चाहे धूप रहे या छाया, चित्स्वरूप अनुभव में आया | Cahe Dhup Rahe Ya Chay Citsvarup Anubhav Mem Ay

चाहे धूप रहे या छाया, चित्स्वरूप अनुभव में आया।

वेदूं चिदानन्द रस अनुपम, भिन्न कर्म है भिन्न है काया।।टेक ।।

धूप छाँह पुद्गल से तन्मय, भिन्न ज्ञेय सम्बन्ध न कुछ भी।
मैं तो ज्ञाता निज घर में ही, पाने योग्य सहज सुख पाया।।1।।

ध्रुव के आश्रय तृप्ति प्रगटी, काल अनन्त सु तृप्त रहूँ।
अद्भुत सहज अखंडित प्रभुता, ज्ञानमयी साम्राज्य सुहाया।।2।।

सिद्ध में आप में भेद न दीखे, दुर्विकल्प सब शान्त हुए।
अहो शुद्धता का प्रवाह ही, सहजपने अक्षुण्ण प्रगटाया।।3।।

पूर्व कर्म जो उदय में आवे, तदनुसार संयोग बने ।
उनसे मुझे प्रयोजन ही क्या ? ध्येय रूप चिद्रूप सु-ध्याया ।।4।।

भेदज्ञान अन्तर में वर्ते, मोह क्षोभ नहीं उपजावे।
मग्न रहूँ नित अपने में ही, अपने में सर्वस्व दिखाया।।5।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’