चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ (बाबू युगल जी) | Chaitanya Ki Surbhit Pankhudiyan (Babu Yugal Ji)

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 20 ) ‘पुण्य के फल में स्वर्ग के अंगारे’

जो इस विश्व में पुण्य को जीवित रखना चाहते हैं वे संपूर्ण विश्व का पराधीन एवं विभाजित स्वरूप देखना चाहते हैं, सहायता एवं सहाय्य, इस व्यवस्था में विश्व सदा पंगु बना रहेगा। सोचो ! अमेरिका यह चाहे कि भारत सदा ही उसकी सहायता पर निर्भर रहे, तो क्या यह बात भारतवासियों को पसंद आयेगी, और बताओ सबको रोटी कपड़ा और मकान में स्वावलंबन चाहिए या परावलंबन ? इस प्रश्न पर सारे भारत का एक ही उत्तर होगा कि हमें स्वावलंबी व्यवस्था चाहिए, क्योंकि पराधीनता अत्यन्त कष्टकर मृत्यु समान है। ऐसे ही समूचा पुण्य पराश्रित होने से, उसमें लगने वाला सुख (सुखाभास) वह सुख नहीं, इस सुख की जाति ही भिन्न है। वह तो नितान्त दुःख है तथा स्वाभाविक निराश्रित, वीतराग भाव ही आनंद मय होता है वीतराग भाव अपने में डूबकर प्राप्त किया जाता है और पुण्यभाव परसत्ता में डूबकर, अतः यह सर्वथा त्याज्य है। पुण्य भाव की निरर्थकता का दूसरा हेतु यह है कि पुण्य परिणाम के द्वारा जीव जो चाहता है, वह तो नहीं मिलता वरन् उससे विपरीत स्वर्गादिक मिलते हैं, इस परिणाम से वह किसी जीव की रक्षा करना चाहता है, किन्तु वह तो संभव नहीं हो पाती, बल्कि स्वर्ग मिल जाता जिसे शुभ परिणाम वाला कभी नही चाहता, शुभ के समय उसका प्रयोजन तो धर्म (वीतरागता) की प्राप्ति होता है। अतः शुद्ध वीतराग भाव ऐसे पुण्य की विपरीत दिशा से मिलने वाली वस्तु नहीं है। जैसे एक पुत्र पिता की सेवा बड़ी तन्मयता से करता है और वह उनके स्वास्थ्य व आरोग्य को चाहता है, पिता के पास बहुत धन होने पर भी धन नहीं चाहता, वह तो पिता को आराम पहुँचाने के लिए पूरा प्रयत्नशील रहता है। फिर भी पिता तो मर जाता है और पुत्र के हाथ उसकी पूरी संपत्ति आ जाती है, जिसे वह तनिक भी नहीं चाहता था। पुण्यभाव की भी ठीक यही स्थिति है कि इससे व्यक्ति को अधर्म का सिंहासन तो मिल जाता है परन्तु उसके फल में तो स्वर्ग के अंगारे मिलते हैं न कि मुक्ति का झरना।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 21 ) अरे ! शिवभूति मुनि क्यों नहीं बन जाते ?

चैतन्य विहार निवास स्थान पर हुई चर्चा – मुमुक्षु समुदाय में से एक ने उत्सुकता पूर्वक पूछा पूज्य बाबूजी हमें क्या पढ़ना चाहिए ? त्वरा से मंद मुस्कान के साथ पूज्य बाबूजी का जवाब आया, कुछ नहीं पढ़ना है बस एक को ही पढ़ना है, बहुत पढ़ने-सुनने के विकल्पों से विराम लो, ज्ञान को बहु विस्तार से समेट कर, एकदम संक्षेपण कर लो, देखो अधिक जानने की लिप्सा से ज्ञान सदैव भारी रहता है, ज्ञान को आराम दो, जिससे वह प्रसन्न रहे, उसे एक विषय में रमाते चलो, जिससे उसका सुख और आनंद बढ़ता ही चला जाय ऐसी यह वर्ल्डरफुल चीज मैं हूँ मेरी सत्ता विज्ञानघन पुरातन शाश्वत है जिसके पन्नों पर छपे इतिहास को यदि एक बार पढ़ लेगा, तो आनंद का झरना बह चलेगा, इसलिए ज्ञान को फैलाओ मत, बल्कि एकदम समेट कर, लक्ष्य पर केन्द्रित कर दो, क्योंकि जानने जानने के लोभ में यह प्राप्त ज्ञान लुट जाएगा, जितना ज्ञान हमें मिला है और जो ज्ञान राग व ज्ञान की भिन्नता कर, दोनों के बीच पैनी छैनी की तरह गिर पड़े, बस ! शिवभूति मुनि जितना ज्ञान पर्याप्त है। ’ तुष-मास घोसन्तो’ दाल अलग है और छिलका अलग है, इतने ज्ञान में तो केवलज्ञान का राज्य मिल गया। अरे! कुछ नहीं जानते थे, णमोकार मंत्र भी याद नहीं रहा, सात तत्त्व, छह द्रव्य कुछ नहीं पढ़े लेकिन सब कुछ पढ़ डाला। सुनो ! ज्ञान को अनेक शास्त्रों में फैलाने का आग्रह भी धन-धान्य जैसा परिग्रह है, अच्छा बताओ तुमने कभी मूंगफली खाई है ? आत्मार्थी बंधु – हाँ बाबूजी कई बार खाई है। बाबूजी - कैसे खाई - छीलकर या बिना छिले ? बंधुवर – छीलकर ही खाते हैं। बाबूजी – बस इतना ज्ञान काफी है इससे अधिक नहीं। कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं -

देह और आत्मा का पृथक् बोध कर लो,
बाकी ज्ञान पेटी में बंद कर धर लो,
यही मोक्षमार्ग यही मोक्ष यही रत्नत्रय,
तिरने की एक कला जल्दी से सीख लो ।।

सभी बंधु खुली हंसी में!

पू. बाबूजी – और सुनो! सम्यग्दर्शन के लिए तो जितना ज्ञान अभी हमारे पास है उतने की भी जरूरत नहीं, अरे ! शिवभूति मुनि ही क्यों नहीं बन जाते। अपने को जाने बिना चाहे कितना ही, करणानुयोग चरणानुयोग, अरे ग्यारह अंग रट लेना, लेकिन कुछ सिद्धि होने वाली नहीं है, सारा अनुत्पादक श्रम है, थकान है, और काल थोड़ा है, अतः अपना कल्याण जिसमें है वह करो। गाथा है अष्टपाहुड़ में।

अन्तोणत्थि सुईण कालोथोवो वयं च दुम्मेहा।
तम्हा णवरि सिखियाणं जम्म मरणं क्षयं कुणइ ।।

अर्थ – श्रुतियों (शास्त्रों) का अंत नहीं है काल थोड़ा है और हम दुर्बुद्धि हैं (अल्पबुद्धि हैं) इसलिए जल्दी से वह कला सीख लो, जिससे जन्म-मरण का क्षय हो।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 22 ) पावभर के पात्र में सैर नहीं समाता

कैसा आश्चर्य है! एक ही समय में ज्ञान पर्याय का सर्वलोकालोक को जानने का अद्भुत स्वभाव है. फिर भी जीव अपने अनंत शक्ति के धारक आत्मा को नहीं जानता और पर्याय में प्राप्त ज्ञान के विकास को पाकर ऐसे अहंकार करता है ओह! कितना बुद्धिमान हूँ मैं। कितना बढ़ गया है मेरा ज्ञान, इस प्रकार उफन-उफन कर कहता है कि कितना ज्ञान है मुझमें। इसका सही अर्थ तो यह है कि वह अपने को उस ज्ञान के विकास के योग्य भी नहीं मानता तथा केवलज्ञान के तो अयोग्य मानता ही है। इस कारण प्राप्त ज्ञान की पूंजी सें न तो सम्यग्दर्शन का पात्र बन पाता और न केवलज्ञान का। जैसे पाव भाव के पात्र में सैर नहीं समाता वैसे ही यह ज्ञान मद में मत्त होकर ऐसा बोलता है एवं अपने विशाल ज्ञान पुंज आत्मा की प्रतीति न होने के कारण थोड़े से ज्ञान के विकास में अज्ञानी को ऐसा लगता है कि मेरा ज्ञान आशा से अधिक बढ़ गया है। अंग व पूर्व पढ़ गया हूँ और मान ढेर सारा मिल रहा है। मैं इस काबिल तो नहीं हूँ किन्तु अनायास देखो यह क्या हो गया ? ऐसी आस्था के कारण उसे अहंकार उत्पत्र होता जाता है और उस अल्प ज्ञान में उसकी दृष्टि संकुचित हो जाने से वह उसे पच नहीं पाता, अतः सारा मिथ्या ज्ञान इकट्ठा हो मानो ज्ञेयों में फैलने लगता है इस तरह अनंतकाल ज्ञेय लुब्धता में बीत जाता है और स्वयं ‘ज्ञान मात्र’ स्वभाव के संचेतन से वंचित रह जाता है।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 23 ) ध्रुव पर समर्पित श्रद्धा का सुहाग कभी फूटेगा नहीं

