भूधर जैन शतक | Bhudhar Jain Shatak

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कविवर भूधर दास जी विरचित भूधर जैन शतक
श्री आदिनाथ स्तुति
ज्ञान जिहाज बैठि गनधर से ।
गुन पयोधि जिन नाही तरे हैं ॥
अमर समूह आनि अवनी सों ।
घसि घसि सीस प्रणाम करे हैं ॥
किधौं भाल कुकर्म की रेखा ।
दूर करन की बुद्धि धरे हैं ॥
ऐसे आदिनाथ के अह निस ।
हाथ जोड़ हम पायें परे हैं ॥
काउस्सग्ग मुद्रा धरि वन में ।
ठाड़े रिसभ रिद्धि तजि ईनी ॥
निहचल अंग मेरु है मानो ।
दोऊ भुजा छोर जिन दीनी ॥
फसे अनंत जंतु जग पेलें ।
दुखी देखि करुणा चित लीनी ॥
कारन काज तिनें समरथ प्रभु ।
किधौं बाह ये दीरघ कीनी ॥
करनो कछू न करन तें कारज ।
तातें पाणि प्रलंब करे हैं ॥
रह्यो न कछु पायन तें पैबो ।
ताहि तें पद नाही टरे हैं ॥
निरख चुके नैनन सत्र यातें ।
नैन नासिका अनी धरे हैं ॥
कानन कहा सुने यों कानन ।
जोग लीन जिनराज खरे हैं ॥
जयो नाभि भूपाल बाल ।
सुकुमाल सुलच्छन ॥
जयो स्वर्ग पाताल पाल ।
गुन माल प्रतच्छन ॥
दृग विशाल वर भाल लाल ।
नख चरण विरजहिं ॥
रूप रसाल मराल चाल ।
सुंदर लखि लज्जहिं ॥
रिपु राज काल रिस हेश हम ।
फसे जन्म जंबाल दह ॥
याते निकाल बेहाल अति ।
भो दयाल दुख टाल यह ॥
भो दयाल दुख टाल यह ॥
श्री चंद्रप्रभ स्तुति
चितवत वदन अमल चंद्रोपम ।
तज चिंता चित होय अकामी ॥
त्रिभुवन चंद पाप तप चंदन ।
नमत चरन चंद्रादिक नामी ॥
तिहुं जग छाई चंद्रिका कीरति ।
चिहन चंद्र चिंतत शिवगामी ॥
बंदौं चतुर चकोर चंद्रमा ।
छंद वरन चंद्र प्रभ स्वामी ॥
श्री शांतिनाथ स्तुति
शांति जिनेस जयो जगतेस ।
हर अघ ताप निशेष किनाई ॥
सेवत पाय सुरासुरराय ।
नमै सिर नाय मही तल ताई ॥
मौलि लगे मन नील दिपैं ।
प्रभु के चरनो झलके भझाई ॥
सूंघन पाय सरोज सुगंधी ।
किधो चलिए अलि पंकति आई ॥
श्री नेमिनाथ स्तुति
शोभित प्रियंग अंग देखे दुख होए भंग ।
लाजत अनंग जैसे द्वीप भानु भास तें ॥
बाल ब्रह्मचारी उग्रसेन की कुमारी जादौ ।
नाथ तैं निकारो कर्म कादो दुख रास तें ॥
नाथ तैं निकारो कर्म कादो दुख रास तें ॥
भीम भव कानन में आन न सहाय स्वामी ।
अहो नेमि नामी तकि आयो तुम तास तें ॥
जैसे कृपा कंद वन जीवन की बंद छोरी ।
त्यों ही दास को खलास कीजे भव पास तें ॥
त्यों ही दास को खलास कीजे भव पास तें ॥
श्री पार्श्वनाथ स्तुति
जनम जलधि जल जान ।
जान जन हंस मानसर ॥
सरब इंद्र मिलि आन ।
आन जिस धरहिं सीस पर ॥
परोपगारी बान ।
बानु उत् पई कुनय गन ॥
गन सरोज वन भान ।
भान मम मोह तिमिर घन ॥
घन वरन देह दुख दाह हर ।
हरखत हेर मयूर मन ॥
मन मथ मतंग हरि पास जिन ।
जिन बिसरहु छिन जगत् जन ॥
जिन बिसरहु छिन जगत् जन ॥
श्री वर्धमान स्तुति
दृढ़ करमाचल दलन पवि ।
भवि सरोज रविराय ॥
कंचन छवि कर जोर कवि ।
नमत वीर जिन पाय ॥
नमत वीर जिन पाय ॥
रहो दूर अंतर की महिमा ।
बाहिज गुन वरनन बल कांपै ॥
एक हजार आठ लच्छन तन ।
तेज कोटि रवि किरनि उथापे ॥
सुरपति सहस आंख अंजुलि सों ।
रूपामृत पीवत नहीं धापे ॥
तुम बिन कौन समर्थ वीर जिन ।
जग सों काढ़ी मोख में थापे ॥
जग सों काढ़ी मोख में थापे ॥
श्री सिद्ध स्तुति
ध्यान हुताशन मैं अरि ईंधन ।
झोंक दियो रिपु रोक निवारी ॥
सो खर्यो भविलोकन को वर ।
केवल ज्ञान मयूख उगारी ॥
लोक अलोक विलोक भये शिव ।
जन्म जरा मृत पंख पखारी ॥
सिद्धन थोक बसे शिवलोक ।
तिन्हें पग धोक त्रिकाल हमारी ॥
तिन्हें पग धोक त्रिकाल हमारी ॥
तीरथनाथ प्रणाम करें ।
तिनके गुन वरनन में बुधि हारी ॥
मोम गयो गली मूस मंझार ।
रह्यो तहमव्योम तदाकृति धारी ॥
लोक गहीर नदी पति नीर ।
गये तिर तीर ॥

