भवि कहना गुरु का मान, समझ शुद्धातम हूँ।
गुण अनन्त की खान, सहज परमातम हूँ।।टेक।।
बहिर्भाव लख हेय तज, अन्तर आतम होय ।
परमातम को ध्याय नित, परमातम पद होय ।।भवि. ।।1।।
शुद्धातम समझे बिना, पायो दुःख अपार ।
श्री गुरुवर समझा रहे, समझ होऊ भवपार ।। भवि. ।।2।।
हो वियोग संयोग का, उपजे सो विनशाय ।
चिदानन्दमय आत्मा, ध्रुव स्वरूप विलसाय ।।भवि. ।।३।।
हुए हो रहे होंयगे, जो अनन्त भगवन्त।
आत्माराधक की अहो, महिमा कहते सन्त ।।भवि. ।।4।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २३०