बिना सम्यक्त के चेतन जनम बिरथा गँवाता है।
तुझे समझाएँ क्या मूरख नहीं तू दिल में लाता है ॥
अथिर है जगत की सम्पत समझले दिल में अब नादां ।
राव और रंक होने का यूँही अफसोस खाता है ॥
ऐशो इशरत में दुख होवे कहीं दुख में महा सुख हो ।
क्यों अपने में समझता है यह सब पुद्गल का नाता है ॥
विनाशी सब तूं अविनाशी इन्हों पे क्या लुभाना है।
निराला भेष है तेरा तू क्यों परमें फँसाता है ॥
पिता सुत बन्धु और भाई सहेली संग की नारी ।
स्वारथ की सभी यारी भरोसा क्या रखाता है ॥
अनादि भूल है तेरी स्वरूप अपना नहीं जाना ।
पड़ा है मोहका परदा नजर तुझको न आता है ॥
है दर्शन ज्ञान गुण तेरा इसे भूला है क्यों मूरख ।
अरे अब तो समझले तू चला संसार जाता है ॥
तू चेतन सबसे न्यारा है भूल से देह धारा है ।
तू है जड़ में न जड़ तुझमें तू क्यों धोखे में आता है ॥
जगत में तूने चित लाया कि इन्द्री भोग मन भाया ।
कभी दिल में नहीं आया तेरा क्या जग से नाता है ॥
तेरे में और परमातम में कुछ नहीं भेद अय चेतन ।
रतन आतम को मूरख कांच बदले क्यों बिकाता है ॥
मोह के फंद में फंसकर क्यों अपनी न्यामत खोई ।
कर्म जंजीर को काटो इसी से मोक्ष पाता है ॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ६७ (विभिन्न कवियों के भजन)