हे अविकारी सिद्धन ठोक बसे शिवलोक, तिन्हें पग धोक त्रिकाल हमारी।
तिन्हें पग धोक त्रिकाल हमारी॥

श्री साधु स्तुति
शीत ऋतु जोरे अंग सबहि सकोरे, तहाँ तन को ना मोरे नदी धोरे धीर जे खरे।
जेठ की झकोर जहाँ अंडा चील छोरे, पशु पंछी छाँह लौ रे गिरि को रे तप वे धरे॥
घोर घन घोरे घटा चहुँ ओर डोरे ज्यों-ज्यों, चलत लारे त्यों-त्यों फोरे बल ये अरे।
देह नेह तोर परमारथ सों प्रीति जोरे, ऐसे गुरु ओरे हम हाथ अंजुली करें॥

श्री जिनवाणी स्तुति
वीर हिमाचल तें निकसी गुरु गौतम के मुख कुंड धरी है।
मोह महाचल भेद चली जग की जड़ता तप दूर करी है॥
ज्ञान पयोनिधि माहिं रली बहुभंग तरंगनि सों उछरी है।
ता शुचि शारद गंग नदी प्रति मैं अंजुरी करि शीश धरी है॥
या जग मंदिर में अनिवार्य अज्ञान अंधेर छयो अति भारी।
श्री जिनकी धुनि दीप सिखा सम जो नहीं होत प्रकाशनहारी॥
तो किस भांति पदारथ पांति कहा लहते रहते विचारी।
या विधि संत कहें धनि हैं धनि हैं जिन वैन बड़े उपगारी॥

जिनवाणी और मिथ्यावाणी
कैसे करील केतकी कनेर एक कही जाय, आका दूध गाय दूध अंतर घनेर है।
पीरी होत रीरी पै न रीस करे कंचन की, कहाँ कागवानी कहाँ कोयल की टेर है॥
कहाँ भानु भारो कहाँ आगिया बिचारो कहाँ, पूनो की उजारो कहाँ मावस अंधेर है।
पच्छ छोरी पारखी निहारो नेक नीके करि, जैन बैन और बैन इतनो ही फेर है॥

वैराग्य कामना
कब गृहवास सों उदास होय वन सेऊं, वेऊं निज रूप गति रोकूं मन करी की।
रहियो अडोल एक आसन अचल अंग, सहियो परीषाह शीत घाम मेघ झरी की॥
सारंग समाज खाज कब धौं खुजे हैं आनि, ध्यान दल जोर जीतूं सेना मोहरी की।
एकल विहारी जथा जात लिंग धारी कब, होऊं इच्छा धारी बलिहारी हों वा घरी की॥

राग और वैराग्य का अंतर
राग उदय भोग भाव लागत सुहावने से, बिना राग ऐसे लागे जैसे नाग कारे हैं।
राग ही सों पाग रहे तन में सदीव जीव, राग गये आवत गिलानी होत न्यारे हैं॥
राग ही सों जग रीति झूठी सब सांची जाने, राग मिटे सूझत असार खेल सारे हैं।
रागी विनरागी के विचार में बड़ोई भेद, जैसे भटा पछकाहू काहू को बयारे हैं॥

भोग निषेध
तू नित चाहत भोग नए नर, पूरब पुण्य बिना किम पैहै।
कर्म संजोग मिले कहीं जोग, गहे तब रोग ना भोग सकें हैं॥
जो दिन चार को ब्योंत बन्यो कहूं, तो परि दुर्गति में पछितै है।
या ही ते यार सलाह यही कि, गई कर जाहु निबाना है॥

देह स्वरूप
मात पितारज वीरज सों उपजी सब सात कुधात भरी है।
माखिन के पर माफि़क बाहर चाम के बैठन बेड़ धरी है॥
नाहिं तो आय लगे अब ही बक वायस जीव बचे ना घरी है।
देह दशा यह है दीखत भ्रात घिनात नहीं किन बुद्धि हरी है॥
बुद्धि हरी है, बुद्धि हरी है, बुद्धि हरी है।

काहू घर पुत्र जायो काहू के वियोग आयो, काहू राग रंग काहू रोआ रोई करी है।
जहाँ भान उगत उछाह गीत गान देखे, सांझ समय ताही थान हाय हाय परी है॥
ऐसी जग रीति को न देखी भयभीत होए, हा हा नर मूढ़ तेरी मति कौन हरी है।
मानुष्य जनम पाय सोवत बिहाय जाय, खोवत करोरन की एक एक घरी है॥
कर कर जिन गुन पाठ जात कारथ रे जिया, आठ पहर में साठ घरी घने रे मोल की।
कानी कौड़ी काज को रिन को लिख देत खत, ऐसे मुरख राज जगवासी जिय देखिए॥
कानी कौड़ी विसय सुख भव दुखर जपार, बिना दिए नहीं छूटे हैं बेशक ले उधार॥

शिक्षा
दश दिन विषय विनोद फेर पहु विपत्ति परंपर।
अशुचि गेह यह देह नेह जानत ना आप जड़॥
मित्र बंधु संबंधी और परिजन जे अंगी।
अरे अंध सब धंध जान स्वारथ के संगी॥
परहित काज अपनो न कर मूढ़ राज अब समझ उर।
तजी लोक लाज निज काज कर आज दाव है कहत गुर॥

