भाखूं हित तेरा, सुनि हो मन मेरा | Bhakhun Hit Tera Suni Ho Man Mera

भाखूं हित तेरा, सुनि हो मन मेरा

भाखूं हित तेरा, सुनि हो मन मेरा ।।टेक।।

नरनरकादिक चारौं गति में, भटक्यो तू अधिकानी ।
परपरणति में प्रीति करी, निज परनति नाहिं पिछानी ।
सहै दुख क्यों न घनेरा ।।१।। भाखूं ।।

कुगुरु कुदेव कुपंथ पंकफंसि, तैं बहु खेद लहायो ।
शिवसुख दैन जैन जगदीपक, सो तैं कबहुं न पायो,
मिट्यो न अज्ञान अंधेरा ।।२।। भाखूं ।।

दर्शनज्ञानचरण तेरी निधि, सौ विधिठगन ठगी है ।
पाँचों इंद्रिन के विषयन में, तेरी बुद्धि लगी है,
भया इनका तू चेरा ।।३।। भाखूं ।।

तू जगजाल विषै बहु उरझ्यो, अब कर ले सुरझेरा ।
‘दौलत’ नेमिचरन पंकज का, हो तू भ्रमर सबेरा,
नशै ज्यों दुख भवकेरा ।।४।। भाखूं ।।

सबेर - सबेरा - शीघ्र ।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ९२ से ९३

अर्थ

अर्थ-हे मेरे मन तू सुन। मैं तेरे हित की बात कहता हूँ। तूने मनुष्य, नरक आदि चारों गतियों में बहुत भ्रमण किया है। तूने आज तक कभी निज-परिणति की पहचान नहीं की है, अपितु सदा पर-परिणति से ही प्रीति की है। ऐसी स्थिति में तू अनन्त दुःख क्यों नहीं सहन करेगा ? अर्थात् अवश्य सहन करेगा। हे मेरे मन तूने कुगुरु-कुदेव-कुधर्म के कीचड़ में फँसकर बहुत दुःख उठाये हैं, किन्तु मोक्षसुख देनेवाले और सारे जगत को दीपक के समान प्रकाशित करनेवाले जिनेन्द्र देव-गुरु-धर्म की शरण नहीं प्राप्त की। यही कारण है कि तेरा अज्ञान-अन्धकार मिटा नहीं। हे मेरे मन ! सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र ही तेरा सच्चा वैभव है, जिसे कर्मरूपी ठगों ने ठग रखा है; किन्तु तेरा ध्यान उधर नहीं है। तेरा उपयोग तो पंचेन्द्रियों के विषयों की ओर लगा हुआ है। तू उन ही का दास बना हुआ है। कविवर दौलतराम कहते है कि हे मेरे मन ! तू संसार के जाल में बहुत उलझ चुका है, परन्तु अब तो अपने आपको सुलझा ले और शीघ्र भगवान नेमिनाथ के चरण-कमलों का भ्रमर बन जा, ताकि तेरे संसार-दुःख का नाश हो जाय।

स्रोत: दौलत विलास, पद 121।

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