चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 20 ) ‘पुण्य के फल में स्वर्ग के अंगारे’
जो इस विश्व में पुण्य को जीवित रखना चाहते हैं वे संपूर्ण विश्व का पराधीन एवं विभाजित स्वरूप देखना चाहते हैं, सहायता एवं सहाय्य, इस व्यवस्था में विश्व सदा पंगु बना रहेगा। सोचो ! अमेरिका यह चाहे कि भारत सदा ही उसकी सहायता पर निर्भर रहे, तो क्या यह बात भारतवासियों को पसंद आयेगी, और बताओ सबको रोटी कपड़ा और मकान में स्वावलंबन चाहिए या परावलंबन ? इस प्रश्न पर सारे भारत का एक ही उत्तर होगा कि हमें स्वावलंबी व्यवस्था चाहिए, क्योंकि पराधीनता अत्यन्त कष्टकर मृत्यु समान है। ऐसे ही समूचा पुण्य पराश्रित होने से, उसमें लगने वाला सुख (सुखाभास) वह सुख नहीं, इस सुख की जाति ही भिन्न है। वह तो नितान्त दुःख है तथा स्वाभाविक निराश्रित, वीतराग भाव ही आनंद मय होता है वीतराग भाव अपने में डूबकर प्राप्त किया जाता है और पुण्यभाव परसत्ता में डूबकर, अतः यह सर्वथा त्याज्य है। पुण्य भाव की निरर्थकता का दूसरा हेतु यह है कि पुण्य परिणाम के द्वारा जीव जो चाहता है, वह तो नहीं मिलता वरन् उससे विपरीत स्वर्गादिक मिलते हैं, इस परिणाम से वह किसी जीव की रक्षा करना चाहता है, किन्तु वह तो संभव नहीं हो पाती, बल्कि स्वर्ग मिल जाता जिसे शुभ परिणाम वाला कभी नही चाहता, शुभ के समय उसका प्रयोजन तो धर्म (वीतरागता) की प्राप्ति होता है। अतः शुद्ध वीतराग भाव ऐसे पुण्य की विपरीत दिशा से मिलने वाली वस्तु नहीं है। जैसे एक पुत्र पिता की सेवा बड़ी तन्मयता से करता है और वह उनके स्वास्थ्य व आरोग्य को चाहता है, पिता के पास बहुत धन होने पर भी धन नहीं चाहता, वह तो पिता को आराम पहुँचाने के लिए पूरा प्रयत्नशील रहता है। फिर भी पिता तो मर जाता है और पुत्र के हाथ उसकी पूरी संपत्ति आ जाती है, जिसे वह तनिक भी नहीं चाहता था। पुण्यभाव की भी ठीक यही स्थिति है कि इससे व्यक्ति को अधर्म का सिंहासन तो मिल जाता है परन्तु उसके फल में तो स्वर्ग के अंगारे मिलते हैं न कि मुक्ति का झरना।