बालबोध पाठमाला भाग-१ | Balbodh Pathmala Part-1 [Hindi & English]

Contents

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णमोकार महामंत्र

णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व साहूणं॥

लोक में सब अरहंतों को नमस्कार हो, सब सिद्धों को नमस्कार हो, सब आचार्यों को नमस्कार हो, सब उपाध्यायों को नमस्कार हो और सब साधुओं को नमस्कार हो।

णमोकार मंत्र की महिमा

एसो पंचणमोयारो सव्वपावप्पणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसिं पढ़मं होहि मंगलम्।

यह पंच नमस्कार मंत्र सब पापों का नाश करनेवाला है। तथा सब मंगलों में पहला मंगल है।
यह मंत्र मोह-राग-द्वेष का अभाव करनेवाला और सम्यग्ज्ञान प्राप्त करानेवाला है।
अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु ये पाँचों परमेष्ठी कहलाते हैं। जो जीव इन पाँचों परमेष्ठियों को पहिचान कर उनके बताये हुए मार्ग पर चलता है उसे सच्चा सुख प्राप्त होता है।

प्रश्न -

१. णमोकार मंत्र शुद्ध बोलिए।
२. इस मंत्र में किसको नमस्कार किया गया है?
३. इस मंत्र के स्मरण से क्या लाभ है?
४. पंच परमेष्ठियों के नाम बताइये।
५. सच्चा सुख कैसे प्राप्त होता है?


Lesson 1: Namokar Mantra

Namo Arahantanam,
Namo Siddhanam, Namo Ayiriyanam,
Namo Uvajjhayanam,
Namo Loye Savva Sahunam.
णमो अरहंताणं,
णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं,
णमो उव्झायाणं,
णमो लोए सव्व साहूणं ।

Salutations to all the Arahantas of the World,
Salutations to all the Siddhas of the World,
Salutations to all the Acharyas of the World,
Salutations to all the Upadhyayas of the World,
Salutations to all the Sadhus of the World.

Significance of Namokar Mantra

Eso Panch Namoyaro,
Savva Pavappanasano,
Manglanancha Savvesim,
Padhamam hoi Manglam.
एसो पंच णमोयारो,
सव्व पावप्पणासणो,
मंगलाणं च सव्वेसिं,
पढ़मं होहि मंगलम् ।

This Pancha Namaskar Mantra destroys all sins and is the first benediction of all the benedictions. This Mantra destroys delusion, attachment and aversion and leads to the right knowledge.
The Arahants, the Siddhas, the Acharyas, the Upadhyayas and the Sadhus are called the five Parmesties i.e. the five Supremely adored beings. The person who knows these five Parmesties and treads the path shown by them definitely attains real happiness.

Questions:-

  1. Recite the Namokar Mantra correctly.
  2. Who have been saluted in this Mantra?
  3. What good flows from reciting this Mantra?
  4. Mention the names of five Parmesties.
  5. How is real happiness attained?

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चार मंगल

चत्तारि मंगलं, अरहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलपण्णत्तो धम्मो मंगलं।
चत्तारि लोगुत्तमा, अरहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो।
चत्तारि सरणं पव्वजामि, अरहंते सरणं पव्वज्जामि, सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वज्जामि।

लोक में चार मंगल हैं। अरहंत भगवान मंगल हैं, सिद्ध भगवान मंगल हैं, साधु (आचार्य, उपाध्याय और साधु) मंगल हैं तथा केवली भगवान द्वारा बताया गया वीतराग धर्म मंगल है।
जो मोह-राग-द्वेषरूपी पापों को गलावे और सच्चा सुख उत्पन्न करे, उसे मंगल कहते हैं। अरहंतादिक स्वयं मंगलमय हैं और उनमें भक्तिभाव होने से परम मंगल होता है।
लोक में चार उत्तम हैं। अरहंत भगवान उत्तम हैं, सिद्ध भगवान उत्तम हैं, साधु (आचार्य, उपाध्याय और साधु) उत्तम हैं तथा केवली भगवान द्वारा बताया हुआ वीतराग धर्म उत्तम हैं।
लोक में जो सबसे महान हो, उसे उत्तम कहते हैं। लोक में ये चारों सबसे महान हैं, अत: उत्तम हैं।
मैं चारों की शरण में जाता है। अरहंत भगवान की शरण में जाता हूँ, सिद्ध भगवान की शरण में जाता हूँ, साधुओं (आचार्य, उपाध्याय, और साधु) की शरण में जाता हूँ और केवली भगवान द्वारा बताये गये वीतराग धर्म की शरण में जाता हूँ।
शरण सहारे को कहते हैं। पंचपरमेष्ठी द्वारा बताये हुए मार्ग पर चलकर अपनी आत्मा की शरण लेना ही पंचपरमेष्ठी की शरण है।
जो व्यक्ति पंचपरमेष्ठी की शरण लेता है उसका कल्याण होता है अर्थात् दु:ख (भव-भ्रमण) मिट जाता है।

प्रश्न -
१. मंगल, उत्तम और शरण शब्द का अर्थ समझाइये।
२. हमें किसकी शरण लेना चाहिए?
३. आत्मा का हित किस बात में है?
४. चत्तारि मंगलं आदि पाठ को शुद्ध बोलिए।
५. पंचपरमेष्ठी की शरण का क्या अर्थ है ?


