चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ (बाबू युगल जी) | Chaitanya Ki Surbhit Pankhudiyan (Babu Yugal Ji)

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ (प्रवचनांश), दार्शनिक कवि बाबू ‘युगल’ जी (बाबू जुगलकिशोर जैन ‘युगल’, कोटा; जन्म 5 अप्रैल 1924, देहविलय 30 सितम्बर 2015) की अमृतवाणी का संकलन। यह एक शतक है, चैतन्य-तत्त्व पर सौ चिन्तन-कणिकाएँ, जिन्हें ‘सुरभित पंखुड़ियाँ’ कहा गया है।

संकलन: ब्र. नीलिमा जैन, कोटा · प्रकाशन: आचार्य कुन्दकुन्द फाउण्डेशन, कोटा (प्रथम संस्करण 2025, बाबू ‘युगल’ जी जन्म-शताब्दी समारोह)।

यहाँ प्रतिदिन एक अध्याय क्रम से जोड़ा जाएगा। एक-एक पंखुड़ी की सुगंध रोज़।


अनुक्रमणिका

  1. सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र
  2. सम्यग्दर्शन
  3. सम्यग्ज्ञान
  4. सम्यग्चारित्र
  5. षट् आवश्यक
  6. देव पूजा
  7. गुरु उपासना
  8. स्वाध्याय
  9. संयम
  10. तप
  11. दान
  12. दश धर्म
  13. उत्तम क्षमा
  14. बारह भावना
  15. अनित्य भावना
  16. अशरण भावना
  17. संसार भावना
  18. एकत्व भावना
  19. अन्यत्व भावना
  20. लोक भावना

अध्याय 1: सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र

( 1 ) ‘है’ का मर्म स्पर्श

जीव भी ‘है’ अजीव भी ‘है’ जब ये दोनों हैं, तो पहले थे अब हैं और हैं तो रहेंगें और जीव स्वयं से ही जीव है और अजीव स्वयं से ही अजीव है, जीव का ‘है’ अजीव से नहीं और अजीव का ‘है’, जीव से नहीं, इस तरह दोनों की त्रैकालिक स्वतंत्रता निर्बाध है। जैसे जमीन भी ‘है’ और आसमान भी ‘है’। किन्तु जमीन आसमान से नहीं, और आसमान जमीन से नहीं, जमीन आसमान का कर्म नहीं और आसमान जमीन का कर्म नहीं – इस प्रकार दो द्रव्यों के कर्ता-कर्म की सर्वथा असिद्धि है जिस समय निमित्त-नैमित्तिक भाव बन रहा हो, उस समय भी कर्ता-कर्म भाव का सर्वथा अभाव है। ‘है’ का यही मार्मिक विश्लेषण है।

( 2 ) ‘अनेकांत एक अपराजित शस्त्र है’

अनेकांत जैनदर्शन का अस्खलित सिद्धान्त है, भगवान वीतरागी, सर्वज्ञ अरहंतदेव के अतिरिक्त और जितने भी विचारक व मन्तव्य हैं वे कल्पना तक नहीं कर पाये कि "प्रत्येक वस्तु अनंत गुणात्मक व अनंत धर्मात्मक हो सकती है इसलिए अनेकांत को बदनामी भी बहुत सहनी पड़ी, लेकिन जिसका चरित्र उज्ज्वल होता है, उसे कितना ही कलंकित किया जाये, उसके चरित्र की पवित्रता कभी किसी से प्रभावित नहीं होती, उसमें क्षति नहीं होती, वह सदा निर्दोष ही रहता है।

अनेकांत पर जिन दार्शनिकों ने प्रहार किये, वे उदय हुए और अस्त भी हो गये, लेकिन अनेकांत अनादि-अनंत अपने ध्रुव धरातल पर जिंदा खड़ा है, यह किसी काल व क्षेत्र में एकांतवादियों के भयावह गोलों से विचलित होने वाला नहीं है क्योंकि यह कोई किसी की कल्पना मात्र नहीं, बल्कि वस्तु की अकाट्य स्वयंसिद्ध व्यवस्था है।

अनेकांत के सम्यक् बोध के अभाव के कारण अज्ञान ने इस आत्मा को अनादिकाल से दबोचा, जिससे यह उसके बंधनपाश से मुक्त नहीं हो पाया, लेकिन जब सद्‌गुरु की करुण कृपा से अनेकांत का सही स्वरूप सुन लेता है और उसे आत्मसात् कर उस दिव्यवाणी को अपने ज्ञान में बिठा लेता है और धारावाहिक पुरुषार्थ द्वारा अनंत धर्मात्मक चैतन्य तत्त्व की अनुभूति कर लेता है तो अज्ञान समूलरूप से नष्ट हो जाता है।

