बीरा! थारी बान परी रे, बरज्यो मानत नाहिं
बीरा! थारी बान परी रे, बरज्यो मानत नाहिं ।।टेक।।
विषय-विनोद महा बुरे रे, दुख दाता सरवंग ।
तू हटसौं ऐसै रमै रे, दीवे पड़त पतंग ।।१।।बीरा. ।।
ये सुख है दिन दोयके रे, फिर दुख की सन्तान ।
करै कुहाड़ी लेइकै रे, मति मारै पग जानि ।।२।।बीरा. ।।
तनक न संकट सहि सकै रे! छिनमें होय अधीर ।
नरक विपति बहु दोहली रे, कैसे भरि है बीर ।।३।।बीरा. ।।
भव सुपना हो जायेगा रे, करनी रहेगी निदान ।
‘भूधर’ फिर पछतायगा रे, अबही समुझि अजान ।।४।।बीरा. ।।
Artist: पं. श्री भूधरदास जी
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पृष्ठ ८६