चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ (प्रवचनांश)
बाबू ‘युगल’ जैन एम.ए., साहित्यरत्न, कोटा
संकलन व लेखन: ब्र. नीलिमा जैन, कोटा
प्रकाशक: आचार्य कुन्दकुन्द फाउण्डेशन, कोटा
प्रथम संस्करण (1100 प्रतियाँ): अध्यात्म मनीषी बाबू ‘युगल’ जी जन्म शताब्दी समारोह, कोटा (4, 5, 6 अप्रैल 2025)। मूल्य: स्वाध्याय।
बाबू जुगलकिशोर जैन ‘युगल’, जन्म: 5 अप्रैल 1924, खुरी, जिला कोटा (राज.); देहपरिवर्तन: 30 सितम्बर 2015।
इस विषय में पूरी पुस्तक क्रम से है: नीचे भूमिका, फिर 100 चिन्तन कणिकाएँ (एक पोस्ट में एक कणिका), फिर “मुमुक्षु सदन की चहल-पहल”, “पूज्य गुरुदेवश्री द्वारा मुमुक्षुओं को समर्पित”, “मुमुक्षुता का यशगान ‘आगम के आलोक में’” और लेखक परिचय। पाठ पुस्तक के स्कैन से शब्दशः मिलाया गया है। कणिका 100 पुस्तक में हस्तलिखित है, उसका मूल पृष्ठ चित्र रूप में दिया है।
सुधार (24 अक्टूबर 2026): पहले यहाँ 20 अध्याय की एक अनुक्रमणिका दी गई थी। वह पुस्तक में नहीं है, भूल से जुड़ गई थी, इसलिए हटा दी गई है। पोस्ट शीर्षकों में “अध्याय” की जगह अब “चिन्तन कणिका” है, कणिका 2 और 3 का दोहराव हटाया गया है, और पाठ स्कैन से मिलाकर शुद्ध किया गया है।
सिद्धांत सौरभ (भूमिका)
ब्र. नीलिमा जैन, कोटा
आर्ष संस्कृति स्वान्तः सुखायः स्वाश्रित सिद्धान्तों की सुदृढ़ नींव पर अचल मेरु समान अपने गौरव को लेकर खड़ी है, सच ही है सिद्धांत हमारी सनातन रीत से जुड़े होते हैं, इनकी सत्ता अटल, अखण्ड व अमिट एवं स्वतः सिद्ध होने से कुतर्थ व कुयुक्तियों के घन प्रहार भी इनका भेदन करने में असमर्थ हैं, और करने का यत्न तो अशक्य अनुष्ठानवत् ही है बल्कि श्रेष्ठनीति हो या मंत्र विद्या ! लेकिन सत् सिद्धान्त के व्रजमयी किले को इनके घन प्रहार छू भी नहीं पायेंगे, ये युक्तियाँ नीतियाँ तो सदा से परास्त ही होती रही हैं।
अकाट्य सिद्धांत हमारे ‘सारी ही सृष्टि अकृत है’, ‘आत्मा अकर्ता है’, ‘ज्ञान ज्ञेयों से निरपेक्ष सत् है’, ‘क्रमबद्ध वस्तु की व्यवस्था’ आदि सहस्त्रों सिद्धान्तों, की काया ऐसी है - जैसे चन्द्रकिरणों के स्पर्शमात्र से चन्द्रकांत मणि द्रवित हो जाती है, वैसे ही सिद्ध मंत्रों की कोमलकाया का स्पर्श करते ही पाषाण-सा कठोर हृदय भी द्रवित होकर पिघलने लगता है एवं उसी क्षण अन्तःकरण स्पन्दित हो उठता है, मानों मृग को मधुर संगीत और प्यासे को शीतल कुण्ड मिला हो।
सचमुच इस स्वर्णयुग को ऐसे अनमोल सिद्धातों का दस्तावेज, पूज्य गुरुदेव से प्राप्त हुआ, अरे ! उनके पूर्व समस्त सिद्धांत रुँध गये थे और उल्टी दिशा में चल रहे थे, उसी समय सिद्धांत सिंधु के पारगामी पूज्य गुरुदेव ने इन्हें पुनर्जन्म देकर 45 वर्ष तक भरपूर पोषण दिया है, उन्होंने अपनी बलकारी ज्ञान भुजाओं द्वारा इनका मंथन कर, माखन खींच खींच कर निकाला, यह तो पूज्य गुरुदेव की ही ताकत है, वरना इस काल की कल्पना से तो कोसों दूर है। सच ! माखन पाकर कलि पंचम निहाल हो गया।