श्रद्धा की माँग को सारा विश्व मिलकर भी पूरा नहीं कर सकता, एकमात्र द्रव्य ही उसके सुहाग को अमरता का वरदान देने वाला है, सच्चाई यह है कि श्रद्धा के सुहाग को ध्रुव द्रव्य ही निभा सकता है। अरे ! इसका दिया सुहाग कभी रुदन में नहीं बदलता, कभी फूटता-टूटता नहीं। वस्तुस्वभाव की दृष्टि से गुणों में अपना-अपना कार्य विभाजन है जैसे ज्ञान है, वह जानता है एवं श्रद्धा के विषय का निर्णय भी करता है, उस समय भी उसे दूसरा पक्ष स्वीकृत होता है, क्योंकि ज्ञान के विषय अनेक भी होते हैं और उसमें स्व-पर व मुख्य गौण की व्यवस्था होती है, लेकिन श्रद्धा में मुख्य गौण की पद्धति नहीं है, क्योंकि श्रद्धा का विषय सदा एक व पूर्ण व अखण्ड द्रव्य होता है, बस! उसी पर सर्वस्व समर्पण होता है, उसकी दृष्टि में स्व-पर नाम की कोई चीज नहीं है, और उसे अपनी ही वस्तु में मुख्य गौण करना भी नहीं आता, क्योंकि यह विभाग पृथक् गुण का है, ज्ञान को यह कार्य संभलाया गया है, यदि श्रद्धा भी ज्ञान के कार्य को करने लगे, तो अहं का कार्य कौन करेगा और एक सबल युक्ति से देखें तो ज्ञान के द्वारा जाने गये सभी ज्ञेय श्रद्धेय हो जायेंगे, यह बड़ी बाधा उत्पन्न हो जायेगी। प्रथम अनुभूति से मोक्ष तक श्रद्धा की यह प्रतीति सतत् धारावाहिक चलती है, सिद्धों को भी यही प्रतीति होती है। मोक्षार्थी ! आत्मा की प्यास वाले को विचार भी आत्मा का ही होता है, जो जगत से थककर यहाँ आया है, ऐसे निकटवर्ती शिष्य को आचार्य कल्याण का मार्ग बताते हैं। एक बार अखण्ड और संपूर्ण में अपने उपयोग को टिका दो। ऐसे सम्यक्त्व के निकट को आत्मानुभूति की पूर्व भूमिका में, आत्मा के गुणों की महिमा पूर्वक समझाया जाता है जैसे जब हम पुण्यात्मा कहते हैं तो शुभ राग पर दृष्टि जाती है और जब दानी कहते हैं तो दान अर्थात् पैसे पर दृष्टि जाती है, ऐसे ही जब दर्शन-ज्ञान-चारित्र वाला कहते हैं तो गुणों के आधारभूत आत्मा पर दृष्टि जाती है इसलिए आचार्य यहाँ तक लाकर फिर अभेद की महिमा बताते हैं तो यह ‘परमात्मद्रव्य’ उसके हाथ में आ जाता है ‘भगवान आत्मा’ विशेषण भी दिया है, समयसार परमागम में। सचमुच आत्मद्रव्य तो सुमेरु गिरी है, पर्याय के नक्षत्र तो उसकी परिक्रमा करते हैं श्रद्धा द्रव्य से बिछुड़ी नहीं है विमुख हुई है, जब भगवत् देवता के साथ अभेद होकर बोलती है कि मैं तो अमर हूँ अरे ! अब इसका सुहाग कभी फूटेगा नहीं।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 24 ) 'मणिदीप व तैलदीप
( ज्ञानी-अज्ञानी की परिणति )