Lesson 2: The Four Mangals

Chattari Manglam, Arahanta Manglam,
Siddha Manglam, Sahu Manglam,
Kevalipannatto Dhammo Manglam.
चत्तारि मंगलं, अरहंता मंगलं,
सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं,
केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं ।
Chattari Loguttama, Arahanta Loguttama,
Siddha Loguttama, Sahu Loguttama,
Kevalipannatto Dhammo Loguttamo.
चत्तारि लोगुत्तमा, अरहंता लोगुत्तमा,
सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा,
केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो ।
Chattari Sarnam Pavvajjami, Arahante Sarnam Pavvajjami,
Siddhe Sarnam Pavvajjami, Sahu Sarnam Pavvajjami,
Kevlipannattam Dhammam Sarnam Pavvajjami.
चत्तारि सरणं पव्वज्जामि, अरहंते सरणं पव्वज्जामि ,
सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि ,
केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वज्जामि ।

There are four benefactors in the world: The Arahant is a benefactor, the Siddha is a benefactor, the Sadhu i.e. the Acharya, the Upadhyay and the Sadhu is à benefactor and the religion of non-attachment, preached by an omniscient being, is a benefactor.

A benefactor is that which removes sins (delusion, attachment and aversion) and brings real happiness. The five parmesties are themselves embodiment of benefaction and devotion to them brings supreme happiness.

There are four supreme entities in the world: The Arahanta is a supreme entity, the Siddha is a supreme entity, the Sadhu i.e. the Acharya, the Upadhyaya and the Sadhu, is a supreme entity and the religion of non- attachment preached by an omniscient being is a supreme
entity.

One who is the greatest in the world is called supreme. These four are the greatest in the world and so
they are supreme entities.

I go to all the four for my abode. I go to the Arahantasfor my abode, I go to the Siddhas for my abode, I go to the Sadhus i.e the Acharyas, the Upadhyayas and the Sadhus, for my abode and I go to the religion of non-attachment preached by an omniscient being for my abode.

Abode means shelter. Shelter in the Five Parmesties means following the path shown by them and taking refuge in one’s soul.

The person who takes refuge in the Five Parmesties obtains bliss and becomes free from all the miseries i.e. the cycle of births and deaths of the world.

Questions:-
1.Define Benefaction, Supreme and Shelter.
2. Whose shelter should we take?
3. Wherein lies the upliftment of our soul?
4. Recite correctly the Chattari Manglam verse.
5. What do you understand by taking shelter in the five Paramesties?

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तीर्थंकर भगवान

छात्र - गुरुजी ! बाहुबली क्या भगवान नहीं हैं ?
अध्यापक - क्यों नहीं हैं ?
छात्र - चौबीस भगवानों में तो उनका नाम आता ही नहीं है।
अध्यापक - चौबीस तो तीर्थंकर होते हैं। जो वीतरागी और सर्वज्ञ हैं, वे सभी भगवान हैं। अरहंत परमेष्ठी और सिद्ध परमेष्ठी भगवान ही तो हैं।
छात्र - क्या तीर्थंकर भगवान नहीं होते ?
अध्यापक - तीर्थकर तो भगवान होते ही हैं पर साथ ही जो तीर्थंकर न हों पर वीतरागी और पूर्णज्ञानी हों, वे अरहंत और सिद्ध भी भगवान हैं।
छात्र - तो तीर्थंकर किसे कहते हैं ?
अध्यापक - जो धर्मतीर्थ (मुक्ति का मार्ग) का उपदेश देते हैं, समवशरण आदि विभूति से युक्त होते हैं और जिनको तीर्थंकर नामकर्म नाम का महापुण्य का उदय होता है, उन्हें तीर्थंकर कहते हैं। वे चौबीस होते हैं।
छात्र - कृपया चौबीसों के नाम बताइए?
अध्यापक -

  1. श्री ऋषभनाथ- बैल
  2. श्री अजितनाथ- हाथी
  3. श्री संभवनाथ- अश्व (घोड़ा)
  4. श्री अभिनंदननाथ- बंदर
  5. श्री सुमतिनाथ- चकवा
  6. श्री पद्मप्रभ- कमल
  7. श्री सुपार्श्वनाथ- साथिया (स्वस्तिक)
  8. श्री चन्द्रप्रभ- चन्द्रमा
  9. श्री पुष्पदंत- मगर
  10. श्री शीतलनाथ- कल्पवृक्ष
  11. श्री श्रेयांसनाथ- गैंडा
  12. श्री वासुपूज्य- भैंसा
  13. श्री विमलनाथ- शूकर
  14. श्री अनंतनाथ- सेही
  15. श्री धर्मनाथ- वज्रदंड
  16. श्री शांतिनाथ- मृग (हिरण)
  17. श्री कुंथुनाथ- बकरा
  18. श्री अरहनाथ- मछली
  19. श्री मल्लिनाथ- कलश
  20. श्री मुनिस्रुव्रतनाथ- कच्छप (कछुआ)
  21. श्री नमिनाथ- नीलकमल
  22. श्री नेमिनाथ- शंख
  23. श्री पार्श्वनाथ- सर्प
  24. श्री महावीर(वर्द्धमान, वीर, अतिवीर, सन्मति) - सिंह

