर अन्त में कहते हैं-अरे, आपके समस्त गुणों की स्तुति करनेवाला मैं कौन ? आपके सम्पूर्ण गुणोंकी स्तुति तो दूर रही, जे भव्य आपके प्रति श्रद्धा से मात्र ‘नम;’ ऐसे दो अक्षर कहता है उसके भी सर्व पाप नष्ट हो जाते हैं और आप समान गुण प्राप्त होते । (वन्दे तद्गुणलब्धये..) ऐसा विचारकर इन्द्रने प्रभुचरणों में अत्यन्त भक्तिपूर्वक साष्टांग नमस्कार किया और फिर प्रभु के जन्माभिषेककी शोभा यात्रा के साथ चन्द्रपुरी आये।

अहा, चन्द्रपुरी के हर्षोल्लास का क्या कहना ! जब सामान्य देव-विमान आने पर भी लोग आश्चर्यमुग्ध हो जाते हैं. तब यहाँ तो देवलोककी विभूति लेकर इन्द्र स्वयं चन्द्रपुरीमें आया और तदुपरान्त बाल-जिनेन्द्र का आगमन हुआ…फिर आनन्दाश्चर्य का क्या कहना !! तथा दूसरा आश्चर्य यह हुआ कि पन्द्रह-पन्द्रह मास से चन्द्रपुरी में प्रतिदिन जो करोड़ों रत्नों की वर्षा हो रही थी वह रत्नवृष्टि भी आज से रुक गई। 'भगवान अवतरित नहीं हुए थे तब तक रत्नों की वर्षा होती थी, और भगवान का अवतार होते ही वह रुक क्यों गई ?..हाँ, बराबर है !-क्योंकि भगवान तीर्थंकर जगत को सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप मोक्षमार्ग के जो रत्न देंगे उनके सामने अब इन जड़ रत्नों की क्या बिसात ? मोक्ष के रत्न छोड़कर इन जड़ रत्नों को कौन लेगा ? इन तीर्थंकर-रत्न की साक्षात् प्राप्ति के पश्चात् उन जड़रत्नों की ओर अब कौन देखेगा ? बस, इसीलिये वह रत्नवर्षा शरमाकर रुक गई थी। "

इन्द्रने भगवान के माता-पिता का सम्मान किया, उनके समक्ष आनन्दपूर्वक विभिन्न नाटकादि तथा ताण्डव नृत्य किया। इस प्रकार चन्द्रपुरी में चन्द्रप्रभ भगवान का जन्मोत्सव मनाकर वे स्वर्गपुरी लौट गये। कहते हैं कि-इन्द्रने जाते समय बालतीर्थंकर के अँगूठे में अमृत भर दिया था… जिसे भगवान चूसते थे। अरे भाई ! तीर्थंकर के तो स्वयं सर्व आत्म-प्रदेशों में चैतन्यामृत भरा था…उसे वे चूसते थे…उस कैवल्यामृत की मिठास के समक्ष स्वर्गलोक के जड़ अमृत की क्या गिनती ? इसलिये इन्द्र बेचारे शरमाकर वह अमृत प्रभुके चरण में रख गये होंगे !

बाल-तीर्थंकर चन्द्रप्रभ शुक्लपक्ष के चन्द्र की भाँति दिन प्रतिदिन वृद्धिंगत होने लगे। सुपार्श्वनाथ तीर्थंकर के मोक्षगमन पश्चात् ९०० करोड़ सागरोपम बीत जाने पर भगवान चन्द्रप्रभ तीर्थंकर हुए। उनकी आयु दस लाख पूर्व थी, १५० धनुष (=१५०० फुट, ४५० मीटर) ऊँचा उनका शरीर था। चन्द्रलक्षण से चिह्नित चन्द्रप्रभ का वह शरीर चन्द्र से भी अधिक कान्तिवान एवं अधिक सौम्य था, और उनके भीतर की भावलेश्या तो उससे भी अधिक उज्ज्वल थी। उन अमृतभोजी महात्मा के शरीर से मानो अमृत झरता था। देवियाँ उन्हें आनन्द से क्रीड़ा करातीं, झुलातीं, मंगलगीत गातीं और मधुर वार्तालाप द्वारा उनके अमृतसमान वचन सुनकर अपने को धन्य मानती थीं।

झूले झूलो रे झूलो, प्रभुजी झूलो रे झूलो ज्ञानकला हे जिन-राजा, ज्ञानझूले झूलो…प्रभु झूलो रे झूलो माता झुलावे, देवी झुलावे, हाथी भी झुलावे…कुंवर झूलो रे झूलो केवलज्ञान में कूदका मारकर समकित झूले झुलावो…प्रभुजी… आकाशे ज्यों चंद्र झूले, प्रभु चैतन्यझूले झूलो…प्रभु झूलो रे झूलो अहा, तीर्थंकर के सान्निध्य में रहकर उनकी सेवा का सौभाग्य मिलने से अपनी देवी पर्याय को भी वे धन्य मानती थीं। ऐसा सौभाग्य क्या स्वर्ग की सारी देवियों को प्राप्त होता है ?-नहीं; महाभाग्यवती कुमारिका मोक्षगामिनी देवियों को ही वह लाभ मिलता है। स्त्रीपर्याय को निंद्य माना गया है, परन्तु वह बात न देवियों को इन्द्राणी को या लक्ष्मणामाता को लागू नहीं होती थी। माता-लक्ष्मणादेवी तो तीर्थंकर की माता बनकर जगत की सर्वश्रेष्ठ नारी बन गई थीं; और उनकी पर्याय धन्य है-ऐसा इन्द्रने भी स्वीकार किया था।

चन्द्रकुमार सबको आनन्दित करते हुए पल रहे थे। जिस प्रकार मूल्यवान रत्न जौहरियों के बीच एक हाथ से दूसरे हाथ में फिरता रहता है और जौहरी उसे देखकर प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार उस तीर्थंकर रत्न को भी राजपरिवार के लोग हाथोहाथ लेकर आनन्दित होते थे। उन बाल-चन्द्र के साथ देव-बालक (बालक का रूप धारण किये हुए देव) आनन्दकारी खेल-कूद करते; कभी छोटे-से हाथी का रूप धारण करके उन्हें सूँड़ में लेकर झुलाते; कभी भगवान स्वयं भी देवों के दिये हुए वाद्य बजाते और मंगल वीतरागता वाले, सब वीतराग सन्मुख हो जाते थे कि-‘अहो रूपं अहो ध्वनि !’ क्या अद्भुत था उनका रूप और कितनी मधुर थी उनकी वाणी !! -मानो तीर्थंकर बनने से पूर्व ही लोगों को उनकी दिव्यध्वनि का स्वाद मिलने लगा। अहा, तीर्थंकर के साथ-साथ उन्हें हँसते-खेलते-बोलते देखना यह कोई साधारण बात है ! आठवें तीर्थंकर के मोक्षगमन पश्चात् असंख्यात वर्षों में भरतक्षेत्र के जीवों को उन आठवें तीर्थंकर के दर्शन का सद्भाग्य प्राप्त हुआ। मात्र चन्द्रपुरी के ही नहीं दूर देशान्तर से भी हजारो भव्य जीव प्रतिदिन उनके दर्शन हेतु राजमहल के प्रांगण में उमड़ते थे। प्रसन्नचित्त राजकुमार कभी-कभी राजमहल के झरोखे में खड़े रहकर उन्हें दर्शन देते, तो कभी महल के बाहर आकर उनसे मिलते और प्रसन्नतासे वार्तालाप भी करते। अहा, छोटे-से परमात्मा के दर्शन पाकर भारत के लोग कृतार्थ हो जाते थे। वे तीर्थंकर राजकुमार कभी-कभी हाथी पर चढ़कर नगर में घूमने निकलते तब नगरवासी उन्हें देखकर अनुपम आनन्द प्राप्त करते। अहा, चलते-फिरते भगवान…उनके साक्षात् दर्शनों से जो आनन्द प्राप्त होता होगा उसका क्या कहना !! बचपन में ‘जलक्रीड़ा’ तो करते, परन्तु ‘जड़क्रीड़ा’ कभी नहीं करते थे।गंगा नदी तो राजमहल को छूकर ही बहती थी; कभी-कभी चन्द्रकुमार उसमें नौका विहार करते। प्रभु चरणों के स्पर्श से गंगानदी पावन बनती; और संभवतः तभी से लोग गंगाजल की महिमा गाने लगे। वे लाड़ले राजकुमार कभी-कभी महल में चुपचाप छिप जाते, तब माता लक्ष्मणा उन्हें ढूँढ़ने जातीं और ‘बेटा चन्द्र…ओ चन्द्र !’ ऐसा कहकर बुलातीं उन्हें हैरान करके फिर अचानक ‘माँ…माँ…’ कहते हुए चन्द्रकुमार बाहर आकर उनसे लिपट जाते। इस प्रकार बाललीला द्वारा माता को आनन्दित करते थे। माँ उन्हें उठाकर अतिवात्सल्य से चूमकर, सिरपर हाथ फेरकर अपार स्नेह की वर्षा करती थीं।

चन्द्रप्रभ का पंचम गुणस्थान-आरोहण और राज्याभिषेक

बाललीलाओं तथा किल्लोलों द्वारा सबको आनन्दित करते-करते जब वे आठ वर्ष के हुए तब सहजवृत्ति से स्वयमेव देशव्रत धारण करके पंचम गुणस्थान में पहुँचे। पहले चार कषायों का तो अभाव किया ही था, अब दूसरे चार कषायों का नाश करके आत्मसाधना में आगे बढ़े। अभी आठ वर्ष की आयु में तो आठ कषायों को तोड़ दिया। उनका जीवन निष्पाप-पवित्र तो था ही, उसीमें देशव्रत धारण करने से उनकी विशुद्धि विशेष बढ़ गई।

गुणों में वृद्धिगत होते-होते वे उन बालप्रभु ने अब युवावस्था में प्रवेश किया और राजसभा के कार्यों में भी भाग लेने लगे। महाराजा ने उनका विवाह भी कर दिया; यद्यपि उनको इन्द्रियविषयों की इच्छा नहीं थी और न प्रजा से कोई कर लेने की आवश्यकता थी; उनका मन तो मोक्षलक्ष्मी में ही आसक्त था।

राजकुमार चन्द्रप्रभ की आयु का चतुर्थ भाग अर्थात् ढाई लाख पूर्व व्यतीत हो गये तब महाराजा महासेनने चावधूम से उनका राज्याभिषेक किया। प्रजाजन अति प्रसन्न हुए; वास्तव में तो वे प्रजा के हृदय-सिंहासन पर विराजते थे। अरे, जन्म से ही इन्द्र जिनका सेवक रहा हो ऐसे वे भगवान मात्र चन्द्रपुरी अथवा काशीदेश के ही नहीं, त्रिलोकाधिपति थे। राज्य-शासन के साथ-साथ वे धर्मशासन भी करते थे।

अब चलो…चन्द्रप्रभ महाराजा के राजदरबार में…

अहा, महाराजा चन्द्रप्रभ का राजदरबार कैसा भव्य है ! उसकी शोभा अद्भुत है ! परन्तु उनकी राजसभा में राजकार्य की चर्चा कम ही होती है, क्योंकि प्रजाजन सर्व प्रकार से सुखी हैं। कहीं भी युद्ध, अकाल, रोग या लूटपाट आदि कोई दुःख या भय नहीं है, इसलिये प्रजा को कोई शिकायत करना नहीं रहा है। राज्य सुव्यवस्थित चल रहा है; इसलिये तत्सम्बन्धी विशेष चर्चा की राजसभा में आवश्यकता ही नहीं होती। अस्तु राजसभामें भी अधिकांश धर्मचर्चा होती है; सब जिनधर्म की महिमा गाते हैं, और कभी-कभी तो महाराजा चन्द्रप्रभ स्वयं चैतन्यतत्त्व की सुंदरता का अद्भुत वर्णन करते हैं तब उनके श्रीमुख से चैतन्य महिमा सुनकर सभा के लोग मुग्ध हो जाते हैं। चलो, हम भी उनके एक मधुर गीत का रसास्वादन करें - आतमा आतमा आतमारे…अहो अद्भुत चिदानन्द आतमा.. जिसे देखने से होगा परमातमारे…अहो अद्भुत चिदानन्द आतमा.. धर्मात्मा जीव बन, अपने में लीन हो…स्वरूप से बाहर भटक ना रे..अहो० सम्यक् दृष्टि बन, भ्रमणा को दूरकर, आनन्द स्वरूप में लीन हो रे..अहो० ज्ञानस्वरूपी आनन्द का सागर, उछला है उसमें तू मग्न हो रे..अहो० अवसर आनन्द का प्राप्त हुआ है, शांत स्वरूप में स्थिर हो रे..अहो० आतमराम यह सुंदर स्वरूपी देखो-देखो निज अंतर में रे..अहो० मानो मधुर चैतन्य की बंशी बज रही हो इस प्रकार प्रभु आत्मगीत गाते थे। प्रभु के श्रीमुख से चैतन्यमहिमा सुनते-सुनते कुछ जीव अंतरकी गहराई में उतरकर आत्मानुभव भी कर लेते थे…मानो भगवान ने अभी से धर्मतीर्थ का प्रवर्तन प्रारम्भ कर दिया हो ! इस प्रकार उनके प्रताप से राजसभा भी धर्मसभा की भाँति शोभायमान हो उठती थी। चन्द्रपुरी में सचमुच धर्मराज्य था। वहाँ के नागरिक वास्तव में भाग्यशाली थे कि जिन्हें तीर्थंकर के दर्शन का और उनके साथ वार्तालाप करने तथा धर्मश्रवण का महाभाग्य भी प्राप्त होता था।

महाराजा चन्द्रप्रभ का वैराग्य .