उपयोगरूप परिणति में अर्थ-व्यापार क्षयोपशम-शक्ति के अनुसार होता है, अतः ज्ञानी और अज्ञानी की उपयोग-परिणति विकास-शक्ति के अनुसार पर विषय में व्यापार करते समय भले ही समान दिखाई दें और उससमय ज्ञानी की उपयोग-परिणति भले ही स्व को विषय नहीं कर रही हो, किन्तु ज्ञानी की उपयोग-परिणति में प्रतिसमय भेदविज्ञान की अतुल-शक्ति विद्यमान होने के कारण पर में व्यापार करते समय भी ज्ञानी की वह परिणति महान सामर्थ्यशालिनी है। जबकि अज्ञानी का ज्ञान भेदविज्ञान की सामर्थ्य के अभाव के कारण अत्यन्त क्लैव्यग्रस्त (नपुंसक) होने से पर को जानते हुए भी कुछ नहीं जानता; क्योंकि वह विपर्यय आदि दोषों से प्रतिसमय-आक्रान्त है मतिज्ञान से लेकर केवलज्ञान तक सम्यक्-ज्ञान की जानने की रीति कम या ज्यादा विकास क्रम भेदपरक नहीं, स्व-पर, स्वभाव-विभाव, द्रव्य-गुण-पर्याय आदि का ज्यों का त्यों भासन ही तो सम्यग्ज्ञान है, कम जानना व अधिक जानना तो विकास की सामर्थ्य के अनुसार होता है, किन्तु जितना जाना जाये उसमें कर्त्ता, कर्म, कारण, कार्य, भिन्न-भावों के एकत्व आदि की भ्रांति न हो, वह ज्ञान ही ‘सम्यक्’ है। अतः विकास की सामर्थ्य सीमित होने के कारण ज्ञानी का ज्ञान भले ही स्व-पर को एक ही समय में विषय न कर सके, किन्तु पर को विषय करते समय भी उसकी सामर्थ्य महान् है। जैसे रत्नों का पारखी कोई पुरुष जिस समय इमीटेशन-नगीनों को देख रहा है, उस समय भी उसके ज्ञान में सच्चे और झूठे रत्नों की भेदज्ञान-सामर्थ्य विद्यमान है, जो एक ग्रामीण के ज्ञान में कभी नहीं है तथा सम्यग्ज्ञान जिस समय ‘पर’ को विषय कर रहा है, उस समय भी उसे शुद्ध-स्वतत्त्व का ही आलंबन प्रवर्तमान है और श्रद्धा पूर्ण रूप से स्व तत्त्व पर समर्पित हो चुकी है, कभी च्युत होने वाली नहीं। अज्ञानी को शुद्ध-तत्त्व के विकल्पों में अनंतबार प्रवर्तित होने पर भी कभी स्वतत्त्व का आलंबन ही नहीं है, क्योंकि यह आलंबन तो ज्ञान में स्वतत्त्व की प्रसिद्धि अर्थात् अनुभूति होने पर ही उदित होता है। जैसे एक स्त्री कुछ समय के लिए पीहर जाती है और वहाँ माता-पिता, भाई-बहिन आदि के राग तथा पीहर के कार्यों में व्यस्त रहने से पुनः पुनः पति को याद भी नहीं करती; किन्तु क्या हम यह कह सकते हैं कि वह किसी भी क्षण पति को भूल गई है, वस्तुतः तो प्रतिक्षण पति का ही आश्रय और पति की ही सर्वोपरि-महिमा प्रवर्तमान होने तथा ससुराल और पति का भेदविज्ञान हर समय उदित रहने से वह कभी भी पति को भूली नहीं है, इसके विपरीत एक अल्पवय में विवाहित कन्या पति के निकट रहकर भी पति को नहीं जानती, वरन् परानुरोध से ‘पति’ को पति कहती है; क्योंकि पति के आलंबनपूर्वक (यह पति ही मेरा सर्वस्व है) उसने पति को जाना ही नहीं, अतः उसका ज्ञान अत्यन्त-दौर्बल्य-युक्त है। और जैसे मणिदीप तथा तैलदीप में पदार्थों को प्रकाशित करने की अपेक्षा समानता दृष्टिगत होने पर भी सामर्थ्य की अपेक्षा महान्-अन्तर है; क्योंकि मणिदीप अंतःस्वभाव के अवलंबन के कारण निश्चल तथा महान्-सामर्थ्यशाली है, जब तैलदीप अंतःआत्मबल के अभाव में उस सामर्थ्य से सदा-शून्य है और यह अन्तर समान दिखाई देनेवाले उनके प्रकाश में ही विद्यमान है। इसीप्रकार पर-प्रकाश के समय ज्ञानी तथा अज्ञानी का ज्ञान समान दिखाई देने पर भी एक के ज्ञान को सदा शुद्ध-ध्रुवतत्त्व का अवलंबन तथा एक को सदा ही सर्वथा-परावलंबन होने से उनकी ज्ञातृ-सामर्थ्य में भारी-अन्तर विद्यमान है।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 25 ) मुझे मोक्ष जाना है यह भी कर्म की वासना है

