( चौपाई ) | Caupai

हे प्रभु! तेरे चरण प्रसाद, निज पद की भूलूँ नहीं याद।
निज पद शाश्वत मंगलरूप, चिदानन्द चिद्रूप अनूप ।। 1 ।।

परभावों से भिन्न अविकार, सहज मुक्त है निज-आधार।
आपद शून्य सदा निष्काम, नित्य निरंजन आतमराम।।2।।

वर्ते निज में ही असहाय, सहजपने सब मंगलदाय।
अक्षय चैतन्य शुद्धि सम्पन्न, शिवपद मिले सहज आसन्न ।।3।।

निरखत उपज्यो परमानन्द, सहज ध्यान हो दुःख निकन्द ।
नशें विभाव सर्व दुःखकार, रहूँ परम निर्ग्रन्थ अविकार ।।4।।

निर्भय निर्वांछक विलसाय, काल अनंत सु-तृप्त रहाय।
होय प्रगट प्रभुता उत्कृष्ट, सहज सिद्ध हो अपना इष्ट ।।5।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’