सचमुच ! अनेकांत का उपयोग हमारी मुक्ति व आत्मकल्याण के लिए ही करना चाहिए, इसका स्वरूप सम्यक् रीति से हमारे मस्तिष्क में समा जाए, परन्तु हुआ क्या? इसके स्वरूप को नहीं समझ पाने से इसे पूर्वापर विरोध के साथ मिला दिया गया, लेकिन यह सिद्धांत किसी से चुनौती नहीं पा सका, यह तो अपराजित शस्त्र है, जो कभी किसी से परास्त नहीं हुआ, न ही होगा, क्योंकि स्वयं वस्तु बोलती है, उसमें परस्पर पूर्वापर विरोध कहीं नहीं है, पूर्वापर विरोध तो उसे कहते हैं कि वस्तु के संबंध में आज क्या बोले - कल क्या बोले - यह बात जैनदर्शन में कहीं ढूंढ़ने को नहीं मिलेगी, इसलिए पूर्वापर विरोध सदा ही हारा हुआ है वह विश्वास के लायक नहीं। अरे झूठा वकील भी इतना सतर्क रहता है कि पूर्वापर विरोध न आ जाए, मैं हार जाऊँगा। अनेकांत मात्र विवेचन की वस्तु नहीं, प्रयोग पद्धति है, जो हमारे भव के भय को धराशाही कर देता है, और आनंदमयी जीवन की शुरूआत हो जाती है।

अनेकांत के अंचल में प्रमाणज्ञान के द्वारा द्रव्य व पर्याय का स्वरूप जान लेने पर श्रुतज्ञान का कार्य उसमें से अपने प्रयोजन की वस्तु को चुनना होता है, पदार्थ में से जो जितना अपेक्षित होता है, उतना वह ले लेता है, शेष अंश को छोड़ देता है क्योंकि उसके आश्रय के योग्य निरंश, अखंड अभेद ज्ञायक ही होता है और ज्ञान के साथ श्रद्धा भी उसी अनंत गुणात्मक एक सामान्य अभेद, अन्वय स्वरूप शाश्वत सत्ता को अहं देती है, विकारी व निर्विकारी केवलज्ञान की शुद्ध पर्याय भी क्षणिक होने से श्रद्धा को अवलंबन नहीं दे सकती इसलिए नित्य शुद्ध पारिणामिक तत्त्व ही श्रद्धा का श्रद्धेय होता है, श्रद्धा सदैव ऐकान्तिक होती है और ज्ञान अनेकांतपूर्वक सम्यक् एकांत की ओर बढ़ता है। इस प्रकार ज्ञान व श्रद्धा दोनों शुद्धात्मा के साथ एकाकार हो जाते हैं और परम आनन्द झरने लगता है। श्रीमद्जी ने भी कहा है – ‘अनेकांत मार्ग सम्यक् एकांत ऐवा निज पदनी प्राप्ति सिवाय अन्य हेतुए कार्यकारी नथी।’

( 3 ) अरे ! ये तो गारुड़ी मंत्र है

‘हे योगी तू ध्रुव तत्त्व को भज, अध्रुव तत्त्व की चिन्ता से तुझे क्या प्रयोजन।’

देखो ! ये आप्त वचन हैं या हीरे मोती! जो विश्व के किसी शोरूम में नहीं मिलेंगे यह तो दिगंबर संतों के खजाने की अचल संपत्ति है, शुद्धात्मा की गहराईयों में उतरकर उसकी अनुभूतियों को इन मोतियों से गूंथा है, इसका एक-एक वाक्य सारे लोक की संपत्ति से अधिक है माँ जिनवाणी की असीम कृपा है, असाधारण प्यार है हम पर। जो हमें भव-विच्छेद के मंत्र देती है, इन परमागमों का यह मधुर प्रसाद है, जो मरते हुए को जिंदा कर देता है, ऐसे गारुड़ी मंत्र हैं ये, एक वचन भी जीवन में क्रियान्वित हो जाए, रोम-रोम में बस जाये तो मुक्तिश्री रूपी लक्ष्मी, अटूट मिलती है, तुम जीभर कर इसका भोग करो अरे ! बाहर की जड़ लक्ष्मी तो मिट्टी के ढेले हैं और उन ढेलों से इसे विश्व का धनपति घोषित किया जाता है। मिट्टी से उसे इज्जत देकर मान के शिखर पर चढ़ाते हैं लेकिन वह इज्जत तो खिसक जाने वाली है एक दिन लुट जायेगी, शिखर से गिर जायेगा, फिर यह भयंकर रुदन करता है। इन करुणावंत जिन गुरुओं के वचन सुन भीतर से रोमांच हो जाए कि मैं ही मोक्ष का अधिकारी हूँ अस्थानों पर पड़ी हुई श्रद्धा डोलायमान हो जाए वह कह उठे कि मैं तो लोक का सम्राट हूँ अध्रुव तत्त्व मेरे से अलोकाकाश जितना दूर है क्योंकि मैं महात्मा परिणाम को स्पर्शता ही नहीं, मुक्ति भी मुझे स्पर्शती नहीं, फिर ‘अध्रुव’ की चिन्ता के निरर्थक विकल्प क्यों ? मुमुक्षु को ऐसी धारा विदाउट ब्रेक चलती है। यही उसका जीवन है।

