भाई धनि मुनि ध्यान-लगायके खरे हैं | Bhai Dhani Muni Dhyan Lagayke Khare Hain

भाई धनि मुनि ध्यान-लगायके खरे हैं

भाई धनि मुनि ध्यान-लगायके खरे हैं

मूसल भारसी धार परै है बिजुली कड़कत सोर करै है॥भाई. ॥१॥

रात अँध्यारी लोक डरे हैं, साधुजी आपनि करम हरे हैं॥भाई.॥२॥

झंझा पवन चहूँदिशि बाजैं, बादर घूम घूम अति गाजैं॥भाई. ॥३॥

डंस मसक, बहु दुख उपराजैं, ‘द्यानत’ लाग रहे निज काजैं॥भाई.॥४॥


Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन १२८

अर्थ

हे भाई! वे मुनि धन्य हैं जो ध्यानस्थ होकर खड़े हुए हैं।

वर्षा ऋतु में मूसलाधार वर्षा हो रही है और चारों ओर बिजली कड़ककर, कौंधकर शोर मचा रही है, वातावरण को भयावना कर रही है।

रात अँधेरी है, सुनसान अँधेरे में संसार भयावना लगता है। ऐसे में साधु खड़े हैं, तपस्या में लीन हैं और अपने कर्मों की निर्जरा कर रहे हैं।

चारों ओर से तीव्र पवन के झौंके, वायु के सर-सर करके बहने से व परस्पर संघात से ध्वनि उत्पन्न करते हैं। बादल भी उनके प्रवाह के साथ घुमड़ जाते हैं, गर्जना करते हैं।

वर्षाकाल में मच्छरों, डांसों की उत्पत्ति हो जाती है। वे डसते हैं, डंक मारते हैं, दुःख उपजाते हैं और विकल करते हैं। द्यानतराय कहते हैं कि उस समय भी वे मुनि अपने निज के काज में अर्थात् आत्मध्यान में लीन हो रहे हैं। इस प्रकार अपने कर्मों की निर्जरा करने में संलग्न हैं।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।

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