जीवन पथ प्रदाता पूज्य गुरुदेव द्वारा प्राप्त, सिद्धांत विद्या को साधकर, कुशल साधक पू.बाबू युगलजी ने उन विद्यामंत्रों को अपने हृदय में ध्रुव रूप से धारण कर लिया, फलस्वरूप उनके चिंतन का चरखा अविराम गति से चलता रहा, उससे निकले सूत्र में सिद्धमंत्रों की मणि माला पिरोकर वे जैन जगत को यह बेशकीमती भेंट प्रदान करते रहें। चिंतन तो निरन्तर परिष्कृत होता चला गया और वह साहित्य की विविध विधाओं लेखन, वक्तृत्व, काव्य चर्चा परिचर्चा के रूप में साकार होता रहा। उनके प्रवचन में था एक अनूठा आकर्षण, जिसमें आर्ष सिद्धान्तों का बड़ी सजीवता, रोचकता व तर्कशुद्धि पूर्वक विवेचन - मानों मोहनी मंत्र सा उनकी वाणी का सम्मोहन; जो श्रोताओं का वशीकरण कर उन्हें मंत्र मुग्ध कर देता था। सभा श्रोता भी अतल शून्य में पहुँच जाते थे तभी एक कोमल संबोधन पूज्य बाबूजी का होता था…
पेठो पेठो अतुल शून्य के तल में पेठो ।
मदिर सुरभि बहती जहाँ, अगणित शक्ति सुमन की ।।
सचमुच ! उनकी वक्तृत्व कला किसी पैमाने से कम नहीं थी अद्वितीय थी, मृदुल इतनी कि मिश्री व दही के योग से बने श्रीखण्ड की भाँति सीधे मस्तिष्क से हृदय में उतरकर स्मृति पर उत्कीर्ण हो जाती थी। उनके इस निष्ठावान व्यक्तित्व में सिद्धान्त, अध्यात्म व चरण का सरस समायोजन दृष्टिगत हुआ है, जिसका प्रस्फुटन विशेष अवसरों पर होता रहा। प्रच्छन्न विषय भी उनकी वैचारिक तुला पर तुलकर झरने से बहने लगते थे, उन्हीं के बहुरंगी चुनिंदा अंशों को मैंने हूबहू भावों के साथ संक्षेपण कर, उनकी मौलिक भाषा में वर्ण वाक्य, सुन्दर टाइटल, छाया में जिन्हें वे अध्यात्म की मस्ती में बोला करते थे।
जैसे ‘जमुना के कंकर, सभी शिवशंकर’ - ‘ज्ञान तो नट नागर है’ विकल्प और विचार में अन्तर, कच्चे घाट के समान है अज्ञानी के वचन, नौ हाथ का कलेजा चाहिए, द्रव्य तो मौनी बाबा है, मुमुक्षु सदन की चहल-पहल, इत्यादि शतक रहस्यमयी सिद्धांत के निचोड़ का यह रसीला सुरभित संग्रह – जिनके मध्य में चैतन्य चन्द्र चमक रहा है। अहो! कैसी है, सिद्ध मंत्र की महिमा - जैसे पारस का लघु कण, लोहे को स्वर्ण बना देता है, वैसे ही लघु सिद्धांत भी व्यक्ति की कलुषित वृत्ति को परिमार्जित कर, उसके गुण सौन्दर्य को कई गुना बढ़ा देते हैं ओर सुनो ! जीवन की विषम परिस्थिति में समाधान की सौरभ देने आते हैं। उलझे मानस को सम्यक् नीति द्वारा सुलझाने की शक्ति देने आते हैं।