अध्याय 1: बिंदु ( 2 ) अनेकांत एक अपराजित शस्त्र है

अनेकांत जैनदर्शन का अस्खलित सिद्धान्त है, भगवान वीतरागी, सर्वज्ञ अरहंतदेव के अतिरिक्त और जितने भी विचारक व मन्तव्य हैं वे कल्पना तक नहीं कर पाये कि "प्रत्येक वस्तु अनंत गुणात्मक व अनंत धर्मात्मक हो सकती है इसलिए अनेकांत को बदनामी भी बहुत सहनी पड़ी, लेकिन जिसका चरित्र उज्ज्वल होता है, उसे कितना ही कलंकित किया जाये, उसके चरित्र की पवित्रता कभी किसी से प्रभावित नहीं होती, उसमें क्षति नहीं होती, वह सदा निर्दोष ही रहता है।

अनेकांत पर जिन दार्शनिकों ने प्रहार किये, वे उदय हुए और अस्त भी हो गये, लेकिन अनेकांत अनादि-अनंत अपने ध्रुव धरातल पर जिंदा खड़ा है, यह किसी काल व क्षेत्र में एकांतवादियों के भयावह गोलों से विचलित होने वाला नहीं है क्योंकि यह कोई किसी की कल्पना मात्र नहीं, बल्कि वस्तु की अकाट्य स्वयंसिद्ध व्यवस्था है।

अनेकांत के सम्यक् बोध के अभाव के कारण अज्ञान ने इस आत्मा को अनादिकाल से दबोचा, जिससे यह उसके बंधनपाश से मुक्त नहीं हो पाया, लेकिन जब सद्‌गुरु की करुण कृपा से अनेकांत का सही स्वरूप सुन लेता है और उसे आत्मसात् कर उस दिव्यवाणी को अपने ज्ञान में बिठा लेता है और धारावाहिक पुरुषार्थ द्वारा अनंत धर्मात्मक चैतन्य तत्त्व की अनुभूति कर लेता है तो अज्ञान समूलरूप से नष्ट हो जाता है।

सचमुच ! अनेकांत का उपयोग हमारी मुक्ति व आत्मकल्याण के लिए ही करना चाहिए, इसका स्वरूप सम्यक् रीति से हमारे मस्तिष्क में समा जाए, परन्तु हुआ क्या? इसके स्वरूप को नहीं समझ पाने से इसे पूर्वापर विरोध के साथ मिला दिया गया, लेकिन यह सिद्धांत किसी से चुनौती नहीं पा सका, यह तो अपराजित शस्त्र है, जो कभी किसी से परास्त नहीं हुआ, न ही होगा, क्योंकि स्वयं वस्तु बोलती है, उसमें परस्पर पूर्वापर विरोध कहीं नहीं है, पूर्वापर विरोध तो उसे कहते हैं कि वस्तु के संबंध में आज क्या बोले - कल क्या बोले - यह बात जैनदर्शन में कहीं ढूंढ़ने को नहीं मिलेगी, इसलिए पूर्वापर विरोध सदा ही हारा हुआ है वह विश्वास के लायक नहीं। अरे झूठा वकील भी इतना सतर्क रहता है कि पूर्वापर विरोध न आ जाए, मैं हार जाऊँगा। अनेकांत मात्र विवेचन की वस्तु नहीं, प्रयोग पद्धति है, जो हमारे भव के भय को धराशाही कर देता है, और आनंदमयी जीवन की शुरूआत हो जाती है।

अनेकांत के अंचल में प्रमाणज्ञान के द्वारा द्रव्य व पर्याय का स्वरूप जान लेने पर श्रुतज्ञान का कार्य उसमें से अपने प्रयोजन की वस्तु को चुनना होता है, पदार्थ में से जो जितना अपेक्षित होता है, उतना वह ले लेता है, शेष अंश को छोड़ देता है क्योंकि उसके आश्रय के योग्य निरंश, अखंड अभेद ज्ञायक ही होता है और ज्ञान के साथ श्रद्धा भी उसी अनंत गुणात्मक एक सामान्य अभेद, अन्वय स्वरूप शाश्वत सत्ता को अहं देती है, विकारी व निर्विकारी केवलज्ञान की शुद्ध पर्याय भी क्षणिक होने से श्रद्धा को अवलंबन नहीं दे सकती इसलिए नित्य शुद्ध पारिणामिक तत्त्व ही श्रद्धा का श्रद्धेय होता है, श्रद्धा सदैव ऐकान्तिक होती है और ज्ञान अनेकांतपूर्वक सम्यक् एकांत की ओर बढ़ता है। इस प्रकार ज्ञान व श्रद्धा दोनों शुद्धात्मा के साथ एकाकार हो जाते हैं और परम आनन्द झरने लगता है। श्रीमद्जी ने भी कहा है – ‘अनेकांत मार्ग सम्यक् एकांत ऐवा निज पदनी प्राप्ति सिवाय अन्य हेतुए कार्यकारी नथी।’

