भैया ! जगा रही जिनवाणी, अब तो पहिचानो निज रूप | bhaiya jaga rahi jinavani aba to pahichano nija rupa

भैया ! जगा रही जिनवाणी, अब तो पहिचानो निज रूप।

पहिचानो निज रूप, तुम हो सहज शुद्ध चिद्रूप ।। टेक ।।

कैसे हों संयोग अपने, नहिं शरीर जहँ अपना।
मोह नींद में सोते-सोते, दीखे झूठा सपना।। 1।।

देखो अन्तर्दृष्टि से आतम, रागादिक से न्यारा।
निर्विकल्प निर्भेद परम ध्रुव, ज्ञायक रूप तुम्हारा।। 2।।

सिद्ध प्रभु ज्यों सिद्धालय में, तिष्ठं जाननहार।
स्वयं सिद्ध शाश्वत परमातम, अतंर माँहि निहार।। 3।।

यों भटको यह शोभा नाहीं, तुम अनन्त गुण धाम।
तृप्त स्वयं में रहो सहज ही, मिले मुक्ति अभिराम ।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १५४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’