मेरा शुद्धात्मा सर्व कर्म परिणाम से रहित अकर्मा तत्त्व है, ज्ञान के प्रकाश में कर्म के अंधकार का सर्वथा अभाव है, दोनों में परस्पर विरोध है, आत्मस्वभाव में सदा ज्ञान का ही भवन (परिणमन) होता है और जो शुभाशुभ कर्म है, उनमें कर्म (जड़ भाव) का ही परिणमन होता है ज्ञान व कर्म भाव के बीच बड़ी संधि है, ज्ञान सूक्ष्म छैनी है, ज्ञान ज्योति का जब आत्मा के असंख्यातप्रदेशी क्षितिज पर उदय होता है और वह यह नारा लगाता है कि हे कर्मों ! मेरी सत्ता को छोड़ो, हे शुभाशुभ भावों, तुमने मेरे चैतन्य की सीमा पर साम्राज्य जमा लिया, लेकिन तुम तो फिरंगी हो, अन्य देश के हो, तुम यहाँ से विदा ले लो, नहीं तो यह ज्ञान का अस्त्र तुम्हारी धज्जियाँ उड़ा देगा ऐसा पौरुष जागता है।

सम्यग्ज्ञान स्वयं ही धर्ममय है और धर्म निष्कर्म होता है, शुभ कर्म तो कर्म है, मीठा जहर है, अज्ञानी कहो या द्रव्यलिंग की उच्च भूमिका, यहाँ भी कर्म ही कर्म सूझता है, धर्म के नाम पर इस घातक भाव शुभ का ही अवलंबन होता है। द्रव्यलिंगी मुनि को तो ऐसा ठपका दिया है कि मुनि होकर यदि शुभोपयोग परिणति के प्रेम में फंसता है, तो तेरा संसार संकट निकट है क्योंकि इस कर्म की वासना से धर्म का जन्म नहीं होता।

करूँ-करूँ का स्थूल विकल्प जहाँ तक चित्त में, ज्ञान में चलता रहेगा, और मुझे कुछ करना है, अभी तक कुछ नहीं किया, अरे ! सम्यग्दर्शन करना है और मोक्ष जाना है, इस कर्म की भयंकर वासना से भी सम्यग्दर्शन व मोक्ष नहीं होगा, बल्कि क्लेश व संसार अवश्य बढ़ जावेगा।

सर्व कर्म की वासना का विसर्जन होने पर ‘मैं निष्कर्म तत्त्व हूँ’, ऐसी श्रद्धा व ज्ञान पूर्वक सम्यग्दर्शन का जन्म होता है, शुद्धात्मतत्त्व का अवलंबन भी कर्म है, परन्तु उसे अवलंबन (कर्म) का अवलंबन नहीं, निरावलंबी का अवलंबन लेते ही, सिद्धों जैसा निष्कर्म कर्म पैदा हो जाता है।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 26 ) रे आत्मन् ! ज्ञान के लोभ में
तू खट्टी छाछ से भी जाएगा

ज्ञान इतना निष्पक्ष और ईमानदार तत्त्व है कि वह सर्व लोकालोक पर स्वयं को समर्पित कर देता है फिर भी विश्व के पदार्थों को ज्ञान से कोई शिकायत नहीं होती क्योंकि वह दूर रहकर उन्हें अपने भीतर चित्रित कर लेता है यही ज्ञान की अनूठी कला है, अतः समस्त पदार्थ निश्चिन्त रहते हैं और ज्ञान भी।

