भवि कीजे हो आतमसँभार, राग दोष परिनाम डार
भवि कीजे हो आतमसँभार, राग दोष परिनाम डार …
कौन पुरुष तुम कौन नाम, कौन ठौर करो कौन काम ॥भवि. ॥१॥
समय समय में बंध होय, तू निचिन्त न वारै कोय ॥भवि. ॥२॥
जब ज्ञान पवन मन एक होय, ‘द्यानत’ सुख अनुभवै सोय ॥भवि. ॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ३८
खोज: Bhavi Kije Ho Atam Sambhar, Rag Dosh Parinam Dar
अर्थ
हे भव्य ! राग-द्वेष के परिणाम भाव छोड़कर तुम अपनी आत्मा की सँसँभाल करो । हे पुरुष ! हे प्राणि! विचार करो कि तुम कौन हो? तुम्हारा क्या नाम है? तुम्हारा स्थान कौन-सा है? क्या कार्य करते हो? बंध की प्रक्रिया सदैव हो रही है। हर समय बंध हो रहा है और तुम इस बात पर ध्यान न देकर निश्चिन्त हो रहे हो ! द्यानतराय कहते हैं कि श्वास स्थिर हो जाए, मन थम जाए और ज्ञान, मन व श्वास सब एकाग्र हो केन्द्रित हो जाए तब सुख की अनुभूति होती है।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।
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