अध्याय 1: बिंदु ( 3 ) अरे ! ये तो गारुड़ी मंत्र है

‘हे योगी तू ध्रुव तत्त्व को भज, अध्रुव तत्त्व की चिन्ता से तुझे क्या प्रयोजन।’

देखो ! ये आप्त वचन हैं या हीरे मोती! जो विश्व के किसी शोरूम में नहीं मिलेंगे यह तो दिगंबर संतों के खजाने की अचल संपत्ति है, शुद्धात्मा की गहराईयों में उतरकर उसकी अनुभूतियों को इन मोतियों से गूंथा है, इसका एक-एक वाक्य सारे लोक की संपत्ति से अधिक है माँ जिनवाणी की असीम कृपा है, असाधारण प्यार है हम पर। जो हमें भव-विच्छेद के मंत्र देती है, इन परमागमों का यह मधुर प्रसाद है, जो मरते हुए को जिंदा कर देता है, ऐसे गारुड़ी मंत्र हैं ये, एक वचन भी जीवन में क्रियान्वित हो जाए, रोम-रोम में बस जाये तो मुक्तिश्री रूपी लक्ष्मी, अटूट मिलती है, तुम जीभर कर इसका भोग करो अरे ! बाहर की जड़ लक्ष्मी तो मिट्टी के ढेले हैं और उन ढेलों से इसे विश्व का धनपति घोषित किया जाता है। मिट्टी से उसे इज्जत देकर मान के शिखर पर चढ़ाते हैं लेकिन वह इज्जत तो खिसक जाने वाली है एक दिन लुट जायेगी, शिखर से गिर जायेगा, फिर यह भयंकर रुदन करता है। इन करुणावंत जिन गुरुओं के वचन सुन भीतर से रोमांच हो जाए कि मैं ही मोक्ष का अधिकारी हूँ अस्थानों पर पड़ी हुई श्रद्धा डोलायमान हो जाए वह कह उठे कि मैं तो लोक का सम्राट हूँ अध्रुव तत्त्व मेरे से अलोकाकाश जितना दूर है क्योंकि मैं महात्मा परिणाम को स्पर्शता ही नहीं, मुक्ति भी मुझे स्पर्शती नहीं, फिर ‘अध्रुव’ की चिन्ता के निरर्थक विकल्प क्यों ? मुमुक्षु को ऐसी धारा विदाउट ब्रेक चलती है। यही उसका जीवन है।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 4 ) ज्ञानी का चित्र

भोगों की तन्द्रा में नहीं; योग निद्रा में देखो

तत्त्व दृष्टा पुरुष को अपने निर्मल ज्ञान में क्रमबद्ध का स्वरूप सम्यक् प्रकार से समझ आ जाने पर उसे निश्चित रूप में आत्मानुभूति व आत्म दृष्टि का जन्म हो जाता है फलस्वरूप ‘ज्ञानी’ संज्ञा से अभिहित किया जाता है यह पहलू परम सत्य है ही लेकिन फिर भी एक दूसरा पहलू जिसमें उसकी अपनी भूमिका के योग्य कर्ता-कर्म का स्वर (विकल्प) चलता हुआ दिखाई देता है जैसे कि मुझे मंदिर जाना है, व्यवसाय करना है, मैं भोजन करता हूँ, यह मेरा परिवार है इत्यादि। उसका यह स्वर देख हमें प्रश्न हो सकता है कि ऐसा क्यों होता है ? अकर्ता का स्वर तो ज्ञानत्व की अनुभूतिरूप होता है न ?

सचमुच देखा जाय तो समस्त शुभाशुभ विकल्प का स्वरूप कर्ताकर्म रूप ही होता है परन्तु कर्ताकर्म जैसा होने पर भी, उसमें कर्ताकर्म की ‘कर्तृत्व बुद्धि’ का नितान्त अभाव है, कारण कि उसे अपने सम्यग्ज्ञान में यह विदित हो चुका है कि - विकल्प की कक्षा ही बिल्कुल न्यारी है, अतः इसका स्वर भी करूँ करूँ का होता है- विकल्पों की काया तो राग अर्थात् पुद्गल से बनी है, मेरा सुन्दर शरीर, मेरा बंगला, ऐसे यह विकल्प ऊपर से तर जैसे लगते हैं किन्तु अन्दर से चट्टान की तरह एकदम सूखे हैं, निर्जीव हैं।

अहो ! तत्त्वदृष्टा तो वस्तु स्वभाव पर आधारित ज्ञान द्वारा यह जानता है कि विकल्पों की जर्जर बस्ती मेरे फौलादी घन ज्ञान से बहुत दूर है, जो व्यक्ति विकल्प की शिकायत करता है वह शतांश झूठ है, अतः ज्ञानी को विकल्प का किंचित् भी विश्वास नहीं उसका ज्ञान तो क्रमबद्ध व होनहार का विश्वासी है इसलिए उसे विकल्प के घोर आतंक पर भी न ही कोई भय और न ही कोई चिंता।

एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि सम्यग्दर्शन हो जाने पर विकल्प के तो प्राण ही निकल चुके हैं वह अब पार्थिव शरीर जैसे पड़े हैं इसलिए आत्म दृष्टिवंत यह जानता है कि जब तक मेरी मुक्ति नहीं होगी तब तक यह अबोध, ना समझ बालक की तरह शोर मचाते रहेंगे और मेरा मोक्ष जब भी होना है वह अपने पुरुषार्थ के निश्चित क्रम में ही होना है, अक्रम कुछ होना नहीं है, ऐसा ठोस ज्ञान होता है उनका, सचमुच !

ज्ञानियों का चित्र भोगों की तन्द्रा में नहीं, योग की निद्रा में देखो।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 5 ) अहमेक्को

‘अहमेक्को’ - मैं एक हूँ- ‘एक’ विशेषण संपूर्ण आगम में स्थान-स्थान पर आया है, यह शब्द रत्नों की भाँति बड़ा कीमती है और ‘एक’ विशेषण अनेक विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता है, एकत्व सदा पूर्ण व सर्व कर्म विमुक्त, सर्व संग से मुक्त, शुद्ध-शुद्ध व मस्त होता है, शताशतः द्रव्य स्वभाव भी त्रिकाल अकेला है और अपने एकत्व में सदैव प्रतिष्ठित रहता है, स्वयंभू होने से भूत-भविष्य-वर्तमान काल की अपेक्षा शून्य, काल भी कला से रहित है, अनेक अवस्थाओं के चक्र में वह कभी नहीं परिणमता ऐसा एक है क्या कहें ! रागादि व पुण्य-पाप की पर्याय तो दूर रहो किन्तु, क्षायिकज्ञान, केवलज्ञान की अनंती पर्याय मिलकर भी उसके एकत्व के खण्ड नहीं कर सकी क्योंकि मेरा अखंड, वज्रमयी स्तूप है, जैसे आकाश एक अखंड अमूर्तिक महापदार्थ है, उस पर कोई बम बरसाये, अग्नि जलाये, तलवार से प्रहार करें, लेकिन आज तक उसे कोई खंडित नहीं कर पाया – ऐसा ही आकाश की भाँति, सघन, एक प्राणवान परम पदार्थ हूँ। अहमेक्को सासदो अप्पा - यह शब्द बहुत महत्त्व का है समयसार परमागम की 6-38-73 नं. की गाथाओं व टीकाओं में ‘एक’ की बड़ी गंभीर व्याख्या की है, जिसमें आत्मा का एकत्व सिद्ध करते हुए, उसे अन्य समस्त संयोग लक्षण वाले पर्याय भावों से सर्वथा पृथक् बताया गया है।

जैसे ‘एक’ का अंक होता है, बताओ उसमें क्या जोड़ा जाये कि वह पूरा हो जाये और उसमें से क्या निकाला जाय कि वह अधूरा रह जाय ? अरे जो सदा से ही संपूर्ण है, उसमें कुछ डालने व निकालने की चेष्टा तो अपने ही श्रम का अपमान है, अनुत्पादक श्रम है जगत का कोई बलशाली भी उस एक के अंक को आज तक चेलेन्ज नहीं कर पाया, उसकी सत्ता को मिटा नहीं सका, तो मुझ चेतन की अमिट-अनादि-अनंत सत्ता को मिटाने की ताकत है किसी में ? मिटाने वाला मिट जायेगा पर मैं नहीं।

‘एकत्व’ में कभी द्वैत नहीं समाता, जैसे कोई व्यक्ति आजन्म ब्रह्मचारी है बताओ वह किससे संबंध बनाये ? न किसी का जन्म मनाये न किसी की मृत्यु, न उसे कोई रोने वाला, न वह किसी को रोने वाला, कितना निर्भार हो गया क्योंकि सारे कृत्रिम संबंधों की श्रृंखला टूट गई।

संसारी अज्ञानीजन ऐसा मानते हैं कि अकेला तो असहाय, बेसहारा, निठल्ला होता होगा, उसका कोई नहीं तो कैसे समय बीतता होगा। आचार्य इसका उत्तर देते हैं – यह तेरे रिश्ते धोखेबाज हैं, कहने के साथी हैं, ठगों की टोली है, प्रतिदिन तुझको छोड़कर जा रहे हैं और तू विलाप करता रह जाता है तू बंधन से निरन्तर जकड़ा हुआ है और किसी धन्य घड़ी में बंधन से निकलने का तुझे शुभ विकल्प आया है समझना तेरी होनहार अच्छी है।

