(तर्ज: दरबार सजा)
भंडार भरा चेतन राजा का ।।टेक।।
स्वयं सिद्ध भण्डार है अक्षय, ओर न छोर दिखाय ।
इक-इक शक्ति अनन्त शान्तिमय अन्तर में विलसाय ।।1।।
सकल विश्व जहँ युगपद् झलके, ऐसो केवलज्ञान ।
प्रगटे जिसमें अनन्त काल तक तो भी नहीं अवसान ।।2।।
शक्ति ऐसी सहज ज्ञान की, ऐसे गुण है अनन्त ।
दर्शन, सुख, वीरज अनन्त हैं, प्रभुता को नहीं अन्त ।।3।।
चक्री के तो रत्न हैं चौदह, चेतन के हैं अनन्त ।
अविनाशी अद्भुत विभव, चेतन का विलसन्त ।।4।।
पूज्य दशाएँ जगत् की, पंच-परमेष्ठी रूप ।
जाके आश्रय प्रगटतीं, ऐसो शुद्ध चिद्रूप ।।5।।
द्रव्यदृष्टि हो सहज ही, यह भंडार दिखाय ।
देखत होय निहाल फिर और न कछु सुहाय ।।6।।
जन्म-जन्म की दरिद्रता, तत्क्षण ही मिट जाय ।
फिर तो वाँछा मुक्ति की भी नहीं उपजे दुखदाय ।।7।।
निर्वाछंक निर्ग्रन्थ हो, मग्न आप में आप ।
सहज सिद्ध पद प्रगटता, विनशे पुण्य और पाप ।।8।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ९५