ब्रह्मचर्य सुख रूप भासे मोहि सुखकारा रे।
सब धर्मों में सार, महिमा अपरम्पारा रे ।। टेक ।।
अक्षय परम ब्रह्म परमातम, ज्ञानानन्द स्वभावी आतम ।
वचनातीत विकल्प शून्य, बस जाननहारा रे ।। 1।।
जब आतम अनुभव प्रगटाया, परमानंद निज में ही पाया।
रही न पंचेन्द्रिय भोगों की चाह लगारा रे ।। 2।।
किससे झूठा नाता जोड़ूँ, किसको भोगूँ किसको छोड़ूँ।
ज्ञेयपने भी दिखे विश्व सब मुझको न्यारा रे।। 3।।
अमृत पीकर विष को चाहे, यही भाव फिर भी आ जावे।
होवे थिर विश्राम स्वयं में, मंगलकारा रे ।। 4।।
हूँ स्वभाव से ही आनन्दमय, सहज तृप्त निज में ही निर्भय।
स्वस्थ रहूँ वेदूँ अमृतमय, निज रस सारा रे।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २८८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’