इस प्रकार सुखपूर्वक राज्य करते-करते दूसरे पाँच लाख पूर्व बीत गये। दस लाख में से साढ़े सात लाख पूर्व की आयु बीत गई; तब एक दिन चन्द्रप्रभ महाराजा का दरबार लगा था, आज उनका जन्मदिन (पौष कृष्णा एकादशी) था; इसलिये आनन्दोत्सव हो रहा था…इतने में अचानक एक आश्चर्यजनक घटना हुई। क्या हुआ ? वह सुनो।

एक अत्यन्त वृद्ध भयभीत पुरुष लकड़ी के सहारे राजसभा में आया और महाराज चन्द्रप्रभ को नमस्कार करके काँपते-काँपते दुःखपूर्वक कहने लगा-हे महाराज ! आप देवों से भी पूज्य हैं, आपका हृदय दयालु है, आप शरणागत-प्रतिपालक हो; प्रजा के दुःख दूर करने वाले हो। हे देव ! मैं अति दीन एवं भयभीत हूँ; आप मेरी रक्षा करो, मुझे बचा लो !

महाराजा ने दयाभरी दृष्टि से पूछा-भाई ! क्या दुःख है तुझे ! किसका भय है ?

वृद्ध ब्राह्मण बोला : हे स्वामी एक निमित्तज्ञानी ने मुझसे कहा है कि आज रात्रि को ही तेरी मृत्यु हो जायगी; इसलिये मैं मृत्यु से भयभीत हूँ; किसी विषयमें मुझे मृत्यु से बचा लीजिये। अरे ! क्या आपके देखते हुए मृत्यु मुझे मार डालेगी ? हे स्वामी ! यदि आप मुझे मृत्यु से नहीं बचा सके तो फिर आप ‘मृत्युंजय’ कैसे कहलायेंगे ?

एक मंत्री ब्राह्मण की उस बात का उत्तर देने लगा : हे भाई ! धैर्य रख ! आयु पूर्ण होने पर मृत्यु तो सभी प्राणियों की होती ही है। उस मृत्यु से इन्द्र नरेन्द्र या जिनेन्द्र भी नहीं बचा सकते। भगवान चन्द्रप्रभ महाराजा ने आत्मसाधना द्वारा मोक्षको साधकर मृत्यु पर विजय प्राप्त की है, इसलिये वे ‘मृत्युंजय’ हैं-न कि दूसरे जीवों को मृत्यु से बचा लेने के लिये ? हाँ, इतना अवश्य है कि उनके बतलाये हुए मोक्षमार्ग की जो उपासना करे वह मृत्यु को जीतकर अमरपद प्राप्त कर सकता है। भगवान तो जगत को मार्ग बतलानेवाले हैं परन्तु जगत के कर्ता-हर्ता नहीं हैं।

मंत्री का उत्तर पूरा होने से पूर्व ही वह ब्राह्मण वेशधारी पुरुष अचानक अंतर्धान हो गया सभाजन एकदम आश्चर्यचकित हो गये; परन्तु महाराज चन्द्रप्रभ तो अतिगंभीर होकर किसी गहरे विचार में उतर गये थे।

तब अवधिज्ञान द्वारा सब वृत्तांत जाननेवाले महाराज चन्द्रप्रभ धीर-गम्भीर स्वर में बोले-सुनो ! हे सभाजनो ! यह जो वृद्ध ब्राह्मण आया था, वह कोई मनुष्य नहीं, किन्तु स्वर्ग; से एक देव मुझे वैराग्य जागृत करने के लिये वह वेश धारण करके आया था और जीवन की क्षणभंगुरता बतलाने के लिये उसने यह युक्ति की थी; वह अपना कार्यपूर्ण करके चला गया। सच ही है-संसारी प्राणियों का जीवन अनित्य है। अरे, स्वर्गलोक के देव भले ही असंख्य वर्षों की आयुवाले होते हैं; परन्तु अन्त में तो वह भी विनश्वर है; आयु पूर्ण होने पर उन देवों को या इन्द्र को भी कोई बचा नहीं सकता। इसलिये इस जीवन में आत्मसाधना पूर्ण करके इस भवचक्र के जन्म-मरण का अन्त कर लेना है। उसी के गहरे विचार में मैं तल्लीन था। मेरा यह अवतार पूर्ण परमात्मपद की साधना के लिये है, इस संसार में रहने के लिये नहीं। मैंने राजपद में बहुत वर्ष बिता दिये हैं इन्द्र की आज्ञा से वह धर्मरुचि नामका देव ब्राह्मण का रूप धारण करके मुझे राजभोगों से विरक्त करने के लिये आया था; मुझमें वैराग्य जागृत करके वह चला गया। अभी तक मुझे जिन शुभाशुभ कर्मों ने संसार-भ्रमण कराया है उन सर्व कर्मों को छेदकर अब मैं मोक्षरूप परमपद की साधना करूँगा…उसके लिये मैं आज ही जिनदीक्षा धारण करूँगा।

सभाजन तो प्रभु की बात सुनकर एकदम चकित हो गये कि-अरे, यह कैसी बात !! बस, प्रभु का चित्त क्षणभर में संसार से विरक्त हो गया; अब उन्हें कोई रोक नहीं सकेगा। उन वनराज को अब गृहवास के पिंजरे में कैद करके नहीं रखा जा सकता। अनेक प्रजाजन तो प्रभु की परमशांत वैराग्य मुद्रा देखकर प्रसन्न हो उठे और स्वयं भी वैराग्य प्राप्त करके प्रभुके साथ जिनदीक्षा लेने की भावना भाने लगे। सारी राजसभा क्षणमात्र में वैराग्यसभा में परिवर्तित हो गई। प्रभु के जन्मोत्सव का दिन वैराग्यमय जिनदीक्षाका दिन बन गया।

श्री चन्द्रप्रभ के वैराग्य का प्रसंग उत्तरपुराणमे अन्य रीति से आता है, वह ऐसा है-महाराज चन्द्रप्रभ एक दिन दर्पण में अपना मुख देख रहे थे उस दिन प्रभु का जन्मदिन था। प्रभु को दर्पण के प्रतिबिम्ब में विशेषता दिखायी दी मानो एक साथ दो प्रतिबिम्ब दिखायी दे रहे हों! आश्चर्य से विचारने पर उन्हें जातिस्मरण हुआ, अपने पूर्वभव दिखायी दिये। चक्रवर्ती का भव, मुनिदशा एव देवलोक का दिव्यभव उन्होंने देखे। वे चिन्तवन करने लगे कि-अरे, चक्रवर्ती और देवलोक के दिव्य भव भी क्षणभंगुर हैं-नश्वर हैं, वहाँ अन्य भोगों की क्या बिसात ? अरे, ऐसे सुखको सुख कैसे कहा जाय कि जो आत्मा में से उत्पन्न नहीं हुआ हो और पराधीन हो? ऐसी लक्ष्मी को लक्ष्मी कौन कहे कि जिसका मोह केवलज्ञान-लक्ष्मी को रोकता हो ? ऐसे बन्धुजन किस काम के जिनका वियोग हो जाय! आत्मा से उत्पन्न हुआ सहजसुख ही सच्चा सुख है, केवलज्ञान-सम्पदा ही आत्मा की सच्ची सम्पदा है और सम्यक्त्वादि अनन्त गुणपरिवार ही आत्मा का सच्चा परिवार है। अरे! ऐसा संसार जीवन किस कामका कि आयु का अत होने पर जिसका अत हो जाय! जो आयु के आधीन नही है ऐसा अनत सिद्ध जीवन ही आत्मा का सच्चा जीवन है। भव-भवमें देहादि सयोग कैसे बदलते रहते हैं!-तथापि मैं तो वही हूँ,-चैतन्य स्वरूप मेरा आत्मा ही मेरे लिये ध्रुवरूप है, अन्य सर्व सयोग मेरे लिये अध्रुव हैं-

मेरा सुशाश्वत एक दर्शन-ज्ञान लक्षण जीव है;
शेष सब संयोग लक्षण भाव मुझसे बाह्य हैं।

और पुण्यफल का उपभोग भी अध्रुव है, वह जीव को खिन्न एव व्याकुल करता है, वीतरागी केवलज्ञानमें ही खेद और थकान रहित ध्रुवसुखका उपभोग है। उसे प्राप्त करने हेतु मैं आज ही चारित्र अगीकार करके मोक्षको साधूँगा। भगवान चन्द्रप्रभ ऐसा विचार रहे हैं कि इतने में मोक्षकी दूती जो दीक्षा, वह प्रभुको बुलाने आ पहुँची। प्रभु मोक्षसुन्दरी के वरण हेतु दीक्षा लेने को तैयार/हुए। उसी समय अवधिज्ञान से वह जानकर लौकान्तिक देव वहाँ आ पहुँचे। ब्रह्मलोक नामके पाँचवें स्वर्ग में आठ प्रकार के लाखों लौकान्तिक देव रहते हैं। वे देवर्षि उपशात परिणामी, बारह अंग ज्ञानधारी, वैरागी, ब्रह्मचारी तथा एकावतारी हैं। वे एकमात्र तीर्थंकर देवके दीक्षा कल्याणक के अतिरिक्त अन्य किसी अवसर पर मध्यलोक मे नहीं आते। चन्द्रप्रभ की दीक्षा के अवसर पर वे लौकान्तिक देव चन्द्रपुरी में आये और प्रभु को वन्दन करके स्तुतिपूर्वक वैराग्य की अनुमोदना करने लगे

सुख-दुःख में जीव अकेला, जन्मे-मरे जीव अकेला;
है भवभ्रमण में अकेला, अरु मोक्ष में भी अकेला।

हे जिनेन्द्र प्रभो! आत्मा के एकत्व को जानकर आप जो वैराग्य भावना भा रहे हैं वह प्रशंसनीय है। आपका चारित्रदशा सम्बन्धी निश्चय अति प्रशंसनीय एव मंगलकारी है, आपका चारित्र जगत के जीवोंको, भी कल्याणकारी है, हम भी उसी चारित्रदशा की भावना भाते हैं। प्रभो ! आप मुनि होकर शुद्धोपयोग द्वारा अल्पकालमें ही केवलज्ञान प्राप्त करेंगे और दिव्यध्वनि द्वारा भरतक्षेत्र के भव्यजीवों के लिये मोक्षमार्ग का प्रवर्तन करेंगे।-धन्य है आपका अवतार !

इस प्रकार वैराग्य की अनुमोदना करके वे लौकांतिक देव चले गये और उसी ही समय दीक्षा हेतु देवी शिविका लेकर इन्द्रादि देव भी वहाँ पहुँचे। जन्मोत्सव की अपेक्षा इस बार के उत्सव की धामधूम भिन्न प्रकार की थी। शांतरसमय वह उत्सव देखकर अनेक राजा तथा प्रजाजन वैराग्य को प्राप्त हुए और प्रभु का अनुसरण करके वनमें जाने को तैयार हुए।

प्रभु वनगमन हेतु जब पालकी में आरूढ़ हुए उस समय इन्द्र ने उन्हें अपने हाथ का सहारा दिया अरे, नहीं। प्रभुके हाथ में अपना हाथ देकर इन्द्र ने भव से पार होने के लिये उनका अवलम्बन लिया ।’ हे प्रभो ! आपकी सेवा का ऐसा सौभाग्य हमें कहाँ से ? भवचक्र से छूटकर मोक्षपुरी की ओर प्रयाण करने के लिये यह आपका अन्तिम वाहन - सवारी है। इस वाहन को अपने कन्धों पर उठाकर हमारा जीवन धन्य हो गया !’ - ऐसी भावना भाते-भाते पहले राजा पालकी उठाकर चले और फिर देवों ने वह लेकर आकाशमार्ग से गमन किया। चैतन्यसाधना के विमल कार्य हेतु प्रभु वनगमन के लिये जिस पालकी में आरूढ़ हुए वह पालकी ‘विमला’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। उसमें बैठे-बैठे भगवान वैराग्यभावना भाते थे।

भगवान चन्द्रप्रभ की भायी हुई बारह वैराग्य भावनाएँ

[राग-हरिगीत]
(१) जे ज्ञान-दर्शन माहरा ते ध्रुव मारुं रुप छे;
एकत्व छुं ने शुद्ध छुं, बस, ओ ज मारुं रूप छे।
(२) चेतनमयी मुज आत्ममां रक्षित थई रहेनार हूँ;
नथी शरण जोतुं कोईनुं बस, शरण आतमरामनुं।
(३) एकत्व जाणी आत्मनुं बस ! लीन हूँ मुज आत्ममां;
अन्यत्व सौ परभावथी, संयोगनुं तो नाम कयां ?
(४) आ देह ने वली राग ते सौ चेतनाथी अन्य छे;
ओमां नथी कंई सुख मारुं, चिन्तवुं मुज आत्मने।
(५) भवचक्रमां भमवा छतां परमातमा मुज पासमां;
हूँ ध्यावतो निज आत्मने बस, जई रह्यो छुं मोक्षमां।
(६) शुचिरुप मारो आतमा, हूँ मलिनने स्पर्शुं नही;
भावो अशुचि रागना, ते आत्ममां लावुं नहीं।

[हरख हवे तु हिन्दुस्तान-राग]
(७) ज्ञानतणी नौकामां बेठो, आस्रव सर्वे दूर थया;
भवथी छूटी मोक्षे चाल्यो, दुःखडा मारा दूर थया।
(८) संवर छे मुज परममित्र ने हूँ ज स्वयं बस संवर छुं;
सम्यक्रूपी ढाल धरीने, आस्रवने अटकावुं छुं।
(९) रत्नत्रयमां वृद्धि करतां, कर्मों झर-झर तुटी पडे;
परीषहोने सहतो आतम मुक्तिपुरीमां आवी रहे।
(१०) लोकभ्रमण हवे नथी-नथी, बस ! लोकशिखरमां जावुं छे;
सादि-अनंत बस सुख ज वेदी, सिद्धपुरीमां वसवुं छे।
(११) मुज आतमनो धर्म ज चेतन, दर्शन-चरित-ज्ञान छे;
क्षमा धरम छे मुज आतमनो, राग रहित वीतराग छे।
(१२) भले बोधि छे दुर्लभ पण ते प्राप्त थती जिनमारगमां;
धन्य बन्यो हूँ बोधि पामी आनंद जाग्यो आतममां।
नथी सुंदर कंई जगमां बीजुं, बोधि मारी सुंदर छे;
जे बोधिना परम बोधथी मुक्ति मारी अंदर छे।

[इति तीर्थंकर-वैराग्य चिन्तन] [उपरोक्त भावनाओं को मुमुक्षु कण्ठस्थ कर लें, जीवनमें सदा उपयोगी हैं।]

ऐसी वैराग्य भावनाएँ भाते हुए भगवान ‘सकलऋतु’ नामक वनमें पधारे। जिस प्रकार सकलऋतुओं में सर्व प्रकार के फूलोंफलों से खिला रहता था, उसी प्रकार भगवान के अंतर-वन में भी सर्व ऋतुओं में सुन्दरता से खिला हुआ रत्नत्रय-पुष्पमय चैतन्य-उद्यान सुशोभित हो रहा था। अहा, चैतन्य की अद्भुत शोभा से सारा जगत सुशोभित हो उठता है !