देह तेरी काहू रोग सो ना घेरी जौलौं।
जरा नाहि नेरी जासों पराधीन परि है॥
जौलौं जमना मवैरी देय न दमाम जौलौं।
मानै कान राम बुद्धि जाइ न बिगरी है॥
तौलौं मित्र मेरे निज कारज संवार ले रे।
पौरुष थकेंगे फेर पीछे काहा करी है॥
अहो आग आए जब झोंपरी जरन लागी।
कुआ के खुदाये तब कौन काज सरी है॥
सौई बरस आयु ताका लेखा करि देखा जब।
आधी तो अकारथ ही सोवत बिहाय रे॥
आधी में अनेक रोग बाल वृद्ध दशा भोग।
और हूँ संयोग केते ऐसे बीत जाएं रे॥
बाकी अब कहा रही ताही तू विचार सही।
कारज की बात यही नीके मन लाए रे॥
खातिर में आवे तो खलासी कर इतने में।
भावे फसी फंद बीच दीनो समुझाय रे॥

बुढ़ापा
बालपने बाल रह्यो पीछे ग्रह भार भयो।
लोक लाज काज बांध्यो पापन को ढेर है॥
आपनो अकाज कीनो लोकन में जस लीनो।
परभव विसार दीनो विषय वश जेर है॥
ऐसे ही गई विहाय अलप सी रही आय।
नर परजाय यह आंधे की बटेर है॥
आई सीत भैया अब काल है अवैया अहो।
जानी रे सयाने तेरे आजो हूँ अंधेर है॥
बालपने ना संभार सक्यो कछू।
जानत नाही हिताहित ही को॥
यौवन वैस वसी वनिता उर।
के नित राग रह्यो लक्ष्मी को॥
यों पन दोइ विगोइ दये नर।
डारत क्यों नरकें निज जी को॥
आए हैं सेत अजो षठ चेत।
गई सु गई अब राख रही को॥
सार नर देह सब कारज को जोग यह।
यह तो विख्यात बात वेदन में बच है॥
तामें तरुणाई धर्म सेवन को समय भाई।
सेवत विषय जैसे माखी मधु रच है॥
मोह मद बोए धन रामा हित रोज रोए।
यों ही दिन खोए खाय कोदों जिम मच है॥
अरे सुन बौरे अबै आए सीस धौरे अजो।
सावधान हो रे नर नरक सों बच है॥
बाय लगी कि बलाय लगी।
मदमत भयो नर भूलत त्यों ही॥
वृद्ध भये ना भजे भगवान्।
विषय विष खात अघात न क्यों ही॥
सीस भयो बगुला सम सेत।
रह्यो उर अंतर श्याम अजो ही॥
मानुष भो मुकता फलहार।
गंवार तगाहित तोरत यों ही॥

संसारी जीव का चिंतवन
चाहत है धन होय किसी विध।
तो सब काज सरे जिये राजी॥
गेह चिनाय करूँ गहना कछु।
ब्याही सुता सुत बाँटीये भाजी॥
चिंतत यों दिन जाहि चले जम।
आनि अचानक देत दगाजी॥
खेलत खेल खिलारी गये रही।
जाय रूपी शतरंज की बाजी॥
तेज तुरंग सुरंग भले रथ।
मत मतंग उतंग खरे ही॥
दास खवास अवास अटाधन।
जोर करोरन कोश भरे ही॥
ऐसे बड़े तो कहा भयो हे नर।
छोरी चले उठी अंत छरी ही॥
धाम खरे रहे काम परे रहे।
दाम गरे रहे ठाम धरे ही॥

अभिमान निषेध
कंचन भंडार भरे मोतिन के पुंज परे।
घने लोग द्वार खरे मारग निहारते॥
जान चढ़ी डोलत हैं जीने सुर बोलत हैं।
काहू की हू ओर नेक नीके न चितारते॥
कोनो धन मांगे कोऊ कहयो ना लागे तेई।
फिरे पाए नांगे कांगे पर पग झारते॥
एते पै अयाने गरबाने रहे विभव पाय।
देखे समझ ऐसी धर्म ना संभारते॥
देखो भरे जोबन में पुत्र को वियोग आयो।
तैसे ही निहारी निज नारी कलमग में॥
जे जे पुण्यवान जीव दीसत है या मही पै।
रंक भये फिरे तेऊ पनही न पग में॥
एते पे अभाग धन जीता अब सो धरे राग।
होय न विराग जाने रहूंगो अलग में॥
आंखिन विलोकी अंध सूसे की अंधेरी करे।
ऐसे राज रोग को इलाज कहा जग में॥
जैन वचन अंजन वटी।
आजे सुगुरु प्रवीन॥
राग तिमिर तो हू न मिटे।
बड़ो रोग लख लीन॥

निज अवस्था वर्णन
जोई दिन कटे सोई आयु में अवसि घटे।
बूंद बूंद बीते जैसे अंजुली को जल है॥
देह नित झीन होत नैन तेज हीन होत।
जुबन मलीन होत छीन होत बल है॥
आवे जरा नेरी तकै अंतक अहेरी आवे।
परभो न झीक जात नरभो निफल है॥
मिलके मिलापी जन पूछत कुशल मेरी।
ऐसी दशा माही मित्र काहे की कुशल है॥

बुढ़ापा
द्रष्टि घटी पलटी तन की छबि।
बंक भई गति लंक नई है॥
रूस रही परनी घरनी अति।
रंक भयो परिअंक लई है॥
कांपत नार बहे सुख लार महामतिमंद।

