भाखूं हित तेरा, सुनि हो मन मेरा
भाखूं हित तेरा, सुनि हो मन मेरा ।।टेक।।
नरनरकादिक चारौं गति में, भटक्यो तू अधिकानी ।
परपरणति में प्रीति करी, निज परनति नाहिं पिछानी ।
सहै दुख क्यों न घनेरा ।।१।। भाखूं ।।
कुगुरु कुदेव कुपंथ पंकफंसि, तैं बहु खेद लहायो ।
शिवसुख दैन जैन जगदीपक, सो तैं कबहुं न पायो,
मिट्यो न अज्ञान अंधेरा ।।२।। भाखूं ।।
दर्शनज्ञानचरण तेरी निधि, सौ विधिठगन ठगी है ।
पाँचों इंद्रिन के विषयन में, तेरी बुद्धि लगी है,
भया इनका तू चेरा ।।३।। भाखूं ।।
तू जगजाल विषै बहु उरझ्यो, अब कर ले सुरझेरा ।
‘दौलत’ नेमिचरन पंकज का, हो तू भ्रमर सबेरा,
नशै ज्यों दुख भवकेरा ।।४।। भाखूं ।।
सबेर - सबेरा - शीघ्र ।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ९२ से ९३