बारह भावना | Barah Bhavana

बारह भावना

(छन्द : सखी)
मुनि सकलव्रती बड़भागी, भव भोगन तैं वैरागी ।
वैराग्य उपावन माई, चिन्तैं अनुप्रेक्षा भाई ।।
इन चिन्तत सम सुख जागैं, जिमि ज्वलन पवन के लागैं ।
जब ही जिय आतम जानैं, तब ही जिय शिव सुख ठानैं ।।

जोवन गृह गो धन नारी, हय गय जन आज्ञाकारी ।
इन्द्रिय भोग छिन थाई, सुरधनु चपला चपलाई ।।
सुर असुर खगाधिप जेते, मृग ज्यों हरि काल दले ते ।
मणि मन्त्र तन्त्र बहु होई, मरतैं न बचावैं कोई ।।

चहुँ गति दु:ख जीव भरे हैं, परिवर्तन पञ्च करै हैं ।
सब विधि संसार-असारा, यामैं सुख नाहिं लगारा ।।
शुभ-अशुभ करम फल जेते, भोगे जिय एकहि तेते ।
सुत दारा होय न सीरी, सब स्वारथ के हैं भीरी ।।

जल पय ज्यौं जिय तन मेला, पै भिन्न-भिन्न नहिं भेला ।
तो प्रकट जुदे धन धामा, क्यों ह्वै इक मिलि सुतरामा ।।
पल रुधिर राध मल थैली, कीकस वसादि तैं मैली ।
नव द्वार बहैं घिनकारी, अस देह करैं किम यारी ।।

जो योगन की चपलाई, तातैं ह्वै आस्रव भाई ।
आस्रव दु:खकार घनेरे, बुधिवन्त तिन्हें निरवेरे ।।
जिन पुण्य-पाप नहिं कीना, आतम अनुभव चित दीना ।
तिनही विधि आवत रोके, संवर लहि सुख अवलोके ।।

निज काल पाय विधि झरना, तासों निज काज न सरना ।
तप करि जो कर्म खिपावै, सोई शिवसुख दरसावै ।।
किन हू न कर्‌यो न धरैं को, षट् द्रव्यमयी न हरै को ।
सो लोक माहिं बिन समता, दु:ख सहै जीव नित भ्रमता ।।

अन्तिम ग्रीवक लौं की हद, पायो अनन्त विरियाँ पद ।
पर सम्यग्ज्ञान न लाधौ, दुर्लभ निज में मुनि साधौ ।।
जो भाव मोह तै न्यारे, दृग ज्ञान व्रतादिक सारे ।
सो धर्म जबै जिय धारै तब ही सुख अचल निहारै ।।

सो धर्म मुनिन करि धरिये, तिनकी करतूति उचरिये ।
ताकों सुनिये भवि प्रानी, अपनी अनुभूति पिछानी ।।


स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ २९४ से २९५