गति संगति छारि गई है।
अंग उपंग पुराने परे तिसना उर और नवीन भई है॥
रूप को न खूज रह्यो तरु ज्यों तुषार दयो।
भयो पतझार के धो रही डार सुनी सी॥
कूबरी भई है कटि दुबरी भई है देह।
उबरी इतेक आयु सिर माहि पूनी सी॥
जोबन ने बिदा लीनी जरा ने जुहार कीनी।
हीनी भई सुधि बुधि सबै बात ऊनी सी॥
तेज घट्यो ताव घट्यो जीवत को चाव घट्यो।
और सब घट्यो एक तिसना दिन दूनी सी॥
अहो इन आपने अभाग उदय नाहि जानी।
वीतराग वानी सार दया रस भीनी है॥
जोबन के जोर थिर जंगम अनेक जीव।
जानी जे सताए कछु करना न कीनी है॥
तेई अब जीव राश आए परलोक पास।
लेंगे बार देंगे दुख भई ना नवीनी है॥
उन्हीं के भय को भरोसो जान कांपत है।
याही डर डोकरने लाठी हाथ लीनी है॥
जाको इंद्र चाहे अहमिंद्र से उमाह जासों।
जीव मुक्ति मांहें जाय भोमल बहावे हैं॥
ऐसो नर जन्म पाय विषय विष खाय खोयो।
जैसे कांच सा मूढ़ मानिक गमावे है॥
माया नदी बूड़ भीजा काया बल तेज छीजा।
आयापन तीजा अब कहा बनी आवे है॥
ताते निज सीस ढोले नीचे नैन किये डोले।
कहा बड़ी बोलें वृद्ध बदन दुरावे हैं॥

देखहु जोर जराबट को जमराज महीपति को अगवानी।
उज्ज्वल केश निशान धरे बहु रोगन की संग फौज पलानी॥
काय पुरी तजी भाजी चल्यो जिहि आवत जोबन भूप गुमानी।
लूट नई नगरी सगरी दिन दोय में खोये हैं नाम निशानी॥

तुम तें ही तजी जोबन समय।
सेवहु विषय विकार।
खल साटे नहीं खोइए।
जनम जवाहर सार॥

देव गुरु साचे मान साचो धर्म हिये आन।
साचो ही बखान सुनी साचे पंथ आवरे॥
जीवन की दया पाल झूठ तजी चोरी टाल।
देखना विरानी बाल तिसना घटावरे॥
अपनी बड़ाई पर निंदा मत करे भाई।
यही चतुराई मद मांस को बचावरे॥
साध खट कर्म साध संगति में बैठ वीर।
जो है धर्म साधन को तेरे चित चावरे॥
सांचो देव सोई जामें दोष को न लेस कोई।
वहै गुरु जाके उर काहू की न चाह है॥
सही धर्म वही जहां करुणा प्रधान कही।
ग्रंथ जहां आदि अंत एक सो निबाह है॥
यही जग रत्न चार इनको परख यार।
सांचे लेहु झूठे डार नरभौ को लाह है॥
मानुष्य विवेक बिना पशु के समान घिना।
ताते यही बात ठीक पारनी सलाह है॥
ताते यही बात ठीक पारनी सलाह है।

जो जग वस्तु समस्त हस्त तल जेम निहारे।
जग जन को संसार सिंधु के पार उतारे॥
आदि अंत अविरोधी वचन सबको सुखदानी।
गुन अनंत जिह मांहि दोष की नाहीं निशानी॥
माधव महेश ब्रह्मा किधौं वर्धमान के बुद्ध हैं।
जे चिहन जान जाके चरण नमो नमो मुझ देव वह॥
नमो नमो मुझ देव वह।

कहे पशु दीन सुन यज्ञ के करैया मोही।
होमत हुताशन में कौन सी बड़ाई है॥
स्वर्ग सुख मैं न चाहूँ देहु मुझे यों न कहूँ।
घास खाय रहों मेरे यही मन भाई है॥
जो तू यह जानत है वेद यों बखानत है।
जज्ञ जलो जीव पावे स्वर्ग सुखदाई है॥
डारें क्यों न वीर या में अपने कुटुंब ही को।
मोहिं जिन जारे जगदीश की दुहाई है॥
मोहिं जिन जारे जगदीश की दुहाई है।
मोहिं जिन जारे जगदीश की दुहाई है।

अग अँधेरा देत्य नित्य नित्य स्वाध्याय करीजै।
सोम उपम संसार तापर तप कर लीजै॥
जिनवर पूजा नियम करहु नित मंगलदायनी।
बुध संजम आधरहु धरहु चित श्रीगुरु पायनी॥
निज वित्त समान अभिमान बिन सुकर सुपतहि दान कर।
यों शनि सुधर्म षटकरमनी नरभौ लाहो लेहु नर॥
यही छह विधि कर्म भज सात विसन तज वीर।
इस ही पैंड़े पहुँची है क्रम क्रम भवजल तीर॥
क्रम क्रम भवजल तीर।
क्रम क्रम भवजल तीर।

जूआ खेलन मांस मद वैश्या विसन शिकार।
चोरी पर रमनी रमन सातों पाप निवार॥
जूआ खेलन मांस मद वैश्या विसन शिकार।
चोरी पर रमनी रमन सातों पाप निवार॥
सातों पाप निवार।
सातों पाप निवार।

सकल पाप संकेत आपदा हेत कुलच्छन।
कलह खेत दारिद्र देत दीसत निज अच्छन॥
गुन समेत जस सेत केत रवि रोकत जैसे।
औगुन निकर निकेत लेत लखि बुध जन ऐसे॥
जूआ समान इह लोक में आन अनीति न पेखिये।
इस विसनराय के खेल को कौतुक हू नहीं देखिये॥
कौतुक हू नहीं देखिये।
कौतुक हू नहीं देखिये।

जंगम जिय को नास होय तब मांस कहावे।
सपरस आकृति नाम गंध उर घिन उपजावे॥
नरक जोग निर्दई खांहि नर नीच अधरमी।
नाम लेत तज देत असन उत्तम कुलकरमी॥
यह निपट निंद्य अपवित्र अति क्रमिकुल रास निवास नित।
आमिष अभच्छ यासों सदा बरजौ बुधजन होय हित॥