दीक्षावन में हजारों-लाखों देव और मनुष्य, अरे वन के पशु भी, प्रभुकी वैराग्यप्रवृत्ति को अति आश्चर्यपूर्वक निहार रहे थे…इन्द्रिय विषयों को तथा उत्तम राजभोगों को भी छोड़कर यह महात्मा कोई दिव्य साधना कर रहे हैं, तो उस साधनामें इन्द्रिय विषयों से पार कोई अचिन्त्य-अतीन्द्रिय परम सुख प्राप्त होता होगा ! इस प्रकार अनेक जीवों को आत्मा के अतीन्द्रिय सुख की प्रतीति हो जाती थी और उनका चित्त विषयों से विरक्त होता था। प्रभुने समस्त राजवैभवसहित वस्त्रादि सर्व परिग्रह का त्याग किया और ‘ॐ नमः सिद्धेभ्यः’ ऐसे सिद्ध भगवन्तों को नमस्कार करके स्वयं मुनिदीक्षा अंगीकार की। उनके साथ दूसरे एक हजार मुमुक्षु जीव भी जिनदीक्षा लेकर मुनि हुए। मुनिराज चन्द्रप्रभ को ध्यानरूप शुद्धोपयोग में तुरन्त सातवाँ गुणस्थान, मनःपर्ययज्ञान तथा अनेक लब्धियाँ-सब एकसाथ प्रगट हुए। मुनिपने का अभ्यास तो उन्होंने पूर्वभवों में किया ही था, तदुपरान्त विशेष शुद्धिपूर्वक वे केवलज्ञान साधने को तत्पर हुए।

धन्य चन्द्रप्रभ-मुनि भगवन्त…उन्हें नमस्कार हो !

मुनिदशा में दो उपवासों के पश्चात् प्रथम पारणा कराने का (-आहारदान का) महान लाभ नलिनपुरके सोमदत्त राजाके प्राप्त हुआ; उस समय रत्नवृष्टि आदि पंचाश्चर्य द्वारा देवों ने भी उस दान की महिमा की। ध्यान के बल से प्रभुने उत्तमक्षमादि धर्मों की आराधना प्राप्त की और क्रोधादि कषायों को मृततुल्य कर दिया। पश्चात् शुक्लध्यान द्वारा पुकार कर प्रभुने केवलज्ञान को बुलाया; इसलिये वह केवलज्ञान नवलब्धि तथा तीर्थंकर पद को साथ लेकर, अति शीघ्रता से निकट आ रहा था। उनका वैराग्य-कवच इतना दृढ़ था कि कोई उपसर्ग या परीषह उनकी आत्मसाधना को प्रभावित नहीं कर सकता था।

मुनिदशा में भी प्रभुका प्रभाव अचिन्त्य था। अनेक मुनि उनकी शरण में आते और बिना बोले प्रभुके दर्शनमात्र से भी उनको सूक्ष्म तत्त्वों का समाधान हो जाता। प्रभुको स्वयं तो कोई शंका थी नहीं और उसके निकट आनेवाले जीवों के अंतर में तत्त्वसम्बन्धी कोई शंका नहीं रहती थी। अरे, उनके शरीर का स्पर्श करके जो वायु आती थी…उसके द्वारा भी रोगी के सर्व रोग दूर हो जाते थे;-ऐसी अनेक लब्धियाँ होनेपर भी प्रभुको उनका लक्ष नहीं था, उनका चित्त तो कैवल्यलब्धि की साधना में लीन था।

८

भगवान चन्द्रप्रभ (भाग ४)

साधक मुनिदशा में चन्द्रप्रभ तीन मास तक रहे…पश्चात् चैत्र कृष्णा सप्तमी को केवलज्ञान प्राप्त करने को कटिबद्ध हुए…क्षपकश्रेणी चढ़ने को तत्पर हुए। क्षायिक सम्यक्त्व तो वे पहले से ही प्राप्त कर चुके थे; अब चैतन्य के परम-आनन्द को तन्मयता से ध्याते हुए मुनिराज चन्द्रप्रभ मोक्ष की श्रेणी चढ़ने लगे। चारित्रमोह का क्षय करने के लिये शुक्लध्यानचक्र को धारण किया और शुद्धता का ‘अपूर्व परिणाम’ द्वारा अष्टम गुणस्थान में प्रवेश किया। कर्मों का बंधन शीघ्रता से टूटने लगा…तुरन्त वे नववें गुणस्थान में पहुँचे। अहा, अब उनकी वैराग्य परिणति इतनी बढ़ गई कि अभी तक (असंख्य वर्षों से सत्तारूप से) तीर्थंकर प्रकृति का जो कर्म बँध रहा था वह भी अब रुक गया। जिसकी परिणति अति शीघ्रता से मुक्ति की ओर जा रही हो उस मुमुक्षु को तीर्थंकर प्रकृति का भी बंधन क्यों रुचेगा ? नहीं क्रोध, मान और मायारूप कषायों का तो उन्होंने सर्वथा अभाव किया और फिर दसवें गुणस्थानों में सूक्ष्म लोभ को भी छोड़कर सर्व कषायरहित अकषाय-वीतराग हुए। उसी क्षण, बीचमें ग्यारहवें गुणस्थान को स्पर्श किये बिना सीधे क्षीणमोहरूप बारहवें गुणस्थान में आये और अतिशीघ्रता से (पलक झपकने मात्र में) शेष घाति कर्मों को तोड़कर तेरहवें गुणस्थान में पहुँचकर सर्वज्ञ-परमात्मा बन गये। अहाहा ! धन्य था वह क्षण ! कृत्यकृत्य था वह परमतमपद !- जहाँ सर्वभाव अत्यन्त शुद्ध एवं ज्ञाता-द्रष्टारूप वर्तते थे, और साथ ही अतीन्द्रिय सुख भी पूर्णतारूप पराकाष्ठा को प्राप्त हुआ था; वे ‘स्वयंभू’ भगवान थे, क्योंकि सर्वज्ञता के लिये उन्होंने अपने आत्मस्वभाव के अतिरिक्त किसी अन्य का अवलम्बन नहीं किया था। महान सन्त भी उस दशा की अनुमोदना करते हैं कि-

अतिशय आत्म समुत्थित, विषयातीत, अनुपम और अनन्त।
तथा अविच्छिन्न सौख्य, शुद्धोपयोगप्रसिद्धों को।।
यों वह लब्धस्वभावी, हो सर्वज्ञ, सर्वलोकपति पूजित।
स्वयमेव आप बनता ‘स्वयंभू’ यों कहा जिनवर ने।।
प्रक्षीणघातिकर्म जो, अनन्त, उत्तमवीर्य, अति तेजमय।
अतीन्द्रिय हुआ है सो ज्ञान-सौख्यरूप परिणमता।।

अहा, उस ज्ञान और सुख की महिमा का क्या कहना !-जिसकी पहिचान और प्रतीति करने पर मुमुक्षु जीवको स्वयं भी अतीन्द्रिय ज्ञान एवं अतीन्द्रिय सुख का स्वाद आ जाता है अर्थात् सम्यग्दर्शन हो जाता है।

चन्द्रप्रभ भगवान सर्वज्ञ हुए। सर्वज्ञ होते ही उनका महान आनन्दसागर मानो समस्त लोकमें उमड़ पड़ा हो तदनुसार क्षणभर के लिये तीनों लोकके सर्व जीवों में दो घड़ी के लिये साता का वातावरण छा गया…नरक के जीव भी उस साता के वेदन से आश्चर्यचकित हो गये और जिनेन्द्रमहिमा का चिंतवन करते-करते सुखस्वभावी आत्मा की प्रतीति करके कितने ही जीवों ने सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लिया…उसी प्रकार देवों में, मनुष्यों में तथा तिर्यंचों में भी अनेक जीव धर्म को प्राप्त हुए…आठवें तीर्थंकर के धर्मचक्रका प्रवर्तन होने लगा।

केवलज्ञानी तीर्थंकर प्रभु की महिमा के समक्ष मानो नम्रीभूत हुआ जा रहा हो तदनुसार इन्द्र का आसन डोल उठा.. उस काल इन्द्र ने तीर्थंकर प्रभु के केवलज्ञान कल्याणक का प्रसंग जानकर, तुरन्त इन्द्रासन से नीचे उतरकर अद्भुत महिमासहित आनन्दपूर्वक उन सर्वज्ञदेव को नमस्कार किया और अनेक देवोंसहित चन्द्रप्रभ के केवलज्ञान की पूजा करने मध्यलोक में आया।

प्रभुने चन्द्रपुरी के जिस वनमें मुनिदीक्षा ग्रहण की थी उसी वनमें (चैत्रकृष्णा सप्तमी के दिन) केवलज्ञान प्राप्त किया। इन्द्र की आज्ञा से कुबेरने अद्भुत शोभायमान समवसरण की रचना की; मानो स्वर्गलोक की समस्त शोभा को यहाँ प्रभु की सेवा में उतार दिया हो…और तीर्थंकरदेव के सुयोग से उस समवसरण-धर्म दरबार की शोभा ऐसी बढ़ गई कि उसे देखकर स्वयं इन्द्र को भी आश्चर्य हुआ कि-ऐसी अद्भुत-सुन्दर रचना करने की हमारी शक्ति नहीं है, यह अद्भुत रचना तो तीर्थंकरदेव के पुण्यप्रताप से ही हुई है। अहा इन्द्र भी जिसे देखकर आश्चर्यचकित हो जाय उस समवसरण की और उन भगवान की शोभा कैसी होगी !! जिसकी महिमा विचारने से मुमुक्षु को चैतन्य की महिमा लक्ष में आये और सम्यग्दर्शन हो जाय-ऐसी !

वाह रे वाह !..समवसरण क्या है…यह तो रत्नत्रय धर्म की दुकान है, वहाँ ‘आत्मगवेषी मुमुक्षु’ को मन चाहे चैतन्यरत्न मिलते हैं। चन्द्रप्रभ की यह धर्मनगरी साढ़े आठ योजन विस्तार में फैली थी; बीसोंबीस समवसरण का स्पर्श किये बिना ही वीतराग प्रभु चैतन्य के सौन्दर्य पिण्डरूप से विराज रहे थे। ऊपर रत्नत्रय समान सुशोभित ‘तीन छत्र’ ऐसा प्रगट कर रहे थे कि भगवान ने रत्नत्रय द्वारा यह परमात्म पद प्राप्त किया है…इसलिये हे भव्य जीवो ! तुम भी उस रत्नत्रय का सेवन करो।

‘अशोक वृक्ष’ प्रसन्नतापूर्वक ऐसा कह रहा था कि-सर्वज्ञ भगवान की निकटता पाकर मैं ‘अशोक’ बन गया हूँ। हे भव्य जीवो ! तुम भी भगवान के सान्निध्य में आओ ! प्रभुका सान्निध्य प्राप्त करके तुम भी अ-शोक (शोकरहित, आनन्दरूप) बन जाओगे।

तथा ‘दुंदुभि वाद्य’ दिव्य नाद द्वारा ऐसी घोषणा कर रहे थे कि-इन जिनेन्द्र भगवान ने मोह शत्रु को जीतकर कैवल्य-साम्राज्य प्राप्त किया है .तुम भी मोहविजेता होने के लिये इन प्रभुके मार्ग में आओ।

देव-मनुष्य-तिर्यंचो की समूह चन्द्रप्रभ भगवान के दर्शन हेतु उमड़ रही थीं। यद्यपि समवसरण की शोभा अद्भुत थी, तथापि मुमुक्षु जीवों का चित्त उसमें नहीं लगता था, क्योंकि उनका मन तो भगवान के दर्शनों में ही लगा था और सब उनकी दिव्यध्वनि सुनने को आतुर थे।

प्रथम, इन्द्र ने हाथ जोड़कर तीर्थंकर-सर्वज्ञ परमात्मा की स्तुति की-अहो देव ! आज आपने परमात्मपद प्राप्त किया, चार घाति’ कर्मों का नाश करके आप ‘अरिहंता’ बने। उत्कृष्ट ज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्य रूप अनन्त चतुष्टय आत्मामें से प्रगट किये। उस चैतन्य चतुष्टय द्वारा आप निरतर प्रकाशमान हो। हे देव ! मैंने आपका नाम ‘चन्द्र-प्रभ’ बिना विचारे ही रख दिया है, क्योंकि चन्द्र तो मात्र रात्रि में ही प्रकाशित होता है जबकि आप तो चैतन्यप्रकाश द्वारा निरंतर दिनरात प्रकाशमान हो, इसलिये आपका नाम ‘सूर्य-चन्द्रप्रभ’ रखना चाहिये, मात्र चन्द्रप्रभ नहीं। प्रभो ! आप इस भरतक्षेत्र के अष्टम तीर्थंकर हो। आपकी दिव्यध्वनि द्वारा धर्मामृत का पान करने के लिये हम सब सभाजन आतुर है, इसलिये हे जिनेश्वर देव ! अपने दिव्य उपदेश द्वारा हमें कृतार्थ कीजिये !

