चार गति में भ्रमते भ्रमते, नहीं मिला सुख इक क्षण भाई
चार गति में भ्रमते भ्रमते, नहीं मिला सुख इक क्षण भाई।
जिनवाणी ही परम सहाई, देवे मोक्षमार्ग दरशाई…॥टेक॥
लख चौरासी भ्रमते-रूलते, काल अनन्ते खोये भाई।
परद्रव्यो से प्रीति लगाई, पर ना हुआ जिन कभी हे भाई ॥१॥
महाभाग्य इस दुःखकाल में, जिनवाणी की शरणा पाई।
जिनवाणी के ज्ञान बिना तो, नहीं मिला निजरूप दिखाई ॥२॥
सत्य ज्ञान श्रद्धान बिना तो, जीवन दुखमय रहा ही भाई।
जिनवाणी का वचन यथारथ, अब तो श्रद्धा में लो भाई ॥३॥
ज्ञान यथारथ निज-पर करके, जीवन में पाओ सुख भाई।
आतम रूप माहिं ही जम लो, आतम रूप सदा सुख दाई ॥४॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ९५ (विभिन्न कवियों के भजन)