चेतन अब तो निज घर आओ
चेतन अब तो निज घर आओ ।
पर घर फिरत बहुत दिन बीते क्यो भव-भव भरमाओ ।।टेक।।
पर से भिन्न स्व पद लख कर,
अब स्वानुभूति प्रगटाओ ।
शुद्ध-बुद्ध सुख… मनोहर,
परम भाव निज भाओ ।।1।।
त्रिविध कर्म तैं भिन्न सु जानो,
पर्यय बुद्धि भगाओ ।
अमल अखड अतुल अविनाशी,
द्रव्यदृष्टि में लाओ ।।2।।
भूल स्वयं को बहु दु:ख पाये,
भूल तजो सुख पाओ ।
‘आत्मन्’ भजो सदा ज्ञायक प्रभु,
सहज सिद्ध पद पाओ ।।3।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ १०३ से १०४