अरे भाई! ज्ञान की राह ज्ञान का मार्ग अत्यन्त कठिन लगता है/कठिन होता है। मैं ज्ञान पाने के अनेक उपाय करता हूँ। कभी मैं भक्त बनता हूँ, कभी बहुत तप करके तपस्वी बनता हूँ, फिर भी मोह-ममता-गृहस्थी के धक्के खाता रहता हूँ। अपने को ज्ञानी बताने के लिए सब कवियों का सिरमौर सरदार बनकर कविता करने लगता हूँ, पुद्गल शब्दों का मेला लगा लेता हूँ। जो-जो जैसा जैसा माँगता है उसे वैसा वैसा देकर मैं अपने को दानी समझता हूँ, इस प्रकार सब मिथ्या भाब करता हूँ। देह मरणशील है। उस देह में बसता हूँ। रहता हूँ और मरता हूँ और फिर किसी अन्य देह में पुनः आ जाता हूँ। अन्त तक (ज्ञानप्राप्ति तक) इसी प्रकार देह का मारना-जिलाना चलता रहता है। क्रोध-लोभ आदि कषायों में स्वयं जलता हूँ और सबको उन कषायों के खेल परिणाम दिखाता रहता हूँ। द्यानतरायजी कहते हैं कि हे जीव ! ज्ञानसिद्ध (जिसने ज्ञान प्राप्त कर लिया है वह) जो वचन कहता है वह (ही) सत्य है। तू भी ऐसी प्रभुता ऐसा ज्ञान पाने में देर मत कर। ज्ञान प्राप्ति के लिए तू पारे के समान चंचल अपने चित्त को स्थिर कर और सुगुरु सत्गुरु का चेला/शिष्य बन जा।
भाई! ज्ञानका राह सुहेला रे ॥ टेक ॥
अरे भाई ! ज्ञान की राह सबसे सरल है, सुगम है, सीधी है। इसके लिए न किसी द्रव्य की आवश्यकता है, न देह को जलाने की, कष्ट देने की आवश्यकता है और न किसी नए योग या भोग की आवश्यकता है।
इसके लिए किसी से लड़ना नहीं है, इसके लिए मरना नहीं है। न कोई बेला या तेला अर्थात् दो-दो व तीन-तीन दिन का उपवास करना है। न पढ़ना है, न कोई किसी वस्तु का निर्माण करना है, न नाचना, न गाना और न कोई मेला (लोगों को इकट्ठा) करना है।
ज्ञान पाने के लिए न नहाने की आवश्यकता है, न खाने की आवश्यकता है, न द्रव्य उपार्जन की आवश्यकता है। न कहीं चलना है, न जलना है, न नष्ट होना है अर्थात् न तन को क्षीण करना है।
यह चित्त कुछ-न-कुछ ‘चाह’ करता है, इच्छा करता है, बस वह चाह ही नित्य दाह उत्पन्न करती है अर्थात् वह चाह ही दुःख का कारण है अतः तू मात्र ‘चाह’ का खेल समाप्त कर, बस ज्ञान की राह मिल जायेगी। द्यानतराय कहते हैं कि बता इसमें कौन-सी कठिन बात है? तू बिना किसी प्रकार की चाह के अकेला-निसंग-चिन्तारहित हो जा।