एकल विहारी, एकाकी निर्जन के जंगलों में, अपने एकत्व की अनुभूति में तल्लीन, उसमें से झरते रस को पी-पीकर वे स्वरूप मंथर योगी, मुक्ति की ओर डग भर रहे हैं, उनके लिए एक काव्य में सुन्दर पंक्तियाँ आती हैं –

एक योगी अशन बनावें, आप बनावें आप ही खावें।
खावत नाहिं अघावे, एक योगी अशन बनावें ।।

ऐसा मेरा ‘एक’ यही ध्यान का ध्येय व श्रद्धा का श्रद्धेय है इसलिए एकत्व ही लोक में सर्वत्र सुन्दरता को प्राप्त होता है, इस एक के गहरे तल में उतरो तो अनंत रत्न मिलेंगे, कारण कि ‘एक’ चैतन्य सिन्धु अनंत को पीकर बैठा है।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 6 ) अरे ! वीर्य हो तो अश्व जैसा

त्रैलोक्य में मेरा शुद्धभाव, ध्रुवभाव ही अनंत वैभववान है – अलोकाकाश के प्रदेशों से काल के समयों से अधिक, गुणा राशि की अचल संपत्ति का स्वामी हूँ, ऐसे शुद्ध भाव की जिसे महिमा न आवे, वह तो अभागा है। अरे जैसे भूखे आदमी को रोटी का पहला ग्रास स्वर्गों के अमृत जैसा लगता है, वैसे ही आत्मा मधुर है-अनंत शक्तियों का रसगुल्ला है, रसगुल्ले जैसा रस इसमें से रिस-रिस कर आ रहा है, उसको देखकर, उसकी वार्ता सुन हमारे हृदय में रस क्यों नहीं बनता ? जैसे अपने पुत्र के प्रति अन्तर्प्रीति होती है-अन्य पुत्र के प्रति बहिर्प्रीति, ऐसी प्रीति अपने ज्ञायक की हो, रूखा चित्त न हो, मुरझाया मन न हो, तो शुद्धभाव की दृष्टि का सुन्दर अवसर हमें मिल सकता है, वरना द्रव्य दृष्टि से शुद्ध हूँ, पर्याय दृष्टि से अशुद्ध – ऐसे नयों के चक्र में घूमता हुआ, परिणाम की मूढ़ता द्वारा मिथ्यादर्शन को पुष्ट करता रहता है और ध्रुवभाव हाथ से खिसक जाता है। अरे ! ‘वीर्य हो तो अश्व जैसा’ जो पर्याय की दीवार को लांघता हुआ, अपने शुद्धात्म तत्त्व पर छलांग भर लेता है। इस अतुल बल में से सम्यक्त्व का पूत जन्म लेता है, बाकी सारा शुभाशुभ में व्यस्त वीर्य-नपुंसकता है, दृष्टि फिर जाने पर पुरुषार्थ की दिशा भी बदल जाती है और पुरुषार्थ की बात तो एक बूँद जैसी है यह तो पुरुषार्थ शिथिल है, ऐसा कहकर मिथ्यात्व को ढ़कना चाहता है, यह स्वयं के साथ छलना है।

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चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 7 ) ज्ञेयों का मोह, भव का बीज
ज्ञान है सो आत्मा ही है, ऐसे ज्ञान के शुद्ध स्वरूप को नहीं जानता हुआ अज्ञानी सदा से अपनी ज्ञेय लुब्धता को नहीं छोड़ना चाहता, वह अपने ज्ञेय मिश्रित ज्ञान अर्थात् ज्ञेयाकारों में प्रतिसमय लुब्ध रहता है उसकी यह आसक्तता, लुब्धता ज्ञान सामान्य के दर्शन में बड़ी दीवार बनकर खड़ी रहती है क्योंकि जितने भी ज्ञेयाकार अर्थात् विशेषाकार हैं, उन्हें वह विशेष मानता हुआ, अनेक प्रकार की कल्पना किया करता है, इसके फल में सदैव शंकित होता हुआ चिंतित रहता है।

जबकि सही स्थिति तो यह है कि प्रत्येक ज्ञेयाकार वह ज्ञान की ही संरचना है, उसका हर प्रदेश ज्ञान है और वह आकार अर्थात् पदार्थ का द्रव्य-गुण-पर्याय सबकी सब ज्ञान की ही कल्लोल, ज्ञान का ही आकार है-आकार का अर्थ-पर्याय अर्थात् जाननभाव। उस ज्ञान का परीक्षण करने पर पता चला कि इसमें तो ज्ञान के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, वह आकार ज्ञान के मेटेरियल का ही बना है, अज्ञानी क्या करता है ? अपनी ज्ञेय लोलुपता के कारण प्रतिसमय चल रहे ज्ञान सामान्य का परित्याग कर देता है और उसी पर्याय में चल रहे विशेष ज्ञेयों की ओर झपटता है एवं उसमें अहं कर उसे रखना चाहता है पर्याय को जाने नहीं देना चाहता, लेकिन जब पर्याय सहित ज्ञेय (विशेष) बदलता है तो इसका अहं आघात को प्राप्त होता है और यह रोता हुआ भयंकर क्लेश में डूब जाता है। पुनः पूर्ववत् नये ज्ञेय में अहंशील होता है इस तरह पर्याय के पाट पर खड़ा रह, उन आने-जाने वाले चित्रों को देखता हुआ, अनंत काल बिता देता है। सचमुच ज्ञेयों के मोह में, ज्ञान की विराधना यही भव का बीज है मैं तो ज्ञान का ध्रुवतारा हूँ – यह मंत्र भव संतति का अंतिम चरण है।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 8 ) शपथ लो
कि मैं आज से परिणाम दृष्टि का विसर्जन करता हूँ