तीर्थंकर चन्द्रप्रभ की धर्मदेशना

इन्द्र द्वारा प्रार्थना किये जाने पर जिस प्रकार चन्द्रमासे शीतल अमृत झरता है वैसे ही चन्द्रप्रभ भगवान के सर्वांग से अति मधुर दिव्यध्वनि खिरने लगी…वीतरागी अमृत झरने लगा . सारी सभा आनन्दमय वातावरण में स्तब्ध होकर प्रभुसन्मुख दृष्टि से एकाग्र होकर दिव्यवाणी सुनने लगी। चारों दिशाओं से प्रभुके साक्षात् दर्शन हो सकते थे; चारों ओर बैठे हुए सभाजनों को ऐसा लगता था कि भगवान हमारे ही सन्मुख विराजमान हैं…हमारी भाषामें हमें ही उपदेश दे रहे हैं। भगवान ने उपदेश में जीवादि तत्त्वों का स्वरूप बतलाया, उसमें शुद्ध चैतन्य का अपार निजवैभव दर्शाकर उसका अनुभव करना कहा।

(१) ‘सत्’ जगत में जीव और अजीव ऐसे दो प्रकार के तत्त्व हैं। (२) वे प्रत्येक अपने-अपने उत्पाद-व्यय-ध्रुवत्व सहित है। (३) उनमें जो चेतन है वह जीव है। (४) जीव अनन्तानन्त हैं; उनमें अनन्त जीव मुक्त हैं, और उनसे अनन्तगुने जीव संसारी हैं।

(५) प्रत्येक जीव अपने शुद्ध या अशुद्ध भाव का कर्ता-भोक्ता है।

(६) संसारी जीव मिथ्यात्व और कषायभावों के कारण दुःखी है और नरक-तिर्यंच-मनुष्य तथा देव ऐसी चार गतियों में जन्म-मरण करता है।

(७) उनमें से जीव जैनमार्ग को पाकर शरीर और कषाय से भिन्न अपने आत्मस्वरूप को जान लेता है वह सम्यक्त्वादि भावों द्वारा मोक्ष का साधक होता है भेदज्ञान द्वारा अंतरात्मा होकर वह जीव संसारसे छूटने लगा और मोक्ष को साधने लगा।

(८) मोक्ष की साधना सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप वीतरागभाव द्वारा होती है; रागभाव मोक्षका साधक नहीं किन्तु बाधक है।

(९) बन्ध और मोक्ष के कारण संक्षेप में इस प्रकार हैं -

रागी बांधता कर्म, विराग संप्राप्त जीव छूटता है।
ऐसा ‘जिन’-उपदेश, अतः मत रच तू कर्मों में।
अतः निवृत्ति-मुमुक्षु, न करो राग किंचित् भी सर्वत्र।
होय यों वीतरागी, वह भव्य भवसमुद्र तर जाता।।

(१०) हे भव्य जीवों ! तुम चैतन्य-महिमा को जानो और वीतराग भाव का सेवन करो। वीतरागता ही सुख है, वीरागता ही जैनमार्ग का सार है और वीतरागता ही मोक्षमार्ग है।

श्री चन्द्रप्रभ तीर्थंकर की धर्मसभा में वीतरागमार्ग का सुन्दर उपदेश सुनकर तत्क्षण उसी समय अनेक जीव संसार छोड़कर मुनि हुए; अनेक जीवों ने ध्यान में सम्यग्दर्शन प्राप्त किया; अनेक जीवों के भेदज्ञान के अतिरिक्त अवधि मनःपर्ययज्ञान तथा बारह अंग ज्ञान विकसित हो उठा। अद्भुत था वह धर्म का मेला ! अहा, जिस मेले में धर्म की साधना करनेवाले लाखों-करोड़ों धर्मी जीवों के उपरान्त दस हजार तो केवलज्ञानी अरिहंत परमात्मा आकाश में विराजते थे; उनकी शोभा का क्या कहना !! श्री चन्द्रप्रभदेव आठवें तीर्थंकर थे; उनके समवसरण में श्रीदत्तादि ९३ गणधर थे; २००० पूर्वधारी-श्रुतकेवली थे; ८००० अवधिज्ञानी थे, ८००० मनःपर्ययज्ञानी थे; विक्रियालब्धि आदि अनेक ऋद्धिधारी हजारों-लाखों मुनिवर थे। तीन लाख अस्सी हजार आर्यिकाएँ, तीन लाख धर्मत्मा श्रावक तथा पाँच लाख श्राविकाएँ थीं। इसे अतिरिक्त सम्यग्दृष्टि देवो और तिर्यंचो तो अलग-ऐसे महान चतुर्विध संघ के बीच शासन नायक तीर्थंकर देव विराजमान थे।चन्द्रप्रभ के शासन में ऐसा महान चतुर्विध संघ मोक्षमार्ग में आनन्दपूर्वक सिद्धपुरी की यात्रा कर रहा था। एकसाथ इतना महान धर्मवैभव देखकर जीवों का चित्त सहज ही धर्म के प्रति आकृष्ट हो जाता था। सभा में सर्वत्र हर्ष-आनन्द छा रहा था; बैर-विरोध या खेदका कहीं नाम-निशान नहीं था।

ऐसी गौरवपूर्ण धर्मसभा के मध्य तीर्थंकर चन्द्रप्रभ प्रतिदिन चारबार छह-छह घड़ी तक (प्रतिदिन लगभग दस घन्टे तक) परमहितकारी धर्मोपदेश देते थे। तीर्थंकर प्रकृति की निर्जरा हेतु तथा देश-देशान्तर के भव्यजीवों के भाग्योदय से करोड़ों-अरबों वर्षतक भरतक्षेत्र में भगवान का श्रीविहार हुआ .और उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यरूप सत्‌तत्त्व तथा अनन्त धर्मस्वरूप अनेकान्त तत्त्व का प्रभुने उपदेश दिया। जो नित्यस्थायी रहकर परिणमता हो ऐसा जीव ही कर्मों का छेदन करके (संसार भावों से छूटकर) मोक्षको साध सकता है। यदि जीव पर्यायरूप से परिणमित न हो तो वह मोक्ष को नहीं साध सकता; (संसारी-दुःखी ही बना रहेगा); और यदि जीव नित्य न रहे तब भी वह मोक्षसुख प्राप्त नहीं कर सकता; (-उसका अभाव हो जायगा।) इसलिये ‘नित्यपरिणामी’ ऐसे अनेकान्त रुप स्वभाव मानने से ही मोक्षकी सिद्धि है। ऐसा अनेकान्तरूप जिनशासन प्राप्त करके अनेक जीवों ने एकान्तरूप मिथ्यामत का त्याग कर दिया, वे अनेकान्ती-सम्यग्दृष्टि जैन हो गये और जिनधर्म के वैभव को जानकर ज्ञायक भावके सुखका वेदन करके मोक्षसुख का आस्वादन करने लगे। प्रभु के उपदेश से भरतक्षेत्र में सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप मोक्षमार्ग, आनन्दमार्ग, विदेहक्षेत्रकी भाँति धारावाही रूप से चलने लगा। ज्ञान एवं रागादि कषायों की भिन्नता को भव्य जीव बराबर समझने लगे।

‘ज्ञान’ की आत्मा के साथ एकता है; वह ज्ञान कषायों से तथा कर्मों से विरुद्ध स्वभाववाला है, इसलिये ज्ञानरस के वेदन द्वारा कषायों एवं कर्मों का क्षय हो जाता है।

जीव के सम्यग्ज्ञानादि भाव ज्यों-ज्यों बढ़ते हैं त्यों-त्यों कषाय शांत होते जाते हैं और सर्वथा कषायरहित भी ज्ञानमय जीवन विद्यमान रहता है; परन्तु बिना ज्ञान के जीव कभी विद्यमान नहीं रहता।-इस प्रकार ज्ञान वह जीव का स्वरूप है और कषाय वह स्वरूप नहीं है।

कषाय में शान्ति नहीं है, ज्ञान में शान्ति है; कषायों में थकान है, ज्ञान में थकान नहीं है। सिद्ध भगवन्त केवलज्ञानरूप से अनंतकाल तक परिणमते हैं और लोकालोक को जानते हैं तथापि उन्हें कभी थकान नहीं लगती, बल्कि परम अतीन्द्रिय आनन्द का अनुभव होता है;-जबकि क्रोधादि कषाय में तो जीव क्षणभर में थक जाता है और उसमें दुःखका अनुभव होता है।

ऐसे स्पष्ट भेदज्ञान द्वारा कषाय से भिन्न उपयोग स्वरूप आत्मा का अनुभव करना वह मुक्ति का उपाय है, वह जिनशासन का आदेश है। जो अनंत जीव सिद्ध हुए हैं वे सब ऐसे भेदज्ञान द्वारा ही सिद्ध हुए हैं। भेदज्ञान के बिना चाहे अन्य कितना करे तथापि कोई जीव सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता-सम्यक्त्व भी प्राप्त नहीं कर सकता।-इस प्रकार प्रभु के श्रीमुख से भेदज्ञान का उपदेश सुनकर अनेक जीव मोक्षमार्ग में लग गये…नगर-नगर में तथा घर-घर में भेदज्ञान की चर्चा होने लगी।

भगवान चन्द्रप्रभ तीर्थंकर का विहार अद्भुत था। आकाश में ही उनका गमन था; उनके चरणों तले देवी कमलों की रचना होती थी, डग भरे बिना ही उनका गमन होता था और ओठ हिले बिना ही उनकी दिव्यध्वनि सर्वांग से खिरती थी। प्रभुकी दिव्यवाणी का मधुर स्वर बत्तीस कोस (करीब सौ किलो मीटर) के घेरे में स्पष्ट सुनाई देती थी। धर्मचक्र और देवदुंदुभी का नाद चारों ओर से भव्यजीवों को मोक्षसुख लेने के लिये बुलाते थे कि-हे जीवों! आओ…रे…आओ! तुम्हें संसार-दुःखों से छूटकर ‘मोक्षसुख’ प्राप्त करना हो तो यहाँ आओ…इन भगवान के दर्शन करो और इनकी वाणी सुनकर निजवैभव का अपने में अवलोकन करो। दूसरे कार्यों को एक ओर रखकर, प्रमाद छोड़कर शीघ्र यहाँ आओ और इन प्रभुके चरणों की सेवा करो। देखो, इन प्रभुने रत्नत्रय द्वारा आत्मतत्त्व की अद्भुत सम्पदा सिद्ध की है..और जगत को भी वह आत्मसम्पदा बतला रहे हैं। जो भव्यजीव प्रभुको पहिचानकर भक्तिपूर्वक अपने चित्तमें धारण करते हैं वे भी आत्मसिद्धि प्राप्त करके प्रभुसमान हो जाते हैं। भवदुःखों से भरा हुआ यह भववन भी प्रभुके मार्ग में चलनेवाले को तो नन्दनवन बन जाता है। प्रभु तो सबके ज्ञाता हैं परन्तु सर्वजीव प्रभुको नहीं जानते, कोई विरल ही स्वानुभव द्वारा प्रभुके अतीन्द्रिय स्वरूप को पहिचान पाते हैं। अरिहंतपद पर करोड़ों-अरबों वर्ष तक शरीर के संयोग में रहने पर भी प्रभुको कभी आहार लेना नहीं पड़ता; पानी पीना नहीं पड़ता। रोग नहीं होता; मल-मूत्र तो प्रभु को जन्म से ही नहीं। जगत के उत्तम परमाणु स्वयमेव प्रभुके शरीर में प्रविष्ट होकर उसका पोषण करते थे…इस प्रकार पूर्व के पुण्यकर्म आ-आकर प्रभुकी सेवा करते थे। प्रभुको शुभकर्म छूटने के लिये इतने अधिक उदय में आते थे कि उनके साथ कोई अशुभ कर्म हो तो वह भी शुभरूप हो जाता और समस्त कर्मों की निर्जरा ही हो जाती थी। उनकी सर्व क्रियाएँ कर्मक्षय का ही कारण थीं।

श्री प्रभु के विहारकाल में सर्वत्र सुकाल था; कहीं दुष्काल या रोगादि नहीं थे,; सब जीवों में बैर-विरोध शांत हो जाते थे; हिंसक पशु भी शांत और अहिंसक बनकर एक-दूसरे के मित्र बनकर बर्तते थे; गाय का बच्चा सिंहनी का दूध अपनी माता की भाँति पीता था और गाय भी सिंह के बच्चों को बछड़े की भाँति चाँटती थी; किसी को भय नहीं था; कहीं क्रूरता नहीं थी। अहा! तीर्थंकर का परमशांत आत्मा जहाँ विचर रहा हो वहाँ अशांति कैसी? प्रभुके समीप आकर अनेक क्रोधी जीवों को आश्चर्य होता था कि अरे! ऐसी शांति हममें कहाँसे आ गयी! फिर वे गहरे विचार में उतरकर क्रोध से भिन्न अपने शांतस्वभाव को देख लेते…और उस शान्ति के अनुभव से सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र को साध लेते थे। अहा! ‘चन्द्र’ का उदय होने से मोक्षमार्ग का समुद्र उल्लसित हुआ और सम्यक्त्वादि रत्न बाहर आये।

