बरसत ज्ञान सुनीर हो, श्री जिनमुख-घन सौ ।। टेक ।।
शीतल होत सुबुद्धि मेदिनी, मिटत भवातप-पीर।
स्याद्वाद नय-दामिनि दमकै, होत निनाद गम्भीर ।। 1 ।।
करुणा-नदी बहै चहुंदिशि तैं, भरी सो निर्मल नीर।
‘भागचन्द’ अनुभव मंदिर को, तजत न सन्त सुधीर ।।2।।
Artist: भागचन्द
स्रोत: भक्ति-भावना (प्रथम खण्ड)
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’