भविजन काहे को मोह करे | bhavijana kahe ko moha kare

तर्ज : अरे जिया जग धोखे की टाटी…

भविजन काहे को मोह करे ॥ टेक ॥
पर तो पर अपना नहीं होवे, भिन्न सदैव रहे।
है स्वाधीन परिणमन सबका, तू कुछ नाहिं करे ॥ 1 ॥

इष्ट-अनिष्ट कल्पना करके, राग अरु द्वेष करे।
तिन निमित्त से कर्म बन्ध कर, जन्मे और मरे ॥ 2 ॥

साँचे देव-धर्म-गुरु जाने, तत्त्व प्रतीति धरे।
भेदज्ञान कर करे स्वानुभव, परमानन्द भरे ॥ ३॥

भावे नित वैराग्य-भावना, पद निर्ग्रन्थ धरे ।
आप-आप में लीन होय कर, भव से सहज तरे ॥ 4 ॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३३७ से ३३८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’