चलो चलें सम्मेदशिखर, करें वंदना आनंदकर ॥ टेक ॥
शाश्वत तीर्थधाम है जहाँ से, मुनिवर अगणित मोक्ष गये।
निज स्वभाव का आराधन कर, परम सिद्ध परमेश भये ॥ 1 ॥
ज्ञान शरीरी अशरीरी प्रभु, लोक शिखर पर राज रहे।
उनके चरण चिन्ह हम सबको, भेद-विज्ञान जगाय रहे ॥ 2 ॥
देह भिन्न है कर्म भिन्न, राग भिन्न है।
ज्ञानानंदमयी शुद्धातम, गुण अनंत अविच्छिन्न है॥ 3 ॥
अरे ! उलझना व्यर्थ जगत में, सत्वर निज स्वरूप साधें।
तजकर संयोगी भावों को, अक्षय शिवपद आराधें ॥ 4॥
परम पुरुष आदर्श हमारे, उन सम निज में थिर होवें।
रत्नत्रय से ही कर्म नशावें, गुण अनंत विलसित होवें ॥ 5॥
निवृत्ति का सुन्दर अवसर, तीर्थक्षेत्र पर सहज मिले।
भायें हम भी आत्म भावना, अंतर परिणति सहज खिले ॥ 6 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २९९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’