‘सुरभित पाखुरियाँ चैतन्य की’ का यह पुष्पहार सिद्धांत साधक सिद्धवंशी पू. बाबू जी के शताब्दी समारोह के पुनीत प्रसंग पर पिपासुओं को समर्पित कर हृदय प्रमुदित है, इनकी काया छोटी है, किन्तु ऐरावत हाथी जैसी ताकत देने वाले हैं, जिन्हें पढ़कर आशाओं व अभिलाषाओं का त्वरित अंत होकर, अवश्य ही मुरझाई ज्ञानलता, अन्तर्बल से खिल उठेगी और सुख की धारा अंत रहित, अनंतता की दिशा में बहने लगेगी, इसलिए हे मानव! तू चलता चल ! ओ मोक्षमार्ग पर बढ़ता चल, बढ़ता चल-भाई बढ़ता चल… 5 अप्रैल 2025 ‘युगल’ जन्म शताब्दी समारोह
मुमुक्षु का लक्षण
“ध्वनित तत्व ध्वनि से सदा, वह मुमुक्षु धर ध्यान,
मुक्ति-महल सो जानिये, बाकी सभी मसान॥”
‘युगल’
कणिका सूची (पुस्तक के क्रम से; यह सूची पुस्तक में नहीं है, पढ़ने की सुविधा के लिए कणिकाओं के अपने शीर्षकों से बनाई गई है)
1. ‘है’ का मर्म स्पर्श
2. अनेकांत एक अपराजित शस्त्र है
3. अरे ! ये तो गारुड़ी मंत्र है
4. ज्ञानी का चित्र
5. अहमेक्को
6. अरे ! वीर्य हो तो अश्व जैसा
7. ज्ञेयों का मोह, भव का बीज
8. शपथ लो
9. चिंतनीय तथ्य
10. मृत्युंजय है मेरी सत्ता
11. नौ हाथ का कलेजा चाहिए
12. ‘ज्ञान तो नट नागर है’
13. कारण तत्त्व में कार्य तत्त्व छिपा है
14. कच्चे घाट के समान है, अज्ञानी के वचन
15. मैं सर्व तत्त्वों में सारभूत हूँ
16. ‘किवदन्ती’ पू. बाबूजी के शब्दों में
17. पर्याय पर बैठकर द्रव्य की बातें करना कायरता है
18. मोह के छिपने के ठिकानों पर छापा
19. ‘तत्त्व की विजय - विकल्प की पराजय’
20. ‘पुण्य के फल में स्वर्ग के अंगारे’
21. अरे ! शिवभूति मुनि क्यों नहीं बन जाते ?
22. पावभर के पात्र में सैर नहीं समाता
23. ध्रुव पर समर्पित श्रद्धा का सुहाग कभी फूटेगा नहीं
24. 'मणिदीप व तैलदीप
25. मुझे मोक्ष जाना है यह भी कर्म की वासना है
26. रे आत्मन् ! ज्ञान के लोभ में
27. लज्जा विकार व परिग्रह का मूल है
28. द्रव्य तो मौनी बाबा है
29. ‘मिथ्या श्रद्धा से ग्रस्त ज्ञान स्पंदित नहीं हो पाता’
30. सच्चा पुरुषार्थ
31. मृत्यु तो नये जीवन का आमंत्रण पत्र है
32. ‘सम्यग्दर्शन’ कषाय व उपयोग से पृथक् परिणति है
33. ‘अरे विकल्प तो निरक्षर व्यक्ति के समान हैं’
34. ‘कोमल आत्म संबोधन’ (समाधि के क्षणों में)
35. भावश्रुतज्ञान-केवलज्ञान का उत्तराधिकारी है
36. वीतरागता के उद्घाटन में पुण्य की विदाई
37. विकल्प व विचार में अंतर
38. शुद्धता की चरमावधि
39. दान एक सहज व उदार मनोवृत्ति
40. ‘मैं तो निर्वेश हूँ’
41. समस्त कर्मकाण्ड बालू का ध्वस्त भवन है
42. पवित्रता के संचेतन में पवित्रता का अनुभव
43. ‘भक्त हो तो ऐसा’
44. भाव बंध सर्व अनर्थों का मूल है
45. ‘जमीन-आसमान जैसा है, एकत्व व विकल्प’
