तर्ज : पर लक्ष्य तजो, नित तत्त्व भजो …
भगवन्त भजो, भव-अन्त लहो, समभाव धरो, सुख रूप रहो।। टेक ।।
शोक तजो प्रभु के ढिंग आओ, कहे अशोक पुकार ।
नहीं अवलम्बन योग्य पुण्य भी, कहे सिंहासन सार।। 1 ।।
प्रभु को नमो उर्ध्वगति पाओ, दुलते चमर सिखायें।
छत्र कहें सेवहु रत्नत्रय, ध्रुव प्रभुता प्रगटाय ।। 2।।
साँचो शरणा वीतरागता, दुंदुभि घोष कराय।
मानो भटकते भवि जीवों को, प्रभु के पास बुलाय ।। 3 ।।
बंध मिटावो हर्ष बढ़ावो, बरसें पुष्प अपार ।
पुण्य भाव सब करो समर्पण, प्रभु के चरण मँझार।। 4।।
भव दीखें प्रभु के भामण्डल, अभव ज्ञान के माँहि ।
साक्षी में जितभव प्रभुवर की, भव से मुक्ति पाँहि ।। 5 ।।
परम तत्त्व ज्ञायक लोकोत्तम, ध्रुव उत्तम गुणधाम।
दिव्यध्वनि में ध्वनित हो रहा, ध्याओ आतम राम।। 6।।
अतंरीक्ष निर्लिप्त दिगम्बर, नहीं कृत्रिम श्रृंगार।
प्रभु ढिंग शोभे प्रातिहार्य अरु, सहजपने अविकार ।। 7।।
अन्तर्महिमा स्वानुभूति में, अहो ! प्रत्यक्ष झलकाय।
वचनों में किंचित् नहीं आवे, सहज नमन सुखदाय ।। 8 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ६९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’