मदिरा पान निषेध

कृमि रास कुवास सराये दहे ।
सुचिता सब छीवत जात सही ॥
जिंहि पान किये सुधि जातीयें ।
जननी जन जानत नारि यही ॥
मदिरा सम आन निषिद्ध कहा ।
यह जान भले कुल में न गही ॥
धिक है उनको वह जीव जलो ।
जिन मूढ़न के मत लीन कही ॥

वेश्या सेवन निषेध

धन कारन पापनि प्रीति करे ।
नहिं तोरत नेह जथा तिनको ॥
लव चाखत नीचन के मुह की ।
सुचिता सब जाय छिये जिनको ॥
मदमांस बजारनि खाय सदा ।
अंधले विसनी न करें गिनको ॥
गनिका संग जे शठ लीन भये ।
धिक है धिक है धिक है तिनको ॥
धिक है धिक है धिक है तिनको ॥

आखेट निषेध

कानन में बसे सो आनला गरीब जीव ।
प्रानन सो प्यारो प्रान पूंजी जिस यह है ॥
कायर सुभाव धरें काहु सो ना द्रोह करें ।
सब ही सों डरें दांत लिये तृन रहे हैं ॥
काहु सो ना दोष पुनि काहु पै ना पोष चहै ।
काहु के परोश पर दोष नाही कहे हैं ॥
नेकु स्वाद सारिव को ऐसे मृग मारिवे को ।
हा हा रे कठोर तेरो कैसे कर बहे है ॥
हा हा रे कठोर तेरो कैसे कर बहे है ॥

चोरी निषेध

चिंता तजे ना चोर रहत चौकायत सारे ।
पीटे धनी विलोक लोक निर्दई मिलि मारे ॥
प्रजापाल करि कोप तोप सो रोप उड़ावै ।
मरे महादुख पेख अंत नीच गति पावै ॥
अति विपत्ति मूल चोरी विसन प्रगट त्रास आवै नजर ।
परवित अदत्त अंगार गिन नीति निपुन परसे ना कर ॥

परस्त्री सेवन निषेध

कुगति वहन गुन गहन दहन दावानल सी है ।
सुजस चंद्र घन घटा देह कृश करन खई है ॥
धन सर सोखन धूप धरम दिन सांज समानी ।
विपति भुजंग निवास बाबई वेद बखानी ॥
इह विधि अनेक ओग भरी प्रान हरन फांसी प्रबल ।
मत करहु मित्र यह जान जिये परवनिता सो प्रीति पल ॥

परस्त्री त्याग प्रशंसा

दिवि दीपक लोय बनी वनिता ।
जड़ जीव पतंग जहाँ परते ॥
दुख पावत प्रान गंवावत हैं ।
बरजे न रहें हठ सों जरते ॥
इह भांति विछच्छन अच्छन के वश ।
होय अनीति नहीं करते ॥
परती लखि जे धरती निरखें ।
धनि हैं धनि हैं धनि हैं नर ते ॥
दृढ़ शील शिरोमन कारज में ।
जग में जस आरज तेइ लहैं ॥
तिनके जुग लोचन वारिज हैं ।
इह भांति अचारज आप कहें ॥
पर कामिनि को मुख चंद चितें ।
मुंद जाहिं सदा यह टेव गहैं ॥
धनि जीवन है तिन जीवन को ।
धनि माय उन्हें उर माय वहे ॥

कुशील निंदा

जे परनारी निहारि निलज्ज ।
हँसें विगसें बुधहीन बड़े रे ॥
जूठन की जिमी पातर पेखी ।
खुशी ऊर कूकर होत घनेरे ॥
है जिनकी यह टेव वहै ।
तिनको इस भव कीरति है रे ॥
है परलोक विषय दृण दंड करे ।
सतखंड सुखाचल केरे ॥

व्यसन सेवन के उदाहरण व फल

प्रथम पांडवा भूप खेली जुआ सब खोयो ।
मास खाय बकराये पाय विपदा बहु रोयो ॥
बिन जाने मदपान जोग जादोगन दज्जे ।
चारुदत्त दुख सह्यो वेसवा विसन रुज्झे ॥
नृप ब्रह्मदत्त आखेट सो द्विज शिवभूति अदत्त रती ।
पररमणी राची रावण गयो सातों सेवत कौन गती ॥
पाप नाम नरपति करे नरक नगर में राज ।
तिन पठये पाठक विसन निज पुर वसती काज ॥
जिनके जिनके वचन की बसी हिये परतीत ।
विसन प्रीति ते नर तजो नरक वास भयभीत ॥

कुकवि निंदा

राग दे जग अंध भयो ।
सहजे सब लोगन लाज गवाई ॥
सीख बिना नर सीख रहे ।
विसनादिक सेवन की सुघराई ॥
ता पर और रचे रस काव्य ।
कहा कहिये तिनकी निठुराई ॥
अंध असूझन की अँखियान में ।
झोंकत हैं रज राम दुहाई ॥
कंचन कुंभन की उपमा कह ।
देत उरोजन को कविबारे ॥
ऊपर श्याम विलोकत के मनि ।
नीलम की ढकनी ढकि छारे ॥
यों सतवैन कहे न कुपंडित ।
ये जुग आमिश पिंड उघारे ॥
साधन झार दई मुह छार ।
भए ही घेत केधो कुछ कारे ॥
ए विधि भूल भई तुमते समझे ।
ना कहा कस्तूरी बनाई ॥
दीन कुरंगन के तन में तृन ।
दंत धरे करुणा किन आई ॥
क्यों न करी तिन जीवन जे रस ।
काव्य करें पर को दुखदाई ॥
साधु अनुग्रह दुर्जन दंड दुहूँ ।
सधते विसरी ॥