छात्र - इनका तो याद रहना कठिन है।
अध्यापक - कठिन नहीं है। हम तुम्हें एक छन्द सुनाते हैं, उसे याद कर लेना, फिर याद रखने में सरलता होगी।
छन्द

ऋषभ अजित संभव अभिनन्दन, सुमति पद्मम सुपार्श्व जिनराय।
चन्द्र पुहुप शीतल श्रेयांस जिन, वासुपूज्य पूजित सुरराय ।।
विमल अनन्त धर्म जस उज्ज्वल, शान्ति कुन्थु अर मल्लि मनाय।
मुनिसुव्रत नमि नेमि पार्श्वप्रभु, वर्द्धमान पद पुष्प चढ़ाय।।

छात्र - इनके जानने से क्या लाभ है ?
अध्यापक - इनके उपदेश को समझकर उस पर चलने से हम सब भी भगवान बन सकते हैं।

प्रश्न -
१. भगवान किसे कहते हैं ?
२. तीर्थंकर किसे कहते हैं ?
३. तीर्थंकर और भगवान में क्या अंतर है? क्या प्रत्येक भगवान तीर्थंकर होते हैं?
४. तीर्थंकर कितने होते हैं ? नाम सहित बताइए।
५. क्या भगवान भी चौबीस ही होते हैं ?
६. पहले, पाँचवें, आठवें, तेरहवें, सोलहवें, बीसवें, बाईसवें और चौबीसवें तीर्थंकरों के नाम बताइये।
७. एक से अधिक नाम किन-किन तीर्थंकरों के हैं ? नाम सहित बताइये।


Lesson 3: Tirthankar Bhagwan

Student- Sir, is Bahubali not a God?
Teacher - Why not?

Student - But, he occupies no place in the list of twenty-four Tirthankaras.
Теacher - Twenty-four are the Tirthankaras. All those who are omniscients and are free from
attachment are the Gods.

Student - Are the Tirthankaras not Gods?
Teacher - The Tirthankaras are indeed Gods, but even those who are not Tirthankaras, but are
unattached and omniscient i.e. the Arahantas and the Siddhas are also Gods.

Student - Who is a Tirthankar?
Teacher - One who preaches the right path to liberation, is surrounded by the magnificence of Samavsaran and other glories and in whom Tirthankar Namkarma has come to fruition, is called a Tirthankar. These are twenty-four in number.

Student - Kindly let us know their names.
Teacher -

  1. Rishabhdeo (Adinath)
  2. Ajitnath
  3. Sambhavnath
  4. Abhinadan
  5. Sumatinath
  6. Padmaprabha
  7. Suparshwanath
  8. Chandraprabha
  9. Pushpadanta (SuvidhiNath)
  10. Shitalnath
  11. Shreyansnath
  12. Vasupujya
  13. Vimalnath
  14. Anantnath
  15. Dharmanath
  16. Shantinath
  17. Kunthunath
  18. Arahnath
  19. Mallinath
  20. Munisuvrat
  21. Naminath
  22. Neminath
  23. Parshwanath
  24. Mahavir (Vardhman, Vir, Ativir, Sanmati)

Student - Sir, it is difficult to remember these names.
Teacher - No, it is not, I recite a poem, which you should learn by heart. Then it will be easy for you to remember these names.

Rishabh, Ajit, Sambhav, Abhinandan, Sumati,
Padam, Suparshwa Jinray;
Chandra, Puhup, Shital, Shreyans Jin,
Vasupujya pujit surray;
Vimal; Anant, Dharma jas ujjval, Shanti,
Kunthu, Ara, Malli manay;
Munisuvrata, Nami, Nemi, Parshwa Prabhu,
Vardhman pad pushpa chadhay.

Student- Sir, what is the good of knowing these?
Teacher- We can ourselves attain Godhood by understanding their teachings and practicing them.

Questions:-

  1. Who is called a God?
  2. Who is called a Tirthankar?
  3. What is the difference between a Tirthankar and a God ? Is every God a Tirthankar?
  4. How many Tirthankaras are there? Name them.
  5. Are Gods too Twenty-four in number?
  6. Tell the names of the first, the fifth, the eighth, the thirteenth, the sixteenth, the twentieth, the twenty-second and the twenty-fourth Tirthankaras.
  7. How many Tirthankaras bear more than one name? Name them.

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देवदर्शन

दिनेश - जिनेश ! ओ जिनेश !! कहाँ जा रहे हो ?
जिनेश - मन्दिरजी।
दिनेश - क्यों ?
जिनेश - जिनेन्द्र भगवान के दर्शन करने।
दिनेश - अच्छा मैं भी चलता हूँ।
जिनेश - तुम चलोगे तो चलो; पर पहिले यह चमड़े की पट्टी (बेल्ट) घर खोलकर आओ। तुम्हें पता नहीं मन्दिर में चमड़े से बनी वस्तुएँ लेकर नहीं जाना चाहिए।
दिनेश - अच्छा भाई ! मैं अभी खोलकर आया।
( दोनों मन्दिर पहुँचते हैं)।