अति दीर्घकाल-करोड़ों-अरबों वर्ष तक (-ढाई लाख पूर्व अर्थात् १७६४००००,०००००००,००००० वर्ष तक) धर्मचक्र प्रवर्तन द्वारा देश-देशान्तर के करोड़ों-अरबों जीवों का कल्याण करके भगवान चन्द्रप्रभ तीर्थंकर सम्मेदाचल पर्वत पर पधारे। वहाँ एक मास प्रतिमायोग में स्थिर रहे; विहार रुक गया, वाणी रुक गई…पश्चात फाल्गुन शुक्ला सप्तमी के दिन वे अरिहंत प्रभु योगनिरोध करके अयोगी दशा को प्राप्त हुए, तेरहवें से चौदहवे गुणस्थान में (मोक्ष महल की अंतिम सीढ़ीपर) आये और तुरन्त सिद्धपद प्राप्त करके मोक्षमहल में प्रवेश किया। इन्द्रादिक देवोंने उनके मोक्ष कल्याण का महोत्सव किया। इस प्रकार आत्मसाधना द्वारा अष्ट कर्मों का अभाव करके, अष्टमतीर्थंकर, अष्टगुणसहित, अष्टम पृथ्वीपर सिद्धालय में विराजमान हैं। [चन्द्रप्रभ भगवान के मोक्षकल्याणक के दिन, उनकी मोक्ष टूक की यात्रा, पूज्य श्री कहानगुरु ने सवत् २०१३ में हजारों यात्रियों के सघसहित अति उल्लास एव भक्तिपूर्वक की थी। उसका आनन्दकारी वर्णन लेखक की मगल तीर्थयात्रा पुस्तक (गुजराती) में पढ़े, तथा सोनगढ़ मे पूज्य गुरुदेव की श्रीसम्मेदशिखर यात्रा की फिल्म मे देखे।]

चन्द्रप्रभ जिनराज की ललित टूंक है जेह,
मन-वचन-तन कर पूज हूँ शिखर सम्मेद यजेह।

जब हम लोग सम्मेद शिखर तीर्थ की यात्रा करते हैं तब दूर-दूर की ललित टूक पर जाकर चन्द्र-चरण का स्पर्श करने से ससार की थकान उतर जाती है। उस टूक के ठीक ऊपर सिद्धालय में आज भी विराज रहे वह सिद्धप्रभु ध्यान द्वारा अपने अतर में पधारकर किसी अपूर्व शान्ति का वेदन कराते हैं और अपने को भी सिद्धालय मे ले जाते हैं।

-सिद्धपदकी साधनासहित उन सिद्धभगवन्तों को नमस्कार हो !

[श्री गुणनन्दि आचार्य की शिष्य परम्परा में वीरनन्दिस्वामी ने चन्द्रप्रभ चरित्र रचा है, तथा वीरसेन और जिनसेनस्वामी के शिष्य गुणभद्रस्वामी के उत्तर पुराण में चन्द्रप्रभ चरित्र की रचना की है, उन पुराणों का अनुसरण करके यह चन्द्रप्रभ चरित्र की रचना की है, उन पुराणों का अनुसरण करके यह चन्द्रप्रभ चरित्र लिखा है। उसमें शारीरिक अलकारादि शृगार रसका वर्णन छोड़कर, शातरसमय आध्यात्मिक अलकारोंसहित आत्मार्थपोषक रचना की है। यह भव्यजीवों के हृदय में तीर्थंकर परमात्मा के प्रति भक्ति जागृत करे और उनकी बतलायी हुई आत्ममहिमा द्वारा सम्यग्दर्शनादि मोक्षमार्ग की प्राप्ति कराये। श्री वीरनिर्वाण सवत् २५०८, अश्विन कृष्ण चतुर्थी की सोनगढ के परमागम-मन्दिर में आत्म-साधक ब्र हरिलाल जैन ने , परमोपकारी गुरु-कहान की मगलस्मृति-पूर्वक यह कथा लिखकर समाप्त की। ‘जैन जयतु शासनम्।’]

१ प्रथम जो श्रीवर्मा राजा थे और सम्यक्त्व प्राप्त किया, २ पश्चात् प्रथम स्वर्ग मे देव हुए, ३ पश्चात् अजितसेन चक्रवर्ती हुए और छह खण्ड का राज्य छोड़कर मुनिदशा धारण की, ४ पश्चात् अच्युतस्वर्ग मे इन्द्र हुए, ५ पश्चात् राजा पद्मनाभ हुए और मुनि होकर दर्शनविशुद्धि आदि १६ भावना पूर्वक तीर्थंकर नामकर्म बाँधा, ६ पश्चात् वैजयन्त विमान में अहमिन्द्र हुए, और ७ अन्तिम भव में चन्द्रपुरी में चन्द्रप्रभ तीर्थंकर होकर भव्य जीवों को मोक्षमार्ग बतलाया और अन्त में भव का अभाव करके सम्मेदशिखर से सिद्धालय में सिधारकर वहीं सिद्धरूप में विराज रहे हैं,-ऐसे भगवान चन्द्रप्रभदेव को हमारा नमस्कार हो।

[इति श्री चन्द्रप्रभ चरित्र समाप्त]

९

भगवान सुविधिनाथ

जो स्वयं रत्नत्रयरूप सम्यक्विधिसहित मोक्षमार्ग में गमन करने से स्वयं ‘सुविधि’ हैं, तथा अन्य जीवों को भी मोक्षमार्ग की सु-विधि में लगाने वाले हैं - ऐसे तीर्थंकर सुविधिनाथ का मंगल जीवन-चरित्र अब सुनो, और हे भव्य जीवों ! तुम भी सुविधिपूर्वक मोक्षमार्ग में आओ।

सुविधिनाथ-पूर्वभव विदेहक्षेत्र मे महापद्म राजा

जिसप्रकार अपने इस जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह मे सीता नदी के उत्तर किनारे पुष्कलावती देश और पुण्डरीकिणी नगरी है और वहाँ सीमंधर महाराजा राज्य करते थे, -जो वर्तमान मे तीर्थंकर रुप से विचर रहे हैं, उसीप्रकार तीसरे पुष्करद्वीप के पूर्वमेरू के पूर्व विदेह मे भी सीता नदी के उत्तर किनारे पुष्कलावती देश और पुण्डरीकिणी नगरी है। अपने चरित्रनायक भगवान सुविधिनाथ पूर्वभवमे वहाँ के राजा थे- उनका नाम महापद्म।

जिस प्रकार गोपाल अपनी गायोंका पालन करता है उसी प्रकार महाराजा महापद्म अपनी प्रजा का वात्सल्यपूर्वक पालन करते थे। उसके पालन से पृथ्वी भी प्रसन्न होकर श्रेष्ठरत्न तथा अन्नादि उत्पन्न करती थी। राजा और प्रजा सब जैन धर्मका पालन करते थे और उत्तम शास्त्रों के अध्ययन द्वारा तत्त्वज्ञानसे सुशोभित होते थे। मुनिजनों के सत्संग से उनका जीवन सदाचारी था, श्रावको उत्तम व्रतोंका पालन करते थे, रात्रिभोजन आदि महादोष कोई नही करता था। वह एक आदर्श नगरी थी और वहाँके राजा-प्रजा का सम्बन्ध भी आदर्श रुप था, उनके बीच कदापि कोई क्लेश नहीं होता था, तथा प्रजा को राजा की ओर से कोई 'य नही था, वे एक दूसरे के सहयोग से राज्य की शोभा बढ़ाते थे और साथ ही साथ सम्यक्त्वादि आत्मगुणों द्वारा धर्म की वृद्धि करते थे।

इस प्रकार महापद्म राजा का जीवन धर्ममय था; राजकाज में रहने पर भी वे सम्यक्त्वसहित मोक्षमार्ग में गमन करते थे; साथ ही उनका पुण्ययोग भी महान था। एकबार वे राज्यसभा में बैठे थे, वहाँ वनपालने आकर शुभसमाचार दिया कि-हे स्वामी ! अपने मनोहर उद्यान में सर्व जीवोंको हितकारी, सर्वभूतहित जिनराज पधारे हैं, साथ में चतुर्विध संघ है; उनके आगमन से उद्यान सुशोभित हो उठा है, फूल खिल गये हैं और पशुपक्षीयों में भी प्रसन्नता व्याप्त है।

प्रभुके पधारने की बधाई सुनकर राजा को अति प्रसन्नता हुई; वे धामधूमसहित जिनवंदना करने चले। अहा जिनेश्वर देव को निरखते ही उनके चित्त में अपार हर्षसहित उपशमरस उल्लसित होने लगा। प्रभुकी वन्दना करके उपदेश सुनने बैठे।आत्मा अज्ञान से स्वयं ही भवदुःख उत्पन्न करता है और आत्म ज्ञान द्वारा वह स्वयं अपना मोक्षसुख प्राप्त करता है।भवदुःख और मोक्षसुख तथा उनके कारण, उन सबका वर्णन सुनकर राजा का चित्त भवदुःखसे उदासीन एवं मोक्षसुख के प्रति उत्साहित हो उठा। वैराग्य पूर्वक वे राजा महापद्म विचारने लगे कि-अनादि मिथ्याभावोसे दुषित आत्मा स्वयं, अपने में ही, अपने ही मिथ्यादि भावोद्वारा, अपने को उन्मत्त की भाँति भववन में भ्रमाता है और दुःखी होता है; मानो भूत लगाहो ऐसी अविचारी चेष्टाएँ करता है; विषय कषायरुप अहितकर कार्योंको वह हितकर मान लेता है और मोक्षके उपायसे भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संसार से भयभीत हुआ मै, अब उन से छूटने लिये मोक्षका उपाय करूँगा।

ऐसा विचारकर, पुण्डरीकिणी नगरीका राज्य अपने पुत्रको सौंपकर महाराजा महापद्मने सर्वजीवहितकारी जिनराजके चरणोंमे मुनिदीक्षा ग्रहण की। मुनि होकर आत्मध्यान करने लगे; उन्हे बारह अंगका ज्ञान प्रगट हुआ और दर्शनविशुद्धि आदि भावनाओं द्वारा महापुण्यरुप तीर्थंकर प्रकृति बंधने लगी। अंतमे समाधिमरण करके प्राणतस्वर्ग में अहमिन्द्र हुए। वहाँ दिव्य एश्वर्य में २० सागरोपम रहे। असंख्यवर्ष तक देवलोक के दिव्य वैभव का सुख भोगनेपर भी वे महात्मा उन इन्द्रियसुखों द्वारा तृप्त नही हुए, इसलिये उन असार सुखों को छोडकर अतीन्द्रिय मोक्ष सुखकी साधना के लिये वे मनुष्य लोक में आने को तत्पर हुए। देवलोक में उनकी आयु छह मास शेष रही और भरत क्षेत्र में तीर्थंकर रुप से अवतरित होने का समय आगया।

किष्किन्धा नगरीमें नव वें तीर्थंकर का अवतार

उस समय इस भरतक्षेत्र में काकन्दी नगरी (किष्किन्धा पुरी) में सुग्रीव महाराजा राज्य करते थे; उनकी महारानी जयरामा के उदर में तीर्थंकर का जीव अवतरित होनेवाला है ऐसा जानकर देव उनके आँगनके रत्नवृष्टि करने लगे। फाल्गुन कृष्णा नववीं की रात्रि के पिछले प्रहर में बैल हाथी, पुष्पमाला, लक्ष्मी आदि मंगल स्वप्नसहित अहमिन्द्रके जीवन स्वर्गलोक छोड़कर माता जयरामा के उदर में प्रवेश किया; उसी समय इन्द्र-इन्द्राणीने काकन्दी नगरी में आकर प्रभुके माता-पिताका सन्मान किया। महाराजा सुग्रीव स्वयं भी अवधिज्ञानी थे; उन्होंने अवधिज्ञान से स्वप्नफल जानकर कहा-हे देवी ! तुम्हारे उदर में जगत्पूज्य आत्मा का आगमन हुआ है; तुम महा कल्याणरुप हो, अपना वह पुत्र भी सर्वज्ञ-तीर्थंकर होकर जगत का कल्याण करेगा और हम भी नियमसे मोक्षगामी हैं। महाराजा के मुख से ऐसा उत्तम फल सुनकर जयरामा देवी के हर्षका पार नहीं रहा। उसी काल मानों मोक्षसुख की प्राप्ति हुई हो !-ऐसी तृप्ति का अनुभव उन्हें हो रहा था। स्वर्गलोक की देवियाँ उनकी सेवा करती थीं। मगसिर शुक्ला प्रतिपदा के दिन उन महादेवीने अति तेजस्वी अवधिज्ञानी पुत्रको जन्म दिया। अवधिज्ञानी पिता के यहाँ अवधिज्ञानीपुत्र का अवतार हुआ नौवें तीर्थंकर का अवतार होने से समस्त पृथ्वीपर हर्ष छा गया। देवलोक के दिव्य वाद्य अपने आप बजने लगे और प्रभुजन्मकी बधाई गाने लगे। वह सुनकर सारा स्वर्गलोक हर्षपूर्वक प्रभुके जन्मकल्याणक का महोत्सव मनाने के लिये काकन्दीनगरी में आ पहुँचा। उस समय काकन्दी नगरी देवों की अमरपुरी से भी विशेष शोभायमान हो रही थी। पंचमसमुद्र क्षीरोदधिके दुग्धसमान उज्ज्वल जल से इन्द्रने जिनेन्द्र का अभिषेक किया। समस्त पर्वतों में श्रेष्ठ-इन्द्रसमान मेरुपर्वत इन्द्र द्वारा जिनेन्द्र का अभिषेक करने के कारण जगतपूज्य तीर्थ बन गया। अहा, तीर्थंकर के स्पर्श से पत्थर भी जगत्पूज्य बनते हों, तो प्रभुके स्पर्श से चेतनवन्त भव्य जीव क्यों परमात्मा नहीं बनेंगे ? जन्माभिषेक के समय भगवान का अति सुन्दर रुप देखकर मुग्ध हुए हरिने एक हजार नेत्र बनाकर उस दिव्य रुप का अवलोकन करते हुए वहीं मेरु पर्वतपर ताण्डव नृत्य किया। और उन बाल तीर्थंकार को ‘पुष्पदन्त’ ऐसे मंगल नाम से सम्बोधित करके स्तुति की; तथा मोक्षमार्ग की सम्यक्विधि के प्रवर्तक होने से दूसरा नाम ‘सुविधिनाथ’ रखा। [सुविहिं च पुष्पदन्तं’-लोगस्ससूत्र में इन एक ही तीर्थंकर के दो नामों का उल्लेख करके स्तुति की है।]

