भविजन ! बिन विवेक मत खोओ | bhavijana bina viveka mata khoo

भविजन ! बिन विवेक मत खोओ ।

मुमुक्षु ! सद् विवेक उर लाओ ।। टेक ।।

साँचे देव-शास्त्र-गुरुवर प्रति, परम प्रतीति जगाओ।
तत्त्वाभ्यास अरु भेदज्ञान करि, स्वानुभूति प्रगटाओ ।। 1 ।।

व्यसन पाप अन्याय अनीति, अभक्ष्य चित्त नहीं लाओ।
आतम हित का उत्तम उवसर, विषयों में न गँवाओ ।। 2 ।।

इष्ट मानकर नहिं ललचाओ, दुख में ना घबराओ।
परम अतीन्द्रिय अनुभव अमृत, पान करो सुख पाओ ।। 3 ।।

रागादिक विभाव नाशन कौं, आत्म-भावना भाओ।
ध्येय रूप ज्ञायक में थिर हो, अविनाशी पद पाओ ।। 4 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३९६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’