चारित्र भक्ति | charitra bhakti

हरिगीतिका

मोह क्षोभ विहीन निज परिणाम जो समतामयी।
सम्यक्त्व जिसका मूल है, चारित्र ज्ञानानन्दमयी ।। 1।।

आत्म-रुचि सम्यक्त्व निश्चय ज्ञान निज अनुभूति है।
चारित्र निज में लीनता, अविनाशी आत्म-विभूति है ।। 2 ।।

इन्द्रादि चक्री रंक सम, अंतर-विभूति के बिना।
जीवन अरे निस्सार सूना, स्वानुभूति के बिना।। 3।।

व्यर्थ ही भूला हुआ, होता रहा हैरान है।
नित्य निर्मल संपदाओं की स्वयं में खान है।। 4।।

भगवान् के सन्मुख खड़ा, पर स्वयं ही भगवान् है।
रम जाय निज में ही अहो, निश्चय बने भगवान् है ।। 5 ।।

चारित्र निश्चय धर्म है, चारित्र ही आराधना।
अहो ! दर्शन ज्ञानमय, चारित्र से शिव पावना।। 6।।

व्रत, शील, संयम भी अरे, साधक दशा में हों सहज ।
करुणामयी परिणाम पर, आसक्ति भी छूटे सहज ।। 7 ।।

इससे व्रतादिक भी प्रभो, व्यवहार से चारित्र कहे।
पर हेय हैं श्रद्धान में, छूटें तभी शिवपद लहें ।। 8।।

इक वीतरागी भाव ही, चारित्र यह श्रद्धान है।
हो वीतरागी परिणति, पुरुषार्थ होय महान् है।। 9।।

छूटे असंयम अहो, संयम भाव निर्मल प्रगट हो।
साम्यभाव रहे सदा, परमार्थ चारित्र भक्ति हो।। 10।।

ज्ञान में ही हो प्रतिष्ठित, ज्ञान निज महिमामयी ।
ज्ञेय भासे निर्विकल्प, अनुभूति हो ज्ञायकमयी।। 11 ।।

श्रद्धान होवे भावना हो, साथ ही पुरुषार्थ हो।
व्यवहार हो न अयोग्य प्रभु, अंतरंग में परमार्थ हो ।। 12 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २३९ से २४०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’