आठवें चन्द्रप्रभ तीर्थंकर के मोक्षगमन के पश्चात् नव्वे करोड़ सागरोपम के अंतर से नौवें सुविधिनाथ-पुष्पदन्त तीर्थंकर हुए। उनकी आयु दो लाख पूर्व (अर्थात् १४११२००,००,००,०००,०००,००० इतने वर्ष थी;) उनका चिह्न मगर-मच्छ था।

उन बाल तीर्थंकर की कुमारावस्था भी अनुपम थी। यद्यपि देवों को भी दुर्लभ ऐसी भोगसामग्री उन्हें प्राप्त थी, परन्तु उनकी ज्ञानचेतना अंतर से किसी विशेष प्रकार के परमात्मसुख का उपभोग करती थी। स्वर्ग के देव बालक का रुप धारण करके उनके साथ क्रीड़ा करने आते थे ..और भवनवासी कुमारिका देविया अनेक प्रकारसे उन बाल तीर्थंकर को खेलाती गोद लेतीं और पालने में झुलाकर लोरियां गाती थी-उपशमरसमें झूल रहे हैं पुष्पदन्त भगवान, पालना झुला ओ रे…। समकित रसका स्वाद ले रहे सुविधिनाथ भगवान, पालना झुलाओं रे…। मुक्तिमार्ग बतलाकर प्रभुजी लेंगे केवलज्ञान, पालना झुलाओ रे…। जयरामा माता के प्यारे करेंगे जग-कल्याण, पालना झुलाओं रे…।

कभी वे छोटी-छोटी देवियाँ हाथ फैलाकर प्रभुको बुलाती थीं-कुँवर जी, आइये…इधर आइये ! तब वे बालकुँवर भी डगमग चाल से मुस्कराहट बिखेरते हुए अपने कोमल हाथ उन देवियों की हथेली में रख देते; अहा ! मानो प्रभुजीने उनके हाथमें मोक्ष ही रख दिया हो !-इस प्रकार बालतीर्थंकर के मंगलस्पर्श से वे देवियाँ अपने को धन्य मानतीं-और दो देवियाँ उनका एक-एक हाथ पकड़कर आनन्द पूर्वक उन्हें झुलाती थीं।

ऐसे दृश्य देखकर माता जयरामा भी अतिशय तृप्ति का अनुभव करती थीं। आनन्द-किल्लोल में समय बिताते हुए पुष्पदन्तकुमार ने बचपन को छोड़कर युवावस्था में प्रवेश किया। कामदेव उनकी सेवा में उपस्थित था…अनेक सुन्दर राजकन्याओं के साथ उनका विवाह हुआ। राजकन्याओंसहित उनका सुख देखकर विद्वानों को प्रश्न उठता था कि महाराजा सुविधिनाथ के द्वारा उन स्त्रियों को जो सुख मिल रहा है उसे महान कहा जाय, अथवा उन स्त्रियों द्वारा महाराजा को जो सुख प्राप्त हो रहा है उसे महान कहें ? महाराजा पुष्पदन्त तो 'महापुण्यवान थे ही, और वे स्त्रियाँ भी पुण्यवान थीं, क्योंकि मोक्षसुख जिनके अति निकट है ऐसे उन सुविधि-महाराजा को भी वे रानियाँ प्रसन्न करके अपने साथ क्रीड़ा कराती थीं ! भगवान सुविधिनाथ तो असंख्य वर्षों के दिव्य स्वर्ग सुखों के उपभोग से भी असन्तुष्ट रहकर अन्त में मोक्षसुख की साधना के लिये इस मनुष्यलोक में अवतरित हुए थे, इसलिये पुण्यजनित उत्तम भोग्य पदार्थों में भी उन्हें आश्चर्य नहीं लगता था…वे तो अनंत बार भोगे हुए जूठन समान लगते थे। हां, बिना प्रयत्न के प्राप्त हुई वह भोगोपभोग की महान सामग्री मूर्ख नास्तिक लोगों को स्पष्ट बतलाती थी कि-देखो, यह पूर्वभव में किये हुए जीव के पुण्यकर्मों का फल है; कारण के अनुसार कार्य होता है; यदि पूर्वभव में जीव न हो और पुण्य-पाप के फल न हों तो यह पुण्यफल कहाँ से आया ? और हमें ही क्यों आया ? दूसरे को क्यों नहीं आया ? इसलिये समझो कि जीव का अस्तित्व है, पूर्व भव है, पुण्य-पाप हैं और उनका फल भी है। ऐसा समझकर, प्रभुके पुण्यफल को देखकर, अनेक नास्तिक जीव भी (जो पहले आत्मा को तथा परलोक को नहीं मानते थे और पापभय से रहित पापों में स्वच्छन्द प्रवर्तन करते थे वे भी) आस्तिक बन गये और पाप से डरकर आत्मसाधना करने लगे।

महाराजा पुष्पदन्त को राज-भोगों के बीच अलिप्त ज्ञान चेतनासहित दीर्घकाल बीत गया। उनको पुण्यजनित राजभोग महान था…तो…आत्मजनित आनन्द का भोग उससे भी महान था…इसलिये पुण्यभोगों में उनकी रुचि नहीं थी। एक बार मगसिर शुक्ला प्रतिपदा के दिन वे राजमहल की छत पर आत्मचिन्तन कर रहे थे…इतने में-इतने में अचानक आकाश में उल्कापात हुआ…तीव्र गर्जना के साथ बिजली गिरी…बिजली की चमक देखते ही उन्हें वैराग्य जाग उठा कि-‘अरे, यह मात्र बिजली नहीं है, यह तो मेरे चारित्रमोहरूपी अंधकार को हटानेवाला महान दीपक है।’ प्रभुकी चेतना जागृत हो उठी…अहा, ऊर्ध्वगामी उज्ज्वल आत्माओं को एक छोटा-सा प्रसंग भी महान कार्य का निमित्त बन जाता है !! प्रभु तो स्वयंबुद्ध हैं; मात्र एक बिजली की क्षणभंगुर चमक देखकर वे महान साम्राज्य, राजभोग और रानियों को छोड़ने के लिये तत्पर हो गये। दीक्षा ग्रहण करने के निश्चयपूर्वक वे वैराग्य भावनाओं का चिंतन करने लगे।

अरे, अनन्तबार अहमिन्द्रपद का दिव्य वैभव पाकर भी यह जीव सन्तुष्ट नहीं हुआ तो इस मनुष्य लोक के वैभव में तृप्ति कैसी ? चैतन्य से आये हुए सुख के सिवा जीव को अन्यत्र कहीं तृप्ति नहीं होती। बाह्यसुखों का संयोग तो बिजली की चमक समान क्षणभंगुर है; चैतन्य का स्वाभाविक सुख ही संयोगरहित सच्चा एवं शाश्वत सुख है। यह सांसारिक विषय तो इन्द्र जाल के समान छलनेवाले हैं; उनमें जीव असत् पदार्थ को सत् मान बैठता है। इस संसार में किसी वस्तु का संयोग न तो स्थिर है, और न सुख देनेवाला। उसमे मेरा कोई नहीं है, मेरा आत्मा ही मेरा है-

जहाँ देह अपनी नहीं, तहाँ न अपनो कोय,
घर संपति पर प्रगट ये, पर हैं परिजन लोय।
पर हैं परिजन लोय, होय नहि वस्तु जाति कुल थारा;
मोहकर्मवश. परको अपना समझै सोइ गँवारा।
तू है दर्शन-ज्ञानमयी चैतन्य आत्मा न्यारा;
तातैं पर जड़ त्याग आपगहि, जो होवे निस्तारा।

-जगत मुझसे भिन्न है और मैं जगत से भिन्न हूँ-बस, इन दो शब्दों से होनेवाला भेदज्ञान ही सत्य है। आश्चर्य है कि शरीर से भिन्न आत्मा का ऐसा भेदज्ञान होने पर भी मैं अभी तक शरीर में मूर्च्छित होकर क्रोधादि युक्त संसार में रहा। दुःखदायी परभावों से भरे हुए इस संसार समुद्र से निकल कर अब मैं सिद्धपद को साधूँगा।

इस प्रकार भगवान पुष्पदन्त ने दीक्षा लेने का निर्णय करते ही लौकान्तिक देवों ने आकर स्तुतिपूर्वक प्रभुके वैराग्य की प्रशंसा की और इन्द्रोंने आकर प्रभुके दीक्षाकल्याणक का भव्य महोत्सव किया। दीक्षा कोई खेद का प्रसंग नहीं है, वह तो मोक्ष की साधना का मंगल महोत्सव है…आनन्द का अवसर है। ‘सूर्यप्रभा’ नामकी देव-शिबिका में प्रभु आरूढ़ हुए और राजाओं तथा इन्द्रोंने वह शिबिका उठाकर दीक्षावन की ओर प्रयाण किया। अहा, स्वयं इन्द्र जिनकी पालकी उठाये उनके दिव्य प्रताप का क्या कहना !! उनके वैराग्य की क्या बात !! अपूर्व वैराग्य का वह दृश्य नगर के लोग आश्चर्यमुग्ध होकर देखते रहे। प्रभुके साथ अनेक भव्य जीवों का चित्त भी संसार से विरक्त हो गया। मगसिर शुक्ला प्रतिपदा के सायंकाल एक हजार राजाओं के साथ भगवान सुविधिनाथ दीक्षा लेकर दिगम्बर मुनि हुए और आत्मध्यान में शुद्धोपयोग द्वारा परम वीतरागी सुखका अनुभव करने लगे; उसी समय मनःपर्ययज्ञान भी प्रगट हुआ…परन्तु प्रभुका उपयोग मनःपर्यय में नहीं लगा था, उनका उपयोग तो शुद्ध आत्मा की अनुभूति में ही लग रहा था। अनेक महान ऋद्धियाँ उन्हें प्रगट हुईं, परन्तु अनन्त चैतन्यऋद्धि के अवलोकन में निमग्न प्रभुको बाह्य ऋद्धियों का कोई उपयोग नहीं था।

पुष्पदन्त मुनिराज ने प्रथम पारणा शैलपुरी नगरी के राजा पुष्यमित्र के घर किया। और वहीं रत्नवृष्टिआदि पंचाश्चर्य हुए।-देवों ने जयजयकार किया। सुविधिमुनिराज ने मोक्षमार्ग की सम्यक्विधि पूर्वक चार वर्ष तक मौन रहकर विहार किया; फिर काकन्दीनगरी के दीक्षावन में पधारे और अप्रतिहतभाव से आत्मध्यान में एकाग्र हुए; ४७ घातिकर्मों की बड़ी सेना को उन्होंने अकेले ही एकमात्र शुद्धोपयोग रूपी शस्त्र द्वारा नष्ट कर दिया, और अपना अनन्त चतुष्टयरूप साम्राज्य प्राप्त करके परमात्मा बन गये…वीतराग-सर्वज्ञ-शुद्धबुद्ध-जिन अरिहंत तीर्थंकर हो गये।

देवों ने आकर अचिन्त्य शोभायुक्त समवसरण की रचना की; परन्तु आश्चर्य यह था कि ऐसे अचिन्त्य शोभामय समवसरण में प्रभु विराजते नहीं थे; प्रभु तो उसे छोड़कर उससे चार अंगुल ऊपर, आकाश में निरालम्बीरूप से विराज रहे थे। प्रभुका आत्मा तो रागादि से अलिप्त था, और शरीर भी समवसरणादि से अलिप्त !-कैसी आश्चर्यकारी परमात्मदशा !

