बोलो जय-जयकार, जिनवाणी सुखकार | bolo jaya jayakara jinavani sukhakara

बोलो जय-जयकार, जिनवाणी सुखकार।

जय-जयकार जय, जयकार जय, जयकार ॥ टेक ॥
तू एकांत नशाने वाली, अनेकान्त दर्शाने वाली।
मुक्तिमार्ग बतलाने वाली, नाशक मिथ्याचार ॥1 ॥

तुझ ही से जग में उजियाला, तू पवित्र श्रुतज्ञान निराला ।
है शुभ गुण मंडित भविमाला, तू जग का श्रृंगार ॥ 2 ॥

तीर्थंकर प्रभु की है वाणी, अंजुलि भर-भर पीवे ज्ञानी ।
आत्मज्ञान पावे भवि प्राणी, तू ही जग आधार ॥ 3 ॥

सम्यक् दर्शन मित्र हमारा, सम्यक् ज्ञान विचित्र हमारा।
सत्सम्यक् चारित्र हमारा, मुक्ति मारग हितकार।। 4।।

माँ हमको स्वात्माभिमान दे, रत्नत्रय का सहज दान दे।
कर्म विनाशक विमल ज्ञान दे, वरद स्वपाणि पसार ॥5॥

तू ही रक्षक जननी हमारी, तन-मन-धन तुझ पर बलिहारी।
पावें निज स्वभाव अविकारी, नमन है बारम्बार ॥ 6 ॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १५८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’