तर्ज : जिया कब तक उलझेगा…
भक्ति प्रभु की कर लो, यह अवसर आया है।
शक्ति अपनी लख लो, यह अवसर आया है।।टेक ।।
प्रभु को पहिचाने बिन, भव-भव में भरमाया।
चिर से भ्रमते-भ्रमते, तुमने दुख ही पाया।।
अति दुर्लभता से रे ! जिनशासन पाया है ।।1।।
निरखो-निरखो प्रभु को, अनुपम है तिहूँ जग में।
अन्यत्र न भरमाओ, आदर्श हैं शिवमग में ।।
हर्षित हो गुण गाओ, जिन दर्शन पाया है।।2।।
शिवपद साधो साधो, अन्तर्दृष्टि लाओ ।
प्रभु सम अपनी प्रभुता, अन्तर में ही पाओ।।
निज में ही रम जाओ, शुभ योग सु-पाया है।।3।।
ज्ञायक के आश्रय से, निर्द्वन्द निराकुल हो।
हो होने योग्य सहज, तुम व्यर्थ न व्याकुल हो।।
मुक्ति निज माँहि लहो, जिनवर ने गाया है।।4।।
अवसर यदि चूक गये, दुर्गति ही पाओगे ।
पछताने से भी तो, सुख लेश न पाओगे ।।
चेतो! चेतो !! चेतन, श्री गुरू समझाया है।।5।।
बरसाती शान्ति सुधा, प्रभु शान्त छवि सोहे।
इन्द्रादिक का भी तो, निरखत ही मन मोहे ।।
सुन्दर स्तोत्रों से, बहुमान जताया है।।6।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’