सचमुच कुदरत की क्रमनियत व्यवस्था में परिणाम को देखने व करने का अधिकार आत्मा को तनिक भी नहीं! सहज होते हुए परिणमन में क्या करें, और नहीं होने वाले परिणमन में कौन क्या करें ? दोनों में ही आत्मा का कर्तृत्व समर्थ नहीं फिर भी पर्याय के क्षण-क्षण में उत्पन्न होने के समय ही अज्ञानी उस पर्याय को अपनी पूरी आत्मा मानकर उसे पकड़ कर टिकाना चाहता है, लेकिन वह क्षण भर में खिसक जाती है और यह विलाप करता रह जाता है मानो मौत ही हो गई हो। जैसे – परिवार में एक छोटा बालक होता है उसके हाथ में घड़ी आ जाए तो वह उसकी सुई को पकड़ कर बैठ जाता है आगे नहीं बढ़ने देता, इस पर वह पिता की मार खाता है डाँट खाता है।

ऐसे ही परिणाम की अपनी स्वतंत्र अहेतुक व्यवस्था जिसको करने का द्रव्य को भी अधिकार नहीं, फिर हमारी क्या विसात् ? अरे परिणाम की संभाल से परिणाम नहीं संभलता लेकिन परिणाम की संभाल छोड़ देने पर हर परिणाम संभला हुआ आता है। “द्रव्य की दृष्टि में परिणाम की सुरक्षा है”, वरना नाशवान के साथ एकांत आकुलता है पर्याय की क्रमबद्धता का विश्वास ही पर्याय दृष्टि के अंत का मंत्र है। मैं परिणाम जितना हूँ, यह परिणाम निष्ठा-जो हमें निर्भय नहीं होने देती-मैं अपरिणामी, परमात्म द्रव्य हूँ, यह दृष्टि भव का छेदन कर निर्भय बनाती है।

यदि अपने को कुन्दकुन्द का वंशज मानते हो जैन संविधान का पालन करते हो – तो शपथ लो, हस्ताक्षर करो, कि इसी पल में अनादि की इस परिणाम दृष्टि का विसर्जन करता हूँ - है इतनी ताकत ? अन्यमत में एक अनारकिष्ट मत है उसकी संस्था के ऐसे नियम है कि यदि किसी को उस संस्था का सदस्य बनना हो तो, उनके हाथ पर जलता हुआ अंगारा रखा जाता है-और वह आह न करें, तो उसे उसका सदस्य बनाया जाता है। हम भी यदि कुन्द-कुन्द व पू. गुरुदेव के शिष्य हैं तो उनके सांसद में शपथ ग्रहण करो, कि मैं आज से परिणाम दृष्टि का परित्याग करता हूँ।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 9 ) चिंतनीय तथ्य
विरागता विचार एवं विकल्प

विरागता के साथ विचार एवं विकल्प हो तो सकते हैं, किंतु विरागता की शांति एवं अनुभूति से, विचार एवं विकल्प शून्य रहते हैं।

जैसे एक खेल में खिलाड़ी को खेले जाने वाले खेल की अनुभूति होती है, किन्तु उसके साथ के रेफ्री एवं दर्शकों को वह अनुभूति किंचित् भी नहीं हो – यद्यपि रेफ्री एवं दर्शक का स्वर वही होता है, जो उस समय खिलाड़ी की अनुभूति का होता है।

