भाई! ज्ञान का राह दुहेला रे
भाई! ज्ञान का राह दुहेला रे …
मैं ही भगत बड़ा तपधारी, ममता गृह झकझेला रे ॥टेक॥
मैं कविता सब कवि सिर ऊपर, बानी पुद्गल मेला रे ।
मैं सब दानी मांगै सिर द्यौ, मिथ्याभाव सकेला रे ॥
भाई! ज्ञान का राह दुहेला रे ॥१॥
मृतक देह बस फिर तन आऊँ, मार जिवाऊं छेला रे ।
आप जलाऊं फेर दिखाऊं, क्रोध लोभतैं खेला रे ॥
भाई! ज्ञान का राह दुहेला रे ॥२॥
वचन सिद्ध भाषै सोई ह्वै, प्रभुता वेलन वेला रे ।
‘द्यानत’ चंचल चित पारा थिर, करै सुगुरु का चेला रे ॥
भाई! ज्ञान का राह दुहेला रे ॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं द्यानतराय कृत भजन)
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