बाह्य जग के दृश्य न देखूँ, जिन दर्शन कर तृप्त रहूँ ॥ टेक ॥
नहीं प्रशंसा गीत सुनूँ मैं, जिनवाणी सुन तृप्त रहूँ ।
मौन रहूँ कुछ अन्य न बोलूँ, भक्ति करते तृप्त रहूँ ॥ 1 ॥
सत्कार्यों की करूँ प्रशंसा, सत् चर्चा में तृप्त रहूँ।
वैभव भोग न चाहूँ कुछ भी, निज वैभव में तृप्त रहूँ ॥ 2 ॥
स्पर्शन पर का नहीं चाहूँ, गुरु चरणों में तृप्त रहूँ।
निरतिचार हो शील सदा ही, शुद्धातम में तृप्त रहूँ ॥ 3 ॥
रहूँ अकर्त्ता रहूँ अभोक्ता, ज्ञाता रहते तृप्त रहूँ।
अन्य न कोई चाह जिनेश्वर, निज प्रभुता में तृप्त रहूँ ॥ 4 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’