“ऊँचे चतुरंगुल जिन राजे, इन्द्र-नरेन्द्र-मुनि ध्यावैं।
जैसा निरालम्बी आत्मद्रव्य, वैसा ही निरालम्बी जिन
देह।”

उस समवसरण में ओष्ठ हिले बिना ही प्रभु की दिव्यध्वनि खिरने लगी। उस दिव्यध्वनि में सर्वतत्त्वों का स्वरूप समझकर भव्य जीव आनन्द से झूम उठे और भगवान के चरणों में लाखों जीवों ने रत्नत्रय अंगीकार किये। उस धर्मसभा में सात हजार केवलज्ञानी भगवन्त और डेढ़ हजार श्रुतकेवली थे। सप्तऋद्धियों के धारी विदर्भ आदि अठासी गणधर थे। आठ हजार अवधिज्ञानी तथा साढेसात हजार मनःपर्ययज्ञानी मुनिवर थे, कुल दो लाख मुनि एव चार लाख आर्यिकाएँ, दो लाख श्रावक और पाँच लाख श्राविकाएँ-ऐसे महान संघ के बीच नौवे तीर्थंकर शोभायमान हो रहे थे। तदुपरान्त असंख्य देव और तिर्यंच भी प्रभुकी देशना सुनकर धर्म को प्राप्त हुए।

इन्द्र ने परम भक्तिपूर्वक उन सर्वज्ञ परमात्मा की स्तुति करते हुए कहा : हे देव ! आप स्वयं अतीन्द्रिय हुए हो और अन्य जीव भी अतीन्द्रिय ज्ञान द्वारा ही आपको पहिचान सकते हैं; इन्द्रियों द्वारा आप नहीं पहिचाने जाते। प्रभो, आपका उपदेश और आपका जीवन अतीन्द्रिय आत्मा को बतलानेवाला है। जो जीव अपने हृदय में आपका वीतराग धर्म धारण करता है, वचन में आपके अनेकान्त वचनों को बसा लेता है, तथा जिसके शरीर की प्रवृत्ति में आपकी प्रवृत्ति बस जाती है;-इस प्रकार अपने मन-वचन-काय की प्रवृत्ति को आपके मार्ग में ही प्रवर्तन कराता है वह प्राणी आप जैसा होकर परम आनन्द को प्राप्त करता है।

हे परमात्मा ! ‘मनमे’ आपका स्मरण करते हुए यद्यपि कुछ विकल्प का क्लेश तो होता है, परन्तु ‘ज्ञानमें’ आपके चिन्तन का फल त्रिलोक में अति महान है,-तो फिर अपना हित चाहनेवाले जीव आपका चिन्तन क्यों नहीं करेंगे ? मूर्ख जीव ही ऐसे महान फल की इच्छा नहीं करेंगे ।

सर्वज्ञ-तीर्थंकर के रूप में पुष्पदन्त भगवान ने लाखों-करोड़ों वर्ष तक भरतभूमि में विहार किया। वह धर्मकाल था, भरतक्षेत्र के भव्य जीवों हेतु मोक्षका राज मार्ग खुला था और रत्नत्रय द्वारा भव्य जीवों के समूह आनन्दपूर्वक उस मार्ग पर चल कर मोक्षपुरी में जा रहे थे।

अंत में, भगवान के मोक्षगमन का समय आ पहुँचा। वे अनंत तीर्थंकरों की मोक्षभूमि सम्मेदशिखर पर पधारे; वहाँ सुप्रभ नामकी टूंक पर तीसरे-चौथे शुक्लध्यान द्वारा योगनिरोध करके, आश्विन शुक्ला अष्टमी के दिन स्वाभाविक उर्ध्वगमन करके सिद्धालय में पधारे। आज भी वहीं विराज रहे हैं…उन्हें नमस्कार हो।

पुष्पदन्त जिनराज की, सुप्रभ टूंक है जेह,
मन-वच-तन कर पूज हूँ, शिखरसम्मेद यजेह।

जिन्होंने स्वयं ‘सुविधि’ (सम्यक्विधि) पूर्वक मोक्षमार्ग में चलकर अन्य जीवों के लिये वह मार्ग सरल और शुद्ध कर दिया; उपशांत भाववान भक्तों के लिये जिन्होंने स्वर्ग-मोक्ष की ‘सुविधि’ बतलायी; ‘पुष्प’ से भी सुशोभित जिनकी ‘दन्त’ पंक्ति थी-ऐसे पुष्पदन्त-सुविधिनाथ, रत्नत्रय के आनन्द पुष्पों द्वारा एव मोक्षमार्ग की विधि से हमारे आत्मा को अलंकृत करो। हे प्रभो! संसार के घोर मरुस्थल के बीच विशाल घटादार वृक्ष समान आपका आश्रय लेकर हम अपने भवताप को शांत करते हैं।

[प्रथम जो पुष्कर द्वीप के विदेहक्षेत्र मे महापद्म राजा थे, पश्चात् चौदहवें स्वर्ग मे इन्द्र हुए और उस इन्द्र वैभव को भी छोड़कर, भरतक्षेत्र की काकन्दीपुरी में तीर्थंकर रूप से अवतरित होकर मोक्षको प्राप्त हुए; उन भगवान सुविधिनाथ (पुष्पदन्त स्वामी) का मंगलचरित्र यहाँ पूर्ण हुआ।

* * * [इस भरतक्षेत्र मे भगवान ऋषभदेव से लेकर चन्द्रप्रभ तक के आठ तीर्थंकरों का शासन अखण्डरूप से चला। पश्चात् भगवान सुविधिनाथ तीर्थंकर के. शासन में चतुर्थकाल के मध्यसमयरूप धर्मकाल होने पर भी, शीतलनाथ तीर्थंकर से पूर्व १/४ पूर्व तक (अर्थात् १७६४००० x एक करोड़ = १७६४०००/००००००० इतने वर्षों तक) जैनधर्म के वक्ता-श्रोता के धर्मात्मा भरतक्षेत्र में नहीं थे, अर्थात् धर्म का विच्छेद हो गया था। भगवान शीतलनाथ के अवतार से पुनः धर्म की धारा प्रवाहित हुई। (धर्म का यह विच्छेद विजयार्द्ध पर्वत की श्रेणी मे लागू नहीं होता।) इस प्रकार भगवान सुविधिनाथ से धर्मनाथ तक के तीर्थंकरों के काल में कुल सात बार भरतक्षेत्र में धर्म का विच्छेद हुआ। भगवान शान्तिनाथ के पश्चात् महावीर भगवान तक धर्म की धारा अखण्डरुप से चली जो पंचम काल के अंत तक चलेगी। जिस धर्म का चौथे काल में भी करोड़ों वर्षतक विच्छेद हुआ वह धर्म आज हमें इस पंचम काल में भी अखण्ड धारा प्रवाह रुप से अविच्छिन्न प्राप्त हो रहा है, अहा, अपने लिये वर्तमान में भी धर्मकाल है।]

१०

भगवान शीतलनाथ

[१०]

भद्रिलापुरी सम्मेदशिखर भगवान शीतलनाथ नौवें तीर्थंकरके तीर्थ के अंत भागमें लाखों-करोडों वर्षतक भरतक्षेत्र में धर्मका जो विच्छेद था वह जिन के अवतार से दूर हुआ और पुनःधर्मचक्र का प्रवर्तन हुआ-ऐसे भगवान शीतलनाथ की स्तुति करते हुए आचार्य समन्तभद्र महाराज कहते हैं कि- हे ‘शीतल जिनेश ! इन संसार से संतप्त जीवोंको जो परम शीतलता आपके दर्शन और वाणी प्रदान करते हैं, वैसी शीतलता चन्दन या चन्द्रमा, गंगाजल या मणि का हार भी नहीं दे सकते। इसलिये मै आपका आश्रय करता हूँ।’ जिसप्रकार ग्रीष्मके तीव्र ताप में सुन्दर वृक्षकी शीतल छायामें आनेवाले जीव शीतलता प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार उत्तम वृक्ष-चिन्हवाले भगवान शीतल जिनके धर्मवृक्ष का जो आश्रय करते हैं वे सम्यक्तवादी परमशीतलता को प्राप्त होते हैं और संसार के आतपसे मुक्त हो जाते हैं।-ऐसे भगवान शीतलनाथ का पवित्र जीवन चरित्र हे भव्य जीवो ! तुम भक्ति से सुनो !

भगवान शीतलनाथ : पूर्वभव : सुसीमानगरी में पद्मगुल्म राजा

पुष्कर द्वीपके पूर्वभाग में मंदारगिरी नामक मेरुपर्वत है; उसकी पूर्वदिशा में विदेह क्षेत्रमें सीतानदी के किनारे वत्सदेश और सुसीमानगरी है। अपने चरित्रनायक भगवान शीतलनाथ पूर्वभव में उस सुसीमानगरी में पद्मगुल्म नामके राजा थे। राजवैभव के बीच भी वे आत्मज्ञानी एवं वैरागी थे; अचिन्त्य आत्मवैभव के ज्ञाता होने से वे राजवैभव से अलिप्त रह सकते थे; चैतन्यसुख के समक्ष अन्य किन्हीं इन्द्रियसुखों को वे सुख नहीं मानते थे, परन्तु दुःख ही समझते थे; तथापि अभी राग के कारण राज्य में रहनेसे भोग-विषयों में भी किंचित् प्रवृत्ति होती थी। इस प्रकार द्विविध परिणतिमें एक साथ प्रवर्तमान होनेपर भी भेदज्ञानशक्ति के कारण उनका आत्मा मोक्षपुरी की ओर गमन कर रहा था, और अब मोक्षपुरी पहुँचने में बीच का एक ही भव शेष था।… राजा पद्मगुल्म एकबार वसन्तऋतु का आगमन होते ही फल एवं पुष्पाच्छादित सुन्दर उद्यान में अपनीरानियों सहित वसन्तोत्सव मनाने गये; वहाँ दो महिने तक नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ की; वसन्त ऋतु कब बीत गई और कब ग्रीष्म ऋतु की प्रारम्भ हो गई उसका भी उन्हें पता नहीं चला। परन्तु वसन्त ऋतु की क्षणभंगुरता देखकर उनका चित्त संसार भोगों से उदास हो गया कि-अरे, यह सब भोग सामग्री भी वसन्त ऋतु की भाँति क्षणभंगुर है; कोई भी संयोग जीव के साथ ध्रुवरूप से नहीं। रहता ऐसे अध्रुव संयोगों में आसक्त रहना मुझे शोभा नहीं देता-इस प्रकार संसार से विरक्त होकर उन्होंने आनन्द नामक मुनिराज के निकट जिनदीक्षा अंगीकार कर ली। रत्नत्रयसहित तप-आराधना करते-करते उनको ग्यारह अंग और चौदह पूर्व का ज्ञान हुआ। सम्यक्त्व की विशुद्धतासहित सोलह उत्तम भावनाओं से तीर्थंकर प्रकृति बँधने लगी। एक ओर निरन्तर तीर्थंकर प्रकृति का कर्म बँध रहा था तो दूसरी ओर रत्नत्रय की शुद्धि द्वारा वे प्रतिक्षण मोक्षको साध रहे थे; ऐसी द्विविध धारा मे मोक्षधारा प्रबल और बंध धारा क्षीण होती जा रही थी इस प्रकार मुनिराज पद्मगुल्म आराधक भावसहित आयु पूर्ण करके पन्द्रहवें आरण-स्वर्ग मे इन्द्ररूप से उत्पन्न हुए।

उन महात्मा भावी तीर्थंकरने स्वर्ग के वैभव के बीच भी मोक्षकी साधना अनवरत चालू रखी और असंख्यात वर्ष एक क्षण की भाँति व्यतीत कर दिये। स्वर्गलोक मे उन्हे अनेक कल्पवृक्ष प्राप्त थे, परन्तु उनके फल खाने की लालसा उनको नहीं थी, बाईस हजार वर्ष मे मात्र एक बार ‘अमृत’ का स्मरण करके मानसिक आहार से वे तृप्त हो जाते थे। उनकी वासनाएँ ऐसी शांत हो गई थी कि प्राप्त हुए उत्तम विषयों को भोगने की वृत्ति भी उनको नही होती थी, उन्हे तो बाह्य विषयो से रहित चैतन्य का आनन्द ही अधिकाधिक भोगने की लालसा रहती थी। इसलिये उस पूर्ण आनन्द को प्राप्त करने के लिये वे स्वर्ग छोड़कर मनुष्य लोक मे आने को तैयार थे, क्योंकि स्वर्ग मे तो उस पूर्ण आनन्द की प्राप्ति नहीं हो सकती। जब स्वर्ग की आयु मे उनके छह मास शेष रहे और मनुष्य लोक मे तीर्थंकर रूप से अवतरित होने का समय आ गया, उस समय मध्यलोक मे क्या-क्या तैयारियाँ होने लगी वह हम देखें।

भद्रिलापुरी मे शीतलनाथ अवतार

यह बात आज-काल की नही, असंख्यात वर्ष पूर्व की है, तब भरतक्षेत्र मे भद्रपुर (भद्रिलापुरी) नाम की नगरी थी। वहाँ दृढ़रथमहाराजा तथा सुनन्दा महारानी के राजमहल मे छह मास से रत्नवर्षा होने लगी, मानों तीर्थंकर की सेवा करने के लिये स्वर्ग से लक्ष्मी स्वयं पहले से आ पहुँची। छह मास पश्चात् चैत्र कृष्णा अष्टमी के दिन रात्रि के पिछले प्रहर मे सुनन्दा देवी ने अतिमंगल सूचक सोलह स्वप्न देखे, और उसी काल स्वर्ग से चयकर वह इन्द्र का जीव (शीतलनाथ भगवान का मंगल-आत्मा) उनके उदर मे आ गया। भरतक्षेत्र के लिये यह एक आश्चर्यकारी मंगल घटना थी जो असंख्य वर्षों पश्चात् हो रही थी। धन्य हुए वे माता-पिता और धन्य हुई वह भद्रिलानगरी !