जिनेश - अरे भाई ! कहाँ चले जा रहे हो ? जूते तो यहीं खोल दो। मन्दिर के भीतर चप्पल, जूते पहने हुए नहीं जाते। मालूम होता है पहिले तुम कभी मन्दिर आये ही नहीं, इसीकारण दर्शन करने की विधि भी नहीं जानते।
दिनेश - हाँ भाई, नहीं जानता, अब तुम बताओ।
जिनेश - सुनो ! मन्दिर के दरवाजे पर पानी रखा रहता है। हमें चाहिए कि सबसे पहिले चप्पल-जूते खोलकर पानी से हाथ-पैर धोकर फिर भगवान की जयजयकार करते हुए तथा तीन बार नि:सहि नि:सहि नि:सहि बोलते हुए मन्दिर में प्रवेश करें।
दिनेश - नि:सहि का क्या अर्थ होता है ?
जिनेश - नि:सहि का अर्थ है सर्व सांसारिक कार्यों का निषेध। तात्पर्य यह है कि संसार के सब कार्यों की उलझन छोड़ कर मन्दिर में प्रवेश करें।
दिनेश - उसके बाद?
जिनेश - उसके बाद भगवान की वेदी के सामने ॐ जय जय जय नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु णमो अरहंताणं आदि णमोकार मंत्र एवं चत्तारि मंगलं आदि पाठ बोलते हुए जिनेन्द्र भगवान को अष्टांग नमस्कार करें। इसके बाद चित्त को एकाग्र करके भगवान की स्तुति पढ़ते हुए तीन प्रदक्षिणा देनी चाहिए। उसके बाद फिर भगवान को नमस्कार कर नौ बार णमोकार मंत्र पढ़ते हुए कायोत्सर्ग करना चाहिए।
दिनेश - अच्छा तो शान्ति से इस प्रकार चित्त एकाग्र करके भगवान का दर्शन करना चाहिए। और…
जिनेश - और क्या ? उसके बाद शान्ति से बैठकर कम से कम आधा घंटा शास्त्र पढ़ना चाहिए। यदि मन्दिरजी में उस समय प्रवचन होता हो तो वह सुनना चाहिए।
दिनेश - बस…।।
जिनेश - बस क्या ? जो शास्त्र में पढ़ा हो अथवा प्रवचन में सुना हो, उसे थोड़ी देर बैठकर मनन करना चाहिए तथा सोचना चाहिए कि मैं कौन हूँ ? भगवान कौन हैं ? मैं स्वयं भगवान कैसे बन सकता हूँ? आदि, आदि।
दिनेश - इन सबसे क्या लाभ होगा?
जिनेश - इससे आत्मा में शान्ति प्राप्त होती है। परिणामों में निर्मलता आती है। मन्दिर में आत्मा की चर्चा होती है। अत: यदि हम आत्मा को समझकर उसमें लीन हो जायें तो परमात्मा बन सकते हैं।

प्रश्न -
१. देवदर्शन की विधि अपने शब्दों में बोलिए।
२. मन्दिर में कैसे और क्यों जाना चाहिए?
३. मन्दिर में कौन-कौन वस्तु नहीं ले जाना चाहिए?
४. देवदर्शन करते समय क्या बोलना चाहिए?
५. मन्दिर में क्या-क्या करना चाहिए?


Lesson 4: Dev Darshan

Dinesh - Jinesh ! Where are you going to?
Jinesh - To the holy temple.

Dinesh - What for ?
Jinesh - To have darshan of the Jinendra Bhagwan.

Dinesh - Well, I also come with you.
Jinesh - That is fine! first put off this leather belt. One should not carry things made of leather inside the temple.

Dinesh - Well, I shall just put it off.

(Both reach the temple)

Jinesh - Oh Brother, where are you going? Please put the shoes here. Shoes and chappals are off your not taken inside a temple. It seems you have not visited a temple before, and are not acquainted with the method of Darshan.
Dinesh - Yes, I do not know the correct method. Please let me know it.

Jinesh- First of all, we should take off our shoes and chappals and wash our hands and feet at the
gate of the temple where water is kept for the purpose. Then we should enter the temple proclaiming victory to God and uttering the word ‘Nissahi’ three times.

Dinesh- What is the meaning of ‘Nissahi’?
Jinesh- ‘Nissahi’ means giving up all kinds of worldly affairs. The meaning is that we should enter a temple after giving up all the desires and anxieties of the world.

Dinesh- Then, what?
Jinesh- Standing before the altar of God and chanting Om Jaya Jaya Jaya, Namostu, Namostu,
Namostu, Namo Arahantanam, Chattari Manglam etc., one should bow down before God. Then going around the altar three times, one should say his prayers. Then again bowing before God and chanting Namokar Mantra nine times, one should stand erect and meditate with concentration.

Dinesh- Well, this is the way one should have Darshan of God with concentration, what more?
Jinesh – After that one should study some religious books at least for half an hour. If religious discourse is going on, one should listen to that.

Dinesh- Is that all?
Jinesh- Not that, one should ponder over the matter read or heard in the discourse. Onė should
also ponder over questions like “Who am I ?” “Who is God ?” “How can I attain Godhood?” etc.

Dinesh- What is the good of all this?
Jinesh- This brings peace to the soul and purifies our thoughts. We talk about our soul in the temple. If we understand our soul and dive deep into it we can ourselves attain Godhood.

Questions:-

  1. Explain the method of Dev Darshan.
  2. How and for what purpose should we go to a temple?
  3. What things are prohibited inside a temple?
  4. What should we chant at the time of Darshan?
  5. What rituals should we observe in a temple?