46. सर्वज्ञवत् सम्यग्दृष्टि भी राग का ज्ञाता ही है
47. ज्ञानी कर्म की गोदी में नहीं खेलता
48. ज्ञान की वज्र सीमा पर अस्ति-नास्ति धर्म तैनात है
49. ‘अरे ओ ! छलिया भक्त’
50. भयानक वन में सीता का अर्न्तनॉद
51. एक ही आवश्यक कर्तव्य है सम्यग्दर्शन
52. अरे ! आकाश कुसुमवत् है हर विकल्प
53. समयसार का समयसार को प्रणाम
54. अज्ञानी की भक्ति से स्वर्ग की चर्बी ही बनती है
55. जैन दर्शन उन्नत मार्ग की प्रेरणा देता है न कि पतन की
56. सम्यग्दर्शन एक निर्विकल्प स्वच्छ दृष्टि है
57. ‘अरे पाकर खोया भगवान’ यह कैसी विडम्बना
58. प्रथम आत्मदर्शन में मुक्ति खिल उठती है
59. समग्र शुभ विकल्प शून्य ( ० ) का ढेर है
60. ‘तत्त्व की विजय - विकल्प की पराजय’
61. ज्ञान का आकार ज्ञान का ही शुद्ध उत्पादन है
62. घट में जल-सम साधक की परिणति
63. दान की शक्ति वट के बीज सी
64. कर्म की स्वाधीन शासन व्यवस्था
65. भगवान का दासत्व-मुक्ति का बाधक चरण है
66. ‘कारण द्रव्य व कार्य स्वतः सिद्ध है’
67. वाह रे पौद्गलिक शब्द की शक्ति
68. पक्ष से पक्षातिक्रांत
69. क्या है द्रव्य का कर्तृत्व
70. ज्ञानी ‘चिन्मय समय’ से प्रतिबद्ध रहता है
71. वस्तु का क्रम व अक्रम धर्म
72. द्रव्य व पर्याय का अभेद पक्ष
73. ‘उपास्य-उपासक की चरम अभेदता’
74. ‘द्रव्य पर्वत है, तो पर्याय पार्वती है’,
75. सत्य के धरातल पर खड़ा जैनदर्शन
76. ज्ञानी की विरत्त दशा एवं सतत् ज्ञान धारा
77. सम्यग्दर्शन की दुनियाँ में ध्रुव बसा है
78. ज्ञान की स्वच्छता में ज्ञेयों की नास्ति है
79. द्रव्य की त्रैकालिक शुद्धता की सिद्धि
80. सम्यग्दृष्टि का वातानुकूलित कक्ष
81. ज्ञान ज्ञेयों से निरपेक्ष सत् है
82. ‘सिद्ध पर्याय मनभावन है पर टिकाऊ नहीं’
83. द्रव्य दृष्टि संसार सिन्धु को सुखा देती है
84. गुणों की भेद वासना अनुभूति
85. सचमुच ! ज्ञानी का पुरुषार्थ अजेय होता है
86. मैं अनंत शक्तियों को पचाकर बैठा हूँ
87. भ्रम की सत्ता है, परन्तु उसमें सत्यता नहीं
88. अज्ञानी कर्म का खिलौना है
89. एकत्व की अनुभूति में अनेकत्व समाविष्ट है
90. हमारा आदर्श कैसा हो
91. ज्ञान फायर प्रूफ है
92. सृष्टि का हर कण दिगंबर है
93. मुमुक्षुओं को मंगल प्रेरणा
94. परिणाम हमारे दर्पण हैं
95. धर्म कार्य में छुपा प्रलोभन
96. भूख से अधिक ग्रहण हिंसा भी है और चोरी भी
97. विषयासक्त की दुर्दशा
98. क्रमबद्धपर्याय
99. आत्म सम्बोधन
100. हस्तलिखित कणिका (मूल पृष्ठ का चित्र)
मुमुक्षु सदन की चहल-पहल
पूज्य गुरुदेवश्री द्वारा मुमुक्षुओं को समर्पित
मुमुक्षुता का यशगान ‘आगम के आलोक में’
लेखक परिचय
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