चाहत है सुख पै न गाहत है धर्म जीव
चाहत है सुख पै न गाहत है धर्म जीव …
सुखको दिवैया हित भैया नाहिं छतियाँ॥चाहत. ॥
दुखतैं डरै है पै भरै है अघसेती घट,
दुखको करैया भय दैया दिन रतियाँ ॥चाहत. ॥१॥
बोयो है बबूल मूल खायो चाहै अंब भूल,
दाह ज्वर नासनिको सोवै सेज ततियां ॥चाहत. ॥२॥
‘द्यानत’ है सुख राई दुख मेरुकी कमाई,
देखो राई चेतनकी चतुराई बतियां ॥चाहत. ॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ९२
अर्थ
हे जीव ! तू सुख चाहता है, पर सुख को देनेवाले धर्म को ग्रहण नहीं करता ! ऐसी हितकारी बात तेरी छाती में, हिये में, मन में नहीं आती!
दुखतें डरै है पै भरै है अघसेती घट,
तू सदा दुःख से डरता है, पर पापों से तूने अपना घड़ा भर रखा है, जो दुःख का कारण है/दुःख उत्पना करनेवाला है और दिन-रात भयदायक अर्थात् भयकारी है।
बोयो है बँबूलमूल खायो 'चाहै अंब भूल,
तेरी बातें ऐसी हैं जैसे कोई बबूल बोकर भूल से आम खाना चाहता है। जैसे कोई दाह व ज्वर का नाश करने के लिए गर्म-गर्म (तप्त) सेज पर सोता हो?
‘द्यानत’ है सुख राई दुख मेरुकी कमाई,
ह्यानतराय कहते हैं कि सुख राई के समान अत्यन्त अल्प/सूक्ष्म लगता है और दुःख मेरु के समान दीर्घ-विशाल लगता है। फिर भी इस चेतन राजा की चतुराई-भरी बातों को तो देखो कि वह बिना किसी यत्न के सदा सुख की कामना करता है !
शब्दार्थ: अंब - आम; बायो - बोया है।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।
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