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जीव और अजीव

हीरालाल - मेरा कितना अच्छा नाम है ?
ज्ञानचंद - अहा ! बहुत अच्छा नाम है! अरे भाई ! हीरा कीमती अवश्य होता है, परन्तु है तो अजीव ही न? आखिर क्या तुम जीव (चेतन) से अजीव बनना पसन्द करते हो ?
हीरालाल - अरे भाई ! यह जीव-अजीव क्या है ?
ज्ञानचन्द - जीव ! जीव नहीं जानते ? तुम जीव ही तो हो । जो ज्ञाता-द्रष्टा है, वही जीव है। जो जानता है, जिसमें
ज्ञान है, वही जीव है।
हीरालाल - और अजीव ?
ज्ञानचन्द - जिसमें ज्ञान नहीं है, जो जान नहीं सकता, वही अजीव है। जैसे हम तुम जानते हैं, अतः जीव हैं। हीरा, सोना, चाँदी, टेबल, कुर्सी जानते नहीं हैं, अतः अजीव हैं।
हीरालाल - जीव-अजीव की और क्या पहिचान है ?
ज्ञानचन्द - जीव सुख व दु:ख का अनुभव करता है, अजीव में सुख-दु:ख नहीं होता। हम तुम सुख-दु:ख का अनुभव करते है, अतः जीव हैं। टेबल, कुर्सी सुख-दुःख का अनुभव नहीं करते, अत: अजीव हैं।
हीरालाल - आँखें देखती हैं, कान सुनते हैं, शरीर में सुख-दु:ख होता है, तो अपना शरीर तो जीव है न ?
ज्ञानचन्द - नहीं भाई ! आँख थोड़े ही देखती है, कान थोड़े ही सुनते हैं, देखने-सुनने वाला इनसे अलग कोई जीव (आत्मा) है। यदि आँख देखे और कान सुने तो मुर्दे (मरा शरीर) को भी देखना-सुनना चाहिए। इसीलिए तो कहा है कि शरीर अजीव है और आँख, कान आदि शरीर के ही हिस्से हैं, अतः वे भी अजीव हैं।
हीरालाल - अच्छा भाई ज्ञानचन्द, अब मैं समझ गया कि : मैं जीव हूँ। शरीर अजीव है।मुझ में ज्ञान है। शरीर में ज्ञान नहीं है। मैं जानता हूँ। शरीर कुछ जानता नहीं है।
ज्ञानचन्द - समझ गये तो बताओ, हाथी जीव है या अजीव ?
हीरालाल - जैसे हमारा शरीर अजीव है, वैसे ही हाथी आदि सब जीवों का शरीर भी अजीव है, पर उनकी आत्मा तो जीव ही है। यह समझ तो लिया, पर इसके जानने से लाभ क्या है? यह भी तो बताओ।
ज्ञानचन्द - इसको जाने बिना आत्मा की सच्ची पहिचान नहीं हो सकती और आत्मा की पहिचान बिना सच्चा सुख नहीं मिल सकता तथा हमें सुखी होना है, इसलिए इनका ज्ञान करना भी आवश्यक है। जीव-अजीव का ज्ञान कर हम स्वयं भगवान बन सकते हैं।

प्रश्न -
१. जीव किसे कहते हैं?
२. अजीव किसे कहते हैं ?
३. नीचे लिखी वस्तुओं में जीव-अजीव की पहचान करो :
हाथी, तुम, कुर्सी, मकान, रेल, कान, आँख, रोटी, हवाई जहाज, हवा, आग।
४. जीव-अजीव की पहिचान से क्या लाभ है?


Lesson 5: The Living and the Non-living

Hiralal: How sweet is my name?
Gyanchand: Yes, sweet it certainly is. Though a diamond is valuable, it is lifeless. Would you like to be transformed into a non-living ?

Hiralal: What do you mean by the living and the non-living?
Gyanchand: Don’t you know living beings? You are yourself a living being. One who knows and perceives is a living being. In other words one who possesses the power of perception (Gyan) is a living being.

Hiralal: And Non-living?
Gyanchand: That knows not and possesses no power of perception is non-living. Both you and I are living beings because we possess the power of knowledge. Diamond, gold, silver, table, chair, etc. are non-living, as they do not possess the power of knowledge.

Hiralal: What are the other signs of the living and non-living beings?
Gyanchand: The living being feels pleasure and pain, whereas the non-living does not. We are living beings since we feel pleasure and pain. The table and chair do not feel pain or pleasure and so they are non-living

Hiralal: Our eyes see, our ears hear and the body feels pains and pleasures. So is our body a living being?
Gyanchand: No. The eye never sees and the ear never hears. The seer and the hearer is our soul, quite separate from them. If the eye and the ear possess the power of seeing and hearing, a dead body should also see and hear. So the body is non-living and its organs, eyes and ears etc. are also non-living.

Hiralal: Now I have understood that I am a living being, that the body is a non-living; that I am possessed of the power of knowing, and that the body does not have this power; I know, the body does not know.
Gyanchand: If you have understood the difference please tell me whether an elephant is a living or a non-living?

Hiralal: Like our body, the bodies of the elephant and other living beings are non-living, but their souls are living. I have understood all this. But please let me know what benefit is derived from
this knowledge.
Gyanchand: Without knowing this we cannot have a correct understanding of our soul, and without such understanding, we cannot attain real happiness. Since all of us wish to be happy, we should have this knowledge. We can ourselves attain Godhood by understanding the reality about the living and the non-living.