के चतुराई

मन रूपी हाथी
ज्ञान महावत डारी सुमति संकल गहि खंडे ।
गुरु अंकुश नहि गिने ब्रह्म व्रत विरख विहंडे ॥
कर सिधंत सरनौन केली अघरज सों ठाने ।
करन चपलता धारे कुमति करनी रति माने ॥
डोलत सछंद मदमत्त अति गुण पथिक ना आवत उरै ।
वैराग्य खंभ से बांध नर मन मतंग विचरत बुरे ॥

गुरु उपकार
ढई सी सराय काय पंथी जीव वस्यो आय ।
रत्नत्रय निधि जापै मोख जाको घर है ॥
मिथ्या निशि कारी जहां मोह अंधकार भारी ।
कामादिक टस्कर समूहन को थर है ॥
सोवै जो अचेत सोई खोवै निज संपदा को ।
तहां गुरु पाहरू पुकारै दया कर है ॥
गाफिल ना हजै भ्रात ऐसी है अंधेरी रात ।
जाग रे बटुही इहां चोरन को डर है ॥

कषाय जीतने का उपाय
छिम निवास छिमा धुवनी बिन क्रोध पिशाच उरै न टरेगो ।
कोमल भाव पाव बिना यह मान महामद कौन हरेगो ॥
आरजौ सार कुठार बिना छल बेल निकंदन कौन करेगो ।
तोष शिरोमणि मंत्र पढ़े बिन लोभ फणी विष क्यों उतरेगो ॥

मिष्ट वचन
काहे को बोलत बोल बुरे नर नाहक क्यों जस धर्म गमावे ।
कोमल वैन चवै किन ऐन लगे कछु है न सबै मन भावे ॥
तालु छदै रसना न भिदै न घटे कछु अंक दरिद्र न आवे ।
जीभ कहै जे हानि नहीं तुझ जी सब जीवन को सुख पावे ॥

धैर्य धारण का उपदेश
आयो है अचानक भयानक असाता कर्म ताके दूर करिवे को बली कौन अह रे ।
जे जे मन भाये ते कमाए पूर्व पाप आप ते ही अब आये निज उदय काल लहरे ॥
ऐरे मेरे वीर काहे होत है अधीर या में कोऊ को ना सीर तू अकेलो आप सह रे ।
भये दिलगीर कछु पीर ना विनसि जाय ताहिते सयाने तू तमासगीर रह रे ॥

होनहार दुर्निवार
कैसे कैसे बली भूप भू पर विख्यात भए वैरी कल कांपे नेकु भावों के विकार सों ।
लंघे गिरि सायर दिवायर से दिपे जिनो कायर किये हैं भट कोटिन हुंकार सों ॥
ऐसे महामानी मौत आये हूँ न हार मानी क्यों ही उतरे न कभी मान के पहार सों ।
देव सों न हारे पुनि दानो सों न हारे और काहू सों न हारे एक हारे होनहार सों ॥
काहू सों न हारे एक हारे होनहार सों ॥

काल सामर्थ्य
लोह मई कोट केई कोटन की ओट करो कांगुरेन तोप रोपि राखो पट भेरी कें ।
इंद्र चंद्र चौकायत चौकस है चौकी देहू चतुरंग चामू चाहूं और रहो घेरी कें ॥
तहां एक भोयरा बनाए बीच बैठो पुनि बोलो मति कोऊ जो बुलावे नाम टेरी कें ।
ऐसे परपंच पाति रचो क्यों ना भांति भांति कैसे हूँ न छोरे जम देख्यो हम हेरी कें ॥
अंतक सो ना छूटे नेहचे पर ।
मूरख जीव निरंतर दूझे ॥
चाहत है चित में नित ही सुख ।
होय न लाभ मनोरथ पूजे ॥
तो पनि मूढ़ बंध्यो भय आस ।
वृथा बहु दुख दवानल भूजे ॥
छोड़ विचच्छन ये जड़ लच्छन ।
धीरज धारि सुखी किन हूजे ॥

धैर्य शिक्षा
जो धन लाभ लिलार लिख्यो लघु धीरघ सुकृत के अनुसारे ।
सो लहिए कछु फेर नहीं मरुदेश के ढेर सुमेर सिधारे ॥
घाट न बाढ़ कही वह होय कहां कर आवत सोच विचारे ।
कूप किधों भर सागर में नर गागर मान मिले जल सारे ॥
कूप किधों भर सागर में नर गागर मान मिले जल सारे ।
गागर मान मिले जल सारे ॥

आशा रूपी नदी
मोह से महान् ऊंचे पर्वत सुं ढर आई ।
तिहुं जग भूतल में याही विस्तरी है ॥
विविध मनोरथ में भूरी जल भरी बहे ।
तिसना तरंगिनी सो आकुलता धरी है ॥
परिभ्रम भंवर जहां राग सो मगर तहां ।
चिंता तट टुंग धर्म वृक्ष ढाय धरी है ॥
ऐसी यह आशा नाम नदी है अगाध ताको ।
धन्य साधु धीरज जहाज चढ़ि तरी है ॥
धन्य साधु धीरज जहाज चढ़ि तरी है ।
धन्य साधु धीरज जहाज चढ़ि तरी है ॥

