तर्जः तीरथ कर लो…
भक्ति श्री जिनराज की कर लो अवसर आया है।
मोक्षमार्ग में बढ़ जाने का अवसर आया है।। टेक ।।
मंगल श्री अरहंत सिद्ध साधु मंगल जानो ।
वीतराग जिनधर्म अहो ! मंगलमय पहिचानो।।
करो सत्य श्रद्धान यही सत् निमित्त बताया है।। 1।।
छोड़ पराई आश अहो ! जिनवाणी अभ्यासो ।
तत्त्वज्ञान का कर प्रकाश, दुर्मोह तिमिर नाशो।।
महाभाग्य से मानुष भव अरु जिनवृष पाया है।। 2।।
पर भावों से भिन्न स्वयं में, पूर्ण सदा लेखो।
विन्मूरति-चिन्मूरति अनुपम, शुद्धातम देखो ।।
शाश्वत मंगलमय आतम, श्री गुरु दर्शाया है।। 3।।
करो स्वानुभव से प्रमाण, ध्रुव आतम ही ध्याओ।
तोरि सकल जग द्वन्द्व फन्द, निज में ही रम जाओ ।।
सिद्ध समान स्वगुण विलसेंगे, आगम गाया है।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २५ से २६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’