चलि सखि देखन नाभिरायघर, नाचत हरि नटवा | Chali Sakhi Dekhan Nabhirayaghar Nachat Hari Natava

चलि सखि देखन नाभिरायघर, नाचत हरि नटवा

चलि सखि देखन नाभिरायघर, नाचत हरि नटवा ।
अद्भुत ताल मान शुभलययुत, चवत राग षटवा ।।चलि.।।

मनिमय नूपुरादिभूषन-दुति, युत सुरंग पटवा ।
हरिकर नखन नखनपै सुरतिय, पगफेरत कटवा ।।१।।चलि. ।।

किन्नर करधर बीन बजावत, लावत लय झटवा ।
‘दौलत’ ताहि लखैं चख तृपते, सूझत शिववटवा ।।२।।चलि. ।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ७५

अर्थ

अर्थ- हे सखी! चलो, राजा नाभिराय के घर चलें; आज वहाँ इन्द्र नट बनकर नाच रहा है, उसे देखेंगे।

हे सखी। वहाँ वह इन्द्र नट आज अद्भुत ताल और शुभ लय से युक्त होकर षट्प्रकार के राग का गायन कर रहा है। उसने नूपुरादि मणिमय आभूषण पहन रखे हैं और सुन्दर रंग के वस्त्र धारण कर रखे हैं। उसके हाथ के प्रत्येक नख पर अनेक देवियाँ अपनी कमर घुमाकर नृत्य कर रही हैं। किन्नर भी इस समय वीणा को अपने हाथ में लेकर बजा रहे हैं और शीघ्रता के साथ लय उत्पन्न कर रहे है।

कविवर दौलतराम कहते हैं कि इस दृश्य को देखने से आँखें तृप्त हो जाती हें और मोक्ष का मार्ग दिखाई दे जाता है।

स्रोत: दौलत विलास, पद 6।

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