भ्रात ऐसी खेलिये होरी
भ्रात ऐसी खेलिये होरी, जामें हो हित तोरी ॥टेक॥
प्रेम गुलाल मलो मुख ऊपर, सुमता से फाग रचोरी ।
क्रोध लोभ मद काष्ट जला कर, फूँक देओ जैसी होरी ॥
भ्रात ऐसी खेलिये होरी, जामें हो हित तोरी ॥१॥
झूठ कपट तज होरी खेली, निज कल्याण करोजी ।
कुंकुम संयम सील बनावो, डारो भर-भर झोरी ॥
भ्रात ऐसी खेलिये होरी, जामें हो हित तोरी ॥२॥
‘न्यामत’ ऐसी होरी खेलो, आतम ध्यान धरोजी ।
राग द्वेष मन दूर करो सब, छोडो निठुर जोरा जोरी ॥
भ्रात ऐसी खेलिये होरी, जामें हो हित तोरी ॥३॥
Artist: पं. न्यामतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं न्यामतराय कृत भजन)
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