Questions:-

  1. Who is a living being?
  2. What do you mean by a non-living?
  3. Please point out the living and the non-living in the following list – an elephant, yourself, a chair, a house, a train, an ear, an eye, a bread, an airplane, air, and fire.
  4. What is the advantage of knowing the question of the living and non-living?

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दिनचर्या

अध्यापक - बालको ! आज हम तुम्हारे नाखून और दाँत देखेंगे। अच्छा, बोलो रमेश ! तुम कितने दिनों से नहीं नहाये?
रमेश - जी, मैं तो रोज नहाता हूँ।
अध्यापक - प्रतिदिन नहाने वाले के हाथ-पैर इतने गंदे नहीं होते हैं। हो सकता है तुम रोज नहाते हो, पर दो लोटे पानी सिर पर डाल लेना ही नहाना नहीं है, हमें अच्छी तरह मल-मल कर नहाना चाहिए। इसीप्रकार हमें अपने दाँत साफ करने के लिए प्रतिदिन प्रात:काल मंजन भी करना चाहिए। जो बच्चे मंजन नहीं करते हैं उनके मुँह से बदबू आती रहती है, उनके दाँत कमजोर हो जाते हैं और गिर जाते हैं।
सुरेश - गुरुजी ! मैं तो शाम को नहाता हूँ।
अध्यापक - नहीं, हमें प्रत्येक काम समय पर करना चाहिए। तभी ठीक रहता है। हमें प्रतिदिन की दिनचर्या बना लेना चाहिए और फिर उसके अनुसार अपना दैनिक कार्य निबटाना चाहिए।
रमेश - गुरुजी ! हमारी दिनचर्या आप ही बना दें। हम आज से उसके अनुसार ही कार्य करेंगे।
अध्यापक - प्रत्येक बालक को चाहिए कि वह सूर्योदय होने के पूर्व बिस्तर छोड़ दे। सबसे पहले नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करें, फिर थोड़ी देर आत्मा के स्वरूप का विचार कर मन को शुद्ध करें।
सुरेश - क्या मन भी अशुद्ध होता है ?
अध्यापक - हाँ भाई, जिस तरह बाह्य गंदगी हमारे शरीर को गंदा कर देती है, उसी प्रकार मोह-राग-द्वेष आदि विकारी भावों से हमारा मन (आत्मा) गंदा हो जाता है। जिस प्रकार स्नान, मंजन आदि द्वारा हमारी देह साफ हो जाती है, उसी प्रकार आत्मा और परमात्मा के चिंतन से हमारा मन (आत्मा ) पवित्र होता है। हमें अंतर और बाहर दोनों की पवित्रता पर ध्यान देना चाहिए।
रमेश - उसके बाद?
अध्यापक - उसके बाद शौच (टट्टी) आदि से निपट कर मंजन करके स्नान करे तथा शुद्ध साफ धुले हुए कपड़े पहन कर मंदिरजी में देवदर्शन करने जाना चाहिए। देवदर्शन की विधि तो तुम्हें उस दिन समझाई थी। उसके बाद ही अल्पाहार (दूध, नाश्ता) लेकर यदि स्कूल और पाठशाला का समय हो वहाँ चले जाना चाहिए, नहीं तो घर पर ही स्वयं अध्ययन करना चाहिए।
इसी प्रकार भोजन भी प्रतिदिन यथासमय १०-११ बजे शांतिपूर्वक करना चाहिए। शाम को दिन छिपने के पूर्व ही भोजन से निवृत्त हो जाना प्रत्येक बालक का कर्तव्य है। रात्रि को भोजन कभी नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार रात्रि को भी जब तक तुम्हारा मन लगे ८-९ बजे तक अपना पाठ याद करना चाहिए। उसके बाद आत्मा और परमात्मा का स्मरण करते हुए स्वच्छ और साफ बिस्तर पर शांति से सो जाना चाहिए।
सब बालक - आज से हम आपकी बताई हुई दिनचर्या के अनुसार ही चलेंगे और शरीर की सफाई के साथ ही आत्मा की पवित्रता का भी ध्यान रखेंगे।


Lesson 6: The Daily Time-Table

Teacher: Boys, I shall examine your teeth and nails today. Ramesh, tell me for how many days you have not taken your bath?
Ramesh: Sir, I take my bath daily.

Teacher: Legs and hands of those who bathe daily are not so dirty. You just pour two or three mugs of water. That is not real bath. You should clean your body by rubbing it with a towel. Similarly one should clean one’s teeth every morning, otherwise they start giving foul smell. The teeth get weakened and fall off.

Suresh: Sir, I take my bath in the evening.
Teacher: We must do things at their proper time. Our daily activities must be based on a time-table and we should follow that always.

Ramesh: Sir, kindly prepare a time-table for us. We shall follow it from today.
Тeacher: Every boy should get up before sunrise. First of all, he should chant the Namokar Mantra nine times. Then he should think over the nature of the soul in order to purify his mind.

Student: Does the mind also become impure?
Teacher: Yes, as the body becomes unclean by the outside dirt etc., so our mind (soul) becomes impure by delusion, attachment and aversion. Just as our bodies become clean by bathing etc., so by virtue of understanding the nature of our soul and the perfect soul, our minds become purified. We should take care of the inner and outer purity.