अरहंत परमात्मा का केवलज्ञान जैसे मात्र जानने का काम करता है चाहे वह सर्व प्रदेशों से जानता हो ऐसे ही छद्मस्थ का क्षयोपशम ज्ञान भी पदार्थ को ठीक वैसे ही जानता है इतना अवश्य है कि इसमें इंद्रिय मनादि की निमित्तता होती है यह सापेक्ष ज्ञान कहलाता है अतः कोई भी विषय में प्रर्वत होते समय इन्द्रियादि का सहारा लेना पड़ता है। कारण कि क्षयोपशम ज्ञान की पर्याय की कमजोरी ऐसी ही है। लेकिन हमें इसकी कमजोरी वह हीनाधिकता पर किंचित् भी दीनता या खेद व्यक्त न करते हुए प्राप्त क्षयोपशम में पूर्ण रूप से सावधान हो जाना चाहिए और इस ज्ञान को सूक्ष्म व पैनी धार वाला बनाकर अपना प्रयोजनभूत कार्य, चैतन्य का दर्शन एवं अनुभवन शीघ्र कर लेना ही श्रेष्ठ है वरना चूक गए तो अन्य पर्यायों में इतने विकास की भी कोई गारंटी नहीं है इस वर्तमान प्राप्त क्षयोपशम में तत्त्व को समझा नहीं, तो हे आत्मन् ! अधिक ज्ञान के लोभ में तू खट्टी छाछ से भी जाएगा। अरे! लौकिक दर्शन व ज्ञान का विकास, सारा बेकार पड़ा रह जाएगा, यदि इसे अपने ‘ज्ञायक भाव’ पर केन्द्रित नहीं किया तो। ज्ञान की सार्थकता इसी में है कि इसे हिताहित में प्रयोग कर प्रमाणिक बनाये शेष विशेष ज्ञान को कचरे में डाल दो उससे कुछ कार्य सिद्धि होने वाली नहीं है।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 27 ) लज्जा विकार व परिग्रह का मूल है

‘किंवदन्ती’ – एक आदमी जंगल में नग्न रहता था। वहाँ के फल-फूल व पत्ते खाकर अपने को महा सुखी मानता था – वहीं उसका भ्रमण होता था, शरीर पर मिट्टी का लेप कर वह योग साधना में व्यस्त रहकर, अनेक लोगों के सम्मान का पात्र बन गया किन्तु उसके कुछ अनुयायियों ने उससे तन ढँकने का आग्रह किया और लज्जा को महा दोष बतलाते हुए वस्त्र धारण करने को कहा ज्योंहि उसके मन में लज्जा ने प्रवेश किया, तो उसने बिना सोच-विचार के तत्काल वस्त्र पहिन लिए और धीरे-धीरे अपनी संपूर्ण तपस्या का परित्याग कर अंत में विवाहादि करके पूरा गृहस्थ हो गया, गृहस्थ जीवन में अनेकों चिंताओं की चपेट से बहुत दुखी हो गया और तब उसे पुनः ध्यान आया कि इन सब दुखों व चिन्ता का मूल कारण तो लज्जा नाम का विकार ही है वही परिग्रह का मूल है। कवि मिल्टन ने भी कहा है, आदमी अकेला ही सुखी है।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 28 ) द्रव्य तो मौनी बाबा है

द्रव्य व पर्याय एक ही पदार्थ के दो अवयव हैं, द्रव्य अविनाशी है एवं पर्याय नाशवान है, जो पदार्थ विश्व में है ही नहीं, वह उत्पन्न हो जाये, और जो सदा से है, उसका नाश हो जाये यह असंभव है।

द्रव्य सत् सदा निरपेक्ष है, नित्य है, वह कभी परिवर्तित नहीं होता बोलता भी नहीं, अपना नाम व गाँव नहीं बता पाता, इसके साथ पर्याय की व्यवस्था इसलिए कि पर्याय का काम द्रव्य का परिचय देना है, यदि दोनों ही ध्रुव हो तो दोनों मिलकर एक ही हो जायेंगे, फिर कोई कार्य होता हुआ नजर ही नहीं आयेगा नित्य बिना परिणमन नहीं होगा एवं परिणमन रहित नित्य सत् की भी कल्पना नहीं की जा सकती।

जैसे – एक व्यक्ति सदा मौन रहता हो, तो उसका परिचय देने के लिए साथ में दूसरा व्यक्ति होना चाहिए, वैसे ही द्रव्य मौनी बाबा है, वह स्वयं तो बोलता ही नहीं, द्रव्य अन्वयरूप वही का वही और पर्याय को व्यतिरेक कहा जाता है, एक के बाद दूसरी, तीसरी ऐसे द्रव्य की अनंत शक्तियों का परिचय पर्याय देती है, इसप्रकार प्रत्येक पदार्थ जड़ व चेतन के साथ पर्याय की सुन्दर व्यवस्था है।

