तर्ज : भक्ति से जिनवर के दर्शन करेंगे …
चरणों में प्रभुवर के आयेंगे हम ।
प्रभु जैसी ही प्रभुता पायेंगे हम ।। टेक ।।
पुण्योदय से प्रभुवर को पाया।
निर्ग्रन्थ शासन हमको सुहाया ।।
मुक्ति के मारग में धायेंगे हम ।। 1 ।।
दुर्लभ सम्यग्दर्शन पाकर।
निर्मल तत्त्वज्ञान प्रगटाकर।।
सम्यक् चारित्र पायेंगे हम।। 2।।
रागादिक से भिन्न लखेंगे।
ज्ञानमात्र अनुभवन करेंगे।।
सहज ही ज्ञायक रहायेंगे हम ।। 3 ।।
मोह न होगा, क्षोभ न होगा।
कर्मों का आश्रव-बंध न होगा ।।
पूरव कर्म झड़ायेंगे हम ।। 4।।
निजानन्द में मग्न रहायें।
पूर्ण अनन्त चतुष्टय पायें ।।
अविनाशी पद पायेंगे हम ।। 5।।
अहो ! अहो ! प्रभु का उपकार।
कैसे गावें अपरम्पार ।।
भक्ति से शीस नवायेंगे हम ।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ७१ से ७२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’