भोर भयो उठ जागो मनुवा
भोर भयो, उठ जागो, मनुवा, साहब नाम सँभारो ॥
सूतां सूतां रैन विहानी, अब तुम नींद निवारों ।
मंगलकारी अमृतवेला, थिर चित काज सुधारो ॥भोर…१॥
खिनभर जो तूँ याद करैगो, सुख निपजैगो सारो ।
बेला बीत्यां है, पछतावै, क्यूँ कर काज सुधारो ॥भोर…२॥
घर व्यापारे दिवस बितायो, राते नींद गमायो ।
इन बेला निधिचारित आदर, ‘ज्ञानानन्द’ रमायो ॥भोर…३॥
Artist: पं. ज्ञानानन्द जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं ज्ञानानन्द कृत भजन)
खोज: Bhor Bhayo Uth Jago Manuva