भाई! ब्रह्म विराजै कैसा? | Bhai Brahm Virajai Kaisa

भाई! ब्रह्म विराजै कैसा?

भाई! ब्रह्म विराजै कैसा? ॥टेक॥
जाको जान परमपद लीजे, ठीक करीजे जैसा ॥

एक कहे यह पवन रूप है, पवन देह को लागै ।
जब नारी के उदर समावै, क्यों नहिं नारी जागै ॥
भाई! ब्रह्म विराजै कैसा? ॥१॥

एक कहै यह बोलै सो ही, वैन कानतें सुनिये ।
कान जीव को जानैं नाहीं, यह तो बात न मुनिये ॥
भाई! ब्रह्म विराजै कैसा? ॥२॥

एक कहै यह फूल-वासना, बास नाक सब जाने ।
नाक ब्रह्म को वेदै नाहीं, यह भी बात न माने ॥
भाई! ब्रह्म विराजै कैसा? ॥३॥

भूमि आग जल पवन व्योम मिलि, एक कहै यह हूवा ।
नैनादिक तत्त्वनि को देखें, लखें न जीया मूवा ॥
भाई! ब्रह्म विराजै कैसा? ॥४॥

धूप चाँदनी दीप जोतसौं, ये तो परगट सूझै ।
एक कहै है लोहू में सो, मृतक भरो नहिं बूझै ॥
भाई! ब्रह्म विराजै कैसा? ॥५॥

एक कहै किनहू नहिं जाना, ब्रह्मादिक बहु खोजा ।
जानौ जीव कह्यौ क्यों तिनने, भाषैं जान्यो होजा ॥
भाई! ब्रह्म विराजै कैसा? ॥६॥

इत्यादिक मतकल्पित बातैं, तो बोलैं सो विघटै ।
‘द्यानत’ देखनहारो चेतन, गुरुकिरपातै प्रगटै ॥
भाई! ब्रह्म विराजै कैसा? ॥७॥


Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं द्यानतराय कृत भजन)

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