चन्द्रानन जिन चन्द्रनाथके, चरन चतुर-चित ध्यावतु हैं ।
कर्म-चक्र-चकचूर चिदातम, चिनमूरत पद पावतु हैं ।।टेक।।
हाहा-हूहू-नारद-तुंबर, जासु अमल जस गावतु हैं ।
पद्मा सची शिवा श्यामादिक, करधर बीन बजावतु हैं ।।१।।
बिन इच्छा उपदेश माहिं हित, अहित जगत् दरसावतु हैं ।
जा पदतट सुर नर मुनि घट चिर, विकट विमोह नशावतु हैं ।।२।।
जाकी चन्द्र बरन तनदुतिसों, कोटिक सूर छिपावतु हैं ।
आतमजोत उदोतमाहिं सब, ज्ञेय अनंत दिपावतु हैं ।।३।।
नित्य-उदय अकलंक अछीन सु, मुनि-उडु-चित्त रमावतु हैं ।
जाकी ज्ञानचन्द्रिका लोका-लोक माहिं न समावतु हैं ।।४।।
साम्यसिंधु-वर्द्धन जगनंदन, को शिर हरिगन नावतु हैं ।
संशय विभ्रम मोह ‘दौल’ के, हर जो जगभरमावतु हैं ।।५।।
अछीन = अक्षय
हाहा, हूहू, नारद और तुंबर ये गंधर्व जाति के देवों के भेद हैं ।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ८० से ८१