भरे हुए हैं सिद्धों के गुण, सिद्धचक्र के पाठ में।
धोलो आतम चीर भव्य, जिनवाणी गंगा धार में ।। टेक।।
सिद्धचक्र सा पाठ न दूजा, करो भव्यजन इसकी पूजा।
शुद्धभाव से हृदय भक्ति धर, निर्विकल्प दिन आठ में।। 1।।
जिनने सकल परिग्रह छोड़ा, विषय-वासना से मुख मोड़ा।
जला शुक्ल ध्यानाग्नि लगा दी, अष्टकर्म रिपु काठ में ।। 2।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २७२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’