भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे …
क्षीर नीर जड़ चेतन जानो, धातु पखान विचारा रे ॥टेक॥
जीव करम को एक जाननो, भाख्यो श्रीगणधारा रे ।
इस संसार दुःखसागर में, तोहि भ्रमावनहारा रे
भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे …॥१॥
ग्यारह अंग पढ़े सब पूरब, भेद-ज्ञान न चितारा रे ।
कहा भयो सुवटाकी नाईं, रामरूप न निहारा रे ॥
भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे …॥२॥
भवि उपदेश मुकत पहुँचाये, आप रहे संसारा रे ।
ज्यों मलाह पर पार उतारै, आप बारका वारा रे ॥
भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे …॥३॥
जिनके वचन ज्ञान परगासैं, हिरदै मोह अपारा रे ।
ज्यों मशालची और दिखावै, आप जात अँधियारा रे ॥
भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे …॥४॥
बात सुनैं पातक मन नासै, अपना मैल न झारा रे ।
बांदी परपद मलि मलि धोवै, अपनी सुधि न संभारा रे ॥
भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे …॥५॥
ताको कहा इलाज कीजिये, बूड़ा अम्बुधि धारा रे ।
जाप जप्यो बहु ताप तप्यो पर, कारज एक न सारा रे ॥
भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे …॥६॥
तेरे घट अन्तर चिनमूरति, चेतन पद उजियारा रे ।
ताहि लखै तासौं बनि आवै, ‘द्यानत’ लहि भव पारा रे ॥
भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे …॥७॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं द्यानतराय कृत भजन)
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