भजन सम नहीं काज दूजौ
(राग जौनपुरी)
भजन सम नहीं काज दूजौ ॥टेक ॥
धर्म अंग अनेक यामें एक ही सिरताज ।
करत जाके, दुरत पातक, जुरत संत समाज ॥
भरत पुण्य भण्डार यातैं, मिलत सब सुख साज ॥१॥
भक्त को यह इष्ट ऐसो ज्यों क्षुधित को नाज ।
कर्म ईंधन को अगनि सम, भव जलधि को पाज ।
इन्द्र जाकी करत महिमा, कहो तो कैसी लाज ॥
जगतराम प्रसाद यातैं, होत अविचल राज ॥२॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ४१ (विभिन्न कवियों के भजन)
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