महा मूढ़ वर्णन
जीवन केतेक ता में का बीत बाकी रह्यो ।
तापे अंध कौन कौन करे हेर फेर ही ॥
आप को चतुर जाने औरन को मूढ़ माने ।
सांझ होन आई है विचारत सबेरी ॥
चाम ही के चाकन ते चित्त में सकल चाल ।
उर सो न चोंधे कर राख्यो है अंधेरी ॥
बाहें बान तान के अचानक ही ऐसो जम ।
दीस है मसान थान हाड़न को ढेर ही ॥
केती बार स्वान सिंघ सांवर सियाल सांप ।
सिंदूर सारंग सूसा सूरी उदरे परयो ॥
केती बार चील चमगादर चकोर चेरा ।
चक्रवाक चातक चंडूल तन भी धरयो ॥
केती बार कच्छ मच्छ मेंढक गिंडोला मीन ।
शंख सीप कौड़ी है जलूका जल में तिरयो ॥
कोऊ कहे जाए रे जनावर तो बुरो माने ।
यों ना मूढ़ जाने मैं अनेक बार है मरयो ॥
यों ना मूढ़ जाने मैं अनेक बार है मरयो ॥

दुष्ट कथन
करे गुण अमृत पान दोष विष विषम समापै ।
बंक चाल नहि तजे जुगल जेह्वा मुख थापै ॥
तके निरंतर छिद्र उदय परदीप न रूचे ।
बिन कारण [अस्पष्ट]

दुख करे वे वेश कबहूँ ना मूंचे ।
वर मौन मंत्र सो होय वश संगत किये हान है ।
बहु मिलत बान याते सही ।
दुर्जन सांप समान है ।
दुर्जन सांप समान है ।
कहो रे दुर्जन सांप समान है ।

विधाता से तर्क
सज्जन जो रचे तो सुधारस सो कौन काज ।
दुष्ट जीव किये कालकूट सों कहा रही ।
दाता निरमापे फिर थापे क्यों कल्प वृक्ष ।
जाचक विचारे बक घूंटण हूते हैं सही ।
इष्ट के संयोग ते ना सिरोगन सार कछु ।
जगत् को ख्याल इंद्रजाल सम है वही ।
ऐसी दोए दोए बात दीखे विधि एक ही सी ।
काहे को बनाई मेरे धोखो मन है यही ।
काहे को बनाई मेरे धोखो मन है यही ।
काहे को बनाई मेरे धोखो मन है यही ।

चौबीस तीर्थंकरों के चिन्ह
गौ पुत्र गजराज बाजी बानर मन मोहे ।
कुक कमल साथिया सोम सफरी पति सोहे ।
सर तरु गेंडा महिष कोल पुनि सेही जानो ।
वज्र हिरन अज मीन कलश कच्छप उर आनो ।
शतपत्र शंख अहिराज हरि ऋषभदेव जिन आदि ले ।
श्री वर्धमान लो जानिए चिहन चारु चौबीस ये ।
चिहन चारु चौबीस ये ।

श्री ऋषभदेव के पूर्व भव
आदि जय वर्मा दूजे महाबल भूपतीजे सुरग ईशान ललितांग देव थयो है ।
चौथे वज्र जंघ ए है पांचवे युगल देह ।
सम्यक् ले दूजे देवलोक फिर गयो है ।
सातवे सुबुद्धि राय आठवे अच्युत इंद्र नवमें नरेंद्र वज्रनाभ नाम भयो है ।
दश अहमिंद्र जान ग्यारवे ऋषभ भान नाभिनंद भूधर के सीस जन्म लयो है ।
नाभिनंद भूधर के सीस जन्म लयो है ।

श्री चंद्रप्रभ के पूर्व भव
श्रीवर्म भूपति पाली पूमी स्वर्ग पहले सुर भयो ।
पनि अजितसेन छखंड नायक इंद्र अच्युत में थयो ।
वर पद्मनाभ नरेश निर्जर वैजयंति विमान में ।
चंद्राभ स्वामी सातवें भव भए पुरुष पुरान में ।
भए पुरुष पुरान में ।

श्री शांतिनाथ के पूर्व भव
श्री सेन आरज पुनि स्वर्गीय अमित तेज खेचर पद पाय ।
सुर रवि चूल स्वर्ग आनत में अपराजित बलभद्र कहाय ।
अच्युतेंद्र वज्रायुध चक्री फिर अहमिंद्र मेघरथ राय ।
सर्वारथ सिद्धीश शांति जिन ये प्रभु की द्वादश परजाय ।
ये प्रभु की द्वादश परजाय ।

श्री नेमिनाथ के पूर्व भव
पहले भव वन भीर द्वितीय अभिकीर्ति सेठ घर ।
तीजे सरसोधर्म चौथ चिंतागति नभचर ।
पंचम चौथे स्वर्ग छटे अपराजित राजा ।
अच्युतेंद्र सातवें अमर कुल तिलक विराजा ।
सुप्रतिष्ठ राय आटम नवे जन्म जयंत विमान धर ।
फिर भए नेमि हरिवंश शशि ये दश भव सुधि करहु नर ।
ये दश भव सुधि करहु नर ।

श्री पार्श्वनाथ के पूर्व भव
विप्र पूत मरुभूत वेच्चच्चन वज्रघोष गज गहन मंझार ।
सुर पुनि सहस्रस्मि विद्याधर अच्युत स्वर्ग अमरी भरतार ।
मनुज इंद्र मध्यम ग्रवेक राजपुत्रानन्द कुमार ।
आनतेंद्र दशवे भव जिनवर भए पाश्व प्रभु के अवतार ।
भए पाश्व प्रभु के अवतार ।

राजा यशोधर के भवांतर
राय यशोधर चंद्रमती पहले भव मंडल मोर कहाए ।
जा हक सर्प नदी मध मच्छ अजा अज भैंस अजा फिर आए ।
फेरी भए कुखड़ा कुकड़ी इन सात भवांतर में दुख पाए ।
चूनमई चरणायुध मारी कथा सुन संत हिये नरमाए ।
कथा सुन संत हिये नरमाए ।