स्वर्ग से उन होनहार तीर्थंकर और आत्मज्ञानी महात्मा (शीतलनाथ) का भरतक्षेत्र मे अवतरण होते ही करोड़ो वर्ष से धर्म का जो विरह था उसका अंत हुआ ,धर्म की धारा पुनः प्रवाहित हुई। वह आत्मा तीर्थंकर तो अब आगे होगा, उससे पूर्व ही उनकी उपस्थिति मात्र से भरत क्षेत्र का धर्मतीर्थ जीवंत हो उठा। धन्य है धर्मात्मा का प्रभाव ! देवों ने भी उस अवसरपर भद्रिलापुरी में आकर मंगल-उत्सव मनाया और गर्भस्थ तीर्थंकर सहित माता-पिता का भी सन्मान करते हुए इन्द्राणी ने कहा: “अहो माता ! विश्व का सर्वोत्तम रत्न आपके उदर में विद्यमान है, जो मोक्षमार्ग को प्रकाशित करके जीवों का कल्याण करेगा ! धन्य रत्नकुक्षिधारिणी माता ! जगत में आप भी वंद्य हो !” सुखपूर्वक नौ महिने बीत गये…गर्भावस्था में उन तीर्थंकर आत्मा को या उनकी माता को कोई कष्ट या पीड़ा नहीं थी। अहा, स्वर्ग के देव जिनकी सुविधाओं का ध्यान रखते हों और सेवा करते हों उनके पुण्योदय का क्या कहना !! गर्भवास में भी मानो सुन्दर रत्नमहल में रहते हो ऐसी सातापूर्वक, आत्मज्ञान-सम्यग्दर्शन तथा अवधिज्ञान सहित गर्भकाल व्यतीत किया और माघकृष्णा द्वादशी के दिन सुनन्दामाता की कुक्षि से बालतीर्थंकर का जन्म हुआ। उस समय सब नक्षत्र उत्तम योगमें वर्त रहे थे…क्षणभर के लिये सारा जगत मानो सुखी था। ऐसा उत्तम योग भरत क्षेत्र में चौबीस तीर्थंकरों के कल्याणक-काल में ही आता है..अहा ! प्रकृतिका परिणमन भी मोक्षसाधक-महात्माओं के आधीन होता है।

भरतक्षेत्र में दसवें तीर्थंकर का जन्म होते ही इन्द्रासन डोल उठा और आनन्दपूर्वक प्रभुजन्म का उत्सव मनाने के लिये देवगण भद्रिलापुरी में आ पहुँचे..धामधूमपूर्वक बालतीर्थंकर को मेरु पर ले जाकरं विश्वकल्याणकारी अभिषेक किया। भगवान के अवतार से जगत के जीवों को शीतलता प्राप्त हुई, इसलिये इन्द्रने ‘शीतलनाथ’ के सम्बोधन से उनकी स्तुति की-हे शीतलनाथ ! कल्पवृक्ष भी जीवों को जो शीतलता नहीं दे सकता ऐसी वीतरागी शान्तिरूप शीतलता आपने जगतके जीवों को प्रदान की है; इसलिये वह कल्पवृक्ष भी आपकी शीतलता का आश्रय लेने के लिये आपकी चरणछाया में (चिह्न रुपमें) निवास करने लगा है।

भगवान शीतलनाथ की आयु एक लाख पूर्व तथा शरीर की ऊँचाई नव्वे धनुष (२७० मीटर) थी। पच्चीस हजार पूर्व की आयु में उनका राज्याभिषेक हुआ था। प्रतापी तीर्थंकर के राज्य में प्रजा सर्व प्रकार से सुखसम्पन्न एवं धर्मपरायण थी। पचास हजार पूर्व तक उन्होंने राज्यभोग किया। अब उनको संसार में रहने का काल मात्र पच्चीस हजार पूर्व शेष रहा था…भव के अंत की तैयारी थी तब एक वैराग्य प्रेरक घटना हुई-महाराज शीतलनाथ एकबार प्रातः वनविहार करने गये थे; चारों ओर फलफूलों से प्रफुल्लित प्रसन्नकारी वातावरण था; रंगबिरंगे पुष्पोंपर गिरे हुए ओसविन्दु सच्चे मोती समान चमक रहे थे। उनकी अद्भुत शोभा निहारते हुए शीतल-महाराजा प्रसन्नता से वनविहार कर रहे थे। कुछ ही समय पश्चात् लौटते हुए उन्होंने देखा तो समस्त ओसविन्दु क्षणभर में नष्ट हो गये हैं…प्रभात का सौन्दर्य भी अब पहले जैसा नहीं रहा था। वह देखकर महाराज शीतलनाथ को वैराग्य जागृत हुआ कि-अरे, यह मनुष्य जीवन और यह राजा-रानी के संयोग सब ओसविन्दुओं के समान क्षणभंगुर हैं; उनकी शोभा और संयोग क्षणभर मे विलीन हो जाते है। संसार के सर्व पदार्थ प्रतिक्षण परिवर्तित हो रहे हैं; जीव के विभाव भी क्षण-क्षण मे पलट जाते हैं; उन पर पदार्थों या परभावों के भरोसे रहना योग्य नहीं हैं। स्थिर एवं अवियोगी तो अपना असयोगी आत्मा है। कर्म भले ही पुण्यरूप हो अथवा पापरूप हो, उसके द्वारा जीव को सुख कैसे मिल सकता है?-पुण्य के फलरूप विषयों में यदि सुख होता तो, मुझे पुण्य की पराकाष्ठा रूप उत्कृष्ट सामग्री प्राप्त होने पर भी मेरा मन संतुष्ट क्यों नहीं है? इसलिये विषयसामग्री का सुख वह सच्चा सुख है ही नही, उसमे जगत सुख मानता है वह मिथ्या है; विषयों के प्रति उदासीनता और निज चैतन्यस्वरूप मे रति वही सच्चा सुख है। परन्तु जहाँ मोह है वहाँ विषयों के प्रति उदासीनता अथवा चैतन्य में लीनता कहाँ से होगी? इसलिये मै मोह का सर्वथा नाश करके शुद्धात्मा के ध्यान द्वारा केवलज्ञान प्रगट करूँगा और परमात्मा बनूँगा।

महाराजा शीतलनाथ ऐसा वैराग्य चिन्तन कर रहे थे उसी समय परिणामविशुद्धि से उनको जातिस्मरण ज्ञान हुआ कि मै पूर्वभव मे पद्मगुल्म राजा था, उस समय भी ऋतु का परिवर्तन देखकर मेरा चित्त संसार से विरक्त हो गया था; और इस समय भी ओस बिन्दुओं की क्षणभंगुरता देखकर मेरा मन संसार से विरक्त हो गया है। इस प्रकार प्रभु की दीक्षा का अवसर जानकर ब्रह्मलोक से लौकान्तिक देव वहाँ आये और प्रभुकी स्तुति करके उनके वैराग्य की प्रशंसा की। उसी समय इन्द्र ‘शक्रप्रभा’ नाम की पालकी लेकर आ पहुँचे। उसमें आरूढ़ होकर विरागी प्रभुने ससार का त्याग करके मोक्ष साधने के लिये वन की और प्रयाण किया। माघ कृष्णा द्वादशी (अपनी जन्मतिथि के दिन) को शीतलनाथ प्रभुने स्वयं दीक्षा धारण की। एक हजार राजाओं ने भी उनके साथ दीक्षा ले ली; बाह्य में वस्त्रादि समस्त परिग्रह और अतर मे बारह कषायो में से आठ कषायों छोड़कर ‘शुद्ध’ हुए वे महात्मा आत्मध्यान में एकाग्र हुए। अहा, धन्य वह ‘शुद्ध’ पद! जिसकी महिमा करते हुए महात्मा कुन्दकुन्द उसे नमन करते हैं-रे ‘शुद्ध’ ने श्रामण्य भाख्युं, ज्ञान-दर्शन ‘शुद्ध’ ने छे ‘शुद्ध’ ने निर्वाण, ‘शुद्ध’ ज सिद्ध, प्रणमुं तेहने।

प्रभु शीतल ऐसे ‘शुद्ध’ श्रमण हुए और सिद्धसमान सुशोभित हो उठे…वे ‘शीतल’ तो थे ही, चैतन्य के शातरस में लीनता द्वारा मुनि होकर वे परम शीतल हो गये; कषायों की कलुषता को ध्यान द्वारा धो डाला। तीन रत्न-चार ज्ञान-पाँच महाव्रत तथा छह आवश्यक के धारी वे मुनिराज दो उपवास के पश्चात् तीसरे दिन अरिष्ट नगरी में पधारे, और वहाँ के राजा पुनर्वसु ने नवधाभक्ति से अत्यन्त हर्षपूर्वक खीर का आहारदान देकर उन्हें पारणा कराया। तीर्थंकर को मुनिदशा में प्रथम आहारदान देनेवाले उन राजा के महाभाग्य की देवों ने भी प्रशंसा की-अहो दानं…महादानं..कहकर आकाश से पुष्पवृष्टि करके दिव्य वाद्य बजाये।

शीतलनाथ प्रभुने तीन वर्ष तक मुनिदशा में रहकर आत्मध्यान द्वारा परमात्म साधना की और अत में पौष कृष्णा चतुर्दशी के सायंकाल केवलज्ञान प्रगट करके स्वयं परमात्मा बन गये। देवों तथा मनुष्यों ने परमात्मपद प्राप्ति का महान उत्सव किया। अरे, तिर्यंच भी उन परमात्मा को देखकर आनन्दित हो उठे। नरकगति के जीव यद्यपि यहाँ आ नहीं सके थे, परन्तु प्रभु के तीर्थंकरत्व के प्रभाव से उन्हें नरक में भी दो घड़ी साता का अनुभव हुआ और आश्चर्यचकित होकर तीर्थंकर की महिमा करके उनमें से कितने ही जीव सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए। शीतलप्रभु के प्रताप से नरक में भी उनको सम्यक्त्व की अपूर्व शीतलता प्राप्त हुई। धन्य है तीर्थंकरत्व की दिव्यता ! धन्य उनके कल्याणक !

देवों ने धर्मसभा के रूप में अद्भुत समवसरण की रचना की…और इन्द्र स्वयं आकर प्रभुकी पूजा करके धर्मोपदेश श्रवण करने बैठा। शीतलनाथ प्रभुके उस धर्म-दरबार में ‘अनगार’ आदि ८१ गणधर थे- जो आश्चर्यकारी सप्त ऋद्धि के धारक थे। वह सात ऋद्धियां इस प्रकार हैं:- १. बुद्धि, २. तप, ३. विक्रिया, ४. रस, ५. बल, ६. औषधि और ७. अक्षीण।-ऐसी ऋद्धि सम्पन्न ८१ गणधरों के अतिरिक्त १४०० श्रुतकेवली मुनिवर थे; ६९००० उपाध्याय मुनि थे; ७२०० अवधिज्ञानी थे; १२००० विक्रियालब्धि धारी मुनिवर थे; ७५०० मन:पर्ययज्ञानी थे;-कुल मिलाकर एक लाख मुनिवर मोक्ष की साधना कर रहे थे। जिनमें ७००० तो प्रभु जैसे ही केवलज्ञानधारी अरिहंत थे…वह भी समवसरण के श्रीमण्डप में ५००० धनुष ऊपर, प्रभु के समकक्ष गगन में विराजते थे। अहा ! एक साथ हजारों केवली भगवन्त और लाखों मुनिभगवन्तों से उमड़ते हुए मेले का वह मंगल दृश्य मुमुक्षु के चित्त में मोक्षसाधना की ऊर्मियां जागृत करता था। वहाँ तीन लाख जितनी आर्यिकाएँ और पाँच लाख श्रावक-श्राविकाएँ भी प्रभुका उपदेश सुनकर आनन्दपूर्वक मोक्षमार्ग में गमन कर रहे थे। देवों का तो क्या कहना ! कितने ही तिर्यंच भी प्रभु के दर्शन करके तथा धर्मोपदेश सुनकर आत्मज्ञान प्राप्त करते और अंतरात्मा होकर परमात्मपद की साधना करते थे। (मोक्ष के मेले का दृश्य पृष्ठ १४५ पर देखें।)

इस प्रकार करोड़ों वर्ष तक धर्मोपदेश देकर अरबों जीवों का मिथ्यात्व छुड़वाते हुए तथा सम्यक्त्वादि रत्नों की प्राप्ति कराते हुए, तीर्थंकर शीतलनाथ सम्मेदशिखर पधारे। अब मोक्षपुरी जाने में उनको मात्र एक मास शेष रहा था, इसलिये उन्होंने सम्मेदशिखर की विद्युत्वर टूंकपर स्थिर योग धारण किया। विहार एवं वाणी रुक गये। पश्चात् अन्तिम शुक्लध्यानपूर्वक अनुक्रम से सम्पूर्ण योगनिरोध करके, आत्मप्रदेशों की सम्पूर्ण स्थिरता द्वारा अशेषरूप से कर्मों का क्षय करके, तथा सर्वगुणसम्पन्न होकर प्रभु सिद्धालय में सिधारे। आश्विन शुक्ला अष्टमी के दिन देवों ने दसवें तीर्थंकर भगवान के मोक्षगमन का मंगल-महोत्सव मनाया। उस अवसर पर भी अशरीरी सिद्धों का तथा उनके अतीन्द्रिय सुख का चिन्तन करके, कितने ही जीवों ने सम्यग्दर्शन द्वारा अपने में वैसे सिद्धसुख का आस्वादन किया और वे भी सिद्धपुरी के पथिक बन गये…

शीतलनाथ जिनराज की विद्युत्वर टूंक जेह,
मन-वच-तन कर पूज हूँ शिखरसम्मेद यजेह।

इस प्रकार भव्य जीवों के परम शीतलता प्रदान करनेवाले भगवान शीतलनाथ तीर्थंकर के पंचकल्याणक पूर्ण हुए…वे भव्यजीवों को मंगलरूप हों।

[इति श्रीशीतलनाथ पुराण समाप्त]