भो आत्मन् ! तजो विकल्प सभी | bho atman tajo vikalpa sabhi

भो आत्मन् ! तजो विकल्प सभी,

कुछ कार्य न होय विकल्पों से।
स्वयमेव परिणमित होय वस्तु,

बस हो संकल्प-विकल्पों से ।। टेक ।।

परिपूर्ण स्वाभाविक आनन्द से,
परिपूर्ण स्वाभाविक प्रभुता से।
ध्रुव रूप अहो ! निरपेक्ष लखो,
परिपूर्ण सदा निज में निज से ।।
अन्तर में अन्तर्मुख होकर,
सब जीव निहारो सिद्धों से ।। 1।।

हैं स्वयं सिद्ध, है सहज सिद्ध,
समझो समझो स्वीकार करो।
निर्मुक्त निरामय परमातम,
अवलोको निज रस पान करो।।
प्रभु होकर भी पहिचान बिना,
तुम भटक रहे हो कल्पों से।। 2।।

जिन-अर्चा, तत्त्वों की चर्चा,
आवश्यक है, पर्याप्त नहीं।
निर्णय कर भेद-विज्ञान करो,
बाहर में तेरा साध्य नहीं ।।
है स्वानुभूति के गम्य तत्त्व,
कैसे पायेगा जल्पों से ।। 3।।

चिन्ता झूठी, आशा झूठी,
पर से कुछ भी सम्बन्ध नहीं।
निर्मोही हो, निर्द्वन्द्व रहो,
निर्ग्रन्थ रहो, है सार यही ।।
आकुलता का कुछ काम नहीं,
संतुष्ट रहो निज में निज से।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३७० से ३७१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’