Ramesh: What next?
Teacher: After ablution, one should clean one’s teeth and take a bath. One should then put on clean clothes and go to the temple for having Darshan. Points regarding Dev darshan were explained to you the other day. Then one should have one’s breakfast and go to school, or study at home.
One should take the morning meal peacefully between 10 A.M. to 11 A.M. Every boy should be free from his evening meal before sun-set. One should not take his meal during the night. One should study up to 8 P.M. or 9 P.M. so long as one can concentrate. Afterward one should remember one’s own soul and those of the liberated beings and go to bed quietly.

All Students:
From today, we shall follow this time- table and will maintain cleanliness both of the body and the soul.

Questions:-

  1. What type of time-table should a good student follow ?
  2. What should we do first of all after getting up in the morning ?
  3. What do you understand by purity of the body and the soul ?
  4. What should one do for the cleanliness of the body ?
  5. What should one do for the purification of one’s soul ?

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भगवान आदिनाथ

बेटी - माँ, चलो न घर !
माँ - चलती तो हूँ, जरा भक्तामरजी का पाठ कर लूँ।
बेटी - भक्तामरजी क्या है?
माँ - भक्तामर स्तोत्र एक स्तुति का नाम है, जिसमें भगवान आदिनाथ की स्तुति (भक्ति) की गई है।
बेटी - माँ, आदिनाथ कौन थे जिनकी स्तुति हजारों लोग प्रतिदिन करते हैं ?
माँ - वे भगवान थे। वे दुनियाँ की सब बातों को जानते थे तथा उनके मोह-राग-द्वेष नष्ट हो चुके थे, इस कारण परम सुखी थे।
बेटी - क्या वे जन्म से ही वीतरागी सर्वज्ञ थे ? उनका जन्म कहाँ हुआ था ?
माँ - नहीं बेटी ! उन्होंने वीतरागता और सर्वज्ञता पुरुषार्थ से प्राप्त की थी। उनका जन्म अयोध्या नगरी में वहाँ के राजा नाभिराय की रानी मरुदेवी के गर्भ से हुआ था।
बेटी - वे तो राजकुमार थे, क्या उन्होंने राज्य नहीं किया ?
माँ - राज्य किया, विवाह भी किया था। उनकी दो शादियाँ हुई थीं। पहली पत्नी का नाम नन्दा था, जिससे भरत चक्रवर्ती आदि सौ पुत्र और ब्राह्मी नामक पुत्री उत्पन्न हुई। दूसरी पत्नी का नाम सुनन्दा था, जिससे बाहुबली पुत्र और सुन्दरी नामक पुत्री उत्पन्न हुई।
बेटी - तो क्या भरत चक्रवर्ती और बाहुबली आदिनाथ भगवान के ही पुत्र थे?
माँ - भगवान तो वे बाद में बने। उस समय तो उनका नाम राजा ऋषभदेव था। प्रथम तीर्थंकर भगवान होने से उन्हें आदिनाथ भी कहने लगे। एक दिन राजा ऋषभदेव अपनी सभा में बैठे नीलांजना का नृत्य देख रहे थे। नृत्य के बीच में ही नीलांजना की मृत्यु हो गई। यह देख उन्हें संसार की क्षणभंगुरता का ध्यान आया और राजपाट आदि सभी का राग छोड़कर दिगम्बर हो गये। छह माह तक तो आत्म-ध्यान में लीन रहे। उसके बाद छह माह तक आहार की विधि नहीं मिली।
एक वर्ष बाद अक्षय तृतीया के दिन ऋषभ मुनि का सर्वप्रथम आहार राजा श्रेयांस के यहाँ इक्षुरस (गन्ने का रस) का हुआ। उसी दिन से अक्षय तृतीया पर्व चल पड़ा।
बेटी - क्या वे मुनि होते ही सर्वज्ञ बन गये थे ?
माँ - नहीं बेटी ! एक हजार वर्ष तक बराबर मौन आत्म साधना करते रहे । एक दिन आत्म-तल्लीनता की दशा में उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई और वे वीतरागी सर्वज्ञ बन गए तथा उनकी दिव्यध्वनि द्वारा तत्त्वोपदेश होने लगा जिससे भव्य जीवों को मुक्ति के मार्ग का ज्ञान हुआ।
बेटी - तो तुम क्या उनकी ही स्तुति करती हो ? मैं भी किया करूंगी। क्या वे मुझे भी मुक्ति का मार्ग बतायेंगे ?
माँ - अवश्य किया करना। वे तो कुछ दिन बाद मुक्त हो गए थे अर्थात् धर्मसभा (समवशरण) आदि को भी छोड़कर सिद्ध हो गए। पर उनका बताया हुआ मुक्तिमार्ग तो आज तक भी ज्ञानियों के द्वारा हमें प्राप्त है और जो उनके बताए मुक्तिमार्ग पर चलें वे ही उनके सच्चे भक्त हैं। तथा वे स्वयं भगवान भी बन सकते हैं।

प्रश्न -
१. भक्तामर स्तोत्र में किसकी स्तुति है ?
२. भगवान आदिनाथ का संक्षिप्त परिचय दीजिए ।
३. अक्षय तृतीया पर्व के सम्बन्ध में तुम क्या जानते हो ?
४. राजा ऋषभदेव भगवान आदिनाथ कैसे बने तथा उन्हें आदिनाथ क्यों कहा जाता है ?
५. उन्हें वैराग्य कैसे हुआ ?
६. क्या उनका बताया हुआ मुक्तिमार्ग हम पा सकते हैं ? यदि हाँ, तो कैसे ?