ज्ञान की पर्याय का स्वभाव परिचय में विरुद्ध व अविरुद्ध देखा जाता है, वह पर्याय कहती है कि मेरी मौत हो गई, ऐसा द्रव्य के लिए कहती है, स्वयं के लिए नहीं, यदि स्वयं के लिए कहे तो वह समाप्त हो गई क्योंकि इसमें यह गर्भित है कि जब मैं अर्थात् पर्याय विनाशी हूँ तो उसके ऐसा मानते हुए भी कोई अविनाशी (द्रव्य) भी वहाँ विद्यमान है अर्थात् क्षणिक के समानान्तर ही कोई ध्रुव द्रव्य भी विद्यमान है - यह स्पष्ट संकेत पर्याय के परिचय से निकलता है, धर्म, अधर्म, आकाश व काल द्रव्य की तो पर्याय कभी विकारी होती ही नहीं, केवल जीव-पुद्गल द्रव्य में ही विकार होता है उनकी पर्याय भी द्रव्य का परिचय देती हुई ही उत्पन्न होती है, अतः उसमें प्रतिसमय परिणमन होना ही चाहिए। ज्ञानकी जो पर्याय शुद्ध-त्रिकाली अनादि-अनंत ध्रुवतत्त्व को जैसा है, वैसा स्वीकार न कर उसे अध्रुव, अशुद्ध अनुभव करती है, इसलिए वह परिणाम द्रव्य स्वभाव के विरुद्ध होने से मिथ्या है-सजा का पात्र है।

पर्याय नष्ट हो जाती है, क्षणिक है ऐसा होना बुरा नहीं, क्योंकि यह तो उसका स्वभाव है, लेकिन वह शुद्धात्मा को विपरीत (मिथ्या) ग्रहण करती है, यही उसका अपराध है, फलस्वरूप अनादि से कष्ट पा रही है, अतः पर्याय त्रिकाल में श्रद्धा के लायक नहीं है, श्रद्धा का विषय तो सदा मात्र त्रिकाली ध्रुव तत्त्व ही है।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 29 ) ‘मिथ्या श्रद्धा से ग्रस्त ज्ञान स्पंदित नहीं हो पाता’

संपूर्ण लोक में मिथ्या श्रद्धा का सुदृढ़ साम्राज्य है और मिथ्या श्रद्धा से ग्रसीभूत ज्ञान कभी भी आत्मनिर्णय का पुरुषार्थ नहीं कर सकता, जैसे कई जैनेत्तर लोग देवी-देवताओं को नहीं जानते फिर भी उन पर अडिग श्रद्धा रखते हैं, इतना मात्र ही नहीं वे जैन धर्म के पालक भी कहलाते हैं लेकिन देवगुरु धर्म के शुद्ध स्वरूप को भी नहीं जानते और जानना भी नहीं चाहते, फिर भी अपने को वीतराग धर्म का आस्थावान घोषित करते हैं।

ऐसे ही जिन लोगों का ज्ञान मिथ्या श्रद्धा से मूर्छित है, उनको कितना ही सत्य समझाया जाए परंतु क्या सत्य है? और क्या असत्य ? वे इस पर विचार तक नहीं करना चाहते, किसी मंत्र से मूर्छित व्यक्ति की तरह उनकी ‘श्रद्धा’ ज्ञान पर बुरी तरह से हावी रहती है तथा विशद क्षयोपशम वाले के सामने भी चाहे, सत्य को सतर्क प्रस्तुत किया जाए तो भी उनकी बुद्धि श्रद्धा का दास बन जाती है अतः ऐसी बुद्धि सम्यग्ज्ञान के अभाव में दुर्बुद्धि बनी रहती है। जैसे एक बीमार औषधि के गुण धर्म बिल्कुल नहीं जानता परंतु डॉक्टर पर पूर्ण विश्वास रखता है और उसी के निर्देशानुसार चलता है।

एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि पूर्वाग्रहों से ग्रस्त श्रद्धा कभी भी ज्ञान को स्पंदित नहीं होने देती किन्तु जब ज्ञान श्रद्धा का साथ छोड़ देता है और स्वतंत्र होकर मैं शुद्धात्म तत्त्व हूँ ऐसी दहाड़ मारता है तो परद्रव्य व पर्याय में पड़ी श्रद्धा कंपित होने लगती है तत्काल ही द्रव्य में अहं कर लेती है और ज्ञान भी अपने इष्ट की उपलब्धि कर लेता है इस प्रथम अनुभूति के क्षण में श्रद्धा, ज्ञान, चरित्र का यह अद्भुत त्रिवेणी संगम होता है।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 30 ) सच्चा पुरुषार्थ
‘काजल की कोठरी में रह कालिमा से कैसे बचे रहना’

