भविन-सरोरूहसूर भूरिगुनपूरित अरहंता | Bhavin Saroruhasur Bhurigunapurit Arahanta

भविन-सरोरूहसूर भूरिगुनपूरित अरहंता

भविन-सरोरूहसूर भूरिगुनपूरित अरहंता ।
दुरित दोष मोष पथघोषक, करन कर्मअन्ता ।।भविन.।।

दर्शबोधतैं युगपतलखि जाने जु भावऽनन्ता ।
विगताकुल जुतसुख अनन्त विन, अन्त शक्तिवन्ता ।।१।। भविन. ।।

जा तनजोतउदोतथकी रवि, शशिदुति लाजंता ।
तेजथोक अवलोक लगत है, फोक सचीकन्ता ।।२।। भविन. ।।

जास अनूप रूपको निरखत, हरखत हैं सन्ता ।
जाकी धुनि सुनि मुनि निजगुनमुन, पर-गर उगलंता ।।३।। भविन. ।।

‘दौल’ तौल विन जस तस वरनत, सुरगुरु अकुलंता ।
नामाक्षर सुन कान स्वानसे, रांक नाकगंता ।।४।। भविन. ।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ २९ से ३०

अर्थ

अर्थ-श्री अरिहन्तदेव भव्यजीवरूपी कमलो के लिए सूर्य के समान हैं और अनन्त गुणों से भरपूर है। वे समस्त दोषों को दूर करनेवाले, मोक्षमार्ग की घोपणा करनेवाले और समस्त कर्मो का अन्त करनेवाले हैं।

वे अपने अनन्तदर्शन और अनन्तज्ञान के द्वारा अनन्त पदार्था को युगपत् देखने और जानते है। वे आकुलता-रहित अनन्तसुख व अनन्तशक्ति से भी सहित है।

उनके शरीर की ज्योति के समक्ष सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश भी लज्जित हो जाता है। उनके शरीर के तेज को देखकर इन्द्र भी फीका प्रतीत होता है। उनके अनुपम रूप को देखकर सन्तजन हर्षित हो जाते है। उनकी दिव्यध्वनि सुनकर तो वे अपने आत्मिक गुणों का ऐसा मनन करते हैं कि सारा विषय-कषायरूपी विष उगल देते हैं।

कविवर दौलतराम कहते हैं कि अरिहन्तदेव का यश अतुलनीय है। उसका वर्णन करने में देवताओं के गुण भी समर्थ नहीं हैं। कुत्ते जैसे प्राणी को भी उनके नाम-अक्षरों को सुनकर स्वर्ग की प्राप्ति हो गयी थी।

स्रोत: दौलत विलास, पद 30।

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