ऐसे ही खिलाड़ी की तरह ज्ञानी साधक की विरागता व अनुभूति होती है, जिसमें एक मात्र अपने चैतन्य के अर्न्तमुखी संवेदन पूर्वक शांति व आनंद का ही वर्तन होता है तथा विचार व अनुभूति शून्य जानन क्रिया अर्थात् रेफ्री के स्थान पर रहते हैं, वह कैसे ? पुरुषार्थी साधक को आत्मानुभूति के पूर्व ज्ञान में आत्मा के ही संबंध में अनेक विचार तरंगे उठती हैं मैं शुद्ध हूँ- एक हूँ, ध्रुव हूँ, अपरिणामी हूँ आदि-आदि ये विचार बड़े उत्साह के साथ उछल-उछल कर आते हैं, किन्तु उन विचारों में अनुभूति की क्षमता नहीं है, क्योंकि विचार तरल होते हैं चाहे आत्मा को जानने के प्रयास में तत्पर हैं और चिन्मय सदृश ही दिखाई देते हैं, फिर भी प्रकाश पुंज स्वभाव से दूर होने के कारण उसकी अनुभूति नहीं कर पाते वरन् उसके विरोधी हैं। जहाँ तक विचारों की तरंगित सरिता की धारा बहती रहेगी वहाँ तक ज्ञानघन आत्मा की घनीभूत अनुभूति किंचित् भी नहीं हो सकती, क्योंकि स्वयं वस्तु निस्तरंग विचारातीत है। सचमुच ! विचारों में वस्तु नहीं ये विचार तो थकान पैदा करने वाले हैं। इनमें कभी विश्राम नहीं मिल सकता मेरा विश्राम स्थल तो एकमात्र निर्विकल्प, अविनश्वर, अक्षय घनसत्ता ही है। इस प्रकार यहाँ दर्शक का स्थान विकल्प को दिया जायेगा और जैसे खेल में हार व जीत से खिलाड़ी को जो सुख व दुख का अनुभव होता है, तब उसके साथ में दर्शक भी अपना वैसा ही भाव व्यक्त करता दिखाई देता है लेकिन वह उस सुख-दुखमय अनुभूति से एकदम दूर रहता है बिल्कुल ऐसे ही इन शुभाशुभ विकल्पों की स्थिति होती है ये विकल्प भी ज्ञान व जानन क्रिया से शून्य होने से सर्वथा जड़मय हैं। अनुभूति के पूर्व साधक को जब ज्ञानात्मक विचारों की प्रक्रिया चलती है उस समय वहाँ रागात्मक विकल्प भी चारित्र की क्रमिक भूमिका में अवश्य होते ही हैं, लेकिन वे विकल्प ज्ञानानुभूति से शून्य उस दर्शक के समान है, उन विकल्पों को जानने वाला तो ज्ञान होता है राग तो स्वयं को भी नहीं जानता और आत्मा को भी नहीं जानता।

चैतन्य की सुरभित पंखुड़ियाँ, अध्याय 1: बिंदु ( 10 ) मृत्युंजय है मेरी सत्ता

कुदरत के जटिल विधान के अंतर्गत यद्यपि ‘मृत्यु’ परम सत्य है, किन्तु इस विधान के आलोक में आत्मसत्ता इस प्रकृति की वह मृत्युंजय शक्ति है, जिसे आज तक कोई बलशाली सम्राट व सेनानी नहीं मार पाया, मेरे अमर अस्तित्व को कोई क्षत-विक्षत नहीं कर सका, क्योंकि मैं तो उस अक्षय धातु का बना हुआ हूँ, जिसका भेदन नहीं हो सकता। मुझे आज तक किसी मृत्यु ने घाता हो या कभी मुझे मृत्यु आई हो, इसका मुझे पता ही नहीं। अरे ! मेरे को तो कुन्दकुन्द जैसे ऋषियों का वरदान है, मेरे शीश पर उनका हस्तकमल है, तेरा अविनाशी कल्याण होगा, तू निर्भय व निरापद व निश्चिन्त रह, तेरे इस मार्ग में कोई विपत्ति आने वाली नहीं है, ऐसा सुनते हैं, सारी चिन्ताओं का ज्वार सूख जाता है, समस्त विकल्पों का तूफान जाने कहाँ चला जाता है, जैसे शेर की दहाड़ मात्र से गीदड़ तितर-बितर हो जाते हैं वैसे ही मृत्युंजय है, मेरी सत्ता ! मेरा स्पर्श भी कर ले, तो मौत की मौत हो जाती है - ऐसे विकल्पमात्र से-शांति की धारा बह चलती है, पर्याय की दृष्टि तो मृत्यु है जो स्वयं ही मर जाती है, जिसकी उम्र ही नहीं है, नाशवान तत्त्व है और आत्मा नाश होनेवाले भावों से सदा दूर रहता है। देहासन्न का नाश की बात से रोम-रोम भयभीत होता है, जो व्यक्ति स्वयं ही मृत्युशय्या पर पड़ा है, वह क्या कमाकर खिला सकता है ? अरे ! मरने के किनारे वाले से क्या आशा करे, ऐसे ही परिणाम मात्र से क्या आशा करे ? इसकी उपेक्षा हो जाने पर अमरत्व का मंगलगान होता है अरे ! सम्यग्दृष्टियों के लिए यह मृत्यु मंगलगान बनकर आती है। वे इसे नव जीवन का शुभ आमंत्रण कहते हैं, मौत को आया हुआ देखकर योगी जन तो अपने पुरुषार्थ को और अधिक उग्रकर समाधिस्थ हो जाते हैं, उनका साहसी हृदय बोल उठता है कि

‘मौत आये तो तू उसे यों कह देना ऐ जिंदगी। सैर पर गये हैं वो घर पर नहीं हैं अभी ।।’

यह ज्ञानियों के अन्तरतम का चित्र है।