Lesson 7: Bhagwan Adinath

Daughter: Mummy, let us go home.
Mother: Just wait, let me recite Bhaktamar Stotra.

Daughter: What is Bhaktamar Stotra?
Mother: It is a devotional poem in which Bhagwan – Adinath has been adored.

Daughter: Mummy, who was Adinath, in whose adoration thousands of people recite this рoem?
Mother: He was a God. He knew all the things of the world. He was perfectly happy because he was devoid of delusion, attachment and Mother aversion.

Daughter: Had he been unattached and omniscient - since birth?
Mother: No, my dear. He achieved the state of non- attachment and omniscience by his supreme efforts. Born in Ayodhya, he was the son of King Nabhiray and Marudevi, the Queen.

Daughter: Prince ! he was. Did he not rule?
Mother: Yes, he ruled and married also. He had two wives. Nanda was his first wife, who bore a hundred sons including Bharat Chakravarty and a daughter Brahmi. His second wife was Sunanda, who bore Bahubali and a daughter Sundari.

Daughter: So ! were Bharat, the Chakravarty and Bahubali sons of Lord Adinath?
Mother: Adinath attained Godhood later in life. He was simply King Rishabhdeo at that time. Since he was the first Tirthankar, he was called Adinath. One day Neelanjana was .dancing in his Court. During the course of the dance, Neelanjana passed away. Seeing this he realized the transitoriness of the world, forsook the royal life and became a saint.
For six months he remained absorbed in contemplation. For the next six months also he did not get food due to his self-imposed conditions. After a year on a certain day King Shreyans gave him sugar-cane juice for the first time. Since then the day has been celebrated as Akshaya Tritiya festival in India.

Daughter: Did he become Omniscient immediately after becoming a saint?
Mother: No, my dear, for one thousand years he remained in the state of self-absorption. One day he obtained perfect knowledge in that state and began to preach his gospel, which showed the path of liberation to the world.

Daughter: So you offer your prayers to him. I shall also do the same. Will he show me also the
path of liberation?
Mother: By all means, offer your prayers to Him. Leaving the glories of the Samavsaran, the religious court, he became a perfectly liberated soul. The way to liberation, as preached by him, is shown to us by the enlightened souls. The persons who tread his path are his true devotees and can attain Godhood in the same way.

Questions:-

  1. Who is adored in Bhaktamar Stotra?
  2. Give a brief life sketch of Adinath Bhagwan.
  3. What do you know regarding Akshaya Tritiya festival?
  4. How did King Rishabhdeo become Lord Adinath? Why is he called Adinath?
  5. What made him leave the glories and pleasures of his life?
  6. Can we follow the path to liberation as shown by him? If so, how?

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मेरा धाम

शुद्धातम है मेरा नाम, मात्र जानना मेरा काम ।
मुक्तिपुरी है मेरा धाम, मिलता जहाँ पुर्ण विश्राम॥

जहाँ भुख का नाम नही है, जहाँ प्यास का काम नही है।
खाँसी और जुखाम नही है, आधि व्याधि का नाम नही है|
सत शिव सुंदर मेरा धाम, शुद्धातम है मेरा नाम||(1)

स्वपर-भेद विज्ञान करेंगे, निज आतम का ध्यान धरेंगे।
राग-द्वेष का त्याग करेंगे, चिदानंद रस पान करेंगे॥
सब सुखदाता मेरा धाम, शुद्धातम है मेरा नाम||(2)

शुद्धातम है मेरा नाम, मात्र जानना मेरा काम|


Lesson 8: My Home

My name is pure soul,
Knowing alone is my job,
Salvation is my home,
Where I enjoy perfect bliss.

No hunger in my abode,
No thirst in my abode,
No cough or cold in my abode,
No pain or agony in my abode.

True, happy and lovely is my Home.
My name is pure soul,
Knowing alone is my job.

We shall discriminate the self from others,
We shall meditate upon our soul,
We shall renounce worldly belongings and aversion,
We shall enjoy spiritual bliss.

My Home is full of all happiness,
My name is pure soul,
Knowing alone is my job.

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PREACHINGS OF BHAGWAN MAHAVIRA

  • Every soul is independent. None depends on another.
  • All souls are alike. None is superior or inferior. Every soul is in itself absolutely omniscient and blissful. The bliss does not come from outside.
  • Not only soul but every object of the universe also, is subject to change by itself, without any external
    interference.
  • All human beings are miserable due to their own faults, and they can themselves be happy by rectifying the same.
  • The greatest mistake of a soul is non-recognition of its real-self and it can only be rectified by recognizing itself.
  • There is no separate existence of God. Everybody can attain Godhood by making supreme efforts in
    the right direction.
  • Know thyself; recognize thyself; be immersed in thyself-you will attain Godhood.
  • God is neither the creator nor the destructor of the universe. He is merely a silent observer and omniscient.
  • One, who, even after knowing the whole universe can remain unaffected and unattached, is God.

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