तर्जः दर्शन नहिं ज्ञान ना…
चरणों में बाहुबली के, मैं सविनय शीस नवाऊँ।
हो प्रगट आत्मबल ऐसा, प्रभु निज में ही रम जाऊँ ।। 1 ।।
पर भावों से अति न्यारा, शाश्वत ज्ञायक प्रभु जाना।
दुर्मोह महातम नाशा, विभु हुआ भेद-विज्ञाना।। 2।।
बाहर में कुछ न सुहावे, तृप्ति निज में ही पाई।
दर्शन पाया अविकारी, निज निधि निज में ही पाई ।। 3 ।।
कर्तृत्व बुद्धि विनशाई, ज्ञातृत्व सहज प्रगटाया।
निर्ग्रन्थ रहूँ हे स्वामिन् ! बस यही भाव उमगाया।। 4।।
निःशल्य निरवलम्बी हो, अविचल शुद्धातम ध्याऊँ।
वैभाविक कर्म नशावें, परमातम निज पद पाऊँ।। 5।।
हूँ जाननहार सहज ही, प्रभु जाननहार रहाऊँ।
निष्काम मुक्त अविकारी, प्रभु जाननहार रहाऊँ।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १३७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’