भज ऋषिपति ऋषभेश, ताहि नित नमत अमर असुरा | Bhaj Rishipati Rishabhesh Tahi Nit Namat Amar Asura

भज ऋषिपति ऋषभेश, ताहि नित नमत अमर असुरा

भज ऋषिपति ऋषभेश, ताहि नित नमत अमर असुरा ।
मनमथमथ दरसावनशिवपथ, वृषरथचक्रधुरा ।।भज.।।

जा प्रभुगर्भछमासपूर्व सुर, करी सुवर्णधरा ।
जन्मत सुरगिरधरसुरगणयुत, हरि पय-न्हवन करा ।।१।। भज. ।।

नटत नृत्यकी विलय देख प्रभु, लहि विराग सु थिरा ।
तब हि देवऋषि आय नाय शिर, जिनपदपुष्प धरा ।।२।। भज. ।।

केवलसमय जास वचरविने, जगभ्रमतिमिरहरा ।
सुदृगबोधचारित्रपोतलहि, भवि भवसिंधुतरा ।।३।। भज. ।।

योगसंहार निवार शेषविधि, निवसे वसुम धरा ।
‘दौलत’ जे जाको जस गावे, ते ह्वैं अज अमरा ।।४।। भज. ।।

देवऋषि = लौकान्तिक देव, वच = वचन; शेषविधि = अघातिया कर्म, वसुम-धरा = आठवीं
पृथ्वी, मोक्ष ।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ६९ से ७०

अर्थ

अर्थ- हे भाई ! ऋषियों के स्वामी उन ऋषभ जिनेन्द्र का भजन करो जिनको सुर ओर असुर भी सदा नमस्कार करते हैं। वे काम-विकार को नष्ट करनेवाले हैं, मोक्षमार्ग को दिखानेवाले हैं और धर्मरूपी रथ के चक्र की धुरी हैं। श्री ऋषभदेव के गर्भ में आने से छह माह पूर्व ही देवो ने इस पृथ्वी को स्वर्णमय बना दिया था और उनके जन्म लेने पर इन्द्र ने अपने देवों को साथ लेकर सुमेरु पर्वत पर क्षीरसागर के जल से उनका अभिषेक किया था। श्री ऋषभदेव ने नृत्य करती हुई नीलाजना नामक नर्तकी को विलय होते देखकर वैराग्य प्राप्त कर लिया था और फिर उसी समय लौकान्तिक देवों ने भी आकर एवं उनके चरणो मे मस्तक झुकाकर उनको पुष्पाजलि अर्पित की थी। उसके बाद केवलज्ञान उत्पन्न होने पर ऋषभदेव के वचनरूपी सूर्य ने संसार के भ्रमरूपी अन्धकार को दूर कर दिया था, जिससे भव्यजीवां ने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की नौका प्राप्त करके संसार-सागर को पार कर लिया। अन्त में श्री ऋषभ जिनेन्द्र ने योग-निरोध करके शेप कर्मो का भी नाश कर दिया और वे अष्टम भूमि सिद्धशिला पर जाकर विराजमान हो गये। कविवर दौलतराम कहते हैं कि जो जीव श्री ऋपभ जिनेन्द्र का यश कीर्तन करते हैं, वे अजर-अमर पद की प्राप्ति कर लेते हैं।

शब्दार्थ: पाठाता । 12 दोसत-विलास

स्रोत: दौलत विलास।

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