सुबुद्धि सखी के प्रतिवचन
कहे एक सखि स्यानी सुन री सुबुद्धि रानी ।
तेरो पति दुखी देख लागे उर आर है ।
महापराधी एक पुग्गल है छहों माहि ।
सोई दुख देत दीसे नाना प्रकार है ।
कहत सुबुद्धि आली कहा दोष पुग्गल को ।
अपनी ही भूल लाल होत आप ख्वार है ।
खोटो दाम आपनो सराफे कहा लगे वीर ।
काहू को ना दोष मेरो भोंदू भरतार है ।
भोंदू भरतार है ।
भोंदू भरतार है ।

गुजराती भाषा में शिक्षा
ज्ञानमय रूप रुड़ो सदा सात तो ।
ओलखे क्यों ना सुख पिंड भोला ।
बेगली देह थी नेह तू शुं करे ।
एहनी टेव जो मेह ओला ।
मेरे रे मान भव दुःख पाम्या पछी ।
चैन लाध्यो नथी एक तोला ।
वली दुःख व्रछनो बीज बावे अने ।
आप थी आपने आप भोला ।
आप थी आपने आप भोला ।
आप थी आपने आप भोला ।

द्रव्यलिंगी मुनि
सीत सहे तन धूप दहे ।
तरु हेट रहें करुणा उर आने ।
झूठ कहें ना दत्त गहें ।
वनिता न चहें लव लोभ न जाने ।
मौन वहे पड़ी भेद लहे ।
नहीं नेम जहें व्रत रीति पिछाने ।
यों निब है पर मोख नहीं ।
बिन ज्ञान यहै जिन वीर बखाने ।
बिन ज्ञान यहै जिन वीर बखाने ।

अनुभव प्रशंसा
जीवन अलप आयु बुद्धि बलहीनता में ।
आगम अगाध सिंधु कैसे ताहि डाक है ।
द्वादशांग मूल एक अनुभव अपूर्व कला ।
भव दाघ हारी घनसार की सलाक है ।
यह एक सीख लीजे याहि को अभ्यास कीजे ।
याको रस पीजे सो वीर जिन वाक है ।
इतनो ही सार यही आतम को हितकार ।
यही लो मदार और आगे ढूँक ढाक है ।

यही लोमदार और आगे ढूँक ढाक है ॥

आगम अभ्यास होहु सेवा सर्वज्ञ तेरी ।
संगति सदीव मिलो साधर्मी जन की ॥
संतन के गुन को बखान यह बान परो ।
मैटो टेव देव पर औगुन कथन की ॥
सब ही सो ऐन सुख देन मुख वैन भाखों ।
भावना त्रिकाल राखो आत्मीक धन की ॥
जो लों कर्म काट खोलो मोक्ष के कपाट तौलों ।
येही बात हुजो प्रभु पूजो आस मन की ॥
पूजो आस मन की ॥

छय अनादि अज्ञान सो जग जीवन के नैन ।
सब मत मूठी धूल की अंजन है मत जैन ॥
भूल नदी के तिरन को और जतन कछु है ना ।
सब मत घाट कुघाट हैं राज घाट है जैन ॥
तीन भवन में भर रहे थावर जंगम जीव ।
सब मत भक्षक देखिए रक्षक जैन सदीव ॥
इस अपार जग जलधि में नहिं नहिं और इलाज ।
पाहन वाहन धर्म सब जिनवर धर्म जिहाज ॥
मिथ्यामत के मद छके सब मत वाले लोय ।
सब मत वाले जानिए जिनमत मत्त न होय ॥
मत गुमान गिरि पर चढ़े बड़े भए मन माहि ।
लघु देखें सब लोक को क्यों हूँ उतरत नाहिं ॥
चाम चखन सो सब मती चितवत करत निबेर ।
ज्ञान नैन सों जैन ही जोवत इतनो फेर ॥
ज्यों बजाज डिंग राख के पट परखे परबीन ।
त्यों मत सों मत की परख पावे पुरुष अमीन ॥
दोय पक्ष जिनमत विषै नय निश्चय व्यवहार ।
तिन बिन लहे न हंस यह शिव सरवर की पार ॥
सीझे सीझे सीझिहो तीन लोक तिहुं काल ।
जिनमत को उपकार सब मत भ्रम करहु दयाल ॥
महिमा जिनवर वचन के नहिं वचन बल होय ।
भुजबल सों सागर अगम तिरे न तिरही कोय ॥
अपने अपने पंथ को पोखे सकल जहान ।
तैसे यह मत पोखना मत समझो मतिवान ॥
इस असार संसार में और न सरन उपाय ।
जन्म जन्म हुजो हमें जिनवर धर्म सहाय ॥
जन्म जन्म हुजो हमें जिनवर धर्म सहाय ॥
जन्म जन्म हुजो हमें जिनवर धर्म सहाय ॥
जन्म जन्म हुजो हमें जिनवर धर्म सहाय ॥

आगरे में बाल बुद्धि भूधर खंडेलवाल ।
बालक के ख्याल सो कवित्त कर जाने हैं ॥
ऐसे ही कहत भयो जैसी सवाई सूबा ।
हाकिम गुलाबचंद रहते ही थाने हैं ॥
हरिसिंह साह के सुवंश धर्म रागी नर ।
तिनके कहे सो जोरि कीनी एक ठाने हैं ॥
फिरि फिरि प्रेरे मेरे आलस को अंत भयो ।
उनकी सहाय मेरो मन माने है ॥
सत्रह से इक्यासिया पोह पाख तमलीन ।
तिथि तेरस रविवार को शतक संपूर्ण कीन ॥
तिथि तेरस रविवार को शतक संपूर्ण कीन ॥

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स्रोत: JinSwara ऑडियो संग्रह।