विपरीत साधनों अथवा कारणों की अनुपस्थिति में तो प्रत्येक व्यक्ति साधु, व्रती, त्यागी, तपस्वी एवं धर्मात्मा बना रहता है किंतु वास्तव में सच्चा त्यागी वह है जो विपरीत कारणों की उपस्थिति में भी दृढ़ चित्त रहता है और रागादि से विमुख होता हुआ अपने आत्मिक पुरुषार्थ में वृद्धि करता जाता है।

ऐसा भी देखा जाता है कि थोड़ा ऊँचा वैराग्य आते ही व्यक्ति सीधा घर छोड़ने अथवा कोई बड़ा त्याग करने को प्रस्तुत हो जाता है किंतु कषायों व मोह को मंद कर उन्हें नष्ट करने की चेष्टा नहीं करता इसलिए तनिक बाधक कारण उपस्थित होते ही सत्ता में बैठी कषाय जागृत हो उठती है और उसकी हजारों लाखों वर्षों की तपस्या पर पानी फिर जाता है।

इसका स्पष्ट उदाहरण उपशांत कषाय गुणस्थानवर्ती महा निर्मल परिणामी जीव है उसको थोड़े समय के लिए मिथ्यात्व व कषाय दब जाती हैं, उपशमन हो जाता है, किंतु तनिक कारण उपस्थित होते ही उसके परिणामों में हलचल मच जाती है। कषाय पुनः जीवित हो जाती है, फलस्वरूप वह ऊपर उछली हुई बॉल के समान गुणस्थान से गिर जाता है। एक धर्मात्मा वह जिसे कषाय के साधनों का संपर्क नहीं है और जो कषायों का स्वरूप समझ कर उन्हें नष्ट करने का प्रयत्न भी नहीं करता तथा विपरीत साधनों का अभाव होने से स्वाभाविक ही जिसकी कषाय दबी हुई है ऐसा व्यक्ति तो कोरा धर्मात्मा होने का भ्रम कर बैठा है अरे ! जहाँ काजल ही नहीं वहाँ काली क्या लगेगी ? एक व्यक्ति वह जो गृहस्थ जीवन में प्रवर्तित है तथा कषायों के स्वरूप को समझता है अपने गृहस्थ के आँधी व तूफान के बीच रहता हुआ भी तत्त्व विचार की छाया में शांतिपूर्वक जीवनयापन करता है ऐसा पुरुष प्रशंसनीय है पुरुषार्थी है क्योंकि काजल की कोठरी में रहकर कालिमा से बचे रहना ही सच्चा पुरुषार्थ है सचमुच अपने को धर्मात्मा मान बैठने वाले की अपेक्षा यह गृहस्थ श्रेष्ठ है।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 31 ) मृत्यु तो नये जीवन का आमंत्रण पत्र है

मुक्ति के रथ पर आरुढ़ सम्यग्दृष्टि पुरुष को, यदि बैकुंठ से दूत के द्वारा ऐसा संदेशा भेज दिया जाए कि अब तुम्हारी आयु 3 दिन की शेष रह गई तुम्हें तैयार रहना है, अपने सब कार्य निपटा लेना, इस पर दूत से उसका शौर्य भरा जवाब क्या होता है कि हे दूत ! जाओ कह देना उस बैकुंठराज से कि “मुझे मौत की धमकी मत दो, मैं तो उस कुल में जन्मा हूँ जहाँ पैदा होते ही अजरता, अमरता की घूंटी पिलाई जाती है, शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि के मंत्र पढ़ाये जाते हैं और यह तो मेरे नए जीवन के लिए एक आमंत्रण पत्र भेजा है जिसे मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ।” सच है मोक्षार्थी पुरुष का ऐसा साहसी हृदय होता है वह विश्व के सारे पदार्थों को चुनौती देता है अरे अमर मरेगा क्या, तुम कितनी गहरी डाल रहे हो नींव । अरे तुम कितनी ही गहरी कब्र खोद लो लेकिन क्या-मेरे अमर अविनश्वर तत्त्व को कभी मिटा पाओगे ? कुदरत के विधान में तुम्हारे सारे यत्न विफल कर दिए जायेंगे क्योंकि मेरी बस्ती तक तुम्हारी पहुँच ही नहीं है सचमुच मृत्यु ज्ञानियों के लिए एक करवट मात्र है।

मृत्यु पर काव्य की कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं, मौत का न्योता आने पर धर्मात्मा पुरुष कैसी चुनौती देते हैं।

“छाने छाने आती है, आती है वह आने दो,
जीवन की छत पर छाती है, वह छाने दो,
मेरे जीवन की छत है कुलीश की बनी,
आने दो नीच को, करिश्मा दिखाने दो।”