बाह्याचार विधान कहे, चरणानुयोग सुखकारी | bahyachara vidhana kahe charananuyoga sukhakari

बाह्याचार विधान कहे, चरणानुयोग सुखकारी।

ताहि समझ के धरो मुमुक्षु, निज विशुद्धि अनुसारी ।। 1 ।।

लोक स्वरूप कर्म बन्धन, परिणतियाँ न्यारी-न्यारी।
भेद-प्रभेद सबहि रचना, करणानुयोग विस्तारी।। 2।।

प्रथमानुयोग कथाओं द्वारा, तत्त्व कहे सुखकारी।
उत्साहित करता शिव-मारग में, सबको हितकारी।। 3।।

सुनें-सुनावें, पढ़ें-पढ़ावें, तज प्रमाद दुःखकारी।
जिनवाणी माँ के प्रसाद से, होवें सम्यक्धारी।। 4।।

अमृत पान करें अंतर में, यही सार सुखकारी।
रत्नत्रयमय पथ पर चलकर, पावें शिव अविकारी।। 5।।

जिनवाणी आनन्दमय, दिव्यध्वनि का सार ।
सब जग में नित विस्तरे, नमो त्रियोग सम्हार।। 6।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १५१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’